Category Archives: साम्राज्यवाद

जिनके पास कम है, वे कम खाएँ (अमरीकी शासकों के प्रति) –मार्ज पियर्सी

Marge+Piercy

ग़रीबों से नफरत, क्या ये गुनाह

बासी हो गया? कि इतना धन है

फिर भी  साजिश रचते हैं दौलतमन्द

एक बच्चे की दवा, एक औरत की जिंदगी,

एक आदमी का दिल और गुर्दा हड़पने के लिए.

जब सांसद उस जनता की बात करते हैं

जो हिसाब बैठाती है गैस और रोटी का

कि ठण्ड और भूख में किसे तरजीह दें

वे गुर्राते हैं. हमारी ये हिम्मत की जिन्दा रहें?

अगर वे बमबारी कर पाते, अगर वे

ग़रीबों के खिलाफ लड़ाई छेड़ पाते

दूसरे देशों की तरह यहाँ, अपने देश में,

क़ानून बनाकर नहीं बल्कि खुलेआम

हथियारों से, तो क्या वे झिझकते?

उनके भीतर सुलगता सच्चा गुस्सा

फूटता है उन कटौतियों में, जो जरूरी हैं

लोगों को जिन्दा रखने के लिए.

जिन लोगों के पास बहुत कम है

उनको सजा देते हैं, और ज्यादा कमी करके-

हमें कुचलनेवाला एक विराट कानूनी बुलडोजर.

(अनुवाद — दिगम्बर)

अमरीका के अश्वेत और भूरे निम्न वर्ग के खिलाफ युद्ध का विरोध– अब हम और इंतजार नहीं कर सकते

Demonstrators stand in the middle of West Florissant as they react to tear gas fired by police during ongoing protests in reaction to the shooting of Brown, in Ferguson–रॉबिन डी.जी. केली

इंतजार करो। धैर्य रखो। शान्त रहो। अमरीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति ने कहा–– “यह एक ऐसा देश है जो सभी को अपने विचार व्यक्त करने की छूट देता है, उन्हें उन कार्रवाईयों के खिलाफ विरोध प्रकट करने के लिए शान्तिपूर्वक प्रदर्शन की इजाजत देता है जिन्हें वे अन्यायपूर्ण समझते हैं।” गडबड़ी मत फैलाओ, अपनी बात रखो । न्याय किया जायेगा। हम कानून की इज्जत करते हैं। यह अमरीका है।

हम सभी ग्रांड जूरी (उच्च न्यायालय) के फैसले का इंतजार कर रहे थे, इसलिए नहीं कि हममें से अधिकांश लोग अभियोग सिद्ध होने की उम्मीद रखते थे। जिला अटार्नी रॉबर्ट पी. मेककुलोच का लच्छेदार वक्तव्य यह समझाते हुए (या उसका बचाव करते हुए) कि कैसे ग्रांड जूरी अपने निर्णय पर पहुँची, एक विजयी भाषण जैसा था। ग्रांड जूरी के लिए यहाँ तक कि अनजाने में हत्या का मामूली सा आरोप भी न तलाश पाना एक आश्चर्यजनक उपलब्धि थी, तब जबकि पुलिस गोलीबारी में एक निहत्था किशोर कई गज दूर हाथ उठाये खड़ा था। बीस मिनट से भी कम समय में 4799 पेज की कार्यवाही का निचोड़ निकालते हुए, ग्रांड जूरी ने चश्मदीद गवाहों की सत्यता पर ही सवाल खड़े कर दिये, चैबीस–घंटे चलनेवाले समाचारों और सोशल मीडिया पर जाँच–पड़ताल को बाधित करने का इल्जाम लगाया और आस–पड़ोस में होनेवाली कथित हिंसा को इस बात के लिए जिम्मेदार ठहराया कि क्यों माइक ब्राउन की लाश को फुटपाथ से उठाने के लिए सुबह तक का इतंजार करना पड़ा। जब मेककुलोच ने अपने जीवन में कभी किसी पुलिसकर्मी को दोषी नहीं ठहराया, तो अब हम उससे कुछ अलग करने कि उम्मीद भला क्यों करते?

कुछ लोग एक चमत्कार की उम्मीद कर रहे थेय ज्यादातर लोग इसलिए इंतजार कर रहे थे कि एक संकट उमड़–घुमड़ रहा था। सेंट लुईस और आसपास के इलाकों में, और मिसौरी राज्य में भी, गोरे लोगों ने इस प्रतीक्षा काल का इंतजार युद्ध की तैयारी के लिए किया। निवासियों ने और ज्यादा बन्दूकें और गोलाबारूद खरीदा, दुकानों की खिड़कियों को बचाने के लिए प्लाइवुड का जखीरा इकठ्ठा किया, अलार्म सिस्टम लगवाये और खिड़कियों पर पट्टियाँ लगायीं, खाने–पीने का सामान इकट्ठा किया। गवर्नर जे. निक्सन ने आपातकाल की घोषणा कर दी, राज्य–भर से नेशनल गार्ड सुरक्षाबलों को बुला लिया और साथ ही दंगा नियंत्रण और जवाबी कार्रवाई के लिए राज्य की नागरिक सेना को ट्रेनिंग दी गयी। संघीय सरकार ने एफबीआई एजेंटों को भेज दिया, अनुमान है कि उनमें से कुछ गुप्त रूप से विरोध आन्दोलनों में काम कर रहे थे। जब मैं यह लेख लिख रहा हूँ तब प्रदर्शनकारियों और खासकर अश्वेत–समुदाय के खिलाफ सभी ताकतों को तैनात कर दिया गया है और गवर्नर ने और ज्यादा नेशनल गार्डों की टुकडियाँ भेजने का अनुरोध किया है।

इसी बीच, जब हम ग्रांड जूरी के निर्णय का इंतजार कर रहे थे तो क्लीवलैंड में एक 12 साल के अश्वेत लड़के तामीर राइस को गोली मारी गयी क्योंकि एक अधिकारी ने गलती से उसकी खिलौना बन्दूक को असली समझ लिया था । तामीर क्लीवलैंड के कडेल रिक्रियेसन सेंटर के बाहर खेल रहा था, जो उन कुछ सार्वजनिक जगहों में से एक थी जो बच्चों के लिए सुरक्षित जगहें हैं।

जब हम इंतजार कर रहे थे, तभी क्लीवलैंड के पुलिसकर्मियों ने एक 37 साल की अश्वेत औरत तनिषा एण्डरसन की जान ले ली जो मानसिक विकार (बाईपोलर डिसओर्डर) से पीड़ित थी। जब उसके घरवालों ने एक मुश्किल हालात में मदद के लिए 911 नम्बर पर फोन किया, तो पुलिस उसके घर पहुँची, लेकिन उसके साथ हमदर्दी का व्यवहार करने के बजाय उन्होंने वही किया जिसकी उन्हें प्रतिक्षण दिया गया था, यानी एक अश्वेत मुहल्ले में अश्वेत लोगों का सामना कैसे करना चाहिए। उन्होंने उसके साथ एक दुश्मन लड़ाके की तरह बरताव किया। जब वह उत्तेजित हो गयी तो एक अफसर ने उसे जबरन जमीन पर गिरा दिया और हथकड़ी पहना दी जबकि दूसरे अफसर ने उसके चेहरे को जमीन से सटा दिया और अपने घुटनों से उसकी पीठ दबाकर उसे 6 से 7 मिनट तक दबाए रखा, जब तक उसका शरीर शिथिल नहीं पड़ गया। उसने साँस लेना बन्द कर दिया। उन्होंने साँस चालू करने की कृत्रिम विधि से उसकी साँस चालू करने का कोई प्रयास नहीं किया। परिवारवालों और गवाहों को बताया कि वह सो रही है । आखिरकार 20 मिनट बाद जब एम्बुलेंस वहाँ पहुँची तो वह मर चुकी थी।

जब हम इंतजार कर रहे थे, तभी एन हार्बर, मिशिगन में पुलिस ने चालीस साल की एक अश्वेत औरत अयुरा रेन रोसर की हत्या कर दी। खबरों के अनुसार जब पुलिसकर्मी एक घरेलू हिंसा की शिकायत पर वहाँ पहुँचे तो वह हाथ में सब्जी काटनेवाला एक चाकू घुमा रही थी, हालाँकि उसके जिस पुरुष मित्र ने इस घटना की सूचना दी थी, उसने इस बात पर जोर दिया कि उससे पुलिसकर्मियों कोई खतरा नहीं है। इस बात से उनपर कोई फर्क नहीं पड़ा, उन्होंने गोली चला दी।

जब हम इंतजार कर रहे थे, तभी शिकागो के पुलिस अधिकारी ने 19 साल के रोशाद मेकिनटोश को गोलियों से गम्भीर रूप से घायल कर दिया। अधिकारी के दावों के बावजूद, कई चश्मदीद गवाहों ने बयान दिया कि मेकिनटोश निहत्था था, अपने हाथ ऊपर करके घुटनों के बल बैठा था और वह उस अधिकारी से गोली न चलाने की प्रार्थना कर रहा था।

जब हम इंतजार कर रहे थे, तभी साराटोगा स्प्रिंग्स, उटाह में पुलिस ने एक 22 साल के अश्वेत नौजवान डेरन हंट के शरीर में छह गोलियाँ उतार दीं, जो एक निंजा लड़ाके की तरह के कपड़े पहने हुए था और एक नकली समुराई तलवार लिये हुए था। इसी बीच विक्टरविले, कैलीफोर्निया में पुलिस ने 36 साल के एक अश्वेत आदमी और पाँच बच्चों के पिता दांते पार्कर को मार दिया। उसे एक चोरी के सन्देह में रोका गया, जब वह अपनी मोटरसाइकल पर जा रहा था । जब उसने “सहयोग करना” बन्द कर दिया तो अधिकारियों ने उसे काबू में करने के लिए बार–बार उस पर टेसर (बिजली के झटके देनेवाला एक हथियार) का इस्तेमाल किया। उन जख्मों की वजह से वह मर गया।

जब हम इंतजार कर रहे थे, तभी अठाईस साल के एक अश्वेत अकाई गरली का भी यही हाल हुआ जब वह ईस्ट न्यूयॉर्क, बु्रकलीन में लुईस एच. पिंक हाउसेस में सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था। पुलिस उस आवासीय परियोजना में टोह लेने की एक ठेठ मुहीम पर गयी थी । ऑफिसर पीटर लिआंग एक हाथ में बन्दूक और दूसरे हाथ में टार्च लेकर अँधेरी सीढ़ियों की तरफ बढ़ा। वह अपने सामने आनेवाले खतरे से निपटने के लिए मुस्तैद था। उदार मेयर बिल डीब्लासियो और पुलिस चीफ बिल ब्रांटन के अनुसार, गरली की मौत एक आनुसांगिक क्षति है। भरपूर क्षमा याचनाएँ की गयीं। गरली अपने पीछे एक दो साल की बेटी छोड़ गया।

जब हम इंतजार कर रहे थे, तभी एलऐपीडी (लॉस एंजेल्स पुलिस डिपार्टमेंट) अधिकारियों ने 25 साल के, एक मानसिक रूप से बीमार अश्वेत, इजेल फोर्ड को उसके अपने पड़ोस के दक्षिण लॉस एंजेल्स में रोका और गोली मार दी। एलऐपीडी ने लॉस एंजेल्स में रहनेवाले 37 साल के पिता ओमर अब्रेगो को रोका, और उसे पीट–पीटकर मार डाला।

जब हम इंतजार कर रहे थे और लगातार इंतजार कर रहे थे, तभी डैरेन विल्सन (माइक ब्राउन का हत्यारोपी पुलिसकर्मी) ने शादी कर ली, वह प्रशासनिक छुट्टी पर रहते हुए अपनी तनख्वाह भी लेता रहा और उसने अपने “बचाव” के नाम पर 4 लाख डॉलर से ज्यादा का चंदा भी हासिल कर लिया।

आप देख सकते हैं कि हम दर्जनों, सैकड़ों, हजारों अभियोगों और फैसलों का इंतजार कर रहे हैं। हर मौत कष्ट देती है। हर दोषमुक्त पुलिसकर्मी, सुरक्षाकर्मी और निगरानीकर्मी मन में आक्रोश पैदा करता है। ग्रांड जूरी के निर्णय ने ज्यादातर अश्वेतों को हैरान नहीं किया क्योंकि हम सजा सुनाये जाने का इंतजार नहीं कर रहे थे। हम न्याय का इंतजार कर रहे थे या ज्यादा सटीक तरीके से कहें, तो न्याय के लिए संघर्ष कर रहे थे। हम सभी नामों को जानते हैं और जानते हैं कि वे कैसे मरे। एरिक गार्नर, काजेमे पावेल, वोनडेरिट डी. मेयर्स जूनियर, जॉन क्राफोर्ड तृतीय, कैरी बाल जूनियर, माइक ब्राउन……..नामों की सूची अन्तहीन है। वे निहत्थे थे और उन्हें ऐसे हालात में गोली मार दी गयी जहाँ जानलेवा हमला जरूरी नहीं था। हम बार–बार आनेवाले दुस्वप्न की तरह उनके नामों को उठाये फिरते हैं, मुर्दों को घिनौने बेसबाल कार्डों की तरह एकत्रित करते हैं। कुछ नहीं भूलते। सिर्फ मुर्दा शरीरों का ढेर है जो हमारी पलक झपकते ही बढ़ जाता है। पिछली तीन पीढ़ियों के लिए, एलेनोर बम्पर्स, माइकल स्टीवर्ट, इयुला लव, अमादु डियालो, ऑस्कर ग्रांट, पेट्रिक डोरिसमंड, मेलिस ग्रीन, टाईशा मिलर, सीन बेल, आईअना स्टेनली–जोंस, मार्गरेट लावर्ने मिशेल इत्यादि, उनमें से कुछ नाम हैं जो नस्ली पुलिस हिंसा के प्रतीक हैं। और मैं सिर्फ मरे हुए लोगों की बात कर रहा हूँ उनकी नहीं जिन्हें परेशान किया गया, पीटा गया, अपमानित किया गया, रोककर जिनकी तलाशी ली गयी और जिनके साथ बलात्कार किया गया।

इसी बीच गवर्नर जे निक्सन, राष्ट्रपति ओबामा, अटार्नी जनरल एरिक होल्डर, मुख्यधारा की प्रेस और राज्य से पुरस्कृत हर अफ्रिकी–अमरीकी नेता अश्वेतों को शान्त रहने और अहिंसक बने रहने का उपदेश देते हैं, जबकि हिंसा का मुख्य कारण पुलिस है। माइक ब्राउन के कत्ल ने लोगों को सड़क पर ला दिया, जहाँ उनका सामना आँसू गैस और रबड़ की गोलियों से हुआ। एक ऐसी दुनिया में राष्ट्र द्वारा की जानेवाली हिंसा हमेशा ही अदृश्य बनी रहती है जहाँ पुलिस और सैनिक हीरो होते हैं और वे जो कुछ भी जो करते हैं उसे हमेशा ही “सुरक्षा,” संरक्षण और आत्मरक्षा के तौर पर दिखाया जाता है। पुलिस बेकाबू (अश्वेत) अपराधियों से नागरिकों की रक्षा करने और उनकी सेवा करने के लिए सड़कों पर उतरती है। इसलिए, हर बार पर पीड़ित को आक्रमणकारी दर्शाने का प्रयास किया जाता है। ट्रेवन मार्टिन ने फुटपाथ को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया और माइक ब्राउन ने अपने भारीभरकम शरीर को। एक अश्वेत आदमी के द्वारा आगे की तरफ लपकने या घूरने को एक आसन्न धमकी समझा जा सकता है। जब 9 अगस्त को माइक ब्राउन के कत्ल के बाद फर्गुसन के उपनगर भड़क उठे तब मीडिया और मुख्यधारा के नेता लूटपाट रोकने और “शान्ति” बनाये रखने के लिए ज्यादा चिंतित थे, बजाय इस तथ्य पर ध्यान दिये कि डैरेन विल्सन अपना वेतन प्राप्त करते हुए छुट्टी पर आजाद था। या इस बात के लिए कि खून से सने, मौत की वजह से अकड़ते, गोलियों से बिंधे, माइक ब्राउन के प्राणहीन शरीर का साढ़े चार घंटे तक पड़े रहना चैथे जेनेवा संधिपत्र का उल्लंघन किये जाने के कारण एक युद्ध अपराध है। आखिर यह एक सामुहिक सजा की कार्यवाही थी–– एक उत्पीड़ित लाश के सार्वजनिक प्रदर्शन का मकसद एक पूरे समुदाय को आतंकित करना था, हर किसी को अधीन करके दंडित करना था, बाकी लोगों को उनका अंजाम याद दिलाना था, अगर वे ठीक से व्यवहार नहीं करते हैं। हम इसे “गैरकानूनी ढंग से सजा देना” कहा करते थे।

युद्ध ? हाँ, युद्ध। माइक ब्राउन के कत्ल के बाद पुलिस के खिलाफ तत्कालीन और अनवरत संघर्ष राज्य और अश्वेतों के बीच के एक कम तीव्रता के युद्ध को प्रकट करता है, और ग्रांड जूरी के निर्णय के पश्चात प्रदर्शनकारियों पर किये गये असंगत बल प्रयोग ने संघर्ष को और भड़का दिया। पूरी दुनिया को फर्गुसन एक युद्ध क्षेत्र जैसा दिखाई दिया क्योंकि पुलिस अपने हेलमेटों, सुरक्षा जैकेटों, निजी हथियारों और एम–16 राइफलों के साथ सेना जैसी लगी। लेकिन फर्गुसन और सेंट लुइस में, और देश–भर की गरीब बस्तियों में, रहनेवाले अफ्रीकी–अमरीकी नागरिकों को यह जानने के लिए आँसू गैस या चेहरे छुपाकर दंगा पुलिसकर्मियों को सहन करने की जरूरत नहीं थी क्योंकि वे पहले से ही एक युद्ध क्षेत्र में रह रहे हैं पुलिस के प्रति माइक ब्राउन और डोरियन जोहनसन की शुरूआती घबराहट की वजह यही थी।

इस इलाके में अतीत और वर्तमान की पुलिस हिंसा ही ब्राउन और जोहनसन के विल्सन से डरने की असली वजह है। अभियोग पक्ष ने हत्या की इस वारदात को एक अठारह साल के भौचक्के और क्रोधित लड़के से खुद को बचने के लिए “एक कानूनी अधिकारी द्वारा हमले से पहले” अपनी आत्मरक्षा की कार्रवाई के रूप में, एक तर्कसंगत मामला बना कर पेश किया। विल्सन को अपनी जान का डर था, सिर्फ इतनी–सी बात उसके द्वारा किये गये जानलेवा हमले को जायज ठहराने के लिए काफी था। लेकिन वह तीन महीने लम्बे चलनेवाले विचार–विमर्श के अन्त में ग्रांड जूरी को दिये जानेवाले निर्देश थे, जिन पर हमें ध्यान देने की जरूरत है। जूरी के सदस्यों से यह कहने के बाद कि वे विल्सन की कार्रवाई को पुलिस द्वारा जानलेवा हमले पर मिसौरी अधिनियम के अनुसार फैसला करें, सहायक जिला प्रोसिक्यूटर, शीला विरली और काठी अलीजदेह ने अचानक घोषणा की कि “रिसर्च करने” पर उन्होंने पाया कि अमरीकी उच्चतम न्यायालय ने अधिनियम को हटा दिया है। निर्णय और पुराने अधिनियम के स्थान पर, विरली ने इस बात का वर्णन लिखा कि जब एक अधिकारी गिरफ्तारी करने के लिए बलप्रयोग करता है तो उस पर यह कानून कैसे लागू होता है। जब ग्रांड जूरी के एक सदस्य ने स्पष्टीकरण के लिए सवाल पूछने शुरू किये तो विरली ने समझाया कि पुराना कानून “पूरी तरह गलत या त्रुटीपूर्ण नहीं है, लेकिन कुछ ऐसा है जो ठीक नहीं है, इसलिए उसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दें।” उसके बाद उसने संकेत दिया कि हम अमरीकी उच्चतम न्यायालय के टेनेसी बनाम गार्नर (1985) निर्णय पर निर्भर रहेंगे, “ऐसा नहीं है कि यह आपके लिए बहुत ज्यादा महत्त्वपूर्ण है ।…… हम कानून की क्लास शुरू नहीं करना चाहते ।” उसके बाद उसने आत्मरक्षा निर्देश पर ध्यान दिलाना शुरू कर दिया।

लेकिन निर्णय पर जल्दी से एक नजर डाल लेने से स्पष्ट हो जाता है कि इस आदेश का उद्देश्य जानलेवा हमले के इस्तेमाल को सीमित करना था, यह तर्क देते हुए कि एक भागते हुए संदिग्ध व्यक्ति को मारना एक अनुचित “हमला” है जो सम्भवत: जीने से वंचित करने के खिलाफ बने चैथे संशोधन का उल्लंघन है। अगर एक संदिग्ध व्यक्ति हथियारबन्द और खतरनाक नहीं है तो उस पर जानलेवा हमला करना न्यायसंगत नहीं है और इसलिए उसके जीवन पर हमला तर्कसंगत नहीं है।

चाहे इसे हम नशीली दवाओं के खिलाफ युद्ध कहें, या “ऑपरेशन घेटो स्टोर्म” कहें या माल्कॉम एक्स के शब्दों में ग्रासरूट मूवमेंट कहें, हम जिस चीज का सामना कर रहे हैं वह राज्य और उसके निजी सहयोगियों के द्वारा खासकर गरीबों और अधिकारहीन अश्वेत और भूरे मजदूर वर्ग के खिलाफ चलाये जा रहे स्थायी युद्ध से किसी भी तरह कम नहीं है। पाँच सदियों के दौरान, यह गुलामी और साम्राज्यवाद से लेकर विराट व्यवस्थागत अपराधीकरण तक फैला हुआ है। हम अपने बच्चों पर इसका प्रभाव देखते हैं, और कानून में इसका प्रभाव देखते हैं, जिसके तहत आसानी से किशोरों पर व्यस्कों की तरह अभियोग चलाये जाते हैंय जीरो टोलरेंस नीतियों की बाढ़ में इसका प्रभाव देखते हैं (जो एक बार फिर नशीली दवाओं के खिलाफ युद्ध का सह–उत्पाद है)य इस चैंका देनेवाले तथ्य में देखते हैं कि हिंसक अपराधों में उल्लेखनीय कमी के बावजूद निष्कासन और निलम्बन में कई गुणा बढ़ोत्तरी हुई है। अपराध, नैतिक घबड़ाहट, नवउदारवादी नीतियाँ और नस्लवाद मानवीय प्रबन्धन पर आधारित जेल में कैद करने, निगरानी, रोकथाम, दमन, जानलेवा कब्जे और भारी गलतबयानी की खर्चीली व्यवस्था की आग में पेट्रोल डालने का काम करते हैं।

फर्गुसन के अश्वेत समुदाय और उसके आसपास के समुदाय नियमित रूप से अन्य दूसरी चीजों के अतिरिक्त पुलिस द्वारा रोके जाने में, ध्वनि अध्यादेश के उल्लंघन (जैसे कि तेज आवाज में संगीत सुनना) के लिए, सेंट लुईस रेलों में चलती रेल में चढ़ने, घास न कटी होने या घर गन्दा होने पर, अनाधिकार प्रवेश पर, “झोलदार पैंट” पहनने पर, ड्राइविंग लाइसेंस या पंजीकरण समाप्त हो जाने पर, “शान्ति भंग करने” पर लगाये गये जुर्माने में हर दिन इस युद्ध का अनुभव करते हैं। यदि ये जुर्माने अदा नहीं किये जाते तो इससे जेल जाना पड़ सकता है, अपनी कार या सम्पत्ति को गँवाना पड़ सकता है, या सामाजिक सेवा के लिए अपने बच्चों को खोना पड़ सकता है। अपराधिक न्याय व्यवस्था गरीब और मजदूर अश्वेतों से सजा और शुल्क के माध्यम से एक तरह का नस्ली कर वसूलती है। 2013 में, फर्गुसन के नगरपालिका न्यायालय ने 21,000 से कुछ ही ज्यादा लोगों को लगभग 33,000 गिरफ्तारी वांरट जारी किये, जिससे नगरपालिका को लगभग 26 लाख डॉलर प्राप्त हुए। इसी साल, फर्गुसन में तलाशी के 92 प्रतिशत और यातायात उल्लंघन रोकने के 86 प्रतिशत मामलों में अश्वेत शामिल थे, इस तथ्य के बावजूद कि हर तीन में से एक गोरा आदमी गैरकानूनी हथियार या नशीली दवाओं के साथ पाया गया, जबकि हर पाँच में से सिर्फ एक अश्वेत नियम विरुद्ध था।

फिर भी, यथास्थिति के समर्थक हमेशा ही राज्य हिंसा के आलोचकों को कम आयवाले अश्वेत समुदायों में होनेवाली आपसी नस्ली हत्याओं की संख्या का हवाला देकर भटकाने की कोशिश करते हैं। न्यूयॉर्क के भूतपूर्व मेयर रूडी गुलियानी के हालिया शातिराना ताने को कौन भूल सकता है जो उन्होंने माइकल एरिक डाइसन के “प्रेस से मिलें” कार्यक्रम में किया–– “गोरे पुलिस अधिकारी वहाँ (अश्वेतों के इलाकों में) नहीं होते अगर आप एक–दूसरे को नहीं मार रहे होते ।” निश्चित रूप से यह एक नस्लवादी शेखी है, लेकिन इस तरह के कथन इस बात की गहन पूछताछ को रोकने में सफल हो जाते हैं कि कैसे नवउदारवादी नीतियाँ (जैसे कल्याणकारी राज्य का विखंडन, पूँजी के पलायन को प्रोत्साहित करना, सार्वजनिक स्कूलों, अस्पतालों, घरों, पारगमन और दूसरे सार्वजनिक संसाधनों का निजीकरण, पुलिस और जेलों में पूँजी निवेश, इत्यादि) एक तरह की राजकीय हिंसा है जो अभावग्रस्तता, पर्यावरण और स्वास्थ्य संकट, गरीबी तथा हिंसा और दमन पर आधारित वैकल्पिक (गैरकानूनी) अर्थव्यवस्था को जन्म देती है।

गुलियानी के व्यंग्यात्मक अपशब्द आधुनिक कानून व्यवस्था की असफलता का एक दमदार मामला है। अगर पुलिस की जिम्मेदारी शान्ति बनाये रखना और नागरिकों की रक्षा करना है, लेकिन इसके बजाय वे हिंसक मौतों की “महामारी” फैलाने में योगदान करती है, तो यह अश्वेतों और भूरे लोगों के इलाकों से पुलिस को पूरी तरह हटा लेने का मामला बनता है। पुलिस को लड़ाई का प्रशिक्षण दिया जाता है और पुलिसकर्मी अक्सर कम आयवाले नस्ली समुदायों के युवाओं को सम्भावित शत्रु समझते हैं। इसलिए अँधेरी सीढ़ियों में एक “बेगुनाह” काले आदमी का, सब्जी काटनेवाला चाकू लिये एक अश्वेत महिला का, या खिलौना बन्दूक से खेलते हुए छोटे बच्चों का कत्ल कोई दुर्घटना नहीं है। पुलिसकर्मी इन इलाकों में हाथ में हथियार लेकर गश्त करते हैं, उन्हें हर छाया के पीछे एक संदिग्ध छिपा हुआ दिखाई देता है और युद्ध में या तो मरना होता है या मारना होता है।

डैरेन विल्सन को माइक ब्राउन के कत्ल से सजा न सुनाये जाने की रोशनी में, उन लोगों के द्वारा जो राजकीय हिंसा से आतंकित है और विशेष तौर पर अपनी सुरक्षा को लेकर खतरा महसूस करते हैं, मिसौरी में पुलिस को हटा लेने का आह्वान–– अस्थायी तौर पर ही सही–– एक वाजिब माँग है। वे कानून और व्यवस्था चाहते हैं, लेकिन पुलिस ने लगातार कानून का अनादर किया है और लगभग बिना किसी जवाबदेही के कार्यवाही की है। पुलिस ने एक अनियंत्रित संगठन की तरह काम किया, उनकी कार्यवाही ने अव्यवस्था और भय पैदा किया। इसके अतिरिक्त, प्रभावी रूप से अभियोग न लगने से पुलिस फोर्स निर्दाेष साबित हो जाती है, जिससे अश्वेतों के जीवन की रक्षा करने और न्याय दिलवाने में सरकार की असफलता से उपजे क्रोध और निराशा की कानूनी अभिव्यक्ति का जवाब देते वक्त पुलिस को हिंसा और दमन का और ज्यादा इस्तेमाल करने का बहाना मिल जाता है। पहले ही ग्रांड जूरी के निर्णय के परिणामस्वरूप ऐसा हो रहा है, जब दंगा पुलिस ‘हेंड्स अप यूनाईटेड’ और उसके साथ–साथ दूसरे सुरक्षित स्थानों पर धावा बोल रही है।

हेंड्स अप यूनाईटेड, लॉस्ट वॉइसेज, ऑर्गनाइजेशन फॉर ब्लैक स्ट्रगल, डोंट शूट कोलिशन, मिलेनियल एक्टिविस्ट यूनाईटेड, और उनके जैसे दूसरे संगठनों के युवा संगठनकर्ता समझते हैं कि वे युद्ध की स्थिति में हैं। टेफपो, टोरी रसेल, मोंटेग्यु सिमंस, चेयेने ग्रीन, एश्ले येट्स, और सेंट लुईस इलाके के अनेकों दूसरे युवा अश्वेत कार्यकर्ता अभियोग का इंतजार नहीं कर रहे हैं। न ही वे दिखावटी संघीय जाँच का इंतजार नहीं कर रहे हैं, उन्हें उस संघीय सरकार के बारे में कोई भ्रम नहीं है जो स्थानीय पुलिस को सैन्य साजोसामान प्रदान करती है, जेलें बनाती है, जो बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के हजारों लोगों को चालकों और चालकरहित जहाजों से मारती है, और जो इजराइल को उसके गैरकानूनी युद्ध और कब्जे के लिए हथियारबन्द करती है। वे संगठित हो रहे हैं । साथ ही शिकागो के वे सक्रिय कार्यकर्ता भी संगठित हो रहे हैं जिन्होंने वी चार्ज जेनोसाइड और ब्लैक यूथ प्रोजेक्ट की स्थापना की, और लॉस एंजेल्स के युवा जिन्होंने कम्युनिटी राइट्स कैम्पेन बनाया, और देश–भर के सैकड़ों ऐसे संगठन जो प्रतिदिन राजकीय हिंसा और कब्जे को चुनौती दे रहे हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि न सिर्फ अश्वेतों का जीवन महत्त्वपूर्ण है (यह तो स्पष्ट ही है), बल्कि यह कि प्रतिरोध का अपना महत्त्व है। इसका महत्त्व है, क्योंकि हम अभी भी अधिवासी उपनिवेशवाद, नस्ली पूँजीवाद और पितृसत्ता के परिणामों के साथ संघर्षरत हैं। कैटरिना के बाद के न्यू ओरलियंस में इसका महत्त्व था जो कामकाजी लोगों पर नवउदारवाद के निरंतर चलनेवाले युद्ध की एक मुख्य रणभूमि है और जहाँ अश्वेत संगठनकर्ता बहुनस्ली गठबन्धनों का नेतृत्व करते हुए स्कूलों, अस्पतालों, सार्वजनिक पारगमन और सार्वजनिक घरों के निजीकरण तथा सार्वजनिक क्षेत्र की यूनियनों को खंडित करने का विरोध कर रहे हैं। फर्गुसन के युवा प्रचंडता के साथ अपना संघर्ष जारी रखे हुए हैं, सिर्फ माइक ब्राउन के लिए न्याय पाने और पुलिस दुर्व्यवहार को खत्म करने के लिए ही नहीं बल्कि वे नस्लवाद को हमेशा के लिए खत्म कर देने के लिए, साम्राज्य का अन्त करने के लिए और अन्तत: युद्ध को खत्म करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

(काउन्टरपंच डॉट कॉम से साभार । अनुवाद–दिनेश पोसवाल)

उत्तरी कोरिया में युद्ध टालने का कर्तव्य

फिदेल कास्त्रो – फोटो राइटर से साभार

-फिदेल कास्त्रो

आज के दौर में मानवता जिन बड़ी चुनौतियों का सामना कर रही है, मैंने उनकी चर्चा कुछ दिन पहले ही की थी. हमारी धरती पर बौद्धिक जीवन लगभग 2,00,000 वर्ष पहले उत्पन्न हुआ था, हालाँकि नयी खोजों से कुछ और ही बात का पता चला है.

हमें बौद्धिक जीवन और उस सामान्य जीवन के अस्तित्व के बीच भ्रमित नहीं होना चाहिए, जो अपने शुरुआती रूप में हमारे सौर मंडल के अंदर करोड़ों साल पहले से मौजूद था.

दरअसल पृथ्वी पर जीवन के अनगिनत रूप मौजूद हैं. दुनिया के अत्यंत जानेमाने वैज्ञानिकों ने बहुत पहले ही अपनी श्रेष्ठ रचनाओं में इस विचार की कल्पना की थी कि 13.7 अरब वर्ष पहले ब्रह्माण्ड की सृष्टि के समय जो महा विस्फोट हुआ था, उस समय उत्पन्न हुई ध्वनि को पुनरुत्पादित किया जा सकता है.

यह भूमिका काफी विस्तृत होती, लिकिन यहाँ हमारा मकसद कोरयाई प्रायदीप में जिस तरह की परिस्थिति निर्मित हुई है, उसमें एक अविश्वसनीय और असंगत घटना की गंभीरता को व्याख्यायित  करना है, जिस भौगोलिक क्षेत्र में दुनिया की लगभग सात अरब आबादी में से पाँच अरब आबादी रहती है.

यह घटना अब से 50 वर्ष पहले, 1962 में क्यूबा के इर्द-गिर्द उत्पन्न अक्टूबर संकट के बाद नाभिकीय युद्ध की गंभीर चुनौती से मिलती-जुलती है.

1950 में वहाँ (कोरियाई प्रायदीप में) एक युद्ध छेड़ा गया था जिसकी कीमत लाखों लोगों ने अपनी जान देकर चुकायी थी. अमरीका द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी शहरों के निहत्थे लोगों पर दो नाभिकीय बम गिराए जाने के कुछ ही सेकण्ड के अंदर लाखों लोगों की या तो मौत हुई थी या वे विकिरण के शिकार हुए थे जबकि इस घटना के महज पाँच साल बाद ही कोरिया में युद्ध थोपा गया था.

उस युद्ध के दौरान जेनरल डगलस मैकार्थर ने कोरिया जनवादी जन गणराज्य पर भी नाभिकीय हथियारों का इस्तेमाल करना चाहा था. लेकिन हैरी ट्रूमैन ने इसकी इजाजत नहीं दी थी.
इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि चीन ने अपने देश की सरहद से लगे एक देश में अपने दुश्मन की सेना को पैर ज़माने से रोकने के प्रयास में अपने दस लाख बहादुर सैनिकों को गवाँ दिया था. सोवियत सेना ने भी अपनी ओर से हथियार, वायु सैनिक सहयोग, तकनीक और आर्थिक मदद दी थी.

मुझे गर्व है कि मैं एक ऐतिहासिक व्यक्ति, अत्यंत साहसी और क्रन्तिकारी नेता किम इल सुंग से मिला था. अगर वहाँ युद्ध छिड़ गया तो उस महाद्वीप के दोनों ओर की जनता को भीषण बलिदान देना पड़ेगा, जबकि उनमें से किसी को भी इससे कोई लाभ नहीं होगा. कोरिया जनवादी जन गणराज्य हमेशा से क्यूबा का मित्र रहा है तथा क्यूबा भी हमेशा उसके साथ रहा है और आगे भी रहेगा.

अब जबकि उस देश ने वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियाँ हासिल कर ली है, तब हम उसे उन तमाम देशों के प्रति उसके कर्तव्यों की याद दिलाना चाहेंगे, जो उसके महान दोस्त रहे हैं और उसका यह भूलना अनुचित होगा कि इस तरह का युद्ध खास तौर पर इस ग्रह की सत्तर फीसदी आबादी को प्रभावित करेगा.

अगर वहाँ इस पैमाने की लड़ाई फूट पड़ती है, तो दूसरी बार चुनी गयी बराक ओबामा की सरकार ऐसी छबियों के सैलाब में डूब जायेगी जो उनको अमरीका के इतिहास के सबसे मनहूस चरित्र के रूप में प्रस्तुत करेंगे. युद्ध को टालना उनका और अमरीकी जनता का भी कर्तव्य बनता है.

फिदेल कास्त्रो रुज
4 अप्रैल, 2013 

(मूल अंग्रेजी लेख dianuke.org से आभार सहित. अनुवाद- दिगम्बर)

जीरो डार्क थर्टी : यातना के सहारे महिला सफलता का दिशानिर्देश

जेरो डार्क थर्टी के खिलाफ प्रदर्शन. फोटो – वर्ल्ड कान्त वेट डॉट नेट से साभार 
— सूसी डे

(जीरो डार्क थर्टी एक हालीवुड फिल्म है जिसमें अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए और अमरीकी सेना द्वारा बिन लादेन की हत्या का रोमांचक विवरण प्रस्तुत किया गया है. इस फिल्म का निर्देशन एक महिला ने किया है और इसे महिला निर्देशिकाओं को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष रूप से आयोजित एक समारोह में पुरष्कृत किया गया है. उस महिला निर्देशिका के बारे में एक जानेमाने पुरुष फिल्म समीक्षक ने कहा है कि वह “बहुत ही बेहतरीन, हालीवुड की सबसे मर्दाना निर्देशक है.”


जीरो डार्क थर्टी : यातना के सहारे महिला सफलता का दिशानिर्देश     
l. पृथ्वी

पृथ्वी पर निगाह डालें. पृथ्वी पर रहने वाले 7 अरब लोगों में से अधिकांश महिलायें हैं. महिलाऐं पुरुषों से अलग हैं. आखिर महिलायें पुरुषों से अलग क्यों हैं? क्योंकि, अंतरराष्ट्रीय मानवतावादी संस्थाओं के मुताबिक कई मामलों में महिलाओं का विशेष प्रतिशत साफ-साफ झलकता है. देखिये महिलाओं का प्रतिशत—

·         दुनिया के ग़रीबों में 70 प्रतिशत महिलायें हैं.
·  दुनिया के कुल काम का 66 प्रतिशत महिलायें करती हैं, फिर भी दुनिया की आमदनी का                                   सिर्फ 10 प्रतिशत पाती हैं.  
·          दुनिया के 7,20,00,000 बच्चे जो स्कूल नहीं जाते, उनमें 55 प्रतिशत लड़कियाँ हैं.
·           हर 3 में से 1 महिला के साथ लिंगभेद पर आधारित हिंसा होती है. 

ये बहुत ही खराब प्रतिशत हैं. खराब प्रतिशत क्यों हैं ये? क्योंकि ये विश्वव्यापी लिंगभेद को दर्शाते हैं. लिंगभेद क्या है? यह धारणा कि महिलायें पुरुषों से हीन हैं. महिलाये लिंगभेद पर विजय कैसे हासिल कर सकती हैं? आइये टीवी देखते हैं! 

ll. द गोल्डन ग्लोब

पुरस्कार समारोह देखिये. गोल्डन ग्लोब टेलीविजन और फिल्म के क्षेत्र में कलात्मक उपलब्धियों को मान्यता प्रदान करता है. जरा ध्यान से देखिये! जोर-शोर से प्रचारित किया गया कि इस बार के समारोह में महिलाओं की प्रतियोगिता होगी, जहाँ “ सशक्त महिला प्रभावी होगी. अब पुरस्कार जीत कर महिलाओं का लिंगभेद पर विजय हासिल करना देखिये.

देखिये किस तरह दो मजेदार महिला चोबदार पुरस्कार दे रही हैं. देखिये एक नाजुक सी गोरी महिला को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार हासिल करते, जिसने एक टीवी नाटक में दुष्ट मुसलमानों से लड़नेवाले सीआईए एजेंट की भूमिका निभाई थी. अब देखिये एक नाजुक सी लाल बालों वाली गोरी महिला को एक फ़िल्मी ड्रामा में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीतते, जिसने दुष्ट मुसलमानों के उत्पीडन में सहायता करनेवाली एक सीआईए एजेंट की भूमिका निभाई थी. जीतो, जीतो, जीतो! 
  
देखिये कि ये दोनों महिलायें किस तरह नाजुक और गोरी होने के गुण को शीर्ष पर होने के मर्दाने गुण के साथ मिलान करती हैं. उन्होंने इस बात का अविष्कार किया है कि अगर आप को लिंगभेद पर विजय पाना है तो (क) अमरीका की क़ानूनी नागरिकता हासिल कीजिए; (ख) आप सुडौल और तीखे नाक-नक्श वाला लुभावना पश्चिमी सौंदर्य हासिल कीजिए जिसे फिल्माया और पर्दे पर दिखाया जा सके; (ग) 20,00,000 डालर मूल्य का नीचे-गलेवाला गाउन पहनिए और (घ) ऐसी कहानियों में महिलाओं की प्रमुख भूमिका निभाइए जिसमे दिखाया गया हो कि अत्याचार किस तरह किसी पुरुष को भी हीन बना देता है. 

lll. जीरो डार्क थर्टी

देखिये ओसामा बिन लादेन को ढूंढने और उसकी हत्या करने के बारे में पहली उच्च तकनीकी, बड़ी बजट की फीचर फिल्म. पुनर्विचार बिलकुल नहीं. 

इसके बजाय यह देखिये कि इसका निर्देशन किसने किया. फिल्म की निर्देशिका एक महिला है. उसके पास गोल्डन ग्लोब भले ही न हो, लेकिन उसमें मर्दानापन जरुर है. उसमें मर्दानापन क्यों है? एक जानेमाने पुरुष फिल्म समीक्षक ने इस औरत के बारे में कह है कि वह “बहुत ही बेहतरीन, हालीवुड की सबसे मर्दाना निर्देशक है.” धन्यवाद, श्रीमान फिल्म समीक्षक! हम औरतें यह जानती हैं कि हम कोई बढ़िया काम कर रही होती हैं जब आप हमारे बारे में “मर्दाना” और “बेहतरीन” लिखते हैं!

निर्देशिका के मर्दानापन ने उसे सिनेमाई जोखिम उठाने की इजाजत दी. उन जोखिमों में एक खास चीज क्या है? निर्देशिका ने उच्च कोटि की कलात्मकता का ऐसा यथार्थ और सजीव चित्रण किया है जैसे आप सब कुछ अपनी आँखों के सामने घटते हुए देख रहे हों और इस शैली को डरावनी फिल्मों जैसे दृश्यों के साथ गूँथ दिया है. उसने घटिया दर्जे की स्टंट फिल्मों के स्तर को अमरीकी ज्ञानरंजन (इन्फोटेन्मेंट) के स्तर तक ऊँचा उठा दिया. देखिये कि किस तरह हमें ज्ञानरंजित किया जाता है—

IV. अच्छा मुसलमान सिर्फ वही है, जिसकी तहकीकात हुई हो

देखिये कि 11 सितम्बर को वर्ल्ड ट्रेड टावर पर हमले में कैसे 3,000 इंसानों की त्रासद मौत होती है. ये मत देखिये कि उस घटना के बाद से इराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में अमरीकी हमले, बमबारी और ड्रोन हमलों में कितने हजारों हजारों हजारों हजार लोगों को किस तरह मौत के घाट उतारा जाता है. उस फ्लैशबैक को मत देखिये कि उस इलाके में तेल का दोहन करने के लिए अमरीका ने किस तरह तानाशाह शासकों को खड़ा किया और उनका समर्थन किया. पश्चिमी देशों के उन प्रतिबंधों पर भी निगाह मत डालिए, जो 11 सितम्बर 2001 से वर्षों पहले इराक पर लादे गये थे, जिसने लगभग 5,00,000 लाख इराकी बच्चों की जान ले ली थी. इस बात को भी मत देखिये कि अव्वल तो लोगों को बिन लादेन की हत्या किये जाने की समझ पर ही उबकाई आ रही थी या किसी की भी राजनितिक हत्या पर, जो एक राष्ट्रपति की गुप्त “हत्या सूची” पर आधारित हो.

V. न्याय नहीं, सिर्फ गोरी शान्ति

जल्दी ही सभी रंगो और डिजाइनों के बालों वाली अमरीकी महिलाओं को युद्ध की अगली कतारों में तैनात किया जायेगा. किसलिए, देखिये! पेंटागोन ने हाल ही में घोषणा की है कि वह महिलाओं को युद्ध की अगली कतारों में तैनाती का आदेश जारी करेगा! हाँ-हाँ, अमरीकी सेना जैसे दोस्त हों तो नारीत्व की परवाह भला किसे है?

शुक्रिया, छरहरी, लाल बालोंवाली, गोरी औरत! तुमने हम महिलाओं का मार्ग प्रशस्त किया है! जब हम लोग डार्क थर्टी के अँधेरे में अपने खराब प्रतिशतों को लिए हुए भटक रही थीं, तुमने चरम प्रतिहिंसा से हमारा साक्षात्कार कराया.

इसने हमें अपने स्तब्धकारी उपसंहार तक पहुँचा दिया—यहाँ संयुक्त राज्य अमरीका में – और यूरोप में भी जो कुछ ही दशकों पहले तक हमारा विकट “मूल निवास” था— न्याय का रंग गोरा है. 
(सूसी डे एक लेखिका हैं जो मुख्यतः बच्चों और किशोरों के लिए लिखती हैं. उनका यह लेख मंथली रिव्यू में प्रकाशित हुआ था, जहाँ से अभार सहित इसे लिया गया है. अनुवाद- दिगम्बर.)


वही करो जो मैं कहता हूँ, वैसा नहीं जैसा मैं करूँ!

-माइक फर्नर


(कनेक्टिकट, अमरीका के स्कूल में हुई अंधाधुंध गोलीबारी की घटना पर एक बेबाक टिप्पणी जो हमारे लिए भी विचारणीय है.)

अपनी भोली-भाली जवानी के दिनों में आपने अपने माता-पिता या बड़े भाई-बहनों की तरफ से इन शब्दों को उछाले जाते सुना होगा, खास कर तब जब आपने उनकी किसी ऐसी गलती पर ऊँगली उठाई हो, जिसके बारे में वे आपसे ऊँचे मापदंड अपनाने को कहा करते हों.

“व्यवहार, शब्दों से अधिक मुखर होता है” और “हम उदाहरण से सीखते हैं,” ये दो ऐसी सच्चाइयाँ हैं जिसे इतिहास ने सही ठहराया है. लेकिन इनको व्यवहार में उतरना आसान नहीं है.

एक राष्ट्र के रूप में हम पिछले हफ्ते कनेक्टिकट में भयावह रूप से हताहत लोगों के परिवारों और प्रियजनों के साथ मिल कर शोक मानते हैं. लेकिन उस शोक के साथ चूँकि यह मत भी जुड़ा हुआ है कि आखिर ऐसी नृशंसता दुबारा कैसे घटित हुई, तो मेरी राय में हम इस घटना के शिकार हुए लोगों के परिजनों और खुद अपने साथ भी अपकार करेंगे, यदि  हम सामूहिक कत्लेआम को लेकर अमरीकियों की अभिरुच की छानबीन करते हुए “हमारे आगे जितने भी विकल्प सामने हैं” उन सब पर विचार नहीं करते.

अगर व्यवहार सचमुच शब्दों से अधिक मुखर होता है, तो हमारी युवा पीढ़ी को भला और क्या संस्कार और सीख मिल सकती है, जब हम हरसाल शिक्षा और स्वास्थ्य की तुलना में कहीं ज्यादा मौत और पीड़ा खरीदते हैं; जब हम एक ऐसी संस्कृति को जन्म देते हैं जिसमें हिंसा और सैन्यवाद का उत्सव मनाया जाता है जबकि शान्ति और अहिंसा चाहनेवालों को अनाड़ी, अनुभवहीन स्वप्नदर्शी और यहाँ तक कि एकदम गद्दार करार दिया जाता है; जब हम सेना को महिमामंडित करते हैं और बढ़ावा देते हैं, सेना के कुकृत्यों पर पर्दा डालते हैं; जब हमारा देश इतने हथियार बेचता है जितना पूरी दुनिया मिलकर नहीं बेचती; जब हमारे एक दूतावास पर हमले के बाद देश का नेता कहता है कि “हिंसा के इस्तेमाल के लिए कोई माफ़ी नहीं,” और दूसरे दिन वह अपनी फेहरिस्त के अगले देश और उसके समर्थकों पर बमबारी करने के लिए ड्रोन बम्बबर्षक रवाना करता है?

क्या हम सचमुच यह सोचते हैं कि हम कहें कुछ और करें कुछ, बिना साफ तौर पर यह सीखे कि हिंसा चाहे जितनी भी उत्तेजक और भयावह हो, उससे हमें कैसे निपटना है?
  

इसमें कोई शक नहीं कि जो ताकतें इंसान के दिमाग को इस हद तक मोड़ देती हैं कि वह दर्जनों बेगुनाह लोगों को मौत के घाट उतार दे, वह निश्चय ही जटिल और भयावह होगा. उनमें से कुछ तो इंसान के मन में इतनी गहराई से बैठी हो सकती हैं, जहाँ तक हमारी पहुँच ही न हो. जो भी हो, हमें जानना चाहिए कि आखिर “क्यों”?


अगर हम ऐसा करते हुए इससे मिलने वाले जवाब से इस हद तक भयभीत न हों कि अगली त्रासदी के घटित होने तक हम भाग कर खोल में ही सिमट जाएँ, तो हमें डॉ. मार्टिन लूथर किंग के शब्दों को अपने दिमाग में रखना होगा, जिन्होंने दुर्भाग्यवश अपने देश को “आज की दुनिया में हिंसा का सबसे बड़ा पोषक” कहा था और चेतावनी दी थी कि “जो राष्ट्र साल दर साल सामाजिक उन्नति के कार्यक्रमों की तुलना में सैन्य सुरक्षा पर अधिक खर्च कर रहा है वह आत्मिक मृत्यु के निकट पहुँच रहा है.”

“वही करो जो मैं कहता हूँ, वैसा नहीं जैसा मैं करूँ,” बचपन में ही काम नहीं आया था. यह अब भी काम नहीं आएगा.

(माइक फर्नर ओहियो निवासी लेखक हैं और वेटरन फॉर पीस संस्था के पूर्व अद्ध्यक्ष हैं. मंथली रिव्यू से आभार सहित. अनुवाद- दिगम्बर) 

धरती : एक वर्जित ग्रह

-जोर्ज मोनबियट

मानवता के सबसे बड़े संकट के साथ-साथ एक ऐसी विचारधारा का भी उदय हुआ, जो उस संकट के समाधान को असंभव बना देती है. 1980 के दशक के उत्तरार्ध में, जब यह साफ़ हो गया कि मानव निर्मित जलवायु परिवर्तन ने इस जानदार ग्रह और इसके निवासियों को खतरे में डाल दिया है, उसी समय दुनिया एक अतिवादी राजनीतिक सिद्धांत की गिरफ्त में आ गयी, जिसके जड़सूत्र ऐसे किसी भी हस्तक्षेप का निषेध करते हैं जो इस संकट से निजात पाने के लिए जरूरी हैं.

नवउदारवाद, जो बाजार-कट्टरपन्थ या मुक्त-बाजार अर्थव्यवस्था के नाम से भी जाना जाता है, इसका अभिप्राय बाजार को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करना है. इसका जोर इस बात पर है कि राज्य को बाजार की हिफाजत करने, निजी सम्पत्ति की रक्षा करने और व्यापार के रास्ते की बाधाएँ हटाने के अलावा और कुछ नहीं करना चाहिए. व्यवहार में यह चीज देखने को नहीं मिलती. नवउदारवादी सिद्धांतकार जिसे सिकुड़ना कहते हैं, वह लोकतंत्र के सिकुड़ने जैसा दिखता है- नागरिक जिन साधनों से अभिजात वर्ग की सत्ता पर अंकुश रख सकते हैं, उन्हें कम करते  जाना. जिसे वे “बाजार” कहते हैं, वह वास्तव में बहुराष्ट्रीय निगमों और चरम-धनवानों का स्वार्थ ही दिखाई देता है. लगता है, जैसे नवउदारवाद केवल अल्पतन्त्र को उचित ठहराने का साधन मात्र हो.
इस सिद्धांत को पहलेपहल 1973 में चिली पर आजमाया गया था. शिकागो विश्वविद्यालय के एक पुराने विद्यार्थी ने जो मिल्टन फ्रीडमैन के अतिवादी नुस्खों में दीक्षित हुए थे, सीआइए के पैसे से जेनरल पिनोचे के साथ मिल कर वहाँ इस सिद्धांत को जबरन लागू करवाया, जिसको किसी लोकतान्त्रिक देश में थोपना असंभव होता. इसका नतीजा एक ऐसी आर्थिक तबाही के रूप में सामने आया जिसमें धनी वर्ग, जिसने चिली के उद्योगों के निजीकरण के बाद उनका मालिकाना हथिया लिया था और वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों पर पूरी तरह कब्ज़ा कर लिया था, लगातार समृद्ध होता गया.
इस पंथ को मारग्रेट थैचर और रोनाल्ड रीगन ने अपना लिया. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोश और विश्व बैंक ने इसे गरीब देशों पर जबरदस्ती थोपा. जब 1988 में जेम्स हानसेन ने अमरीकी सीनेट में पहली बार धरती के तापमान में भावी बढ़ोतरी के बारे में अपना विस्तृत माडल प्रस्तुत किया, तब इस सिद्धांत को पूरी दुनिया में लागू करवाया जा रहा था.
जैसा कि हमने 2007 और 2008 में देखा (जब नवउदारवादी सरकारों को बाध्य किया जा रहा था कि वे बैंकों को उबारने से सम्बंधित अपनी नीति को त्यागें), तब किसी तरह के संकट का सामना करने की इतनी खराब परिस्थिति इससे पहले शायद ही कभी रही हो. जब कोई विकल्प न रह जाय तबतक, संकट चाहे जितना ही तीक्ष्ण हो और उसके परिणाम चाहे जितने भी गम्भीर क्यों न हों, आत्म-घृणाशील राजसत्ता दखल नहीं देगा. लेकिन नवउदारवाद सभी तरह की मुसीबतों से अभिजात वर्ग की हिफाजत करता है.
विश्व बैंक, अंतरार्ष्ट्रीय ऊर्जा एजेन्सी और प्राइसवाटरहाउसकूपर जैसे हरित अतिवादियों ने इस शताब्दी के लिए चार डिग्री, पांच डिग्री और छः डिग्री ग्लोबल वार्मिंग का जो पूर्वानुमान लगाया है, उसके चलते होनेवाले पर्यावरण विनाश से बचने का मतलब होगा- तेल, गैस और कोयला उद्योग से सीधे टक्कर लेना. इसका मतलब है उद्योगों पर इस बात के लिए दबाव डालना कि वे अपने अस्सी फीसदी से भी अधिक खनिज तेल भंडार का त्याग करें, जिसे जलाए जाने से होने वाला नुकसान हमारे बर्दास्त से बाहर है. इसका मतलब है नए तेल भंडारों का पता लगाने और उन्हें विकसित करने कि कार्रवाइयों को रद्द करना, क्योंकि जब हम पहले वाले भण्डार का ही इस्तेमाल नहीं कर सकते, तो नया खोजने से क्या फायदा? और इसका मतलब होगा ऐसे किसी भी नए संरचनागत ढाँचे के निर्माण (जैसे- हवाई अड्डे) पर रोक लगाना, जिसे बिना तेल के चलाना ही सम्भव न हो.
लेकिन आत्म-घृणाशील राजसत्ता कोई कार्रवाई कर ही नहीं सकती. जिन स्वार्थों से लोकतंत्र को बचना चाहिए, उनकी गिरफ्त में होने के चलते वे केवल बीच सड़क पर बैठे, कान खोदते और मूँछ ऐंठते रहेंगे, जबकि धड़धड़ करता ट्रक उनकी ओर आता जायेगा. टकराहट वर्जित है, कार्रवाई करना प्राणघातक पाप है. आप चाहें तो कुछ पैसे वैकल्पिक ऊर्जा पर बिखेर सकते हैं, लेकिन पुराने कानूनों की जगह कोई नया कानून नहीं बना सकते.
बराक ओबामा वे उस नीति को आगे बढ़ाते हैं जिसे वे “सबसे श्रेष्ठ” बताते हैं- हवा, सौर, तेल और गैस को प्रोत्साहन देना. ब्रिटिश जलवायु परिवर्तन सचिव, एड डेवी पिछले हफ्ते सामान्य सदन में ऊर्जा बिल पेश करते हैं, जिसका उद्देश्य ऊर्जा आपूर्ति को कार्बन रहित बनाना है. उसी बहस के दौरान वे वादा करते हैं कि वे उत्तरी सागर और दूसरे विदेशी तेल कुओं में तेल और गैस के उत्पादन की “क्षमता को बढ़ाएंगे.”
लोर्ड स्टर्न ने जलवायु परिवर्तन को परिभाषित करते हुए कह था कि यह “यह बाजार व्यवस्था की ऐसी विराटतम और व्यापक दायरे वाली असफलता है, जो पहले कभी देखने में नहीं आई थी.” जून में बेमतलब का पृथ्वी सम्मेलन, दोहा में आजकल जिस पर बहस हो रही है वे बोदे उपाय, ऊर्जा बिल और ब्रिटेन में पिछले हफ्ते जारी बीजली की माँग घटाने से सम्बंधित परचा (बेहतर होता कि ये सारे उपाय समस्या की गंभीरता के मद्देनजर इतने गये-गुजरे न होते), ये सब कुछ बाजार कट्टरपंथ की विराटतम और व्यापकतम असफलता को बेनकाब करते हैं- यह हमारे अस्तित्व से जुड़ी इस समस्या को हल करने में इस व्यवस्था की अक्षमता को दर्शाता है.
हजार वर्षों की विरासत में मिला मौजूदा कार्बन उत्सर्जन ही मानव सभ्यता से मिलतीजुलती किसी भी चीज को चकनाचूर कर देने के लिए काफी है. जटिल समाजों ने समय-समय पर साम्राज्यों के उत्थान-पतन, प्लेग, युद्ध और अकालों को  झेल लिया. वे छः डिग्री जलवायु परिवर्तन को नहीं झेलपाएंगे जिसे शहस्राब्दी तक जारी रहना है. 150 वर्षों के विस्फोटक उपभोग की एवज में, जिसके ज्यातर हिस्से का मानवता की भलाई से कोई लेना-देना नहीं रहा, हम प्राकृतिक विश्व और उस पर निर्भर मानवीय व्यवस्था को खंड-खंड बिखेर रहे हैं.
दोहा जलवायु शिखर (या तलहटी) वार्ता तथा नए उपायों के बारे ब्रिटिश सरकार की चीख-पुकार से यह थाह लग जाता है कि मौजूदा राजनीतिक कार्रवाइयों की कितनी सीमाएं हैं. आप आगे बढ़े नहीं कि सत्ता के साथ आपकी प्रतिज्ञा भंग हुई, दोनों तरह की प्रतिज्ञाएं- चाहे वह परदे के पीछे की गयी हो या नवउदारवादी पंथ द्वारा उसे मान्यता मिली हो.       
नवउदारवाद इस समस्या की जड़ नहीं है – अक्सर इस विचारधारा का इस्तेमाल बेलगाम अभिजात वर्ग द्वारा दुनिया के पैमाने पर सत्ता, सार्वजनिक सम्पत्तियों और प्राकृतिक संसाधनों पर कब्ज़ा ज़माने को उचित ठहराने के लिए किया जाता है. लेकिन इस समस्या का तब तक समाधान नहीं किया जा सकता जब तक एक प्रभावशाली राजनितिक विकल्प के जरिये इस सिद्धांत को चुनौती नहीं दी जाती.     
दूसरे शब्दों में जलवायु परिवर्तन- और वे तमाम संकट जो मानव तथा प्रकृति को अपने शिकंजे में जकड़े हुए हैं- उनके खिलाफ संघर्ष में तब तक  जीत हासिक नहीं  की जा सकती है जब तक एक  व्यापक राजनीतिक संघर्ष न छेडा जाय, धनिक तंत्र के खिलाफ व्यापक जनता कि जनवादी गोलबंदी न की जाय. मेरा मानना है कि इसकी शुरुआत उस वित्तीय व्यवस्था के खिलाफ सुधार अभियान के जरिये होनी चाहिए जिसके माध्यम से बहुराष्ट्रीय निगम और धनाढ्य वर्ग राजनीतिक फैसलों और नेताओं की खरीद-फरोख्त करते हैं. अगले कुछ हफ़्तों के भीतर ही हमारे साथियों में से कुछ लोग ब्रिटेन में एक याचिका दायर करके इस मुहीम की शुरुआत करेंगे. मुझे यकीन है कि आप उस पर जरुर हस्ताक्षर करेंगे.          
लेकिन यह तो एक विनम्र शुरुआत भर होगी. निश्चय ही हमें एक नयी राजनीति की रूपरेखा तैयार करनी होगी- जो जन हस्तक्षेप को न्यायसंगत मानती हो, जिसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों  द्वारा बाजार को मुक्त कराने के घिनौने मकसद से कहीं ज्यादा महान उद्देश्य अन्तर्निहित हो, जो मुठी-भर उद्योगों को को खास तरजीह देकर उन्हें बचने के बजाय, आम जनता और इस सजीव संसार के अस्तित्व को ज्यादा अहमियत देती हो. दूसरे शब्दों में, एक ऐसी राजनीति जो हमारी अपनी हो, न कि मुट्ठी भर चरम अमीर तबके के लिए.
(4 दिसम्बर को गार्जियन में प्रकाशित लेख का आभार सहित प्रस्तुति. अनुवाद – दिगम्बर)
इस लेख में दिये गये पाद-टिप्पणियों का अनुवाद नहीं किया गया है. जिन पाठकों की रूचि हो, वे कृपया मूल अंग्रेजी पाठ देख लें, जिसका लिंक नीचे दिया गया है.

हिंदी के दुश्मन हिंदी अखबार


पारिजात

अल्लाह तुम्हारे बच्चों को उनकी माँ की भाषा से वंचित कर दे,” एक नारी ने दूसरी नारी को कोसा ।
अल्लाह तुम्हारे बच्चों को उससे महरूम करे, जो उन्हें जबान सिखा सकता हो ।
नहीं, अल्लाह तुम्हारे बच्चों को उससे महरूम करे, जिसे वे अपनी जबान सिखा सकते हों ।
तो ऐसे भयानक होते हैं शाप ।
रसूल हमजातोव, “मेरा दागिस्तानपुस्तक से ।
कल्पना करें कि अगर हम अचानक अपनी मातृभाषा भूल जायें तो क्या होगा ? हम पूरी दुनिया से और यहाँ तक कि खुद से भी अजनबी नहीं हो जायेंगे ?
पिछले बीस सालों से हिंदी के कई अखबार जनता के स्मृतिपटल से उसकी मातृभाषा पोंछ देने की कारगुजारियों में लिप्त हैं । किसी जमाने में इन्ही हिंदी अखबारों से जुड़े सम्पादकों और पत्रकारों ने हिंदी को समृद्ध किया था । आज उनके उत्तराधिकारी उनके कियेकराये पर पानी फेर रहे हैं । वे हिंदी की जगह अंग्रेजी को प्रतिष्ठित करने का अभियान छेड़े हुए हैं और हिंदी के दुश्मन की भूमिका निभा रहे हैं । वे बिलावजह अंग्रेजी के शब्दों को हिंदी में घुसाकर हिंदी को हिंगलिश बनाने में लिप्त रहे हैं ।
हिंदी के एक प्रतिष्ठित अखबार के एक कोने में ही ईवनिंग, शिफ्ट, केस, कांसटेबुल, कोर्ट, करप्सन, लाइट, इलैक्सन, लिस्ट, जैसे अनेकों शब्द देखने को मिले । इन शब्दों के लिये लोगों की जुबान पर चढ़े हुए हिंदी के बहुप्रचलित शब्दों का अकाल नहीं है । इन अखबारों ने सचेत रूप से ऐसे सैकड़ों शब्दों को हमारी आम बोलचाल की भाषा में घुसा दिया है ।
अगर किसी शब्द के लिये हमारी भाषा में प्रचलित शब्द न हो तो कोशिश यही होनी चाहिये कि उसके लिये शब्द बनाकर उसे प्रचलित किया जाय, ताकि हमारे शब्द भंडार में इजाफा हो । अगर वैकल्पिक शब्द तलाशना सम्भव न हो तो मजबूरी में किसी दूसरी भाषा के शब्द का प्रयोग करने में कोई बुराई नहीं । लेकिन अपनी भाषा में प्रचलित समानार्थी शब्द होने पर भी दूसरी भाषा के शब्द का प्रयोग करना अपनी भाषा के प्रति घोर उपेक्षा है ।
भाषा के घालमेल का काम सबसे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने शुरू किया था । इसने धीरेधीरे अंग्रेजी के शब्दों को हमारी बोलचाल की भाषा में घुसाया । यह एक हवाई हमले की तरह था । तब समाज में इसकी व्यापक पहुँच नहीं थी । लेकिन हिंदी को अंग्रेजी द्वारा प्रतिस्थापित करने की अखबारों की योजाना के लिये इसने आधार का काम किया । इसी जमीन पर खड़े होकर अखबार अंग्रेजी के शब्दों की संख्या बढ़ाते चले गये । शब्दों की तो बात ही छोड़िये, वे अंग्रेजी के वाक्यांशों को भी हमारी भाषा में घुसा रहे है । उनकी अगली योजाना हिंदी को देवनागरी लिपि के बजाय रोमन लिपि में लिखने की है ।
अपने इन भाषा विनाशी कुकृत्यों के लिये वे तर्क देते हैं कि इससे हिंदी समृद्ध हो रही है और एक वैश्विक भाषा बनने की ओर बढ़ रही है । उनका कहना है की हिंदी में इन नये शब्दों के आ जाने से हिंदी की ताकत बढ़ेगी और इसका विस्तार भी होगा । अगर उनके तर्क को थोड़ा बढ़ाकर सोंचे तो जल्द ही वह दिन आयेगा जब हम वाक्य तो हिंदी का बोलेंगे पर उसमें शब्द अंग्रेजी के होंगे । इसका नमूना हम रेडियो और टीवी के संचालकों की खिचड़ी बोली के रूप में देख सकते हैं ।
भाषाशास्त्रियों का कहना है कि शब्द मात्र अक्षरों का समूह नहीं होते । हर शब्द का अपना इतिहास होता है । शब्दों का अपना जीवन क्रम होता है, वे पैदा होते हैं, पुराने पड़ते हैं, मरते हैं और फिर नयेनये शब्द पैदा होते हैं । किसी भी शब्द के सम्पर्क में आते ही हमारे दिमाग में उससे सम्बंधित एक तस्वीर बनती है । शब्द से हमारे दिमाग में बनने वाले इस चित्र पर समय, समाज, भौगोलिक परिस्थिति, संस्कृति जैसी बहुत सी चीजों का असर होता है । किसी भारतीय किसान के दिमाग में सुबहकहने से जो चित्र खिंचता है, वह किसी अमरीकी के जीवन में मार्निंगसुनकर उभरने वाली छवि से बिलकुल अलग होता है । माँबाप सुनकर हमारा दिमाग जैसी प्रतिक्रिया करता है पैरेंट्स सुनकर हमारे दिमाग में वही छवि नहीं बनती ।
यह भी महत्त्वपूर्ण है की हमारे दिमाग में जो भी विचार आते हैं या हम जो भी चिंतन करते हैं, वह हमारी अपनी मातृभाषा में होता है । हम परायी भाषा में सोच ही नहीं सकते । अगर हमारी भाषा के शब्द ही बदल दिये जायेंगे तो हम न तो मौलिक चिंतन कर पायेंगे और न ही अपने विचारों की प्रखर अभिव्यक्ति । अपनी भाषा से कटते ही हम अपनी परम्पराआंे अपनी संस्कृति और अपने इतिहास से भी कट जायेंगे । हम अपने पूर्वजों की विकास यात्रा और उनके संघर्षों से अजनबी हो जायेंगे । यही कारण है की दुनिया का हर जागरूक समाज जीजान से अपनी मातृभाषा को बचाने और उसका विकास करने का प्रयास करता है ।
सवाल यह है की मातृभाषा हिंदी में छपने वाले अखबार क्यों अपनी ही भाषा को नष्ट करने के लिये योजनाबद्ध तरीके से प्रयासरत हैं ? क्यों वे हिंदी को अंग्रेजी शब्दों की बैशाखी थमा रहे हैं, जबकि राष्ट्रीय आन्दोलन और 1947 के बाद के दशकों में भी उन्होंने हिंदी के विकास का काम किया था । कोई भी अखबार या पत्रिका समाज के किसी खास वर्ग का प्रतिनिधि होती है । देश की सत्ता की बागडोर जिस वर्ग के हाथ में होती है जनसंचार के माध्यमों पर भी उसी का कब्जा होता है । विरोधी विचारों को भी वह एक सीमा तक ही स्थान देता है । मुख्यधारा के हमारे अखबार पहले भी देश के शासक, पूँजीपति वर्ग की विचारधारा के वाहक थे और आज भी हैं । हालाँकि उनके मालिकों में अब विदेशी पूँजीपति भी शामिल हो गये हैं । आजादी की लड़ाई में जनता को अपने साथ लेने के लिये वे सुखदुःख में उसका साथ देते और शासकों तक उसकी आवाज पहुँचाते थे । आजादी के बाद हमारे शासकों ने राष्ट्र के आत्मनिर्भर विकास का रास्ता चुना । अपनी राष्ट्रीय भाषा और संस्कृति का विकास भी इसी का हिस्सा था । हालाँकि शासक वर्ग उस वक्त भी अंग्रेजी की श्रेष्ठता और निर्भरता से मुक्त नहीं थे, फिर भी इस पूरे दौर में अखबारों ने हिंदी के विकास में योगदान किया ।
80–90 के दशक में दुनिया मे हुए बदलावों को देखते हुए हमारे शासकों को आत्मनिर्भरता के बजाय परनिर्भरता और साम्राज्यवादियों की गुलामी में ज्यादा मुनाफा दिखायी देने लगा । उन्होंने अपने संकीर्ण स्वार्थों के लिये वैश्वीकरण के रूप में आयी नये तरह की गुलामी को स्वीकार कर लिया । साम्राज्यवादियों के लिये देश के दरवाजे खोल दिये गये । देश की सभी नीतियाँ इनकी सहूलियत के अनुसार बदली जाने लगीं । जब देश के शासक वर्ग ने साम्राज्यवादियों की अधीनता स्वीकार कर ली तो अखबारों समेत उसके सभी जनसंचार माध्यम भी साम्राज्यवाद की सेवा में लग गये । उनका चरित्र रातोंरात बदलने लगा ।
साम्राज्यवादियों का सपना पूरी दुनिया पर अपना एकछत्र राज कायम करना है । वे चाहते हैं कि पूरी दुनिया की जनता मुनाफाखोरी और उपभोक्तावाद को ही जीवन का उद्देश्य मान ले । उनकी पतित पूँजीवादि संस्कृति को ही पूरी दुनिया में स्थापित कर दिया जाय । उन्हीं की भाषा पूरी दुनिया में बोली जाये और पूरी दुनिया की जनता अपने देश के स्वाभिमान और आजादी के सपने का परित्याग कर दे । उन्हीं आक्रांताओं की साम्राज्यवादी संस्कृति का प्रचारप्रसार अब हिंदी के अखबारों का उद्देश्य बन गया हैं । इसके लिये जरूरी था की सबसे पहले अखबार खुद को हर कीमत पर मुनाफा कमाने वाले उपक्रम में बदलें और देश की जनता के प्रति अपने दायित्यों को त्याग कर अधिक से अधिक विज्ञापन हासिल करने की रणनीति अपनायें । इसी के तहत हिंदी के अखबारों ने हिंदी का विकास करने के बजाय उसकी जड़ें खोदने का बीड़ा उठा लिया । चूँकि हिंदी और सभी देशी भाषाएँ भारत की पहचान का अनिवार्य अंग है, इसलिए वैश्वीकरण के नाम पर साम्राज्यवादी ऐसी किसी भी पहचान को रौंदना जरूरी समझते हैं ।
भाषा ही नहीं बल्कि खानपान, पहनावा, जीवनशैली और हर क्षेत्र में बहुलतावाद को रौंदते हुए अपने एकरस और जड़ीभूत मानकों को स्थापित करना उनके लिये जरूरी है । तभी उनके ब्रांडेड कपडे़, खानेपीने के सामान और हर तरह की उपभोक्ता वस्तुएँ पूरी दुनिया में धड़ल्ले से बिक पायेंगी ।
अंग्रेजी के प्रति इस वर्ग का मोह फैशन मात्र नहीं है, बल्कि उनके अस्तित्व से सीधे जुड़ी हुई है । बहुराष्ट्रीय निगमों का पूरा तामझाम, पूरा तानाबाना, अंग्रेजी पर निर्भर है । जाहिर है कि उनके विज्ञापनों पर पलने वाले अखबारों के लिए भी अंग्रेजी को बढ़ावा देना और हिंदी का मानमर्दन करना आज उनके फलनेफूलने की शर्त है ।
ज्यादा मुनाफा कमाने के लालच में अपने देश की आजादी को साम्राज्यवादियों के पास गिरवी रख चुके शासक वर्गों के समर्थक अखबार अपनी मातृभाषा के मित्र नहीं हो सकते । आज अपनी मातृभाषा के मित्र उन्हीं वर्गों के पत्रपत्रिकाएँ हो सकती हैं जो पूरी मानवता की मुक्ति का सपना देखते हैं । अतीत में भी अंग्रेजी से लड़ते हुए अंग्रेजी के खिलाफ हिंदी का पताका लहराया गया था । आज हम उससे भी कठिन परिस्थिति का सामना कर रहे हैं, क्योंकि देश की एक बहुत बड़ी आबादी अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिये विदेशी पूँजी के साथ गलबहियाँ डाले खड़ी है । इसका मुकाबला जनपक्षधर पत्रपत्रिकाओं और अन्य वैकल्पिक माध्यमों के प्रचारप्रसार को एक आन्दोलन का रूप देकर ही सम्भव है ।

(देश-विदेश अंक 14 में प्रकाशित लेख) 

नोबेल शान्ति पुरस्कार : एक उन्माद भरी जालसाजी

स्पेन में अशांति और दंगे  (फोटो ए पी के प्रति आभार सहित )

यूरोपीय संघ को नोबेल शान्ति पुरस्कार देना एक भद्दा मजाक और उन्माद भरी जालसाजी है. नोर्वे नाटो का सदस्य देश है. सबसे अहम यह कि यूरोपीय संघ के सदस्य देश भी नाटो के सदस्य देश हैं, जो वास्तव में यूरोपीय संघ सैनिक शक्ति के रूप में काम करता है. इसलिए नाटो नोर्वेजियाई नोबेल “शान्ति” समिति ने नाटो यूरोपीय संघ के सदस्य देशों को अपना पुरस्कार दिया है, क्योंकि उसने अभी हाल ही में लीबिया के खिलाफ हमलावर युद्ध छेड़ा, ताकि वहाँ के तेल ओर गैस भंडार पर डाका डाले और इस दौरान लगभग 50,000 अफ्रीकियों को वहाँ से भगा दे. यह यूरोपीय गौरांग नस्लवादी उपनिवेशवादी साम्राज्यवाद का मामला है जो दुबारा अफ्रीका पर शिकंजा कस रहा है- फर्क सिर्फ यही है कि इस बार यह कुकृत्य बेहतर देखरेख के लिए नोबेल शान्ति पुरस्कार का ठप्पा लगा कर किया जा रहा है.


प्रोफ़ेसर फ्रांसिस ए. बोएल अंतरराष्ट्रीय न्याय के विशेषग्य हैं. वे 1998 में फिलीस्तीनी स्वतंत्रता की घोषणा के बारे में फिलीस्तीनी मुक्ति संगठन और यासिर अराफात के क़ानूनी सलाहकार थे. साथ ही, वे 1991 से 1993 तक मध्य-पूर्व शान्ति वार्ता के प्रतिनिधि थे जिस दौरान उन्होंने उस ओस्लो समझौते के लिए, जो अब बेकार हो चुका है, फिलिस्तीन की ओर से जवाबी प्रस्ताव तैयार किया था. उनकी रचनाओं में “पेलेस्टाइन, पेलेस्तिनियन एण्ड इंटरनेशनल ला” (2003) और “द पेलेस्तिनियन राइट ऑफ रिटर्न अंडर इंटरनेशनल ला” (2010) शामिल हैं.
प्रोफ़ेसर फ्रांसिस ए. बोएल ने 1976 में नोबेल शान्ति पुरस्कार के लिए नामांकन की पात्रता हासिल की थी, जब उन्होंने पहली बार हावर्ड में इंटरनेशनल ला का अध्यापन शुरू किया था.
(Countercurrents.org से आभार सहित लिया और अनूदित किया गया.)

दुनिया की अर्थव्यवस्था ढाँचागत संकट की गिरफ्त में (पांच भागों में)

पाँचवाँ भाग 

ढाँचागत संकट पूँजीवाद का व्यवस्थागत संकट है। इसमें वित्तीय महासंकट, दुनिया के अलगअलग देशों और एक ही देश के भीतर अलगअलग वर्गों के बीच बेतहाशा बढ़ती असमानता, राजनीतिक पतनशीलता और चरम भ्रष्टाचार, लोकतन्त्र का खोंखला होते जाना और राजसत्ता की निरंकुशता, सांस्कृतिक पतनशीलता, भोगविलास, पाशविक प्रवृति, अलगाव, खुदगर्जी, और व्यक्तिवाद को बढ़ावा, अतार्किकता और अन्धविश्वास का बढ़ना, सामाजिक विघटन और पहले से मौजूद टकरावों और तनावों का सतह पर आ जाना, प्रतिक्रियावादी और चरमपंथी ताकतों का हावी होते जाना तथा पर्यावरण संकट, धरती का विनाश और युद्ध की विभीषिका इत्यादि सब शामिल है। हालाँकि अपने स्वरूप, कारण और प्रभाव के मामले में इन समस्याओं की अपनीअपनी विशिष्टता और एकदूसरे से भिन्नता है, लेकिन ये सब एक ही जटिल जाला समूह में एकदूसरे से गुँथी हुई हैं तथा एक दूसरे को प्रभावित और तीव्र करती हैं। इन सबके मूल में पूँजी संचय की साम्राज्यवादी विश्व व्यवस्था है जो दुनिया भर के सट्टेबाजों, दैत्याकार बहुराष्ट्रीय निगमों और अलगअलग सरकारों के बीच साँठगाँठ और टकरावों के बीच संचालित होती है। इसका एक ही नारा हैमुनाफा, मुनाफा, हर कीमत पर मुनाफा ।वैसे तो दुनिया की तबाही के लिये आर्थिक संकट, पर्यावरण संकट और युद्ध में से कोई एक ही काफी है लेकिन  इन विनाशकारी तत्वों के एक साथ सक्रिय होने के कारण मानवता के आगे एक बहुत बड़ी चुनौती मुँह बाये खड़ी हैं। कुल मिलाकार यह संकट ढाँचागत है और इसका समाधान भी ढाँचागत बदलाव में ही है।
इस बुनियादी बदलाव के लिये वस्तुगत परिस्थिति आज जितनी अनुकूल है, इतिहास के किसी भी दौर में नहीं रही है। इस सदी की शुरुआत में रूसी क्रांति के समय पूरी दुनिया में मजदूर वर्ग की कुल संख्या दस करोड़ से भी कम थी, जबकि आज दुनिया की लगभग आधी आबादी, तीन अरब मजदूर हैं। इनमें बड़ी संख्या उन मजदूरों की है जो शहरी हैं और संचार माध्यमों से जुड़े हुए हैं। इनके संगठित होने की परिस्थिति पहले से कहीं बेहतर है। दूसरे, वैश्वीकरणउदारीकरणनिजीकरण की लुटेरी नीतियों और उनके दुष्परिणामों के चलते पूरी दुनिया में मेहनतकश वर्ग का असंतोष और आक्रोश लगातार बढ़ता गया है। इसकी अभिव्यक्ति दुनिया के कोनेकोने में निरंतर चलने वाले स्वत%स्फूर्त संघर्षों में हो रही है। तीसरे, आज उत्पादन शक्तियों का विकास उस स्तर पर पहुँच गया है कि पूरी मानवता की बुनियादी जरूरतें पूरी करना मुश्किल नहीं। फिर भी दुनिया की बड़ी आबादी आभाव ग्रस्त है और धरती विनाश के कगार पर पहुँच गयी है, क्योंकि बाजार की अंधी ताकतें और मुनाफे के भूखे भेड़िये उत्पादक शक्तियों के हाथपाँव में बेड़ियाँ डाले हुए हैं। इन्हें काट दिया जाय तो धरती स्वर्ग से भी सुन्दर हो जायेगी।

लेकिन बदलाव के लिये जरूरी शर्तमनोगत शक्तियों की स्थिति भी क्या अनुकूल है ? निश्चय ही आज दुनियाभर में वैचारिक विभ्रम का माहौल है और परिवर्तन की ताकतें बिखरी हुई हैं। ऐसे में निराशा और आशा, व्यक्तिवाद और सामूहिकता, अकेलापन और सामाजिकता, निष्क्रियता और सक्रियता, खुदगर्जी और कुरबानी, प्रगतिशीलता और प्रतिक्रियावाद, सभी तरह की प्रवृतियाँ समाज में संक्रमणशील हैं। बुनियादी सामाजिक बदलाव में भरोसा रखने वाले मेहनतकशों और उनके पक्षधर बुद्धिजीवियों का यह ऐतिहासिक दायित्व है कि जमीनी स्तर पर क्रान्तिकारी सामाजिक शक्तियों को चेतनासम्पन्न और संगठित करें। वर्तमान मानव द्रोही, सर्वनाशी सामाजिकआर्थिक ढाँचे के मलबे पर न्यायपूर्ण, समतामूलक और शोषणविहीन समाज की बुनियाद खड़ी करने की यह प्राथमिक शर्त है, जिसके बिना आज के इस चैतरफा संकट और विनाशलीला से निजात मिलना असम्भव है।

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दुनिया की अर्थव्यवस्था ढाँचागत संकट की गिरफ्त में (पाँच भागों में)

चौथा भाग

इसमें कोई संदेह नहीं कि दुनिया को तबाही की ओर ले जाने वाला विश्वव्यापी आर्थिक संकट हो, पर्यावरण विनाश का खतरा हो या युद्ध और नरसंहार से होने वाली तबाही, ये सब प्राकृतिक आपदाएँ नहीं हैं। इनके लिये दुनियाभर के शोषकों द्वारा सोचसमझ कर लागू की गयी नीतियाँ जिम्मेदार हैं। 1990 के आसपास बर्लिन की दीवार ढहने, रूसी खेमे के पतन और युगोस्लाविया के बिखराव के बाद विश्वशक्तिसंतुलन में भारी बदलाव आया। राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष और समाजवाद की ओर से 1917 की रूसी क्रांति सम्पन्न होने के बाद से ही पूँजीवादी खेमे को मिलने वाली चुनौती, वैसे तो सोवियत संघ में ख्रुश्चोव द्वारा तख्तापलट के बाद से ही लगातार क्षीण हो रही थी, अब रूसी साम्राज्यवादी खेमे की रहीसही चुनौती भी समाप्त हो गयी। इसके चलते पूरी दुनिया में अमरीकी चैधराहट वाले साम्राज्यवादी खेमे का पलड़ा भारी हो गया।

इस बदले हुए माहौल में विश्व पूँजीवाद को दुनिया के बाजार, कच्चे माल के स्रोत और सस्ते श्रम पर कब्जा जमाने का अनुकूल अवसर मिल गया। साथ ही आत्मनिर्भर विकास का सपना देखने वाले तीसरी दुनिया के तमाम शासकों ने भी हवा का रुख देखते हुए साम्राज्यवाद के आगे आत्मसमर्पण कर दिया। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष की देखरेख में वाशिंगटन आमसहमतिके नाम से एक नयी आर्थिक विश्व व्यवस्था का पुनर्गठन किया गया, जिसका मकसद सम्पूर्ण विश्व में पूँजी की लूट के मार्ग से सभी बाधाओं को एकएक कर हटाना था। तटकर और व्यापार पर आम सहमति (गैट) की जगह डंकल प्रस्ताव के अनुरूप विश्व व्यापार संगठन की स्थापना की गयी, जिसने दुनियाभर में बहुराष्ट्रीय निगमों, शेयर बाजार के निवेशकों और बैंकों की लूट का रास्ता आसान बना दिया। प्रकृति के दोहन और मानव श्रमशक्ति के शोषण की रफ्तार सारी सीमाएँ लाँघ गयी।

पूरी दुनिया पर पूँजीवाद की निर्णायक जीत और इतिहास के अंतकी दुंदुभि बजाते हुए दुनिया के पैमाने पर अतिरिक्त मूल्य की उगाही के लिये अमरीका की चैधराहट में आर्थिक नवउपनिवेशवादी व्यवस्था का एक मुकम्मिल ढाँचा तैयार किया गया। इस पिरामिडनुमा ढाँचे के शीर्ष पर अमरीका और उसके नीचे ग्रुप 7 के बाकी देश काबिज थे। उनके नीचे हैसियत के मुताबिक दूसरे पूँजीवादी देश और सबसे नीचे सम्राज्यवादी लूट और कर्जजाल में फँसकर तबाह हो चुके तीसरी दुनिया के देशों को जगह दी गयी थी। इस नये लूटतंत्र के अंदर माले गनीमत (लूट के माल) में किसे कितना हिस्सा मिलेगा, यह इस बात से तय होना था कि किस देश के पास कितनी पूँजी है और टेक्नोलॉजी का स्तर क्या है। अब संकट की घड़ी में इसकी कीमत भी अलगअलग देशों को अपनी हैसियत के मुताबिक ही चुकानी होगी, यानी क्रमश% ऊपर के पायदानों पर खड़े साम्राज्यवादी देश कम प्रभावित होंगे और सबसे गरीब, तीसरी दुनिया के देश पहले से भी अधिक तबाही के शिकार होंगे।

साम्राज्यवादी वैश्वीकरण की इन नीतियों ने पूरी दुनिया को एकाधिकारी पूँजी संचय की एक ऐसी व्यवस्था के भीतर जकड़ दिया, जिस पर कहीं से कोई अंकुश, कोई नियंत्रण नहीं रहा। यही कारण है कि इस नयी विश्व व्यवस्था में एक तरफ जहाँ अमीरीगरीबी के बीच की खाई बेहिसाब चैड़ी होती गयीदुनियाभर में अर्थव्यवस्थाएँ ठहराव और वित्तीय उथलपुथल का शिकार हुईं, दूसरी ओर हमारी धरती भी विनाश के कगार पर पहुँचा दी गयी। लेकिन इस के बावजूद, विश्व पूँजीवाद का अन्तर्निहित संकट हल होने के बजाय और भी घनीभूत, और भी असमाधेय होता गया। कारण यह कि श्रम की लूट और पूँजी संचय जितने बड़े पैमाने पर होगा, पूँजी निवेश का संकट उतना ही विकट होता जायेगा। यह एक ऐसा दुष्चक्र है, जो पूँजीवाद के प्रारंभिक दौर, मुक्त व्यापर के जमाने से ही बना रहा है। लेकिन एकाधिकारी पूँजी के मौजूदा दौर में यह संकट इसलिए असाध्य है, क्योंकि यह अब सम्पूर्ण पूँजीवादी व्यवस्था का ढाँचागत संकट बन चुका है।

प्रारम्भिक पूँजीवाद के दौर में आने वाला आवर्ती संकट और वर्तमान ढाँचागत संकट के बीच साफसाफ फर्क है। इसे स्पष्ट रूप से समझकर ही भविष्य की सही दिशा तय की जा सकती है। क्योंकि नयी और जटिल समस्याओं का समाधान पूराने सूत्रों और समीकरणों से नहीं हो सकता। आवर्ती या मीयादी संकट जब भी आता था, तो उसका समाधान पहले से स्थापित ढाँचे के भीतर ही हो जाता था, लेकिन आज का बुनियादी संकट समूचे ढाँचे को ही संकट ग्रस्त कर देता है। यह किसी एक भौगोलिक क्षेत्र या उद्योग की किसी खास शाखा तक या किसी खास अवधि तक सीमित नहीं होता। यह सर्वग्रासी होता है, जिसकी चपेट में वित्त, वाणिज्य, कृषि, उद्योग और सभी तरह की सेवाएँ आ जाती हैं।

पुराने जमाने में उच्च स्तर कि तकनोलॉजी और उत्पादकता वाले उद्योग गलाकाटू प्रतियोगिता और मंदी की मार से बच जाते थे, लेकिन एकाधिकारी वित्तीय (सटोरिया) पूँजी के वर्तमान दौर में, सर्वग्रासी संकट की घड़ी में अब ये कारक उद्धारकर्ता की भूमिका नहीं निभा सकते। उल्टे आज तकनीकी श्रेष्ठता वाले विकसित पूँजीवादी देशों में ही संकट ज्यादा गहरा है।

दूसरे, ऐसा नहीं कि मंदी एक खास अवधि तक ही बनी रहे तथा पूँजी और उत्पादक शक्तियों की क़ुर्बानी लेने के बाद फिर आर्थिक गतिविधियों का ग्राफ उठने लगे, जैसा पुराने दौर में हुआ करता था।अब तो अर्थव्यवस्था मंदी में दोहरी, तिहरी डुबकी लगाने के बाद भी उससे उबर नहीं पाती। सीमित समय के लिये चक्रीय क्रम में आने वाली मंदी अब चिरस्थायी और दीर्घकालिक चरित्र ग्रहण कर चुकी है।

तीसरे, पुराने समय में मंदी किसी एक देश या एक भौगोलिक क्षेत्र तक ही सीमित होती थी। दुनिया का बहुत बड़ा हिस्सा, जो पूँजीवादी दुनिया का अंग नहीं बना था, वहाँ भले और ढेर सारी समस्याएँ थीं, लेकिन पूँजीवादी संकट जैसी किसी चीज का अस्तित्व नहीं था। पूँजी के वैश्वीकरण के मौजूदा दौर में विश्वअर्थव्यवस्था आपस में इस तरह अंतरगुम्फित है कि धरती के किसी भी कोने से शुरू होने वाला संकट धीरेधीरे पूरी दुनिया में पाँव पसारने लगाता है। अमरीकी गृह ऋण संकट का बुलबुला फटने के बाद से अब तक की घटनाएँ इस बात की जीतीजागती मिसाल हैं।



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