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क्रान्ति (एक कवि का इतिवृत) –व्लादिमीर मायकोवस्की

26 फरवरी, पियक्कड़ सैनिकों ने पुलिस के साथ मिलकर, जनता पर गोली दागी.

 

27 तारीख को

लाल, दीर्घकालिक,

सूर्योदय की दग्ध किरणें फूटीं,

बन्दूक के चमकते नाल और संगीन पर छिटकीं.

दुर्गन्ध भरे बैरकों में,

शान्त,

निर्दयी,

वोलिन्सकी रेजिमेंट ने प्रार्थना की.

अपने क्रूर सैनिक भगवान को

अर्पित किया अपना सौगंध,

भृकुटी तने माथे को फर्श पर पटका,

उबलते आक्रोश में हाथों को जकड़कर इस्पात बनाते हुए,

तीव्र गुस्से से खून उतर आया उनकी कनपटियों पर.

 

पहला,

जिसने आदेश दिया-

“भुखमरी के नाम पर गोली दागो!”

उसके भौंकते मुँह को बन्द कर दिया एक गोली ने.

चुप कर दिया किसी के “सावधान!” को

चाकू के प्रहार ने,

भाड़ में जाएँ वे.

सैनिक टुकड़ियाँ शहर में फ़ैल गयीं आँधी की तरह.

 

9 बजे

 

वाहन स्कूल के

अपने स्थाई ठिकाने के पास

हम डटे रहे,

बैरेक की बाड़ में घिरे हुए.

ज्यों-ज्यों ऊपर चढ़ता है सूरज

आत्मा को सालता है संदेह,

भयावह, लेकिन सुहावने पूर्वानुमान से भरा.

खिड़की पर!

मैंने देखा-

दिख रहे थे जहाँ से आसमान को बेधते

महल के कंगूरों के तीखे दाँत

बाज की ऊँची उड़ान,

ज्यादा मनहूस,

ज्यादा खूँख्वार,

सचमुच बाज जैसे.

 

और देखते-देखते

जनता,

घोड़े,

सड़क की बत्तियाँ,

इमारतें,

और सैकड़ों की तादात में

मेरे बैरक,

उमड़ आये सड़कों पर

झुण्ड के झुण्ड,

उनके तीखे पदचाप गूँजने लगे सड़कों पर,

कानों को चीरती, दानवी कर्कश आवाजें.

 

और फिर,

भीड़ के गाने से-

या क्या पता?-

पहरेदारों के कर्णभेदी बिगुल से

उभरी,

एक प्रतिमा,

उज्जवल,

गर्द-गुबार को चीरती झलकी उसकी दीप्ती.

 

उसके फैलते पंखों के आगोश में आते गए जनगण

उनकी चाह थी रोटी से अधिक की,

प्यास थी पानी से अधिक की,

आवाज आई–

“नागरिको, हथियार उठाओ- हर एक औरत और मर्द!

हथियार उठाओ, नागरिको, हिचक छोड़ दो!”

झंडों के पंखों पर सवार

सौ-सिरों का बल लिए

वह शहर के उदर से होते हुए

आकाश छूती ऊँचाइयों तक उड़ा,

भय से काँप उठा दोमुहें शाही बाज का शरीर

काँप उठी जान लेने पर आमादा उसकी संगीनें.

 

नागरिको!

आज के दिन पलट रहा है तुम्हारा हजारों साल पुराना अतीत.

आज के दिन बदल रही है दुनिया की बुनियाद.

आज,

आज पूरी दृढ़ता के साथ

हर एक की जिन्दगी में बदलाव शुरू करना है.

 

नागरिको!

यह पहला दिन है

मजदूरों को आनन्द विभोर करने वाला.

हम आये हैं

इस गड़बड़ दुनिया की सहायता के लिए.

जनसमूह को अपने पदचाप ओर चीख से आसमान हिलाने दो!

सायरन की चीख से फूटने दो नाविकों का आक्रोश!

 

होशियार, दोमुहें लोगो!

हिलोर, गीतों का शोर

उन्मत करती है जनसमूह को

राह में होते हिमस्खलन की तरह.

चौराहे जोश से उबल रहे हैं.

छोटी-सी फोर्ड मोटर में इधर-उधर डोलते

गोली के निशाने को पीछे छोड़ते हुए

धमाकेदार शोर मचाते हुए

गुजरते हैं हम शहर को चीरते हुए.

 

कोहरा!

सड़क पर प्रवाहमान

जन-सैलाब से उठता धुंआ

जैसे एक दर्जन विराट नावें खेते नाविक

तूफानी दिनों के ऊपर

विद्रोही लोगों की मोर्चाबंदी के ऊपर से

गा रहे हों बुलंद आवाज में क्रान्ति-गीत मर्सियेज.

 

पहले दिन का प्रचंड तोप का गोला

सनसनाता हुआ दूमा के गुम्बंद के पिछवाड़े लुढका.

एक नये भोर की नयी थरथराहट

जकडती है हमारी आत्मा को,

बेसुध और उदास करते हैं हमें, नये संदेहों के हमले.

 

आगे क्या होगा?

क्या हम इन संदेहों को

फेंक देंगे खिडकियों से बाहर,

या पसरे रहेंगे अकर्मण्य अपने काठ के तखत पर

इस इन्तजार में कि राजाशाही

पूरे रूस को वीभत्स

भयानक टीलेनुमा

कब्रगाहों में बदल दे.

 

कानों को छेदते बन्दूक के धमाकों से

अपने कलेजे को सुन्न कर लिया मैंने.

ओर इसके बाद,

बरसातियों के बीचों-बीच बन गया खंदक.

इमारतों के ऊपर

गोलियाँ बरसाना शुरू किया मशीन-गनों ने

शहर जल रहा है

गोलों के बज्रपात से छिन्न-भिन्न.

हर जगह जीभ लपलपाती लपटें

ऊपर उठती फिर इधर-उधार फैलती.

फिर-फिर ऊँची उठती, दूर तलक छिटकाती चिंगारियाँ.

ये सड़कें हैं

सब पर लाल झंडे टंगे-

लाल लपटें अपील करती रूसियों से, रूस से.

 

एक बार फिर

अरे, एक बार फिर

अपने विवेक की झलक दिखाओ,

ऐ रक्ताभ जिह्वा और लाल होंठों वाले वक्ता

निचोड़ो, सूरज ओर चाँद की चमकीली किरणों को

हजारों हाथों वाले मारात दानव को

अपने प्रतिशोधी जकड में ले लो!

मरते, दोमुहें लोग!

टूटते जेलों के दरवाजे पर पड़ी जंग

खुरचते हुए अपने नाखूनों से!

बाज के पंखों के पुलिंदे की तरह

गोली खाकर टपकते धूल में

हथियार बन्द सिपाही.

 

आत्म समर्पण करता है, राजधानी का जलता खण्डहर.

अटारियों के इर्द-गिर्द चारों ओर चल रही है तलाशी.

वह क्षण निकट आ गया है.

त्रोइत्सकी पुल पर सैनिकों का समूह

परेड करता, धीरे-धीरे आगे बढता है.

 

चरमराहटें गूँजती हैं काँपती बुनियादों और शहतीरों की

हमारे प्रहार से दुश्मन गिरफ्त में आता जा रहा है.

क्षण भर में

पेट्रोपाव्लोव्स्काया दुर्ग से

लपटों की तरह, क्रान्तिकारी पताका ऊँचाई में लहराता है

सूर्यास्त की लालिमा से आलोकित

विनाश हो, दो मुंहों का!

सर उड़ा दो!

गला रेत दो!

फिर कभी रौंद न पाये हमसब को

उनके जूतों की नाल!

वहाँ देखो,

वह धरासाई हो रहा है!

उस कोने में अंतिम आदमी पर झपट्टा मारते हुए.

भगवान!

चार हजार ओर आत्माओं को अपने घेरे में ले लो!

 

हद है!

असीम आनन्द में उठती है सभी आवाजें!

हमारे लिए भगवान क्या है

सौभाग्यशाली अपने स्वर्ग सहित?

खुद हम लोग और

हमारे मृतक भी,

संतों के साथ शांति से सो जाएँगे कब्र में.

 

कोई भी गा नहीं रहा है क्यों?

या, रक्तरंजित,

साइबेरियाई कफ़न ने हमारी आत्माओं को जकड लिया?

हमने विजय पायी है!

गौरव,

हम सबके लिए गौरव, हर एक के लिए!

हथियारों पर हाथ की जकड कायम है अब भी,

हम एक नया कानून लागू करते हैं

जिस पर चलेंगे लोग.

अंततः इस धरती पर लाते हैं हम नये धर्मादेश-

अपने ही धूसर सिनाई पर्वत से.

 

हमारे लिए, इस पृथ्वी ग्रह के निवासियों के लिए,

पृथ्वी का हर निवासी सबसे करीबी रक्त-सम्बन्धी है,

चाहे हो खान मजदूर,

क्लर्क या किसान.

पृथ्वी पर हम सभी यहाँ सैनिक हैं-

एक ही जीवन-सर्जक सेना के!

ग्रहों की उड़ान,

राज्यों का जीवन

हमारी इच्छा के अधीन हैं.

हमारी है यह पृथ्वी,

हवा हमारी है,

तारे जो हीरों की तरह भरे हैं आकाश में.

और हम कसम खाते हैं

अपनी आत्मा की-

हम कभी भी

कभी भी!

अपने ग्रह को उड़ाने नहीं देंगे

किसी को तोप के गोलों से

या चीरने नहीं देंगे अपनी हवा को

पैनी सान वाले भाले से.

 

किसका मनहूस गुस्सा

दो फाड़ करता है इस ग्रह को?

कौन उड़ाता है काला धुआँ

इन चमकते रणक्षेत्रों में?

क्या एक ही सूर्य

काफी नहीं है

तुम सबके लिए?

क्या एक आकाश

काफी नहीं तुम सब के लिए-

जिन्होंने जन्म लिया और बड़े हो रहे हैं?

 

अन्तिम बंदूकें गरज रही हैं खुनी विवादों के बीच.

शस्त्रागारों में,

जहाँ बना अंतिम संगीन!

हम सभी सैनिकों से नष्ट करवाएंगे

उनके बारूद,

हम बच्चों में बाँट देंगे हथगोले

गेंद बना कर.

 

डर की चीत्कार नहीं आती अब

धूसर बरसातियों से,

भीषण अकाल में जन्मे लोगों का

रुदन अब नहीं आता

आज असंख्य लोग गरज रहे हैं

“हमें भरोसा है

मनुष्य के हृदय की महानता पर!”

 

जहाँ उड़ रही है सघन धुल

रणक्षेत्र के ऊपर,

उन तमाम लोगों के ऊपर

उत्पीडन के मारे जिन्होंने खो दिए थे

 

प्यार पर भरोसा,

 

उदीयमान है आज,

अकल्पनीय रूप से वास्तविक

सर्वकालिक समाजवादी वैभवशाली मतान्तर!

(अनुवाद — दिगम्बर)

 

 

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कामरेड लेनिन से बातचीत (1829) –ब्लादिमीर मायकोवस्की

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घटनाओं की एक चकरघिन्नी

ढेर सारे कामों से लदा,

दिन डूबता है धीरे-धीरे

जब उतरती है रात की परछाईं.

दो जने हैं कमरे में—

मैं

और लेनिन-

एक तस्वीर

सफेद दीवार पर लटकी.

दाढ़ी के बाल फिसलते हैं

उनके होठों के ऊपर

जब उनका मुँह

झटके से खुलता है बोलने को.

तनी हुई

भौं की सलवटें

विचारों को रखती हैं

उनकी पकड़ में,

घनी भौंहें

मेल खाती घने विचारों से.

झंडों का एक जंगल

उठी हुई मुट्ठियाँ घास की तरह सघन…

हजारों लोग बढ़ रहे हैं जुलूस में

उनके नीचे…

गाड़ियों से लाये गए,

ख़ुशी से उछलते हुए उतरते,

मैं अपनी जगह से उठता हूँ,

उनको देखने के लिए आतुर,

उनके अभिवादन के लिए,

उनके आगे हाजिर होने के लिए!

“कामरेड लेनिन,

मैं आपके सामने हाजिर हूँ-

(किसी के आदेश से नहीं,

सिर्फ अपने दिल की आवाज पर)

.यह मुश्किल काम

पूरा किया जायेगा,

बल्कि पूरा किया जा रहा है.

हम लोगों को मुहय्या करा रहे है

खाना और कपड़ा

और जरूरतमन्दों को रोशनी,

कोटा

कोयले का

और लोहे का

पूरा हुआ,

लेकिन अभी भी

परेशानियाँ कम नहीं,

कूड़ा-करकट

और बकवास

आज भी हमारे चारों ओर.

तुम्हारे बिना,

ढेर सारे लोग

बेकाबू हो गए,

सभी तरह के झगड़े

और वाद-विवाद

जो मुमकिन हैं.

हर तरह के बदमाश

भारी तादाद में

परेशान कर रहे हैं हमारे देश को,

सरहद के बाहर

और भीतर भी.

कोशिश करो

इन्हें गिनने की

और दर्ज करने की,

इनकी कोई सीमा नहीं.

सभी तरह के बदमाश,

और बिच्छू की तरह विषैले—

कुलक,

लालफीताशाह

और

निचली कतारों में,

पियक्कड़,

कट्टरपंथी,

चाटुकार.

वे अकड़ते हुए चलते हैं,

घमण्ड में चूर

मोर की तरह,

उनकी छाती पर जड़े

बैज और फौन्टेन पेन.

हम उनमें से बहुतों से छुटकारा पा लेंगे

मगर यह काम आसान नहीं

बेहद कठिन प्रयास की जरूरत है.

बर्फ से ढकी जमीन पर

और बंजर खेतों में,

धुआँभरे कारखानों में

और बन रहे कारखानों के पास,

आपको दिल में बसाए,

कामरेड लेनिन,

हम रच रहे हैं,

हम सोच रहे हैं,

हम साँस ले रहे हैं,

हम जी रहे हैं,

और हम संघर्ष कर रहे हैं!

घटनाओं की एक चकरघिन्नी

ढेर सारे कामों से लदा,

दिन डूबता है धीरे-धीरे

जब उतरती है रात की परछाईं.

दो जने हैं कमरे में—

मैं

और लेनिन-

एक तस्वीर

सफेद दीवार पर लटकी.

(अनुवाद– दिगम्बर)

व्लादिमीर मायकोवस्की की कविता- तुम

maykovasky
तुम, जो व्याभिचार के कीचड़ में लगातार लोट रहे हो,
गरम गुसलखाने और आरामदायक शौचालय के मालिक!
तुम्हारी मजाल कि अपनी चुन्धियायी आँखों से पढ़ो
अखबार में छपी सेंट जोर्ज पदक दिये जाने जैसी खबर!

तुमको परवाह भी है, उन बेशुमार मामूली लोगों की
जिन्हें चिंता है कि वे कैसे पूरी करते रहे तुम्हारी हवश,
कि शायद अभी-अभी लेफ्टिनेंट पेत्रोव की दोनों टांगें
उड़ गयीं हैं बम के धमाके से?

कल्पना करो कि अगर वह, जिसे बलि देने के लिये लाया गया,
अपने खून से लतपथ टांगे लिये आये और अचानक देख ले,
कि वोदका और सोडा-वाटर गटकते अपने पियक्कड थोबड़े से
गुनगुना रहे हो तुम सेवेरियाती का कामुक गीत!

औरतों की देह, मुर्ग-मुसल्लम और मोटर गाड़ियों के पीछे पागल
तुम्हारे जैसे अय्याश लोगों के लिये, मैं अपनी जान दे दूँ?
इससे लाख दर्जे अच्छा है कि मास्को के भटियारखाने में जाकर
वहाँ रंडियों को शरबत पिलाने के काम में लग जाऊं.

(अनुवाद- दिगम्बर)

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