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योद्धा और मक्खियाँ * –लू शुन

lu shun

जर्मन दार्शनिक शौपेनहावर ने कहा है कि मनुष्य की श्रेष्ठता को आँकने के मामले में, आत्मिक श्रेष्ठता और शरीर के आकार को निर्धारित करने वाले नियम एक दूसरे के विपरीत होते हैं. हमारे लिए इसका अभिप्राय यह है कि आदमी का शरीर जितना ही छोटा होगा, उतनी ही उसकी भावनाएँ श्रेष्ठ होंगी.

ऐसा इसलिए कि करीब से देखने पर जहाँ उसकी त्रुटियाँ और घाव साफ दिखाई देते हैं, कोई आदमी नायक नहीं दिखता, बल्कि वह हमारी ही तरह लगता है, भगवान या किसी नयी प्रजाति का अलौकिक प्राणी नहीं लगता. वह महज एक आदमी होता है. लेकिन निश्चय ही इसी में उसकी महानता होती है.

जब कोई योद्धा रणक्षेत्र में धराशायी हो जाता है, तो मक्खियों को जो चीज सबसे पहले नजर आती है, वह उसकी त्रुटियाँ और घाव ही होते हैं. वे उनको भिनभिनाते हुए चूसती हैं और यह सोच कर खुश होती हैं कि वे इस पराजित नायक से ज्यादा महान हैं. और चूँकि नायक मर चुका होता है और वह उन मक्खियों को उड़ा नहीं पाता, इसलिए मक्खियाँ और जोर-जोर से भिनभिनाती हैं और कल्पना करती हैं कि वे अमर संगीत का सृजन कर रही हैं, क्योंकि वे उस मृत नायक से अधिक पूर्ण और उत्तम हैं.

सही है कि मक्खियों की त्रुटियों और घावों पर कोई भी ध्यान नहीं देता.

हालाँकि अपनी तमाम त्रुटियों और घावों के बावजूद योद्धा तो योद्धा ही होता है, जबकी अत्यंत परिपूर्ण और उत्तम मक्खियाँ भी आखिरकार मक्खियाँ ही होती हैं.

भिनभिनाओ, मक्खियो! भले ही तुम्हारे पास पंख हों और भले ही तुम्हारे पास भिनभिन करने की क्षमता हो, लेकिन तुम जैसे कीड़े-मकोड़े किसी योद्धा के मुकाबिल नहीं हो सकते!

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* यहाँ योद्धा  डॉ. सुन यात-सेन और 1911 की क्रान्ति के शहीदों को कहा गया है, जबकि मक्खियाँ प्रतिक्रियावादियों के भाड़े के टट्टुओं को .

(अनुवादक– दिगम्बर)

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आलोचकों से मैं क्या चाहता हूँ – लू-शुन

lu shun

दो या तीन साल पहले नियतकालीन पत्रिकाओं में साहित्य के रूप में थोड़ा-सा मौलिक लेखन (अगर हम ऐसा कह सकते हों तो) और अनुवाद को छोड़कर कुछ खास नहीं होता था. इसीलिए पाठकों ने आलोचकों की आवश्यकता को महसूस किया. अब आलोचक प्रकट हुए और दिनों-दिन इनकी संख्या बढ़ती ही जा रही है.

यह देखते हुए कि हमारा साहित्य इतना अपरिपक्व है, कला की लौ को तेज करने के लिए आलोचकों द्वारा इसकी अच्छाइयों का पता लगाना वास्तव में बहुत अच्छा है. वे आधुनिक रचनाओं के सतहीपन को लेकर इस उम्मीद के साथ अफ़सोस जाहिर करते हैं कि हमारे लेखक कही अधिक गहन-गम्भीर रचना करेंगे तथा वे खून और आँसू के जमाव पर खेद प्रकट करते हैं, ताकि ऐसा न हो कि आधुनिक लेखक बहुत ही ढिठाई के साथ विकास कर रहे हों. ऐसा लग सकता है कि वे अतिशयोक्तिपूर्ण अलोचना कर रहे हैं, लेकिन वास्तव में यह दिखाता है कि साहित्य को लेकर उनमें गहरा लगाव है और हमें उनके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए.

लेकिन कुछ दूसरे लोग भी हैं जो साहित्यिक आलोचना की एक या दो “पश्चिमी” किताबों पर ही भरोसा करते हैं और कुछ पुरानी पंडिताऊ रचनाओं का कूड़ा परोसते हैं या चीन की परम्परागत “सच्चाइयों” को अपनाने का आग्रह करते हैं और साहित्य जगत की कटु आलोचना करते हैं. ऐसे लोग एक आलोचक के रूप में अपने प्राधिकार का दुरूपयोग करते हैं. मैं एक अनगढ़ और सरल सा दृश्य प्रस्तुत करने की इजाजत चाहूँगा. अगर किसी रसोइये ने कोई व्यंजन तैयार किया है और कोई व्यक्ति उसमें कमी देखता है, तो निश्चय ही उसे अपनी कड़ाही और दूसरे बर्तन उस आलोचक के सामने रख कर यह नहीं कहना चाहिए कि “लीजिए, इससे बेहतर बना कर दिखाइये.” लेकिन उसे इतनी उम्मीद करने का अधिकार है कि जिस व्यक्ति ने उसके व्यंजन का स्वाद चखा है उसकी भूख मर तो नहीं गयी है या वह शराब के नशे में या बुखार से पीड़ित तो नहीं, जिसके चलते उसकी जीभ मोटी और छालेदार हो गयी हो.

मैं तो आलोचकों से इससे भी कम की माँग करता हूँ. मैं यह उम्मीद नहीं करता कि दूसरों की रचना की चीर-फाड़ करने और उस पर अपना फैसला सुनाने से पहले वे अपनी ही चीर-फाड़ करें और फैसला सुनाएँ, ताकि यह देख सकें कि वे किसी रूप में छिछला, संकीर्ण और गलत तो नहीं है. यह तो बहुत अधिक माँग करना होगा. मैं सिर्फ इतनी आशा करता हूँ कि वे थोड़ी सहज बुद्धि का प्रयोग करेंगे. उन्हें इन दो भिन्न चीजों में अन्तर करना चाहिए, जैसे – नग्नता और अश्लीलता के अध्ययन के बीच, चुम्बन और सहवास के बीच, लाश के पोस्टमार्टम और उसको चिथड़े-चिथड़े करने के बीच, पढ़ने के लिए विदेश जाने और “बर्बरों द्वारा निर्वासित किये जाने” के बीच, बाँस की कोंपल और बाँस के बीच, बिल्ली और चूहे के बीच, बाघ और कॉफी हाउस के बीच … . निश्चय ही एक आलोचक पूरी तरह आजाद है कि उसके तर्क इंग्लैण्ड और अमरीका के कुछ पुराने विशेषज्ञ पर निर्भर हों, लेकिन मुझे उम्मीद है कि वह भूलेगा नहीं कि दुनिया में और भी देश हैं. वह चाहे तो तोल्सतोय का तिरस्कार कर सकता है, लेकिन मुझे उम्मीद है कि ऐसा करने से पहले वह उनका अध्ययन करेगा, उनकी कुछ किताबें पढ़ेगा.

ऐसे भी आलोचक हैं जो अनुवादों की आलोचना करते हुए यह घोषित करते है कि यह श्रम की बर्बादी है और अनुवादकों को लेखन कार्य में हाथ आजमाना चाहिए. शायद यह अनुवादक को यह जताना है कि लेखक का पेशा कितना सम्मानपूर्ण है, लेकिन फिर भी वह अनुवाद कार्य में ही संलग्न है क्योंकि वह इसी में सक्षम है या यही काम उसे सबसे अधिक पसन्द है. इस तरह यदि कोई आलोचक ऐसे-वैसे प्रस्ताव देता है, तो वह अपने अधिकार-क्षेत्र का उल्लंघन करता है– क्योंकि इस तरह के सुझाव आलोचना नहीं, बल्कि सलाह हैं. रसोइये के साथ तुलना वाले प्रसंग की ओर लौटते हैं– कोई भी व्यक्ति जो व्यंजन चखता है उसे यह बताने की जरूरत है कि स्वाद के बारे में उसकी राय क्या है. इसकी जगह यदि वह रसोइये को इस बात के लिए फटकारता है कि वह दर्जी या राज मिस्त्री क्यों नहीं है, तो वह रसोइया चाहे जितना भी बेवकूफ हो, इतना जरूर कहेगा– “महाराज, आप पागल हैं क्या!”

(अनुवाद- दिगम्बर)

लेखन काल- 9 नवंबर, 1922

राय जाहिर करने के बारे में

 

–लू शुन

lu shun

मैनें सपना देखा

कि मैं प्राथमिक विद्यालय की एक कक्षा में था । एक लेख लिखने की तैयारी कर रहा था और मैंने शिक्षक से पूछा कि कोई राय जाहिर करनी हो तो कैसे करें ।

“यह तो कठिन काम है ।” अपने चश्में के बाहर से मेरी ओर निहारते हुए उन्होंने कहा, “मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ–
“एक परिवार में जब बेटा पैदा हुआ, तो पूरे घराने में खुशी की लहर दौड़ गयी । जब वह बच्चा एक महीने का हो गया, तो वे लोग उसे मेहमानों को दिखाने के लिए बाहर ले आये । जाहिर है कि उन्हें उन लोगों से शुभकामनाओं की उम्मीद थी ।
“एक ने कहा– ‘यह बच्चा धनवान होगा ।’ उसे लोगों ने हृदय से धन्यवाद दिया ।
“एक ने कहा– ‘यह बच्चा बड़ा होकर अफसर बनेगा ।’ उसे भी जवाब में लोगों की प्रशंसा मिली ।
“एक ने कहा– ‘यह बच्चा मर जायेगा ।’ उसके बाद पूरे परिवार ने मिल कर उसकी कस के धुनाई की ।
“बच्चा मरेगा, यह तो अवश्यंभावी है, जबकि वह धनवान होगा या अफसर बनेगा, ऐसा कहना झूठ भी हो सकता है । फिर भी झूठ की प्रशंसा की जाती है, जबकि अपरिहार्य सम्भावना के बारे में दिये गये वक्तव्य पर मार पिटाई होती है । तुम–––”
“मैं झूठी बात नहीं कहना चाहता श्रीमान, और पिटना भी नहीं चाहता । तो मुझे क्या कहना चाहिए ?”
“ऐसी स्थिति में कहो– ‘आ हाहा! जरा इस बच्चे को तो देखो! मेरी तरफ से इसे––– आ हाहा! मेरा मतलब आहाहा! हे, हे! हे, हे, हे, हे।

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