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हे मार्केट के अराजकतावादियों की सौवीं बरसी की याद में

 –लेस्ली विश्मान, अक्टूबर 198713115782_1052369761503241_201308696_n

4 मई 1970, ओहियो के राष्ट्रीय सुरक्षा सैनिकों ने प्रदर्शनकारी छात्रों के एक समूह पर गोली चलायी, जिसमें चार छात्र मारे गये और नौ घायल हुए। पूरे देश ने गगन भेदी गर्जना के साथ इस घटना का विरोध किया– राज्य–समर्थित इस हत्याकाण्ड की निंदा बहुत थोड़े लोगों ने ही की, जबकि भारी बहुमत ने इस कृत्य के लिए ‘‘कानून और व्यवस्था’’ लागू करने पर खुशी जाहिर की ।

वितयनाम में होने वाले युद्ध का विरोध, जिसमें छात्रों ने बड़ी भूमिका निभायी उसने देश को दो भाग में बाँट दिया और राज्य मशीनरी ने लम्बे समय से जारी इस परम्परागत तौर–तरीके का सहारा लिया कि जनता की आवाज को खामोश करने के लिए कुछ लोगों की हत्या करनी पड़ती है और हमेशा की तरह इस नीति ने अपना काम किया। केन्ट प्रान्त में छात्र आन्दोलन अपने चरम पर था ।

विडम्बना है कि जिस समय राष्ट्रीय सुरक्षा सैनिकों ने केन्ट प्रान्त में छात्रों को गोलियों से भून दिया था, उसी समय मेयर रिचर्ड डैली हे मार्केट चैराहे के उस पुलिस स्मारक को पुनः समर्पित कर रहे थे जिसे सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक सोसाइटी (एसडीएस) के उग्र धड़े के सदस्य वेदरमैन ने 6 अक्टूबर 1969 को बम से उड़ा दिया था। शिकागो द्वारा 4 मई, 1886 के दंगों में उसकी ओर से लड़ने वालों को समर्पित हे मार्केट चैराहे के स्मारक के जरिये कानून लागू करने वाले उन अधिकारियों को सम्मानित किया गया, जिन्होंने 19वीं शताब्दी के अंत में विराट मजदूर आन्दोलन का गला घोंटने के लिए दमन का सहारा लिया था ।

1850 के पूरे दशक के दौरान भारी संख्या में मजदूर 8 घण्टे के कार्यदिवस की माँग के इर्द–गिर्द संगठित हुए। पूरे देश में काम के घण्टे 8 करने की माँग करने वाले सैकड़ों संगठन उठ खड़े हुए। उनके दवाब में 1867 के मार्च में इलिनॉयस जनरल एसेम्बली ने 8 घण्टे कार्य दिवस को इलिनॉयस में कानूनी घोषित कर दिया। परन्तु मजदूरों पर फिर भी 10, 12 और 14 घण्टों तक काम करने के लिए दवाब डाला जाता था। जिन लोगों ने 8 घण्टों से अधिक काम करने से मना किया, उन्हें नौकरी से निकाल कर उनकी जगह बेरोजगारों की स्थायी फौज से नये मजदूर रख लिये गये ।

संगठित व्यापार और श्रम संघ ने (जो बाद में अमरीकी श्रम संघ बन गया) एक मई, 1886 को पहला मई दिवस घोषित किया, जिसे 8 घण्टे का कार्य दिवस लागू करने की अन्तिम समय सीमा माना गया। टेरेन्स पाउडरली व नेशनल नाइट्स ऑफ लेबर जैसे संगठनों द्वारा विरोध किये जाने के बावजूद उस दिन देशव्यापी हड़ताल हुई जिसमें 12 हजार फैक्ट्रियों के 3 लाख, 40 हजार मजदूरों ने हिस्सा लिया। शिकागो नाइट्स ने अल्बर्ट पार्सन्स के प्रभाव में प्रस्ताव का उत्साहपूर्वक समर्थन किया ।

एक मई को अल्बर्ट पार्सन्स ने अपनी पत्नी व दो बच्चों के साथ शिकागो की गलियों में 80 हजार लोगों के आन्दोलनकारी जूलूस की अगुवाई की । 16 फरवरी से मैकोर्मिक प्लांट में तालाबन्दी के कारण निकाले गये 1500 मजदूरों में से ज्यादातर मजदूरों ने आन्दोलन में हिस्सा लिया। पुलिस और पिंकार्टन्स ने अपने हाथों में रायफल लेकर मकान की छतों से इस पूरे आन्दोलन पर नजर रखी। लेकिन पार्सन्स, ऑगस्ट स्पाइस और अन्य वक्ताओं के जोशीले भाषण सुनने के बाद उत्साहित भीड़ बिना कोई घटना घटे वहाँ से बिखर गयी। दो दिनों के अंदर ही लगभग 65 हजार से 80 हजार मजदूरों ने हड़ताल कर दी ।

3 मई, आर्बिटर जितुंग के सम्पादक ऑगस्ट स्पाइस ने मैकोर्मिक से आने वाली सड़क पर 6 हजार हड़ताली लकड़हारों की भीड़ को सम्बोधित किया। जैसे ही शिफ्ट बदलने की घंटी बजी, श्रोताओं में से कुछ लोग निकलकर हड़ताल तोड़ने वालों से जवाब–तलब करने के लिए मैकोर्मिक के गेट की ओर चल दिये। ठीक उसी समय इंस्पेक्टर जॉन बॉनफिल्ड वहाँ आ गये और अव्यवस्था फैल गयी । वहाँ क्या हो रहा है यह देखने के लिए स्पाइस वहाँ पहुँचे, लेकिन उन्होंने अपने आपको पुलिस की लाठियों और गोलियों की बौछार से घिरा पाया। कितने लोग मरे और घायल हुए, यह आज तक सही–सही पता नहीं चल पाया। अधिकांश लोग इतने घबराये हुए थे कि अपना इलाज भी नहीं कराना चाहते थे ।

अपमान का घूँट पीये स्पीज भागे–भागे अपने दफ्तर पहुँचे, जहाँ उन्होंने ‘‘मेहनतकशो, हथियार उठाओ’’ नाम से उत्तेजनापूर्ण सर्कुलर लिखा । एक कम्पोजीटर ने यह सोचकर कि और अच्छा शीर्षक बनेगा, उसमें ‘‘बदला लो’’ शब्द जोड़ दिया ‘‘बदले का सर्कुलर कहे जाने वाले इस ज्ञापन की लगभग 1500 प्रतियाँ बाँट दी गयीं । 4 मई को आर्बिटर जिटुंग में स्पाइस का, मैकोर्मिक में हुई घटना पर लेख पढ़कर शिकागो के मजदूर और अधिक क्रोधित हो गये । उसी अखबार में माइकल एसक्वाब का लेख ‘‘वर्गों का युद्ध अब निकट है’’, भी छपा ।

उसी समय नेताओं का एक समूह जिसमें एडोल्फ फिशर और जॉर्ज एंजिल शामिल थे, उन्हें शाम को हे मार्केट में होने वाली रैली के लिए बुलाया गया । फिशर पर वक्ताओं को बुलाने और पर्चे की छपाई की जिम्मेदारी थी। उनके द्वारा छापा गया मूल पर्चा इस पंक्ति पर खत्म होता था ‘‘मेहनकशों हथियार उठाओ और पूरी ताकत के साथ सामने आओ’’ परन्तु ऑगस्ट स्पाइस ने भाषण देने से मना कर दिया, जब तक कि यह लाइन हटा नहीं दी जाती । मूल पर्चे को बदल दिया गया, लेकिन पहले वाले पर्चे की कुछ प्रतियाँ भी बाँटी गयी ।

उस रात लगभग 2500 लोग इकट्ठे हुए । एडोल्फ फिशर थक कर कुछ मिनटों के लिए सो गये, फिर धीमे–धीमे चलकर जैक के हॉल में शराब पीने गये । जार्ज अपनी पत्नी और कुछ दोस्तों के साथ ताश खेलने के लिए अपने घर पर ही रुक गये । जब कोई वक्ता उपस्थित नहीं हुआ तो भीड़ अशान्त हो गयी ।

स्पाइस साढ़े आठ बजे पहुँचे । उनका जर्मन में भाषण देना तय था । स्पाइस जल्दी में नहीं थे क्योंकि तब विदेशी भाषाओं में भाषण अन्त में होते थे लेकिन भीड़ को असमजंस में पाकर वे तुरंत एक पुरानी गाड़ी पर चढ़ गये और बोलना शुरू कर दिया । स्पाइस की सहायता के लिए कुछ साथी दूसरे वक्ताओं को भीड़ में खोजने लगे ।

अल्बर्ट पार्सन्स अभी–अभी सिनसिनाटी से वापस आये थे । वे लगभग 15 मिनट बाद दिखाई दिये और स्पाइस के बाद उन्होंने बोलना शुरू किया । लगभग 10 बजे पार्सन्स ने मंच सैम्युअल फिल्डेन को सौंप दिया और अपनी पत्नी लूसी के साथ एक शराबखाने में फिशर का साथ देने चले गये ।

फिल्डेन ने 4 मई की दोपहर के बाद का समय वेलदिन कब्रिस्तान में सड़क बनाने के लिए बजरी ढोने के काम में दिया था और उन्हें इस रैली के आयोजन की जानकारी नहीं थी, हे मार्केट पहुँचने के कुछ समय बाद ही उन्हें इसका पता चला । वे बोलने के लिए पहले से तैयार नहीं थे । उन्होंने भीड़ को बाँधे रखने की पूरी कोशिश की। जिस समय इंस्पेक्टर बॉर्न फिल्ड और उसके 180 सिपाही वहाँ पहुँचे, वे भाषण समाप्त करने की तैयारी कर रहे थे ।

बॉर्न फिल्ड ने सभी से ‘‘तुरन्त और शान्तिपूर्वक’’ बिखर जाने की माँग की । ‘‘लेकिन कैप्टन, हम यहाँ शान्तिपूर्वक हैं’’ फिल्डेन ने यह जवाब दिया ही था कि एक विस्फोट ने भीड़ को हिला दिया । पुलिस कतारों के बीच एक बम फेंका गया था । इसके बाद पुलिस ने अंधा–धुंध गोली चलानी शुरू कर दी । जिस समय यह सब खत्म हुआ, चार आम नागरिक और 7 पुलिस वाले मारे गये । सैमुएल फिल्डेन, ऑगस्ट स्पाइस के भाई और आम नागरिक व पुलिस को मिलाकर 100 से 200 लोग घायल हुए । फिर भी, केवल एक सिपाही माथियास देगान ही बम से मरा, बाकी पुलिस की गोलीबारी में घायल हुए ।

एक अज्ञात पुलिस वाले ने 27 जून को शिकागो ट्रिब्यून को बताया ‘‘मैं भी जानता हूँ कि यह एक सच है, बहुत बड़ी संख्या में सिपाही एक-दूसरे की रिवाल्वर से ही घायल हुए थे, उस दिन हे मार्केट में जिस व्यक्ति ने पुलिस बल का संचालन किया, उसकी ओर से यह बहुत बड़ी गलती थी । ऐसी हत्याएँ या मारकाट पहले नहीं देखी गयी। बॉर्न फील्ड ने यह बहुत बड़ी गलती की थी । इसके परिणामस्वरूप घायल और मारे गये लोगों के लिए वही जिम्मेदार है ।’’

बम किसने फेंका यह एक रहस्य है । पुलिस दावा करती है कि वह एक अराजकतावादी था, अल्बर्ट पार्सन्स का मानना था कि वह एक हड़ताल तोड़ने वाला घुसपैठिया था । गर्वनर आल्टगेल्ट ने 1893 में निष्कर्ष निकाला कि सम्भव है कि बम किसी दुश्मनी का बदला लेने वाले व्यक्ति ने फेंका हो ।’’

पॉल एवरिक ने व्यापक अध्ययन के बाद निष्कर्ष निकाला कि बम किसी अराजकतावादी द्वारा फेंका गया । सबसे संदिग्ध अराजकतावादी एडोल्फ स्नोबेल्ट था जो माइकल एसक्वाब का साला था । परन्तु एवरिक ने, जो बम काण्ड के बाद दो बार पकड़े और छोड़े गये, स्नोबेल्ट को इसका जिम्मेदार नहीं माना ।

बम फेंकने वाले को देखने वाले एक मात्र निरपेक्ष गवाह जॉन ब्रेनेट ने जो ब्योरा दिया उससे स्नोबेल्ट का कोई मेल नहीं था और एवरिक ने चिन्हित किया कि स्नोबेल्ट के क्रिया कलाप बम फेंकने वाले के रूप में असंगत जान पड़ते हैं । ‘‘यदि स्नोबेल्ट की जेब में बम होता तो क्या वह बम विस्पफोट की घटना के बाद माइकल एसक्वाब को छुड़ाने के लिए पुलिस स्टेशन जाता ? ये प्रश्न उस पर लगाये अभियोग पर संदेह करने के लिए पर्याप्त हैं ।

एवरिक द्वारा इस निर्णय पर पहुँचने के पीछे कि बम फेंकने वाला अराजकतावादी है । मुख्यतः दो अराजकतावादियों– रॉबर्ट रित्जेल और डायर लुम द्वारा दिये गये वक्तव्य थे । मृत्युदण्ड के बाद रित्जेल ने डॉ– अर्बन हार्टुंगे को बताया कि ‘‘बम फेंकने वालों का पता है, पर हमें अब इस बात को भूल जाना चाहिए ।’’ अगर उसने अपना अपराध स्वीकार कर भी लिया होता, तो हमारे साथियों की जान नहीं बचायी जा सकती थी ।

1891 मे लिखे एक निबंध में डायर लुम कहते हैं कि 4 मई की दोपहर को ऑगस्ट स्पाइस ने बाल्थासार राउ को उन जुझारू लोगों को यह बताते के लिए भेजा था कि हे मार्केट में हथियार के साथ नहीं आना है । लेकिन लुम लिखते हैं कि एक आदमी ने आदेश का उल्लंघन किया जो हमेशा खुद ही निर्णय लेता था । उसने यह कार्य अपनी जिम्मेदारी पर किया । वह बलि का बकरा बनने की अपेक्षा हत्याकाण्ड के विरोध की तैयारी करके मर जाने को वरीयता देता था ।

लुम का मानना है कि मुकदमें की पैरवी करने वाले कहते हैं कि 8 लोगों में से कोई भी बम फेंकने वाले को नहीं जानता था । हालाँकि उनमें से दो लोग बाद में उसे पहचान गये, लेकिन इनमें ‘‘न तो स्पाइस थे और न ही पार्सन्स ।’’ एवरीक का मानना था जिन दो लोगों ने बम फेंकने वाले को पहचाना, वे एंगेल और फिशर थे । लुम के अनुसार बम फेंकने वाले का नाम मुकदमें के दौरान ‘‘कभी चिन्हित नहीं किया गया और आज वह जनता के लिए अज्ञात है ।’’

महान महिला अराजकतावादियों में से एक, लुम की दोस्त और समर्थक बोल्टायरिन दे क्लेयरे की बातों में भी बम फेंकने वाले की पहचान अन्तर्निहित थी । 1899 के अपने स्मारक भाषण में दे क्लेयरे ने कहा ‘‘हे मार्केट में फेंका गया बम उस व्यक्ति का प्रतिरोध है जो इस बात का समर्थक था कि बोलने की स्वतंत्रता और लोगों के शान्तिपूर्वक इकट्ठा होने के कानूनी अधिकार की घोषणा को कम नहीं किया जाना चाहिए ।’’

और 1907 में द क्लेयरे ने कहा कि ‘‘हमारे साथी मारे जा रहे हैं, मैं देख सकती हूँ कि बम फेंकने वाले की अपनी पहचान उद्घाटित करने की कोई मंशा नहीं है । एक नकाबपोश मौन व्यक्ति के रूप में उसने पूरी दुनिया को पार किया और दुनिया पर अपनी छाप छोड़ गया । अब इस बात का भला क्या मतलब है कि वह कौन था, वह उन 8 आदमियों में से नहीं था जिन्हें राज्य ने बम फेंकने के दोष में दण्ड दिया ।’’

इन सुरागों से एवरीक ने निष्कर्ष निकाला कि बम फेंकने वाला सम्भवतया उस जर्मन अराजकतावादी सशस्त्र समूह का सदस्य था जिससे बाल्थासार राउ ने सम्पर्क किया था । उसकी पहचान अराजकतावादियों के एक छोटे से घेरे के अलावा पूर्णतया अज्ञात बमी रही और जॉन वर्नेर की गवाही के अनुसार उसकी लम्बाई 5 फुट, 9 या 10 इंच थी । उसके चेहरे पर मूँछे थीं पर दाढ़ी नहीं ।

अपनी पुस्तक के प्रकाशन के बाद एवरीक को डॉ– अदाह मोरर का एक पत्र मिला जो कैलिफोर्निया के बर्कले में मनोवैज्ञानिक थी । अपने पत्र में उन्होंने किसी ‘‘जेपी मेंग’’ के बारे में पूछा । एवरीक ने जिसकी पहचान 1883 की पीटर्सबर्ग कांग्रेस में शिकागो के अराजकतावादी सदस्य के प्रतिनिधि के रूप में की । मोरर ने पूछा, क्या पहले वाली बातें गलत थीं । मोरर का विश्वास था कि उस बातचीत का सम्बन्ध उनके नाना से है, जिस पर स्वयं मोरर को संदेह था कि बम उन्हीं ने फेंका था ।

छानबीन करने पर एवरीक ने पाया कि प्रतिनिधि का नाम जॉर्ज ही था न कि जे–पी– मेंग । तब डॉ– मोरर द्वारा दिये गये इस सुझाव का क्या हुआ कि बम फेंकने वाला मेंग था । मोरर ने एवरीक को ये जानकारी दी– मेंग का जन्म बावरिया में 1840 के आसपास हुआ और वह वयस्क होने पर अमरीका आया । वह शिकागो में बस गया और चाय बनाने का काम ढूँढा, शादी की और दो लड़कियों– लुईस और केंट का बाप बना । लुईस मोरर की माँ थी । 1883 में मेंग ने मजदूरों के अन्तरराष्ट्रीय संघ के उत्तरी समूह की सेना में काम शुरू किया । इसके सदस्यों में ऑस्कर नीबे, बाल्थासर राउ, रूडोल्पफ स्नाउबोल्ट और लुईस लिंग शामिल थे ।

लुईस ने कई बार अपनी बेटी को बिना व्याख्या किये बताया कि मेंग ने ही बम फेंका था– ‘‘यह वही था’’ उसने कहा । लुईस ने यह भी बताया कि हे मार्केट वाली घटना के दिन रूडोल्फ नामक एक व्यक्ति उसके घर में घुसा था । रूडोल्फ उसके पिता का साथी था और ‘‘वे दोनों पूरी रात रसोईघर में बातें करते रहे ।’’

मोरर के अनुसार 1907 में उसके जन्म के कुछ वर्ष पहले मेंग एक सैलून में लगी आग में मारे गये और वे मेंग का हुलिया बता पाने में असमर्थ थी । इतने पर भी एवरीक को मोरर की कहानी अकाट्य लगी । ‘‘स्वीकार किये गये तथ्यों से मेल खाने के कारण उदाहरण के लिए इसमें एडोल्फ स्नोबेल्ट के विषय में दी गयी जानकारी जिसके बारे में, लोग आम तौर पर नहीं जानते हैं, और एक जर्मन अराजकतावादी डायर लुम द्वारा बम फेंकने वाले व्यक्ति के विषय में दिया गया विवरण डायर लूम शिकागो समूह का एक ‘खुद मुख्तार’ लड़ाका था, आन्दोलन में जानी–पहचानी शख्सियत, परन्तु वह मुख्य नेताओं में से नहीं था और मुकदमें में इसका नाम भी नहीं था । डॉ– मोरर की कहानी सत्य की परिधि में है और इस पर विश्वास करने में मेरी रुचि है ।’’

बम फेंकने वाले की पहचान ने विद्वानों के समक्ष उलझन पैदा कर दी और यह हे मार्केट मुकदमें में अप्रासंगिक हो गया । अल्बर्ट पार्सन्स, ऑगस्ट स्पाइस, जॉर्ज एंगेल, सैम्युअल फिल्डेन, एडोल्फ फिशर, माइकल एसक्वाब, ऑस्कर नीबे और लुईस लिंग के ऊपर बम फेंकने के लिए नहीं, बल्कि हत्या करने का अभियोग लगाया गया । जिस समय बम फटा, इन व्यक्तियों में से केवल स्पाइस और फिल्डेन, केवल दो ही व्यक्ति वहाँ उपस्थित थे । परन्तु स्टेट अटॉर्नी जुलियस एस– ग्रिनेल ने घोषित किया कि ‘‘इन लोगों को अपराधी सिद्ध करो, इनको उदाहरण बनाओ, इनको फाँसी दो और तुम हमारी संस्थाओं को बचाओ ।

किन विचारों ने सामाजिक ताने–बाने को इतनी भारी चुनौती दी ? अल्बर्ट पार्सन्स ने अराजकतावाद को परिभाषित किया कि यह ‘‘ताकत का निषेध, सामाजिक मामलों में किसी भी प्राधिकार का उन्मूलन, किसी एक व्यक्ति पर दूसरे व्यक्ति के प्रभुत्व के अधिकार को न मानना है । यह सत्ता के कर्त्तव्य का, अधिकार का जनता के बीच स्वतन्त्र और समान रूप से बँटवारा है ।’’ स्पाइस ने कहा– ‘‘अराजकतावाद खून–खराबा नहीं, इसका मतलब लूट और आगजनी नहीं । ये दानवी कृत्य तो पूँजीवाद की चारित्रिक विशेषताएँ हैं । अराजकतावाद का अर्थ सबके लिए शान्ति और सुकून’’ है और लुईस लिंग के अनुसार ‘‘अराजकतावाद का मतलब है किसी एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति पर प्रभुत्व और प्राधिकार का न होना––––’’

फिर भी 21 जून 1886 को जब अदालत में मुकदमा शुरू हुआ तो न्यायालय कक्ष में बम फेंकने के बारे में घिसीपिटी, खून की प्यासी और उन्मादी तस्वीर व्याप्त थी । जब मुकदमा शुरू हुआ, केवल सात लोग हिरासत में थे । बम फटने के बाद बुरे नतीजों के भय से पार्सन्स शिकागो से भाग गये और छह सप्ताह तक गिरफ्तारी से बचने में सफल रहे । लेकिन अपनी पत्नी और अटॉर्नी से विचार–विमर्श के बाद पार्सन्स ने आत्मसमर्पण करके साथियों के साथ मुकदमें का सामना करने का निश्चय किया । हर व्यक्ति इस बात से सहमत था कि इससे पलड़ा उनके पक्ष में झुक जाएगा । इसलिए मुकदमा शुरू होने ही वाला था कि पार्सन्स ने न्यायालय कक्ष में प्रवेश किया और नाटकीय रूप से अधिकारियों के सामने अपने आप को प्रस्तुत कर दिया ।

मुकदमा शुरू से ही एक पहेली बना हुआ था । एक विशेष अभिकर्त्ता अपने मनपसन्द और प्रभावशाली जजों की भर्ती कर रहा था और यह योजना कोई रहस्य नहीं थी ‘‘मैं इन लोगों से आह्वान करता हूँ कि वे अभियुक्तों के साथ हठधर्मितापूर्वक व्यवहार करें और समय जाया न करें । वे ऐसे लोगों को बुलाएँ जिनकी अभियोक्ता को जरूरत है ।’’ यह चाल कामयाब हुई । घटना के शिकार एक पुलिस वाले का रिश्तेदार और ऐसे ही पूर्वाग्रह ग्रस्त लोगों को जूरी में शामिल किया गया ।

मुकदमे के दौरान गवाहों ने झूठ बोला, अपनी कहानियाँ बदली और एक–दूसरे के बयानों का खंडन किया । सबूतों को बदलकर सरकारी पक्ष के अनुकूल बना दिया गया । सरकारी मुकदमे के पक्ष में झूठे सबूत बना लिये गये और सही सबूतों को झुठला दिया गया । मुकदमे का बड़ा हिस्सा अभियुक्तों द्वारा लिखे गये भड़काऊ लेखों पर केन्द्रित था जो शिकागो के उग्र अखबारों से लिये गये थे ।

यह मुकदमा शहर का सबसे दिलचस्प तमाशा बन चुका था और इसमें भारी भीड़ उमड़ रही थी । पूरे मुकदमे के दौरान जूरी के सदस्य ताश खेलते रहे और भद्रलोक जज गैरी के साथ बेंच पर बैठे रहे । जो लोग मुकदमे की कार्यवाही देखने के लिए आये, उनमें रोज सारा नीना स्टुअर्ट क्लार्क वैन जाण्ट भी थी जो विराट सम्पत्ति की वारिस, वासार की स्नातक थी । वैन जाण्ट ने बाद में उस फैशनेबुल शरारत का स्मरण किया ‘‘मैं उस समय किसी भी अभियुक्त को नहीं जानती थी, मुकदमे के नाम पर हो रहे प्रहसन के दौरान मैंने इस आशा से अदालत के कमरे में प्रवेश किया कि अन्दर मुझे मूर्खों, दुष्ट और अपराधी जैसे दिखने वाले लोगों का अनोखा जमावड़ा देखने को मिलेगा और उनमें से किसी को भी वहाँ न पाकर मैं बहुत आश्चर्यचकित हुई कि इस तरह का कोई व्यक्ति वहाँ था ही नहीं, बल्कि वे तो बुद्धिमान, दयालु और देखने में भले लोग थे । मेरे मन में रुचि पैदा हो गयी । लेकिन जल्दी ही मैंने पाया कि अदालत के अधिकारी, खुफिया एजेंसी और सारी पुलिस उन लोगों को दोषी सिद्ध करने पर तुली हुई थी इसलिए नहीं कि उन्होंने कोई अपराध किया था, बल्कि इसलिए कि उनका सम्बन्ध मजदूर आन्दोलन से था ।’’

वैन जाण्ट ने कुक काउन्टी जेल में कैदियों से मिलना शुरू किया और ऑगस्ट स्पाइस से हुई दोस्ती जल्दी ही उससे कहीं गहरे रिश्ते में बदल गयी । लेकिन वैन जाण्ट की मुलाकातों को नये नियम–कानूनों ने बाधित किया, जिसमें सिर्फ कैदियों की पत्नियों को ही मिलने की इजाजत थी । ‘‘मुझे यह साफ लग गया कि कैदियों को न्याय दिलाने के लिए मेरा प्रयास उस खास वर्ग को स्वीकार्य नहीं था, जो उन लोगों को खत्म करना चाहते थे । मेरी सामाजिक हैसियत और जान–पहचान के कारण उनकी यह भावना और बढ़ गयी ।’’ स्पाइस वैन जाण्ट ने आपस में शादी करने का निर्णय लिया, लेकिन अधिकारियों ने सहमति देने से इनकार कर दिया और विवाह का आयोजन स्पाइस की जगह उसके भाई को वैन जाण्ट के साथ खड़ा करके सम्पन्न किया गया ।

शादी के बाद इसके लिए अखबारों ने उसकी निंदा की, उसे पड़ोसियों द्वारा धमकाया गया और उसे अपनी मौसी से विरासत में मिलने वाले पाँच लाख डॉलर से वंचित कर दिया गया, क्योंकि वह एक ‘‘उचित शादी’’ करने में असफल रही, लेकिन वैन जाण्ट स्पाइस अपने उद्देश्य पर डटी रही । उसने स्पाइस की आत्मकथा प्रकाशित करवाई और अपने पति को मृत्युदण्ड के बाद अक्सर वह हे मार्केट में भाषण देने भी जाती थी ।

प्रतिवादियों के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण चश्मदीद गवाह शिकागो का मेयर कार्टर हैरीसन था । सम्भावित झड़प से चिन्तित हैरीसन 4 मई की हे मार्केट रैली में गया । कुछ समय बाद जब उसे लगा कि यहाँ कोई खतरा नहीं है तो वह पुलिस स्टेशन गया और उसने वॉनफील्ड से अपने आदमियों को वापस घर भेजने के लिए कहा । वॉनफील्ड इस बात के लिए तैयार हो गया । लेकिन ज्यों ही मेयर वहाँ से गया, उसने अपने आदमियों को हे मार्केट की ओर कूच करने का आदेश दे दिया ।

हैरीसन की गवाही के बावजूद जैसा कि पहले ही उम्मीद थी, अराजकतावादियों को दोषी करार दिया गया । सात पुलिसवालों के बदले सात अराजकतावादियों को फाँसी पर लटकाने की सजा दी गयी । आठवें आरोपी ऑस्कर नीबे को 15 वर्ष का कारावास मिला, जबकि राज्य के अटार्नी ने याचिका दायर की थी कि उसके खिलाफ अभियोग रद्द किया जाय ।

उसके बाद एक साल तक कानूनी और सार्वजनिक जोड़–तोड़ होती रही । लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ । आखिरी दिनों में फील्डेन, स्पाइस और एसक्वाब ने माफी के लिए याचिका दायर की । जिसके लिए उनके साथियों ने उनकी भर्त्सना की । फिर फाँसी से दो दिन पहले स्पाइस ने अपनी याचिका वापस ले ली और दूसरे पत्र में उसने गवर्नर को लिखा कि ‘‘मैं आपसे सात लोगों की हत्या को रोकने की प्रार्थना करता हूँ । उन लोगों का एकमात्र अपराध यही है कि वे आदर्शवादी हैं, कि वे सभी के लिए अच्छे भविष्य की कामना करते हैं । यदि यह कानूनी हत्या जरूरी ही है, तब एक की हत्या कर दी जाय और इसके लिए मैं हाजिर हूँ । गवर्नर ने एसक्वाब और फील्डेन की याचिका मन्जूर कर ली और उनके मृत्युदण्ड की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया ।

6 नवम्बर को तयशुदा फाँसी से पाँच दिन पहले कैदियों को बन्दी गृह से हटा दिया गया और उनकी काल कोठरी की तलाशी ली गयी । पुलिस ने घोषित किया कि लुइस लिंग की काल कोठरी से उन्हें चार बम मिले । पार्सन्स को सन्देह था कि जनता की बढ़ती सहानुभूति के तूफान को थामने के लिए वहाँ बम रखा गया, जबकि दूसरों का मानना था कि लिंग ने ही बम छुपा रखा था ।

जिस समय लुइस लिंग की मृत्यु हुई, तब वह शहीदों में सबसे कम उम्र का, केवल 23 वर्ष का था और सबसे उग्र था, लिंग ने बम बनाया था, बल प्रयोग करने की वकालत की थी और मुकदमे की पूरी कार्रवाई के दौरान उसने कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी । गवाहों को सुनने की जगह उसे कुछ पढ़ना पसन्द था ।

कैप्टन शाक ने एक पत्र में लिखा कि घृणा से दाँत पीसते हुए, उसकी पाशविक आँखें उसके नेत्र कोटरों से बाहर निकली जा रही थी–––– वह इस प्रकार आग बबूला हो रहा था, जैसे पिंजरे में कैद कोई जंगली शिकारी पशु हो । वह गुस्से में चुप था और उसकी प्रत्येक गतिविधि उसमें जुनून की ऊर्जा को प्रकट कर रही थी जो भयानक था । शाक के अनुसार ‘‘लिंग पूरे शिकागो में सबसे खतरनाक अराजकतावादी था ।’’

लिंग के बारे में अराजकतावादी और उनके समर्थक भी एकमत नहीं थे । स्पाइस उसे ‘‘गैर जिम्मेदार’’ और ‘‘उन्मादी’’ कहता था । माइकल एसक्वाब ने स्वीकार किया कि उसका लिंग से ‘‘दोस्ताना रिश्ता नहीं था’’ और ‘‘निश्चित रूप से एक ऐसा प्राणी था–––– जिसका कोई भी परिचित होना नहीं चाहता ।’’ कुछ समर्थकों को आशा थी कि लिंग को पागल घोषित करके फैसला उल्टा जा सकता है ।

लेकिन दूसरे कई लोग उसे नायक मानते थे । वोल्तेयरिन द क्लेयरे ने लिंग को ‘‘सुन्दर और बहादुर लड़का’’ बताया और एम्मा गोल्डमान ने ‘‘आठ लोगों में सबसे शानदार नायक’’ कहा । ‘‘उसकी कभी ने झुकने वाली भावना, अभियोग लगाने वालों और जजों के प्रति पूर्ण तिरस्कार, उसकी इच्छा शक्ति, उस 22 वर्षीय लड़के के बारे में हर चीज उसके व्यक्तित्व में रूमानियत और सुन्दरता ला देती थी । वह हमारे जीवन का प्रकाश पुंज बन गया ।’’

लिंग द्वारा अदालत में दिया गया अन्तिम जोशीला भाषण उस व्यक्ति की झलक प्रस्तुत करता है–

‘‘मैं तुम्हें बेलाग–लपेट और स्पष्ट बता रहा हूँ कि मैं ताकत का समर्थक हूँ । कैप्टन शाक को मैंने पहले ही कहा था कि अगर वे हमारे खिलाफ तोप का इस्तेमाल करते हैं, तो हम उनके खिलाफ डायनामाइट का प्रयोग करेंगे । मैं दोहराता हूँ कि मैं आज की ‘व्यवस्था’ का दुश्मन हूँ और दोहरा रहा हूँ कि जब तक मुझमें साँस बाकी है अपनी पूरी ताकत के मुकाबला करूँगा । मैं दोबारा बिना लाग लपेट के घोषणा करता हूँ कि मैं बल प्रयोग के पक्ष में हूँ । शायद आप सोचते हैं कि आप और अधिक बम नहीं फेंकेंगे, लेकिन मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूँ कि मैं फाँसी के तख्ते पर खुशी से मरूँगा । मुझे इस बात का पूरा विश्वास है कि जिन सैकड़ों–हजारों लोगों से मैंने बात की, वे मेरे शब्दों को याद रखेंगे और जब आप हमें फाँसी पर लटकाओगे, तब– मेरे शब्दों को गौर से सुनो, वे बम फेकेंगे! और इसी आशा में मैं तुमसे कहता हूँ– मैं तुम्हें तुच्छ समझता हूँ । मैं तुम्हारे कानून व्यवस्था और सेना के बल पर चलने वाले शासन का तिरस्कार करता हूँ । इसके लिए मुझे फाँसी दो!

11 नवम्बर 1887, ‘‘काले शुक्रवार’’ को ऑगस्ट स्पाइस, जॉर्ज एंगेल, एडोल्पफ और अल्बर्ट पार्सन्स के लिए फाँसी का तख्ता तैयार किया गया और उन्हें फाँसी पर चढ़ा दिया गया ।

अपने दो बच्चों और मित्र लिज्जी होम्स के साथ लूसी पार्सन्स ने फाँसी पर चढ़ने से पहले अपने पति को देखने की भरसक कोशिश की, लेकिन पुलिस ने उनकी मदद करने का वादा करके उन्हें एक पोस्ट से दूसरी पोस्ट पर घुमाया और फिर पुलिस लाइन के बाहर भेज दिया । जैसे–जैसे समय बीतता गया, बच्चे ठण्ड से ठिठुरने और रोने लगे । लूसी ने पुलिस लाइन को पार करने की कोशिश की । लूसी, लिज्जी और दोनों बच्चों को गिरफ्तार कर लिया गया, उन्हें शिकागो एवेन्यू स्टेशन ले जाया गया और निर्वस्त्र करके तलाशी लेने के बाद अलग–अलग कोठरियों में बन्द कर दिया गया ।

दोपहर के कुछ समय बाद एक महिला सहायिका वहाँ आयी और घोषणा की कि अब सब ‘‘खत्म हो चुका है ।’’ लिज्जी होम्स अपनी सहेली की पीड़ा भरी रुदन को सुनती रही, जब तक उन्हें रिहा नहीं कर दिया गया । लुइस लिंग ने फाँसी के तख्ते को बिलकुल ही नहीं देखा । फाँसी के एक दिन पहले लिंग ने एक सिगार पिया और उसके बाद उसने मुँह में डायनामइट रखकर आग लगा ली,  जिसके धमाके में उसका आधा सिर उड़ गया ।

मरने से पहले वह पीड़ादायक दर्द से कई घण्टों तक तड़पता रहा । कुछ लोगों का दावा था कि पुलिस ने सिगार में डायनामाइट रखा, लेकिन अधिकांश लोग मानते थे कि विद्रोही लिंग ने फाँसी देने वालों को धोखा देने के लिए ऐसा किया ।

एलेक्जेन्डर वर्कमैन ने एक पत्र में एम्मा गोल्डमैन को लिखा कि ‘‘पुलिस अच्छी तरह जानती थी कि लिंग को मरना है । फिर वह उसे क्यों मारना चाहते । इसके अलावा लिंग सम्भवतः ऐसा आदमी था जो दूसरों के बजाय खुद अपने हाथों मरना चाहता था ।’’

वाल्तेरिन दे क्लेयर जानती थीं कि लिंग ने आत्महत्या की है और 1897 में उन्होंने ‘‘अपने भाषण में कहा कि लिंग ने 10 नवम्बर को अपने मित्र द्वारा दिये गये डायनामाइट से कानून पर विजय हासिल कर ली!’’ दे क्लेयर ने अपने पुत्र को बताया कि वह दोस्त डायर लुम था । लुम ने अपने दोस्त को लिखा ‘‘कि वह समर्पित और भयमुक्त था । कोई भी तात्कालिक इच्छा उसको अपने सिद्धांत से विमुख नहीं कर सकी । लिंग बच्चे की तरह जिया और उसी तरह मरा ।’’

फाँसी के बाद शहीदों के पार्थिव शरीरों को उनके घर वापस भेज दिया गया । लिंग का परिवार नहीं था । उसे जॉर्ज एंगेल के घर और खिलौने की दुकान पर ले जाया गया, जिनसे उसका घनिष्ठ सम्बन्ध बन गया था । किसी ने लिंग के शरीर को पूरे रास्ते प्रदर्शित करने के बदले हजारों डॉलर का भुगतान करने की पेशकश की, जिसे एंगेल की विधवा ने गुस्से में ठुकरा दिया ।

एल्बर्ट के शरीर को जब उसके तीसरी मंजिल के छोटे से मकान में लाया गया, तो लूसी ब्राउन रोते–रोते बेहोश हो गयी । लिज्जी होम्स पूरे दिन उसके साथ रही, जबकि सैम्युएल फिल्डेन की पत्नी उसके दोनों बच्चों को दिलासा देने की कोशिश कर रही थी ।

वह घर, जहाँ ऑगस्ट स्पाइस अपनी माँ और भाई–बहनों के साथ रहता था अभी भी शिकागो वीकर पार्क में है जैसा कि 1887 डेली न्यूज अखबार में वर्णित किया गया था उसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है । ‘‘कि लम्बी सफेद धारियाँ और काला क्रेप कागज दरवाजे की घंटी से लटका हुआ था और मातम के सबसे बड़े चिन्हों में क्रेप कागज से बना बड़ा सा काला गुलाब था, जिसके अन्दर से बाहर लाल प्रकाश पुंज हवा में लहरा रहा था––––

13 नवम्बर को स्पाइस के अन्तिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू हुई । उसके ताबूत को बग्गी में रखा गया, जबकि उसके परिवार वाले इन्तजार में खड़ी एक गाड़ी में बैठे हुए थे । शिकागो की सड़क पर चल रही शवयात्रा सभी शहीदों के शव को लेने के लिए उनके घर पर रुकती । शिकागो की सड़कों पर बग्गी और वाहन गाड़ी के पीछे लोगों की कतार लगी थी और वे आहत और उदास मन से जुलूस में चल रहे थे । यह शिकागो के इतिहास की सबसे बड़ी शव यात्रा थी, क्यों अर्थी के पीछे लगभग दो लाख लोग पंक्तिबद्ध होकर चल रहे थे ?

भयग्रस्त अधिकारियों ने सख्त निर्देश जारी कर दिये कि कोई बैनर नहीं, झण्डे नहीं और न ही कोई हथियार । संगीत में केवल शोकगीतों की इजाजत थी। प्रदर्शन और भाषण की मनाही थी और शवयात्रा केवल शहर के बाहरी इलाके से और दोपहर 12 बजे से 2 बजे के बीच ही निकाली जा सकती थी । निषेधाज्ञा केवल एक बार तोड़ी गयी । ‘‘जैसे ही शवयात्रा मिलवॉकी एवेन्यु पहुँची, तभी गृहयुद्ध के दौर के एक बुजुर्ग सेनानी तेजी से पहली कतार के सामने आये और उन्होंने एक छोटे से अमरीकी झण्डे को लहराया । पुलिस ने उन्हें परेशान नहीं किया, वे झण्डे को जुलूस के पीछे ले गये ।

शवयात्रा पुराने विसकोसिन स्टेशन पर खत्म हुई, जहाँ विशेष रूप से किराये पर लिए गये रेल के डिब्बे परिजन को जंगल में वालदेन कब्रगाह ले जाने के लिए इन्तजार कर रहे थे । दूसरे लोग पैदल चल कर कब्रगाह पहुँच गये, जहाँ 10,000 लोग विलियम ब्लेक को सुनने के लिए इकट्ठा हुए। अराजकतावादी अटार्नी ने प्रशस्ति भाषण दिया ।

उन लोगों को अराजकतावादी कहा जाता था । दुनिया के सामने उन्हें मार–काट, दंगा–फसाद और खून–खराबे से प्रेम करने और बेवजह इस वर्तमान व्यवस्था के प्रति घृणा से भरे हुए लोगों के रूप में प्रस्तुत किया गया । ये बातें सच्चाई का सरासर माखौल उड़ाने जैसी हैं । वे लोग शांति से प्यार करते थे, जो उन्हें जानते थे वे उन्हें प्यार करते थे, उन पर विश्वास करते थे । वे लोग जीवन के प्रति उनकी निष्ठा और ईमानदारी को समझते थे–––– और अराजकतावादी के रूप में उनके सम्पूर्ण विचार और दर्शन को भी, कि वे जनता का राज लाना चाहते थे, जिसे इन शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है– ‘‘व्यवस्था बिना जोर जबरदस्ती के’’ ।

जैसे ही दिन ढला, ऑगस्ट स्पाइस, अल्बर्ट पार्सन्स, जार्ज एंगेल, एडोल्फ फिशर के मृत शरीरों को अस्थायी शवगृह में रखा गया । 18 दिसम्बर को उनके पार्थिव शरीर को स्थायी रूप से कब्रगाह में स्थानान्तरित कर दिया गया ।

आज अल्बर्ट विनर द्वारा बनायी गयी इमारत हे मार्केट कब्रगाह की शोभा बढ़ा रही है । यह ताँबे से बना है और ‘मार्सिलेज’ (फ़्रांसीसी क्रान्ति का गीत) से प्रेरित है । स्मारक के आधार स्तम्भ पर अंकित शब्द ऑगस्ट स्पाइस के हैं जो उन्होंने फाँसी के तख्ते से चीखते हुए कहे थे– ‘‘वह दिन आएगा जब हमारी चुप्पी हमारे उन शब्दों से अधिक प्रभावशाली होगी, जिन्हें आज तुम दबा रहे हो ।’’ गवर्नर जॉन अल्टगेल्ड के क्षमा संदेश का एक अंश उसके पीछे अंकित है, उन आठ शहीदों में से सैम्युअल फिल्देन को छोड़कर बाकी को यहीं दफनाया गया ।

हे मार्केट इमारत के ईद–गिर्द जाने–माने कार्यकर्ताओं की कब्रें हैं जो पार्सन्स की पत्नी लूसी और उनके दो बच्चों तथा उसके बगल में नीना जैण्ट स्पाइस की कब्र से घिरी है । वैन जैण्ट की कब्र पर नाम नहीं है क्योंकि इसके लिए पैसे नहीं थे ।

स्मारक के नजदीक ही राजधर्म विरोधियों की कब्रें भी कतार में हैं, जहाँ एम्मा गोल्डमैन की कब्र पर एक बड़ा सा शिलालेख है । उनकी मृत्यु 1940 में कनाडा में हुई थी । उसके पास ही केली, एलिजाबेथ गर्ली पिलन, विलियम जैड फॉस्टर, यूजेन डेनिस, वाल्टेरिन डे क्लेयरे, बेन, रीटमैन और अलक्जेंडर ट्रेचेनबर्ग की साधारण पत्थर की मूर्तियाँ बनी हैं ।

‘‘बिग बिल’’ के बाद 1928 में हेवुड की मास्को में मृत्यु हुई । उनका आधा शरीर क्रेमलिन की दीवार में दफनाया गया और आधा वालदेइ पहाड़ के ऊपर से चारों ओर बिखेर दिया गया । जो हिल को 19 नवम्बर 1915 में उटाह की सरकार ने फाँसी पर चढ़ाया, जिसे आई डब्ल्यू–डब्ल्यू के द्वारा शिकागो वापस लाया गया । पाँच हजार लोग जो के पार्थिव शरीर को अन्तेष्टि से पहले अन्तिम विदाई देने के लिए थैंक्स गीविंग डे के जुलूस में शामिल हुए । उसके बाद उनकी अस्थियाँ उटाह को छोड़कर अमरीका के सभी प्रान्तों, दक्षिण अमरीका, यूरोप, एशिया, दक्षिण अप्रफीका, न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया के लिए लिफाफे में भरकर पहुँचा दी गयी । 1 मई 1916 को उन लिफाफों को एक साथ खोला गया और जो हिल पुरी दुनिया में फैल गये । इलियानोस प्रान्त में अस्थियाँ बिखेरी गयी ।

और उसके अलावा मोर्ट शाफनर भी हैं जिनकी मृत्यु 1973 में हुई थी । जब हाईस्कूल में थे तभी 18 साल की उम्र में शाफनर ने वियतनाम युद्ध का विरोध करने वाले चार अध्यापकों पर की गई फायरिंग का विरोध किया । उसने नील्साऊनशिप स्कूल बोर्ड तक दौड़ लगा कर चुनाव के नियमों को चुनौती दी । उसका नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया लेकिन तीन सप्ताह बाद उस कानून को बदल दिया गया । जब वह बीस साल की उम्र में अचानक हृदयाघात से मर गया तब उसके परिवार ने उसे यहाँ दफनाने का फैसला लिया, ताकि वहाँ आने वाले बाल्डेन को याद दिलायें कि सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष जारी है ।

 

(यह  लेख हे मार्केट के अराजकतावादियों की  सौवीं बरसी की याद में मंथली रिव्यू  पत्रिका में  प्रकाशित हुआ था जिसे  बाद में मंथली रिव्यू प्रेस से  प्रकाशित पुस्तक हिस्ट्री एज इट हैपन्ड में संगृहीत किया गया.यह पुस्तक हिंदी में गार्गी  प्रकाशन से इतिहास जैसा घटित हुआ शीर्षक  से प्रकाशित हो  चुकी है. प्रस्तुत लेख का अनुवाद दिनेश प्रखर ने  किया  है. )
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आशावादी आदमी — नाजिम हिकमत

nazim

जब वह बच्चा था, उसने मक्खियों के पर नहीं नोचे

बिल्लियों की पूंछ में टिन नहीं बाँधा

माचिस की डिब्बी में भँवरों को कैद नहीं किया

चींटी की बाम्बी नहीं ढायी

वह बड़ा हुआ

और यह सबकुछ किया गया उसके साथ

जब वह मरा तो मैं उसके सिरहाने खड़ा था

उसने कहा कि एक कविता सुनाओ

सूरज और समुद्र के बारे में

नाभिकीय संयन्त्र और उपग्रहों के बारे में

मानवजाति की महानता के बारे में

(अनुवाद – दिगम्बर)

कला के बारे में — नाजिम हिकमत

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कभी-कभी मैं भी कह देता हूँ- हाय,

अपने दिल की गहराइयों से

जब देखता हूँ  सुनहरे बालों की लटों में गुंथी

खुनी रंग के मोतियों की माला!

 

लेकिन मेरी कविता की देवी को

पसंद है हवा से बातें करना

इस्पात से बने डैनों पर

जैसे शहतीर मेरे झूला पुलों के!

 

मैं दिखावा नहीं करता

कि गुलाब के लिए बुलबुल का मातम

आसान नहीं कानों में गूंजना…

लेकिन वह जुबान

जो सचमुच मुझसे बात करती है

वह तो विथोवेन के सोनेट हैं बजते हुए

ताम्बा, लोहा, लकड़ी, हड्डी और ताँत पर….

 

आप के लिए “मुमकिन है”

सरपट भागते हुए गायब हो जाना

धूल के गुबार में!

जहाँ तक मेंरी बात है, मैं नहीं बदलूँगा

असली नस्ल के अरबी घोड़े से

छह मील की रफ़्तार वाला

अपना लोहे का घोड़ा

जो दौड़ता है लोहे की पटरी पर!

 

कभी-कभी मेरी आँखें उलझ जाती हैं

किसी बूढी गूंगी बड़ी मक्खी की तरह

हमारे घर के कोने में लगे चतुर मकड़ी के जाले में.

लेकिन सच पूछो तो मैं देखता हूँ

सतहत्तर मंजिले, मजबूत कंक्रीट के पहाड़

जिनको बनाते हैं मेरे नीली वर्दी वाले बिल्डर!

 

मिलना होता अगर मुझको

“जवान अदोनिस*, बाइब्लोस के देवता की”

मरदानी सुन्दरता से किसी पुल पर,

तो शायद मैं ध्यान ही नहीं देता उसकी तरफ;

मगर मैं रोक नहीं सकता टकटकी लगाने से

अपने फलसफी की बेजान आँखों के अन्दर

या अपने फायरमैन के पसीने से सराबोर

सपाट चेहरे पर, दहकता सूरज की तरह!

 

हालाँकि मैं पी सकता हूँ

घटिया सिगरेट

बिजली घर में अपने काम की जगह  पर,

लेकिन अपने हाथों से कागज में लपेटकर

नहीं पी सकता तम्बाकू-

चाहे कितना ही बेहतरीन क्यों न हो!

चमड़े की जैकेट और टोप में सजी

अपनी बीबी का सौदा

न आज तक किया और न आगे करूँगा

ईव के नंगेपन से!

मुमकिन है कि मेरे पास नहीं हो “शायराना रूह”?

लेकिन मैं क्या करूँ

अगर  मैं अपने खुद के बच्चों से प्यार करता हूँ

कहीं ज्यादा.

—————————————————-

अदोनिस– ग्रीक पौराणिक कथाओं का एक धार्मिक रहस्यादी चरित्र. सुन्दरता का प्रतीक. अदोनिस की मृत्यु  एस्बोस द्वीप के शायर सैप्फो के चारों ओर युवा लड़कियों के घेरे में हुई, ऐसा दिखाया गया है.

 

(अनुवाद – दिगम्बर)

हमारी आँखें – नाजिम हिकमत

nazim

 

 

 

 

 

 

 

हमारी आँखें

साफ़ बूँदें हैं

पानी की.

 

हर बूँद में मौजूद है

एक छोटी सी निशानी

हमारी काबिलीयत की

जिसने जान डाल दी ठन्डे लोहे में.

 

हमारी आँखें

पानी की

साफ़ बूँदें हैं

समन्दर में इस तरह घुलीमिली

कि आप शायद ही पहचान पाएँ

बर्फ की सिल्ली में एक बूँद

खौलती कडाही में.

 

शाहकार इन आँखों का

उनकी भरपूर काबिलीयत का

यह जिन्दा लोहा.

 

इन आँखों में

पाक साफ़ आँसू

छलक नहीं पाते
गहरे समन्दर से
बिखर जाती

अगर हमारी ताकत,

तो हम कभी नहीं मिला पाते

डायनेमो को टरबाइन के साथ,

कभी तैरा नहीं पाते

इस्पात के इन पहाड़ों को पानी में

इतनी आसानी से

कि जैसे खोंखले काठ के बने हों.

 

शाहकार इन आँखों का

उनकी भरपूर काबिलीयत का

हमारी मुत्तहद मेहनत का

यह जिन्दा लोहा.

(अंग्रेजी से अनुवाद — दिगम्बर)

2014 in review

The WordPress.com stats helper monkeys prepared a 2014 annual report for this blog.

Here’s an excerpt:

A New York City subway train holds 1,200 people. This blog was viewed about 6,400 times in 2014. If it were a NYC subway train, it would take about 5 trips to carry that many people.

Click here to see the complete report.

सीधा-साधा समाजवादी सच- पॉल लफार्ग

workers


(अक्सर किसी कारखाने या दफ्तर में काम करने वाले वेतनभोगी मजदूर से बात करो तो वे यह कहते हैं कि उन्हें काम देकर उनका मालिक उन पर कृपा करता है ,क्योंकि अगर उन्हें काम न मिले तो उनका जीना मुश्किल हो जायेगा. समाज में सदियों से फैलायी गयी सोच और आजकल मीडिया के ज़रिये लगातार मालिकों कि भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किये जाने का ही नतीजा है कि मेहनतकश लोग अपने शोषकों को ही अपना कृपानिधान मान लेते हैं. सवाल यह है कि मालिक मजदूरों की परवरिश करता है या मजदूर मालिकों को करोड़पति-अरबपति बनाते हैं ? इस सच्चाई को समझने में पौल लफार्ग द्वारा 1903 में लिखा यह वार्तालाप काफी मददगार है. इस वार्तालाप में शारीरिक श्रम और सीधे उत्पादन में लगे मजदूरों का उदाहरण दिया गया है, लेकिन यह बात मानसिक श्रम करने वाले सेवाक्षेत्र के कर्मचारियों के मामले में भी लागू होती है.)

मज़दूर- यदि कोई मालिक नहीं होता, तो मुझे काम कौन देता?

प्रचारक- यह एक सवाल है जो अक्सर लोग हमसे पूछते हैं. इसे हमें अच्छी तरह समझना चाहिए. काम करने के लिये तीन चीजों की ज़रुरत होती है- कारखाना, मशीन और कच्चा माल.

मजदूर- सही है.

प्रचारक – कारखाना कौन बनाता है?

मजदूर- राजमिस्त्री.

प्रचारक- मशीने कौन बनाता है?

मजदूर- इंजीनियर.

प्रचारक- तुम जो कपड़ा बुनते हो, उसके लिये कपास कौन उगाता है? तुम्हारी पत्नी जिस ऊन को कातती है, उसे कौन पैदा करता है? तुम्हारा बेटा जो खनिज गलाता है उसे ज़मीन से खोद कर कौन निकालता है?

मजदूर- किसान, गडरिया, खदान मजदूर. वैसे ही मजदूर जैसा मैं हूँ.

प्रचारक- हाँ, तभी तो तुम, तुम्हारी पत्नी और तुम्हारा बेटा काम कर पाते हैं? क्योंकि अलग-अलग तरह के मजदूर तुम्हे पहले से ही इमारतें, मशीनें और कच्चा माल तैयार कर के दे रहे हैं.

मजदूर- बिलकुल, मैं सूती कपड़ा बिना कपास और करघे के नहीं बुन सकता हूँ.

प्रचारक- हाँ, और इससे पता चलता है कि तुम्हें कोई पूँजीपति या मालिक काम नहीं देता है, बल्कि यह किसी राजमिस्त्री, इंजीनियर और किसान की देन है.क्या तुम जानते हो कि तुम्हारा मालिक कैसे उन चीजों का इन्तजाम करता है जो तुम्हारे काम के लिये ज़रूरी हैं?

मजदूर- वह इन्हें खरीदता है.

प्रचारक- उसे पैसे कौन देता है?

मजदूर- मुझे क्या पता. शायद उसके पिता ने उसके लिये थोड़ा बहुत धन छोड़ा होगा और आज वह करोड़पति बन गया है.

प्रचारक- क्या उसने यह पैसा मशीनों में काम करके और कपड़ा बुन के कमाया है?

मजदूर- ऐसा तो नहीं है, ज़ब हमने काम किया, तभी उसने करोड़ों कमाया.

प्रचारक- तब तो वह ऐसे ही बिना कुछ किये अमीर बन गया है. यही उसकी किस्मत चमकाने का एकमात्र रास्ता है- जो लोग काम करते हैं उन्हें तो केवल जिन्दा रहने भर के लिये मजदूरी मिलती है. लेकिन मुझे बताओ कि यदि तुम और तुम्हारे मजदूर साथी काम नहीं करें, तो क्या तुम्हारे मालिक की मशीनों में जंग नहीं लग ज़ायेगा और उनके कपास को कीड़े नहीं खा जायेंगे?

मजदूर- इसका मतलब यदि हम काम न करें, तो कारखाने का हर सामान बर्बाद और तबाह हो जायेगा.

प्रचारक- इसीलिये तुम काम करके मशीनों और कच्चे माल को बचा रहे हो जो कि तुम्हारे काम करने के लिये ज़रूरी है.

मजदूर- यह बिल्कुल सही है, मैंने पहले कभी इस तरह नहीं सोचा.

प्रचारक- क्या तुम्हारा मालिक यह देखभाल करने आता है कि उसका कारोबार कैसा चल रहा है?

मजदूर- बहुत ज्यादा नहीं, वह हर दिन एक चक्कर लगता है, हमारे काम को देखने के लिये. लेकिन अपने हाथों को गंदा होने के डर से वह उन्हें अपनी जेब में ही डाले रहता है. एक सूत कातने वाली मिल में, ज़हाँ मेरी पत्नी और बेटी काम करती हैं, उन्होंने अपने मालिक को कभी नहीं देखा है, ज़बकि वहाँ चार मालिक हैं. ढलाई कारखाने में भी कोई मालिक नहीं दिखता है ज़हाँ मेरा बेटा काम करता है. वहाँ के मालिक को तो न किसी ने देखा है और न ही कोई जानता है. यहाँ तक कि उसकी परछाई को भी किसी ने नहीं देखा है. वह एक लिमिटेड कम्पनी है जिसका अपना काम है. मान लो कि मेरे और तुम्हारे पास 500 फ्रांक कि बचत होती है, तो हम एक शेयर खरीद सकते हैं और हम भी उनमें से एक मालिक बन सकते हैं बिना उस कारखाने में पैर रखे.

प्रचारक- तो फिर उस ज़गह पर काम कौन देखता है और कामकाज का संचालन कौन करता है, ज़हाँ से ये शेयर धारक मालिकाने का सम्बंध रखते हैं? तुम्हारी खुद कि कंपनी का मालिक भी ज़हाँ तुम काम करते हो वहाँ कभी दिखायी नहीं देता और कभी-कभार आ भी जाए तो वह गिनती में नहीं आता है.

मजदूर- प्रबंधक और फोरमैन.

प्रचारक- लेकिन जिन्होंने कारखाना बनाया, मशीनें बनायीं व कच्चे माल को तैयार किया, वे भी मजदूर ही हैं. जो मशीनों को चलाते हैं वे भी मजदूर हैं. प्रबंधक और फोरमैन इस काम कि देख रेख करते हैं, तब मालिक क्या करते हैं?

मजदूर- कुछ नहीं करते व्यर्थ समय गँवाते हैं.

रचारक- अगर यहाँ से चाँद के लिये कोई रेलगाड़ी होती, तो हम वहाँ सारे मालिकों को बिना वापसी की टिकट दिये भेज देते और फिर भी तुम्हारी बुनाई तुम्हारी पत्नी कि कताई और तुम्हारे बेटे कि ढलाई का काम पहले जैसा ही चलता रहता. क्या तुम जानते हो कि पिछले साल तुम्हारे मालिक ने कितना मुनाफा कमाया था?

मजदूर- हमने हिसाब लगाया था कि उसने कम से कम एक लाख फ्रांक कमाये थे.

प्रचारक- कितने मजदूर उसके यहाँ काम करते हैं- औरत, मर्द और बच्चों को मिलाकर?

मजदूर- एक सौ.

प्रचारक- वे कितनी मजदूरी पाते हैं?

मजदूर– प्रबंधक और फोरमैन के वेतन मिलाकर औसतन लगभग एक लाख फ्रांक सालाना.

प्रचारक- यानी की सौ मजदूर सारे मिलकर एक लाख फ्रांक वेतन पाते हैं, जो सिर्फ उन्हें भूख से न मरने के लिये ही काफी होता है. ज़बकि तुम्हारे मालिक की जेब में एक लाख फ्रांक चले जाते हैं और वह भी बिना कुछ काम किये. वे एक लाख फ्रांक कहाँ से आते हैं?

मजदूर- आसमान से तो नहीं आते हैं. मैंने कभी फ्रांक की बारिश होते तो देखी नहीं है.

प्रचारक- यह मजदूर ही हैं जो उसकी कंपनी में एक लाख फ्रांक का उत्पादन करते हैं जिसे वे अपने वेतन के रूप में लेते हैं और मालिक जो एक लाख फ्रांक का मुनाफा पाते हैं जिसमें से कुछ फ्रांक वे नयी मशीने खरीदने में लगाता है वह भी मजदूरों की ही कमाई है.

मजदूर- इसे नाकारा नहीं ज़ा सकता.

प्रचारक- तब तो यह तय है कि मजदूर ही उस पैसे का उत्पादन करता है, जिसे मालिक नयी मशीनें खरीदने में लगाता है. तुमसे काम करवाने वाले प्रबंधक और फोरमेंन भी तुम्हारी ही तरह वेतनभोगी गुलाम हैं जो इस उत्पादन कि देख-रेख करते हैं. तब मालिक कि क्या ज़रूरत है? वह किस काम का है?

मजदूर- मजदूरों का शोषण करने के लिये.

प्रचारक- ऐसा कहो कि मजदूरों को लूटने के लिये, यह कहीं ज्यादा साफ़ और ज्यादा सटीक है.

( अनुवाद- स्वाति / शशि )

मनहूस आज़ादी — नाजिम हिकमत

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तुम बेच देते हो –

अपनी आँखों की सतर्कता, अपने हाथों की चमक.

तुम गूंथते हो लोइयाँ जिंदगी की रोटी के लिये,

पर कभी एक टुकड़े का स्वाद भी नहीं चखते

तुम एक गुलाम हो अपनी महान आजादी में खटनेवाले.

अमीरों को और अमीर बनाने के लिये नरक भोगने की आज़ादी के साथ

तुम आजाद हो!

 

जैसे ही तुम जन्म लेते हो, करने लगते हो काम और चिंता,

झूठ की पवनचक्कियाँ गाड़ दी जाती हैं तुम्हारे दिमाग में.

अपनी महान आज़ादी में अपने हाथों से थाम लेते हो तुम अपना माथा.

अपने अन्तःकरण की आजादी के साथ

तुम आजाद हो!

 

तुम्हारा सिर अलग कर दिया गया है धड़ से.

तुम्हारे हाथ झूलते है तुम्हारे दोनों बगल.

सड़कों पर भटकते हो तुम अपनी महान आज़ादी के साथ.

अपने बेरोजगार होने की महान आज़ादी के साथ

तुम आजाद हो!

 

तुम बेहद प्यार करते हो अपने देश को,

पर एक दिन, उदाहरण के लिए, एक ही दस्तखत में

 

उसे अमेरिका के हवाले कर दिया ज़ाता है

और साथ में तुम्हारी महान आज़ादी भी.

उसका हवाईअड्डा बनने की अपनी आजादी के साथ

तुम आजाद हो!

 

वालस्ट्रीट तुम्हारी गर्दन ज़कड़ती है

ले लेती है तुम्हें अपने कब्ज़े में.

एक दिन वे भेज सकते हैं तुम्हें कोरिया,

ज़हाँ अपनी महान आजादी के साथ तुम भर सकते हो एक कब्र.

एक गुमनाम सिपाही बनने की आज़ादी के सा

 

तुम आजाद हो!

 

तुम कहते हो तुम्हें एक इंसान की तरह जीना चाहिए,

एक औजार, एक संख्या, एक साधन की तरह नहीं.

तुम्हारी महान आज़ादी में वे हथकडियाँ पहना देते हैं तुम्हें.  

गिरफ्तार होने, जेल जाने, यहाँ तक कि

फाँसी पर झूलने की अपनी आज़ादी के साथ

तुम आजाद हो.

 

तुम्हारे जीवन में कोई लोहे का फाटक नहीं,

बाँस का टट्टर या टाट का पर्दा तक नहीं.

आज़ादी को चुनने की जरुरत ही क्या है भला 

तुम आजाद हो!

 

सितारों भारी रात के तले बड़ी मनहूस है यह आज़ादी.  

(अनुवाद- दिनेश पोसवाल)

राष्ट्रपति ओबामा के नाम ब्रैडली मैनिंग का पत्र

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(ब्रैडली मैनिंग एक अमरीकी सैनिक रहे हैं जिन्होंने विकीलिक्स को इराक और अफगानिस्तान में अमरीकी कारगुजारियों के बारे में  ख़ुफ़िया जानकारी मुहैया की थी. इस जुर्म में उन्हें 35 साल की सजा हुई है.)

मैंने 2010 में जो निर्णय लिया था, वह अपने देश के प्रति और जिस दुनिया में हम जी रहे हैं उसके प्रति गहरे लगाव का परिणाम था. 11 सितम्बर की त्रासद घटना के समय से ही हमारा देश युद्धरत है. हम ऐसे दुश्मन से युद्ध करते आ रहे हैं जो हमें किसी परम्परागत युद्धक्षेत्र में हमारा मुकाबला नहीं करना चाहता और इसी के चलते हमें अपने ऊपर और अपनी जीवन शैली के ऊपर थोपे गये जोखिम का सामना करने का अपना तौर-तरीका बदलना पड़ा.

शुरू-शुरू में मैं इस तौर-तरीके से सहमत था और मैंने अपने देश की हिफाजत में मदद करने के लिए अपनी सेवा अर्पित करने का रास्ता चुना. लेकिन यह उससे पहले की बात है जब में ईराक में था और रोज-ब-रोज गोपनीय सैनिक रिपोर्टों को पढता था. तब हम जो कर रहे थे उसकी नैतिकता पर मैंने सवाल उठाना शुरू किया. यही वह समय था जब मुझे यह अहसास हुआ कि दुश्मन द्वारा थोपे गये जोखिम का मुकाबला करने के अपने प्रयासों में हम अपनी मानवता को भूल चुके हैं. हमने सचेतन रूप से ईराक और अफगानिस्तान, दोनों ही जगह मानव जीवन की गरिमा को कम करने का रास्ता चुना. हम उन लोगों का सामना करते हुए  जिन्हें हमने दुश्मन मान लिया था, कभी-कभी हमने निर्दोष लोगों को मार डाला. जब भी हमने निर्दोष नागरिकों की हत्या की, हमने अपने बर्ताव की जिम्मेदारी लेने की जगह किसी भी सार्वजनिक जिम्मेदारी से बचने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा और वर्गीकृत सूचना के नकाब में खुद को छुपाने का रास्ता अपनाया.

दुश्मन को कत्ल करने के जोश में हमने यातना और उत्पीडन की परिभाषा पर अंदरखाने बहस की. हमने लोगों को ग्वाटेमाला में कई वर्षों तक बिना उचित प्रक्रिया अपनाए बंदी बनाकर रखा. इराकी सरकार द्वारा किये जाने वाले उत्पीडन और मृत्युदंड से हमने आँख मूँद ली, जो समझ से परे है. और आतंक के खिलाफ अपने युद्ध के नाम पर हम ऐसी बेशुमार कार्रवाइयों को चुपचाप पचा लिया.

अक्सर जब सत्ताधारियों दवारा अपनी नैतिक रूप से गलत कारगुजारियों को सही ठहराना होता है, तब देशभक्ति की चीख पुकार मचाई जाती है. जब तार्किकता पर आधारित किसी विरोध को देशभक्ति की इन चीखों में डुबो देना होता है, तो अमूमन अमरीकी सैनिक ही हैं जिन्हें किसी दुर्भावनापूर्ण मुहीम को पूरा करने का आदेश दिया जाता है.

हमारे राष्ट्र के सामने भी लोकतंत्र के सद्गुण के लिए ऐसे ही अंधकारपूर्ण समय आये हैं, जिनमें से कुछ एक हैं- अश्रुधारा त्रासदी (जिसमें अमरीकी सरकार ने दक्षिणपूर्व राज्यों के लाखों अमरीकी मूल निवासियों को अपनी ज़मीन से ज़बरन उजाड कर उनकी जमीनें कपास उगानेवाले वाले फार्मरों को दे दिया था और उन्हें मिसिसिपी नदी के किनारे एक बाड़े में बसा दिया था), ड्रेड स्कॉट निर्णय (अमरीकी गृहयुद्ध- 1861-65 के दौरान अमरीकी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अमरीकी गुलाम ड्रेड स्कॉट के मामले में दिया गया कुख्यात फैसला जिसमें कहा गया था कि किसी भी अफ्रीकी-अमरीकी को यह अधिकार नहीं है कि वह न्यायालय में आकर न्याय के लिये गुहार लगाये), मैकार्थिज्म (मैकार्थी की नीतियों के अनुसार ऐसे हजारों लोगों को, जिन पर कम्युनिस्ट या उनके समर्थक होने का संदेह था, बिना किसी प्रमाण के गैरकानूनी रूप से शारीरिक-मानसिक उत्पीडन का शिकार बनाया गया), जापानी-अमरीकी नज़रबंदी शिविर (दूसरे महायुद्ध के अंतिम दिनों में पर्ल हार्बर पर हमले के बाद एक लाख से भी अधिक जापानी मूल के अमरीकी नागरिकों को नज़रबंदी शिविर में रखा गया था). मुझे पूरा विशवास है कि ९ सितम्बर के बाद से कई कार्रवाइयों को किसी न किसी दिन इसी रोशनी में देखा जाएगा.

जैसा कि स्वर्गीय हॉवर्ड जीन ने एक बार कहा था- “कोई भी झंडा इतना बड़ा नहीं होता, जो निर्दोष जनता की हत्या के शर्म को ढकने के लिए पर्याप्त हो.”

मैं समझता हूँ कि मेरी कार्रवाई से कानून का उल्लंघन हुआ है और अगर मेरी कार्रवाई से किसी को ठेस पहुंची या अमरीका का नुकसान हुआ, तो इसके लिए मुझे खेद है. मै केवल जनता की सहायता करना चाहता था. जब मैंने वर्गीकृत सूचना को प्रकट करने का निर्णय लिया तो मैंने अपने देश के प्रति प्यार और दूसरों के प्रति कर्तव्य की भावना से ही किया.

अगर आप ने हमारी क्षमा याचना को स्वीकार नहीं किया, तो मै यह मान कर अपनी सजा भुगत लूँगा कि एक मुक्त समाज में जीने के लिए कभी-कभी आपको उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है. मै खुशी-खुशी वह कीमत चुकाऊंगा, अगर इसका मतलब यही है कि हमें एक ऐसा देश चाहिए जिसने आजादी को सही मायने में आत्मसात किया हो और इस प्रस्तावना के प्रति समर्पित है कि हर औरत और मर्द एक सामान हैं.  

एदुआर्दो गालेआनो की कविता- सपना देखने का अधिकार

eduardo 1
संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1948 में और दुबारा 1976 में मानवाधिकारों की लम्बी सूची जारी की, लेकिन मानवता की भारी बहुसंख्या आज भी सिर्फ देखने, सुनने और चुप रहने के अधिकार का ही उपभोग कर पाती है। मान लीजिये की हम सपना देखने के अधिकार का प्रयोग करने लगें, जिसकीआज तक किसी ने घोषणा नहीं की ? मान लीजिये की हम थोडा बक-बक करने लगें? आइये, हम अपनी निगाहें इस मौजूदा घिनौनी दुनिया की जगह एक बेहतरीन दूसरी दुनिया की ओर टिकाएँ जो मुमकिन है-

हवा तमाम जहरीली चीजों से साफ हो, सिवाय उन जहरों के जो पैदा हुए हों इंसानी डर और इंसानी जज्बात से;

सडकों पर, कारें रौंदी जाएँ कुत्तो के द्वारा;

लोग कारों से न हाँके जाएँ या संचालित न हों कंप्यूटर प्रोग्राम से या खरीदे न जाएँ सुपर बाज़ार के द्वारा या उन पर निगाह न रखी जाय टेलीविजन से;

आगे से टीवी सेट परिवार का सबसे ख़ास सदस्य न रह जाएँ और उनके साथ वैसा ही सलूक किया जाय, जैसा इस्तरी या वाशिंग मशीन के साथ;

लेग श्रम करने के लिए जीने के बजाय जीने के लिए श्रम करें;

कनून की नजर में माना जाय मूर्खता का अपराध कि लोग धन बटोरने या जीतने के लिए जिन्दा रहें, बजाय इसके कि सहजता से जीयें, उन पंछियों की तरह जो अनजाने ही चहचहाते हैं और उन बच्चों की तरह जो खेलते हैं बिना यह जाने कि वे खेल रहे हैं;

किसी देश में युद्व के मोर्चे पर जाने से इन्कार करने वाले नौजवान जेल नहीं जायें बल्कि जेल जायें वे लोग जो युद्व छेड़ना चाहते हैं;

अर्थशास्त्री उपभोग के स्तर से जीवन स्तर को या उपभोक्ता सामानों की मात्रा से जीवन की गुणवत्ता को न नापें;

रसोईये इस बात में यकीन न करें कि लोबस्टर को अच्छा लगता है जिन्दा उबाला जाना;

इतिहासकार इस बात में यकीन न करें कि देशों को अच्छा लगता है उन पर हमला किया जाना;

राजनेता इस बात में यकीन न करें कि सिर्फ वादों से भर जाता है गरीब लोगों का पेट;

गम्भीरता को सद्गुण नहीं समझा जाय और जो खुद पर हँसना नहीं जानता हो, उसे गम्भीरता से न लिया जाय;

मौत और पैसेकी जादुई शक्ति गायब हो जाय और कोई चूहा महज वसीयत या दौलत के दम पर अचानक गुणी जन न बन जाय;

अपने विवेक के मुताबिक जो ठीक लगे वह काम करने के लिए किसी को मूर्ख न समझा जाय और नाह ही अपने फायदे के हिसाब से काम करने वाले को बुद्विमान;

पूरी दुनिया में गरीबों के खिलाफ नहीं, बल्कि गरीबी के खिलाफ जंग छिड़े और हथियार उद्योग के सामने खुद को दिवालिया घोषित करने के सिवा कोई चारा न रह जाये;

भोजन खरीद-फरोख्त का सामान न हो और संचार साधनों का व्यापार न हो क्योंकि भोजन और संचार मानवाधिकार हैं;

कोई व्यक्ति भूख से न मरे और कोई व्यक्ति खाते-खाते भी न मरे;

बेघर बच्चों को कूड़े का ढेर न समझा जाय क्योंकि कोई भी बच्चा बेघर न रह जाय;

धनी बच्चों को सोने जैसा न माना जाय क्योंकि कोई भी बच्चा धनी न रहे;

शिक्षा उन लोगों का विशेषाधिकार न हो जिनकी हैसियत हो उसे खरीदने की;

पुलिस उन लोगों पर कहर न ढाये जिनकी जेब में उसे देने के लिए पैसा न हो;

न्याय और मुक्ति, जिन्हें जन्म से ही आपस में जुड़े बच्चों की तरह काट कर अलग कर दिया गया, आपस में फिर मिलें और एक साथ जुड़ जायें;

एक महिला, एक अश्वेत महिला ब्राजील में राष्ट्रपति चुनी जाय, एक रेड इण्डियन महिला ग्वाटेमाला में और दूसरी पेरू में सत्ता संभाले;

अर्जेंनटीना की प्लाजा द मेयो (1) की सनकी औरतों को मानसिक स्वास्थ्य की सब से अच्छी मिसाल समझा जाय क्योंकि उन्होंने जान पर खतरा जानकर भी चुप स्वीकार नहीं किया चुप बैठना;

चर्च और पचित्र माता, मूसा के शिलालेख की गलत लिखावट को दुरूस्त करें और उनका छठा आदेश शरीर के उत्सव मनाने का आदेश दे;

एक और आदेश की घोषणा करे चर्च, जिसे भूल गया था ईश्वर- तुम प्रकृति से प्यार करो क्योंकि तुम उसी के अंग हो;

जंगलों से आच्छादित हों दुनिया के रेगिस्तान और धरती की आत्मा;

नाउम्मीद लोगों में उम्मीद की किरण फूटे और खोये हुए लोगों का पता लगा लिया जाय क्योंकि वे लोग अकेले-अकेले राह तलाशने के चलते निराश हुए और रास्ते से भटक गये;

हम उन लोगों के हमवतन और हमसफर बनें जिनमें न्याय और खूबसूरती की चाहत हो, चाहे वे कहीं भी रहते हों, क्योंकि आने वाले समय में कहातम हो जाएँ देशों के बीच सरहदें और दिलों के बीच की दूरी;

शुद्धता केवल देवताओं का उबाऊ विशेषाधिकार भर रह जाये, और हम अपनी गड़बड़ और गन्दी दुनिया में इस तरह गुजारें हर रात जैसे वह आखिरी रात हो और हर दिन जैसे पहला दिन…
—————-
1. प्लाजा द मेयो- अर्जेंनटीना में 1976 से 1983 के बीच सैनिक तानाशाही के अधीन सरकार का विरोध करने वाले क्रांतिकारी नौजवानो को गिरफ्तार करके यातना देने, हत्या करने और गायब कर देने की घटनाएं आम हो गयी थीं। उन नौजवानों की माताओं ने प्लाजा द मेयो नाम से संगठन बनाकर तानाशाही की इन क्रूरताओं का खुलकर विरोध किया था।)

(अनुवाद- दिगम्बर)

आत्मकथा






-नाजिम हिकमत
मेरा जन्म हुआ 1902 में
और जहाँ पैदा हुआ वहाँ एक मर्तबा भी वापस नहीं गया
मुझे पीछे लौटना पसंद नहीं
तीन साल का हुआ तो अलेप्पो में पाशा के पोते की खिदमत की
उन्नीस की उम्र में दाखिल हुआ मास्को कम्युनिस्ट विश्वविद्यालय में
उन्चास की उम्र में चेका पार्टी का मेहमान बन कर दुबारा मास्को गया
और चौदह साल की उम्र से ही शायर हूँ मैं
कुछ लोगों को पेड़-पौधों और कुछ को मछलियों के बारे में मालूम है सब कुछ
मुझे पता है जुदाई के बारे में
कुछ लोगों को जबानी याद हैं सितारों के नाम
मैं सुनाता हूँ अभाव के बारे में कविता
मैंने जेलखानों में और आलिशान होटलों में रातें गुजारीं
मैंने भूख और यहाँ तक कि भूख हड़ताल के बारे में भी जाना
मगर शायद ही कोई खाने की चीज हो
जिसका जायका न लिया हो
तीस की उम्र में वे मुझे फाँसी पर लटकाना चाहते थे
बयालीस की उम्र में वे देना चाहते थे शान्ति पुरस्कार
और दिया भी
छत्तीस की उम्र में चार वर्ग मीटर कंक्रीट तले आधा साल गुजारा
उनसठ साल कि उम्र में प्राग से भागा और हवाना पहुँचा अठारह घंटे में
लेनिन को कभी देखा नहीं मगर उनकी ताबूत के करीब था 1924 में
1961 में मैंने जिस समाधी का दौरा किया वह थी उनकी किताबें
उन्होंने मेरी पार्टी से काट कर अलग करने की कोशिश की
मगर कामयाब नहीं हुए
और न ही मैं कुचला जा सका ढहते हुए बुतों के नीचे
1951 में एक नौजवान दोस्त के साथ खतरनाक समुद्री यात्रा की
1952 में अपना टूटा हुआ दिल लिए चार महीने चित लेटा रहा
मौत का इंतजार करते हुए
मुझे रश्क था उस औरत से जिसे मैं प्यार करता था
चार्ली चैप्लिन से मैं बिलकुल नहीं जलता था
मैंने अपनी औरत को धोखा दिया
अपने दोस्तों के पीठ पीछे मैंने कभी बात नहीं की
पी मगर हर रोज नहीं
खुशी की बात यह कि मैंने अपनी रोटी ईमानदारी से हासिल की
झूठ बोला इस तरह कि किसी और को शर्मिंदा न होना पड़े
इस तरह झूठ बोला कि दूसरों को चोट न पहुँचे
लेकिन बेवजह भी झूठ बोला
मैंने रेलों, हवाईजहाजों और मोटरगाड़ियों में सफर किया
जो मयस्सर नहीं ज्यादातर लोगों को
मैं ओपेरा देखने गया
ज्यादातर लोग तो जानते भी नहीं ओपेरा के बारे में
और 1921 के बाद मैं वैसी जगह नहीं गया जहाँ ज्यादातर लोग जाते हैं
मस्जिदों चर्चों मंदिरों सिनागॉग जादूघरों में
मगर कहवा घरों में अड्डेबाजी जरुर की
मेरी रचनाएँ छप चुकी हैं तीस या चालीस भाषाओँ में
हमारे देश तुर्की में तुर्की भाषा में उन पर रोक है
मुझे कैंसर नहीं हुआ अभी तक 
और कोई वजह नहीं कि आगे भी हो
मैं प्रधान मंत्री या उसके जैसा कुछ भी नहीं बनूँगा कभी
और मैं नहीं चाहूँगा वैसी जिन्दगी जीना
अब तक शामिल नहीं हुआ किसी जंग में
या बमबारी से बचने के लिए रात के पिछले पहर किसी बिल में नहीं दुबका
और कभी भी गोते लगाते हवाई जहाजों को देख कर सड़क पर नहीं लेटा
मगर मुझे प्यार हो गया था लगभग सोलह की उम्र में  
मुख़्तसर बात ये दोस्तो
कि भले ही आज के दिन बर्लिन शहर में बडबडा रहा हूँ गमगीन
मगर ये कह सकता हूँ कि मैं इंसान की तरह जिया 
और किसे पता कि कब तक जिऊंगा
और मुझ पर क्या गुजरेगी.
(यह आत्मकथा 11 सितम्बर 1961 को बर्लिन में लिखी गयी थी. अंग्रेजी से अनुवाद- दिगम्बर)
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