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आशावादी आदमी — नाजिम हिकमत

nazim

जब वह बच्चा था, उसने मक्खियों के पर नहीं नोचे

बिल्लियों की पूंछ में टिन नहीं बाँधा

माचिस की डिब्बी में भँवरों को कैद नहीं किया

चींटी की बाम्बी नहीं ढायी

वह बड़ा हुआ

और यह सबकुछ किया गया उसके साथ

जब वह मरा तो मैं उसके सिरहाने खड़ा था

उसने कहा कि एक कविता सुनाओ

सूरज और समुद्र के बारे में

नाभिकीय संयन्त्र और उपग्रहों के बारे में

मानवजाति की महानता के बारे में

(अनुवाद – दिगम्बर)

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कला के बारे में — नाजिम हिकमत

najim

 

 

 

 

 

 

 

 

कभी-कभी मैं भी कह देता हूँ- हाय,

अपने दिल की गहराइयों से

जब देखता हूँ  सुनहरे बालों की लटों में गुंथी

खुनी रंग के मोतियों की माला!

 

लेकिन मेरी कविता की देवी को

पसंद है हवा से बातें करना

इस्पात से बने डैनों पर

जैसे शहतीर मेरे झूला पुलों के!

 

मैं दिखावा नहीं करता

कि गुलाब के लिए बुलबुल का मातम

आसान नहीं कानों में गूंजना…

लेकिन वह जुबान

जो सचमुच मुझसे बात करती है

वह तो विथोवेन के सोनेट हैं बजते हुए

ताम्बा, लोहा, लकड़ी, हड्डी और ताँत पर….

 

आप के लिए “मुमकिन है”

सरपट भागते हुए गायब हो जाना

धूल के गुबार में!

जहाँ तक मेंरी बात है, मैं नहीं बदलूँगा

असली नस्ल के अरबी घोड़े से

छह मील की रफ़्तार वाला

अपना लोहे का घोड़ा

जो दौड़ता है लोहे की पटरी पर!

 

कभी-कभी मेरी आँखें उलझ जाती हैं

किसी बूढी गूंगी बड़ी मक्खी की तरह

हमारे घर के कोने में लगे चतुर मकड़ी के जाले में.

लेकिन सच पूछो तो मैं देखता हूँ

सतहत्तर मंजिले, मजबूत कंक्रीट के पहाड़

जिनको बनाते हैं मेरे नीली वर्दी वाले बिल्डर!

 

मिलना होता अगर मुझको

“जवान अदोनिस*, बाइब्लोस के देवता की”

मरदानी सुन्दरता से किसी पुल पर,

तो शायद मैं ध्यान ही नहीं देता उसकी तरफ;

मगर मैं रोक नहीं सकता टकटकी लगाने से

अपने फलसफी की बेजान आँखों के अन्दर

या अपने फायरमैन के पसीने से सराबोर

सपाट चेहरे पर, दहकता सूरज की तरह!

 

हालाँकि मैं पी सकता हूँ

घटिया सिगरेट

बिजली घर में अपने काम की जगह  पर,

लेकिन अपने हाथों से कागज में लपेटकर

नहीं पी सकता तम्बाकू-

चाहे कितना ही बेहतरीन क्यों न हो!

चमड़े की जैकेट और टोप में सजी

अपनी बीबी का सौदा

न आज तक किया और न आगे करूँगा

ईव के नंगेपन से!

मुमकिन है कि मेरे पास नहीं हो “शायराना रूह”?

लेकिन मैं क्या करूँ

अगर  मैं अपने खुद के बच्चों से प्यार करता हूँ

कहीं ज्यादा.

—————————————————-

अदोनिस– ग्रीक पौराणिक कथाओं का एक धार्मिक रहस्यादी चरित्र. सुन्दरता का प्रतीक. अदोनिस की मृत्यु  एस्बोस द्वीप के शायर सैप्फो के चारों ओर युवा लड़कियों के घेरे में हुई, ऐसा दिखाया गया है.

 

(अनुवाद – दिगम्बर)

हमारी आँखें – नाजिम हिकमत

nazim

 

 

 

 

 

 

 

हमारी आँखें

साफ़ बूँदें हैं

पानी की.

 

हर बूँद में मौजूद है

एक छोटी सी निशानी

हमारी काबिलीयत की

जिसने जान डाल दी ठन्डे लोहे में.

 

हमारी आँखें

पानी की

साफ़ बूँदें हैं

समन्दर में इस तरह घुलीमिली

कि आप शायद ही पहचान पाएँ

बर्फ की सिल्ली में एक बूँद

खौलती कडाही में.

 

शाहकार इन आँखों का

उनकी भरपूर काबिलीयत का

यह जिन्दा लोहा.

 

इन आँखों में

पाक साफ़ आँसू

छलक नहीं पाते
गहरे समन्दर से
बिखर जाती

अगर हमारी ताकत,

तो हम कभी नहीं मिला पाते

डायनेमो को टरबाइन के साथ,

कभी तैरा नहीं पाते

इस्पात के इन पहाड़ों को पानी में

इतनी आसानी से

कि जैसे खोंखले काठ के बने हों.

 

शाहकार इन आँखों का

उनकी भरपूर काबिलीयत का

हमारी मुत्तहद मेहनत का

यह जिन्दा लोहा.

(अंग्रेजी से अनुवाद — दिगम्बर)

तुम्हारे हाथ और उनके झूठ के बारे में — नाजिम हिकमत

haath

तुम्हारे हाथ
पत्थरों की तरह संगीन.
जेल में गाये गये तमाम गीतों की तरह मनहूस,
बोझ ढोनेवाले जानवरों की तरह अनाड़ी, सख़्त
और भूखे बच्चों के चेहरों की तरह नाराज़ हैं.

मधुमक्खियों की तरह कुशल और सहनशील,
दूध से भरी छातीयों की तरह भरपूर,
कुदरत की तरह दिलेर,
और अपनी खुरदरी खाल में दोस्ताना अहसास छुपाये
तुम्हारे हाथ.

यह दुनिया बैल के सिंग पर नहीं टिकी है,
तुम्हारे हाथों ने सम्हाल रखी है यह दुनिया.

और लोगो, मेरे लोगो,
वे तुम्हें झूठ परोसते रहते हैं,
जबकि तुम भूख से मर रहे हो,
तुम्हें गोस्त और रोटी खिलाने की ज़रूरत है.
और सफ़ेद कपड़े से ढकी मेज़ पर एक बार भी
भर पेट खाए बिना ही
तुम छोड़ देते हो यह दुनिया
जिसकी हर डाली पर लदे हुए हैं
बेशुमार फल.

लोगो, मेरे लोगो,
खासकर एशिया के लोगो, अफ्रीका के लोगो,
निकट पूर्व, मध्य पूर्व, प्रशान्त द्वीप के लोगो,
यानी धरती के सत्तर फीसद लोगो,

अपने हाथों की तरह तुम बूढ़े और भुलक्कड़ हो,
बेकल, अनोखे और जवान हो अपने हाथों की तरह.

लोगो, मेरे लोगो,
मेरे अमरीकी लोगो, मेरे यूरोपीय लोगो,
तुम फुरतीले, साहसी और लापरवाह हो अपने हाथों की तरह,
अपने हाथों की तरह ज़ल्दी राजी हो जानेवाले,
आसान है तुमसे पीछा छुड़ाना….

लोगो, मेरे लोगो,
अगर टीवी और रेडियो झूठ बोलते हैं,
अगर किताबें झूठ बोलती हैं,
अगर दीवार के पोस्टर और अखबारों के इश्तहार झूठ बोलते हैं,
अगर परदे पर लड़कियों की नंगी टाँगे झूठ बोलती हैं,
अगर प्रार्थनाएँ झूठ बोलती हैं,
अगर लोरियाँ झूठ बोलती हैं,
अगर सपने झूठ बोलते हैं,
अगर शराबखाने का साज़िन्दा झूठ बोलता है,
अगर मायूसी भरी रात में चाँदनी झूठ बोलती है,
अगर अल्फाज़ झूठ बोलते हैं
अगर रंग झूठ बोलते हैं,
अगर आवाजें झूठ बोलती हैं,
अगर तुम्हारे हाथों को छोड़कर,
तुम्हारे हाथों के सिवा
हर चीज और हर शख्स झूठ बोलता है,
तो यह सारी कवायद तुम्हारे हाथों को
मिट्टी के लोंदे की तरह फरमाबरदार,
अँधेरे की तरह अन्धा,
और कुत्ते की तरह भोंदू बना देने के लिए है,
ताकि तुम्हारे हाथ घूँसों में,
बगावत में तब्दील न हो जाएँ,
और इसलिए कि इस नाशवान, मगर जीने लायक दुनिया में
जहाँ हम मेहमान हैं इतने कम समय के,
सौदागरों की यह हुकूमत,
यह ज़ुल्म कहीं खत्म न हो जाए…
(अनुवाद– दिगम्बर)

नाजिम हिकमत की कविता- आशावाद

nazim 

कविताएँ लिखता हूँ मैं

वे छप नहीं पातीं

लेकिन छपेंगी वे.

मैं इंतजार कर रहा हूँ खुश-खैरियत भरे खत का

शायद वो उसी दिन पहुँचे जिस दिन मेरी मौत हो

लेकिन लाजिम है कि वो आएगा.

दुनिया पर सरकारों और पैसे की नहीं

बल्कि अवाम की हुकूमत होगी

अब से सौ साल बाद ही सही

लेकिन ये होगा ज़रूर.

(अंग्रेजी से अनुवाद- दिगम्बर)

मनहूस आज़ादी — नाजिम हिकमत

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तुम बेच देते हो –

अपनी आँखों की सतर्कता, अपने हाथों की चमक.

तुम गूंथते हो लोइयाँ जिंदगी की रोटी के लिये,

पर कभी एक टुकड़े का स्वाद भी नहीं चखते

तुम एक गुलाम हो अपनी महान आजादी में खटनेवाले.

अमीरों को और अमीर बनाने के लिये नरक भोगने की आज़ादी के साथ

तुम आजाद हो!

 

जैसे ही तुम जन्म लेते हो, करने लगते हो काम और चिंता,

झूठ की पवनचक्कियाँ गाड़ दी जाती हैं तुम्हारे दिमाग में.

अपनी महान आज़ादी में अपने हाथों से थाम लेते हो तुम अपना माथा.

अपने अन्तःकरण की आजादी के साथ

तुम आजाद हो!

 

तुम्हारा सिर अलग कर दिया गया है धड़ से.

तुम्हारे हाथ झूलते है तुम्हारे दोनों बगल.

सड़कों पर भटकते हो तुम अपनी महान आज़ादी के साथ.

अपने बेरोजगार होने की महान आज़ादी के साथ

तुम आजाद हो!

 

तुम बेहद प्यार करते हो अपने देश को,

पर एक दिन, उदाहरण के लिए, एक ही दस्तखत में

 

उसे अमेरिका के हवाले कर दिया ज़ाता है

और साथ में तुम्हारी महान आज़ादी भी.

उसका हवाईअड्डा बनने की अपनी आजादी के साथ

तुम आजाद हो!

 

वालस्ट्रीट तुम्हारी गर्दन ज़कड़ती है

ले लेती है तुम्हें अपने कब्ज़े में.

एक दिन वे भेज सकते हैं तुम्हें कोरिया,

ज़हाँ अपनी महान आजादी के साथ तुम भर सकते हो एक कब्र.

एक गुमनाम सिपाही बनने की आज़ादी के सा

 

तुम आजाद हो!

 

तुम कहते हो तुम्हें एक इंसान की तरह जीना चाहिए,

एक औजार, एक संख्या, एक साधन की तरह नहीं.

तुम्हारी महान आज़ादी में वे हथकडियाँ पहना देते हैं तुम्हें.  

गिरफ्तार होने, जेल जाने, यहाँ तक कि

फाँसी पर झूलने की अपनी आज़ादी के साथ

तुम आजाद हो.

 

तुम्हारे जीवन में कोई लोहे का फाटक नहीं,

बाँस का टट्टर या टाट का पर्दा तक नहीं.

आज़ादी को चुनने की जरुरत ही क्या है भला 

तुम आजाद हो!

 

सितारों भारी रात के तले बड़ी मनहूस है यह आज़ादी.  

(अनुवाद- दिनेश पोसवाल)

मैं तुम्हें प्यार करता हूँ – नाजिम हिकमत

nazim

घुटनों के बल बैठा-
मैं निहार रहा हूँ धरती,
घास,
कीट-पतंग,
नीले फूलों से लदी छोटी टहनियाँ.
तुम बसंत की धरती हो, मेरी प्रिया,
मैं तुम्हें निहार रहा हूँ.

पीठ के बल लेटा-
मैं देख रहा हूँ आकाश,
पेड़ की डालियाँ,
उड़ान भरते सारस,
एक जागृत सपना.
तुम बसंत के आकाश की तरह हो, मेरी प्रिया,
मैं तुम्हें देख रहा हूँ.

रात में जलाता हूँ अलाव-
छूता हूँ आग,
पानी,
पोशाक,
चाँदी.
तुम सितारों के नीचे जलती आग जैसी हो,
मैं तुम्हें छू रहा हूँ.

मैं काम करता हूँ जनता के बीच-
प्यार करता हूँ जनता से,
कार्रवाई से,
विचार से,
संघर्ष से.
तुम एक शख्शियत हो मेरे संघर्ष में,
मैं तुम से प्यार करता हूँ.

(अनुवाद- दिगम्बर)

शर्ट, पैंट, कपड़े की टोपी और फेल्ट हैट के बारे में –नाजिम हिकमत

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अगर कोई है
जो कहता है
मुझे
“साफ कमीज का दुश्मन”
तो देखना चाहिए उसे तस्वीर मेरे महान शिक्षक की,
गुरुओं के गुरु, मार्क्स, गिरवी रखते थे
अपना जैकेट,
और शायद खाते हों चार दिन में एक जून;
फिर भी
उनकी खूबसूरत दाढ़ी
झरने की तरह
गिरती थी लहराती हुई
बेदाग, झक्क सफ़ेद
कलफ की हुई कमीज पर….

और किसी इस्त्री किये पैंट को
आज तक फांसी की सजा हुई?
समझदार लोगों को
यहाँ भी पढ़ना चाहिए अपना इतिहास-
“1848 में जब गोलियाँ उनकी जुल्फें संवारती थी,
पहनते थे वे
असली विलायती ऊन का पैंट
बिलकुल अंग्रेजी फैशनवाला,
माड़ी दे कर इश्तरी किया हुआ
हमारे महापुरुष, एंगेल्स….

व्लादिमीर इलिच उल्यानोव लेनिन जब खड़े हुए
मोर्चे पर किसी आग-बबूला महामानव की तरह
पहने थे कालरदार कमीज
और साथ में टाई भी….”

जहाँ तक मेरी बात है
मैं महज एक सर्वहारा कवि हूँ
-मार्क्सवादी-लेनिनवादी चेतना, तीस किलो हड्डियाँ,
सात लीटर खून,
दो किलो मीटर शिराएँ और धमनियाँ,
मांस, मांसपेशियाँ, त्वचा और नसें,
कपड़े की टोपी मेरे सिर की
यह नहीं बताती
कि उसमें क्या खूबी है
मेरे इकलौते फेल्ट हैट से ज्यादा
और इस तरह गुजरता जा रहा है
एक एक दिन….

लेकिन
जब मैं पहनता हूँ हफ्ते में छ दिन
कपड़े की टोपी
तभी जाके हफ्ते में एक दिन
पहन पाता हूँ
अपनी प्रिया के साथ घूमते वक्त
साफ-सुथरा
अपना एकलौता फेल्ट हैट….

सवाल यह है कि
मेरे पास क्यों नहीं हैं दो फेल्ट हैट?
आपका क्या कहना है उस्ताद?
क्या मैं काहिल हूँ?
नहीं!
दिन में बारह घंटे जिल्दसाजी करना,
अपने पैरों पर खड़े-खड़े तबतक
जबतक मैं लुढक के गिर न जाऊं,
मेहनत का काम है….

क्या मैं बिलकुल भोंदू हूँ?
नहीं!
मसलन,
मैं हो ही नहीं सकता
उतना गया गुजरा
जितना अलाने जी या फलाने जी…

क्या मैं कोई बेवकूफ हूँ?
ठीक है,
पर पूरी तरह नहीं….
थोड़ा लापरवाह हो सकता हूँ….
लेकिन कुल मिला कर
असली वजह यही है कि
मैं एक सर्वहारा हूँ,
भाई,
एक सर्वहारा!
और मेरे पास भी दो फेल्ट हैट होंगे
-दो क्या दो लाख-
लेकिन तभी जब,
सभी सर्वहाराओं की तरह
मेरा भी मालिकाना होगा –कब्ज़ा होगा हम सब का-
बार्सिलोना-हाबिक-मोसान-मैनचेस्टर के कपड़ा मिलों पर
अगर नहींsssss,
तो नहीं!

(अनुवाद – दिगम्बर)

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