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क्या है जो मजदूर वर्ग को क्रांतिकारी बनाता है?

-माइकल ए. लेबोवित्ज़

ऐसा क्या है जो मजदूर वर्ग को क्रांतिकारी बनाता है? वह हीगल का रहस्यवाद नहीं है कि यह एक सर्वव्यापी वर्ग या निरपेक्ष आत्मा की भौंडी नकल है. ऐसा भी नहीं कि मजदूर वर्ग अपनी भौतिक स्थिति की वजह से ही क्रांतिकारी है, यानी उद्योग के पहियों को जाम कर देने के लिये कूटनीति तौर पर उसे वहां बहाल किया गया है.

इसमें ज्यादा हैरत की बात नहीं है कि ये अच्छी-बुरी सारी व्याख्यायें बहुत थोड़े लोगों को ही कायल बना पाती हैं. निश्चय ही, कुछ ऐसे लोग भी हैं जो पहले इस बात की बहुत अच्छी तरह व्याख्या करते थे कि मजदूर वर्ग क्रांतिकारी क्यों है, लेकिन अब वे कहते हैं कि मजदूर वर्ग का समय आया और चला गया. उदाहरण के लिये, कुछ लोग यह मानते हैं कि, एक ज़माने में, पूंजी मजदूरों को सकेंद्रित करती थी, उन्हें एक साथ आने, संगठित होने और संघर्ष करने का अवसर प्रदान करती थी; मगर, अब पूंजी ने मजदूरों को विकेन्द्रीकृत कर दिया है और उन्हें एक-दूसरे के खिलाफ इस तरह खड़ा कर दिया है कि अब वे साथ मिलकर संघर्ष नहीं कर पाते. एक ज़माना था, जब मजदूरों के पास खोने के लिये अपनी बेड़ियों के सिवा कुछ भी नहीं था. लेकिन  अब पूंजीवाद ने उसे अपने अंदर समाहित कर लिया है, वह अब उपभोक्तावाद की जकड़बंदी में है और उसके उपभोग के सामान ही अब उसके मालिक हैं और वे ही उसका इस्तेमाल करते हैं.    
जो लोग यह नतीजा निकालते हैं कि मजदूर वर्ग अब इसलिए क्रांतिकारी नहीं रह गया क्योंकि पूंजीवाद ने उसे रूपांतरित कर दिया है, वे यह दर्शाते हैं कि उन्हें मार्क्सवाद की रत्ती भर भी समझ नहीं है. अपने संघर्षों के जरिये ही मजदूर वर्ग खुद को क्रांतिकारी बनाता है – खुद को रूपांतरित करता है. हमेशा से यही मार्क्स का दृष्टीकोण था – उनका “क्रांतिकारी व्यवहार” कि अवधारणा, जिसके दौरान हालात भी बदलते हैं और साथ ही साथ खुद मजदूर वर्ग में भी बदलाव आते हैं. अपने संघर्षों के जरिये ही मजदूर वर्ग खुद को बदलता है. वह खुद को नयी दुनिया का निर्माण करने के लायक बनाता है.

लेकिन मजदूर संघर्ष क्यों करते हैं? मजदूरों के सभी संघर्षों में एक ही बुनियादी बात है जिसे मार्क्स “विकास के लिए मजदूरों की अपनी जरुरत” कहते हैं. हम जानते हैं कि मार्क्स का यह मानना था कि वेतन-भत्ते के संघर्ष अपने आप में अपर्याप्त हैं. लेकिन वह यह भी मानते थे कि इन संघर्षों में शामिल न होना, मजदूरों को “उदासीन, विचारहीन और कमोबेश उत्पादन के खाते-पीते उपकरण” बना देगा. मार्क्स का तर्क था कि संघर्षों के अभाव में मजदूर “उदास, मानसिक रूप से कमज़ोर, क्लांत और विरोध न करने वाली भीड़” बनकर रह जायेंगे. संघर्ष उत्पादन की एक प्रक्रिया हैं- जो एक अलग तरह के मजदूर का निर्माण करती है, एक ऐसा मजदूर जो अपने आप को उत्पादित करता/करती है, एक ऐसे व्यक्ति के रूप में, जिसका सामर्थ्य बढ़ता है, आत्मविश्वास विकसित होता है और जिसकी संगठित होने और आपस में जुड़ने की क्षमता विस्तृत होती है. लेकिन हम ऐसा क्यों सोचते हैं कि यह संघर्ष सिर्फ वेतन-भत्ते की लड़ाई तक ही सीमित है? हर एक संघर्ष जिसमें लोग खुद हि मजबूती से डटे रहते हैं, हर एक संघर्ष जिसमें लोग सामाजिक न्याय पर जोर देते हैं, हर एक संघर्ष जिसमें वे खुद अपनी संभावनाओं और अपने विकास की जरुरत समझते हैं, उसमें शामिल लोगों के सामर्थ्य को बढ़ाते हैं.      
      इतना ही नहीं, ये संघर्ष हमें पूंजी के खिलाफ खड़ा करते हैं. क्यों? क्योंकि पूंजी एक ऐसा  अवरोध है जो हम सब के बीच और हमारे खुद के विकास के बीच बाधा बन कर खड़ी होती है. और ऐसा इसलिये है कि पूंजी ने सारी सभ्यताओं से हासिल उपलब्धियों को अपने कब्जे में कर लिया है, क्योंकि यह सामाजिक मष्तिस्क और सामाजिक श्रम का मालिक बन बैठी है, और यह हमारे उत्पादों को और मजदूरों के उत्पादों को हमारे ही खिलाफ खड़ा कर देती है; जिसके पीछे  सिर्फ एक ही मकसद होता है, खुद का फायदा – यानी मुनाफा. अगर हमें अपनी जरूरतों को पूरा करना है और अपनी क्षमता का विकास करना है, तो हमें पूंजी के खिलाफ संघर्ष करना जरूरी है  और इसी के दौरान हम मजदूर खुद को क्रांतिकारी बनाते हैं.  

लेकिन हम लोग कौन हैं? वह मजदूर वर्ग कौन है जो क्रांतिकारी है? आपको पूँजी के अंतर्गत इसका जवाब नहीं मिलेगा. मार्क्स की पूंजीमजदूर वर्ग के बारे में नहीं है – सिवाय इसके कि मजदूर वर्ग उसका एक लक्ष्य है. पूंजी में जिस चीज की ब्याख्या की गयी है वह है पूंजी की प्रकृति, इसका लक्ष्य और इसकी गतिकी. मगर मजदूर वर्ग के बारे में यह सिर्फ इतना ही बताती है कि पूंजी मजदूर वर्ग के खिलाफ काम करती है. और चूँकि वह मजदूर वर्ग को एक विषय के तौर पर पेश नहीं करती, इसलिये वह इस बात पर केंद्रित नहीं है कि पूंजी अपने इस मातहत के खिलाफ कैसे लड़ती है. इसके लिये हमें मार्क्स की दूसरी रचनाओं और उनकी टिप्पणियों को देखना होगा कि कैसे पूंजीपति वर्ग मजदूरों को बाँटकर और उन्हें अलग-थलग करके अपनी सत्ता बनाये रखता है (विशेष तौर पर अंग्रेज और आयरिश मजदूरों को). और, हालाँकि मार्क्स ने स्पष्ट तौर पर टिप्पणी की है कि “पूंजी की समकालीन सत्ता” मजदूरों में नयी जरूरतें पैदा करने पर ही “पूंजी की समकालीन सत्ता निर्भर” है, लेकिन उन्होंने किसी भी  जगह इस प्रश्न की जांच-पड़ताल नहीं की है.  

इसलिये, समकालीन मजदूर वर्ग की प्रकृति एक ऐसा महत्वपूर्ण प्रश्न है जिसका जवाब किसी किताब में नहीं ढूंढा जा सकता. हमें खुद ही इस सवाल का जवाब तलाशना होगा. आज कौन है जिसके पास पूंजी नहीं है? कौन है जो उत्पादन के साधनों से अलग है और जो अपने अस्तित्व को बचाने के लिये पूंजी के आगे एक याचक की तरह खड़ा होता है? निश्चय ही, इसमें सिर्फ वही शामिल नहीं है जो पूंजी को अपनी श्रम शक्ति बेचता है, बल्कि वे भी शामिल हैं जिनकी हैसियत पूंजी को अपनी श्रम शक्ति बेचने लायक भी नहीं हैं – सिर्फ शोषित मजदूर ही नहीं, बल्कि वे भी जिन्हें हासिये पर फेंक दिया गया है. और निश्चय ही, इसमें वे भी शामिल हैं, जो बेरोजगारों की विशाल आरक्षित सेना मौजूद होने के चलते, पूंजी के विस्तार के अधीन काम करते हैं और सारा जोखिम खुद ही उठाने को मजबूर हैं – अर्थात जो लोग अनौपचारिक (असंगठित) क्षेत्र में अपने अस्तित्व के लिये संघर्षरत हैं. भले ही वे फैक्ट्री में काम करने वाले पुरुष मजदूर के घिसेपिटे मानदण्ड पर खरे नहीं उतारते हों, क्योंकि यह मानदण्ड तो हमेशा से ही गलत था.                

निश्चय ही, हमें मजदूर वर्ग की विविधतापूर्ण प्रकृति की पहचान करने से शुरु करना होगा. क्योंकि मार्क्स जानते थे कि मजदूर वर्ग के बीच के मतभेद पूंजी के शासन का जारी रहना संभव बनाते हैं. लेकिन मार्क्स यह भी जानते थे कि संघर्षों के दौरान ही हमारी एकता का निर्माण होता है. और हम अपने खुद के विकास की जरुरत के सामूहिक लक्ष्य को पहचान कर और यह पहचान कर कि “प्रत्येक व्यक्ति का स्वतंत्र विकास सभी के स्वतंत्र विकास की जरूरी शर्त है”, उस एकता का निर्माण कर सकते है. हमें यह विश्वास दिलाकर कि पूँजीवाद का कोई विकल्प नहीं है, पूंजी विचारों की इस लड़ाई को जीतती आ रही है और जो लोग मजदूर वर्ग को क्रांतिकारी मानने से इंकार करते हैं, वे इस काम में पूँजी के मददगार हैं. हालाँकि, अपने  विकास के अधिकार पर जोर देकर हम विचारों की इस लड़ाई को लड़ सकते हैं. मार्क्स और एंगल्स यह जानते थे कि मजदूरों से “अपने अधिकारों के लिये लड़ने का आह्वान करना ‘उन्हें’, क्रांतिकारी, संगठित समूह में ढालने का एक साधन मात्र है.” हमारे पास जीतने के लिये एक पूरी दुनिया है – वह दुनिया जिसका हम हर रोज निर्माण करते हैं.
(माइकल ए. लेबोवित्ज़ वेंकूवर (कनाडा) के साईमन फ्रेसर विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के अवकाशप्राप्त प्रोफेसर और बियोंड कैपिटल, बिल्ड ईट नाउ, और द सोसिअलिस्ट अल्टरनेटिव सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं. यह लेख उनकी किताब बियोंड कैपिटल के आने वाले ईरानी संस्करण का प्राक्कथन है. मंथली रिव्यू के प्रति आभार सहित. अनुवाद- दिनेश पोसवाल)

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दुनिया का ‘सबसे गरीब’ राष्ट्रपति : जोसे मुजिका

जोसे मुजिका का खेत में बना मकान, उनकी पत्नी और कुत्ता (फोटो- बीबीसी)
व्लादिमीर हर्नान्डेज

यह एक आम शिकायत है कि राजनीतिज्ञों की जीवनशैली उन लोगों से बिलकुल अलहदा होती है जो उन्हें चुनते हैं. लेकिन उरूग्वे में ऐसा नहीं है. यहाँ के राष्ट्रपति से मिलें– जो खेत में बने एक जर्जर मकान में रहते हैं और अपनी तनख्वाह का बड़ा हिस्सा दान कर देते हैं.

अपने कपड़े वे खुद ही धोकर घर के बाहर सूखाते हैं. पानी उनके अहाते में बने कुएँ से आता है, जहाँ घास-फूस फैली रहती है. सिर्फ दो पुलिस अधिकारी और एक तीन टांग वाला कुत्ता, मनुएला बाहर रखवाली करते हैं.

यह उरूग्वे के राष्ट्रपति, जोसे मुजिका का घर है जिनकी जीवनशैली दुनिया के दूसरे नेताओं से साफ तौर पर बिलकुल अलग है.

राष्ट्रपति मुजिका ने उस आरामदेह निवास को त्याग दिया जो उरूग्वे की सरकार अपने नेताओं को उपलब्ध कराती है और उन्होंने राजधानी के बाहर मोंटेवीडियो में, धूलभरी सड़क पर स्थित, अपनी पत्नी के खेत में बने घर में रहने का विकल्प चुना.

राष्ट्रपति और उनकी पत्नी जमीन पर खुद खेती करते हुए, फूल उगाते हैं.

इस सीधी-सरल जीवनशैली और इस तथ्य ने कि मुजिका अपनी मासिक तनख्वाह का 90 फीसदी, यानी लगभग 12,000 डॉलर, परोपकार के लिये दान कर देते हैं – मुजिका पर दुनिया के सबसे गरीब राष्ट्रपति होने का तमगा लगा दिया है.

बगीचे में एक पुरानी कुर्सी पर अपने प्यारे कुत्ते मनुएला को तकिये की तरह बगल में लिटाकर बैठे, वे कहते हैं, “मैंने अपना ज्यादातर जीवन इसी तरह जिया है.”

“मेरे पास जो कुछ है, उससे मैं अच्छी तरह जी सकता हूँ.”

उनकी तनख्वाह एक औसत उरूग्वेवासी की मासिक आय लगभग 775 डॉलर के बराबर है. 2010 में, उनकी घोषित वार्षिक आय– उरुग्वे में अधिकारियों के लिये इसकी घोषणा करना अनिवार्य है– 1800 डॉलर थी, जो उनकी 1887 मॉडल फ़ोल्क्सवेगन बीटल मोटर गाड़ी की कीमत है.

इस साल उन्होंने इस सम्पत्ति में अपनी पत्नी की आधी सम्पत्ति को भी शामिल कर लिया है, जिसमें जमीन, ट्रेक्टर्स और एक घर शामिल है. इसके कारण उनकी कुल सम्पत्ति बढ़कर 2,15,000 डॉलर हो गयी, जो अभी भी उप-राष्ट्रपति डनिलो एस्टोरी की घोषित सम्पति का सिर्फ दो-तिहाई, और मुजिका के पूर्ववर्ती राष्ट्रपति, तबारे वास्कुएज़ की सम्पत्ति से एक-तिहाई कम है.

2009 में निर्वाचित, मुजिका ने 1960 और 1970 के दशक उरूग्वे के टुपामारोस गुरिल्ला के सदस्य के रूप में बिताये. यह क्यूबा की क्रांति से प्रेरित एक वामपंथी सशस्त्र संगठन था. उन्हें छह बार गोली लगी और उन्होंने १४ साल जेल में बिताये. उनके कारावास का ज्यादातर समय कठोर परिस्थितियों और एकांतवास में गुजरा, जब १९८५ में उरूग्वे में जनतंत्र की बहाली हुयी और उन्हें आजाद कर दिया गया, तबतक.

मुजिका कहते है, जेल में बिताये गये उन वर्षों के दौरान ही उन्हें जीवन के प्रति अपना नजरिया गढ़ने में मदद मिली.

“मुझे ‘सबसे गरीब राष्ट्रपति’ कहा जाता है, परन्तु मैं गरीब महसूस नहीं करता. गरीब लोग वे हैं जो सिर्फ एक महंगी जीवनशैली को बनाये रखने के लिये काम करते हैं, और हमेशा पहले से ज्यादा हासिल करना चाहते हैं,” वह कहते हैं.

उनका मानना है कि “यह आज़ादी का मामला है. अगर आपके पास बहुत ज्यादा सम्पति नहीं है, तब आपको उसे बनाये रखने के लिये एक गुलाम की तरह सारी उम्र काम करने की जरुरत नहीं है और इस तरह आपके पास अपने लिये ज्यादा वक्त होता है.”

“मैं एक पागल और सनकी बूढ़ा आदमी लग सकता हूँ. लेकिन यह एक अपनी मर्जी से चुना गया विकल्प है.”

उरूग्वे के इस नेता ने इस साल जून में सम्पन्न, रियो+२० सम्मेलन में दिये गये अपने व्याख्यान में भी इसी तरह की बात रखी- “हम पूरी दोपहरी टिकाऊ विकास के बारे में बातें करते रहे. आम आदमी को गरीबी से उबारने के बारे में बातें करते रहे.

“लेकिन हम क्या सोच रहे हैं? क्या हम अमीर देशों के विकास और उपभोग के माडल को अपनाना चाहते हैं? अब मैं आपसे पूछता हूँ- इस ग्रह का क्या होगा अगर अमेरिकी महाद्वीप के हर मूलनिवासियों के घर में उसी अनुपात में कारें होंगी जितनी जर्मनी वालों के पास हैं? तब हमारे पास कितनी आक्सीजन शेष बचेगी?

“क्या इस ग्रह के पास इतने पर्याप्त संसाधन है कि सात या आठ अरब लोग उसी स्तर पर उपभोग और फिजूलखर्ची कर सकें, जैसा कि आज हम अमीर समाजों में देखते हैं? यह अत्याधिक-उपभोग का स्तर है जो हमारे ग्रह को हानि पहुँचा रहा है.”

मुजिका दुनिया के ज्यादातर नेताओं में “उपभोग के सहारे विकास हासिल करने के प्रति अंधा जूनून होने,” का इल्जाम लगाते हैं, “मानो इसका उल्टा हो, तो दुनिया का अन्त हो जायेगा.”

मुजिका अपने पूर्ववर्तियों की तरह एक विशाल आधिकारिक निवास में रह सकते थे. लेकिन शाकाहारी मुजिका और दूसरे नेताओं के बीच का अंतर भले ही कितना ज्यादा हो, वह अपने राजनैतिक जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव के मामले में उनसे ज्यादा सुरक्षित नहीं हैं.

इस संबंध में उरूग्वे के एक मतदान सर्वेक्षक इग्नासियो जुआस्नाबर कहते हैं- “क्योंकि जिस तरह वह रहते हैं उसकी वजह से बहुत से लोग राष्ट्रपति मुजिका से सहानुभूति रखते हैं. लेकिन इससे उनकी इस बात के लिए आलोचना रुक नहीं जाती कि उनकी सरकार कैसा काम कर रही है.” उरूग्वे के विपक्षी दल कहते हैं कि देश की हालिया आर्थिक सम्रद्धि के बावजूद स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में सार्वजनिक सेवाओं में बेहतर बदलाव नहीं आया है. शायद यही कारण है कि 2009 में चुनाव के बाद से पहली बार मुजिका की लोकप्रियता 50 फीसदी से भी नीचे गिर गयी है.

इस साल दो विवादित कार्यवाहियों के चलते उन्हें काफी आलोचना का सामना करना पड़ा. उरूग्वे की कांग्रेस ने हाल ही में एक बिल पास किया, जिसमे १२ हफ़्तों तक के भ्रूण का गर्भपात कराना क़ानूनी रूप से वैध बना दिया गया है. अपने पूर्ववर्तियों के विपरीत, मुजिको ने इसे वीटो नहीं किया.

ऐसा करने बजाय, उन्होंने अपनी पत्नी के मकान पर ही रुके रहने का विकल्प चुना.

वह भांग के उपभोग को क़ानूनी वैधता दिलाने की बहस का भी समर्थन कर रहे हैं, एक ऐसा बिल जो राष्ट्र को इसके व्यापार पर एकाधिकार भी दिला देगा.

“भांग का उपभोग सबसे ज्यादा चिंता की बात नहीं है, नशीली दवाओं का व्यापार वास्तविक समस्या है,” वह कहते हैं.

फिर भी, उन्हें अपनी लोकप्रियता की रेटिंग को लेकर ज्यादा चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है – उरूग्वे के कानून के मुताबिक वह 2014 में फिर से चुनाव नहीं लड़ सकते. और चूँकि वे 77 साल के हैं, इसलिए शायद वे उससे पहले ही रिटायर हो जायेंगे.

जब वह रिटायर होंगे, तब वह राष्ट्र से मिलने वाली पेंशन के अधिकारी होंगे– और दूसरे पूर्व राष्ट्रपतियों के विपरीत, उन्हें आय में होने वाली कमी का अभ्यस्त होने में ज्यादा परेशानी नहीं होगी.

टुपामारोस गुरिल्ला

· प्रारम्भ में गरीब गन्ना कामगारों और विद्यार्थियों को मिलाकर इस वामपंथी गुरिल्ला दल का गठन किया गया.

· इंका राजा टुपाक अमारू के नाम पर इसका नामकरण किया गया.

· राजनैति़क अपहरण इनकी मुख्य रणनीति थी– 1971 में ब्रिटेन के राजदूत जिओफ्री जैक्सन को आठ महीने तक कैद में रखा.

· 1973 में राष्ट्रपति जुआन मारिया बोरडाबेरी के तख्तापलट के बाद इसे कुचल दिया गया.

· मुजिका जेल जाने वाले कई विद्रोहियों में से एक थे, उन्होंने ने 14 साल सलाखों के पीछे बिताये – जब तक 1985 में संवैधानिक सरकार की वापसी हुयी.

· उन्होंने टुपामारोस को एक क़ानूनी राजनैतिक पार्टी में रूपांतरित करने में मुख्य भूमिका निभायी, जो फ्रंटे अम्प्लियो (व्यापक मोर्चे) गठबंधन में शामिल हो गया.

(बीबीसी न्यूज से साभार. अनुवाद- दिनेश पोसवाल)

वे कुछ भी नहीं देखते, कुछ भी याद नहीं करते

-मार्कंडेय काटजू


रौ में है रख्शे-ऐ-उम्र कहाँ देखिये थमे
नै हाथ बाग पर है, न पा है रकाब में
मिर्ज़ा ग़ालिब का यह शेर सारतः आज के भारत की ऐतिहासिक परिस्थितियों को प्रतिबिंबित करता है.
“रौ” का मतलब है रफ़्तार, “रख्श” का मतलब है घोड़ा (?), “उम्र” का मतलब है समय (इसका मतलब जिन्दगी भी है, लेकिन यहाँ इसका मतलब समय या युग है), “बाग” का मतलब घोड़े का “लगाम” और “रकाब” का मतलब पैर रखने का कुंडा.
इस तरह इस शेर का मतलब है- “समय का घोड़ा सरपट दौड़ रहा है, देखें यह कहाँ जा कर रुकता है/ घुड़सवार के हाथों में लगाम है, न उसके पैर ही कुंडे में हैं.”
ग़ालिब संभवतः 1857 के महान विप्लव के दौर में होने वाली घटनाओं के विषय में लिख रहे थे, जब घटनाएँ सरपट भाग रही थीं. लेकिन ग़ालिब की शायरी की खूबसूरती यही है (जो उर्दू की ज्यादातर शायरी में दिखती है) कि यह स्थान और काल के मामले में सर्वकालिक है.
आज के भारत में, इतिहास की रफ़्तार तेज हो गयी है. घटनाएँ पहले की तुलना में तेजी से घटित हो रही हैं और हर कोई अचम्भे में है कि आखिर इनका अंत कहाँ होगा.
मीडिया में एक के बाद एक घोटाले की रिपोर्ट आ रही है, जिनमें अमूमन उन राजनेताओं के लिप्त होने की बात होती है जो समाज के गरीब और वंचित तबकों के नाम पर कसमें खाते हैं.
टैलीरां (फ़्रांसिसी कूटनीतिग्य) ने बोर्बों वंश के राजाओं के बारे में कहा था कि उन्होंने- “कुछ भी नहीं देखा, कुछ भी याद नहीं किया और कुछ भी नहीं भूला.” अधिकतर भारतीय राजनेता भी आज किसी बोर्बों की याद दिलाते हैं. वे अपने खिलाफ बढ़ते जनाक्रोश को नहीं देख रहे हैं, जो सारी हदें पर करता जा रहा है. वे इस बात को याद नहीं करते कि बोर्बों शासकों, हैप्सबर्गों और रोमोनोवों का क्या हश्र हुआ (पता नहीं, उन्हें इनके बारे में कुछ मालूम भी है या नहीं). और वे अपनी सत्ता और धन-दौलत को नहीं भूलते, वे यही सोचते हैं कि यह सब हमेशा कायम रहेगा, जैसा कि दुर्भाग्य के शिकार उपरोक्त राजवंशों के लोग सोचा करते थे.
अर्थव्यवस्था निर्णायक कारक है. योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने हाल ही में कहा कि भारतीय सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर में गिरावट आते-आते अब वह 5.5 फीसदी पर ठहर गयी है. यह सुहावनी तस्वीर स्टैण्डर्ड एंड पुअर की इस चेतावनी के एकदम विपरीत है जिसमें कहा गया है कि 24 महीने में भारतीय अर्थव्यवस्था का संप्रभु कर्ज मूल्यांकन (क्रेडिट रेटिंग) घट कर “रद्दी हालत” में पहुँच जायेगा.
जिस चीज को डॉ. अहलुवालिया जैसे अर्थशास्त्री नहीं देखते, वह यह है कि भारत में समस्या  उत्पादन को कैसे बढ़ाया जाय, यह नहीं है (भारी संख्या में इन्जीनियरों और तकनीशियनों तथा विपुल प्राकृतिक संसाधनों को देखते हुए इसे बड़ी आसानी से बढ़ाया जा सकता है) बल्कि समस्या यह है कि भारतीय जनता की क्रय शक्ति कैसे बढ़ाई जाय. आख़िरकार, जो भी उत्पादन होता है, उसे बेचना भी तो होता है, लेकिन बिकेगा कैसे, जबकि हमारी 75-80 फीसदी जनता गरीब है, जो लगभग 25 रुपये रोज पर गुजार-बसर करती है?
यही नहीं, अगर सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि केवल धनी लोगों को और अधिक धनी बनाने के काम आती हो, जबकि गरीब जनता महंगाई के चलते और भी कंगाल होती जा रही हो, तो जाहिर है कि तैयार होने वाला माल बिक ही नहीं सकता, क्योंकि लोगों में खरीदने की क्षमता नहीं है.
हाल के महीनों में, भारत के विनिर्माण क्षेत्र में गिरावट आयी है. निर्यातोन्मुख उद्योगों को खास तौर पर करारा झटका लगा है, क्योंकि पश्चिमी देशों में मंदी आई हुई है.
भारत की तुलनात्मक स्थिरता का आधार आबादी का महज 15-20 फीसदी मद्ध्यम वर्ग है, जिसकी कुल संख्या, 120 करोड़ की भारी आबादी में लगभग 20-25 करोड़ होगी. हमारे माल और सेवाओं को यही तबका बाजार माँग मुहय्या करता है. आसमान छूती महंगाई के चलते इस मद्ध्यम वर्ग की क्रय शक्ति में भी गिरावट आ रही है. इसी का नतीजा है कि भारतीय स्थिरता की जमीन तेजी से खिसक रही है, जिसे हालिया आन्दोलनों में देखा जा सकता है.
विकराल गरीबी, भारी पैमाने पर बेरोजगारी, आसमान छूती महंगाई, ग़रीबों के इलाज का आभाव, किसानों की आत्महत्याएँ, बाल कुपोषण, इत्यादि, इन सब से एक विस्फोटक मिश्रण तैयार हुआ है. अगर बोर्बों अब भी नहीं जागे (फ़िलहाल जिसकी कोई उम्मीद मुझे दिख नहीं रही है) तो आने वाले समय में, भारत एक लम्बे समय तक चलने वाले उथल-पुथल और अराजकता की गिरफ्त में होगा, और अब वह दिन बहुत दूर नहीं.
(मार्कंडेय काटजू सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और प्रेस काउन्सिल ऑफ इण्डिया के अध्यक्ष हैं. द हिंदू में प्रकाशित अंग्रेजी लेख की साभार प्रस्तुति. अनुवाद- दिगम्बर.)   

अमीरों की मितव्ययिता                   

–पी. साईनाथ
           
योजना आयोग के अनुसार अगर एक ग्रामीण भारतीय प्रतिदिन २२ रुपये ५० पैसे खर्च करता है तो वह गरीब नहीं माना जायेगा, जबकि पिछले साल मई और अक्टूबर के बीच इसी योजना आयोग के उपाध्यक्ष की विदेश यात्राओं पर २.०२ लाख रुपये रोजाना औसत खर्च आया है.

खर्चों में कटौती के प्रणव मुखर्जी के भावनात्मक आह्वान ने देश को भावुक कर दिया था. इससे पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी इसकी वकालत कर चुके थे और उन्होंने अपनी जमात के लोगों को रचनात्मक तरीकों से इसे अपनाते देखा. यहाँ तक कि विदेश मंत्रालय को २००९ में किये गये इस आह्वान पर काम करते देखते (किफायती दर्जे में हवाईयात्रा, खर्चों में कटौती), हम इस महान खोज के चौथे साल में प्रवेश कर चुके हैं.     

निश्चय ही, हमारे यहाँ कई प्रकार की मितव्ययितायें हैं. इन अनेकों आजमायी गयी विविधताओं में से  योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया वाली किस्म को लेते है. खर्चों में कटौती के लिये डा. अहलूवालिया की वचनबद्धता को कोई भी चुनौती नहीं दे सकता. देखिये वह किस तरह गरीबी की रेखा के बारे में उस लोकलुभावन मांग के खिलाफ अडिग खड़े रहे हैं जो मानीखेज है. जनता की कतई खुशामद नहीं की गयी. शहरी भारत में २९ रूपये या ग्रामीण भारत में २३ रूपये रोज खर्च करें तो आप गरीब नहीं हैं. यहां तक कि  उन्होंने उच्चतम न्यायालय से भी  अपने लाखों-करोंडों  देशवासियों के प्रति  इस कठोरता को बनाये रखने का अनुरोध किया है. योजना आयोग द्वारा दायर एक हलफनामे में ३२ रूपये (शहरी) और २६ रूपये (ग्रामीण) प्रतिदिन की रेखा की वकालत की गयी  है. उसके बाद से, इस पदम विभूषण विजेता और सके कुछ सहयोगियों ने इस रेखा को र कम करने के लिये बेहिचक अपनी राय पेश की है.

आरटीआई पूछताछ

डा. अहलूवालिया मितव्ययिता को खुद पर लागू करते हैं इस बात की पुष्टि दो आरटीआई प्रश्नों से हो जाती है. दोनों ही आरटीआई-आधारित पत्रकारिता के बेहतरीन उदाहरण हैं, परन्तु उन्हें उतनी तवज्जो नहीं मिल पायी जिसके वे हकदार हैं. उनमे से एक श्यामलाल यादव द्वारा दी गयी इंडिया टुडे (जिसमें जून २००४ से जनवरी २०११ के बीच डा. अहलूवालिया की विदेश यात्राओं का ब्यौरा है) की खबर है. यह पत्रकार (जो अब इंडियन एक्सप्रेस में काम करते हैं) पहले भी आरटीआई-आधारित बेहतरीन ख़बरें दे चुके हैं.

दूसरी खबर, इस साल फ़रवरी में, द स्टेट्समेन न्यूज़ सर्विस में प्रकाशित हुई (पत्रकार का नाम नहीं दिया गया है). इसमें मई और अक्टूबर २०११ के बीच में डा. अहलूवालिया की विदेश यात्राओं का ब्यौरा है. एसएनएस की रिपोर्ट कहती है कि “इस अवधि में, १८ रातों के दौरान चार यात्राओं के लिये राजकोष को कुल ३६,४०,१४० रुपये कीमत चुकानी पड़ी, जो औसतन २.०२ लाख रुपये प्रतिदिन बैठती है.”

जिस दौरान यह सब हुआ, उस समय के हिसाब से २.०२ लाख रुपये ४,००० डॉलर प्रतिदिन के बराबर बैठते हैं. (अहा! हमारी खुशकिस्मती है कि मोंटेक मितव्ययी हैं. अन्यथा कल्पना करें कि उनके खर्चे कितने अधिक होते). प्रतिदिन का यह खर्चा उस ४५ सेंट की अधिकतम सीमा से ९,००० गुना ज्यादा है जितने पर उनके अनुसार एक ग्रामीण भारतीय ठीक-ठाक जी ले रहा है, या उस शहरी भारतीय के लिये ५५ सेंट की अधिकतम सीमा से ७,००० गुना ज्यादा है जिसे डा. अहलूवालिया “सामान्य तौर पर पर्याप्त” मानते हैं.

यहां हो सकता है कि १८ दिनों में खर्च किये गये ३६ लाख रूपये (या ७२,००० डॉलर) उस साल विश्व पर्यटन के लिये दिया गया उनका निजी प्रोत्साहन हो. आख़िरकार, २०१० में पर्यटन उद्योग अभी भी २००८-०९ के विनाश से उभर ही रहा था, जैसा कि संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यटन संगठन ध्यान दिलाता है. दूसरी तरफ, यू.एन. संस्था ने पाया कि २०१० में वैश्विक यात्राओं पर वार्षिक आय 1,000 अरब  डॉलर तक पहुँच गयी. वार्षिक आय में सबसे ज्यादा बढ़त अमेरिका और यूरोप में देखी गयी (जहाँ उन १८ दिनों में से ज्यादातर दिन व्यतीत किये गये). भारतीय जनता इस बात पर खुशी मना सकती है कि उन देशों के स्वास्थ्य लाभ में उन्होंने भी एक सादगीपूर्ण भूमिका निभायी, तब भी जबकि वे घर पर खर्चों में कटौती की मार झेल रहे थे.

श्यामलाल यादव की आरटीआई में दिये गये आकड़े बेहद दिलचस्प हैं. शुरुआत के लिये, उनकी जाँच दिखाती है कि अपने सात साल के कार्यकाल में डा. अहलूवालिया ने ४२ आधिकारिक विदेश यात्रायें की और विदेशों में २७४ दिन बिताये. इस तरह यह “हर नौ में से एक दिन” विदेश में पड़ता है. और इसमें यात्रा करने में लगे दिन शामिल नहीं हैं. इंडिया टुडे की खबर ने पाया कि उनके इस भ्रमण के लिये राजकोष से २.३४ करोड़ रूपये खर्च किये गये, यह बताया गया है कि उनकी यात्राओं के संबंध में उन्हें तीन अलग- अलग अनुमान प्राप्त हुए थे और उदारतापूर्वक उन्होंने अपनी खबर के लिये सबसे कम खर्च वाले अनुमान को चुना. साथ ही, इंडिया टुडे की खबर कहती है, “यह स्पष्ट नहीं है कि इन आकड़ों में भारतीय दूतावास के द्वारा विदेश में किये गये अतिरिक्त खर्चे, जैसे-  लिमोसिन को किराये पर लेना शामिल हैं या नहीं. वास्तविक खर्चे काफी ज्यादा हो सकते हैं.”

चूँकि जिस पद पर वह हैं उसके लिये ज्यादा विदेश यात्राओं की आवश्यकता नहीं है – हालाँकि, यह सब “प्रधानमंत्री की इजाजत” से किया गया है– यह काफी दुविधा में डाल देने वाला है. ४२ यात्राओं में से २३ अमेरिका के लिये थी, जो योजना में विश्वास नहीं करता ( योजना में तो, शायद डॉ. अहलूवालिया भी विश्वास नहीं करते), तब यह और भी ज्यादा दुविधा में डाल देने वाली बात है. ये यात्रायें किस बारे में थी? मितव्ययिता के बारे में वैश्विक जागरूकता का प्रसार करने के लिये? यदि ऐसा है तो, हमें उनकी यात्राओं पर ओर ज्यादा खर्च करना होगा: एथेन्स की सड़कों पर इस ध्येय का क़त्ल करते हुए विद्रोही ग्रीसवासियों पर ध्यान दें. और उससे भी ज्यादा उनकी अमरीका यात्राओं पर जहाँ अमीरों की मितव्ययिता असाधारण है. यहाँ तक उस देश के मैनेजरों ने २००८ में भी करोड़ों रूपये बोनस लिये, जिस साल वाल स्ट्रीट ने विश्व अर्थव्यवस्था का भट्टा बिठा दिया था. इस साल, अमरीका में बेहद-अमीर मीडिया अखबार भी लिख रहे हैं कि ये मैनेजर ही कम्पनियों, नौकरियों और तमाम चीजों का विनाश कर रहे हैं– और इस सबसे व्यक्तिगत लाभ उठा रहे हैं. लाखों अमरीकावासी, जिनमे वे भी शामिल है जो बंधक घरों की नीलामी का शिकार हुए हैं, वे अलग तरह की मितव्ययिता भुगत रहे हैं. उस तरह की, जिससे फ्रांसीसी घबराये हुए थे और जिसके खिलाफ उन्होंने वोट दिया.

२००९ में जब डा. सिंह ने खर्चों में कटौती का अनुरोध किया, तब उनके मंत्रिमंडल ने इस आह्वान का शानदार जवाब दिया. अगले २७  महीनों के दौरान, हर सदस्य ने औसतन, कुछ लाख रूपये प्रति महीने अपनी सम्पति में जोड़े. यह सब उस दौरान, जब वे मंत्रियों के तौर पर कठिन मेहनत कर रहे थे. प्रफुल पटेल इनमे सबसे आगे रहे, जिन्होंने इस दौरान अपनी सम्पति में हर २४ घंटे में, औसतन पांच लाख रुपये जोड़े. तब जब एयर इंडिया के कर्मचारी, जिस मंत्रालय का ज्यादातर समय वह मन्त्री थे, हफ़्तों तक अपनी तनख्वाह पाने के लिये संघर्ष कर रहे थे. अब जबकि प्रणव अपना कोड़ा फटकार रहे हैं, तब ओर भी ज्यादा मितव्ययिता देखने को मिलेगी.

अब इस मितव्ययिता के द्विदलीय भाईचारे को देखें: प्रफुल पटेल (यूपीए–एनसीपी) और नितिन गडकरी (एनडीए–बीजेपी) ने अभी तक की दो सबसे महंगी शादियों का आयोजन किया, जिसमे किसी आईपीएल फ़ाइनल से भी ज्यादा मेहमान शामिल थे. लिंग-संतुलन का कठोर अनुशासन, भी. ये आयोजन, मि. पटेल की बेटी के लिये और मि. गडकरी के बेटे के लिये थे. 

इनके कारपोरेट प्रतिरूपों ने इसे ओर आगे बढ़ाया. समकालीन स्मृति में मुकेश अंबानी का सबसे महंगा २७ मंजिल (पर उसकी ऊंचाई ५० मंजिल तक है) का घर. और विजय माल्या ने– किंगफिशर में जिनके कर्मचारी अपनी तनख्वाहों के लिये संघर्ष कर रहे हैं–  ५ मई को ट्वीट किया: “दुबई में बुर्ज खलीफा के १२३वें माले पर एटमोसफियर में रात्रिभोज कर रहा हूँ. मैं अपने जीवन में कभी इतनी ऊंचाई पर नहीं आया. शानदार दृश्य.” यह शायद उससे ज्यादा ऊंचाई पर है जहाँ अभी किंगफिशर उड़ान भर रही है. दोनों की आईपीएल में खुद की टीमें हैं. एक ऐसी संस्था जिसे सार्वजनिक आर्थिक सहायता मिली है (उदाहरण के लिये, मनोरंजन कर में छूट). यह तब तक, जब तक मामला बम्बई उच्च न्यायालय में नहीं गया. आईपीएल से जुड़ी  जनता के पैसे से चलने वाली अन्य मितव्ययितायें भी हैं – इन खबरों का इंतज़ार करें.

वाल स्ट्रीट मॉडल   

कारपोरेट जगत आम तौर पर वाल स्ट्रीट के मॉडल का अनुसरण करता है. वहाँ, नौ बैंकों, जिसमे सिटीग्रुप और मेर्रिल लिंच शामिल हैं, ने “२००८ में ३२.६ बिलियन डॉलर बोनस के तोर पर दिये, उस समय जब उन्होंने करदाताओं द्वारा जमा धन से १७५ बिलियन डॉलर प्राप्त किये,” ब्लूमबर्ग ने २००९ में रिपोर्ट दी. उसने इस विषय पर न्यूयॉर्क के अटॉर्नी जनरल एंडरयू कयूओमो की रिपोर्ट से उद्धृत किया: “जब बैंक बेहतर कर रहे थे, तब उनके कर्मचारियों को अच्छी तनख्वाह दी जा रही थी. जब बैंक खराब प्रदर्शन कर रहे थे तब भी उनके कर्मचारियों को अच्छी तनख्वाह दी जा रहती थी. जब बैंकों ने बेहद खराब प्रदर्शन किया तो करदाताओं ने उनकी जमानत ली और उनके कर्मचारियों को तब भी अच्छी तनख्वाह दी गयी. जैसे-जैसे मुनाफा कम होता गया, उनके बोनस और दूसरे पारितोषिकों में कोई कमी नहीं आयी.”

ध्यान दें  कि  पिछले सप्ताह प्रणव की मितव्ययिताओं की प्रार्थना ने बेहद-अमीरों के प्रवक्ताओं को टीवी पर बहुत जोरशोर से यह कहते हुए देखा कि घाटा पूरी तरह से “एक के बाद एक होने वाली लोकलुभावन कार्यवाहियों” की वजह से है, जिसमे  ऐसे मूर्खतापूर्ण काम शामिल हैं,- जैसे लोगों को काम देना, भुखमरी को कम करना, बच्चों को स्कूल भेजना. इसमें धनाड्य वर्ग के लिये किये गये लुभावने कामों का कोई जिक्र नहीं है जिसमें  इन्ही प्रणव के बजट के माध्यम से कारपोरेट टैक्स, उत्पाद और सीमा शुल्क में रियायत देकर लगभग ५ लाख करोड़ रुपये (उस समय लगभग १०० बिलियन डॉलर) मुख्य रूप से अमीर और कारपोरेट वर्ग को तोहफे में दे दिये गये. सीताराम येचुरी ने इस बात की ओर संसद का ध्यान दिलाया है कि बेहद-अमीरों के लिये बट्टे खाते में डाले गये इन पैसों की वजह से राजकोषीय घाटा ८,००० करोड़ रुपये ज्यादा बढ़ गया है. परन्तु वह गरीबों के लिये किये जाने वाले “लोकलुभावन काम” हैं जिन्हें आलोचना झेलनी पड़ती है.

अमर्त्य सेन खेदपूर्वक पूछते हैं कि “राजस्व से सम्बंधित समस्याओं पर मिडिया में किसी भी तरह की बहस क्यों नहीं होती है, जैसे कि सोने और चांदी को सीमा शुल्क में छूट, वित्त मंत्रालय के अनुसार, इसमें राजस्व को उससे ज्यादा राशि का नुकसान शामिल है (प्रति वर्ष ५०,००० करोड़ रूपये) जितनी खाद्य सुरक्षा बिल के लिये जरूरी अतिरिक्त राशि (२७,००० करोड़ रूपये) है.”

इस सर्वगुण संपन्न सम्मोहक दायरे के बाहर रहने वाले भारतीय एक अलग तरह की मितव्ययिता जानते हैं. खाद्य मुद्रास्फीति दो अंको में है. एक साल में सब्जियों के दाम ६० प्रतिशत बढ़ चुके हैं. बच्चों में कुपोषण सब-सहारा अफ्रीका से दोगुना है. परिवार दूध और दूसरी जरुरी चीजों का उपयोग तेजी से कम कर रहे हैं. स्वास्थ्य सेवाओं में भारी वृद्धि लाखों लोगों को कंगाल कर रही है. किसान निवेश करने में और कर्ज हासिल करने में असमर्थ हैं. बहुत से लोगों को पीने के पानी की कमी है, जैसे- जैसे इस जीवनदायिनी वस्तु को दूसरे कामों के लिये इस्तेमाल किया जा रहा है. उच्च वर्ग के लिये मितव्ययिता का अभ्यास करना कितना बेहतर होगा.  
(द हिन्दू में प्रकाशित पी. साईनाथ के लेख की आभार सहित प्रस्तुति. अनुवाद– दिनेश पोसवाल)  

राजनीति में जाति का जुड़ाव जीवंत सामाजिक सच्चाइयों से है.

जोसेफ तारामंगलम
जाति भारतीय सामाजिक जीवन का इतना प्रभावी लक्षण क्यों है? द हिंदूमें प्रकाशित लेख (भारत की नियति जाति में जकड़े रहना नहीं, २१ फरवरी) में आंद्रे बताई का मानना है कि राजनीति और मीडिया के चलते ही जाति आज भी जीवित है. भारतीय संविधान ने भी शायद कुछ भूमिका निभाई है. नागरिकों का राष्ट्र और नागरिक अधिकारों की स्थापना के साथ ही इसने जाति को भी जीवित रखा. राजनीति के बाहर धीरे-धीरे, लेकिन लगातार होने वाले ढेर सारे बदलावों ने आपसी खान-पान, अंतरजातीय विवाह और जाति आधारित पेशों जैसे कई मामलों में जाति प्रथाओं और जाति चेतना को रूपांतरित किया है.
यह आम तौर पर स्वीकृत दृष्टिकोण है और इसमें ताज्जुब की कोई बात नहीं कि समाजशास्त्री जिसको विशिष्ठता (ठोस) से सर्वव्यापकता (सामान्य) की ओर आगे बढ़ना कहते हैं, आधुनिकता की ताकतें उससे संबद्ध होती हैं. हमने इसे भारत में रेलवे के आने के साथ देखा, जिसमे अलग-अलग जातियों के लिए अलग से डब्बे का इंतजाम नहीं किया गया था. इसलिए हमें यह मान लेना चाहिए कि बताई जिन बदलावों को दर्शाते हैं, भले ही वे उन्हें थोडा बढ़ा-चढा के बता रहे हों, लेकिन बदलाव आये हैं. यह तथ्य कि भारत में अपने हाथों से मल-मूत्र साफ करने वाले तीन लाख से भी ज्यादा लोग लगभग पूरी तरह दलित समुदाय से आते हैं, निश्चय ही इस मुद्दे पर गंभीर चिंतन के लिए उकसाता है. यह जानना भी दिलचस्प होगा कि अब से छह दशक पहले बताई ने जिस तमिलनाडु में अपना पीएचडी शोध किया था, वहाँ के गांवों में आपसी खान-पान कितना है और कितने लोग अंतरजातीय विवाह करते हैं. 
पहुँच पर पाबन्दी 
बताई के तर्कों के साथ समस्या यह है कि इसमें जाति के कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं की अनदेखी की गयी है जो लगातार मजबूती के साथ जारी हैं और शायद ठेठ भारतीय विकास के कुछ खास  लक्षणों को मजबूत करने में सहायक हैं. जाति के ये पहलू उस भौतिक आधार पर टिके हुए हैं जो जीविका के संसाधनों और जोर-जबर के साधनों के ऊपर बेहद भेदभावपूर्ण नियंत्रण से तय होता है. इनका इस्तेमाल अब पवित्रता/अपवित्रता के विधि-विधान को जबरन लागू करवाने के लिए नहीं, बल्कि पुराने और नए संसाधनों और अवसरों तक बहुसंख्य दलितों और अन्य पिछड़ी जातियों की पहुँच पर पाबंदी लगाने के लिए किया जाता है. जाति की राजनीति को अगर इस सन्दर्भ के बाहर या इन सच्चाइयों से काट कर देखें तो उसे समझ पाना मुमकिन नहीं.
सामाजिक सूचक 
भारत के विकास का एक सुस्पष्ट विरोधाभास उन देशज प्रवंचनाओं पर कुछ रोशनी डाल सकता है जिनका शिकार निम्न जातियां हैं. ऊँची वृद्धि दर के बावजूद, भारत की हालत प्रतिव्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद और आर्थिक वृद्धि के मामले में निचले स्तर के विकासशील देशों से भी खराब है. प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और भारतीय संगठनों द्वारा जितने भी तरह के सामाजिक सूचक मुहैया कराये जाते हैं (जैसे- मानव विकास सूचकांक, बहुआयामी गरीबी सूचकांक, वैश्विक भूख सूचकांक) उन सभी मामलों में स्थिति दयनीय है. मानव विकास सूचकांक के निम्न स्तर (१६९ देशों की सूची में भारत का ११९ वाँ स्थान है, जबकि चीन का ८९ वाँ) के लिए प्राथमिक शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सामान्य सूचकों का स्तर भी बहुत ही खराब होना जिम्मेदार है. खास तौर पर शिशु मृत्यु दर, कुपोषण, कमवजन और छोटे कद वाले बच्चों तथा कमवजन और खून की कमी वाली गर्भवती महिलाओं के मामले में स्तर बहुत ही गिरा हुआ है. वैश्विक भूख सूचकांक के मामले में भारत का ६६ वाँ दर्जा बहुत ही शर्मनाक है जो बांगलादेश को छोड़ कर अपने दक्षिण एशियाई पड़ोसियों से भी गया-गुजरा है. हमारा देश दुनिया भर में सबसे ज्यादा एकमुश्त भूखे लोगों का ठिकाना है- २५.५ करोड लोग, यानी  कुल आबादी का २१ प्रतिशत. बहुआयामी गरीबी सूचकांक का भी यही हाल है- ४५.५ करोड लोग, यानी ५५ प्रतिशत आबादी भीषण गरीबी की गिरफ्त में है और आठ भारतीय राज्यों में जितने लोग बहुआयामी गरीबी के शिकार हैं उनकी तादाद २६ बेहद गरीब  अफ़्रीकी देशों के कुल ग़रीबों से भी कहीं ज्यादा है.
इन आंकड़ों के पीछे भारतीय समाज के दो महत्वपूर्ण तथ्य हैं- पहला इस देश में निम्नवर्ग की एक बहुत ही भारी तादाद है, और दूसरा, इन वर्गों में विशेष रूप से बड़ी आबादी निम्न जाति के लोगों की (खास कर दलितों की) और आदिवासियों की है. इन सभी सूचकों के मामले में इन समूहों की स्थिति (१० प्रतिशत से भी ज्यादा का अंतर) काफी बुरी है. उदहारण के लिए, कुल ५५ प्रतिशत भारतीय बहुआयामी गरीबी के शिकार हैं, जबकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति में यह संख्या क्रमशः ६५.८ और ८१.४ है. ध्यान दें कि जिन राज्यों की स्थिति ज्यादा खराब है, वे वही हैं जहाँ अनुसूचित जाति और जनजाति का अनुपात अधिक है.
हिंसा की व्यवस्था
निम्न जातियों की रसातल जैसी सामाजिक-आर्थिक स्थिति कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि यह ऐतिहासिक विरासत में मिले उस ढांचे में निहित है जिसने बुनियादी बदलाव में बाधा खड़ी की. भारत की ऐतिहासिक असफलताएँ- जमीन के पुनर्वितरण की भ्रूण-हत्या, खेती की उपेक्षा (१९६०-७० के दशक में हरित क्रांति को छोड़ कर) और जातिगत असमानता पर प्रहार करने में नरम रुख- इन ढांचों को कायम रखने में मददगार साबित हुईं. इस सन्दर्भ में भारत के यात्रा-पथ की एक पेचदार बात पर नजर डालना दिलचस्प है कि जिस दौर में इसने वैज्ञानिक, तकनीकी और उच्च शिक्षा के दूसरे रूपों में भारी छलांग लगाई और जिसके चलते आज के मशहूर भारतीय मध्यम वर्ग की संख्या में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई, उसी दौर में प्राथमिक शिक्षा में बहुत ही घटिया रिकार्ड रहा (यह स्थिति पूर्वी एशिया के ठीक विपरीत है). 
इस विराट असफलता के लिए एक सफाई यह दी जाती है कि पहले के योजनाकारों ने एक भ्रांत धारणा को आगे बढ़ाया कि वैज्ञानिक, तकनीकी और उच्च शिक्षा ही भारत में तीव्र आर्थिक विकास के लिए जरूरी है. लेकिन एक दूसरी व्याख्या भी है जिसमें जाति को एक कारक माना गया है. इस नजरिये का एक अच्छा विवरण यह है कि अपनी दिली इच्छाओं के चलते भारत के ऊपरी जातियों के लोगों को दलितों को शिक्षित करने में कोई लाभ नहीं दिखाई दिया.  इससे थोड़ा कम अच्छा विवरण यह तर्क पेश करता है कि निम्न जातियों को शिक्षित करने की योजना को ऊपरी जातियों की ओर से इसलिए विरोध झेलना पड़ा कि इस तरह की परियोजन और इसके चलते निम्न जातियों का ऊपर उठना, निम्नजाति के मजदूरों, आश्रितों और नौकरों को अपने काबू में रखने की उनकी मंशा को मटियामेट कर देगा. बिहार के देहातों में काम करते हुए और उस दौरान इस तरह की गतिविधि का अवलोकन करते हुए मैंने पाया कि इस अंतिम तर्क में थोड़ा दम है. 
अंततः, इस बात पर ध्यान देना जरुरी है कि यह ढाँचा महज विचारधारा और अपवित्रता के विधि-विधान से नहीं चलता बल्कि भरपूर हिंसा के दम पर कायम है. वास्तव में यह एक ढांचागत हिंसा की व्यवस्था है जिसका इजहार लगातार धमकियों और समय-समय पर फूट पडने वाली शरीरिक हिंसा के रूप में होता है, जिसे जमीन के मालिक ऊपरी जातियों के लोग इस चुनौती के चलते अंजाम देते हैं कि पहले से चले आ रहे सम्बंध बदल रहे हैं और साथ ही निचली जातियों के लोग भी अब विरोध कर रहे हैं और पलटवार भी कर रहे हैं. दलितों के ऊपर अत्याचारहत्या, बलात्कार और आगजनी से लेकर दलित महिलाओं को नंगा करके गांव में घुमाने और पीडितों के मुंह में पेशाब-पाखाना डालने जैसे अपमानजनक कुकृत्य तक के भरपूर दस्तावेजी प्रमाण मौजूद हैं. भारतीय सांसदों ने इन घटनाओं को इतना गंभीर माना कि १९८९ में दलितों के विरुद्ध अत्याचार क़ानूनपारित किया. हालाँकि इस कानून का प्रभावी होना संदिग्ध है, दलित कार्यकर्ता इस बात पर जोर देते हैं कि बिना नीचे से राजनीतिक दबाव बनाये इस कानून को लागू नहीं करवाया जा सकता.
आर्थिक विकास का जो मौजूदा ढर्रा ग्रामीण आबादी और खेतिहर मजदूरों को पहले से भी ज्यादा वंचना की ओर धकेल रहा है, उसे देखते हुए समर्पित कार्यकर्ताओं और अमर्त्य सेन जैसे विद्वानों ने (जिनका भारतीय अकाल के ऊपर किया गया शोध दिखाता है कि भारतीय अकालों के दौरान उसके शिकार होने वालों में दलितों की संख्या बहुत ही अधिक रही है) आह्वान किया है कि वंचित समुदायों के बेहतर राजनीतिक संगठनों के जरिये समतामूलक सत्ता का निर्माण किया जाय. 
तब आखिर बताई के इस सुझाव का क्या किया जाये कि जाति का बड़ी आसानी से खात्मा हो जाता, अगर इसे राजनीति और मीडिया के दायरे से बाहर कर दिया गया होता? निश्चय ही, उन्होंने खुदगर्ज नेताओं और मीडिया के लोगों द्वारा जाति का दुरुपयोग करने का मामला महत्वपूर्ण रूप से उठाया है. लेकिन जाति के अराजनीतिकरण का जो नुस्खा उन्होंने सुझाया है, उससे कुछ होने वाला नहीं. बेहतर रास्ता शायद वह हो जिसे केरल ने तय किया, जहाँ निम्न जातियों की राजनीतिक लामबंदी को संगठन के व्यापक तार्किक-वैधानिक और सर्वव्यापी रूपों के साथ, जाति समुदाय और धर्म से ऊपर उठ कर गठित ट्रेड यूनियनों और पार्टियों के रूपों के साथ एकीकृत किया गया.
हाँ, हमने छुआछूत को मिटा दिया, अब उस भौतिक आधार को मिटने की जरूरत है जो छुआछूत को बनाये हुए है और हररोज  भेदभाव और हिंसा के नए रूपों को जनम दे रहा है.
(लेखक माउन्ट सेंट विन्सेंट यूनिवर्सिटी, हलिफैक्स, कनाडा में  समाजशास्त्र के मानद प्रोफ़ेसर हैं और आजकल सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज, तिरुअनंतपुरम में आमंत्रित अध्येता हैं. यह लेख द हिन्दूमें ७ मार्च को प्रकाशित हुआ था जिसका अनुवाद आभार सहित प्रस्तुत है.)


जाति में जकडे रहना भारत की नियति नहीं

आंद्रे बताई
जो लोग अखबारों और टीवी चैनलों पर सामायिक मुद्दों के ऊपर चर्चा करते रहते हैं, वे अगर यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जाति भारत की नियति है, तो उन्हें माफ़ कर देना चाहिए. राजनीतिक मुद्दों पर टिप्पणी करनेवाले मीडिया विशेषज्ञों के बीच अगर किसी बात में समानता है तो बस यही कि जाति के विषय में और चुनावी राजनीति में उसकी भूमिका की ओर ध्यान आकृष्ट करने में वे हमेशा लवलीन रहते हैं.
बहुतेरे लोग अब यह यकीन करने लगे हैं कि देश में हो रहे जनसंख्या सम्बंधी, तकनीकी और आर्थिक बदलावों से तो इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन फिर भी जातियों और समुदायों में बंटे होना भारतीय समाज का अनिवार्य चरित्र है और इसे मिटा पाना असंभव है. उनका यह भी मानना है कि इन बंटवारों को नजरअंदाज करना या आमदनी, शिक्षा और पेशा जैसे दूसरे बंटवारों की ओर ध्यान दिलाना जमीनी सच्चाइयों से मुँह चुराना है. उनमें से जो कुछ ज्यादा ही रेडिकल हैं, वे यह भी जोड़ देते हैं कि इन सच्चाइयों की अनदेखी करना, दरअसल समाज के फायदे और जिम्मेवारियों का इंसाफ और बराबरी के साथ बंटवारे की राजनीतिक जिम्मेदारी से टालमटोल करना है.
क्या भारत में कुछ भी नहीं बदला है? वास्तव में पिछले साथ सालों के दौरान हमारी राजनीतिक अवधारणा और सामाजिक यथार्थ दोनों ही मामलों में ढेर सारे बदलाव हुए हैं. राष्ट्रीय आंदोलन के जिन नेताओं ने उपनिवेशिक शासन से भारत की स्वतंत्रता के लिए सफलतापूर्वक संघर्ष किया, उनका विश्वास था कि अतीत में भारत भले ही जातियों और समुदायों में बंटा समाज था, लेकिन नए गणतांत्रिक संविधान को अंगीकार कर लेने के बाद यह नागरिकों का राष्ट्र बन जाएगा. वे अत्यंत आशावादी थे. संविधान ने नागरिकों के अधिकारों को स्थापित किया, लेकिन इसने जिन नागरिकों का सर्जन किया उनके दिलों और दिमागों से जाति का निर्मूलन नहीं किया. कई भारतीयों का, शायद अधिकांश लोगों का दिली मिजाज़ आज भी उंच-नीच में बंटे समाज का ही मिजाज़ है.
आपसी खान-पान के नियम
सार्विक वयस्क मताधिकार ने जाति के आधार पर चुनावी समर्थन जुटाने की नयी सम्भावनायें पैदा कीं और इस तरह जातिगत चेतना को समाप्त होने से रोका. लोकतंत्र से अपेक्ष थी कि यह जातिगत भेदभाव को नष्ट कर देगा, लेकिन इसके परिणामस्वरूप जो उम्मीद थी, उससे उलते ही नतीजे सामने आये. लोकतंत्र में राजनीति किसी देश के जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है, लेकिन यह उसका एकमात्र अंग नहीं है. जीवन के दूसरे क्षेत्र हैं जिनमें जातिगत चेतना निस्तेज होती गयी है, भले ही बहुत तेजी से और नाटकीय रूप में न हुई हो. बदलाव की जिस रुझान के बारे में हम आगे चर्चा करेंगे उस ओर मीडिया का ध्यान नहीं गया क्योंकि यह बदलाव लंबे समयांतराल में घटित हुआ. इसे महीने-महीने या साल दर साल देख पाना मुमकिन नहीं, बल्कि दो या दो से अधिक पीढ़ियों के दौरान ही इसे महसूस किया जा सकता है.
हम पवित्रता और अपवित्रता के कर्मकांडी विरोध से ही शुरू करें, जो जातियों के ऊँच-नीच में बंटवारे की एक बुनियाद थी. पवित्रता और अपवित्रता के नियम जातियों और उपजातियों के भीतर भेदभाव और श्रेणी-विभाजन को चिन्हित करने में काम आते थे. इनमें से कुछ लक्षण आपस में घुलने-मिलने और एक साथ खाने-पीने से सम्बंधित थे.  उन्हीं से तय होता था कि कौन किसके साथ खाने की पंगत में बैठ सकता है और किनके हाथ का खाना और पानी ले सकता है. केवल बराबर दर्जे वाली जातियों के लोग ही एक पंगत में खा सकते थे. आम तौर पर लोग अपने से ऊँची जाति के लोगों के हाथ से ही खाना और पानी लेते थे, अपने से नीची जाति के हाथ से नहीं.
भोजन की लेन-देन के बारे में शास्त्रीय विधि-निषेध कठोर थे और अब से सौ साल पहले तक जारी थे. इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि उन विधि-निषेधों का लगातार क्षरण हुआ है. जीवन और कार्य की आधुनिक परिस्थितियों ने इनमें से बहुतेरों को लुप्तप्राय बना दिया. पवित्रता और अपवित्रता के अतिरेक को कोलकाता और दिल्ली जैसे शहरों में रहनेवाले पढ़े-लिखे लोग मजाक का विषय समझते हैं. कॉलेज कैंटीन या ऑफिस के भोजन कक्ष में इस तरह के नियमों का पालन करना असंभव है. सार्वजनिक आयोजनों में लोगों को अपनी-अपनी जाति के अनुसार बैठने पर जोर देना आज शर्मनाक घटना मानी जायेगी.
अतीत में, जाति के नियमों के मुताबिक एक-दूसरे के साथ खाने-पीने और शादी-विवाह करने पर लगाये गए रोक का सीधा सम्बंध था. शादी पर रोक अभी समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन कुछ हद तक इसमें ढील आई है. हिंदुओं में, अंतरजातीय विवाह पर पहले क़ानूनी रोक था. अब वह कानून तो बदल गया, लेकिन जाति के भीतर शादी करने का रिवाज आज भी भारी पैमाने पर देखा जा सकता है. हालाँकि हो यह रहा है कि शादी तय करते समय अन्य बातों के आलावा शिक्षा और आमदनी को भी दिमाग में रखा जा रहा है. बहरहाल, यह बहस करना काफी कठिन है कि पिछले कुछ दशकों से वैवाहिक मामलों में जातिगत चेतना उठान पर है.
राजनीति में, मीडिया में
जाति और पेशे के बीच एक आम जुडाव इस हद तक अभी जारी है कि निम्नतम जातियों के लोग बड़े पैमाने पर घटिया और कम मजदूरी वाले कामों में लगे हैं, जबकि उपरी जाति के लोगों का झुकाव अच्छी आमदनी और सर्वोत्तम पेशों की ओर है. लेकिन जाति और पेशे के बीच का संबंध, जमीन और अनाज की परंपरागत अर्थव्यवस्था की तुलना में आज कहीं ज्यादा लचीला है. तेज आर्थिक विकास और माध्यम वर्ग के विस्तार के साथ-साथ व्यक्तिगत अवसर की गतिशीलता ने जाति और पेशे के बीच के संबंध को और अधिक ढीला किया है.
इन सब के बावजूद, अगर जनता की चेतना पर जातिगत जकडबंदी न सिर्फ कायम है, बल्कि मजबूत होती जा रही है, तो इसके निश्चित कारण हैं. यह कारण संगठित राजनीति के क्षेत्र में देखा जा सकता है. राजनीति के अखाड़े में जाति का प्रवेश आज़ादी हे पहले ही हो गया था, खास तौर पर भारतीय उपमहाद्वीप में. लेकिन आज़ादी के बाद सार्विक वयस्क मताधिकार अपनाये जाने के बाद राजनीतिक प्रक्रिया में जाति को घंसीटने का ढंग और दायरा बिलकुल बदल गया.
जातीय चेतना चुनावों के मौके पर आगे लायी जाती है. लोकसभा और विधान सभा के चुनाव अब पूरे साल होते रहते हैं. सामान पहुँचाने और तैयारी से जुड़े दूसरे कारणों से, विधान सभा के चुनाव भी अब कई-कई हफ्ते में पूरे होते हैं. आम चुनावों के आलावा उप-चुनाव भी होते हैं. चुनाव अभियान दिनोंदिन भडकीले और लगातार खर्चीले होते गए हैं और अक्सर वे आनंदोत्सव का वातावरण तैयार करते हैं. जाति के आधार पर चुनावी समर्थन जुटाना एक जटिल परिघटना है जिसके नतीजे बेइंतिहा अटकलों की गुंज़ाइश पैदा करते हैं.
बावजूद इसके कि पूरे देश के लिए चुनावी मौसम का कभी भी अंत नहीं होता, कोई खास मतदाता चुनाव की प्रक्रिया में कभी कभार और छिटपुट रूप से ही भाग लेता है. औसत ग्रामीण मतदाता चुनावी मामलों के बजाय अपने घरेलू मसलों, काम-धाम और पूजा-पाठ में कहीं ज्यादा दिमाग खपाता है. सब को पता है कि शहरों में रहनेवाले भारतीय मतदाता बहुत काम संख्या में वोट देने जाते हैं. लेकिन मतदान केन्द्र तक जाने के लिहाज से भले ही वे चुनाव में भाग नहीं लेते, मगर अप्रत्यक्ष रूप से वे इनमें जरूर भाग लेते हैं, क्योंकि वे टेलीविजन पर देखते रहते हैं कि बाहरी दुनियां में क्या हो रहा है. थोड़ी मात्रा में राजनीतिक शिक्षा के साथ टेलीविजन हमें मनोरंजन की भरपूर खुराक देता है.
निजी टेलीविजन चैनलों ने एक पूरी दुनिया रची है जिसमें उनके संचालक और विशेषज्ञ एक दूसरे के साथ जीवंत संपर्क में रहते हुए जातिगत घटकके महत्त्व का लेखा-जोखा लेते हैं तथा उनके टीकाकार जातियों, उपजातियों और जातियों के समूहों के बीच की प्रतिद्वंद्विता और गंठबंधन की खोजबीन करते है, जिनमें से अधिकांश लोगों की देश में दूरगामी बादलावों के रुझान की न तो कोई समझ होती है और न ही उसमें कोई रूचि. ये विचार-विमर्श यह भ्रम पैदा करते हैं कि जाति भारतीय समाज का एक अपरिवर्तनीय लक्षण है. आज जातिगत चेतना को मजबूत करने और हमें इस बात का  कायल बनाने के लिए कि जाति भारत की नियति है, मीडिया में जो कुछ चल रहा है, उसे यदि जारी रहने दिया गया तो यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण होगा.
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के मानद प्रोफ़ेसर और राष्ट्रिय अनुसन्धान प्रोफ़ेसर हैं. २१ फरवरी के द हिंदूमें प्रकशित लेख का अनुवाद, आभार सहित.)

मेरी वसीयत- कर्नल गद्दाफी


“यह मेरी वसीयत है. मैं मोहम्मद बिन अब्दुल्लस्सलाम बिन हुमायद बिन अबू मानयर बिन हुमायद बिन नयिल अल फुह़शी गद्दाफ़ी, कसम खाकर कहता हूँ कि दुनिया में अल्लाह़ के अलावा कोई खुदा नहीं, और मोहम्मद ही उस अल्लाह के पैगंबर हैं. उनके नाम पर अमन कायम हो. मैं कसम खता हूँ कि मैं एक सच्चे मुसलमान की तरह मरुंगा.
अगर मैं मारा गया तो जिन कपड़ों में मेरी मौत हो उन्हीं कपड़ों में, मेरी लाश को बिना नहलाए, सिर्त में अपने परिवार और रिश्तेदारों की कब्र के पास, मुस्लिम रस्मो-रिवाज़ के मुताबिक दफ़नाया जाना चाहूँगा.
मैं चाहूँगा कि मेरी मौत के बाद मेरे परिवार, खास तौर पर औरतों और बच्चों के साथ अच्छा सलूक किया जाए.
लीबियाई जनता को चाहिए की वे अपनी पहचान, अपनी कामयाबियां,अपना इतिहास तथा अपने पुरखों और वीर नायकों की गौरव-गाथा की हिफाजत करें. लीबियाई जनता को अपने आज़ाद और बेहतरीन लोगों की कुर्बानियों को कभी भूलना नहीं चाहिए.
मैं अपने समर्थकों का आह्वान करता हूँ कि वे प्रतिरोध-संघर्ष चलाते रहें और विदेशी हमलावरों के खिलाफ आज, कल हमेशा-हमेशा के लिए अपनी लड़ाई जरी रखें.
दुनिया की आज़ाद जनता को हम यह बताना चाहेंगे कि अगर हम चाहते तो अपनी निजी हिफाजत और सुकूनभरी जिंदगी के बदले अपने पवित्र उद्देश्यके साथ समझौता करके उसे बेच सकते थे. हमें इसके लिए कई प्रस्ताव मिले लेकिन हमने अपने कर्तव्य और सम्मानपूर्ण पद के अनुरूप इस लड़ाई के हरावल दस्ते में रहना पसंद किया.
अगर हम तुरंत जीत हासिल न कर पायें तो भी, आने वाली पीढ़ियों को यह सीख दे जाएँगे कि अपने कौम की हिफाजत करने के बजाय उसे नीलाम कर देना इतिहास की सबसे बड़ी गद्दारी है, जिसे इतिहास हमेशा याद रखेगा, भले ही दूसरे लोग इसकी कोई दूसरी ही कहानी गढते और सुनाते रहें.
टिप्पणी : इस्लाम में शहीद की लाश को बिना नहलाए ही दफनाया जाता है, उसी तरह जैसे मक्का की सेना के साथ अहद की लड़ाई में शहीद होने वाले मुहम्मद साहब के अनुयाइयों की लाश को दफनाया गया था.
(मुअम्मर गद्दाफी लीबियाई क्रान्ति के नेता ओर नीति निर्माता थे. वे अपने देश की स्वतंत्रता ओर संप्रभुता की पवित्र उद्देश्य के लिए बलिदान हुए. २० अक्टूबर २०११ साम्राज्यवादी सैनिक गठबंधन नाटो की चाकरी करने वाले अपने ही देश की गद्दारों के हाथों उनकी राजनीतिक ह्त्या कर दी गयी. उनकी यह वसीहत मंथली रिव्यू से लेकर अनूदित है.)

बर्बर अमरीका के हाथों तबाह एक और राष्ट्र – लीबिया

जिस धज से कोई मकतल को गया वो शान सलामत रहती है,

ये जान तो आनी-जानी है इस जाँ की तो कोई बात नहीं.

–फैज़

(लीबिया पर नाटो के हमले के बाद गद्दाफी की हार तय थी. अचरज यह नहीं कि गद्दाफी को क़त्ल कर दिया गया या अमरीकी चौधराहट में नाटो की दैत्याकर फौज के दम पर वहाँ के साम्रज्यवादपरस्त बागियों ने लीबिया पर कब्ज़ा कर लिया. अचरज तो यह है कि गाद्दफी और उनके समर्थक नौ महीने तक उस साम्राज्यवादी गिरोह की बर्बरता के आगे डटे रहे. फिदेल कास्त्रो ने 28 मार्च 2011को अपने एक विमर्श में कहा था कि…

“उस देश (लीबिया) के नेता के साथ मेरे राजनीतिक या धार्मिक विचारों का कोई मेल नहीं है। मैं मार्क्सवादी-लेनिनवादी हूँ और मार्ती का अनुयायी हूँ, जैसा कि मैंने पहले ही कहा है।

मैं लीबिया को गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के एक सदस्य और संयुक्त राष्ट्रसंघ के लगभग 200 सदस्यों में से एक सम्प्रभु देश मानता हूँ।

कोई भी बड़ा या छोटा देश, एक ऐसे सैनिक संगठन की वायु सेना द्वारा जघन्य हमले का इस तरह शिकार नहीं हुआ था, जिसके पास हजारों लड़ाकू बमवर्षक विमान, 100 से भी अधिक पनडुब्बी, नाभिकीय वायुयान वाहक और धरती को कई बार तबाह करने में सक्षम शस्त्र-अस्त्रों का जखीरा है। हमारी प्रजाति के आगे ऐसी परिस्थिति कभी नहीं आयी और 75 साल पहले भी इससे मिलती-जुलती कोई चीज नहीं रही है जब स्पेन को निशाना बनाकर नाजी बमवर्षकों ने हमले किये थे।

हालाँकि अपराधी और बदनाम नाटो अब अपने ‘‘लोकोपकारी’’ बमबारी के बारे में एक ‘‘खूबसूरत’’ कहानी गढ़ेगा।

अगर गद्दाफी ने अपनी जनता की परम्पराओं का सम्मान किया और अन्तिम साँस तक लड़ने का निर्णय लिया, जैसा कि उसने वादा किया है और लीबियाई जनता के साथ मिलकर मैदान में डटा रहा जो एक ऐसी निकृष्टतम बमबारी का सामना कर रही है जैसा आज तक किसी देश ने नहीं किया, तो नाटो और उसकी अपराधिक योजना शर्म के कीचड़ में धँस जायेगी।

जनता उसी आदमी का सम्मान करती है और उसी पर भरोसा करती है जो अपने कर्तव्य का पालन करते हैं।…अगर वे (गद्दाफी) प्रतिरोध करते हैं और उनकी (नाटो) माँगों के आगे समर्पण नहीं करते तो वे अरब राष्ट्रों की एक महान विभूति के रूप में इतिहास में शामिल होंगे।”

गद्दाफी ने फिदेल को हू-ब-हू सही साबित किया और पलायन की जगह संघर्ष का रास्ता अपनाया।

लीबियाई जनता पर बर्बर नाजी-फासीवादी हमले का प्रतिरोध करते हुए जिस तरह गद्दाफी ने शहादत का जाम पिया, वह निश्चय ही उन्हें साम्राज्यवाद-विरोधी अरब योद्धाओं की उस पंक्ति में शामिल कर देता है जिसमें लीबियाई मुक्तियोद्धा उमर मुख़्तार का नाम शीर्ष पर है। गद्दाफी की साम्राज्यवादविरोधी दृढता को सलाम करते हुए प्रस्तुत है फ्रेड पियर्स का यह लेख)

आतंकी और बर्बर अमरीका का शिकार एक और राष्ट्र. लीबिया
फ्रेड पीयर्स

मैं लीबिया में 12 वर्ष रहा हूँ। वहां नागरिको को संपूर्ण शिक्षा (जिसमें विदेश में जाकर शिक्षा लेना भी शामिल है), चिकित्सा (जिसमें विदेश में जाकर उपचार लेने का खर्चा भी शामिल है) और लोगो को घर बना कर देना सब कुछ सरकार करती है। उसने पूरे देश में नई सड़कें (जिन पर कोई टोल नहीं लगता है), अस्पताल, स्कूल, मस्जिदें, बाजार सब कुछ नया बनवाया था। मुझसे भी पूरे 12 वर्षो में नल, बिजली, टेलीफोन का कोई पैसा नहीं लिया। मुझे खाने.पीने, पेट्रोल, सब्जी, फल, मीट, मुर्गे, गाड़ियां, फ्रीज, टीवी, बाकी घर की सुविधाएं, एयर ट्रेवल और सब कुछ सुविधाएँ मुफ्त में मिली हुई थी।

उसने लीबिया को जो एक रेगिस्तान है, हरा-भरा ग्रीन बना दिया था। एक बार हमारे भारत के राजदूत ने मेरे डायरेक्टर को कहा था कि हम भारतवासी हरे भारत को काट कर रेगिस्तान बना रहे हैं और मैं यहां आकर देखता हूँ कि आपने रेगिस्तान को हरा-भरा बना दिया है। गद्दाफी ने लीबिया में मेन मेड रीवर बनवाई थी जो दुनिया का सबसे मंहगा प्रोजेक्ट है, जिसके बारे में कहा गया था कि यह प्रोजेक्ट इतना अनाज पैदा कर सकता है जिससे पूरे अफ्रीका का पेट भर जाये, और जिसका ठेका कोरिया को दिया गया था। जब गद्दाफी यह ठेका देने कोरिया गया था तो उसके स्वागत में कोरिया ने चार दिन तक स्वागत समारोह किये थे और उसके स्वागत में चालीस किलोमीटर लंबा कालीन बिछाया था। इस ठेके से कोरिया ने इतना कमाया था कि पूरे देश की अर्थव्यवस्था जापान जैसी हो गई थी। मुझ पर विश्वास नहीं हो तो गूगल की पुरानी गलियों में जाओ, आपको सारे सबूत मिल जायेंगे। मैं उस महान शासक को श्रद्धांजलि देता हूँ और उसकी आत्मा की शांति के लिए दुआ करता हूँ। उसे मिस्र के जमाल अब्दुल नासर नें मात्र 28 वर्ष की उम्र में लीबिया का शासक बना दिया था। वह भारत का अच्छा मित्र था। मालूम हो कि गद्दाफी ने 41 साल तक लीबिया पर राज किया है।

गद्दाफी था महान नदी निर्माता

लीबीया और गद्दाफी का नाम आजकल हम सिर्फ इसलिए सुन रहे हैं क्योंकि गद्दाफी को गद्दी से हटाने के लिए अमेरिका बमबारी कर रहा हैण् लेकिन गद्दाफी के दौर में उनके काम का जिक्र करना भी जरूरी है जो न केवल लीबीया बल्कि विश्व इतिहास में अनोखा है- गद्दाफी की नदी। अपने शासनकाल के शुरूआती दिनों में ही उन्होंने एक ऐसे नदी की परियोजना पर काम शुरू करवाया था जिसका अवतरण और जन्म जितना अनोखा था शायद इसका अंत उससे अनोखा होगा।
लीबिया की गिनती दुनिया के कुछ सबसे सूखे माने गए देशों में की जाती है। देश का क्षेत्रफल भी कोई कम नहीं। बगल में समुद्रए नीचे भूजल खूब खारा और ऊपर आकाश में बादल लगभग नहीं के बराबर। ऐसे देश में भी एक नई नदी अचानक बह गई। लीबिया में पहले कभी कोई नदी नहीं थी। लेकिन यह नई नदी दो हजार किलोमीटर लंबी है, और हमारे अपने समय में ही इसका अवतरण हुआ है! लेकिन यह नदी या कहें विशाल नद बहुत ही विचित्र है। इसके किनारे पर आप बैठकर इसे निहार नहीं सकते। इसका कलकल बहता पानी न आप देख सकते हैं और न उसकी ध्वनि सुन सकते हैं। इसका नामकरण लीबिया की भाषा में एक बहुत ही बड़े उत्सव के दौरान किया गया था। नाम का हिंदी अनुवाद करें तो वह कुछ ऐसा होगा। महा जन नद।
हमारी नदियां पुराण में मिलने वाले किस्सों से अवतरित हुई हैं। इस देश की धरती पर न जाने कितने त्याग, तपस्या, भगीरथ प्रयत्नों के बाद वे उतरी हैं। लेकिन लीबिया का यह महा जन नद सन् 1960 से पहले बहा ही नहीं था। लीबिया के नेता कर्नल गद्दाफी ने सन् 1969 में सत्ता प्राप्त की थी। तभी उनको पता चला कि उनके विशाल रेगिस्तानी देश के एक सुदूर कोने में धरती के बहुत भीतर एक विशाल मीठे पानी की झील है। इसके ऊपर इतना तपता रेगिस्तान है कि कभी किसी ने यहां बसने की कोई कोशिश ही नहीं की थी। रहने-बसने की तो बात ही छोड़िए, इस क्षेत्र का उपयोग तो लोग आने-जाने के लिए भी नहीं करते थे। बिल्कुल निर्जन था यह सारा क्षेत्र।
नए क्रांतिकारी नेता को लगा कि जब यहां पानी मिल ही गया है तो जनता उनकी बात मानेगी और यदि इतना कीमती पानी यहां निकालकर उसे दे दिया जाए तो वह हजारों की संख्या में अपने-अपने गांव छोड़कर इस उजड़े रेगिस्तान में बसने आ जाएगी। जनता की मेहनत इस पीले रेगिस्तान को हरे उपजाऊ रंग में बदल देगी।
अपने लोकप्रिय नेता की बात लोक ने मानी नहीं। पर नेता को तो अपने लोगों का उद्धार करना ही था। कर्नल गद्दाफी ने फैसला लिया कि यदि लोग अपने गांव छोड़कर रेगिस्तान में नहीं आएंगे तो रेगिस्तान के भीतर छिपा यह पानी उन लोगों तक पहुंचा दिया जाए। इस तरह शुरू हुई दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे महंगी सिंचाई योजना। इस मीठे पानी की छिपी झील तक पहुंचने के लिए लगभग आधे मील की गहराई तक बड़े-बड़े पाईप जमीन से नीचे उतारे गए। भूजल ऊपर खींचने के लिए दुनिया के कुछ सबसे विशालकाय पंप बिठाए गए और इन्हें चलाने के लिए आधुनिकतम बिजलीघर से लगातार बिजली देने का प्रबंध किया गया।
तपते रेगिस्तान में हजारों लोगों की कड़ी मेहनत, सचमुच भगीरथ-प्रयत्नों के बाद आखिर वह दिन भी आ ही गया, जिसका सबको इंतजार था। भूगर्भ में छिपा कोई दस लाख वर्ष पुराना यह जल आधुनिक यंत्रों, पंपों की मदद से ऊपर उठाए ऊपर आकर नौ दिन लंबी यात्रा को पूरा कर कर्नल की प्रिय जनता के खेतों में उतरा। इस पानी ने लगभग दस लाख साल बाद सूरज देखा था।

कहा जाता है कि इस नदी पर लीबिया ने अब तक 27 अरब डालर खर्च किए हैं। अपने पैट्रोल से हो रही आमदनी में से यह खर्च जुटाया गया है। एक तरह से देखें तो पैट्रोल बेच कर पानी लाया गया है। यों भी इस पानी की खोज पैट्रोल की खोज से ही जुड़ी थी। यहां गए थे तेल खोजने और हाथ लग गया इतना बड़ा, दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञात भूजल भंडार।
बड़ा भारी उत्सव था। 1991 के उस भाग्यशाली दिन पूरे देश से, पड़ौसी देशों से, अफ्रीका में दूर-दूर से, अरब राज्यों से राज्याध्यक्ष, नेता, पत्रकार जनता- सबके सब जमा थे। बटन दबाकर उद्घाटन करते हुए कर्नल गद्दाफी ने इस आधुनिक नदी की तुलना रेगिस्तान में बने मिस्र के महान पिरामिडों से की थी।
लोग बताते हैं कि इन नद से पैदा हो रहा गेहूं आज शायद दुनिया का सबसे कीमती गेहूं है। लाखों साल पुराना कीमती पानी हजारों-हजार रुपया बहाकर खेतों तक लाया गया है- तब कहीं उससे दो मुट्ठी अनाज पैदा हो रहा है। यह भी कब तक? लोगों को डर तो यह है कि यह महा जन नद जल्दी ही अनेक समस्याओं से घिर जाएगा और रेगिस्तान में सैकड़ों मीलों में फैले इसके पाईप जंग खाकर एक भिन्न किस्म का खंडहर, स्मारक अपने पीछे छोड़ जाएंगे।
लीबिया में इस बीच राज बदल भी गया तो नया लोकतंत्र इस नई नदी को बहुत लंबे समय तक बचा नहीं सकेगा। और देशों में तो बांधों के कारण, गलत योजनाओं के कारण, लालच के कारण नदियां प्रदूषित हो जाती हैं, सूख भी जाती हैं। पर यहां लीबिया में पाईपों में बह रही इस विशाल नदी में तो जंग लगेगी। इस नदी का अवतरण, जन्म तो अनोखा था ही, इसकी मृत्यु भी बड़ी ही विचित्र होगी।

(फ्रेड पीयर्स का यह लेख गांधी मार्ग में प्रकाशित हुआ है, प्रस्तुति- अनुपम मिश्र)

भगत सिंह और पेरियार: दो सामानधर्मा युगद्रष्टा

(शहीदे-आजम भगत सिंह के 104 वें जन्म दिन पर)

दक्षिण भारत में सामाजिक-आर्थिक समानता के अग्रदूत पेरियार ई. वी. रामास्वामी भगत सिंह के समकालीन थे और उम्र में उनसे 28 साल बड़े थे. भगत सिंह के विचारों के वे प्रबल समर्थक थे. हाल ही में प्रो. चमन लाल और एस. इरफ़ान हबीब ने अपने शोध-कार्यों के दौरान इस बात के दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत किये हैं.

पेरियार की सबसे बड़ी विशेषता उनकी स्पष्टवादिता थी, जो भगत सिंह से सम्बंधित उनके विचारों में भी स्पष्ट दिखाई देती है. 29 मार्च 1931 को तमिल साप्ताहिक कुडियारासु के सम्पादकीय में पेरियार ने भगत सिंह और गाँधी की तुलना करते हुए भगत सिंह के विचारों के साथ अपनी सहमति जतायी थी. उन्होंने लिखा -“जिस दिन गाँधी ने कहा कि केवल ईश्वर ही उनका मार्गदर्शन करता है, दुनिया को चलाने में वर्णाश्रम धर्म व्यवस्था ही उचित है और हर काम भगवान की इच्छा के अनुसार ही होता है, उसी दिन हम इस निष्कर्ष पर पहुँच गये की गाँधीवाद और ब्राह्मणवाद में कोई अंतर नहीं है. हम इस नतीजे पर भी पहुंचे की अगर ऐसे दर्शन को मानने वाली कांग्रेस पार्टी का खात्मा नहीं होता तो यह देश के लिए अच्छा नहीं होगा और अब यही सच्चाई कम से कम कुछ लोगों को हासिल हो गयी है. उन्होंने गांधीवाद के पतन का आह्वान करने का विवेक और साहस हासिल कर लिया है. यह हमारे उद्देश्य की बहुत बड़ी जीत है.

यदि भगत सिंह फांसी चढ़कर प्राण नहीं गंवाते तो यह जीत इतनी लोकप्रियता के साथ हासिल नहीं होती. हम यह कहने का भी साहस करते हैं कि अगर उन्हें फांसी नहीं होती तो गांधीवाद की जमीन और पुख्ता होती.

जैसा की आमतौर पर लोगों के साथ होता है, भगत सिंह न बीमार पड़े, न पीड़ित हुए और न ही मरे. उन्होंने न केवल भारत को, बल्कि दुनिया को भी असली बराबरी और शान्ति की राह दिखाने के लिए पवित्र उद्देश्य के लिए अपना जीवन निछावर किया. वे उन्नत शिखर तक पहुँच गये. हम अपने हृदय की गहराई से उनकी शहादत की प्रशंसा और गुणगान करते है.”

पेरियार ने भगत सिंह द्वारा पंजाब के गवर्नर को लिखे उस पत्र का भी हवाला दिया जिसमें उन्होंने नास्तिकता और समाजवाद के विचारों में अपना विश्वास व्यक्त किया था. अदालत में बयान देते हुए भगत सिंह ने कहा था “इस सभ्यता की विराट इमारत को यदि समय रहते बचाया नहीं गया तो यह भहराकर ढह जायेगी. इसलिए एक आमूल परिवर्तन जरूरी है और जिन लोगों को इस बात का अहसास है उनका यह कर्तव्य है कि समाजवाद की बुनियाद पर इस समाज का पुनर्गठन करें. अगर ऐसा नहीं किया गया तो आज मानवता के सामने जिस दुस्सह पीड़ा और नरसंहार का ख़तरा मंडरा रहा है उसे रोका नहीं जा सकता.” भगत सिंह के इन विचारों से सहमति जताते हुए पेरियार ने लिखा था कि “छुआ-छूत को ख़त्म करने के लिए हमें ऊपरी और निचली जाति के सिद्धांत को ख़त्म करना होगा. इसी तरह गरीबी मिटने के लिए हमें पूँजीवाद और मजदूरी के सिद्धांत से छुटकारा पाना होगा. इसलिए समाजवाद और साम्यवाद कुछ और नहीं, बल्कि इन अवधारणाओं और व्याख्याओं से निजात पाना ही है. यही वे सिद्धांत हैं जिनकी हिमायत भगत सिंह करते थे.”

पेरियार का मानना था कि ऐसे विचारों को मानना किसी भी क़ानून के तहत अपराध नहीं है . यदि यह किसी कानून के खिलाफ भी समझा जाता है तो किसी को इससे डरने की जरूरत नहीं है क्योंकि हमें पूरा यकीन है कि इन सिद्धांतों का पालन करने से (जिन्हें भगत सिंह सही मानते थे) जनता को कोई हानि नहीं होगी या कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा. हम इन सिद्धांतों को व्यवहार में उतारने का प्रयास कर रहे हैं.”

निष्कर्ष के तौर पर उन्होंने अपने सम्पादकीय में लिखा था-“हमारी यह पक्की राय है कि भारत में सिर्फ भगत सिंह के विचारों की ही जरूरत है.”

आज के इस कठिन दौर में न्याय और समता पर आधारित समाज के सपने को साकार करने में लगे लोगों के लिए इन दोनों युगद्रष्टाओं के विचार और जीवन प्रेरणास्पद हैं.

भ्रष्टाचार के प्रति भद्रलोक का भ्रामक नजरिया – दिगम्बर

र्तमान समाज में प्रचलित और स्थापित धारणा यही है कि अपनी पद-प्रतिष्ठा और जिम्मेदारी का दुरुपयोग करके अपने और अपने खास लोगों के स्वार्थों कि पूर्ति करना तथा पूंजीवादी नैतिकता के मानदंडों और कानूनों का उल्लंघन करके नाजायज धन-संपत्ति जमा करना भ्रष्टाचार है. एक दूसरे प्रकार का भ्रष्टाचार भी है जिस पर यह पूरी समाज व्यवस्था टिकी हुई है, लेकिन वह हराम या गैर-कानूनी नहीं है- पूंजीवादी शोषण और लूट-खसोट. उदाहरण के लिए श्रम का निर्मम शोषण, प्राकृतिक संसाधनो का बेहिसाब दोहन, निजीकरण के नाम पर सार्वजनिक सम्पात्ति का मालिकाना निजी पूंजीपतियों को सौंपना, पूंजीपतियों को टैक्स में छूट और हर तरीके से उनकी तिजोरी भरना, जनता पर टैक्स लादकर मंत्रियों, सांसदों, विधायकों, नौकरशाहों और बुद्धिजीवियों के लिए मोटी तनख्वाहों, राजसी ठाट-बाट और विशेषाधिकारों का इंतजाम करना. पूंजीवादी नैतिकता के अनुसार ये भ्रष्टाचार की श्रेणी में नहीं आते, लेकिन बहुसंख्य मेहनतकश वर्गों और मानवता की दृष्टि से यह सब निकृष्ट और भ्रष्ट आचरण है. भ्रष्टाचार के खिलाफ धर्मयुद्ध छेडने वाले योद्धा इस दूसरे तरह के भ्रष्टाचार की कहीं कोई चर्चा नहीं करते, उनकी निगाह में ये सभी काली करतूतें नैतिक और जायज हैं, केवल स्थापित कानूनों का उल्लंघन करके काला धन बटोरना ही भ्रष्टाचार है जबकि भ्रष्टाचार का ये कानूनी प्रकार इस समूचे लूटतंत्र के आगे कुछ भी नहीं. लेकिन इसकी चर्चा बाद में. पहले प्रचलित अर्थों में भ्रष्टाचार को ही लें, जो लोगों को प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता है, जिसे लेकर लोगों के मन में आक्रोश है और जिसकी रोक-थाम के लिए आज विश्व बैंक, सरकार और भद्रलोक एनजीओ अपने-अपने तरीके से जोर लगा रहे हैं.
भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के भद्रलोक एनजीओ नेता भ्रष्टाचार के प्रति सतही और भ्रामक नजरिया अपनाते हैं. कैसे?
पहला– वे रोग के लक्षण को ही रोग बताते हैं, महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की तबाही और लाखों की संख्या में आत्महत्याएं, मजदूरों का निर्मम शोषण, अमीरी-गरीबी के बीच बढ़ती खाई, बहुसंख्य जनता की कंगाली, बदहाली और प्रवंचना, सांस्कृतिक पतनशीलता और अन्य तमाम लक्षणों की तरह भ्रष्टाचार भी वर्तमान रुग्ण पूंजीवादी व्यवस्था के लाइलाज रोग का एक लक्षण मात्र है. लेकिन भ्रष्टाचार विरोधी धर्मयोद्धा यह भ्रम फैला रहे हैं कि भ्रष्टाचार समाज कि सभी बुराइयों की जड़ है जिसे खत्म कर दिया जाय तो सारी समस्याओं का अंत हो जायेगा.
अपने रोजमर्रे की जिंदगी में आये दिन लोगों का भ्रष्टाचार से सामना होता रहता है. हर छोटे-बड़े काम के लिए उन्हें रिश्वत देनी पड़ती है. इसी का फायदा उठाकर भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के कर्ता-धर्ताओं ने इसे देश कि सारी समस्याओं की जड़ बनाकर पेश किया. कारपोरेट नियंत्रित मीडिया– टीवी, रेडियो और अखबारों ने अपने धुआँधार प्रचार के द्वारा आम लोगों के मन में इसे कॉमन सेंस की तरह स्थापित कर दिया है. हर कॉमन सेंस की तरह यह भी सरासर गलत है. इसके लिए एक सूत्र अजमाया जाय. हर व्यक्ति अपने एक साल का लेखा-जोखा ले कि उसने कितनी जगह कितनी रिश्वत दी. उससे उसे खुद कितना फायदा हुआ? नहीं देने से कितना नुकसान होता? पता चलेगा की 20 रुपये रोज पर गुजर-बसर करने वाले 80 फीसदी लोगों की जिन्दगी में भ्रष्टाचार की कोई गुंजाइश ही नहीं है. यही कारण है कि इन 80 फीसदी लोगों को भद्रलोक इस लायक नहीं समझता कि वे उसके भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में झण्डा, टोपी और टैटू के साथ शामिल हों. आम माध्यम वर्ग के लिए भी यह ढेर सारी समस्याओं में से एक है.
भ्रष्टाचार कि तरह ही पूंजीवादी रोग का एक लक्षण महंगाई है जिसके चलते हर आदमी को अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ता है, चाहे 20 रूपये पर गुजारा करने वाले हों या हजारों रुपये मासिक कमाने वाले. तुलना करें कि एक साल में किसने हमारा कितना अधिक प्रत्यक्ष दोहन किया? बेरोजगार यह सोचें कि यदि सम्मानजनक रोजगार मिल जाये तो पिछले एक साल में भ्रष्टाचारियों को दी गयी रिश्वत की तुलना में उसका कितना फायदा होता? खेती तबाह न हो तो कोई किसान आत्माहत्या करने के बजाय क्या ब्याज चुकाना और घूस देना पसंद नहीं करेगा? इन बातों का मतलब भ्रष्टाचार का समर्थन करना नहीं बल्कि उनके ‘कॉमन सेंस’ का जवाब उन्हीं की भाषा में देना है. क्योंकि इसी पद्धति से भ्रष्टाचार विरोधी भ्रष्टाचार को सबसे बड़ी समस्या बना कर उसे लोगों के मष्तिस्क में रोप रहे हैं. भ्रष्टाचार को लक्षण की जगह रोग बताने वाले ये ध्वजाधारी वास्तव में लोगों का ध्यान जनता की मूल समस्याओं– महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की तबाही, आम जनता की बढती बदहाली और कानून के संरक्षण में हो रहे देशी-विदेशी पूंजीपतियों की बेलगाम लूट से हटा रहे हैं, जिनके मूल में नवउदारवादी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था है. इसके चलते लोगों को लगता है कि जन लोकपाल बनने और लोकपाल का पद सृजन होने से उनकी सारी समस्याएं हल हो जाएँगी. इस तरह जनता का गुस्सा कुछ समय के लिए शांत हो जायेगा. आंदोलनकारियों का यही मकसद है .
दूसरा— भ्रष्टाचार की जड़ तक पहुँचने, उसका कारण तलाशने या उसके असली स्रोतों को निशाना बनाने और उसे निर्मूल करने के बजाय भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलनकारी केवल ऊपरी तौर पर सुधार करने और कानून के जरिये इस पर रोक लगाने की बात करते हैं. इस कानून के अधीन देशी-विदेशी पूंजीपतियों को लाने से इन्कार करते हैं और केवल उनके निरंतर जारी भ्रष्टाचार में सहयोग करने वाले नेताओं और नौकरशाहों के खिलाफ कानून बनाने कि बात करते हैं. 2जी स्पेक्ट्रम का घोटालेबाज में ए. राजा तो पहले से मौजूद कानून के तहत ही जेल में है. लेकिन जिन मोबाइल कंपनियों को उसके जरिये 1,75,000 करोड़ का मुनाफा हुआ उन देशी-विदेशी पूंजीपतियों को इस नये कानून के अधीन लाने का कहीं कोई जिक्र नहीं है. इसी तरह वे व्यस्थापोषक मीडिया और एनजीओ को भी इस कानून की पकड़ से बाहर रखने के हिमायती हैं.
अन्ना टीम यह मानकर चलती है कि भ्रष्टाचार केवल सरकारी संस्थानों में ही है. इसीलिए वे निचले स्तर तक के सरकारी कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाने कि मांग करते हैं. सरकारी स्कूल, अस्पताल और सरकारी सेवाओं के भ्रष्टाचार के प्रति उनकी चिंता जायज है. लेकिन आज निजीकरण के चलते शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, सड़क और पानी-बिजली का जिम्मा नाम मात्र ही सरकार के अधीन है. ये सारे कारोबार अब निजी पूंजीपति और एनजीओ सम्भाल रहे हैं जिन पर कोई सरकारी अंकुश नहीं है, सरकारी लोकपाल और जनलोकपाल दोनों में ही उन्हें शामिल नहीं किया गया. इसमें अचरज की कोई बात नहीं, क्योंकि दोनों ही पक्ष नवउदारवादी नीतियों के प्रबल समर्थक हैं और दोनों को पूंजीपतियों के भ्रष्टाचार से कोई शिकायत नहीं है.
1991 में नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों के लागू होने के बाद जितने भारी पैमाने पर भ्रष्टाचार की घटनाएं सामने आई हैं उसने माध्यम वर्गीय लोगों में तीव्र आक्रोश उत्पन्न किया है. अन्ना के आह्वान पर ऐसे लोग सडकों पर उतरे. अन्ना टीम ने उस जनाक्रोश को सही दिशा देने और भ्रष्टाचार की जड़ों पर प्रहार करने के बजाय उसे सतही और बेमानी सुधारों के ठन्डे पानी में डुबो दिया क्योंकि इस भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का अंतिम लक्ष्य केवल एक अदद कानून बनाना था. निजीकरण-उदारीकरण के नाम पर देश की सार्वजनिक सम्पदा और प्राकृतिक संसाधनों को कौडियों के मोल पूंजीपतियों के हवाले करने वाली नीतियों को पलटे बगैर किसी भी कानून से इस भ्रष्टतंत्र पर कोई आंच नहीं आने वाली है. इस विषय पर अन्ना टीम मौन है. भ्रष्टाचार का स्रोत देशी-विदेशी पूंजीपति हैं. पूंजीवादी-साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था और उसके असली मालिक पक्ष–विपक्ष की पार्टियों के नेता और नौकरशाह दिन-रात उनकी सेवा में जुटे रहते हैं. अपनी अपार संपत्ति के दम पर पूंजीपति वर्ग अपने मनोनुकूल कानून बनवाने और लागू करवाने के लिए नेताओं, नौकरशाहों, मीडिया, पत्रकारों, विशेषज्ञों और लॉबिंग करने वालों को खरीदते हैं. वे करोड़ों की रिश्वत देकर अरबों-खरबों की लूट करते हैं. चाहे सरकारी लोकपाल हो या अन्ना का जन लोकपाल, दोनों में से किसी ने भी इनको निशाना नहीं बनाया. शायद यही कारण है कि अन्ना के आन्दोलन को इन्हीं पूंजीपतियों का प्रत्यक्ष-परोक्ष सहयोग और समर्थन हासिल हुआ.
विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी साम्राज्यवादी संस्थाएं और बहुराष्ट्रीय निगम दुनिया भर में भ्रष्टाचार के बहुत बड़े स्त्रोत हैं. इस पर अनेक शोध, अध्ययन और लेख प्रकाशित हो चुके हैं. तीसरी दुनिया के देशों के शासन-प्रशासन के ढाँचे को भ्रष्ट करके अपने मनोनुकूल नीतियां बनवाना, अपने गुप्त समझौतों और दुरभिसंधियों को लागू करवाना, अपने लिए बड़े-बड़े ठेके और परियोजनाएं हासिल करना, हथियार के सौदे करना, अपने निर्यात को सुलभ बनाना, प्राकृतिक संसाधनों को हथियाना इनके रोजमर्रे के काम हैं. भारत में बड़े पैमाने के भ्रष्टाचार की जमीन इन्हीं विदेशी ताकतों और देशी पूंजीपतियों की मिलीभगत से तैयार हुई है. जब भ्रष्टाचार का कोई ठोस मामला किसी तरह उजागर हो जाता है तो वह सबको दिख जाता है और लोगों को गुस्सा भी आता है. लेकिन कानूनी लबादे से ढका हुआ भ्रष्टाचार का विकट दानव हमें नहीं दिखाई देता. हम उसे स्वाभाविक मानते हैं क्योंकि विकास के नये मंत्र के रूप में सब हमारे मन-मष्तिस्क में रोप दिया जाता है. अन्ना टीम इसी स्थिति का लाभ उठाते हुए केवल सतही भ्रष्टाचार को निशाना बनाते हैं और इसके लिए भारी समर्थन भी हासिल कर लेते हैं.
तीसरा- भ्रष्टाचार को लेकर हाय-तौबा मचाने वाले नैतिकता के प्रचारक, धर्मोपदेशक, अर्थशास्त्री, समाज सुधारक, पत्रकार और बुद्धिजीवी, इसके वर्गीय आधारों पर पर्दा डालते हैं और इसे लोभ-लालच की सामान्य मानवीय प्रवृत्ति और नैतिक पतन का नतीजा मानते हैं. वे हीरा चुराने वालों और खीरा चुराने वालों को एक ही तराजू पर तौलते हैं. इस तरह यह आम धारणा बन गयी है कि हमारे समाज में सभी लोग भ्रष्ट हैं. यह सरासर झूठ है.
समाज के विभिन्न वर्गों और भ्रष्टाचार के साथ उनके संबंधों की जांच करें तो इस प्रचलित धारणा से एकदम अलग ही तस्वीर सामने आती है. कुछ वर्ष पहले प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो.अरुण कुमार ने भारत में भ्रष्टाचार पर अपना अध्ययन प्रस्तुत किया था जिसके अनुसार उस दौरान देश में 25,00,0000 करोड़ की काले धन की सामानांतर अर्थव्यवस्था मौजूद थी. इस अपार काली कमाई के लिए जिम्मेदार कौन है? इस पर किसका कब्ज़ा है?
हमारे देश में लगभग 30 करोड़ लोग शहरों में रहते हैं जिनमें से आधी आबादी छोटे-मोटे धंधो में लगे लोगों और मेहनतकशों की है. देश की कुल अर्थव्यवस्था में इनका हिस्सा बहुत कम है तथा भ्रष्टाचार और काले धन की अर्थव्यवस्था में इनकी भागीदारी नगण्य है. शहरी आबादी के बाकी आधा भाग का अधिकांश हिस्सा ही भ्रष्टाचार में लिप्त है जिनके शीर्ष पर पूंजीपति, उद्योगपति और उनका प्रबंध तंत्र, डीलर, डिस्ट्रीब्यूटर, कमीशन एजेंट, सट्टेबाज तथा निर्माण, रियल इस्टेट, शिक्षा,स्वास्थ्य, मनोरंजन, पेंशन और सेवा क्षेत्र के विभिन्न व्यवसायों के मालिक और सरकारी अधिकारी, कर्मचारी, छोटे-मझोले पूंजीपति, व्यापारी और अन्य परजीवी शामिल हैं. ये सब आपस में मौसेरे भाई हैं. ग्रामीण आबादी का एक बहुत छोटा और नगण्य हिस्सा ही काले धन कि अर्थव्यवस्था में शामिल है क्योंकि देश की अर्थव्यवस्था में ग्रामीण इलाके की भागीदारी बहुत कम, लगभग 20% है. प्रोफ़ेसर अरुण कुमार का अनुमान है कि आबादी का 3% उपरी हिस्सा ही काले धन की अर्थव्यवस्था में सबसे ज्यादा लिप्त है. यदि छोटे-बड़े सभी तरह के भ्रष्टाचार को ले लिया जाय तो यह दायरा 15% उपरी तबके तक जाता है. एक अध्ययन के मुताबिक देश की आधी आय ऊपरी 20% लोगों के हाथ में जाती है. यानि इतनी बड़ी आमदनी के साथ-साथ यही उपरी तबका 25,00,0000 लाख करोड़ के काले धन पर भी काबिज है. इसी काले धन कि बदौलत इस वर्ग का इस देश की सत्ता पर भी नियंत्रण है जिसके जरिये यह धनाढ्य वर्ग कानूनी तौर पर अपने लिए मोटी तनख्वाह और सुविधाएं (वेतन आयोग बनाकर या संसद में प्रस्ताव पास करके) जुटाने के अलावा, टैक्स में छूट, सरकारी धन का बंदरबाँट, अरबों का फायदा पहुँचाने के बदले करोड़ों की रिश्वत और हर तरह के जुगाड़ से सार्वजनिक संपत्ति की कानूनी-गैरकानूनी लूट में दिन रात शामिल रहता है. यही तबका वैश्वीकरण, उदारीकरण, निजीकरण का सबसे बड़ा पैरोकार और नवउदारवादी लूटतंत्र का सामाजिक आधार है. इसे अपने अलावा सभी भ्रष्ट नजर आते हैं और सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार पर प्रवचन भी यही लोग देते हैं. अन्ना के आन्दोलन में भी इसी तबके के लोग सबसे आगे थे. अपनी सुविधानुसार भ्रष्टाचार को लेकर इनके अलग-अलग बोध हैं. इनका मानना है कि इनकी परिभाषा के मुताबिक़ जो भ्रष्टाचार है, उसे खत्म कर दिया जाये तो यह व्यवस्था सुचारू रूप से चलने लगेगी. सरकार और सिविल सोसाइटी के बीच टकराव का कारण यही अलग-अलग बोध है. अगर देश में पहले से ही मौजूद कानूनों को कड़ाई से लागू कर दिया जाय तो शायद इस तबके के कुछ लोगों को छोड़कर बाकी सभी जेल की सलाखों के पीछे होंगे. लेकिन व्यवस्था को चलाने वाले लोग भी चूँकि इसी तबके से हैं, इसीलिए हमारे यहाँ छोटे चोरों को सजा होती है और बड़े चोरों को पुरस्कृत किया जाता हैI जब तक चोरी पकड़ी नहीं जाती, तब तक हर चोर प्रतिष्ठित नागरिक होता है, चाहे कलमाड़ी हों, ए.राजा, हसन अली, रेड्डी बंधु, यदुरप्पा या अलां-फलां… सूची अंतहीन है. सत्ता के शीर्ष पर विराजमान लोगों तथा सफेदपोश और संगठित अपराधियों के बीच गहरे रिश्ते हैं. लोकपाल की जगह साक्षात ब्रह्मा-विष्णु-महेश भी आ जायें तो वे भी इस व्यवस्था के रहते कुछ नहीं कर पाएंगे.
दरसल भ्रष्टाचार इस व्यवस्था का अलिखित विधि-विधान और समान्तर कार्य-प्रणाली है. यह इस व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने में ग्रीस और मोबिल ऑयल का काम करता है. भ्रष्टाचार से एकत्रित काले धन का एक हिस्सा स्विस बैंक या लिचेंस्टीन बैंक में जमा होता है फिर विश्व अर्थव्यवस्था में सफ़ेद बनकर दौड़ता है. (भारत में विदेशी निवेश और कर्ज के रूप में वापस आकर प्रतिष्ठित होता है.) दूसरा भाग अपने ही देश में सफ़ेद होकर पूँजी में बदल दिया जाता है और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का वैधानिक हिस्सा बन जाता है. इस कार्य के लिए एक पूरी कार्य प्रणाली विकसित हुई है- दान-पुण्य से लेकर खेती की आय, मनोरंजन उद्योग, भवन निर्माण उद्योग और यहाँ तक की मनी लैंडरिंग (काले धन की स्वैछिक घोषणा ) कानून तक. ताजा समाचार यह है कि भारत के पूंजीपतियों ने सरकार से विदेशों में जमा कला धन आसानी से वापस लाने के लिए क़ानून बनाने की अपील कि है ताकि पूंजी निवेश कि समस्या हल हो. इस तरह वर्तमान दौर में भ्रष्टाचार की बेलगाम बढ़ती प्रवृत्ति दरअसल आदिम पूँजी संचय का ही एक रूप है. यह आदम-हव्वा के द्वारा वर्जित फल खाने की तरह ही पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का आदिम पाप है. पूँजी शिष्टाचार से पैदा नहीं होती, जन्म से ही वह खून और कीचड़ से लथपथ होती है.
वैश्वीकरण के इस दौर में अर्थतंत्र और राजनीति के बीच, सार्वजनिक और निजी स्वार्थों के बीच तथा व्यवसाय और जनसेवा के बीच के सारे फर्क मिटाए जा रहे हैंI इसी के साथ सत्ता की राजनीति खुद ही एक नग्न रूप ले चुकी हैI एक जमाना था जब इसे ठीक नहीं माना जाता था हालाँकि तब भी सत्ता की राजनीति पूंजीवादी व्यवसाय को संरक्षण देने और बदले में अपने लिए उनसे चंदा लेने का काम करती थी जो स्वीकृत और जायज था. अक्सर यह भ्रम फैलाया जाता है कि लोकतंत्र में सरकार का काम बाजारवाद और पूँजीवादी अर्थतंत्र पर अंकुश रखना है, ताकि वे जनता का निर्मम शोषण न करें. सच्चाई यह है कि सरकार का काम पूँजीवाद की हिफाजत करना है. नेहरूवाद के दौर में इस पर समाजवाद-संरक्षणवाद का पर्दा पड़ा हुआ था जिसे अब हटा दिया गया है. अब पूंजीपति और उनके नुमाइंदों के बीच का अंतर काफी हद तक मिट गया है. यही कारण है कि पूँजीवाद द्वारा श्रम की वैधानिक लूट और शोषण, जो वास्तव में भ्रष्टाचार ही है, उसे काफी पीछे छोड़ते हुए हर कीमत पर मानव श्रम, प्राकृतिक संसाधन और सार्वजनिक संपत्ति की लूट-खसोट में ज्यादा तेजी आयी है. इसके साथ ही भ्रष्टाचार का नंगा नाच भी पहले से कई गुना अधिक बढ़ा है. इंदिरा गाँधी के ज़माने में जो 10 लाख रुपये का नागरवाला कांड हुआ था, वह आज के हर्षद मेहता, हसन अली, कलमाड़ी और ए. राजा कांड के आगे भला क्या था? ‘भद्रलोक’ को पूंजीवादी अर्थव्यवस्था और पूंजीवादी शोषण के बेलगाम होने से कोई शिकायत नहीं है. वे सतह पर दिखने वाले भष्टाचार के इस घिनौने चेहरे से लज्जित हैं और इसे खत्म करके पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की छवि सुधारने का अपना कर्त्तव्य निभा रहे हैं. इससे आगे वे देखना नहीं चाहते.
अमेरिका के कहने पर मणि शंकर अय्यर को हटा कर मुरली देवड़ा को पेट्रोलियम मंत्री बनाना, क्योंकि अमेरिका इरान-पकिस्तान-भारत गैस पाइप लाइन के विरुद्ध था, यह कहाँ का शिष्टाचार है? पूंजीपतियों का एक समूह एक लौबिस्ट को भरपूर पैसा देकर अपने मनमाफिक आदमी ए.राजा को संचार मंत्री बनवाता है, अतीतग्रस्तता के कारण गुटनिरपेक्षतापूर्ण बयानबाजी कि जुर्रत करने वाले विदेश मंत्री नटवर सिंह को निकाल बाहर करना और वे तमाम बातें जिनका खुलासा विकिलिक्स ने किया, भला किस कोटि का आचार हैं? बिना लेन-देन के ही सही, सार्वजनिक संपत्तियों की कोड़ियों के मोल नीलामी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित में असमान व्यापार समझौते, नाभिकीय समझौते पर संसद की मोहर लगवाने के लिए खरीद-फरोख्त (जिसके बारे में सर्वोच्च न्यायालय ने पूंछा है कि इतना पैसा कहाँ से आया?) यह सब नैतिकता की किस कोटि में आते है? ऐसे मामलों में ‘भद्रलोक’ गाँधी जी के तीन बंदरों कि तरह आचरण क्यों करता है?
सबसे बड़ी बात यह कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में कोई भी भ्रष्टाचार शिष्टाचार बन जाता है, जब व्यवस्था के संचालक किसी भ्रष्ट आचरण-व्यवहार या पेशे को कानूनी जामा पहना देते हैं, जैसे- वित्तमंत्री के मुख्या सलाहकार कौशिक बासु ने कुछ विशेष प्रकार की रिश्वतखोरी को वैधानिक बना देने का सुझाव दिया और शीर्षस्थ पूंजीपति नारायणमूर्ति सहित अनेक लोगों ने इसका समर्थन भी किया. लॉबिंग को परामर्श सेवा का दर्जा देने कि चर्चा चल रही है, पैसा लेकर सवाल पूछने और अमेरिका की तरह यहाँ भी सांसदों को लॉबी बनाने की इजाजत देने की सिफारिश कुछ साल पहले भाजपा ने की थी. काले धन को सफ़ेद करने के लिए कानून बनाया जाना, सोने के आयात की छूट देना, सीमा शुल्क 350% से घटाकर 10% कर देना, श्रम कानूनों में ढील देकर मजदूरों के निर्मम शोषण को कानूनी रूप देना, उदारीकरण-निजीकरण के जरिये पूँजी को बेलगाम छूट देना, 1991 से पहले गैर कानूनी समझे जाने वाले काले धंधों (काला बाजारी, सट्टेबाजी, जमाखोरी, कर चोरी) को कानून बनाकर वैधानिक करार देना भी उसके अन्य उदाहरण हैं. विदेशों से सोना लाने वाले तश्करों पर अब फिल्में नहीं बनती. नेपाल से विदेशी उपभोक्ता वस्तुओं की तश्करी अब पुराने ज़माने की बात हो गयी है. ऐसे ढेर सारे धंधे जो 1991 से पहले भ्रष्टाचार की श्रेणी में आते थे आज वे शिष्टाचार हैं. अभी ढेर सारे ऐसे भ्रष्टाचार है जो शिष्टाचार की श्रेणी में बदले जाने की प्रतीक्षा में है. सम्भव है कि लोकपाल के पदभार सँभालने तक भ्रष्टाचार के ढेर सारे मामले उनके दायरे से बाहर हो जायें. संसद में अस्सी से अधिक कानून पास होने कि बात जोह रहे हैं.
भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के ध्वजवाहक लोगों में लोकरंजक शैली में कहते हैं कि ‘सरकार नौकर है और हम सब उसके मालिक हैं’. वे यह नहीं बताते कि आखिर क्यों यह नौकर अपने मालिक की छाती पर मूंग दल रहा है? लोकतंत्र बहुमत की इच्छा न होकर कुलीनतंत्र क्यों है? राज्य के संचालकों के पास जितने अधिकार केंद्रित होते हैं उसके कारण उनका नौकर से मालिक बन जाना, भ्रष्टाचार रोकने के बजाय उसका स्रोत बन जाना लाजिमी है. साथ ही, यह प्रक्रिया उतनी ही तेज होती जाती है जितनी तेजी से गरीबी-अमीरी की खाई चौड़ी होती जाती है, बहुसंख्य जनता कंगाली के गर्त में धकेली जाती है, उसे राज-समाज के काम-काज में भागीदार होने के लायक नहीं समझा जाता (क्योंकि सरकारी नीतियों के चलते भद्रलोक की तुलना में राष्ट्रीय आय में उनका हिस्सा लगातार कम से कमतर होता जाता है) और सरकार के विभिन्न अंग जितना अधिक खुद को जनता से दूर करते जाते हैं. भ्रष्टाचार की आपराधिक कार्यवाहियों के अलावा शासक वर्ग अपने विशेष अधिकारों के दम पर अपने और अपने सहयोगियों के वेतन-भत्ते और सुविधाएं, जनता की बहुमत की औसत आय (जहाँ 77% लोग 20 रूपया रोज पर गुजर करते हैं) से कई कई गुना अधिक बढ़ाते चले जाते हैं. आर्थिक हैसियत के साथ-साथ उनकी सामाजिक हैसियत भी बढ़ती है और वे जनता के ऊपर सवारी गांठने वाले नये राजा-महाराजा बनते जाते हैं. आज की पीढ़ी के लिए कल्पना करना शायद कठिन हो कि पहले अधिकांश नेता (भले ही उनके विचार पूंजीवादी हों और वे मूलतः पूंजीपतियों के ही नुमाइंदे रहे हों) आज से बहुत कम सुविधा संपन्न थे. बसों में आज भी ‘सांसद और विधायक सीट’ लिखा दिख जाता है जो बताता है कि पहले वे लोग भी बसों में सफर करते रहे होंगें. जनता की बढ़ती कंगाली की कीमत पर अपने लिए वैभव-विलास जुटाने कि यह कार्यवाही खुली तानाशाही के अधीन तो होती ही है, लेकिन उन लोकतान्त्रिक देशों में भी निर्बाध रूप से होती है जहाँ राज्य के केवल एक अंग (विधायिका) का मतदान के द्वारा चुनाव करने की औपचारिकता के अलावा ऊपर से नीचे तक किसी भी ‘लोकतान्त्रिक’ संस्था में या उसकी कार्यवाहियों में जनता की कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं होती. राज्य के प्रमुख कार्यकारी अंग नौकरशाही और न्यायतंत्र का चुनाव लोकतांत्रिक तरीके से नहीं होता, बल्कि इन विशेषाधिकार प्राप्त और सुविधा संपन्न लोगों को जनता पर ऊपर से थोप दिया जाता है. निगम नियंत्रित मीडिया भी जिसे लोकतंत्र का पहरेदार कहा जाता है, बाजार और मुनाफे से प्रेरित है और मुनाफाखोरी के परम हितैषी है. पिछले दिनों मीडिया-नेताओं-पूँजीपतियों की दुरभिसंधियों के एक से बढ़कर एक मामले सामने आये. कुल मिलाकर इनमें से कोई भी संस्था जनता के प्रति जवाबदेह नहीं है. इन सबका हित जनता के विपरीत है. इनको जनता का नौकर बताना जनभावनाओं को सहलाना और लोगों को भरमाना है. भ्रष्टाचार की जननी, इस पूरी व्यवस्था की असलियत बताने और पर्दाफाश करने के बजाय उसी पर निर्भर रहते हुए भ्रष्टाचार मिटाने की बात करना, उसे और अधिक मजबूत बनाने के लिए कठोर कानून की हिमायत करना और उसके प्रति अन्धश्रद्धा को बढ़ावा देना दरसल भ्रष्टाचार को चिरस्थायी बनाना है. भ्रष्टाचार की जड़ पर प्रहार करने के बजाय उस पर अंकुश लगाने के लिए प्रशासनिक और कानूनी सुधारों की मांग करना जनता में व्याप्त व्यवस्था विरोधी असंतोष और आक्रोश को शांत करना और उसके मन में व्यवस्था के प्रति विश्वास पैदा करने का प्रयास मात्र है. जब तक राज्य के सभी अंगों का जनता से अलगाव दूर नहीं होता, राज्य चलाने के कार्यों में जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी सुनिश्चित नही होती, राज्य के सभी अंग जनता के प्रति पूरी तरह से जवाबदेह नहीं होते, चुने जाने, चुनने और वापस बुलाने का अधिकार सही मायने में बहुमत के हांथों में नहीं आता, तब तक ‘नौकर के मालिक बन बैठने’ और उसे भ्रष्ट होने से दुनिया की कोई ताकत रोक नहीं सकती. यह सतही सुधारों या कानूनी फेर-बदल से नहीं होगा. लूट पर टिकी पूंजीवादी अर्थव्यस्था के रहते इनमें से कुछ भी सम्भव नहीं है.
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