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रिसेप्सनिस्ट अपनी डेस्क के पास बैठी है और गुनगुनाती है सॉलिडेरिटी गीत –कारोल तार्लेन

(कारोल तार्लेन एक मजदूरनी, ट्रेड यूनियन कार्यकर्त्री और कवियत्री थीं… 2012 उनकी मृत्यु हुई… पहले भी उनकी कविता विकल्प पर प्रकाशित हुई और सराही गयी…)

हम एक नयी दुनिcarol_01gया को जन्म देंगे

पुरानी दुनिया की राख से

 

मैं एक सोन मछरी हूँ जिसे पकड़ा तुमने

ठण्डी बारिश के दौरान

सेवारवाले एक बड़े तालाब से.

मेरे माँस ने देखे धरती के चारों कोने.

मैं रसीली हूँ.

मेरे शल्क चमकते हैं

तुम्हारी पनीली भूरी आँखों में.

मैं मुस्तैदी से सजाई हुई नुमाइशी चीज हूँ

जो तुम्हारे फोन सुनती है,

टाइप करती है तुम्हारे टैक्स बचत की रिपोर्ट

शर्दियों की यात्रा.

स्वागत करती है तुम्हारे ग्राहकों का

गुलाबी मुस्कान से.

जब मैं बैठती हूँ गद्देदार

चक्करदार बिन हत्थेवाली कुर्सी पर,

सपने देखती हूँ खूबसूरत विदेशी जगहों के,

टहलती हुई विशाल सजे-धजे पार्कों में.

इसी बीच मैं देखती हूँ अपनेआप को

झुकी कमर बूढ़ी, लिपटा स्कार्फ

मेरी पतली गर्दन पर,

सुलगती राख को कुरेदते हुए,

लेकिन फिर मैं देखती हूँ

कि मैं चौड़े कुल्हेवाली, लम्बी, मजबूत औरत

दोनों पैर फैलाये,

सन्तान जन रही हूँ.

(अनुवाद — दिगम्बर)

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काम के वक्त घड़ी देखते हुए, मैं भाँप रही हूँ इसके अजीबोगरीब नतीजे – करोल तार्लेन

carol

सोचो, कितना हसीन नज़ारा होगा?
शैतानी धूल-गर्द क्या डुबो देगी फाइलों को
और चक्कर काटेगी हमारी मेज़ पर
फोन के इर्दगिर्द मैल की परत छोड़ते हुए?

क्या चालान जीरोक्स में पिघल जायेंगे?

क्या मेरे पास समय होगा
कि फैक्स करूँ चमगादड़ की किडनी
एक अंग-बैंक को और माँग सकूँ फीस
उसे खरीदनेवाले ज़रूरतमंद से?

हाँ! मेरे कंप्यूटर का बैकस्पेस बटन
काम करने से इनकार कर देगा;
मेरे की बोर्ड की हड्डियाँ छितरा जायेंगी,
ज़बकि मेरा सुपरवाइजर और अफसर
मरियल कुत्ते की तरह मेरी ऐंडी में दाँत गड़ाएंगे.

दोपहर के भोजन की जगह मैं चबाऊँगी
तयशुदा कामों की फेहरिश्त,
और भकोसने की बीमारी से ग्रसित
उल्टी कर दूँगी ऑफिस के शौचालय में,
जिसकी नालियों में चूहों के साथ तैरते हैं
सपने, कम्पनियों के विलय के.

ओह, कामक्रीड़ा का चरमसुख!
ओह, आनन्द की बारिश हो रही है
मेरी लालायित त्वचा पर!

मैं एक निजी फोन कर रही हूँ गैब्रिएल को,
मिटा रही हूँ हजारों मशीनों
की स्मरण-सूची,
तोड़ते हुए टखनों से पाजेब,
उतारती हूँ एक इंच ऊँची एड़ी वाली सैण्डिल
अपने ऑफिस की तयशुदा पोशाक
मेरे नंगे पाँव लड़खड़ाते हैं नजाकत से
मेरे सुचना पट पर
जैसे मैं शान से बढ़ रही हूँ ज़न्नत की ओर
और शामिल हो रही हूँ फरिश्तों के
मुक्ति मोर्चे में!

( अनुवाद- दिगम्बर )

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