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शब्दों के बचाव में — एदुआर्दो गालेआनो

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कोई व्यक्ति संवाद बनाने की जरूरत महशूस करके और दूसरों से बात करने के लिए लिखता है, उस चीज की भर्त्सना करने के लिए जो कष्ट देती है और उसे साझा करने के लिए जिससे खुशी मिलती है. कोई व्यक्ति अपने एकांत के विरुद्ध और दूसरों के एकांत के विरुद्ध लिखता है. कोई व्यक्ति यह मानकर चलता है कि साहित्य ज्ञान का प्रसार करता है और उनकी भाषा और व्यवहार को प्रभावित करता है जो उसे पढ़ते हैं…. कोई व्यक्ति, वास्तव में, उन लोगों के लिये लिखता है जिनके भाग्य और दुर्भाग्य से वह खुद को जोड़ता है – दुनिया के भूखे, निद्रा-हीन, विद्रोही और अभागे लोग – और उनमें से ज्यादातर निरक्षर हैं.

… तब हममें से वे लोग जो साहित्य के क्षेत्र में काम करना चाहते हैं, ताकि उन बेआवाज लोगों की आवाज़ को सुनने में मदद मिल सके, इस वास्तविकता के सन्दर्भ में अपना काम कैसे कर सकते हैं? क्या हम इस गूंगी-बहरी संस्कृति के मध्य में अपनी बात सुना सकते हैं? लेखकों को जो थोड़ी सी छूट हासिल है, क्या कभी-कभी यह हमारी असफलता का प्रमाण नहीं बन जाती है? हम कितनी दूर तक जा सकते हैं? हम किन लोगों तक अपनी पहुँच बना सकते हैं?

… चेतना जागृत करना, पहचान स्थापित करना – क्या साहित्य इस दौर में इससे बेहतर काम करने का दावा कर सकता है? … इन देशों में?

… लातिन अमरी
का के लेखकों के रूप में हमारा भाग्य इन गंभीर सामाजिक परिवर्तनों की जरुरत से जुड़ गया है. अपनी बात कहना स्वयं को खो देना है: यह स्पष्ट दिखायी देता है कि पूर्णरूप से अपनी बात कहने के प्रयास में, साहित्य को बाधित किया जाता रहेगा … जबतक निरक्षरता और गरीबी बरकरार हैं, और तबतक, जबतक सत्ता पर काबिज लोग अपनी सामूहिक जड़बुद्धि को… जन माध्यमों के जरिये निरंतर थोपते रहेंगे.

… हमारे इन देशो में महान परिवर्तन, गहन ढाँचागत परिवर्तन जरूरी होंगे, अगर हम लेखकों को… सभ्रांत वर्ग से आगे जाना है, अगर हमें स्वयं को अभिव्यक्त करना है … एक बंद समाज में मुक्त साहित्य का अस्तित्व केवल भर्त्सना और उम्मीद के रूप में ही कायम  रह सकता है.

… हम वही हैं जो हम करते हैं, खास तौर पर वह काम जो हम खुद को बदलने के लिये करते है… इस मायने में पहले से ही कायल लोगों के लिये लिखा गया “क्रन्तिकारी” साहित्य उतना ही निरर्थक है जितना कि रुढिवादी साहित्य… आत्मकेंद्रित चिंतन-मनन के लिए समर्पित.

हमारी सार्थकता इस बात पर निर्भर करती है कि हमारे अंदर निर्भीकता और चतुराई तथा स्पष्टता और आग्रह की क्षमता कितनी है. मुझे उम्मीद है कि हम एक ऐसी भाषा का सृजन कर सकते हैं जो परम्परावादी लेखकों की गोधूली का स्वागत करने वाली भाषा से  कहीं अधिक निर्भय और सुन्दर होगी.

… लातिन अमेरिका में एक साहित्य आकार ले रहा है और मजबूती हासिल कर रहा है, एक साहित्य …  जो हमारे मृतकों को दफ़नाने की नहीं, बल्कि उन्हें अमर करने की हिमायत करता है; जो राख के ढेर को कुरेदने से इनकार करता है और आग सुलगाने का प्रयास करता है … शायद यह “सभी चीजों के वास्तविक अर्थ” को बचाए रखने में आने वाली नस्लों की मदद करेगा.

 

एदुआर्दो गालेआनो, 1978

प्यार और युद्ध के दिन और रातें (1983) से
(अनुवाद- दिनेश पोसवाल)

 

 

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एदुआर्दो गालेआनो की कविता — दुनिया भर में डर

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जो लोग काम पर लगे हैं वे भयभीत हैं
कि उनकी नौकरी छूट जायेगी
जो काम पर नहीं लगे वे भयभीत हैं
कि उनको कभी काम नहीं मिलेगा
जिन्हें चिंता नहीं है भूख की
वे भयभीत हैं खाने को लेकर
लोकतंत्र भयभीत है याद दिलाये जाने से और
भाषा भयभीत है बोले जाने को लेकर
आम नागरिक डरते हैं सेना से,
सेना डरती है हथियारों की कमी से
हथियार डरते हैं कि युद्धों की कमी है
यह भय का समय है
स्त्रियाँ डरती हैं हिंसक पुरुषों से और पुरुष
डरते हैं निर्भय स्त्रियों से
चोरों का डर, पुलिस का डर
डर बिना ताले के दरवाज़ों का,
घड़ियों के बिना समय का
बिना टेलीविज़न बच्चों का, डर
नींद की गोली के बिना रात का और दिन
जगने वाली गोली के बिना
भीड़ का भय, एकांत का भय
भय कि क्या था पहले और क्या हो सकता है
मरने का भय, जीने का भय.

(अनुवाद– दिगम्बर)

एदुआर्दो गालेआनो की कविता- सपना देखने का अधिकार

eduardo 1
संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1948 में और दुबारा 1976 में मानवाधिकारों की लम्बी सूची जारी की, लेकिन मानवता की भारी बहुसंख्या आज भी सिर्फ देखने, सुनने और चुप रहने के अधिकार का ही उपभोग कर पाती है। मान लीजिये की हम सपना देखने के अधिकार का प्रयोग करने लगें, जिसकीआज तक किसी ने घोषणा नहीं की ? मान लीजिये की हम थोडा बक-बक करने लगें? आइये, हम अपनी निगाहें इस मौजूदा घिनौनी दुनिया की जगह एक बेहतरीन दूसरी दुनिया की ओर टिकाएँ जो मुमकिन है-

हवा तमाम जहरीली चीजों से साफ हो, सिवाय उन जहरों के जो पैदा हुए हों इंसानी डर और इंसानी जज्बात से;

सडकों पर, कारें रौंदी जाएँ कुत्तो के द्वारा;

लोग कारों से न हाँके जाएँ या संचालित न हों कंप्यूटर प्रोग्राम से या खरीदे न जाएँ सुपर बाज़ार के द्वारा या उन पर निगाह न रखी जाय टेलीविजन से;

आगे से टीवी सेट परिवार का सबसे ख़ास सदस्य न रह जाएँ और उनके साथ वैसा ही सलूक किया जाय, जैसा इस्तरी या वाशिंग मशीन के साथ;

लेग श्रम करने के लिए जीने के बजाय जीने के लिए श्रम करें;

कनून की नजर में माना जाय मूर्खता का अपराध कि लोग धन बटोरने या जीतने के लिए जिन्दा रहें, बजाय इसके कि सहजता से जीयें, उन पंछियों की तरह जो अनजाने ही चहचहाते हैं और उन बच्चों की तरह जो खेलते हैं बिना यह जाने कि वे खेल रहे हैं;

किसी देश में युद्व के मोर्चे पर जाने से इन्कार करने वाले नौजवान जेल नहीं जायें बल्कि जेल जायें वे लोग जो युद्व छेड़ना चाहते हैं;

अर्थशास्त्री उपभोग के स्तर से जीवन स्तर को या उपभोक्ता सामानों की मात्रा से जीवन की गुणवत्ता को न नापें;

रसोईये इस बात में यकीन न करें कि लोबस्टर को अच्छा लगता है जिन्दा उबाला जाना;

इतिहासकार इस बात में यकीन न करें कि देशों को अच्छा लगता है उन पर हमला किया जाना;

राजनेता इस बात में यकीन न करें कि सिर्फ वादों से भर जाता है गरीब लोगों का पेट;

गम्भीरता को सद्गुण नहीं समझा जाय और जो खुद पर हँसना नहीं जानता हो, उसे गम्भीरता से न लिया जाय;

मौत और पैसेकी जादुई शक्ति गायब हो जाय और कोई चूहा महज वसीयत या दौलत के दम पर अचानक गुणी जन न बन जाय;

अपने विवेक के मुताबिक जो ठीक लगे वह काम करने के लिए किसी को मूर्ख न समझा जाय और नाह ही अपने फायदे के हिसाब से काम करने वाले को बुद्विमान;

पूरी दुनिया में गरीबों के खिलाफ नहीं, बल्कि गरीबी के खिलाफ जंग छिड़े और हथियार उद्योग के सामने खुद को दिवालिया घोषित करने के सिवा कोई चारा न रह जाये;

भोजन खरीद-फरोख्त का सामान न हो और संचार साधनों का व्यापार न हो क्योंकि भोजन और संचार मानवाधिकार हैं;

कोई व्यक्ति भूख से न मरे और कोई व्यक्ति खाते-खाते भी न मरे;

बेघर बच्चों को कूड़े का ढेर न समझा जाय क्योंकि कोई भी बच्चा बेघर न रह जाय;

धनी बच्चों को सोने जैसा न माना जाय क्योंकि कोई भी बच्चा धनी न रहे;

शिक्षा उन लोगों का विशेषाधिकार न हो जिनकी हैसियत हो उसे खरीदने की;

पुलिस उन लोगों पर कहर न ढाये जिनकी जेब में उसे देने के लिए पैसा न हो;

न्याय और मुक्ति, जिन्हें जन्म से ही आपस में जुड़े बच्चों की तरह काट कर अलग कर दिया गया, आपस में फिर मिलें और एक साथ जुड़ जायें;

एक महिला, एक अश्वेत महिला ब्राजील में राष्ट्रपति चुनी जाय, एक रेड इण्डियन महिला ग्वाटेमाला में और दूसरी पेरू में सत्ता संभाले;

अर्जेंनटीना की प्लाजा द मेयो (1) की सनकी औरतों को मानसिक स्वास्थ्य की सब से अच्छी मिसाल समझा जाय क्योंकि उन्होंने जान पर खतरा जानकर भी चुप स्वीकार नहीं किया चुप बैठना;

चर्च और पचित्र माता, मूसा के शिलालेख की गलत लिखावट को दुरूस्त करें और उनका छठा आदेश शरीर के उत्सव मनाने का आदेश दे;

एक और आदेश की घोषणा करे चर्च, जिसे भूल गया था ईश्वर- तुम प्रकृति से प्यार करो क्योंकि तुम उसी के अंग हो;

जंगलों से आच्छादित हों दुनिया के रेगिस्तान और धरती की आत्मा;

नाउम्मीद लोगों में उम्मीद की किरण फूटे और खोये हुए लोगों का पता लगा लिया जाय क्योंकि वे लोग अकेले-अकेले राह तलाशने के चलते निराश हुए और रास्ते से भटक गये;

हम उन लोगों के हमवतन और हमसफर बनें जिनमें न्याय और खूबसूरती की चाहत हो, चाहे वे कहीं भी रहते हों, क्योंकि आने वाले समय में कहातम हो जाएँ देशों के बीच सरहदें और दिलों के बीच की दूरी;

शुद्धता केवल देवताओं का उबाऊ विशेषाधिकार भर रह जाये, और हम अपनी गड़बड़ और गन्दी दुनिया में इस तरह गुजारें हर रात जैसे वह आखिरी रात हो और हर दिन जैसे पहला दिन…
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1. प्लाजा द मेयो- अर्जेंनटीना में 1976 से 1983 के बीच सैनिक तानाशाही के अधीन सरकार का विरोध करने वाले क्रांतिकारी नौजवानो को गिरफ्तार करके यातना देने, हत्या करने और गायब कर देने की घटनाएं आम हो गयी थीं। उन नौजवानों की माताओं ने प्लाजा द मेयो नाम से संगठन बनाकर तानाशाही की इन क्रूरताओं का खुलकर विरोध किया था।)

(अनुवाद- दिगम्बर)

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