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रघुवीर सहाय की कविता गुलामी:-

गुलामी

मनुष्य के कल्याण के लिए
पहले उसे इतना भूखा रखो कि वह और कुछ
सोच न पाए
फिर उसे कहो कि तुम्हारी पहली जरुरत रोटी है
जिसके लिए वह गुलाम होना भी मंजूर करेगा
फिर तो उसको यह बताना रह जायेगा कि
अपनों कि गुलामी विदेशियों की गुलामी से बेहतर है
और विदेशियों की गुलामी वे अपने करते हों
जिनकी गुलामी तुम करते हो तो वह भी भला क्या बुरी है
तुम्हे तो रोटी मिल रही है एक जून .

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रघुवीर सहाय की ये कविता वर्तमान दौर पर एक करारा व्यंग है –

आप की हँसी
निर्धन जनता का शोषण है
कह – कर आप हँसे
लोकतंत्र का अन्तिम क्षण है
कह – कर आप हँसे
सब के सब हैं भ्रस्टाचारी
कह – कर आप हँसे
चारो ओर बड़ी लाचारी
कह – कर आप हँसे
कितने आप सुरक्षित होंगे मै सोचने लगा
सहसा मुझे अकेला पाकर फ़िर से आप हँसे

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