Category Archives: मंथली रिव्यू

इनके बारे में सोचिए लेकिन आप ऐसा नहीं करेंगे — मार्ज पीयर्सी

 

 

घूँघराले भूरे बालों वाली
उस बच्ची के बारे में सोचिए
जो पुरानी कार की पिछली सीट पर
अपने कुत्ते के साथ सो रही है
और उसके माँ-बाप
कार चलाते आगे की अस्त-व्यस्त सीट पर
जम्हाई ले रहे हैं।

भूरी त्वचा वाले उस बच्चे के बारे में सोचिए
जिसे अश्वेत कहा जाता है
जिससे कहा गया है
कि वह वापस अफ्रीका चला जाये
जिसके महान पूर्वजों ने
स्कूल तक जाने वाली
अमरीकी सड़कों को बनाया था।

बलात्कार से गर्भवती हुई
उस औरत के बारे में सोचिए
जो मजदूरी छोडकर
दो राज्यों को पार कर
गर्भपात के लिए नहीं जा सकी
जो अपने बच्चे को
प्यार करने की जबरन कोशिश करती है
लेकिन वह बच्चा अब अधिकांश
उस घिनौने बलात्कारी जैसा
दिखाई देता है।

उन औरतों और मर्दों के बारे में सोचिए
जो असेंबली लाइन में
तब तक काम करते हैं
जब तक
उनके कान बहरे न हो जाएँ
पीठ झुक न जाये
और किडनी फेल न हो जाये
वे पेन्सन की बकाया राशि चाहते हैं
जो उनकी ज़िंदगी में रोशनी ला दे
लेकिन कंपनी के पास
अपना वादा निभाने का समय नहीं है।

उस परिवार के बारे में सोचिए
जिसका घर बैंक वाले जब्त कर लेंगे
कैंसर की दवा खरीदने की स्थिति में
नहीं रह गया है अब वह परिवार
हर महीने की कैंसर की दवा
पूरे परिवार की मासिक आमदनी के बराबर है
इसलिए उसकी बेटी मर जाएगी
और फिर भी वह परिवार कर्ज में डूबा रहेगा।

लेकिन मेरे सरकार
आप उन्हें देखेंगे भी नहीं
वे इतने तुच्छ जीव हैं।

(मंथली रिव्यू जून 2017 से साभार)
अनुवाद-विक्रम प्रताप

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जिनके पास कम है, वे कम खाएँ (अमरीकी शासकों के प्रति) –मार्ज पियर्सी

Marge+Piercy

ग़रीबों से नफरत, क्या ये गुनाह

बासी हो गया? कि इतना धन है

फिर भी  साजिश रचते हैं दौलतमन्द

एक बच्चे की दवा, एक औरत की जिंदगी,

एक आदमी का दिल और गुर्दा हड़पने के लिए.

जब सांसद उस जनता की बात करते हैं

जो हिसाब बैठाती है गैस और रोटी का

कि ठण्ड और भूख में किसे तरजीह दें

वे गुर्राते हैं. हमारी ये हिम्मत की जिन्दा रहें?

अगर वे बमबारी कर पाते, अगर वे

ग़रीबों के खिलाफ लड़ाई छेड़ पाते

दूसरे देशों की तरह यहाँ, अपने देश में,

क़ानून बनाकर नहीं बल्कि खुलेआम

हथियारों से, तो क्या वे झिझकते?

उनके भीतर सुलगता सच्चा गुस्सा

फूटता है उन कटौतियों में, जो जरूरी हैं

लोगों को जिन्दा रखने के लिए.

जिन लोगों के पास बहुत कम है

उनको सजा देते हैं, और ज्यादा कमी करके-

हमें कुचलनेवाला एक विराट कानूनी बुलडोजर.

(अनुवाद — दिगम्बर)

जिसे वे भगवान की लीला कहते हैं – मार्ज पियर्सी

जिसे वे भगवान की लीला कहते हैं - मार्ज पियर्सी

कितना खूबसूरत और जानलेवा है बर्फ.
सड़कें समा गयी हैं इसकी सुरंग में.
बिना बिजली-पानी हजारों हजार लोग
जमी हुई दुनिया में जहाँ भेड़ियों के झुण्ड
की तरह हुंआ-हुंआ करती है हवा.

पहले ही बेइन्तेहाँ हैं ठण्ड से हो रही मौतें
जिसका मतलब है फटे-पुराने कम्बल में
किकुडते, ठिठुरते लोगो की जमघट,
कंपकंपाते बच्चे बंद कर देते हैं कांपना
ठण्ड से अकड़कर समा जाते हैं मौत के मुँह में.

ऊपर से गुजरते बिजली के तारों को
जमीन में दाबना बहुत खर्चीला है,
कहते हैं बिजली कम्पनी के अधिकारी,
जो नहीं झेलते बिजली-पानी का आभाव,
जिन्हें दुबकना नहीं पड़ता ठन्डे अँधेरे में.

आभाव का कोई असर नहीं जिन पर, आभाव
से मरते नहीं जो लोग, वही लेते हैं फैसले.
हम यकीन नहीं करते जलवायु परिवर्तन में
और यही नहीं, लागत और मुनाफे का
अनुपात हमें मुनाफा भी तो देता है.

कृषि व्यापारियों के पानी चुराने और
रिहायशी इलाकों में लॉन की हरियाली के कारण
पड़नेवाला सूखा. घटिया दर्जे के बांधों के चलते
बहते-ढहते मकान. न्यू ओर्लियांस में होता है
पुनर्निर्माण धनाढ्यों और पर्यटकों के लिये

सड़ने और मातम मानने दो गरीब बस्तियों को.
बीमा कम्पनी को आशा है कि उनके भुगतान
की तारीख आते-आते आप बूढ़े हो जायेंगे.
राजनेता दाबे बैठे हैं पुनर्निर्माण का पैसा.
और हम कहते हैं इसे प्राकृतिक आपदा.

(अमरीकी कवियत्री मार्ग पियार्सी के अठारह कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. यह कविता मंथली रिव्यू से आभार सहित लिया गया है. अनुवाद- दिगम्बर)

जीरो डार्क थर्टी : यातना के सहारे महिला सफलता का दिशानिर्देश

जेरो डार्क थर्टी के खिलाफ प्रदर्शन. फोटो – वर्ल्ड कान्त वेट डॉट नेट से साभार 
— सूसी डे

(जीरो डार्क थर्टी एक हालीवुड फिल्म है जिसमें अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए और अमरीकी सेना द्वारा बिन लादेन की हत्या का रोमांचक विवरण प्रस्तुत किया गया है. इस फिल्म का निर्देशन एक महिला ने किया है और इसे महिला निर्देशिकाओं को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष रूप से आयोजित एक समारोह में पुरष्कृत किया गया है. उस महिला निर्देशिका के बारे में एक जानेमाने पुरुष फिल्म समीक्षक ने कहा है कि वह “बहुत ही बेहतरीन, हालीवुड की सबसे मर्दाना निर्देशक है.”


जीरो डार्क थर्टी : यातना के सहारे महिला सफलता का दिशानिर्देश     
l. पृथ्वी

पृथ्वी पर निगाह डालें. पृथ्वी पर रहने वाले 7 अरब लोगों में से अधिकांश महिलायें हैं. महिलाऐं पुरुषों से अलग हैं. आखिर महिलायें पुरुषों से अलग क्यों हैं? क्योंकि, अंतरराष्ट्रीय मानवतावादी संस्थाओं के मुताबिक कई मामलों में महिलाओं का विशेष प्रतिशत साफ-साफ झलकता है. देखिये महिलाओं का प्रतिशत—

·         दुनिया के ग़रीबों में 70 प्रतिशत महिलायें हैं.
·  दुनिया के कुल काम का 66 प्रतिशत महिलायें करती हैं, फिर भी दुनिया की आमदनी का                                   सिर्फ 10 प्रतिशत पाती हैं.  
·          दुनिया के 7,20,00,000 बच्चे जो स्कूल नहीं जाते, उनमें 55 प्रतिशत लड़कियाँ हैं.
·           हर 3 में से 1 महिला के साथ लिंगभेद पर आधारित हिंसा होती है. 

ये बहुत ही खराब प्रतिशत हैं. खराब प्रतिशत क्यों हैं ये? क्योंकि ये विश्वव्यापी लिंगभेद को दर्शाते हैं. लिंगभेद क्या है? यह धारणा कि महिलायें पुरुषों से हीन हैं. महिलाये लिंगभेद पर विजय कैसे हासिल कर सकती हैं? आइये टीवी देखते हैं! 

ll. द गोल्डन ग्लोब

पुरस्कार समारोह देखिये. गोल्डन ग्लोब टेलीविजन और फिल्म के क्षेत्र में कलात्मक उपलब्धियों को मान्यता प्रदान करता है. जरा ध्यान से देखिये! जोर-शोर से प्रचारित किया गया कि इस बार के समारोह में महिलाओं की प्रतियोगिता होगी, जहाँ “ सशक्त महिला प्रभावी होगी. अब पुरस्कार जीत कर महिलाओं का लिंगभेद पर विजय हासिल करना देखिये.

देखिये किस तरह दो मजेदार महिला चोबदार पुरस्कार दे रही हैं. देखिये एक नाजुक सी गोरी महिला को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार हासिल करते, जिसने एक टीवी नाटक में दुष्ट मुसलमानों से लड़नेवाले सीआईए एजेंट की भूमिका निभाई थी. अब देखिये एक नाजुक सी लाल बालों वाली गोरी महिला को एक फ़िल्मी ड्रामा में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीतते, जिसने दुष्ट मुसलमानों के उत्पीडन में सहायता करनेवाली एक सीआईए एजेंट की भूमिका निभाई थी. जीतो, जीतो, जीतो! 
  
देखिये कि ये दोनों महिलायें किस तरह नाजुक और गोरी होने के गुण को शीर्ष पर होने के मर्दाने गुण के साथ मिलान करती हैं. उन्होंने इस बात का अविष्कार किया है कि अगर आप को लिंगभेद पर विजय पाना है तो (क) अमरीका की क़ानूनी नागरिकता हासिल कीजिए; (ख) आप सुडौल और तीखे नाक-नक्श वाला लुभावना पश्चिमी सौंदर्य हासिल कीजिए जिसे फिल्माया और पर्दे पर दिखाया जा सके; (ग) 20,00,000 डालर मूल्य का नीचे-गलेवाला गाउन पहनिए और (घ) ऐसी कहानियों में महिलाओं की प्रमुख भूमिका निभाइए जिसमे दिखाया गया हो कि अत्याचार किस तरह किसी पुरुष को भी हीन बना देता है. 

lll. जीरो डार्क थर्टी

देखिये ओसामा बिन लादेन को ढूंढने और उसकी हत्या करने के बारे में पहली उच्च तकनीकी, बड़ी बजट की फीचर फिल्म. पुनर्विचार बिलकुल नहीं. 

इसके बजाय यह देखिये कि इसका निर्देशन किसने किया. फिल्म की निर्देशिका एक महिला है. उसके पास गोल्डन ग्लोब भले ही न हो, लेकिन उसमें मर्दानापन जरुर है. उसमें मर्दानापन क्यों है? एक जानेमाने पुरुष फिल्म समीक्षक ने इस औरत के बारे में कह है कि वह “बहुत ही बेहतरीन, हालीवुड की सबसे मर्दाना निर्देशक है.” धन्यवाद, श्रीमान फिल्म समीक्षक! हम औरतें यह जानती हैं कि हम कोई बढ़िया काम कर रही होती हैं जब आप हमारे बारे में “मर्दाना” और “बेहतरीन” लिखते हैं!

निर्देशिका के मर्दानापन ने उसे सिनेमाई जोखिम उठाने की इजाजत दी. उन जोखिमों में एक खास चीज क्या है? निर्देशिका ने उच्च कोटि की कलात्मकता का ऐसा यथार्थ और सजीव चित्रण किया है जैसे आप सब कुछ अपनी आँखों के सामने घटते हुए देख रहे हों और इस शैली को डरावनी फिल्मों जैसे दृश्यों के साथ गूँथ दिया है. उसने घटिया दर्जे की स्टंट फिल्मों के स्तर को अमरीकी ज्ञानरंजन (इन्फोटेन्मेंट) के स्तर तक ऊँचा उठा दिया. देखिये कि किस तरह हमें ज्ञानरंजित किया जाता है—

IV. अच्छा मुसलमान सिर्फ वही है, जिसकी तहकीकात हुई हो

देखिये कि 11 सितम्बर को वर्ल्ड ट्रेड टावर पर हमले में कैसे 3,000 इंसानों की त्रासद मौत होती है. ये मत देखिये कि उस घटना के बाद से इराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में अमरीकी हमले, बमबारी और ड्रोन हमलों में कितने हजारों हजारों हजारों हजार लोगों को किस तरह मौत के घाट उतारा जाता है. उस फ्लैशबैक को मत देखिये कि उस इलाके में तेल का दोहन करने के लिए अमरीका ने किस तरह तानाशाह शासकों को खड़ा किया और उनका समर्थन किया. पश्चिमी देशों के उन प्रतिबंधों पर भी निगाह मत डालिए, जो 11 सितम्बर 2001 से वर्षों पहले इराक पर लादे गये थे, जिसने लगभग 5,00,000 लाख इराकी बच्चों की जान ले ली थी. इस बात को भी मत देखिये कि अव्वल तो लोगों को बिन लादेन की हत्या किये जाने की समझ पर ही उबकाई आ रही थी या किसी की भी राजनितिक हत्या पर, जो एक राष्ट्रपति की गुप्त “हत्या सूची” पर आधारित हो.

V. न्याय नहीं, सिर्फ गोरी शान्ति

जल्दी ही सभी रंगो और डिजाइनों के बालों वाली अमरीकी महिलाओं को युद्ध की अगली कतारों में तैनात किया जायेगा. किसलिए, देखिये! पेंटागोन ने हाल ही में घोषणा की है कि वह महिलाओं को युद्ध की अगली कतारों में तैनाती का आदेश जारी करेगा! हाँ-हाँ, अमरीकी सेना जैसे दोस्त हों तो नारीत्व की परवाह भला किसे है?

शुक्रिया, छरहरी, लाल बालोंवाली, गोरी औरत! तुमने हम महिलाओं का मार्ग प्रशस्त किया है! जब हम लोग डार्क थर्टी के अँधेरे में अपने खराब प्रतिशतों को लिए हुए भटक रही थीं, तुमने चरम प्रतिहिंसा से हमारा साक्षात्कार कराया.

इसने हमें अपने स्तब्धकारी उपसंहार तक पहुँचा दिया—यहाँ संयुक्त राज्य अमरीका में – और यूरोप में भी जो कुछ ही दशकों पहले तक हमारा विकट “मूल निवास” था— न्याय का रंग गोरा है. 
(सूसी डे एक लेखिका हैं जो मुख्यतः बच्चों और किशोरों के लिए लिखती हैं. उनका यह लेख मंथली रिव्यू में प्रकाशित हुआ था, जहाँ से अभार सहित इसे लिया गया है. अनुवाद- दिगम्बर.)


दुनिया के मजदूर

जहाजी मजदूर- फोटो “द वाटरफ्रंट वर्कर हिट्री प्रोजेक्ट” से आभार सहित 
-जय मूर
श्रम इतिहासकार मर्कुइज रिडाइकरऔर पीटर लाइनबो ने बहुत ही जीवन्त चित्रण किया है कि अंतरराष्ट्रिय मजदूर वर्ग के निर्माण में नाविकों और जहाज पर काम करने वाले मजदूरों ने किस तरह हिरावल की भूमिका निभाई थी. आधुनिक काल के शुरूआती दिनों के अधिकांश मजदूर आम तौर पर अपनी जन्म भूमि की मिट्टी से ही जुड़े रहे या अपने दस्तकारी के उद्यमों से ही मजबूती से बंधे रहे. लेकिन वे जैक टार (जहाजी मजदूर) जो दुनिया भर में बहुत अधिक आवाजाही करते थे, इस मामले में उनसे एकदम अलग थे. उन्होंने दुनिया देखी तथा यात्रा के आनन्द और खतरों को मजबूती से अंगीकार किया. वे सुग्गों और बंदरों के साथ-साथ दुनिया भर की अनोखी जगहों के किससे-कहानी अपने साथ लेकर आये. जहाजी कार्य-बल अत्यधिक बहुराष्ट्रिय और बहु-सांस्कृतिक भी था. उन कठिन परिश्रमी मजदूरों के लिए मार्क्सवादी नारा- “दुनिया के मजदूरों एक हो,” कोई अमूर्त मनभावन चीज नहीं थी, बल्कि वह उनके रोज-बरोज के वर्गीय अनुभव से पूरी तरह मेल खाता था.

यही नहीं, जिन देशों के बारे में मार्क्स और एंगेल्स ने सोचा था कि वहाँ कपड़ा मिलों और दूसरे औद्योगिक फैक्टरियों का विकास होने पर नयी वर्गीय चेतना का उदय होगा, उससे बहुत पहले ही वे जहाजी मजदूर ऐसी जगह काम करते थे जो वास्तव में समुद्र पर तैरने वाली पूँजीवादी फैक्टरी ही थे, जहाँ काम करने के तौर-तरीके में बहुत ही उन्नत स्तर का तालमेल शामिल था. नाविकों ने दमनकारी परिस्थितियों के खिलाफ विद्रोह के दौरान इस तथ्य का भरपूर इस्तेमाल किया कि जहाज को चलाने के लिए उन सभी लोगों को एक साथ मिल कर काम करना जरूरी होता है. “हड़ताल” जिसका मजदूर आन्दोलन के पूरे इतिहास में इतना अधिक महत्त्व रहा है, उस शब्द का उद्भव ही नाविकों के उस व्यवहार से हुआ था जिसके दौरान वे जहाज को रोकने के लिए उसे तब तक के लिए खेना बंद कर देते थे, जबतक अधिक वेतन और काम की बेहतर परिस्थितियों से सम्बंधित उनकी माँग पूरी नहीं हो जाती थी.

उनकी नौकरी स्थाई और लगातार चलने वाली नभीं होती थी, फिर भी समुद्री यात्रा पर जाने वाले वाणिज्यिक जहाजों के नाविक और समुद्र तट पर काम करने वाले मजदूरों ने आधुनिक मजदूर आन्दोलन के सबसे जुझारू और प्रगतिशील यूनियनों का संगठन किया था. कुछ समुद्री मजदूरों की यूनियनों की कतारों में और कुछ नेतृत्वकारी पदों पर भी अंतरराष्ट्रिय औद्योगिक मजदूर (आईडब्लूडब्लू) और आगे चलकर कम्युनिस्ट पार्टी का काफी प्रभाव बन गया क्योंकि जनता के मंच के रूप में वे अपनी राय पर हमेशा अडिग रहते थे और अपने उद्देश्यों को कभी छुपाते नहीं थे. हालाँकि बिके हुए दक्षिण पंथी यूनियनों और पूर्वी तट के माफिया सरगनाओं से उन लोगों को लगातार लड़ाई लड़नी पड़ती थी.

एक खास तरकीब, जिसके चलते इन तमाम वर्षों के दौरान एक फीसदी लोग शीर्ष पर कब्ज़ा जमाए रहे, वह था कार्य-बल का विभाजन तथा नस्ली और नृजातीय आधारों पर 99 फीसदी के एक हिस्से को दूसरे हिस्से के खिलाफ खड़ा करना. यही हाल पानी के जहाजों पर काम करने वाले मजदूरों के मामले में भी था. लेकिन ऐसे सकारात्मक उदहारण भी हैं जब समुद्री मजदूरों ने अपने साझा हितों के लिए इन बँटवारों से ऊपर उठ कर काम किया. पीटर कोल ने अपनी पुस्तक वोब्बलीज ऑफ द वाटरफ्रंट में बीसवीं सदी के प्रारंभ में फिलाडेल्फिया के अंतरराष्ट्रीय औद्योगिक मजदूर संघ द्वारा नस्ली भेदभाव से ऊपर उठ कर गोरे और कालों के बीच तथा मूलनिवासी और आप्रवासी मजदूरों के बीच यूनियन बनाने से सम्बंधित भूले-बिसरे इतिहास के उद्धार का उल्लेखनीय काम किया है. कम्युनिष्ट-नेतृत्व वाली रसोइयों और खानसामों की यूनियन ने भी नस्लवाद के खिलाफ मजबूत रुख अपनाया, जब जहाजी मजदूर यूनियनें काले और एशियाई लोगों को यूनियन से अलग कर रही थीं.

पश्चिम तटीय अंतरराष्ट्रिय तटवर्ती एवं गोदाम मजदूर यूनियन (आई एल डब्ल्यू यू) के लिए 1930 और 1940 के दशक सबसे सुनहरे दिन थे. उस दौरान यह अमरीका की सबसे बेहतरीन यूनियन थी (और आज भी इसकी भव्यता बरक़रार है). जैसा कि हमारे पुराने कॉलेज के प्राध्यापक चार्ल्स “लैश” लैरो ने अपनी सुन्दर आत्मकथा (जिसका छपना बेहद जरूरी है) के एक उपशीर्षक “अमरीका में रेडिकल यूनियन का उत्थान और पतन” में बताया है, “इसके प्रखर और अडिग नेतृत्व की जिम्मेदारी आस्ट्रेलिया में जन्मे, एक सुदृढ़ कम्युनिष्ट हैरी ब्रिजेज के कन्धों पर थी.” इस यूनियन ने वोब्बलीज यूनियन का औपचारिक नारा अपनाया था- “एक को लगी चोट, सबके ऊपर चोट है.” बाद के कई वर्षों में इस यूनियन ने नस्लभेदी दक्षिण अफ्रीका के जहाजों तथा चीली और अल साल्वाडोर में दमन करने जा रहे अमरीकी जहाजों का बहिष्कार करने जैसी अन्तरराष्ट्रिय भाईचारे की असंख्य कार्रवाइयों को अंजाम दिया. 1997 में उन्होंने लिवरपूल, इंग्लैण्ड में यूनियन पर रोक लगाने के खिलाफ लड़ रहे अपने साथी गोदी मजदूरों के समर्थन में अमरीकी पश्चिमी तट की गोदी का काम एक दिन के लिए ठप्प कर दिया था.

हार्वे स्वोर्त्ज़ ने आईएलडब्ल्यूयू के वर्तमान और भूतपूर्व सदस्यों के साथ बातचीत कर के मौखिक इतिहास की अद्भुत सामग्री एकत्रित की है और उसे बिलकुल सटीक शीर्षक वाली अपनी पुस्तक सोलिडारिटी स्टोरी  में शामिल किया है. “सर्वहारा अंतरराष्ट्रीयतावाद” के बारे में एक परियोजना के सन्दर्भ में मैंने बीसवीं सदी के विभिन्न किस्मों के रेडिकल मजदूरों द्वारा लिखी गयी ऐसी ही कहानियों और संस्मरणों को पढ़ा. उस ऐतिहासिक ज्ञान को पुनर्जीवित करना आज मैं बहुत ही जरूरी मानता हूँ, क्योंकि वैश्विक सामाजिक और आर्थिक न्याय आन्दोलन से जुड़े हम सभी लोग एकबार फिर इस मुद्दे पर गंभीरता से सोच रहे हैं कि मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था से आगे एक नयी दुनिया का निर्माण करना सम्भव है. मैं उन संस्मरणों में से एक का जिक्र यहाँ करना चाहूँगा, जो एक कम्युनिस्ट नाविक बिल बैली की अनोखी कहानी है.

बैली का जन्म होबोके, न्यू जर्सी में 1911 में हुआ था. वह एक प्रतिभाशाली बच्चा था जिसका लालन-पालन आयरिश आप्रवासी मजदूरों के मोहल्ले की कठिन परिस्थितियों में भूख और गरीबी की हालत में हुआ था. उसके पैरों में जूते भी नहीं होते और अक्सर उसे कानून से दो-दो हाथ करने पड़ते. 14 साल की उम्र में उसने समुद्र में जानेवाले जहाज में काम शुरू किया. मजदूर वर्ग की क्रान्तिकारी विचारधारा से पहली बार उसका साबका तब पड़ा जब उसने आईडब्ल्यूडब्ल्यू की पत्रिका इंडस्ट्रियल वर्कर की प्रति अचानक उठा कर पढ़ना शुरू किया, जिसे किसी ने जहाज पर छोड़ दिया था. महा मंदी के दौरान जब जहाजी का काम मिलना काफी मुश्किल हो गया था, तब उसने नौकरी की तलाश में दूसरे आवारा लोगों के साथ देश के एक छोर से दूसरे छोर तक रेल से सफर किया. 1934 में उसने कम्युनिष्ट नेतृत्व वाली मेरीन इंडस्ट्रियल वर्कर्स यूनियन (एमडब्ल्यूआईयू) में शामिल हुआ तथा न्यूयार्क और बाल्टीमोर में यूनियन का संगठनकर्ता बन गया. जर्मनी में फासीवाद का विरोध कर रहे एक अमरीकी जहाजी मजदूर की गिरफ़्तारी का विरोध करने के लिए बैली ने अपने दूसरे नाविक साथियों के साथ मिलकर न्यू यार्क के बंदरगाह पर खड़े एक जर्मन यात्री जहाज के अग्रभाग पर लगे स्वास्तिक निशान को नोच कर फेंक दिया. यह घटना अंतरराष्ट्रिय खबर बन गयी. कुछ दिनों तक दूसरे कई समुद्री यूनियनों का संगठन करने के बाद वह अब्राहम लिंकन ब्रिगेड से जुड़ा और विभिन्न देशों के मजदूरों के साथ मिल कर स्पेन में फासीवाद से लड़ने के लिए लिए चल पड़ा. स्पेन से लौटने के बाद उसने फिर से तटवर्ती मजदूर संगठनकर्ता के रूप में काम शुरू कर दिया और फिर विश्व युद्ध के दौरान उसने वाणिज्यिक आपूर्तिकर्ता जहाज पर नाविक के खतरनाक काम के लिए स्वेच्छा से अपनी सेवा समर्पित की. इन सभी कामों के दौरान वर्ग भाईचारा की ओजपूर्ण भावना ही बैली को प्रेरित करती रही.

क्या “सर्वहारा अंतरराष्ट्रीयतावाद” इस रूप में एक मृत और गुजरे ऐतिहासिक युग की चीज है, जैसाकि हार्ट और नीग्रा ने इसकी जगह “अनेकता” की अपनी अवधारणा स्थापित करते हुए दलील दी है? हो सकता है, क्योंकि आज वहाँ काम की प्रकृति काफी बादल गयी है. जहाँ तक समुद्र तट के कामों की बात है, वहाँ पर बहुत पहले ही गोदी मजदूरों से काम लेने की जगह स्वचालित मशीनों से बड़े-बड़े कंटेनरों में माल का लदान होने लगा है. आज माल ढुलाई वाले विराट जहाज़ों और तेल के टैंकरों पर बहुत ही कम, बमुश्किल दर्ज़न भर जहाज कर्मचारी होते हैं. लेकिन फिर भी उन मजदूरों (और उनके समर्थकों) के इस इतिहास में ऐसे ढेर सारे बहुमूल्य अनुभव भरे पड़े हैं, जीनसे सबक ली जा सकती है. उन लोगों ने सिर्फ अपनी नौकरी से जुड़े निजी हितों के लिए ही लड़ाई नहीं लड़ी थी, बल्कि वे खुद को एक महान अंतरराष्ट्रिय मुक्ति आन्दोलन का अंग भी मानते थे.

वैश्विक स्तर पर सोचना और काम करना, अतीत के मजदूर आन्दोलन लिए उसी तरह मजबूती प्रदान करने वाला साबित हुआ था, जैसे मौजूदा ओक्युपाई आन्दोलन ने अरब स्प्रिंग और स्पेनी इन्दिग्नादोस (क्रुद्ध) आन्दोलन से शक्ति ग्रहण की. ओक्युपाई आन्दोलन की तुलना में मजदूर आन्दोलन की ताकत यह थी कि वह सड़कों और चौराहों पर तो दिखता ही था, साथ ही उसकी जड़ें उत्पादन में भी थीं और इस तरह वे अपनी माँग मनवाने के लिए काम ठप्प कर सकते थे या पूरी तरह काम बंद कर सकते थे और यह भी मुमकिन था कि बड़े पैमाने पर आम हड़ताल के जरिये वे व्यवस्था में ही  रूकावट पैदा कर दें. अगर मजदूर आन्दोलन को बने रहना है और पूँजी की चरम आवाजाही के इस युग में वास्तव में कोई फर्क लाना है, तो उसे फिर से इस बात को सीखना होगा कि दुबारा पहले से भी बेहतर तरीके से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कैसे काम किया जाय. इस दिशा में देर से ही सही, लेकिन उम्मीद जगानेवाले कुछ प्रयास हुए हैं. ओक्युपाई जैसे सामाजिक आन्दोलन ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो संपर्क और भाईचारा कायम किया, उसके चलते मौजूदा पूँजीवादी राजनीतिक अर्थतंत्र में आज वे जिस स्थिति में हैं, निश्चय ही उन्हें इस तरीके से काम करने का लाभ मिलेगा. 
  
(जय मूर एक रेडिकल इतिहासकार हैं जो वेरमोंट के देहात में रहते हैं और अगर काम मिल जाय तो पढ़ाने का काम करते हैं. उनका यह लेख मंथली रिव्यू से आभार सहित लिया गया है. अनुवाद- दिगम्बर) 

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क्या है जो मजदूर वर्ग को क्रांतिकारी बनाता है?

-माइकल ए. लेबोवित्ज़

ऐसा क्या है जो मजदूर वर्ग को क्रांतिकारी बनाता है? वह हीगल का रहस्यवाद नहीं है कि यह एक सर्वव्यापी वर्ग या निरपेक्ष आत्मा की भौंडी नकल है. ऐसा भी नहीं कि मजदूर वर्ग अपनी भौतिक स्थिति की वजह से ही क्रांतिकारी है, यानी उद्योग के पहियों को जाम कर देने के लिये कूटनीति तौर पर उसे वहां बहाल किया गया है.

इसमें ज्यादा हैरत की बात नहीं है कि ये अच्छी-बुरी सारी व्याख्यायें बहुत थोड़े लोगों को ही कायल बना पाती हैं. निश्चय ही, कुछ ऐसे लोग भी हैं जो पहले इस बात की बहुत अच्छी तरह व्याख्या करते थे कि मजदूर वर्ग क्रांतिकारी क्यों है, लेकिन अब वे कहते हैं कि मजदूर वर्ग का समय आया और चला गया. उदाहरण के लिये, कुछ लोग यह मानते हैं कि, एक ज़माने में, पूंजी मजदूरों को सकेंद्रित करती थी, उन्हें एक साथ आने, संगठित होने और संघर्ष करने का अवसर प्रदान करती थी; मगर, अब पूंजी ने मजदूरों को विकेन्द्रीकृत कर दिया है और उन्हें एक-दूसरे के खिलाफ इस तरह खड़ा कर दिया है कि अब वे साथ मिलकर संघर्ष नहीं कर पाते. एक ज़माना था, जब मजदूरों के पास खोने के लिये अपनी बेड़ियों के सिवा कुछ भी नहीं था. लेकिन  अब पूंजीवाद ने उसे अपने अंदर समाहित कर लिया है, वह अब उपभोक्तावाद की जकड़बंदी में है और उसके उपभोग के सामान ही अब उसके मालिक हैं और वे ही उसका इस्तेमाल करते हैं.    
जो लोग यह नतीजा निकालते हैं कि मजदूर वर्ग अब इसलिए क्रांतिकारी नहीं रह गया क्योंकि पूंजीवाद ने उसे रूपांतरित कर दिया है, वे यह दर्शाते हैं कि उन्हें मार्क्सवाद की रत्ती भर भी समझ नहीं है. अपने संघर्षों के जरिये ही मजदूर वर्ग खुद को क्रांतिकारी बनाता है – खुद को रूपांतरित करता है. हमेशा से यही मार्क्स का दृष्टीकोण था – उनका “क्रांतिकारी व्यवहार” कि अवधारणा, जिसके दौरान हालात भी बदलते हैं और साथ ही साथ खुद मजदूर वर्ग में भी बदलाव आते हैं. अपने संघर्षों के जरिये ही मजदूर वर्ग खुद को बदलता है. वह खुद को नयी दुनिया का निर्माण करने के लायक बनाता है.

लेकिन मजदूर संघर्ष क्यों करते हैं? मजदूरों के सभी संघर्षों में एक ही बुनियादी बात है जिसे मार्क्स “विकास के लिए मजदूरों की अपनी जरुरत” कहते हैं. हम जानते हैं कि मार्क्स का यह मानना था कि वेतन-भत्ते के संघर्ष अपने आप में अपर्याप्त हैं. लेकिन वह यह भी मानते थे कि इन संघर्षों में शामिल न होना, मजदूरों को “उदासीन, विचारहीन और कमोबेश उत्पादन के खाते-पीते उपकरण” बना देगा. मार्क्स का तर्क था कि संघर्षों के अभाव में मजदूर “उदास, मानसिक रूप से कमज़ोर, क्लांत और विरोध न करने वाली भीड़” बनकर रह जायेंगे. संघर्ष उत्पादन की एक प्रक्रिया हैं- जो एक अलग तरह के मजदूर का निर्माण करती है, एक ऐसा मजदूर जो अपने आप को उत्पादित करता/करती है, एक ऐसे व्यक्ति के रूप में, जिसका सामर्थ्य बढ़ता है, आत्मविश्वास विकसित होता है और जिसकी संगठित होने और आपस में जुड़ने की क्षमता विस्तृत होती है. लेकिन हम ऐसा क्यों सोचते हैं कि यह संघर्ष सिर्फ वेतन-भत्ते की लड़ाई तक ही सीमित है? हर एक संघर्ष जिसमें लोग खुद हि मजबूती से डटे रहते हैं, हर एक संघर्ष जिसमें लोग सामाजिक न्याय पर जोर देते हैं, हर एक संघर्ष जिसमें वे खुद अपनी संभावनाओं और अपने विकास की जरुरत समझते हैं, उसमें शामिल लोगों के सामर्थ्य को बढ़ाते हैं.      
      इतना ही नहीं, ये संघर्ष हमें पूंजी के खिलाफ खड़ा करते हैं. क्यों? क्योंकि पूंजी एक ऐसा  अवरोध है जो हम सब के बीच और हमारे खुद के विकास के बीच बाधा बन कर खड़ी होती है. और ऐसा इसलिये है कि पूंजी ने सारी सभ्यताओं से हासिल उपलब्धियों को अपने कब्जे में कर लिया है, क्योंकि यह सामाजिक मष्तिस्क और सामाजिक श्रम का मालिक बन बैठी है, और यह हमारे उत्पादों को और मजदूरों के उत्पादों को हमारे ही खिलाफ खड़ा कर देती है; जिसके पीछे  सिर्फ एक ही मकसद होता है, खुद का फायदा – यानी मुनाफा. अगर हमें अपनी जरूरतों को पूरा करना है और अपनी क्षमता का विकास करना है, तो हमें पूंजी के खिलाफ संघर्ष करना जरूरी है  और इसी के दौरान हम मजदूर खुद को क्रांतिकारी बनाते हैं.  

लेकिन हम लोग कौन हैं? वह मजदूर वर्ग कौन है जो क्रांतिकारी है? आपको पूँजी के अंतर्गत इसका जवाब नहीं मिलेगा. मार्क्स की पूंजीमजदूर वर्ग के बारे में नहीं है – सिवाय इसके कि मजदूर वर्ग उसका एक लक्ष्य है. पूंजी में जिस चीज की ब्याख्या की गयी है वह है पूंजी की प्रकृति, इसका लक्ष्य और इसकी गतिकी. मगर मजदूर वर्ग के बारे में यह सिर्फ इतना ही बताती है कि पूंजी मजदूर वर्ग के खिलाफ काम करती है. और चूँकि वह मजदूर वर्ग को एक विषय के तौर पर पेश नहीं करती, इसलिये वह इस बात पर केंद्रित नहीं है कि पूंजी अपने इस मातहत के खिलाफ कैसे लड़ती है. इसके लिये हमें मार्क्स की दूसरी रचनाओं और उनकी टिप्पणियों को देखना होगा कि कैसे पूंजीपति वर्ग मजदूरों को बाँटकर और उन्हें अलग-थलग करके अपनी सत्ता बनाये रखता है (विशेष तौर पर अंग्रेज और आयरिश मजदूरों को). और, हालाँकि मार्क्स ने स्पष्ट तौर पर टिप्पणी की है कि “पूंजी की समकालीन सत्ता” मजदूरों में नयी जरूरतें पैदा करने पर ही “पूंजी की समकालीन सत्ता निर्भर” है, लेकिन उन्होंने किसी भी  जगह इस प्रश्न की जांच-पड़ताल नहीं की है.  

इसलिये, समकालीन मजदूर वर्ग की प्रकृति एक ऐसा महत्वपूर्ण प्रश्न है जिसका जवाब किसी किताब में नहीं ढूंढा जा सकता. हमें खुद ही इस सवाल का जवाब तलाशना होगा. आज कौन है जिसके पास पूंजी नहीं है? कौन है जो उत्पादन के साधनों से अलग है और जो अपने अस्तित्व को बचाने के लिये पूंजी के आगे एक याचक की तरह खड़ा होता है? निश्चय ही, इसमें सिर्फ वही शामिल नहीं है जो पूंजी को अपनी श्रम शक्ति बेचता है, बल्कि वे भी शामिल हैं जिनकी हैसियत पूंजी को अपनी श्रम शक्ति बेचने लायक भी नहीं हैं – सिर्फ शोषित मजदूर ही नहीं, बल्कि वे भी जिन्हें हासिये पर फेंक दिया गया है. और निश्चय ही, इसमें वे भी शामिल हैं, जो बेरोजगारों की विशाल आरक्षित सेना मौजूद होने के चलते, पूंजी के विस्तार के अधीन काम करते हैं और सारा जोखिम खुद ही उठाने को मजबूर हैं – अर्थात जो लोग अनौपचारिक (असंगठित) क्षेत्र में अपने अस्तित्व के लिये संघर्षरत हैं. भले ही वे फैक्ट्री में काम करने वाले पुरुष मजदूर के घिसेपिटे मानदण्ड पर खरे नहीं उतारते हों, क्योंकि यह मानदण्ड तो हमेशा से ही गलत था.                

निश्चय ही, हमें मजदूर वर्ग की विविधतापूर्ण प्रकृति की पहचान करने से शुरु करना होगा. क्योंकि मार्क्स जानते थे कि मजदूर वर्ग के बीच के मतभेद पूंजी के शासन का जारी रहना संभव बनाते हैं. लेकिन मार्क्स यह भी जानते थे कि संघर्षों के दौरान ही हमारी एकता का निर्माण होता है. और हम अपने खुद के विकास की जरुरत के सामूहिक लक्ष्य को पहचान कर और यह पहचान कर कि “प्रत्येक व्यक्ति का स्वतंत्र विकास सभी के स्वतंत्र विकास की जरूरी शर्त है”, उस एकता का निर्माण कर सकते है. हमें यह विश्वास दिलाकर कि पूँजीवाद का कोई विकल्प नहीं है, पूंजी विचारों की इस लड़ाई को जीतती आ रही है और जो लोग मजदूर वर्ग को क्रांतिकारी मानने से इंकार करते हैं, वे इस काम में पूँजी के मददगार हैं. हालाँकि, अपने  विकास के अधिकार पर जोर देकर हम विचारों की इस लड़ाई को लड़ सकते हैं. मार्क्स और एंगल्स यह जानते थे कि मजदूरों से “अपने अधिकारों के लिये लड़ने का आह्वान करना ‘उन्हें’, क्रांतिकारी, संगठित समूह में ढालने का एक साधन मात्र है.” हमारे पास जीतने के लिये एक पूरी दुनिया है – वह दुनिया जिसका हम हर रोज निर्माण करते हैं.
(माइकल ए. लेबोवित्ज़ वेंकूवर (कनाडा) के साईमन फ्रेसर विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के अवकाशप्राप्त प्रोफेसर और बियोंड कैपिटल, बिल्ड ईट नाउ, और द सोसिअलिस्ट अल्टरनेटिव सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं. यह लेख उनकी किताब बियोंड कैपिटल के आने वाले ईरानी संस्करण का प्राक्कथन है. मंथली रिव्यू के प्रति आभार सहित. अनुवाद- दिनेश पोसवाल)

पूँजीवाद और “मानव स्वभाव” : एक भंडाफोड

अमरीकी महाद्वीप के मूलनिवासियों का उपहार पर्व- पोटलैच

 -जय मूर 
द वेल्थ ऑफ नेशंस के सबसे मशहूर हिस्से में, जहाँ श्रम विभाजन के फायदों की चर्चा की गयी है, एडम स्मिथ इस सिद्धांत को आगे बढ़ाते हैं कि “यह चीज सभी मनुष्यों में समान है” कि उनमें “एक चीज के बदले दूसरी चीज की लेन-देन, अदला-बदली और विनिमय की स्वाभाविक प्रवृति” पायी जाती है. स्मिथ इस बात को खोल कर नहीं बताते कि क्या यह “प्रवृति” मूल मानवीय स्वभाव का मामला है या, प्रबोधनकालीन एडम स्मिथ के लिए ऐसा मानना सुविधाजनक है कि यह मनुष्य की वैसी ही अनोखी क्षमता है जिस तरह चेतना और बोलने की क्षमता. लेकिन इसी अप्रमाणित धारणा के ऊपर कि ऐसी किसी “प्रवृति” का अस्तित्व है, और इसी के साथ एक और ऐसी ही अप्रमाणित धारणा को मिला कर कि अभाव की परिस्थिति में बेपनाह जरूरतों की ख्वाहिश रखने वाला “स्वामित्वशाली व्यक्तिवाद” विश्वव्यापी जन्मजात मानवीय प्रवृति है, पूरा का पूरा आधुनिक नव-क्लासिकीय अर्थशास्त्र इसी पर टिका हुआ है. मुख्यधारा के अर्थशास्त्र की कोई भी किताब पलट के देखिये तो आपका सामना एडम स्मिथ के प्रसिद्द उद्धरण से होगा, जिसे पूँजीवाद और तथाकथित “मुक्त बाजार” की श्रेष्ठता के पक्ष में एक स्वयंसिद्ध प्रस्थान बिन्दु माना जाता है, क्योंकि उन फर्जी आर्थिक रूपों से इस फर्जी मानवीय प्रवृति का काफी मेल बैठता है.

जिस किसी को भी इतिहास और मानवशास्त्र के गहन अध्ययन का अवसर मिला हो, जैसा कि मुझे, जिसने स्थान और काल से परे मानव समाजों और संस्कृतियों की बड़े पैमाने पर परिवर्तनशीलता पर मुग्ध हुआ हो और कुछ बुनियादी समानताओं और विन्यासों पर विचार किया हो (जिनके अस्तित्व को ऐतिहासिक भौतिकवाद दर्शाता है) तो उसने उपरोक्त धारणा के इस चरम कुतर्क पर ध्यान दिया होगा कि आधुनिक बुर्जुआ का ठेठ चरित्र ही सर्वव्यापी मानव चरित्र है. इतिहास के पूरे दौर में अधिकांश मनुष्यों ने ऐसी “प्रवृति” को नहीं दर्शाया है.

कई समाजों में, और शायद सभी समाजों में व्यापारियों का अस्तित्व रहा है, लेकिन जिन लोगों ने भी खुद को धनी बनाने के उद्देश्य से पेशे के रूप में यह काम किया, उन्हें संदेह से देखा जाता रहा है. व्यापार मुख्यतः सामाजिक हासिये पर ही किया जाता था. और, जैसा कि डेविड ग्राएबर ने “कर्ज” के राजनीतिक अर्थशास्त्र के बारे में अपनी चिरस्मरणीय रचना में दर्शाया है, अब तक ज्ञात कोई भी समाज वस्तु विनिमय पर आधारित नहीं रहा है. आधुनिक युग के पहले तक उपहार की अर्थव्यवस्था सबसे अधिक प्रचलित थी, जिसमें समाज में चीजें एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक परिचालित होती थीं और कोई इस बात की गणना नहीं करता था कि उसने जो कुछ दिया उसके बदले उसी के बराबर या उससे बड़ी कोई चीज वापस मिले, यानी कोई भी व्यक्ति संभावित लाभ की उम्मीद नहीं करता था. “अग्रिम भुगतान” की अवधारणा इसी का आधुनिक प्रतिरूप है.

जब यूरोप के लोगों का पहले-पहल उत्तर-पश्चिमी तटवासी इन्डियन (अमरीका के मूलनिवासी) लोगों से सामना हुआ तो वे यह देख कर हैरान रह गये कि वहाँ के निवासियों में धन बटोरने की अंतहीन पूँजीवादी हवस नहीं थी, बल्कि समाजिक जरूरतें पूरी करने के उद्देश्य से संग्रह करने या उपहार देकर अपनी स्थिति सुधारने की प्रथा थी और उपहार पर्व मनाने और अपनी सम्पदा को बाँट कर खत्म करने का चलन था. इसीलिए उन्होंने वहाँ के लोगों का दमन किया तथा इंडियन लोगों के मन में कार्य नैतिकता, बचत और निवेश के बारे में बुर्जुआ विचारों को ठूँस-ठूँस कर भर दिया. कनाडा की सरकार ने 1884 में उपहार पर्व को गैरकानूनी घोषित कर दिया; फिर भी कुछ मूलनिवासी इंडियनों ने इस “असभ्य” प्रथा को जारी रखा तो उन्हें जेल में ठूँस दिया गया और उनके आनुष्ठानिक स्मरण-चिन्हों को उनसे छीन लिया गया. (उन स्मरण चिन्हों को अजायब घरों में रख दिया गया, जहाँ शीशे के खाने में पड़े-पड़े वे विस्मृति के गर्त में चले गये.) अफ्रीका में, सभी यूरोपीय उपनिवेशवादियों ने एक ही तरह के निराशा का इजहार किया, जब बाजार के प्रलोभनों के जरिये वे वहाँ के मूलनिवासियों से अधिक उत्पादन के लिए कठिन श्रम नहीं करवा पाए. उल्टे हुआ यह कि अफ्रीकी ग्रामीण अगर कुछ अधिक अर्जित करने में समर्थ भी थे, जैसा कि आधुनिक युग से पहले की दुनिया के कई दूसरे हिस्से के किसान, तो वे अक्सर काम काम करना पसंद करते थे और छुट्टी का जम के मजा लेते थे. जब उन पर झोपड़ी टैक्स थोपा गया और हिंसा का तांडव किया गया, तब मजबूर होकर उन्होंने बाजार के लिए अधिक उत्पदान किया.
   
इसके अलावा, यह भी जरूरी नहीं कि बाज़ार में छोटे पैमाने की भागीदारी पक्के तौर पर पूँजीवादी मूल्यों को अपनाने का इजहार करती है, हालाँकि एक लंबे अरसे के दौरान विचारों और कार्रवाइयों पर इसका विनाशकारी प्रभाव जरुर हुआ होगा. लोगों ने “परंपरागत” सामाजिक उत्पादन के लिए “एक चीज के बदले दूसरी चीज की लेन-देन, अदला-बदली और विनिमय” करने का फैसला लिया होगा और जरूरी नहीं कि इसके पीछे मुनाफा कमाना ओर “तरक्की करना” उनका उद्देश्य रहा हो. उपहार की अर्थव्यवस्था भी उसी के साथ-साथ या बाजार आर्थव्यवस्था के साथ तालमेल करते हुए चलती रही होगी. उत्तरी-पश्चिमी तटवासी अमरीकी मूलनिवासी यूरोप के साथ ऊन और मछली का व्यापार करते थे, ताकि बदले में वे अपने उपहार पर्व (पोटलैच) के लिए अनोखी वस्तुएँ हासिल कर सकें.

हालही में मैंने एक दिलचस्प किताब पढ़ी- द डिस्कवरी ऑफ फ़्रांस: ऐ हिस्टोरिकल जोगरफी फ्रॉम द रेवोलूशन टू द फर्स्ट वर्ल्ड वार, जिसके लेखक ग्राहम रोब हैं. इसमें विस्तार से यह बताया गया है कि प्रांतीय फ़्रांस में रोजमर्रे का जनजीवन कैसा था और आधुनिकता के उभर के बाद उसमें किस तरह बदलाव आया. यह ठीक वही समय था जब व्यावहारिक रूप से अब तक अपनी कीमतपर पूरी जिन्दगी गुजारते आ रहे ग्रामीण लोग, अमूमन हैरत और नाउम्मीदी के साथ देख रहे थे कि अब वे “फ़्रांस” नामक एक कहीं बड़े सत्ता के अंग हैं. एक छोटी सी कहानी खास तौर पर मेरे दिमाग में बस गयी है- ऑरजेनिया इलाके में महिलाओं का एक समूह कपड़ों की सिलाई-बुने के लिए एकत्र होता था जहाँ दूसरों के लिए काम करने के बदले घुमंतू व्यापारी उनको बहुत ही थोड़े पैसे देते थे. लेकिन वहाँ मामला पैसा कमाने का था ही नहीं. असली बात शाम होने के बाद भी घर से बाहर निकलने और आपसी मेलजोल की थी. कपड़ों की सिलाई-कढाई से जितने पैसे मिलते थे वे तो चिराग जलाने के लिए तेल खरीदने में ही लग जाते थे. रोब कहते हैं कि इन महिलाओं जैसे लोगों के व्यवहार को प्रेरित करने वाला कारक किसी आर्थिक जरुरत से कहीं ज्यादा अपनी ऊब मिटाना होता था.

ऐसे ही कई और उदाहरण दिये जा सकते हैं जो दिखाते हैं कि एडम स्मिथ ने मानव जाति का जो काल्पनिक खाका बनाया है उसमें अधिकांश मनुष्य फिट नहीं बैठते, न तो स्वाभाविक रूप से और नही “तर्क” का अभ्यास करने से. जैसा कि कार्ल पोलान्यी ने द ग्रेट ट्रांसफोर्मेशनमें दिखाया है, मानव समाज विभिन्न प्रकार की आर्थिक तार्किकताओं का वाहक रहा है; सब को उन्होंने इन समूहों में रखा है- परस्पर लेनदेन, पुनर्वितरण, परिवार के उपभोग के लिए उत्पादन और बाजार व्यवस्था. बाजार व्यावस्था की प्रधानता से पहले की अर्थव्यवस्थाएं अकेले व्यक्ति की सत्ता नहीं होती थीं. बावजूद इसके कि वहाँ विभिन्न सत्रों और अधिक समानता वाले समाजों में अंतर मौजूद था, सभी अर्थव्यवस्थाएँ सामाजिक संबंधों में “सन्निहित” या “अंतर्गुम्फित” थीं और सम्मान जैसी नीतियों पर आधारित थीं- सीधे निजी आर्थिक स्वार्थों से उनका कोई लेना-देना नहीं था. पोलान्यी दर्शाते हैं कि किस तरह “एक चीज के बदले दूसरी चीज की लेन-देन, अदला-बदली और विनिमय,” जो इस हद तक समाज की चारित्रिक विशेषता बन गये हैं, इंग्लैण्ड में, जो कि इनका मुख्य उद्भव स्थल है, स्वाभाविक रूप से नहीं आए थे. 18वीं सदी के उत्तरार्ध और 19वीं सदी की शुरुआत (जो इस किताब का शीर्षक है) में मुक्त व्यापार अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों की आड़ में कठोर कानूनों की एक पूरी श्रृंखला को जबरन लागू करके इसे संस्थाबद्ध किया गया था. पूँजीवादी सम्पत्ति संबंधों और पूँजीवादी मानदंडों को थोपने और बनाये रखने में राजसत्ता ने केन्द्रीय भूमिका निभाई थी और आज भी निभा रही है.
अच्छी हैसियत वाले पूँजीपतियों और मुख्यधारा के पूँजीवाद समर्थक अर्थशास्त्रियों की निगाह में निजी स्वार्थों को अधिकाधिक बढ़ाने वाले व्यवहारों के अलावा सभी तरह के आचरण “अतार्किक” होते हैं. स्कूलों में “व्यापार में कैसे सफल हों,” इस बारे में तो ढेर सारे पाठ्यक्रम होते हैं, लेकिन सहकारी समितियों का गठन और संचालन कैसे करें या शोषणकारी और अलगाव का शिकार बनाने वाली “मुक्त बाजार” प्रक्रिया के किसी दूसरे विकल्प के पाठ्यक्रम शायद ही होते हों.

आश्चर्य की बात नहीं कि इस माहौल में एक सामूहिक सुर उभरता है जो किसी भिन्न राय पर विचार करते हुए उसे विदेशी और ‘काल्पनिक” बताता है और कहता है कि इसे तो असफल होना ही है. लेकिन हम यह पूछ सकते हैं कि हमारा यह समाज कितना तार्किक है जहाँ धनी और गरीब के बीच, 1 % और 99 % के बीच विकराल और विस्मयकारी असमानता मौजूद है, जहाँ एक अरब लोग रोज भूखा सोते हैं, जबकि बेलगाम विकास और उसे टिकाये रखने के लिए बेशुमार उपभोग की आदत ने समूची पृथ्वी के पर्यावरण को तबाह कर दिया और इसके विनाश का खतरा पैदा कर दिया?

हालाँकि आधुनिक काल से पहले या उसके शुरूआती युग के लोगों का रोमानी चित्र खींचना उचित नहीं, फिर भी रोब कंगाली की गर्त में पड़े, अनिश्चितता में डूबे फ़्रांसिसी किसान का वर्णन करते हैं जो कुर्क अमीन या मूसलाधार बारिश का इंतजार करता थरथर काँपता रहता था. कितना अच्छा होता कि पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली के चलते उत्पादन क्षमता में जो अद्भुत वृद्धि हुई है उसका संचालन एक समकालीन “सहकारी राष्ट्रमंडल” के जरिये होता, जो पूँजीवादी निजी मुनाफाखोरी से नहीं, बल्कि उपहार अर्थव्यवस्था और इतिहासकारों द्वारा वर्णित मानवीय किस्म की मूल्य-मान्यताओं से प्रेरित होता. 
(जय मूर एक रेडिकल इतिहासकार हैं. वेरमौंट के ग्रामीण इलाके में रहते हैं और जब कभी काम मिल जाता है तो पढाने का काम करते हैं. मंथली रिव्यू से आभार सहित. अनुवाद- दिगम्बर)         

मिस्र में राजनीतिक इस्लाम की जीत के मायने – सामीर अमीन

(कल 30 जून को मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड के नेता मोहम्मद मोरसी ने उसी तहरीर चौक पर राष्ट्रपति पद की शपथ ली जहाँ से होस्नी मुबारक की निरंकुश सत्ता के खिलाफ वहाँ के लाखों लोगों ने अपनी आवाज बुलंद की थी. लोकतंत्र, न्याय और समता की यह लड़ाई अभी भी जारी है क्योंकि जिस लक्ष्य को लेकर मिस्र का अवाम उठ खड़ा हुआ था, उसे अमरीका, इजराइल और उनके पिट्ठू अरब शासकों ने अपनी साजिशों का शिकार बना दिया. यही कारण है कि आज भी तहरीर चौक प्रतिरोध का झंझाकेंद्र बना हुआ है. प्रस्तुत है, मिस्र की ताजा घटनाओं पर वहाँ के एक विश्वविख्यात अर्थशास्त्री सामीर अमीन की यह टिप्पणी.)
मिस्र के चुनाव (जनवरी 2012) में मुस्लिम ब्रदरहुड और सलाफपंथियों की जीत कोई चौंकानेवाली बात नहीं. पूँजी के मौजूदा वैश्वीकरण ने जिस आर्थिक पतन को जन्म दिया है, उसके चलते वहाँ तथाकथित “अनौपचारिक” गतिविधियों में बेशुमार बढ़ोतरी हुई है. मिस्र की आधी से भी अधिक आबादी (आकडों के अनुसार 60% जनता) इसी अनौपचारिक क्षेत्र से अपनी जीविका चलती है.
मुस्लिम ब्रदरहुड इस पतन का लाभ उठाने और अपनी तादाद बढ़ाने के लिहाज से वहाँ काफी बेहतर हालत में रही है. उनकी एक तरफ़ा विचारधारा उस दुखद बाज़ार अर्थव्यवस्था को उचित ठहराती है जो किसी भी तरह के विकास की जरूरतों के पूरी तरह खिलाफ है. मुस्लिम ब्रदरहुड की गतिविधियों, जैसे- अनौपचारिक को आर्थिक सहायता, परोपकारी सेवाओं, अस्पताल, इत्यादि के लिए भारी मात्रा में वित्तीय साधन मुहैया किया गया.
इस तरह से ब्रदरहुड ने समाज के दिल में जगह बनाई और लोगों को अपने ऊपर निर्भर बनाया. खाड़ी देशों की मंशा कभी यह नहीं रही कि अरब देशों के विकास को बढ़ावा दें, मसलन वहाँ के उद्योग में पूँजी लगाएँ. वे आंद्रे गुंदर फ्रांक के शब्दों में- एक तरह के “लम्पट विकास” की मदद करते हैं, जो सम्बंधित समाजों को कंगाली और वंचना के मकड़जाल में पूरी तरह फँसा लेता है, जिसके चलते उन समाजों के ऊपर प्रतिक्रियावादी राजनीतिक इस्लाम के शिकंजे को और मजबूती से कसने में उन्हें आसानी होती है.
इसे इतनी आसानी से कामयाबी नहीं मिल पाती, अगर यह अमरीका, इजराइल और खाड़ी देशों की सरकारों के उद्देश्यों से पूरी तरह मेल नहीं खा रहा होता. इन तीनों करीबी सहयोगियों की चिंता एक ही है- मिस्र की स्थिति में सुधार न होने देना. एक मजबूत, स्वाभिमानी मिस्र का मतलब खाड़ी देशों (समाज के इस्लामीकरण के आगे पुरि तरह समर्पण), अमरीका (एक ताबेदार और कंगाल मिस्र ही उसके प्रत्यक्ष प्रभाव के अधीन रहेगा) और इजराइल (एक शक्तिहीन मिस्र फिलिस्तीन में दखल नहीं देगा) के तिहरे दबदबे का अंत होगा.

सादात के शासन काल में मिस्र के शासकों ने अचानक और पूरी तरह से नव-उदारवाद का समर्थन और वाशिंगटन के आगे समर्पण कर दिया था, जबकि अल्जीरिया और सीरिया ने यह काम धीरे-धीरे और संयत तरीके से किया था. मुस्लिम ब्रदरहुड जो शासन तंत्र का अंग है, उसे महज एक “इस्लामिक पार्टी” नहीं माना जा सकता, बल्कि सबसे पहले और सबसे बढ़चढ़ कर यह एक अत्यंत प्रतिक्रियावादी पार्टी है जो साथ के साथ इस्लामपंथी भी है. यह केवल “सामाजिक मुद्दों” (हिजाब, शरिया, दूसरे धर्मों से दुश्मनी इत्यादि) के मामले में ही नहीं, बल्कि आर्थिक-सामाजिक जीवन के बुनियादी मामलों में भी उसी हद तक प्रतिक्रियावादी है- ब्रदरहुड हड़तालों, मजदूरों की माँगों, मजदूरों के स्वतन्त्र यूनियनों, किसानों की बेदखली के खिलाफ प्रतिरोध आंदोलन, इत्यादि का विरोधी है.

इस तरह “मिस्र की क्रांति” की योजनाबद्ध असफलता उस व्यवस्था को जारी रखने की गारंटी करेगा जिसे वहाँ सादात के दौर से ही कायम किया जाता रहा, जो सेना के उच्च अधिकारीयों और राजनीतिक इस्लाम के गंठजोड़ पर आधारित थी. निश्चय ही, ब्रदरहुड अपनी चुनावी जीत के दम पर अब उससे कहीं ज्यादा अधिकार की माँग करने में सक्षम है, जितना सेना ने उसे अब तक सौंपा था. हालाँकि इस गंठजोड़ के फायदों का ब्रदरहुड के हक में बँटवारा करना कठिन साबित हो सकता है.

24 मई को राष्ट्रपति चुनाव का पहला चक्र इस तरीके से संगठित किया गया था कि मिस्र की सत्ता पर काबिज लोगों और वाशिंगटन, दोनों के मनमाफिक उद्देश्यों को हसिल किया जा सके, यानी व्यवस्था के दो स्तंभों- सेना के उच्च अधिकारी और मुस्लिम ब्रदरहुड के गंठजोड़ को और मजबूत बनाया जाय तथा उनके बीच के मतभेदों को सुलझाया जाय (कि उनमें से कौन अगली कतार में रहेगा). इस मकसद से जो दो उम्मीदवार “स्वीकार्य” थे, सिर्फ उन्हें ही पर्याप्त साधन हासिल हुए कि वे अपना-प्रचार अभियान चला सकें- मोरसी (ब्रदरहुड- 24%) और शफीक (सेना- 23%). जनआन्दोलन के असली उम्मीदवार- एच. सब्बाही, जिन्हें सामान्य रूप से मंजूर की गयी  सुविधाएँ भी हासिल नहीं हुईं, उन्हें कथित रूप से केवल 21% वोट मिले (यह आँकड़ा संदेहास्पद है).  
   
लंबे समय तक चले समझौता वार्ताओं के अंत में इस बात पर सहमति बनी कि मोरसी ही दूसरे चक्र के विजेता हैं. राष्ट्रपति की तरह ही संसद का चुनाव भी इस्लामपंथियों को वोट देने वालों के घर बड़े-बड़े गट्ठर (मांस, तेल और चीनी) पहुँचाने के जरिये ही हो पाया. और फिर भी, “विदेशी पर्यवेक्षक” उस परिस्थिति को देख ही नहीं पाये, जिसका मिस्र में खुले आम मजाक उड़ाया गया. सेना ने संसद भंग करने में देरी की, जो दरअसल ब्रदरहुड को पर्याप्त समय देना चाहती थी, ताकि वह रोजगार, तनख्वाह, स्कूल और स्वास्थ्य जैसे सामाजिक मुद्दे उठाने से इन्कार करके खुद बदनामी मोल ले.

मोरसी की “अध्यक्षता” वाली मौजूदा व्यवस्था इस बात की बेहतरीन गारंटी है कि लम्पट विकास और राज्य की संस्थाओं के विध्वंस के जिस लक्ष्य को अमरीका लगातार बढ़ावा दे रहा था, वह जारी रहेगा. हम देखेंगे कि क्रन्तिकारी आन्दोलन जो आज भी लोकतंत्र, सामाजिक प्रगति और राष्ट्रिय स्वाधीनता के लिए संघर्ष के प्रति पूरी तरह वचनबद्ध है, इस चुनावी स्वांग के बाद किस तरह आगे बढ़ता है.

(सामिर अमीन दुनिया के जानेमाने मार्क्सवादी अर्थशास्त्री है. अंग्रेजी में मंथली रिव्यू द्वारा प्रकाशित इस लेख को आभार सहित लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. अनुवाद- दिगम्बर)

मुद्दत से चुकता नहीं हुआ उनका हिसाब- मार्ज पियर्सी

क़यामत का जिक्र करना,
उकसाना धोखेबाज़ी और बदनीयती को,
किस्से बुनना ताकि टाला जा सके
बदकिस्मती को-
इनसे बात नहीं बनने वाली.
तेज होती जा रही है ओले बरसाती
हवा. उठ रही हैं ऊँची लहरें और फिर
लौट रही हैं पीछे, बेपर्द करती तलहटी
जिसे कभी देखा नहीं तुमने.
हवा में राख है प्यारे,
हमारे खाने में राख जैसा कोई जायका
सोते वक्त हमारे होठों पर राख
राख से अंधी हुई आँखें.
हमारी रीढ़ गिरवी है जिसे
छुड़ा नहीं सकते हम. किसी ने
हमारे दाँत खरीद लिए और चाहता है
उखाडना उन्हें दाँव पर लगाने के लिए.
असली शैतान छुपे हैं चारपाई के नीचे,
खून के प्यासे. जिस जमीन पर
बना है यह मकान उसके मालिक
शुरू करेंगे यहाँ कोयला खदान.
सांता क्लॉज नहीं आता. आते हैं
किराये के गुंडे. तुम्हारी बुनियाद
गिरवी है और बैंक बेचैन है
पाबन्दी लगाने को तुम्हारे आनेवाले कल पर. 
अगर चाहते हो बचे रहना तो जागो
अगर चाहते हो लड़ना तो आगे बढ़ो
कुछ भी हासिल नहीं होता मुन्तजिर को
केवल भूख के पंजे खरोंचते हैं
खाली पेट के भीतर.
अगर जानते हो अपने लहू की कीमत
तो लड़ो कि वह बहता रहे रगों में.
तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है खोने को
अपनी जिन्दगी के सिवा.
और वह तो दशकों पहले बेंच दी थी
तुम्हारे पुरखों ने उनके हाथों.
बेइंतिहाँ है उनकी हवस
तुम्हारे सब्र की कोई इन्तिहाँ है?
(मंथली रिव्यू , मई 2012 में प्रकाशित. अनुवाद- दिगम्बर)

संसाधनों का ह्रास और पर्यावरण का विनाश -एक विनम्र प्रस्ताव

            -फ्रेड मैगडॉफ

(इस टिप्पणी में फ्रेड ने बड़े ही सरल और रोचक ढंग से यह बताया है कि दुनिया के मुट्ठीभर सबसे धनी लोग ही संसाधनों का सबसे ज्यादा उपभोग करते हैं और वे ही पर्यावरण और धरती के विनाश के लिए जिम्मेदार हैं, जबकि उलटे वे लोग गरीबों की जनसंख्या को इसके लिए दोषी ठहराते हुए एनजीओ के जरिये परिवार नियोजन कार्यक्रम चलवाते हैं. फ्रेड का सुझाव है कि गरीब जनता बहुत कम संसाधन खर्च करती है, इसलिए गरीबों की नहीं, बल्कि धनाढ्यों की जनसंख्या और दौलत पर रोक लगा कर ही धरती को बचाया जा सकता है. फ्रेड मैगडॉफ पारिस्थितिकी और अर्थशास्त्र के जानेमाने प्रोफ़ेसर और प्रतिष्ठित लेखक हैं.)  

दैत्याकार क्रेन 

धनी देशों में ढेर सारे लोग यह मानते हैं कि इस धरती पर जितने संसाधन उपलब्ध हैं उनमें लगातार  कमी होना और दुनिया भर में बढते पर्यावरण प्रदूषण कि मुख्य वजह आज भी दुनिया के निवासियों की विराट संख्या है जो सात अरब से भी ज्यादा है. यह स्थिति और भी खराब होगी क्योंकि विश्व-जनसंख्या इस सदी के मध्य तक 9 अरब और सदी के अंत तक 10 अरब हो जाने की संभावना है.
इसका समाधान यह सुझाया जा रहा है (वैसे कुछ लोगों का कहना है कि वास्तव मे कोई समाधान है नहीं- हम सब के भाग्य में उथल-पुथल और बर्बरता लिखी है) कि विश्व जनसंख्या को तेज़ी से घटाया जाय, खासकर ऐसे कार्यक्रमों के जरिये जो जन्म में कमी को प्रेरित करें. इसी का नतीजा हैं गरीब देशों में गर्भ निरोधकों के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करने के लिए धनी देशों के एनजीओ द्वारा वित्त पोषित कार्यक्रम जो महिलाओं के लिए गर्भ-निरोधक और परिवार नियोजन के उपाय मुहैय्या करते हैं.
इस मुद्दे पर वे लोग जो रुख अपना रहे हैं हम उसकी पडताल कभी बाद में करेंगे. यहाँ हम उनके इस दावे को पूरी तरह सही मानकर चलेंगे कि दुनिया की विशाल  जनसंख्या ही संसाधनों के इस्तेमाल और वैश्विक पर्यावरण की क्षति को बुरी तरह प्रभावित कर रही है.
विश्व बैंक के कर्मचारियों ने विश्व विकास सूचक- 2008  में यह आकलन प्रस्तुत किया है की दुनिया की 10 फीसदी सबसे धनी आबादी लगभग 60 फीसदी संसाधनों का इस्तेमाल करती है और 40 फीसदी सबसे गरीब आबादी इन संसाधनों का 5 फीसदी से भी कम इस्तेमाल करती है. संसाधनों के इस्तेमाल और जनससंख्या के बीच इस घनिष्ट सम्बंध को देखते हुए सबसे धनी 10 फीसदी लोग ही 60 फीसदी वैश्विक प्रदुषण, यानी ग्लोबल वार्मिंग, जल प्रदुषण, इत्यादि के लिए जिम्मेदार हैं.

अब विचारधारा को थोड़ी देर के लिए दरकिनार कर दें. अगर आप वैश्विक संसाधनों के इस्तेमाल और पर्यावरण विनाश के मामले को लेकर उतने ही चिंतित हैं जितना मैं और कई अन्य लोग, तो ये आँकड़े ऐसे नतीजे की ओर ले जाते हैं जिनसे कोई आँख नही चुरा सकता. गरीब परिवारों की जनसंख्या घटाने का प्रयास इस मामले को हल करने में बिलकुल मदद नहीं करेगा, क्योंकि संसाधनों और पर्यावरण से जुड़ी जिन समस्याओं का हम सामना कर रहे हैं उसके असली गुनाहगार दुनिया के लखपति-करोड़पति हैं.
इस सच्चाई के मद्देनज़र हमारा यह विनम्र सुझाव है कि दुनिया के सबसे धनी 10 फीसदी लोग अपनी जरूरतों में कटौती करें. हमारे ग्रह की पारिस्थितिकी और विश्व जनगण के लिए यह कदम बेहद जरूरी है. इसलिए मेरा प्रस्ताव है की निम्नलिखित कार्यक्रमों को फौरन लागू किया जाय-
(क)     लखपतियों-करोड़पतियों के लिए “कोई बच्चा नहीं “ या “केवल एक बच्चा” की नीति;

(ख)    पैतृक संपत्ति पर 100 फीसदी टैक्स तत्काल लागु करना, (यानी संपत्ति का उत्तराधिकार खत्म);
(ग)     और न्यूनतम आय-सीमा (न्यूनतम मजदूरी की तरह ) लागू करके लखपतियों-करोड़पतियों की आय को घटाना.
इन निर्देशों का पालन करते हुए हम जल्द ही दुनियाभर में संसाधनों के इस्तेमाल और प्रदुषण को घाटा कर आधा कर सकते हैं. तब लखपति-करोड़पति या तो दुनिया से गायब हो जायेंगे (मर-खप जायेंगे ) या ऐसी जिन्दगी जियेंगे जिसमें उनका उपभोग भी आम जनता की तरह ही सामान्य हो जाएगा.
तब, जब हम अपनी धरती पर भारी दबाब को घटा चुके होंगे, हम उन मुद्दों को हाथ मे लेंगे, जिनको हल करते हुए हम अपने इस ग्रह को रहने लायक और अपने समाज को न्यायपूर्ण बनायेंगे.
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