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पूँजीवाद से नफरत करने के दस प्रमुख कारण

carrying garbage

-गैरी एन्गलर

दसवाँ– पूँजीवादी निगम एक व्यक्तित्व विकार के शिकार हैं जिसकी झलक उनके स्थाई असामाजिक आचरण, सहानुभूति और पश्चाताप के अभाव में मिलती है और ऐसे आचरण के लिये वे अपने शेयरधारकों द्वारा पुरस्कृत किये जाते हैं. अगर निगमों को आपराधिक मनोचिकित्सक के दफ्तर में भेजा जाय, तो वह उनको मनोरोगी करार देगा और हमेशा के लिये उनपर ताला जड़ देगा.

 

नौवाँ— पूँजीवाद लालच को बढ़ावा देता है. लेकिन लालच केवल पूँजीवाद के लिये ही अच्छी चीज़ है. सामान्य जन की निगाह में यह समाजविरोधी और आत्मा का विनाश करनेवाली चीज़ है, कहने की ज़रूरत नहीं कि यह हमारे उन समुदायों के लिये बहुत ही बुरी चीज़ है जो परोपकार, करुणा और एक-दूसरे के प्रति समान सरोकार में यकीन करते हैं.

 

आठवाँ— पूँजीवाद मुट्ठीभर लोगों के विशेषाधिकार और उनके वर्गीय शासन की व्यवस्था है, जो जीविका के साधनों के निजी मालिकाने पर आधारित है. यह थोड़े से धनी लोगों को रोज़गार बेचने और खरीदने की शक्ति प्रदान करती है, जिसका अर्थ है कि उन रोजगारों पर निर्भर करनेवाले किसी समुदाय का निर्माण या विनाश वे ही कर सकते हैं.

 

सातवाँ— पूँजीपति स्वतंत्रता और व्यक्तिवाद की तारीफ़ करते हैं, लेकिन वे अपने अलावा सबकी स्वतंत्रता और व्यक्तिवाद का खात्मा करते हैं. ज़िंदा रहने के लिये काम करनेवाले हम में से ज़्यादातर लोगों से हर रोज यह कहा जाता है कि हम बिना कोई सवाल किये चुपचाप आदेश का पालन करें, इस तरह काम करें जैसे हम कोई मशीन हों और अपनी सृज़नशीलता को वहीँ तक सीमित रखें जब तक मालिकों का मुनाफा बढ़ता रहे.

 

छठा— पूँजीवाद सहकारिता और सामूहिकता को कलंकित करता है, लेकिन साथ ही वह बड़े पैमाने के उत्पादन का ढाँचा तैयार करता है जो मजदूरों से इन दोनों ही चीजों की माँग करता है. उनकी व्यवस्था की जरुरत है कि हम उसके कल-पुर्जे बन जाएँ, लेकिन इसके चलते हमें जो शक्ति हासिल होती है उससे डरकर हमसे कहा जाता है कि अपने हित में मिलजुलकर काम करना नाजायज और गलत है. इसीलिए पूँजीपति वर्ग मजदूर-यूनियनों को और मजदूरों के बीच एक-दूसरे का सहयोग करने और मिलजुलकर काम करने की प्रेरणा देनेवाले सभी संगठनों को नष्ट करने की कोशिश करता है.

 

पाँचवाँ— पूँजीवाद को इतने विराट प्रचार-तंत्र की जरूरत है, जैसा दुनिया ने आज तक नहीं देखा, ताकि वह हमें समझा सके कि पूँजीवाद ही एकमात्र सम्भव व्यवस्था है. विज्ञापन, विपणन, मनोरंजन और यहाँ तक ​​कि तथाकथित समाचारों के जरिये यह जनता को उपभोक्ता में बदल देता है. दुनिया भर में करोड़ों लोगों को इस काम पर लगाया गया है कि वे अपनी रचनाशीलता का इस्तेमाल करके हमारी प्यार, अभिलाषा, मानवीय भाईचारा और खरापन जैसी  भावनाओं को तोड़-मरोड़कर उन्हें तीन-तिकडम के साधन में बदल दें, ताकि मुट्ठी भर मुनाफाखोरों का मुनाफा पहले से भी अधिक बढ़ता रहे.

 

चौथा— पूँजीवाद एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ की नीति के ऊपर ‘नोट देकर वोट लो’ की नीति हावी होती है. जो लोग अधिकांश शेयरों के मालिक होते हैं (डालर से खरीदकर), वे ही उन दैत्याकार निगमों को नियंत्रित करते हैं, जिनमें से कई निगमों की ताकत कुछ को छोड़कर दुनिया की सभी सरकारों से अधिक है. धनाढ्य लोग उन चुनावों में अपना वर्चश्व कायम करने के लिए भी धन का इस्तेमाल करते हैं जिनमें ऐसा बताया जाता है कि हममें से हर एक को मतदान का सामान अधिकार है. पूँजीवाद के अंतर्गत जिनके पास बेहिसाब पैसा है, वे ही अधिकांश उपभोग की वस्तुओं और सेवाओं के हक़दार हैं तथा हमारी सरकार और अर्थव्यवस्था को चलाने में उनकी ही राय मानी जाती है.

 

तीसरा– पूँजीवाद निजी-स्वार्थ के सदाचार का दावेदार है, लेकिन नैतिकता, पर्यावरण या सामान्य विवेक का आदर किये बिना निजी-स्वार्थ पर्यावरण का क्षरण, देशज समुदायों का विनाश, उपनिवेशवाद, युद्ध और व्यापक जनसंहार के दूसरे रूपों की ओर ले जाता है. निजी-स्वार्थ पूँजीपतियों को हर जगह हर कीमत पर मुनाफा कमाने की ओर ले जाता है, बिना इस बात की परवाह किये कि इससे जनता और धरती के पारिस्थितिकी तंत्र को कितना अधिक नुकसान हो रहा है. निजी-स्वार्थ पूँजीवाद को किसी भी विरोधी आर्थिक व्यवस्था या चिंतन पद्धति (जैसे देशज सामुदायिक भूमि उपयोग या प्रकृति का सम्मान) को तबाह करने की ओर ले जाता है, जो मुनाफे की अंतहीन भूख के लिये रुकावट खड़ी करता हो.

 

दूसरा— पूँजीवाद लोकतंत्र का दोस्त नहीं, बल्कि आखिरकार इसका दुश्मन है. मुसीबत में पड़ने पर पूँजीपति वर्ग लोकतंत्र की जगह पूँजीवाद को चुनता है. जब जनता पूँजीपतियों की ताकत को कमजोर करने के लिए लोकतंत्र का सहारा लेती है तो पूँजीपति और धनाढ्य अपने विशेषाधिकार की रक्षा के लिए फासीवाद के नाना रूपों का सहारा लेते हैं.

 

पहला— पूँजीवाद एक कैंसर है जिसने हमारी पूरी धरती को अपनी चपेट में ले लिया है. पूँजीपति ग्लोबल वार्मिंग करके, हमारे समुद्रों का विनाश करके, वातावरण में पहले से भी अधिक जहर घोल के और हर चीज का, यहाँ तक कि जिंदगी का भी पेटेंट करा के मुनाफा बटोरते हैं.

 

(गैरी एन्गलर एक कनाडा निवासी पत्रकार और उपन्यासकार हैं. वे हाल ही में प्रकाशित न्यू कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो—वर्कर्स ऑफ द वर्ल्ड इट रियली इज टाइम टू यूनाइट www.newcommuneist.com के सह-लेखक हैं. यह रचना काउंटरपंच से आभार सहित ली गयी है. अनुवाद– दिगम्बर)

 

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उत्तराखण्ड में भयावह तबाही : प्राकृतिक आपदा नहीं, अंधाधुंध पूँजीवादी विकास का नतीजा

प्रकृति के साथ आपराधिक छेड़-छाड और विकास के नाम पर हो रहे पर्यावरण विनाश के कारण उत्तराखंड में जो भयावह तबाही मची है वह प्राकृतिक आपदा नहीं है. बल्कि यह अंधाधुंध और बदहवास पूँजीवादी विकास का नतीजा है.
अब से 137 साल पहले महान विचारक फ्रेडरिक एंगेल्स ने ‘वानर से नर बनने की प्रक्रिया में श्रम की भूमिका’ नामक अपने लेख में प्रकृति और मानव जाति के बीच सामंजस्यपूर्ण सम्बन्धों को बाधित किये जाने के दुष्परिणामों के बारे में जो राय व्यक्त की थी वह आज हू-ब-हू हमारे सामने आ रहे हैं. प्रस्तुत है उस लेख का एक अंuttrakhandश–

…प्रकृति पर अपनी मानवीय विजयों के कारण हमें आत्मप्रशंसा में विभोर नहीं हो जाना चाहिए, क्योंकि वह हर ऐसी विजय का हमसे प्रतिशोध लेती है. यह सही है कि प्रत्येक विजय से पहले-पहल वे ही परिणाम प्राप्त होते हैं, जिनका हमने भरोसा किया था, पर दूसरी और तीसरी बार उसके बिलकुल ही भिन्न और अप्रत्याशित परिणाम होते हैं, जिनसे अक्सर पहले परिणाम का असर जाता रहता है. मेसोपोटामिया, यूनान, एशिया माइनर तथा अन्य स्थानों में जिन लोगों ने कृषियोग्य भूमि प्राप्त करने के लिये वनों को बिलकुल ही नष्ट कर डाला, उन्होंने कभी यह कल्पना तक नहीं की थी कि वनों के साथ आर्द्रता के संग्रह-केन्द्रों और आगारों का उन्मूलन करके वे इन देशों की मौजूदा तबाही की बुनियाद डाल रहे हैं. आल्प्स के इटलीवासियों ने जब पर्वतों की दक्षिणी ढलानों पर चीड़ के वनों को (ये उत्तरी ढलानों पर खूब सुरक्षित रखे गये थे) पूरी तरह से तबाह काट डाला तब उन्हें इस बात का अहसास नहीं था कि ऐसा करके वे अपने प्रदेश के पहाड़ी पशु-पालन पर कुठाराघात कर रहे हैं. इससे भी कम आभास उन्हें इस बात का था कि अपने कार्य द्वारा वे अपने पर्वतीय स्रोतों को वर्ष के अधिक भाग के लिये जलहीन बना रहे हैं और साथ ही इन स्रोतों के लिये यह सम्भव बना रहे हैं कि वे वर्षाऋतु में मैदान में और भी भयावह बाढ़ें लाया करें… हमें हर पग पर यह याद कराया जाता है कि प्रकृति पर हमारा शासन किसी विदेशी जाति पर एक विजेता के शासन जैसा कदापि नहीं है, वह प्रकृति से बाहर के किसी व्यक्ति जैसा शासन नहीं है, बल्कि रक्त, मांस और मस्तिष्क से युक्त हम प्रकृति के ही प्राणी हैं, हमारा अस्तित्व उसके ही मध्य है और उसके ऊपर हमारा सारा शासन केवल इस बात में निहित है कि अन्य सभी प्राणियों से हम इस मानी में श्रेष्ठ हैं कि हम प्रकृति के नियमों को जान सकते हैं और ठीक-ठीक लागू कर सकते हैं.
…जैसा समाज के संबंध में वैसे ही प्रकृति के संबंध में भी वर्तमान उत्पादन-प्रणाली मुख्यतया केवल प्रथम, ठोस परिणाम भर से मतलब रखती है. और तब विस्मय प्रकट किया जाता है कि इस उद्देश्य की पूर्ति के किये गये क्रियाकलाप के दूरवर्ती प्रभाव बिलकुल दूसरे ही प्रकार के, बल्कि मुख्यतया बिलकुल उल्टे ही प्रकार के होते हैं; कि पूर्ति और माँग का तालमेल बिलकुल विपरीत वस्तु में परिणत हो जाता है…

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