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हमारा नायक : वाल्टर बेंजामिन

-एलिफ शफक

(शब्दों  के कीमियागर :निबंधकार और आलोचक वाल्टर बेंजामिन )

जब मैं कॉलेज में पढ़ती थी, तभी मैंने वाल्टर बेंजामिन को पढना शुरू किया. साहित्य समीक्षक, दार्शनिक, निबंधकार, एक शब्द-शिल्पी थे. एक जर्मन यहूदी के रूप में उनका जन्म उथलपुथल भरे दौर में, 19 वीं सदी के अंतिम दिनों में, एक बेहद खतरनाक जगह, बर्लिन में हुआ था.


हालाँकि अपने जीवनकाल में उनको जानने वाले पाठकों-श्रोताओं की संख्या बहुत ही सीमित थी, लेकिन मृत्यु के बाद उनकी ख्याति आसमान छूने लगी. मुझे याद है कि उनकी किताब- आर्केड प्रोजेक्ट (तोरणपथ की परियोजना) के तुर्की संस्करण का मैंने कितनी बेकरारी से इंतजार किया था. उस किताब ने मेरे पिट्ठू बैग में मेरे साथ हर जगह सफर किया, उसके पन्नों के फटे किनारे, उन पर सिगरेट से जलने के छींटे और कॉफी के धब्बे, और एक बार रौक संगीत समारोह के दौरान वह बारिश में भींग भी गयी. उस साल मैंने काल्पनिक और गैर-काल्पनिक, जितनी भी किताबें पढीं, उनमें कोई भी इतनी धज्जी-धज्जी, इतनी गहराई तक दिल को छूने वाली नहीं थी.
  
बेंजामिन एक तरह के कीमियागर थे, मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों में सबसे असाधारण, सबसे अलग. उन्होंने साहित्य को दर्शन के साथ, धर्म द्वारा उठाये गए सवालों को धर्मनिरपेक्षता के साथ, बामपंथी विरोध को रहस्यवाद के साथ, जर्मन आदर्शवाद को ऐ पर चलना, खंडहरों के भीतर से आने वाली जिंदगी के किसी संकेत को सुनना है. उदासी उनके अस्तित्व के आतंरिक भाग का गठन करती है. एक शाम एक शून्यवादी पुरुष दोस्त पी के बहकने लगा और दीवार पर टंगी बेंजामिन की तस्वीर के आगे चिल्लाने लगा- “मुस्कुराओ मिस्टर बेंजामिन! दुनिया को अपने कंधों पर ढोने की कोई जरुरत नहीं. अब तुम मर चुके हो, विश्राम करो!” फिर उसने अपनी शराब का गिलास उनके ऊपर दे मारा, जिसे शायद वह मेरी ओर फेंकने वाला था. मैंने सारी गन्दगी साबुन से साफ की, लेकिन बेंजामिन के चश्मे पर एक लाल धब्बा रह गया और उनकी तस्वीर ऐसी लगने लगी मानो वे हर चीज को लाल शीशे के जरिये देखना चाहते हों.

भगवान, प्रगति, सभ्यता, कोई चीज नहीं थी जिस पर वे संदेह न करते हों, यहाँ तक कि खुद अपने आप पर भी. विराट बौद्धिकता के धनी होते हुए भी वे बहुत ही सीधे-सरल और उद्विग्न थे. यहूदी रहस्यवाद के सिरमौर जेर्सोम स्कोलेम सोचते थे कि बेंजामिन एक अत्यंत विशिष्ट आत्मा थे, लेकिन वे उन वामपंथियों के खेमे में क्यों शामिल हो गए? ब्रेख्त के मन में उनके लिए अपार श्रद्धा थी, लेकिन वे समझ नहीं पाये कि वे रहस्यवादियों के इर्दगिर्द क्या करते हैं. और दो दुनिया के बीच, उन लोगों की भाषा का अनुवाद करते हुए जो कभी एक भाषा नहीं बोल सकते, बेंजामिन आपनी राय पर कातिहासिक भौतिकवाद के साथ, निराशा को रचनाशीलता के साथ घुला-मिला दिया…. गेटे, फ्रौस्ट, काफ्का और बौदेलेयर के बारे में वे विशेषज्ञ थे, लेकिन उन्होंने जीवन की छोटी-छोटी और साधारण चीजों पर भी काफी बिस्तार से लिखा. वे गजदंती मीनारों के दार्शनिक नहीं थे. ज्यों-ज्यों आप उनको पढते जाते, अमूमन  आप उन्हें सडकों पर भटकते, लोगों की बातें सुनते, नोट करते, चित्र बनाते, निरंतर जानकारी इकठ्ठा करते हुए पाते हैं.
कोई पाठक उन्हें अच्छा लगने के लिए नहीं पढता. वह महसूस करने के लिए पढता है. उनके संसार में कोई भी चीज जैसी दिखती है वैसी नहीं. उनके यहाँ सतह से आगे जाने और मानवता से जुडने की तीव्र आवश्यकता है. उनकी नजर में जिंदगी जीना मलवे के ढेर पर चलना, खंडहरों के भीतर से आने वाली जिंदगी के किसी संकेत को सुनना है. उदासी उनके अस्तित्व के आतंरिक भाग का गठन करती है. एक शाम एक शून्यवादी पुरुष दोस्त पी के बहकने लगा और दीवार पर टंगी बेंजामिन की तस्वीर के आगे चिल्लाने लगा- “मुस्कुराओ मिस्टर बेंजामिन! दुनिया को अपने कंधों पर ढोने की कोई जरुरत नहीं. अब तुम मर चुके हो, विश्राम करो!” फिर उसने अपनी शराब का गिलास उनके ऊपर दे मारा, जिसे शायद वह मेरी ओर फेंकने वाला था. मैंने सारी गन्दगी साबुन से साफ की, लेकिन बेंजामिन के चश्मे पर एक लाल धब्बा रह गया और उनकी तस्वीर ऐसी लगने लगी मानो वे हर चीज को लाल शीशे के जरिये देखना चाहते हों.

भगवान, प्रगति, सभ्यता, कोई चीज नहीं थी जिस पर वे संदेह न करते हों, यहाँ तक कि खुद अपने आप पर भी. विराट बौद्धिकता के धनी होते हुए भी वे बहुत ही सीधे-सरल और उद्विग्न थे. यहूदी रहस्यवाद के सिरमौर जेर्सोम स्कोलेम सोचते थे कि बेंजामिन एक अत्यंत विशिष्ट आत्मा थे, लेकिन वे उन वामपंथियों के खेमे में क्यों शामिल हो गए? ब्रेख्त के मन में उनके लिए अपार श्रद्धा थी, लेकिन वे समझ नहीं पाये कि वे रहस्यवादियों के इर्दगिर्द क्या करते हैं. और दो दुनिया के बीच, उन लोगों की भाषा का अनुवाद करते हुए जो कभी एक भाषा नहीं बोल सकते, बेंजामिन आपनी राय पर कायम रहे, अपने अकेलेपन में भी खूबसूरत.

जब नाजियों ने अपनी सत्ता मजबूती से कायम कर ली और इंसानियत का सामना, विवेक के बदले पागलपन, सद्भावना के बदले कट्टरता से हुआ, तब जो आदमी अपने पुस्तकालय से अलग रह कर जी नहीं पता था, अपना वतन छोड़ना पड़ा. यूरोप के एक छोर से दूसरे छोर तक की यात्रा खतरों से भरी थी. 26 सितम्बर 1940 को, फ़्रांस-स्पेन सरहद पर बीजा मिलने का इंतजार करते हुए उन्होंने आत्महत्या कर ली. अचानक उन्होंने और इंतजार न करने, और अधिक शक न करने का फैसला ले लिया.

(द गार्जियन में 27 अप्रैल 2012 को प्रकाशित ख्यातिलब्ध तुर्क लेखिका एलिफ शफक के लेख का अनुवाद- दिगम्बर)

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