Category Archives: साहित्य

मैं क्यों लिखता हूँ

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खुद को कुछ सनकी और तकलीफदेह अहसासों से बचाने के लिए.

जो ख़यालात और इलहाम मेरे दिमाग में उमड़ते-घुमड़ते हैं उनको तरतीब देने की कोशिश में ताकि उनको बेहतर ढंग से समझा जाय.

कोई ऐसी बात कहने के लिए जो कहने लायक हो.

लफ़्ज़ों के सिवा किसी भी दूसरी चीज का सहारा लिये बगैर कोई ऐसी चीज बनाने के लिए जो खूबसूरत और टिकाऊ हो.

क्योंकि इसमें मजा आता है.

क्योंकि सिर्फ यही काम है जिसे मैं कमोबेश बेहतर तरीके से करना जानता हूँ.

क्योंकि ये मुझे किसी नाकाबिले-बयान गुनाह से आजाद कर देता है.

क्योंकि इस काम का मैं आदी हो गया हूँ और क्योंकि मेरे लिए ये किसी बुराई से, किसी रोजमर्रे के काम से कहीं बेहतर है.

ताकि मेरी जिन्दगी का तजुर्बा, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो, कहीं खो न जाए.

क्योंकि अपने टाईपराइटर और सादा कागज़ के आगे  मेरे अकेले होने की हकीक़त मुझे पूरी तरह आजाद और ताकतवर होने का भरम देती है.

एक किताब की शक्ल में, एक आवाज़ की तरह जिसे कोई सुनने की जहमत मोल ले सके, मरने के बाद भी जिन्दगी को कायम रखने के लिए.

(रचनाकार– जूलियो रैमन रिबेरो, लातिन अमरीकी लेखक, 1929-94. अनुवाद– दिगम्बर)

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योद्धा और मक्खियाँ * –लू शुन

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जर्मन दार्शनिक शौपेनहावर ने कहा है कि मनुष्य की श्रेष्ठता को आँकने के मामले में, आत्मिक श्रेष्ठता और शरीर के आकार को निर्धारित करने वाले नियम एक दूसरे के विपरीत होते हैं. हमारे लिए इसका अभिप्राय यह है कि आदमी का शरीर जितना ही छोटा होगा, उतनी ही उसकी भावनाएँ श्रेष्ठ होंगी.

ऐसा इसलिए कि करीब से देखने पर जहाँ उसकी त्रुटियाँ और घाव साफ दिखाई देते हैं, कोई आदमी नायक नहीं दिखता, बल्कि वह हमारी ही तरह लगता है, भगवान या किसी नयी प्रजाति का अलौकिक प्राणी नहीं लगता. वह महज एक आदमी होता है. लेकिन निश्चय ही इसी में उसकी महानता होती है.

जब कोई योद्धा रणक्षेत्र में धराशायी हो जाता है, तो मक्खियों को जो चीज सबसे पहले नजर आती है, वह उसकी त्रुटियाँ और घाव ही होते हैं. वे उनको भिनभिनाते हुए चूसती हैं और यह सोच कर खुश होती हैं कि वे इस पराजित नायक से ज्यादा महान हैं. और चूँकि नायक मर चुका होता है और वह उन मक्खियों को उड़ा नहीं पाता, इसलिए मक्खियाँ और जोर-जोर से भिनभिनाती हैं और कल्पना करती हैं कि वे अमर संगीत का सृजन कर रही हैं, क्योंकि वे उस मृत नायक से अधिक पूर्ण और उत्तम हैं.

सही है कि मक्खियों की त्रुटियों और घावों पर कोई भी ध्यान नहीं देता.

हालाँकि अपनी तमाम त्रुटियों और घावों के बावजूद योद्धा तो योद्धा ही होता है, जबकी अत्यंत परिपूर्ण और उत्तम मक्खियाँ भी आखिरकार मक्खियाँ ही होती हैं.

भिनभिनाओ, मक्खियो! भले ही तुम्हारे पास पंख हों और भले ही तुम्हारे पास भिनभिन करने की क्षमता हो, लेकिन तुम जैसे कीड़े-मकोड़े किसी योद्धा के मुकाबिल नहीं हो सकते!

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* यहाँ योद्धा  डॉ. सुन यात-सेन और 1911 की क्रान्ति के शहीदों को कहा गया है, जबकि मक्खियाँ प्रतिक्रियावादियों के भाड़े के टट्टुओं को .

(अनुवादक– दिगम्बर)

आलोचकों से मैं क्या चाहता हूँ – लू-शुन

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दो या तीन साल पहले नियतकालीन पत्रिकाओं में साहित्य के रूप में थोड़ा-सा मौलिक लेखन (अगर हम ऐसा कह सकते हों तो) और अनुवाद को छोड़कर कुछ खास नहीं होता था. इसीलिए पाठकों ने आलोचकों की आवश्यकता को महसूस किया. अब आलोचक प्रकट हुए और दिनों-दिन इनकी संख्या बढ़ती ही जा रही है.

यह देखते हुए कि हमारा साहित्य इतना अपरिपक्व है, कला की लौ को तेज करने के लिए आलोचकों द्वारा इसकी अच्छाइयों का पता लगाना वास्तव में बहुत अच्छा है. वे आधुनिक रचनाओं के सतहीपन को लेकर इस उम्मीद के साथ अफ़सोस जाहिर करते हैं कि हमारे लेखक कही अधिक गहन-गम्भीर रचना करेंगे तथा वे खून और आँसू के जमाव पर खेद प्रकट करते हैं, ताकि ऐसा न हो कि आधुनिक लेखक बहुत ही ढिठाई के साथ विकास कर रहे हों. ऐसा लग सकता है कि वे अतिशयोक्तिपूर्ण अलोचना कर रहे हैं, लेकिन वास्तव में यह दिखाता है कि साहित्य को लेकर उनमें गहरा लगाव है और हमें उनके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए.

लेकिन कुछ दूसरे लोग भी हैं जो साहित्यिक आलोचना की एक या दो “पश्चिमी” किताबों पर ही भरोसा करते हैं और कुछ पुरानी पंडिताऊ रचनाओं का कूड़ा परोसते हैं या चीन की परम्परागत “सच्चाइयों” को अपनाने का आग्रह करते हैं और साहित्य जगत की कटु आलोचना करते हैं. ऐसे लोग एक आलोचक के रूप में अपने प्राधिकार का दुरूपयोग करते हैं. मैं एक अनगढ़ और सरल सा दृश्य प्रस्तुत करने की इजाजत चाहूँगा. अगर किसी रसोइये ने कोई व्यंजन तैयार किया है और कोई व्यक्ति उसमें कमी देखता है, तो निश्चय ही उसे अपनी कड़ाही और दूसरे बर्तन उस आलोचक के सामने रख कर यह नहीं कहना चाहिए कि “लीजिए, इससे बेहतर बना कर दिखाइये.” लेकिन उसे इतनी उम्मीद करने का अधिकार है कि जिस व्यक्ति ने उसके व्यंजन का स्वाद चखा है उसकी भूख मर तो नहीं गयी है या वह शराब के नशे में या बुखार से पीड़ित तो नहीं, जिसके चलते उसकी जीभ मोटी और छालेदार हो गयी हो.

मैं तो आलोचकों से इससे भी कम की माँग करता हूँ. मैं यह उम्मीद नहीं करता कि दूसरों की रचना की चीर-फाड़ करने और उस पर अपना फैसला सुनाने से पहले वे अपनी ही चीर-फाड़ करें और फैसला सुनाएँ, ताकि यह देख सकें कि वे किसी रूप में छिछला, संकीर्ण और गलत तो नहीं है. यह तो बहुत अधिक माँग करना होगा. मैं सिर्फ इतनी आशा करता हूँ कि वे थोड़ी सहज बुद्धि का प्रयोग करेंगे. उन्हें इन दो भिन्न चीजों में अन्तर करना चाहिए, जैसे – नग्नता और अश्लीलता के अध्ययन के बीच, चुम्बन और सहवास के बीच, लाश के पोस्टमार्टम और उसको चिथड़े-चिथड़े करने के बीच, पढ़ने के लिए विदेश जाने और “बर्बरों द्वारा निर्वासित किये जाने” के बीच, बाँस की कोंपल और बाँस के बीच, बिल्ली और चूहे के बीच, बाघ और कॉफी हाउस के बीच … . निश्चय ही एक आलोचक पूरी तरह आजाद है कि उसके तर्क इंग्लैण्ड और अमरीका के कुछ पुराने विशेषज्ञ पर निर्भर हों, लेकिन मुझे उम्मीद है कि वह भूलेगा नहीं कि दुनिया में और भी देश हैं. वह चाहे तो तोल्सतोय का तिरस्कार कर सकता है, लेकिन मुझे उम्मीद है कि ऐसा करने से पहले वह उनका अध्ययन करेगा, उनकी कुछ किताबें पढ़ेगा.

ऐसे भी आलोचक हैं जो अनुवादों की आलोचना करते हुए यह घोषित करते है कि यह श्रम की बर्बादी है और अनुवादकों को लेखन कार्य में हाथ आजमाना चाहिए. शायद यह अनुवादक को यह जताना है कि लेखक का पेशा कितना सम्मानपूर्ण है, लेकिन फिर भी वह अनुवाद कार्य में ही संलग्न है क्योंकि वह इसी में सक्षम है या यही काम उसे सबसे अधिक पसन्द है. इस तरह यदि कोई आलोचक ऐसे-वैसे प्रस्ताव देता है, तो वह अपने अधिकार-क्षेत्र का उल्लंघन करता है– क्योंकि इस तरह के सुझाव आलोचना नहीं, बल्कि सलाह हैं. रसोइये के साथ तुलना वाले प्रसंग की ओर लौटते हैं– कोई भी व्यक्ति जो व्यंजन चखता है उसे यह बताने की जरूरत है कि स्वाद के बारे में उसकी राय क्या है. इसकी जगह यदि वह रसोइये को इस बात के लिए फटकारता है कि वह दर्जी या राज मिस्त्री क्यों नहीं है, तो वह रसोइया चाहे जितना भी बेवकूफ हो, इतना जरूर कहेगा– “महाराज, आप पागल हैं क्या!”

(अनुवाद- दिगम्बर)

लेखन काल- 9 नवंबर, 1922

लू शुन की दो गद्य कविताएँ

(विश्व साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर लू शुन ने सृजानात्मक लेखन की तुलना में ज़नोन्मुख लेखकों की नयी पीढ़ी तैयार करने और सांस्कृतिक आन्दोलन खड़ा करने की ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी को अधिक महत्त्व दिया. पिछड़े हुए चीनी समाज के लिए यह ऐतिहासिक दायित्व स्वतंत्र लेखन से कहीं अधिक महत्व रखता था. इस कलम के सिपाही ने साहित्यिक लेख, व्यंग्य, लघु कथाएँ, कहानियाँ, समीक्षात्मक लेख और ऐतिहासिक उपन्यास के साथ-साथ गद्य कवितायेँ भी लिखीं. उनकी गद्य कविताओं का संकलन ‘वाइल्ड ग्रास’ नाम से प्रकाशित हुआ है. 1924 से 1926 के बीच लिखी गयी इन गद्य कविताओं साम्राज्यवाद और उत्तरी युद्ध सरदारों के खिलाफ प्रतिरोध और दमन की अभिव्यन्ज़ना सांकेतिक और अमूर्त शैली में की गयी है. इसका कारण शायद यह रहा हो कि उस समय साहित्य को कठोर सेंसर से गुज़ारना होता था.

इन गद्य कविताओं में ऊपर-ऊपर देखने पर निराशा और भयावहता की झलक मिल सकती है, लेकिन इन प्रतीकात्मक कविताओं के विविध रंग हैं. इनमें स्वप्न का सृज़न है जिनमें दु:स्वप्न भी शामिल हैं. यहाँ कुत्ते से वार्तालाप है, कीड़ों कि भिनभिनाहट है और इंसानों की नज़र से खुद को छिपाने की कोशिश करता आकाश है. समाज के ढोंग-पाखंड, निष्क्रियता, हताशा और ठहराव पर विक्षुब्ध टिप्पणी है जो मुखर नहीं है.

‘वाइल्ड ग्रास’ की भूमिका में लू शुन ने लिखा है- “धरती के भीतर तीव्र वेग से जो अग्नि-मंथन हो रहा है, उस का लावा जब सतह पर आएगा, तो वह सभी जंगली घासों और गहराई से धंसे विष-वृक्षों को जला कर खाक कर देगा, ताकि सडान्ध पैदा करनेवाली कोई चीज़ न रह जाय.”)

lu shun

भिखमँगे

मैं एक पुरानी-धुरानी, ऊँची दिवार के बगल से गुजर रहा हूँ, बारीक धूल में पैर घिसटते हुए. कई दूसरे लोग भी अकेले टहल रहे हैं. हवा का एक झोंका आया और दीवार के ऊपर से झांकते ऊँचे-ऊँचे पेड़ों की डालियाँ, जिनके पत्ते अभी झड़े नहीं हैं, मेरे सिर के ऊपर हिल रही हैं.
हवा का एक झोंका आया और हर जगह धूल ही धूल.
एक बच्चा मुझ से भीख माँग रहा हैं. वह दूसरे लोगों की तरह ही धारीदार कपड़े पहने हुए है और देखने से दुखी भी नहीं लगता , फिर भी वह रास्ता रोक कर मेरे आगे सिर झुकाता हैं और मेरे पीछे-पीछे चलता हुआ रिरियाता है.
मैं उसकी आवाज, उसके तौर-तरीके को नापसंद करता हूँ. उसमें उदासी का ना होना मेरे अन्दर घृणा पैदा करता है, जैसे यह कोई चाल हो. जिस तरह वह मेरा पीछा करते हुए रिरिया रहा है, उससे मेरे मन में जुगुप्सा पैदा हो रही है.
मैं चलता रहा. कई दूसरे लोग भी अकेले टहल रहे हैं. हवा का एक झोंका आया और हर जगह धूल ही धूल.
एक बच्चा मुझसे भीख माँग रहा है. वह दूसरे लोगों की तरह ही धारीदार कपडे पहने हुए है और देखने से दुखी नही लगता, लेकिन वह गूँगा है. वह गूँगे की तरह मेरी ओर हाथ फैलाता है.
मैं उसके गूँगेपन के इस दिखावे को नापसंद करता हूँ. हो सकता है कि वह गूँगा न हो, यह केवल भीख माँगने का उसका जरिया हो सकता है.
मैं उसे भीख नहीं देता. मुझे भीख देने की इचछा नहीं है. मैं भीख देने वालों से परे हूँ. उसके लिए मेरे मन में जुगुप्सा, संदेह और घृणा है.
मैं एक ढही हुई मिटटी की दीवार के बगल से गुजर रहा हूँ. बीच की जगह में टूटी हुई ईंटों की ढेर लगी है और दीवार के आगे कुछ नहीं है. हवा का एक झौंका आया आता है, मेरे धारीदार चोंगे के भीतर पतझड़ की सिहरन भर जाती है, और हर जगह धूल ही धूल है.
मुझे उत्सुकता होती है कि भीख माँगने के लिए मुझे क्या तरीका अपनाना चाहिए. मुझे कैसी आवाज में बोलना चाहिए? अगर मैं गूँगा होने का दिखावा करूँ तो मुझे गूँगापन कैसे प्रदर्शित करना चाहिए? ___
कई दूसरे लोग अकेले टहल रहे है .
मुझे भीख नहीं मिलेगी, भीख देने की इच्छा तक हासिल नहीं होगी. जो लोग खुद को भीख देने वालों से परे मानते हैं उनकी जुगुप्सा, संदेह और घृणा ही मिलेगी मुझे.
मैं निष्क्रियता और चुप्पी धारण किये भीख मागूँगा …
अंततः मुझे शून्यता हासिल होगी.
हवा का एक झोंका आता है और हर जगह धूल ही धूल. कई दूसरे लोग अकेले टहल रहे हैं.
धूल, धूल …
………………
धूल …

लेखन-काल 24 सितम्बर, 1924

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परछाईं का अवकाश ग्रहण

जब आप एक ऐसे समय तक सोते हैं जब आप को समय का अता-पता ही न चले, तब आपकी परछाईं इन शब्दों में अवकाश लेने आयेगी –
“कोई चीज है जिसके मैं स्वर्ग से नफरत करती हूँ, मैं वहाँ जाना नहीं चाहती. कोई चीज है जिसके चलते मैं नरक से नफरत करती हूँ, मैं वहाँ जाना नहीं चाहती. कोई चीज है आपके भविष्य की सुनहरी दुनिया में जिससे मैं नफरत करती हूँ, मैं वहाँ नहीं जाना चाहती.
“हालाँकि यह आप ही हो, जिससे मैं नफरत करती हूँ.”
“दोस्त, अब और तुम्हारा अनुसरण नहीं करूँगी, मैं रुकना नहीं चाहती.
“मैं नहीं चाहती!
“ओह, नहीं! मैं नहीं चाहती. इससे तो कहीं अच्छा है कि मैं शून्य में भटकूँ.
मैं तो केवल एक परछाईं हूँ. मैं तुम्हें त्याग दूँगी और अन्धेरे में डूब जाऊँगी. फिर वह अन्धेरा हमें निगल लेगा, और रोशनी भी मुझे गायब कर देगी.
“लेकिन मैं रोशनी और छाया के बीच भटकना नहीं चाहती, इससे तो कहीं अच्छा कि मैं अन्धेरे में डूब जाऊं.
“फिर भी अब तक मैं रोशनी और छाया के बीच ही मँडरा रही हूँ, अनिश्चय में कि अभी साँझ हुई या भोर. मैं तो बस अपने धूसर-भूरे हाथ उठा सकती हूँ जैसे शराब की एक प्याली खत्म करनी हो. जिस समय मुझे समय का अता-पता नहीं रह जाएगा, तब मैं दूर तक अकेली ही चली जाऊँगी.
“हाय! अगर अभी साँझ हुई है, तो काली रात मुझे पक्के तौर पर घेर लेगी या मैं दिन के उजाले में लुप्त कर दी जाऊँगी अगर अभी भोर हुई है.
“दोस्त, समय अभी हाथ में है.
“मैं शून्यता में भटकने के लिए अन्धेरे में प्रवेश करने जा रही हूँ .
“अभी भी आप हमसे कोई उपहार की उम्मीद रखते हैं. मेरे पास देने के लिए है ही क्या? अगर आप जिद करेंगे तो आपको वही अन्धेरा और शून्यता हासिल होगी. लेकिन मैं चाहूँगी कि केवल अन्धेरा ही मिले जो आपके दिन के उजाले में गायब हो सके. मैं चाहूँगी कि यह केवल शून्यता हो, जो आपके हृदय को कभी भी काबू में नहीं रखेगी.
“मैं यही चाहती हूँ, दोस्त –
“दूर, बहुत दूर, एक ऐसे अन्धेरे में जाना जिससे न केवल तुम्हें, बल्कि दूसरी परछाइयों को भी निकाल बाहर किया जाय. वहाँ सिर्फ मैं रहूँगी अन्धेरे में डूबी हुई. वह दुनिया पूरी तरह मेरी होगी.”

लेखन-काल 24 सित. 1924

(अनुवाद – दिगम्बर)

रसूल हमजातोव की कविता- सफ़ेद सारस

(रसूल हमजातोव द्वितीय विश्व युद्ध में मारे गए सैनिकों की समाधि का दर्शन करने हिरोशिमा (जापान) गए थे, जहाँ जापानी रिवाज के मुताबिक़ कागज़ के बने सफ़ेद सारस के झुण्ड को उस स्मारक के ऊपर उड़ते हुए दिखाया गया था. इस कविता में रसूल हमजातोव ने उसी बिम्ब का प्रयोग किया है. द्वितीय महायुद्ध में सोवियत संघ के दो करोड़ से भी अधिक नागरिक शहीद हुए थे, जिनकी याद में समर्पित है रसूल  की यह कविता.

मूलतः अवार भाषा में लिखित झुरावली शीर्षक कविता का अंग्रेजी अनुवाद बोरिस अनिसीमोव ने व्हाइट क्रेन शीर्षक  से किया है, जिसका हिंदी अनुवाद यहाँ प्रस्तुत है.)


सफेद सारस

कभी-कभी मुझे ऐसा लगता है
जैसे युद्ध क्षेत्र में मारे गए नौजवान सिपाही
जो लौट कर कभी घर नहीं आये
वे दफ्न नहीं हुए हैं धरती के नीचे,
जैसा  बताया गया हमें.
बर्फ जैसे सफ़ेद पंखों वाले सारस बन
उड़ चले वे असीम आकाश में  उन्मुक्त.

युद्ध के दिनों से आज तलक
दिखते हैं वे उड़ते, कलरव करते ऊँचे आकाश में
मुझे गमगीन कर देती है

दूर से आती उनकी आवाज 
और भीगी आँखों से निहारता हूँ
अपने बहादुर साथियों अपने पुरखों को.


आकाश में उड़ते सारसों का एक झुण्ड
ओझल होता जा रहा है आँखों से दूर बहुत दूर
इतनी दूर कि मेरी आँखें देख नहीं पाती उन्हें.


जब गुजर जाएँ मेरी जिंदगी के दिन

और खत्म हो जाये मेरा वजूद जिस दिन
मुझे उम्मीद है कि ये सारस अपनी पाँतों में
मेरे लिए भी बना लेंगे थोड़ी-सी जगह. 


तब मैं अपने दुःख और तकलीफ से 

ऊपर उठ, शामिल हो जाऊँगा उसी तरह
उनकी कतार में जैसे बरसों पहले.


मुक्ताकाश में उड़ान भरते 
अपनी नयी भाषा में  याद करूँगा नाम
उन बहादुरों के और उन लोगों के भी  जिन्हें
छोड़ जाऊँगा मैं इस धरती पर.



 (अनुवाद- दिगम्बर)

गरीब अब हमारे साथ नहीं हैं

-मार्ज पियर्सी  
अब कोई गरीब नहीं रहा
सुनो नेताओं का बयान.
हम देख रहे हैं उन्हें बिलाप करते
उस मध्यवर्ग के लिए
जो सिकुड़ रहा है.
गरीब इस तरह धकेले गए
गुमनामी के गर्त में
कि बयान करना मुमकिन नहीं.
बिलकुल वही बर्ताव
जो कभी कोढियों के साथ होता था,
जहाज में ठूंस कर भेजते थे काला पानी,
यादों से परे सड़ने को धीरे-धीरे.
अगर गरीबी रोग है तो इसके शिकार लोगों को
अलग रखो सबसे काट कर.
सामाजिक समस्या है तो उन्हें
कैद करो ऊँची दीवारों के पीछे.
मुमकिन है यह आनुवंशिक रोग हो-
अक्सर शिकार हो जाते हैं वे आसानी से
रोक-थाम होने लायक रोगों के.
खिलाओ उन्हें कूड़ा-कचरा कि वे मर जाएं
और तुमको खर्च न करना पड़े एक भी कौड़ी
उनके दिल के दौरे या लकवा के इलाज पर.
मुहय्या करो उन्हें सस्ती बंदूकें
कि वे क़त्ल करें एक-दूजे को
तुम्हारी निगाहों से एकदम ओझल.
झोपड़पट्टियाँ ऐसी ही खतरनाक जगहें हैं.
ऐसे स्कूल हो उनके लिए जो उन्हें सिखाए
कि वे कितने बेवकूफ हैं.
लेकिन हमेशा यह दिखावा करो
कि उनका वजूद ही नहीं है,
क्योंकि वे ज्यादा कुछ खरीदते नहीं,
ज्यादा खर्च नहीं करते,
नहीं देते तुमको घूस या चंदा.
उनकी बोदी बचत नहीं है विज्ञापनों का निशाना.
वे असली जनता नहीं है
बहुराष्ट्रीय निगमों की तरह. 

(मर्ज पियर्सी के अब तक अठारह कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं. यह कविता मंथली रिव्यू से साभार ले कर अनूदित और प्रस्तुत किया गया है. अनुवाद- दिगम्बर)

            

पौल रोबसन के लिए – नाजिम हिकमत

जुझारू गायक पौल रोबसन
क्रन्तिकारी तुर्की कवि नाजिम हिकमत









वे हमें अपना गीत नहीं गाने दे रहे, रोबसन,
उकाब जैसी उड़ान वाले मेरे गायक पाखी 
मोतिया मुस्कान बिखेरते मेरे अफ्रीकी भाई,
वे हमें अपना गीत नहीं गाने दे रहे हैं.

वे भयभीत हैं, रोबसन,
भोर की लालिमा से भयभीत,
भयभीत देखने, सुनने और छूने से-
नंगधडंग बच्चे को नहलाती बारिश के शोर से भयभीत,
जैसे कोई कच्ची नाशपाती में दाँत गडाये उस हँसी से भयभीत.
वे भयभीत हैं मोहब्बत करनेवालों से, मोहब्बत फरहाद की तरह.


(यकीनन तुम्हारे यहाँ भी कोई फरहाद हुआ होगा, रोबसन,
उसका नाम क्या है भला?)
वे बीज से भयभीत हैं, धरती से
और बहते पानी से
भयभीत किसी दोस्त के हाथ को याद करने से 
जो कोई छूट, कोई कमीशन, कोई ब्याज नहीं माँगता –
हाथ जो कभी छूटा नहीं 
जैसे कोमल हथेलियों में कोई चंचल चिड़िया.
वे उम्मीद से भयभीत हैं, रोबसन, उम्मीद से भयभीत, उम्मीद से!
उकाब जैसी उड़ान वाले मेरे गायक पाखी, वे भयभीत हैं,
वे हमारे गीतों से भयभीत हैं, रोबसन. 
अक्टूबर 1949
(अनुवाद – दिगंबर)

जब से मैं कैद हूँ – नाजिम हिकमत

जब से मैं कैद हूँ
दुनिया दस बार घूम चुकी है सूरज के इर्द-गिर्द
और तुम धरती से पूछो, वह कहेगी —
ये कोई दर्ज करनेवाली बात नहीं,
बहुत ही छोटा अरसा.
और तुम मुझसे पूछो, मैं कहूँगा
मेरी जिंदगी के दस साल.
मेरे पास एक पेन्सिल थी
जिस साल मैं कैदखाने में आया.
घिस गयी एक ही हफ्ते में वह लिखते-लिखते.
और अगर तुम पूछो उस पेन्सिल से, वो कहेगी
एक पूरी जिंदगी.
और मुझसे पूछो तो कहूँगा
कुछ नहीं, महज एक हफ्ता.
उस्मान को क़त्ल के जुर्म में कैद किया गया था
सात साल की सजा काट कर बाहर निकला वह
उस रोज जब मैं कैदखाने में आया.
कुछ दिन घूमता रहा वह बाहर
फिर तस्करी के जुर्म में गिरफ्तार हुआ.
छे महीने की सजा काट कर वह फिर बाहर निकला.
और कल ही एक खत मिला कि उसने शादी कर ली
और बहार के मौसम में जनमेगा उसका बच्चा.
अब दस साल के हैं
वे बच्चे जो अपनी माँ की कोख से जन्मे उस साल
जब मैं इस कैदखाने में आया था,
और उस साल जन्मे, दुबले पैरों पर लडखडाते बछेड़े
अब चौड़े पुट्ठे वाले घोड़ों में तब्दील हो चुके हैं.
मगर जैतून के पौधे आज भी पौधे ही हैं
और आज भी वे बच्चे ही हैं.
यहाँ से दूर हमारे शहर में खुल गए हैं नए चौक-बाजार
जब से मैं कैद हूँ.
और हमारा परिवार रहता है
उस घर में जिसे हमने कभी देखा नहीं
उस गली में जिसे मैं नहीं जानता.
रोटी बिलकुल सफ़ेद हुआ करती थी, कपास की तरह,
जिस साल मैं कैदखाने में आया.
बाद में राशन बंध गया,
और यहाँ, इस दीवार के भीतर हम एक-दूसरे को पीटते थे 
मुट्ठी भर काली पपड़ी के टुकड़े के लिए.
अब दुबारा इस पर पाबंदी नहीं
मगर भूरा और बेस्वाद.
नाजियों के दचाऊ कैंप का तंदूर अभी नहीं सुलगा था,
एटम बम अभी नहीं गिराया गया था हिरोशिमा पर.
किसी बच्चे की कटी गर्दन से बहते लहू की मानिंद 
गुजरता रहा वक्त.
फिर खत्म किया गया बजाप्ता वह दौर आगे चल कर
अमरीकी डालर अब बातें करते हैं तीसरे आलमी जंग की
लेकिन सब के बावजूद, रोशन हुए हैं दिन
जब से मैं कैदखाने में हूँ,
और उनमें से आधे दिन
अपना मजबूत हाथ रखते देते हैं पत्थर के फर्श
और अँधेरे के छोर पर
सीधे आकर.
जब से मैं कैदखाने में हूँ
दुनिया दस बार घूम चुकी है सूरज के इर्द-गिर्द
और एक बार फिर दुहराता हूँ मैं उसी जज्बे के साथ 
जीनके बारे में लिखा था मैंने
उस साल जब मैं कैदखाने में आया था
वे
जिनकी तादाद उतनी ही ज्यादा है
जितनी जमीन पर चींटियाँ
पानी में मछलियाँ
आसमान में परिंदे
वे खौफज़दा और बहादुर हैं 
जाहिल और जानकार हैं
और वे बच्चे हैं,
और वे ही
जो तबाह करना और बनाना जानते हैं
इन गीतों में उन्हीं के जोखिम भरे कारनामे हैं.
और बाकी सभी बातें,
मसलन, मेरा दस साल यहाँ पड़े रहना
कुछ भी नहीं.
अंग्रेजी से अनुवाद – दिगंबर  

नाजिम हिकमत की कविता — जीने के बारे में

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जीना कोई हंसी-मजाक नहीं,
तुम्हें पूरी संजीदगी से जीना चाहिए
मसलन, किसी गिलहरी की तरह
मेरा मतलब जिंदगी से परे और उससे ऊपर
किसी भी चीज की तलाश किये बगैर.
मतलब जिना तुम्हारा मुकम्मल कारोबार होना चाहिए.
जीना कोई मजाक नहीं,
इसे पूरी संजीदगी से लेना चाहिए,
इतना और इस हद तक
कि मसलन, तुम्हारे हाथ बंधे हों पीठ के पीछे
पीठ सटी हो दीवार से,
या फिर किसी लेबोरेटरी के अंदर
सफ़ेद कोट और हिफाज़ती चश्मे में ही,
तुम मर सकते हो लोगों के लिए
उन लोगों के लिए भी जिनसे कभी रूबरू नहीं हुए,
हालांकि तुम्हे पता है जिंदगी 
सबसे असली, सबसे खूबसूरत शै है.
मतलब, तुम्हें जिंदगी को इतनी ही संजीदगी से लेना है
कि मिसाल के लिए, सत्तर की उम्र में भी
तुम रोपो जैतून के पेड़
और वह भी महज अपने बच्चों की खातिर नहीं,
बल्कि इसलिए कि भले ही तुम डरते हो मौत से
मगर यकीन नहीं करते उस पर,
क्योंकि जिन्दा रहना, मेरे ख्याल से, मौत से कहीं भारी है.
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मान लो कि तुम बहुत ही बीमार हो, तुम्हें सर्जरी की जरूरत है
कहने का मतलब उस सफ़ेद टेबुल से
शायद उठ भी न पाओ.
हालाँकि ये मुमकिन नहीं कि हम दुखी न हों
थोड़ा पहले गुजर जाने को लेकर,
फिर भी हम लतीफे सुन कर हँसेंगे,
खिड़की से झांक कर बारीश का नजारा लेंगे
या बेचैनी से
ताज़ा समाचारों का इंतज़ार करेंगे….
फर्ज करो हम किसी मोर्चे पर हैं
रख लो, किसी अहम चीज की खातिर.
उसी वक्त वहाँ पहला भारी हमला हो,
मुमकिन है हम औंधे मुंह गिरें, मौत के मुंह में.
अजीब गुस्से के साथ, हम जानेंगे इसके बारे में,
लेकिन फिर भी हम फिक्रमंद होंगे मौत को लेकर
जंग के नतीजों को लेकर, जो सालों चलता रहेगा.
फर्ज करो हम कैदखाने में हों
और वाह भी तक़रीबन पचास की उम्र में,
और रख लो, लोहे के दरवाजे खुलने में
अभी अठारह साल और बाकी हों.
फिर भी हम जियेंगे बाहरी दुनिया के साथ,
वहाँ के लोगों और जानवरों, जद्दोजहद और हवा के बीच
मतलब दीवारों से परे बाहर की दुनिया में,
मतलब, हम जहाँ और जिस हाल में हों,
हमें इस तरह जीना चाहिए जैसे हम कभी मरेंगे ही नहीं.
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यह धरती ठंडी हो जायेगी,
तारों के बीच एक तारा
और सबसे छोटे तारों में से एक,
नीले मखमल पर टंका सुनहरा बूटा
मेरा मतलब है, यह गजब की धरती हमारी.
यह धरती ठंडी हो जायेगी एक दिन,
बर्फ की एक सिल्ली के मानिंद नहीं
या किसी मरे हुए बादल की तरह भी नहीं
बल्कि एक खोंखले अखरोट की तरह चारों ओर लुढकेगी
गहरे काले आकाश में…
इस बात के लिये इसी वक्त मातम करना चाहिए तुम्हें
–इस दुःख को इसी वक्त महसूस करना होगा तुम्हें
क्योंकि दुनिया को इस हद तक प्यार करना जरुरी है
अगर तुम कहने जा रहे हो कि मैंने जिंदगी जी है
अंगरेजी से अनुवाद –दिगंबर 

दीवाली के दीप जले– फिराक गोरखपूरी



नई हुई फिर रस्म पुरानी दीवाली के दीप जले
शाम सुहानी रात सुहानी दीवाली के दीप जले
धरती का रस डोल रहा है दूर-दूर तक खेतों के
लहराये वो आंचल धानी दीवाली के दीप जले
नर्म लबों ने ज़बानें खोलीं फिर दुनिया से कहन को
बेवतनों की राम कहानी दीवाली के दीप जले
लाखों-लाखों दीपशिखाएं देती हैं चुपचाप आवाज़ें
लाख फ़साने एक कहानी दीवाली के दीप जले
निर्धन घरवालियां करेंगी आज लक्ष्मी की पूजा
यह उत्सव बेवा की कहानी दीवाली के दीप जले
लाखों आंसू में डूबा हुआ खुशहाली का त्योहार
कह ता है दुःखभरी कहानी दीवाली के दीप जले
कितनी मंहगी हैं सब चीज़ें कितने सस्ते हैं आंसू
उफ़ ये गरानी ये अरजानी दीवाली के दीप जले
मेरे अंधेरे सूने दिल का ऐसे में कुछ हाल न पूछो
आज सखी दुनिया दीवानी दीवाली के दीप जले
तुझे खबर है आज रात को नूर की लरज़ा मौजों में
चोट उभर आई है पुरानी दीवाली के दीप जले
जलते चराग़ों में सज उठती भूके-नंगे भारत की
ये दुनिया जानी-पहचानी दीवाली के दीप जले
भारत की किस्मत सोती है झिलमिल-झिलमिल आंसुओं की
नील गगन ने चादर तानी दीवाली के दीप जले
देख रही हूं सीने में मैं दाग़े जिगर के चिराग लिये
रात की इस गंगा की रवानी दीवाली के दीप जले
जलते दीप रात के दिल में घाव लगाते जाते हैं
शब का चेहरा है नूरानी दीवाले के दीप जले
जुग-जुग से इस दुःखी देश में बन जाता है हर त्योहार
रंजोख़ुशी की खींचा-तानी दीवाली के दीप जले
रात गये जब इक-इक करके जलते दीये दम तोड़ेंगे
चमकेगी तेरे ग़म की निशानी दीवाली के दीप जले
जलते दीयों ने मचा रखा है आज की रात ऐसा अंधेर
चमक उठी दिल की वीरानी दीवाली के दीप जले
कितनी उमंगों का सीने में वक़्त ने पत्ता काट दिया
हाय ज़माने हाय जवानी दीवाली के दीप जले
लाखों चराग़ों से सुनकर भी आह ये रात अमावस की
तूने पराई पीर न जानी दीवाली के दीप जले
लाखों नयन-दीप जलते हैं तेरे मनाने को इस रात
ऐ किस्मत की रूठी रानी दीवाली के दीफ जले
ख़ुशहाली है शर्ते ज़िंदगी फिर क्यों दुनिया कहती है
धन-दौलत है आनी-जानी दीवाली के दीप जले
बरस-बरस के दिन भी कोई अशुभ बात करता है सखी
आंखों ने मेरी एक न मानी दीवाली के दीप जले
छेड़ के साज़े निशाते चिराग़ां आज फ़िराक़ सुनाता है
ग़म की कथा ख़ुशी की ज़बानी दीवाली के दीप जले

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