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कामरेड लेनिन से बातचीत (1829) –ब्लादिमीर मायकोवस्की

mayakovsky-1

घटनाओं की एक चकरघिन्नी

ढेर सारे कामों से लदा,

दिन डूबता है धीरे-धीरे

जब उतरती है रात की परछाईं.

दो जने हैं कमरे में—

मैं

और लेनिन-

एक तस्वीर

सफेद दीवार पर लटकी.

दाढ़ी के बाल फिसलते हैं

उनके होठों के ऊपर

जब उनका मुँह

झटके से खुलता है बोलने को.

तनी हुई

भौं की सलवटें

विचारों को रखती हैं

उनकी पकड़ में,

घनी भौंहें

मेल खाती घने विचारों से.

झंडों का एक जंगल

उठी हुई मुट्ठियाँ घास की तरह सघन…

हजारों लोग बढ़ रहे हैं जुलूस में

उनके नीचे…

गाड़ियों से लाये गए,

ख़ुशी से उछलते हुए उतरते,

मैं अपनी जगह से उठता हूँ,

उनको देखने के लिए आतुर,

उनके अभिवादन के लिए,

उनके आगे हाजिर होने के लिए!

“कामरेड लेनिन,

मैं आपके सामने हाजिर हूँ-

(किसी के आदेश से नहीं,

सिर्फ अपने दिल की आवाज पर)

.यह मुश्किल काम

पूरा किया जायेगा,

बल्कि पूरा किया जा रहा है.

हम लोगों को मुहय्या करा रहे है

खाना और कपड़ा

और जरूरतमन्दों को रोशनी,

कोटा

कोयले का

और लोहे का

पूरा हुआ,

लेकिन अभी भी

परेशानियाँ कम नहीं,

कूड़ा-करकट

और बकवास

आज भी हमारे चारों ओर.

तुम्हारे बिना,

ढेर सारे लोग

बेकाबू हो गए,

सभी तरह के झगड़े

और वाद-विवाद

जो मुमकिन हैं.

हर तरह के बदमाश

भारी तादाद में

परेशान कर रहे हैं हमारे देश को,

सरहद के बाहर

और भीतर भी.

कोशिश करो

इन्हें गिनने की

और दर्ज करने की,

इनकी कोई सीमा नहीं.

सभी तरह के बदमाश,

और बिच्छू की तरह विषैले—

कुलक,

लालफीताशाह

और

निचली कतारों में,

पियक्कड़,

कट्टरपंथी,

चाटुकार.

वे अकड़ते हुए चलते हैं,

घमण्ड में चूर

मोर की तरह,

उनकी छाती पर जड़े

बैज और फौन्टेन पेन.

हम उनमें से बहुतों से छुटकारा पा लेंगे

मगर यह काम आसान नहीं

बेहद कठिन प्रयास की जरूरत है.

बर्फ से ढकी जमीन पर

और बंजर खेतों में,

धुआँभरे कारखानों में

और बन रहे कारखानों के पास,

आपको दिल में बसाए,

कामरेड लेनिन,

हम रच रहे हैं,

हम सोच रहे हैं,

हम साँस ले रहे हैं,

हम जी रहे हैं,

और हम संघर्ष कर रहे हैं!

घटनाओं की एक चकरघिन्नी

ढेर सारे कामों से लदा,

दिन डूबता है धीरे-धीरे

जब उतरती है रात की परछाईं.

दो जने हैं कमरे में—

मैं

और लेनिन-

एक तस्वीर

सफेद दीवार पर लटकी.

(अनुवाद– दिगम्बर)

जेवियर हेरौद पेरेज़ की कविता

jeviyar harod parej जेवियर हेरौद पेरेज़ (1942-1963) पेरू के कवि और नेशनल लिबरेशन आर्मी सदस्य थे। अठारह साल की उम्र में उनके दूसरे कविता संग्रह को पेरू का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान प्रदान किया गया।

जनवरी 1963 में,  21 वर्षीय कवि जेवियर हेरौद  और एलेन इलियास के नेतृत्व में एक क्रान्तिकारी समूह ने हथियार लेकर बोलीविया की सरहद पार की और दक्षिणी पेरू में प्रवेश किया। गंभीर बीमारी से ग्रस्त 15 सदस्यीय टीम ने इलाज के लिए प्योर्तो माल्दोनादो शहर में प्रवेश करने का फैसला किया। स्थानीय पुलिस समूह को पहले ही सूचना मिल गयी थी. पेरू की पुलिस ने 15 मई को हेरौद को  सीने में गोली मार दी जब वे एक डोंगी में बैठ कर शहर से गुजर रहे थे। वह एक ऐसा दौर था जब लातिन अमरीका संघर्ष और सृजन के नए-नए कीर्तिस्तम्भ खड़ा हो रहे थे। उनकी मृत्यु के चार साल बाद ही सीआईए की साजिशों के तहत चे ग्वेरा की बोलीविया में इसी तरह हत्या की गयी थी। प्रस्तुत है जेवियर हेरौद पेरेज़ की एक कविता—

नदी हूँ मैं

1.

मैं एक नदी हूँ, विराट पत्थरों से होकर बहती,
कठोर चट्टानों से होकर गुजरती,
हवा तय करती है मेरे रास्ते।
मेरे आस-पास के पेड़ बारिश में सराबोर हैं।
मैं एक नदी हूँ, भरपूर गुस्से के साथ बहती नदी,
बेपनाह प्रचंडता के साथ,
जब भी कोई पुल अपनी तिरछी परछाईं मुझमें बिखेरता है।

2.

मैं एक नदी हूँ, एक नदी,
एक नदी, हर सुबह स्फटिक की तरह साफ़।
कभी-कभी मैं नाजुक और विनम्र होती हूँ।
मैं उर्वर घाटियों से शान्तिपूर्वक फिसलती हूँ।
मैं पशु और सीधे-सच्चे लोगों को
जितना चाहें पिलाती हूँ अपना पानी।
दिन में बच्चे तैर-तैर आते हैं मेरे भीतर
रात में स्पन्दित प्रेमी झाँकते हैं मेरी आँखों में।
और डुबकी लगाते हैं
मेरे भुतहे पानी के गहरे अँधेरे में।

3.

मैं एक नदी हूँ।
लेकिन कभी-कभी होती हूँ बेरहम और मजबूत।
कभी-कभी जिन्दगी या मौत का नहीं करती सम्मान।
झरने के उत्ताल तरंग में उछलती-कूदती,
मैं  बार-बार पीटती हूँ चट्टानों को
अनगिनत टुकड़ों में तोड़ती हूँ।
पशु भागते हैं। वे भागते हैं।
जब मैं उनके मैदानों में सैलाब बनकर उतरती हूँ।
जब मैं उनकी ढलानों में बोती हूँ छोटे-छोटे कंकड़-पत्थर।
जब मैं उनके घरों और चरागाहों को डुबोती हूँ।
जब बाढ़ में डुबोती हूँ उनके दरवाजे और उनके दिल,
उनकी उनके शरीर और उनके दिल।

4

और यह तब होता है, जब मैं तेजी से नीचे आती हूँ–
जब मैं उनके दिलों में पैठ सकती हूँ
और उनके लहू पर भी काबू कर सकती हूँ
और मैं उनके अंदर से उनको निहार सकती हूँ।
फिर मेरा गुस्सा शांत हो जाता है
और मैं एक पेड़ बन जाती हूँ।
मैं एक पेड़ की तरह खुद को जड़ लेती हूँ
और पत्थर की तरह मौन हो जाती हूँ
काँटा रहित गुलाब की तरह मैं शान्त हो जाती हूँ।

5

मैं एक नदी हूँ.
मैं नदी हूँ अनन्त खुशियों की.
मैं महसूस करती हूँ दोस्ताना शीतल हवाएँ.
महसूस करती हूँ अपने चेहरे पर मंद समीर
अपनी अन्तहीन यात्रा के दौरान.

6

मैं नदी हूँ जो यात्रा करती है
किनारों, सूखे पेड़ों और रूखे पत्थरों के साथ,
मैं नदी हूँ जो हिलोरे मारती गुजरती है
तुम्हारे कानों, तुम्हारे दरवाजों और तुम्हारे दिलों से होकर.
मैं नदी हूँ जो यात्रा करती है
घास के मैदानों, फूलों, गुलाब की झुकी डालियों से होकर,
मैं एक नदी हूँ जो यात्रा करती है
सडकों के साथ-साथ, धरती के आरपार, नम आकाश के नीचे.
मैं नदी हूँ जो यात्रा करती है
पहाड़ों, चट्टानों और खारे झरनों से होकर.
मैं नदी हूँ जो यात्रा करती है
मकानों, मेजों, कुर्सियों से होकर.
मैं नदी हूँ जो यात्रा करती है
इन्सान के भीतर— पेड़, फल, गुलाब, पत्थर,
मेज, दिल, दिल, दरवाजा—
हर चीज जो मेरे आगे आये.

7

मैं नदी हूँ जो गाती है लोगों के लिए भरी दुपहरी में.
मैं उनके कब्र के आगे गाती हूँ.
मैं उन पवित्र स्थानों की ओर मुड़ जाती हूँ.

8

मैं नदी हूँ जो रात में बदल गयी है.
मैं उतरती हूँ उबड़-खाबड़ गहराइयों में,
भुला दिए गये अनजान गाँवों के निकट,
लोगों से अटी पड़ी खिडकियों वाले शहरों के करीब.
मैं नदी हूँ,
बहती हूँ घास के मैदानों से होकर.
हमारे किनारे खड़े पेड़ जीवित हैं कबूतरों के संग-साथ.
पेड़ गाते हैं नदी के साथ,
पेड़ गाते हैं मेरे पंछियों के ह्रदय से,
नदियाँ गाती हैं मेरी बाहों में बाहें डाल.

9

वह घड़ी आएगी
जब मुझे विलीन हो जाना पड़ेगा
सागर में,
कि मिला सकूँ मैं अपना निर्मल जल उसके धुँधले पानी में.
हमें अपने चमकीले गीत को चुप करना होगा,
हमें बन्द करना होगा वह गपशप
जो प्रभात की अगवानी में हर रोज किया करती थी,
मैं अपनी आँखें सागर जल से धो लूँगी.
वह दिन आएगा,
और उस अनन्त सागर में
मैं नहीं देख पाउंगी अपने उर्वर खेतों को,
नहीं देख पाऊँगी मैं अपने हरे पेड़ों को,
मेरे आसपास की हवा,
मेरा निर्मल आकाश, मेरी गहरी झील,\
मेरा सूरज, मेरे बादल,
मैं कुछ नहीं  देखपाऊँगी,
सिवाय उस अनन्त नीलाभ स्वर्ग के
जहाँ हर चीज घुलीमिली है,
पानी के विराट विस्तार में,
जहाँ एक और गीत या कोई दूसरी कविता का
इसके सिवा कोई अर्थ नहीं होगा
कि कोई तुच्छ नदी बहकर नीचे आती,
या कोई हहरारती नदी मुझ से मिलने आती,
मेरे नए चमकीले पानी में,
हाल ही में विलुप्त मेरे जल में.

(अनुवाद- दिगम्बर)

आशावादी आदमी — नाजिम हिकमत

nazim

जब वह बच्चा था, उसने मक्खियों के पर नहीं नोचे

बिल्लियों की पूंछ में टिन नहीं बाँधा

माचिस की डिब्बी में भँवरों को कैद नहीं किया

चींटी की बाम्बी नहीं ढायी

वह बड़ा हुआ

और यह सबकुछ किया गया उसके साथ

जब वह मरा तो मैं उसके सिरहाने खड़ा था

उसने कहा कि एक कविता सुनाओ

सूरज और समुद्र के बारे में

नाभिकीय संयन्त्र और उपग्रहों के बारे में

मानवजाति की महानता के बारे में

(अनुवाद – दिगम्बर)

कला के बारे में — नाजिम हिकमत

najim

 

 

 

 

 

 

 

 

कभी-कभी मैं भी कह देता हूँ- हाय,

अपने दिल की गहराइयों से

जब देखता हूँ  सुनहरे बालों की लटों में गुंथी

खुनी रंग के मोतियों की माला!

 

लेकिन मेरी कविता की देवी को

पसंद है हवा से बातें करना

इस्पात से बने डैनों पर

जैसे शहतीर मेरे झूला पुलों के!

 

मैं दिखावा नहीं करता

कि गुलाब के लिए बुलबुल का मातम

आसान नहीं कानों में गूंजना…

लेकिन वह जुबान

जो सचमुच मुझसे बात करती है

वह तो विथोवेन के सोनेट हैं बजते हुए

ताम्बा, लोहा, लकड़ी, हड्डी और ताँत पर….

 

आप के लिए “मुमकिन है”

सरपट भागते हुए गायब हो जाना

धूल के गुबार में!

जहाँ तक मेंरी बात है, मैं नहीं बदलूँगा

असली नस्ल के अरबी घोड़े से

छह मील की रफ़्तार वाला

अपना लोहे का घोड़ा

जो दौड़ता है लोहे की पटरी पर!

 

कभी-कभी मेरी आँखें उलझ जाती हैं

किसी बूढी गूंगी बड़ी मक्खी की तरह

हमारे घर के कोने में लगे चतुर मकड़ी के जाले में.

लेकिन सच पूछो तो मैं देखता हूँ

सतहत्तर मंजिले, मजबूत कंक्रीट के पहाड़

जिनको बनाते हैं मेरे नीली वर्दी वाले बिल्डर!

 

मिलना होता अगर मुझको

“जवान अदोनिस*, बाइब्लोस के देवता की”

मरदानी सुन्दरता से किसी पुल पर,

तो शायद मैं ध्यान ही नहीं देता उसकी तरफ;

मगर मैं रोक नहीं सकता टकटकी लगाने से

अपने फलसफी की बेजान आँखों के अन्दर

या अपने फायरमैन के पसीने से सराबोर

सपाट चेहरे पर, दहकता सूरज की तरह!

 

हालाँकि मैं पी सकता हूँ

घटिया सिगरेट

बिजली घर में अपने काम की जगह  पर,

लेकिन अपने हाथों से कागज में लपेटकर

नहीं पी सकता तम्बाकू-

चाहे कितना ही बेहतरीन क्यों न हो!

चमड़े की जैकेट और टोप में सजी

अपनी बीबी का सौदा

न आज तक किया और न आगे करूँगा

ईव के नंगेपन से!

मुमकिन है कि मेरे पास नहीं हो “शायराना रूह”?

लेकिन मैं क्या करूँ

अगर  मैं अपने खुद के बच्चों से प्यार करता हूँ

कहीं ज्यादा.

—————————————————-

अदोनिस– ग्रीक पौराणिक कथाओं का एक धार्मिक रहस्यादी चरित्र. सुन्दरता का प्रतीक. अदोनिस की मृत्यु  एस्बोस द्वीप के शायर सैप्फो के चारों ओर युवा लड़कियों के घेरे में हुई, ऐसा दिखाया गया है.

 

(अनुवाद – दिगम्बर)

हमारी आँखें – नाजिम हिकमत

nazim

 

 

 

 

 

 

 

हमारी आँखें

साफ़ बूँदें हैं

पानी की.

 

हर बूँद में मौजूद है

एक छोटी सी निशानी

हमारी काबिलीयत की

जिसने जान डाल दी ठन्डे लोहे में.

 

हमारी आँखें

पानी की

साफ़ बूँदें हैं

समन्दर में इस तरह घुलीमिली

कि आप शायद ही पहचान पाएँ

बर्फ की सिल्ली में एक बूँद

खौलती कडाही में.

 

शाहकार इन आँखों का

उनकी भरपूर काबिलीयत का

यह जिन्दा लोहा.

 

इन आँखों में

पाक साफ़ आँसू

छलक नहीं पाते
गहरे समन्दर से
बिखर जाती

अगर हमारी ताकत,

तो हम कभी नहीं मिला पाते

डायनेमो को टरबाइन के साथ,

कभी तैरा नहीं पाते

इस्पात के इन पहाड़ों को पानी में

इतनी आसानी से

कि जैसे खोंखले काठ के बने हों.

 

शाहकार इन आँखों का

उनकी भरपूर काबिलीयत का

हमारी मुत्तहद मेहनत का

यह जिन्दा लोहा.

(अंग्रेजी से अनुवाद — दिगम्बर)

विकास दल – रोस कोग्गिंस

रोस कोग्गिंस की यह मशहूर कविता गरीबी और बदहाली को पेशा बनाकर मौज उड़ाने वाली स्वयंसेवी संस्थाओं पर करारा व्यंग्य है. विकास के नाम पर चलनेवाला यह धन्धा तेज़ी से फ़ैल रहा है. इसके लिए महँगे पाठ्यक्रम हैं और कमाई का अच्छा जरिया है.

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क्षमा करो यारो मुझको है ज़ल्दी जेट पकड़ना
शामिल होने विकास दल में फ़ौरन होगा उड़ना;
बोरिया-बिस्तर बाँध लिया और सब तस्वीरें धर ली
यात्री चेक और दवा-दारू सबकुछ झोले में भर ली.

पराक्रमी और वैभवशाली है विकास दल अपना
गहरे हैं विचार अपने और विश्वव्यापी है सपना;
वैसे तो हम धनिक वर्ग के साथ चला करते हैं
किन्तु विचार हमेशा अपने जनगण से मिलते हैं.

भिन्न-भिन्न देशों में शेरेटन होटल में टिकते हैं.
मल्टीनेशनल निगमों की भर्त्सना किया करते हैं;
नरम-गरम बिस्तर पर हो यदि सामाजिक विश्राम
फिर विरोध अन्याय-ज़ुल्म का कहाँ कठिन है काम.

छप्पनभोग सामने हो तो बने विमर्श कुपोषण
और भुखमरी की चर्चा हो कॉफी के टेबुल पर;
अफ्रीकी सूखा, एशियाई बाढ़ सभी पर बोलें
लेकिन जब हो पेट भरा, तब ही हम सब मुँह खोलें.

ऐसे कपटी सलाहकार हम संग लिए आते हैं
जिसकी राय समस्याओं को हरदम उलझाते हैं-
लगातार हम इसी तरह दावत करते रहते हैं
अगली बैठक आवश्यक है यह चर्चा करते हैं.

विकास दल भरता रहता है नये शब्द-भण्डार
आंग्ल वर्णमाला में इसका व्यापक है विस्तार;
“एपीजेनेटिक” जैसे भारी-भरकम शब्द उचारें
“माइक्रो”, “मैक्रो”, “लोगारिथमेटिक” से भाषा को तारें.

गूढ़-गहन बनकर हमको आनन्द बहुत आता है
बौद्धिक वातावरण इसी ढब से तो बन पाता है!
और भले ही प्रतिष्ठानों पर आँच नहीं आती है,
हम लोगों की शब्द-राशि बेहतर होती जाती है.

जब विमर्श गहरा हो जाये तुमको झपकी आये
झेप मिटाने का आओ तुमको तरकीब बताएँ;
यह दिखलाने की खातिर कि तुम भी हो विद्वान्
तड़ से पूछो “क्या सच में है यही विकास श्रीमान?”

या कह दो, “व्यवहारिक पहलू ठीक-ठाक दिखता है-
किन्तु कहीं से भी इसका सिद्धान्त नहीं जमता है!
पल्ले नहीं पड़ेगी कुछ लोगों को बात तुम्हारी,
बहुतों की नज़रों में होगी गहरी और गुणकारी.

इस विकास दल के मुख्यालय के  हैं ठाट निराले,
नक्काशी, प्राचीन वास्तु और बाटिक परदे डाले.
आँखों के आगे लटकी तस्वीर दिलाये ध्यान
महान और गरीब संग रहता सहज सरल मेज़बान. 

हद है ऐसी कविताई की— पथ पर करो प्रयाण!
मानव-पीड़ा जितनी उतना व्यापक है अभियान!
ईश्वर से तुम करो प्रार्थना वचन करे वह पूरा-
निर्धन जन हों संग सर्वदा लगे विकास का नारा.

(अनुवाद- दिगम्बर)

पढना जारी रखे

जिनके पास कम है, वे कम खाएँ (अमरीकी शासकों के प्रति) –मार्ज पियर्सी

Marge+Piercy

ग़रीबों से नफरत, क्या ये गुनाह

बासी हो गया? कि इतना धन है

फिर भी  साजिश रचते हैं दौलतमन्द

एक बच्चे की दवा, एक औरत की जिंदगी,

एक आदमी का दिल और गुर्दा हड़पने के लिए.

जब सांसद उस जनता की बात करते हैं

जो हिसाब बैठाती है गैस और रोटी का

कि ठण्ड और भूख में किसे तरजीह दें

वे गुर्राते हैं. हमारी ये हिम्मत की जिन्दा रहें?

अगर वे बमबारी कर पाते, अगर वे

ग़रीबों के खिलाफ लड़ाई छेड़ पाते

दूसरे देशों की तरह यहाँ, अपने देश में,

क़ानून बनाकर नहीं बल्कि खुलेआम

हथियारों से, तो क्या वे झिझकते?

उनके भीतर सुलगता सच्चा गुस्सा

फूटता है उन कटौतियों में, जो जरूरी हैं

लोगों को जिन्दा रखने के लिए.

जिन लोगों के पास बहुत कम है

उनको सजा देते हैं, और ज्यादा कमी करके-

हमें कुचलनेवाला एक विराट कानूनी बुलडोजर.

(अनुवाद — दिगम्बर)

तुम्हारे हाथ और उनके झूठ के बारे में — नाजिम हिकमत

haath

तुम्हारे हाथ
पत्थरों की तरह संगीन.
जेल में गाये गये तमाम गीतों की तरह मनहूस,
बोझ ढोनेवाले जानवरों की तरह अनाड़ी, सख़्त
और भूखे बच्चों के चेहरों की तरह नाराज़ हैं.

मधुमक्खियों की तरह कुशल और सहनशील,
दूध से भरी छातीयों की तरह भरपूर,
कुदरत की तरह दिलेर,
और अपनी खुरदरी खाल में दोस्ताना अहसास छुपाये
तुम्हारे हाथ.

यह दुनिया बैल के सिंग पर नहीं टिकी है,
तुम्हारे हाथों ने सम्हाल रखी है यह दुनिया.

और लोगो, मेरे लोगो,
वे तुम्हें झूठ परोसते रहते हैं,
जबकि तुम भूख से मर रहे हो,
तुम्हें गोस्त और रोटी खिलाने की ज़रूरत है.
और सफ़ेद कपड़े से ढकी मेज़ पर एक बार भी
भर पेट खाए बिना ही
तुम छोड़ देते हो यह दुनिया
जिसकी हर डाली पर लदे हुए हैं
बेशुमार फल.

लोगो, मेरे लोगो,
खासकर एशिया के लोगो, अफ्रीका के लोगो,
निकट पूर्व, मध्य पूर्व, प्रशान्त द्वीप के लोगो,
यानी धरती के सत्तर फीसद लोगो,

अपने हाथों की तरह तुम बूढ़े और भुलक्कड़ हो,
बेकल, अनोखे और जवान हो अपने हाथों की तरह.

लोगो, मेरे लोगो,
मेरे अमरीकी लोगो, मेरे यूरोपीय लोगो,
तुम फुरतीले, साहसी और लापरवाह हो अपने हाथों की तरह,
अपने हाथों की तरह ज़ल्दी राजी हो जानेवाले,
आसान है तुमसे पीछा छुड़ाना….

लोगो, मेरे लोगो,
अगर टीवी और रेडियो झूठ बोलते हैं,
अगर किताबें झूठ बोलती हैं,
अगर दीवार के पोस्टर और अखबारों के इश्तहार झूठ बोलते हैं,
अगर परदे पर लड़कियों की नंगी टाँगे झूठ बोलती हैं,
अगर प्रार्थनाएँ झूठ बोलती हैं,
अगर लोरियाँ झूठ बोलती हैं,
अगर सपने झूठ बोलते हैं,
अगर शराबखाने का साज़िन्दा झूठ बोलता है,
अगर मायूसी भरी रात में चाँदनी झूठ बोलती है,
अगर अल्फाज़ झूठ बोलते हैं
अगर रंग झूठ बोलते हैं,
अगर आवाजें झूठ बोलती हैं,
अगर तुम्हारे हाथों को छोड़कर,
तुम्हारे हाथों के सिवा
हर चीज और हर शख्स झूठ बोलता है,
तो यह सारी कवायद तुम्हारे हाथों को
मिट्टी के लोंदे की तरह फरमाबरदार,
अँधेरे की तरह अन्धा,
और कुत्ते की तरह भोंदू बना देने के लिए है,
ताकि तुम्हारे हाथ घूँसों में,
बगावत में तब्दील न हो जाएँ,
और इसलिए कि इस नाशवान, मगर जीने लायक दुनिया में
जहाँ हम मेहमान हैं इतने कम समय के,
सौदागरों की यह हुकूमत,
यह ज़ुल्म कहीं खत्म न हो जाए…
(अनुवाद– दिगम्बर)

मार्ज पियर्सी की कविता – दोस्त

Marge+Piercy
हम मेज पर आमने-सामने बैठे

उसने कहा, अपने हाथों को काट डालो.

ये हमेशा चीजों को कुरेदते हैं.

मुझे छू भी सकते हैं ये.

मैंने कहा हाँ.

 

मेज पर धरा खाना ठंडा हो गया.

उसने कहा, ज़लाओ अपना शरीर

यह साफ़ नहीं  और कामुक गंध आती है इससे

यह मेरे मन घावों को रगड़ता है.

मैंने कहा हाँ.

 

मैं तुम्हें प्यार करती हूँ, मैंने कहा.

ये तो बहुत अच्छी बात है, उसने कहा

कोई प्रेम करे मुझे पसंद है

इससे मुझे खुशी मिलती है.

तुमने अपने हाथों को काटा कि नहीं ?

लाल हमारा रंग – ए.एन.सी. कुमालो

gulmohar

हमें ऐसी कविताओं की जरूरत है

जिनमें खून के रंग की आभा हो

और दुश्मनों के लिए आती हो जिनसे

यमराज के भैंसे की घंटी की आवाज

 

कविताएँ

जो आतताइयों के चेहरे पर

सीधा वार करती हों

और उनके गरूर को तोड़ती हों

 

कविताएँ

जो लोगों को बताएँ

कि मृत्यु नहीं, जीवन

निराशा नहीं, आशा

सूर्यास्त नहीं, सूर्योदय

प्राचीन नहीं, नवीन

समर्पण नहीं, संघर्ष

 

कवि, तुम लोगों को बताओ

कि सपने सच्चाई में बदल सकते हैं

तुम आजादी की बात करो

और धन्नासेठों को सजाने दो

थोथी कलाकृतियों से अपनी बैठकें

 

तुम आजादी की बात करो

और महसूस करो लोगों की आँखों में

जनशक्ति की वह ऊष्मा

जो जेल की सलाखों को

सरपत घास की तरह मरोड़ देती है

ग्रेनाइट की दीवारों को ध्वस्त करके

रेत में बदल देती है

 

कवि,

इससे पहले कि यह दशक भी

अतीत में गर्क हो जाय

तुम जनता के बीच जाओ और

जन संघर्षों को आगे बढ़ाने में

मदद करो !

 

 

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