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पता है, आधार क्यों अनिवार्य नहीं है?

-राम कृष्णास्वामी 

आधार/एकल पहचान पत्र (यूआईडी)का विरोध कर रहे आंदोलनकारी पिछले तीन सालों से यह दलील दे रहे हैं कि यह सांप्रदायिक हमले की और ले जा सकता है, गैरकानूनी प्रवासियों की मदद कर सकता है, निजता में दखलंदाजी कर सकता है, असंसदीय है, इसे संसद से स्वीकृति नहीं मिली है, गैरकानूनी है, इत्यादि. फिर भी एकल पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) और संप्रग नेतृत्व द्वारा इन सभी आपत्तियों की अनसुनी की गयी.

साथ ही, आधार अनिवार्य नहीं है और इसीलिए कहा गया कि ये आपत्तियाँ अमान्य हैं. मध्यम और उच्च वर्ग के भारतीय यूआईडी की बहस पर चुप्पी साधे रहे, क्योंकि इससे उनके ऊपर जरा भी प्रभाव नहीं पड़ता. यूआईडी नामांकन केन्द्रों पर लोगों की लंबी कतारों को देखने से इस धारणा की पुष्टि होती है.

नंदन नीलकानी और यूआईडी महानिदेशक आर एस शर्मा ने बार-बार राष्ट्र को कहा कि यूआईडी, जिसे अब आधार कहा जाता है, बाध्यकारी नहीं है. फिर भी, वे कहते हैं कि एक समय बाद यह सर्वव्यापी भी हो सकता है, जब सेवा देने वाली संस्थाएं सेवा लेने के लिए इसे अनिवार्य बनाने पर जोर डालें. नंदन नीलकानी के ही शब्दों में- “हाँ, यह स्वैच्छिक है. लेकिन सेवा देनेवाले इसे बाध्यकारी बना सकते हैं. आने वाले समय में, मैं इसे अनिवार्य नहीं कहूँगा. इसकी जगह मैं कहूँगा कि यह सर्वव्यापी हो जायेगा.”

जबसे भारत सरकार ने गरीब और हाशिए पर धकेल दिये गये लोगों के लिए एकल पहचान संख्या के विचार से खेलना शुरू किया, तभी से राष्ट्र को यही बताया जाता रहा कि यह बाध्यकारी नहीं है.
कभी इस पर आश्चर्य हुआ कि क्यों?

एक सवाल आन्दोलनकारियों ने कभी नहीं पूछा कि “आधार अनिवार्य क्यों नहीं है?”

इसका कारण बहुत साफ़ है और लगातार हम सब की आँखों में घूरता रहा है, फिर भी शायद किसी ने यह सवाल  नहीं उठाया. आज क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है, उस पर यह सवाल कुछ और रोशनी डालता है.

सरसरी तौर पर देखने से ही इन दोनों मंसूबों में भारतीय इतिहास के सबसे विद्वान मुर्ख तुगलक की प्रतिध्वनि सुनाई देती है. इस तरह के मंसूबों का मकसद महान राष्ट्र का निर्माण करना नहीं होता, वास्तव में ये कंगालों की पीढ़ी तैयार करने का अचूक तरीका हो सकते हैं. गरीबी तब तक “अच्छी” थी जब तक ग़रीबों में उससे संघर्ष करने और ऊपर उठने की गरिमा कायम थी. जबकि कंगालीकरण उस चेतना और आत्म-गौरव को ही मार देगा जो एक अरब से भी अधिक आबादी वाले एक राष्ट्र के कायम रहने और आगे बढ़ने के लिए बहुत ही जरूरी है.

मानव जाति का इतिहास गवाह है कि जो लोग मालिक की स्थिति में थे, वे हमेशा अपने गुलामों के लिए किसी न किसी तरह का पहचान-चिन्ह चाहते थे. सिर्फ गुलाम और उसके परिवार का नाम लिखना ही पर्याप्त नहीं था. गुलामों को नाव में लादते समय मालिक उनकी बाँहों को दाग कर कोई चिन्ह बना देते थे. रूसी साम्राज्य के ज़माने में कतोर्श्निकी (सार्वजनिक गुलामों) को भयानक तरीके से चिन्हित किया जाता था- उनके ललाट और गाल पर  गुलाम शब्द गोद कर उस पर बारूद रगड़ दिया जाता था. कई देशों में गुलामों का सिर मूड कर सिर्फ एक चुटिया छोड़ दी जाती थी. सिर मूडना पुंसत्व-हरण, यानी मर्दानगी, सत्ता और आजादी छीन जाने का प्रतीक था. वर्चश्व के संबंधों के सबसे चरम रूपों में से एक है गुलामी, जिसमें मालिक के लिए सम्पूर्ण सत्ता और गुलाम के लिए पूरी तरह सत्ताहीनता की सारी हदें पार कर ली जाती हैं.

भारत में, वर्तमान सन्दर्भ में राजसत्ता “मालिक” है जो कहती है कि ग़रीबों को जिन्दा रहने के लिए सिर्फ 32 रुपया ही काफी है, जबकि पूँजीवादी मालिक 500 की थाली का खर्च उठा सकते हैं. भारतीय जनता “गुलाम” है जो गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करती है, जिनको कहा गया है कि जब तक तुम्हारे पास ऊँगली की छाप सहित  एक नंबर नहीं है, तब तक तुमको सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान से तीन रुपये किलो चावल पाने का हक नहीं है. भारत में एक गुलाम सामाजिक रूप से मृत प्राणी है, जिसकी पहचान मालिक द्वारा जारी की गयी एक संख्या से की जा सकती है, न कि उसके पिता, माता या दुनिया के साथ जोड़ने वाली कोई दूसरी सामाजिक कड़ी से.

यह सवाल अक्सर सामाजिक कार्यकर्ताओं से पूछा जाता रहा है कि “आपको निजता के बारे में परेशान होने की क्या जरूरत है, अगर आपके पास छुपाने के लिए कुछ है ही नहीं?” इसी सिद्धांत से यह बात भी तो निकलती है कि “जिन लोगों के पास छुपाने के लिए कुछ हो, वे निश्चय ही कोई ऐसी विशिष्ट पहचान संख्या नहीं चाहते जो उनके जैविक मापकों, जैसे ऊँगली की छाप या पुतलियों के फोटो से जुड़ा हो.”

हाल ही में किये गये स्टिंग ऑपरेशन से पता चला कि कई बैंक भ्रष्ट लोगों को बिना उनकी पहचान खोले, उनकी हराम की काली कमाई सफ़ेद करने की सहूलियत मुहैय्या करते हैं. कमाल है कि बैंकर काला धन सफ़ेद बनाने में भ्रष्ट लोगों की इतनी आसानी से मदद करते है. अब कल्पना कीजिए कि भारत के भ्रष्ट लोग आधार को अनिवार्य बनाये जाने पर क्या प्रतिक्रिया देंगे. कानून का पालन करवाने वाली संस्थाएं छुपाये गये धन को बेनकाब करने में आधार संख्या और उससे सम्बंधित जैविक माप का इस्तेमाल करेंगी और वह भी केवल भारत में ही नहीं, बल्कि स्विस बैंकों और सिंगापुर के बैंकों में भी, क्योंकि आजकल सिंगापुर गैरकानूनी धन छुपाने वालों का नया स्वर्ग बन गया है.

अगर समय के साथ आधार को बाध्यकारी बना दिया गया, तो इससे सम्बंधित जैविक माप का इस्तेमाल सारे भ्रष्ट नौकरशाहों, राजनेताओं और पूँजीपतियों का भंडाफोड करने में हो सकता है. तब उनकी हालत खस्ता हो जायेगी. तय है की सरकार ऐसे दानव को सुलभ बनाना नहीं चाहती. इसीलिए आधार बाध्यकारी नहीं है. इसलिए कार्यकर्ताओं को  विशिष्ट पहचान संख्या प्राधिकरण के अध्यक्ष और संप्रग सरकार को खुली चुनौती देनी चाहिए कि अगर हिम्मत है तो वे आधार को सबके लिए बाध्यकारी बनाएँ और देश को भीतर से खोंखला कर रहे इन कीड़ों को नेस्तनाबूद करने में मदद करें.

नीलकानी महोदय, एक बार आपने पूछा था कि “मैं क्या हूँ? कोई विषाणु?”

आधार को सभी भारतीयों के लिए बाध्यकारी बना कर, चाहे अमीर हो या गरीब, आप साबित करो कि विषाणु नहीं हो, और दिखाओ कि तुम्हारे “कल्पना का भारत” राष्ट्र की सच्ची सेवा का प्रयास है.

जाहिर है कि आप एक ऐसी व्यवस्था मुहय्या नहीं करना चाहते जहाँ सभी लोग बराबर हों, बल्कि कुछ लोगों को  ज्यादा बराबर बनाना चाहते हैं, जिन्हें आधार को नकारने का अधिकार हो. लेकिन पक्के तौर पर जान लीजिए कि जिस दिन आप का प्राधिकरण और भारत सरकार आधार को बाध्यकारी बनती है, उसी दिन यह राष्ट्र, यानी धनाढ्य और शक्तिशाली वर्ग आप लोगों को विशिष्ट पहचान संख्या का असली रंग दिखा देगा.

एक राष्ट्र के रूप में हम सब एकजुट हो कर इस सरकार से सवाल कर सकते हैं—

“आधार बाध्यकारी क्यों नहीं है?”

धनवानों और वंचितों में भेदभाव करके आधार एक नयी तरह की जाति व्यवस्था क्यों बना रही है, जो पहले से ही खंडित देश को और अधिक तोड़ने का काम करेगी?

आधार इसलिए बाध्यकारी नहीं है, ताकि इसका फायदा उठाते हुए नीच कोटि के अपराधी, जैसे हत्यारे, बलात्कारी, गबन करने वाले, टैक्स चोर, आयकर जालसाज़, भ्रष्ट अफसर और नेता, और यहाँ तक कि कोई आतंकवादी भी बेधड़क कानून को ठेंगा दिखाते रहें.
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आधार का विरोध करने वाले लोगो के कुछ मशहूर कथन—

“विशिष्ट पहचान योजना भारतीय नागरिकों की निजता छीन लेगी” – मैथ्यू थॉमस

“निजता ऐसी चीज नहीं जिसे लोग बिना इससे वंचित हुए महसूस कर सकें. इसे खत्म कर दो और आप मनुष्य होने के लिए सबसे जरूरी चीज को नष्ट कर देंगे.” – फिल बूथ, नो टू आई डी

“आधार परियोजना भारतीय संविधान को मुर्दा दस्तावेज में तब्दील कर देगी” – एस जी वोम्बातकेरे
“यूआईडी सांप्रदायिक हमले में सहायक होगा.” – अरुणा राय और निखिल डे, राष्ट्रिय सलाहकार समिति के सदस्य

“आधार बाध्यकारी नहीं है – यह तो बस स्वैच्छिक “सहूलियत” है. इसके प्राधिकरण की टिप्पणी में यह जोर देकर कहा गया है कि “पंजीयन करवाना बाध्यकारी नहीं होगा.” लेकिन एक चाल चली गयी है- “…जिन सहूलियतों और सेवाओं को यूआईडी से जोड़ा जाएगा वे इस संख्या की माँग को सुनिश्चित कर सकते हैं.” यह किसी गाँव के कुँए में जहर घोल कर उस गाँव वालों पानी की बोतल बेचने और यह दावा करने के सामान है कि लोग स्वेच्छा से पानी खरीद रहे हैं. अगला वाक्य भी अमंगलकारी है – “हालाँकि यह सरकार और रजिस्ट्रार को इस बात से रोकेगा नहीं कि वे पंजीयन को अनिवार्य बनायें.” – जिन द्रेज, अर्थशास्त्र के मानद प्रोफ़ेसर, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, राष्ट्रिय सलाहकार समिति के पूर्व सदस्य.

“नीलकानी का रिपोर्ट करने का तौर-तरीका इतिहास में अभूतपूर्व है, वे सीधे प्रधान मंत्री को रिपोर्ट करते हैं, और इस तरह सरकार के भीतर के सभी नियंत्रणों और संतुलनों को दरकिनार करते हैं.” – गृह मंत्री चिदंबरम

“यूआईडी एक कारपोरेट घोटाला है, जो सुचना प्रद्योगिकी क्षेत्र में अरबों डॉलर झोंक रहा है.” – अरुंधती राय

“अगर सरकार इस देश को बेच रही है तो हम सबको कम से कम यह जानना चाहिए कि वह किसको बेच रही है.” – वीरेश मलिक 
    
उँगलियों की छाप का सबसे प्रबल विरोध करने वाला कोई और नहीं, बल्कि खुद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी थे, जिन्होंने कहा था कि “जेनेरल स्मट के नए क़ानून के बारे में …हम पहले ही साफ़ हो लें. अब सभी भारतीयों की उँगलियों के छाप लिए जायेंगे…अपराधियों की तरह. चाहे मर्द हों या औरतें. ईसाई विधि से की गयी शादी के अलावा कोई भी शादी वैध नहीं होगी. इस क़ानून के तहत हमारी पत्नियाँ और माताएँ वेश्या हैं. और यहाँ हर मर्द हरामी है.” 

लेकिन आज के शासकों में से आज कौन है जो महात्मा गांधी को याद करता है, दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने क्या कह था, यह तो बहुत दूर की बात है.  

(काफिला डॉट ऑर्ग से आभार सहित. अनुवाद – दिगम्बर) 

  
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आधार : मिथकों के आधार पर

आर. रामकुमार

दो देश। दोनों के प्रधानमंत्रियों की अपनी-अपनी प्रिय योजनाएँ। दोनों के सुर बिलकुल एक जैसे। टोनी ब्लेयर ने नवम्बर 2006 में पहचान पत्र विधेयक 2004 के लिए समर्थन जुटाते समय कहा था कि पहचान पत्र का मामला स्वतंत्रता का मामला नहीं हैं, बल्कि आधुनिक दुनिया का मामला है।मनमोहन सिंह ने सितम्बर 2010 में नंदुरबार में पहला आधार संख्या वितरित करते हुए कहा कि आधार… नए और आधुनिक भारत का प्रतीक है। मि. ब्लेयर ने कहा कि हम पहचान पत्रों के साथ जो करने कि कोशिश कर रहे हैं वह आधुनिक प्रौद्योगिकी को उपयोग में लाना है।डॉ सिंह ने कहा कि आधार योजना आज के नवीनतम और आधुनिक प्रौद्योगिकी का उपयोग करेगा।समान सोच कि कोई हद नहीं है।

मि. ब्लेयर ने पहचान पत्र लागू करने के लिए जो बहुचर्चित प्रोत्साहन कार्यक्रम चलाये उसका अन्त लेबर पार्टी कि राजनितिक त्रासदी के रूप में हुआ। ब्रिटेन की जनता ने लगभग पाँच सालों तक इस योजना का विरोध किया। अंततः कैमरून सरकार ने 2010 में पहचान पत्र अधिनियम रद्द कर दिया, इसी प्रकार पहचान पत्रों और एक राष्ट्रीय पहचान रजिस्टर बनाने कि योजना भी खत्म कर दी। दूसरी तरफ, भारत सरकार आधार या एकल पहचान (यूआईडी) परियोजना को उत्साहपूर्वक प्रोत्साहित कर रही है। यूआईडी योजना को गृहमंत्रालय के राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के साथ नत्थी किया जा चुका है। ‘‘राष्ट्रीय पहचान प्राधिकरण अधिनियम’’ संसद के पटल पर रखा गया है। दुनिया भर में पहचान नीतियों के पर्यवेक्षक देख रहे हैं कि भारत ‘‘आधुनिक’’ दुनिया से कुछ सबक लेता है या नहीं।

ब्रिटेन में पहचान पत्रों का अनुभव बताता हे कि मि. ब्लेयर मिथकों के सहारे इस कार्यक्रम की तिजारत कर रहे थे। पहला, उन्होंने कहा कि, पहचान पत्रों के लिए नामांकन कराना ‘‘स्वैच्छिक’’ होगा। दूसरा, उन्होंने तर्क दिया कि पत्र राष्ट्रीय स्वास्थ्य तंत्र और दूसरे हकदारी योजनाओं के दुरूपयोग को कम करेगा, डेविड ब्लंकेट ने तो इसे ‘‘पहचान पत्र’’ के बजाय ‘‘हकदारी पत्र’’ घोषित कर दिया। तीसरा, मि. ब्लेयर ने तर्क दिया कि पहचान पत्र नागरिकों को ‘‘आतंकवाद’’ और ‘‘पहचान की धोखाधड़ी से बचायेगा। इसके लिए बायोमिट्री तकनीक को रामबाण के रूप में पेश किया गया था। इस सभी दावों पर विद्धानों और जनमत द्वारा सवाल खड़े किये गये थे। लन्दन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स ने बहुत ही सावधानीपूर्वक एक रिपोर्ट दी थी जिसने उन सभी दावों की जाँच-पड़ताल करके उन्हें खारिज कर दिया (देखें ‘‘हाई कॉस्ट, हाई रिस्क’’ फ्रण्टलाइन, 14 अगस्त, 2009)। इस रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि सरकार पहचान पत्र को इतने तरह के कार्यक्रमों के लिए जरूरी बनाती जा रही है कि वास्तव में यह अनिवार्य हो जायेगा। इसने यह भी तर्क दिया है कि पहचान पत्र के जरिये हकदारी कार्यक्रमों के लिए पहचान की धोखाधड़ी को खत्म करना भी सम्भव नहीं। बायोमीट्रिक तकनीक नकल रोकने का भरोसेमंद तरीका नहीं है।

आधारा को लेकर भारत में चलने वाली चर्चाएँ इसी से मिलती जुलती हैं। भारत के एक अरब से भी ज्यादा लोगों को यूआईडी संख्या प्रदान करने के लिए इस योजना के समर्थन में वैसी ही घिसीपिटी दलीलें पेश की गयीं। मेरा कहना है कि ब्रिटेन में विफल हो चुकी पहचान पत्र योजना की तरह भारत में भी मिथकों के आधार पर ही आधार योजना को प्रवर्तित किया गया। स्थानाभाव में हम यहाँ केवल तीन बड़े मिथकों की चर्चा करेंगे।

पहला मिथक: आधार संख्या अनिवार्य नहीं है।

यह गलत है। आधार को चोरी छुपे अनिवार्य बना दिया गया है। आधार को स्पष्टतया राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के साथ नत्थी कर दिया गया है। भारतीय जनगणना वेबसाइट में बताया गया है कि ‘‘एनपीआर में एकत्रित डाटा भारतीय एकल पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) के अधीन होगा। दुहराव न हो, इसकी जाँच करने के बाद यूआईडीएआई एकल पहचान संख्या जारी करेगा। यह संख्या एनपीआर का हिस्सा होगा और एनपीआर कार्ड पर यह संख्या दर्ज रहेगी।

एनपीआर नागरिकता कानून 1955 में 2003 में किये गये संशोधन का नतीजा है। नागरिकता कानून 2003 की धारा 3(3) के अनुसार भारतीय नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर में प्रत्येक नागरिक के बारे में उसकी एकत्र की गयी जारकारी में उसकी ‘‘राष्ट्रीय पहचान संख्या’’ दर्ज करना जरूरी होगा। इसके अलावा, नियम 7(3) कहता है कि ‘‘प्रत्येक नागरिक का यह उत्तरदायित्व होगा कि वह एक बार स्थानीय नागरिकता रजिस्ट्रार के यहाँ जाकर अपना पंजीकरण कराये और अपने बारे में सही व्यक्तिगत विवरण दे। इससे भी आगे, नियम 17 कहता है कि ‘‘नियम 5, 7, 8, 10, 11 और 14 के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर दण्डस्वरूप जुर्माना देना होगा जिसे हजार रुपये तक बढ़ाया जा सकता है।’’

निष्कर्ष बिल्कुल साफ है : संसद में विधेयक पास होने से पहले ही आधार को अनिवार्य बना दिया गया है। इस परियोजना की आड़ में, सरकार लोगों को निजी सूचना देने के लिये जोर-जबरदस्ती कर रही है यह जबरदस्ती सजा देने की धमकी के रूप में सामने आती है।

दूसरा मिथक : आधार संयुक्त राज्य अमरीका के सामाजिक सुरक्षा संख्या (एसएसएन) की तरह ही है।

एसएसएन और आधार में बहुत ज्यादा फर्क है। अमरीकी सामाजिक सुरक्षा के प्राविधानों को आसान बनाने के लिये 1936 में एसएसएन लागू किया गया था। एसएसएन की एक घोषित विशेषता यह है कि इसे 1974 के गोपनीयता अधिनियम द्वारा सीमित कर दिया गया है। इस अधिनियम के अनुसार ‘‘किसी भी सरकारी एजेंसी के लिए किसी व्यक्ति को कानून द्वारा प्राप्त किसी अधिकार, लाभ या विशेषाधिकार से इसलिए इनकार करना गैर-कानूनी होगा कि व्यक्ति विशेष अपनी सामाजिक सुरक्षा संख्या बताने से मना करता है। इसके अलावा, संघीय एजेन्सियों को उन व्यक्तियों की सामाजिक सुरक्षा संख्याओं को किसी तीसरे पक्ष को बताने से पहले उनको सूचना देना और उनसे सहमति लेनी पड़ती है।

सामाजिक सुरक्षा संख्या को कभी भी पहचान का दस्तावेज नहीं समझा गया। फिर भी, 2000 के दशक में सामाजिक सुरक्षा संख्या का विभिन्न वितरण/प्रवेश केन्द्रों पर किसी की पहचान साबित करने के लिए व्यापक रूप से इस्तेमाल होने लगा। परिणामस्वरूप, व्यक्तियों की सामाजिक सुरक्षा संख्यायें विभिन्न प्रकार के निजी खिलाड़ियों को पता चल गयी, जिसे पहचान चोरों ने बैंक खाता, उधार खाता, प्रसाधन ब्योरों और दूसरे निजी सूचना स्रोतों तक पहुँचने के लिए इस्तेमाल किया। 2006 में, सरकारी जवाबदेही विभाग ने विवरण दिया की ‘‘एक साल के अन्दर, लगभग एक करोड़ लोगों, यानी अमरीका की 4.6 प्रतिशत जनसंख्या ने यह पाया कि वे किसी न किसी तरह के पहचान चोरी के शिकार हुए थे, जिससे उन्हें अनुमानतः 50 अरब डॉलर से भी अधिक का नुकसान हुआ। लोगों के कड़े विरोध के दबाव में राष्ट्रपति ने 2007 में पहचान-धोखाधड़ी पर एक टास्क फोर्स गठित की। इस रिपोर्ट पर अमल करते हुए राष्ट्रपति ने एक योजना घोषित की ‘‘पहचान-चोरी का मुकाबला: एक रणनीतिक योजना।’’ इस योजना के तहत सभी सरकारी कार्यालयों को ‘‘एसएसएन का अनावश्यक प्रयोग खत्म करने’’ और घटाने तथा जहाँ सम्भव हो, व्यक्तियों की पहचान में एसएसएन के प्रयोग की आवश्यकता को खत्म करने का निर्देश दिया गया। भारत में स्थिति बिलकुल उल्टी है। नन्दन निलकानी के अनुसार, आधार संख्या ‘‘सर्वव्यापी’’ होगी, यहाँ तक कि उन्होंने लोगों को सलाह दी है कि ‘‘अपने शरीर पर इसे गोदवा लो, ताकि भूल न जाओ।’’

तीसरा मिथक: पहचान चोरी को बायोमीट्रिक से खत्म किया जा सकता है।

पहचान सिद्ध करने में बायोमिट्रिक की सीमाओं के बारे में वैज्ञानिक एवं कानूनी विशेषज्ञों के बीच आम-सहमती है। पहला ऐसी कोई सूचना मौजूद नहीं है जिसके आधार पर यह माना जाय कि ऊंगली के छाप के मिलान में गलती बहुत कम या नहीं होती है। उपभोगकर्ताओं के एक छोटे हिस्से की ऊंगलियों का निशान हमेशा ही डाटाबेस से या तो गलत मेल खायेगा या मेल ही नहीं खायेगा।

दूसरा, भारत जैसे देश में ऐसे मिलान की गड़बड़ी बहुत अधिक बढ़ जायेगी। यूआईडीएआई ने बायोमिट्रिक यंत्रों की आपूर्ति के लिए जिस 4जी आइडेन्टिटी सोल्यूसन्स को ठेका दिया था उसने एक रिपोर्ट में कहा है किः ‘‘अनुमान है कि दाग या बुढ़ापे या अस्पष्ट छाप के कारण किसी भी आबादी के लोगों की ऊंगली की छाप घिचपिच होती है। भारतीय वातावरण का अनुभव यह बताता है कि यहाँ की बहुत बड़ी आबादी शारीरिक श्रम पर काफी अधिक निर्भर होती है, जिसके कारण नामांकन करने में नाकामयाबी 15 प्रतिशत तक है।’’ 15 प्रतिशत नाकामयाबी की दर का मतलब है लगभग बीस करोड़ लोगों को इस योजना से निकाल बाहर करना। यदि मनरेगा (महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना) के कार्यस्थल और राशन की दुकानों पर ऊंगली की छाप जाँचने वाली मशीन लगा दी जाय तथा रोजगार और राशन खरीदने के लिए सही तस्दीक को जरूरी शर्त बना दिया जाय तो लगभग 20 करोड़ लोग इन कार्यक्रमों की पहुँच से हरदम बाहर रहेंगे।

असल में यूआईडीएआई ‘‘बायोमिट्रिक स्टैण्डर्ड कमेटी’’ की रिपोर्ट इन चिन्ताओं को ठीक मानता है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि सही दोहराव न हो पाने की पूरी तरह गारंटी करने वाली एक महत्त्वपूर्ण शर्त ऊंगली की छाप का भारतीय परिस्थितियों में गहराई से अध्ययन नहीं किया गया है। लेकिन तकनीक की इस गम्भीर आलोचना के बावजूद सरकार इस परियोजना को लेकर अंधेरे में छलांग लगाने से नहीं मान रही है जिस के ऊपर 50,000 करोड़ रुपये से अधिक का खर्च आयेगा।

कहा गया है कि सच का सबसे बड़ा दुश्मन झूठ नहीं बल्कि मिथक होता है। एक लोकतांत्रिक सरकार को आधार जैसी विराट परियोजना को मिथकों के आधार पर शुरू नहीं करना चाहिए। ब्रिटेन के अनुभव से हमें यह सबक मिलता है कि सरकार द्वारा फैलाये गये मिथकों का भंडाफोड़ लगातार सार्वजनिक अभियान चला कर ही किया जा सकता है। भारत में आधार परियोजना का भंडाफोड़ करने के लिए एक जनांदोलन की शुरूआत करना बेहद जरूरी है।

(आर. रामकुमार टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान में सहायक प्रोफेसर हैं। यह लेख 17 जुलाई को अंग्रेजी दैनिक द हिन्दूसाभार लिया गया है। अनुवाद- सतीश पासवान)

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