Category Archives: व्यंग्य

बयान जानवरों के — इब्ने इंशा (शेर की तारीफ़)

ibne insha

शेर आए, शेर आए, दौडना !
आजकल हर तरफ शेर घूम रहे हैं !
दहाड़ रहे हैं‌‌‍.
“यह शेरे बंगाल है.”
“यह शेरे सरहद है.”
“यह शेरे पंजाब है.”

लोग भेंडे बने अपने बाड़ों में दुबके हुए हैं.
बाबा हाफीज जालंधरी का शेर पढ़ रहे हैं.

“शेरों को आजादी है
आजादी के पाबन्द रहें
जिसको चाहें चीरें-फाड़ें
खाएँ-पिएँ आनंद रहें.”

शेर या तो जंगल में रहते हैं,
या चिड़िया घर में.

यह मुल्क या तो जंगल है या चिड़िया घर है
या फिर कालीन होगा.
क्यों की एक किस्म शेर की ‘शेरे कालीन’ भी है.

या फिर कागज का होगा.
क्योंकि एक शेर ‘कागजी शेर’ भी होता है.

या फिर ये जानवर कुछ और है.
आगा शेर का पीछा भेड़ का.
हमारे मुल्क में यह जानवर आम पाया जाता है.

शेर जंगल का बादशाह है.
लेकिन बादशाहों का जमाना नहीं रहा.
इसलिए शेरोन का जमाना भी नहीं रहा.

आज कल शेर और बकरियाँ एक घाट पर पानी नहीं पीते.
बकरियाँ सींगों से खदेड़ भगाती हैं.
लोग-बाग उनकी दुम में नमदा बाँधते हैं.

शिकारी शेरों कोमार लाते हैं.
उनके सर दीवारों पर सजाते हैं.
उनकी खाल फर्श पर बिछाते हैं.
उनपर जूतों समेत दनदनाते हैं.

मेरे शेर ! तुमपर भी रहमत खुदा की
तू भी वाज (उपदेश) मत कह.
अपनी खाल में रह.

 

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योद्धा और मक्खियाँ * –लू शुन

lu shun

जर्मन दार्शनिक शौपेनहावर ने कहा है कि मनुष्य की श्रेष्ठता को आँकने के मामले में, आत्मिक श्रेष्ठता और शरीर के आकार को निर्धारित करने वाले नियम एक दूसरे के विपरीत होते हैं. हमारे लिए इसका अभिप्राय यह है कि आदमी का शरीर जितना ही छोटा होगा, उतनी ही उसकी भावनाएँ श्रेष्ठ होंगी.

ऐसा इसलिए कि करीब से देखने पर जहाँ उसकी त्रुटियाँ और घाव साफ दिखाई देते हैं, कोई आदमी नायक नहीं दिखता, बल्कि वह हमारी ही तरह लगता है, भगवान या किसी नयी प्रजाति का अलौकिक प्राणी नहीं लगता. वह महज एक आदमी होता है. लेकिन निश्चय ही इसी में उसकी महानता होती है.

जब कोई योद्धा रणक्षेत्र में धराशायी हो जाता है, तो मक्खियों को जो चीज सबसे पहले नजर आती है, वह उसकी त्रुटियाँ और घाव ही होते हैं. वे उनको भिनभिनाते हुए चूसती हैं और यह सोच कर खुश होती हैं कि वे इस पराजित नायक से ज्यादा महान हैं. और चूँकि नायक मर चुका होता है और वह उन मक्खियों को उड़ा नहीं पाता, इसलिए मक्खियाँ और जोर-जोर से भिनभिनाती हैं और कल्पना करती हैं कि वे अमर संगीत का सृजन कर रही हैं, क्योंकि वे उस मृत नायक से अधिक पूर्ण और उत्तम हैं.

सही है कि मक्खियों की त्रुटियों और घावों पर कोई भी ध्यान नहीं देता.

हालाँकि अपनी तमाम त्रुटियों और घावों के बावजूद योद्धा तो योद्धा ही होता है, जबकी अत्यंत परिपूर्ण और उत्तम मक्खियाँ भी आखिरकार मक्खियाँ ही होती हैं.

भिनभिनाओ, मक्खियो! भले ही तुम्हारे पास पंख हों और भले ही तुम्हारे पास भिनभिन करने की क्षमता हो, लेकिन तुम जैसे कीड़े-मकोड़े किसी योद्धा के मुकाबिल नहीं हो सकते!

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* यहाँ योद्धा  डॉ. सुन यात-सेन और 1911 की क्रान्ति के शहीदों को कहा गया है, जबकि मक्खियाँ प्रतिक्रियावादियों के भाड़े के टट्टुओं को .

(अनुवादक– दिगम्बर)

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