Tag Archives: लूशुन

लू शुन की दो गद्य कविताएँ

(विश्व साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर लू शुन ने सृजानात्मक लेखन की तुलना में ज़नोन्मुख लेखकों की नयी पीढ़ी तैयार करने और सांस्कृतिक आन्दोलन खड़ा करने की ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी को अधिक महत्त्व दिया. पिछड़े हुए चीनी समाज के लिए यह ऐतिहासिक दायित्व स्वतंत्र लेखन से कहीं अधिक महत्व रखता था. इस कलम के सिपाही ने साहित्यिक लेख, व्यंग्य, लघु कथाएँ, कहानियाँ, समीक्षात्मक लेख और ऐतिहासिक उपन्यास के साथ-साथ गद्य कवितायेँ भी लिखीं. उनकी गद्य कविताओं का संकलन ‘वाइल्ड ग्रास’ नाम से प्रकाशित हुआ है. 1924 से 1926 के बीच लिखी गयी इन गद्य कविताओं साम्राज्यवाद और उत्तरी युद्ध सरदारों के खिलाफ प्रतिरोध और दमन की अभिव्यन्ज़ना सांकेतिक और अमूर्त शैली में की गयी है. इसका कारण शायद यह रहा हो कि उस समय साहित्य को कठोर सेंसर से गुज़ारना होता था.

इन गद्य कविताओं में ऊपर-ऊपर देखने पर निराशा और भयावहता की झलक मिल सकती है, लेकिन इन प्रतीकात्मक कविताओं के विविध रंग हैं. इनमें स्वप्न का सृज़न है जिनमें दु:स्वप्न भी शामिल हैं. यहाँ कुत्ते से वार्तालाप है, कीड़ों कि भिनभिनाहट है और इंसानों की नज़र से खुद को छिपाने की कोशिश करता आकाश है. समाज के ढोंग-पाखंड, निष्क्रियता, हताशा और ठहराव पर विक्षुब्ध टिप्पणी है जो मुखर नहीं है.

‘वाइल्ड ग्रास’ की भूमिका में लू शुन ने लिखा है- “धरती के भीतर तीव्र वेग से जो अग्नि-मंथन हो रहा है, उस का लावा जब सतह पर आएगा, तो वह सभी जंगली घासों और गहराई से धंसे विष-वृक्षों को जला कर खाक कर देगा, ताकि सडान्ध पैदा करनेवाली कोई चीज़ न रह जाय.”)

lu shun

भिखमँगे

मैं एक पुरानी-धुरानी, ऊँची दिवार के बगल से गुजर रहा हूँ, बारीक धूल में पैर घिसटते हुए. कई दूसरे लोग भी अकेले टहल रहे हैं. हवा का एक झोंका आया और दीवार के ऊपर से झांकते ऊँचे-ऊँचे पेड़ों की डालियाँ, जिनके पत्ते अभी झड़े नहीं हैं, मेरे सिर के ऊपर हिल रही हैं.
हवा का एक झोंका आया और हर जगह धूल ही धूल.
एक बच्चा मुझ से भीख माँग रहा हैं. वह दूसरे लोगों की तरह ही धारीदार कपड़े पहने हुए है और देखने से दुखी भी नहीं लगता , फिर भी वह रास्ता रोक कर मेरे आगे सिर झुकाता हैं और मेरे पीछे-पीछे चलता हुआ रिरियाता है.
मैं उसकी आवाज, उसके तौर-तरीके को नापसंद करता हूँ. उसमें उदासी का ना होना मेरे अन्दर घृणा पैदा करता है, जैसे यह कोई चाल हो. जिस तरह वह मेरा पीछा करते हुए रिरिया रहा है, उससे मेरे मन में जुगुप्सा पैदा हो रही है.
मैं चलता रहा. कई दूसरे लोग भी अकेले टहल रहे हैं. हवा का एक झोंका आया और हर जगह धूल ही धूल.
एक बच्चा मुझसे भीख माँग रहा है. वह दूसरे लोगों की तरह ही धारीदार कपडे पहने हुए है और देखने से दुखी नही लगता, लेकिन वह गूँगा है. वह गूँगे की तरह मेरी ओर हाथ फैलाता है.
मैं उसके गूँगेपन के इस दिखावे को नापसंद करता हूँ. हो सकता है कि वह गूँगा न हो, यह केवल भीख माँगने का उसका जरिया हो सकता है.
मैं उसे भीख नहीं देता. मुझे भीख देने की इचछा नहीं है. मैं भीख देने वालों से परे हूँ. उसके लिए मेरे मन में जुगुप्सा, संदेह और घृणा है.
मैं एक ढही हुई मिटटी की दीवार के बगल से गुजर रहा हूँ. बीच की जगह में टूटी हुई ईंटों की ढेर लगी है और दीवार के आगे कुछ नहीं है. हवा का एक झौंका आया आता है, मेरे धारीदार चोंगे के भीतर पतझड़ की सिहरन भर जाती है, और हर जगह धूल ही धूल है.
मुझे उत्सुकता होती है कि भीख माँगने के लिए मुझे क्या तरीका अपनाना चाहिए. मुझे कैसी आवाज में बोलना चाहिए? अगर मैं गूँगा होने का दिखावा करूँ तो मुझे गूँगापन कैसे प्रदर्शित करना चाहिए? ___
कई दूसरे लोग अकेले टहल रहे है .
मुझे भीख नहीं मिलेगी, भीख देने की इच्छा तक हासिल नहीं होगी. जो लोग खुद को भीख देने वालों से परे मानते हैं उनकी जुगुप्सा, संदेह और घृणा ही मिलेगी मुझे.
मैं निष्क्रियता और चुप्पी धारण किये भीख मागूँगा …
अंततः मुझे शून्यता हासिल होगी.
हवा का एक झोंका आता है और हर जगह धूल ही धूल. कई दूसरे लोग अकेले टहल रहे हैं.
धूल, धूल …
………………
धूल …

लेखन-काल 24 सितम्बर, 1924

——————————————————————————————————————————————————————————————————————————–

परछाईं का अवकाश ग्रहण

जब आप एक ऐसे समय तक सोते हैं जब आप को समय का अता-पता ही न चले, तब आपकी परछाईं इन शब्दों में अवकाश लेने आयेगी –
“कोई चीज है जिसके मैं स्वर्ग से नफरत करती हूँ, मैं वहाँ जाना नहीं चाहती. कोई चीज है जिसके चलते मैं नरक से नफरत करती हूँ, मैं वहाँ जाना नहीं चाहती. कोई चीज है आपके भविष्य की सुनहरी दुनिया में जिससे मैं नफरत करती हूँ, मैं वहाँ नहीं जाना चाहती.
“हालाँकि यह आप ही हो, जिससे मैं नफरत करती हूँ.”
“दोस्त, अब और तुम्हारा अनुसरण नहीं करूँगी, मैं रुकना नहीं चाहती.
“मैं नहीं चाहती!
“ओह, नहीं! मैं नहीं चाहती. इससे तो कहीं अच्छा है कि मैं शून्य में भटकूँ.
मैं तो केवल एक परछाईं हूँ. मैं तुम्हें त्याग दूँगी और अन्धेरे में डूब जाऊँगी. फिर वह अन्धेरा हमें निगल लेगा, और रोशनी भी मुझे गायब कर देगी.
“लेकिन मैं रोशनी और छाया के बीच भटकना नहीं चाहती, इससे तो कहीं अच्छा कि मैं अन्धेरे में डूब जाऊं.
“फिर भी अब तक मैं रोशनी और छाया के बीच ही मँडरा रही हूँ, अनिश्चय में कि अभी साँझ हुई या भोर. मैं तो बस अपने धूसर-भूरे हाथ उठा सकती हूँ जैसे शराब की एक प्याली खत्म करनी हो. जिस समय मुझे समय का अता-पता नहीं रह जाएगा, तब मैं दूर तक अकेली ही चली जाऊँगी.
“हाय! अगर अभी साँझ हुई है, तो काली रात मुझे पक्के तौर पर घेर लेगी या मैं दिन के उजाले में लुप्त कर दी जाऊँगी अगर अभी भोर हुई है.
“दोस्त, समय अभी हाथ में है.
“मैं शून्यता में भटकने के लिए अन्धेरे में प्रवेश करने जा रही हूँ .
“अभी भी आप हमसे कोई उपहार की उम्मीद रखते हैं. मेरे पास देने के लिए है ही क्या? अगर आप जिद करेंगे तो आपको वही अन्धेरा और शून्यता हासिल होगी. लेकिन मैं चाहूँगी कि केवल अन्धेरा ही मिले जो आपके दिन के उजाले में गायब हो सके. मैं चाहूँगी कि यह केवल शून्यता हो, जो आपके हृदय को कभी भी काबू में नहीं रखेगी.
“मैं यही चाहती हूँ, दोस्त –
“दूर, बहुत दूर, एक ऐसे अन्धेरे में जाना जिससे न केवल तुम्हें, बल्कि दूसरी परछाइयों को भी निकाल बाहर किया जाय. वहाँ सिर्फ मैं रहूँगी अन्धेरे में डूबी हुई. वह दुनिया पूरी तरह मेरी होगी.”

लेखन-काल 24 सित. 1924

(अनुवाद – दिगम्बर)

Advertisements
%d bloggers like this: