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"फिदेल मरने वाला है"

-फिदेल कास्त्रो


( प्रस्तुत लेख में फिदेल कास्त्रो ने दुनियाभर के साम्राज्यवादी मीडिया द्वारा फैलाए गये इस झूठ का मखौल उड़ाया है कि “फिदेल मरने वाला है”. इसमें उन्होंने “रिफ्लेक्संस” (विचार प्रवाह) को बंद करने के अपने फैसले का कारण भी बताया है. इस विषय में उन्होंने यह विनम्र आकलन पेश किया कि क्यूबा में उनके लेखों से कहीं ज्यादा तवज्जो देने लायक कई जरूरी मुद्दे हैं. वैश्विक घटनाओं पर हमारे समय के एक अगुआ राजनेता की बेबाक और ईमानदार टिप्पणियों का कोई जोड़ नहीं है.) 

विक्टोरिया दे गिरों मेडिकल साइंसेज इंस्टिट्यूट के स्नातक प्रथम वर्ष कक्षा द्वारा जारी किया गया बस एक सन्देश ही साम्राज्यवादी प्रोपगंडा की सारी हदें पर कर जाने और समाचार एजेंसियों द्वारा इस झूठ के पीछे टूट पड़ने के लिए काफी था. इतना ही नहीं, बल्कि अपने केबल के जरिये वे ऐसी अनापशनाप बातें फ़ैलाने लगे जो किसी मरीज के बारे में किसी ने आजतक नहीं सुनी होगी. 

स्पेन के अख़बार एबीसी ने खबर छापी कि वेनेजुएला के एक डॉक्टर ने किसी अज्ञात जगह से यह खुलासा किया है कि कास्त्रो के दिमाग की दाहिनी धमनी में बहुत ज्यादा थक्का जम गया है. “मेरा मानना है कि अब हम फिर कभी सार्वजनिक जीवन में वापस आते नहीं देख पायेंगे.” इस कथित डॉक्टर ने, अगर वह सचमुच एक डॉक्टर है, तो निस्संदेह उसने अपने देश के लोगों से दगाबाजी की है और कास्त्रो के स्वास्थ्य के बारे में बतया है कि “जल्दी ही उनका स्नायु तंत्र फेल होने वाला है.” 

दुनिया के ढेर सारे लोग इस तरह की अनाप-शनाप खबरें फैलाने वाली सूचना एजेंसियों के झांसे में आ जाते हैं, जिनमें लगभग सभी सुविधासम्पन्न और अमीर लोगों के कब्ज़े में हैं- लेकिन लोग अब इन पर बहुत कम ही यकीन करते हैं. कोई भी व्यक्ति धोखा नहीं खाना चाहता; यहाँ तक की सबसे लाइलाज झूठे से भी लोग सच सुनने की आश लगाए रहते हैं. अप्रैल 1961 में, समाचार एजेंसियों द्वारा फैलाये गए उस समाचार पर सबने विश्वास कर लिया था कि गिरोन या बे आफ पिग्स (इसे कुछ भी कहें) के भाड़े के हमलावर हवाना की तरफ बढ़ रहे हैं, जबकि सच्चाई यह थी कि उनमें कई अपनी नावों में बैठ कर उन यांकी युद्धपोतों तक पहुँचने की नाकामयाब कोशिश कर रहे थे जो उनकी हिफाजत में तैनात थे. 

बार-बार आनेवाले पूंजीवादी संकटों को देखते हुए अब सच्चाई लोगों को समझ में आने लगी है और प्रतिरोध भी दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है. कोई भी झूठ, दमन या नया हथियार इस उत्पादन प्रणाली को ध्वस्त होने से नहीं रोक पायेगा जिसमें असमानता और अन्याय की खाई दिन पर दिन चौड़ी होती जा रही है. 

कुछ दिन पहले, अक्तूबर संकट की पचासवीं सालगिरह के आसपास, समाचार एजेंसियों ने मिसाइल संकट के लिए तीन पक्षों को दोषी ठहराया था- उस समय साम्राज्यवाद के चौधरी रहे केनेडी, ख्रुश्चेव और क्यूबा. क्यूबा को नाभिकीय हथियारों से कुछ भी लेना-देना नहीं था, और न ही हिरोशिमा और नागासाकी में किये गए गैरजरूरी कत्ले-आम से ही, जो उस समय के अमरीकी राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने करायी थी, जिसकी बदौलत दुनिया भर में उनकी नाभिकीय तानाशाही कायम हुई थी. क्यूबा तो अपनी आज़ादी और सामाजिक न्याय के अपने अधिकारों की रक्षा कर रहा था 

यांकियों के हमलावर मनसूबे से अपनी मातृभूमि की अपनी हिफाजत के लिए हमने हथियारों, तेल, खाने-पीने की चीजों और अन्य संसाधनों के रूप में सोवियत सहायता कबूल की थी. इस पूंजीवादी देश ने शुरुआती महीनों से ही हम पर घिनौना और खुनी युद्ध थोप दिया था, जिसमें हजारों क्यूबावासियों को मार डाला गया और अपंग बना दिया गया. 

जब ख्रुश्चेव ने मध्यम दुरी तक मार करने वाली मिसाइल लगाने का प्रस्ताव दिया, ठीक वैसा ही, जैसी अमरीका ने तुर्की में लगा रखी थी, जो क्यूबा और अमरीक के बीच की दुरी की तुलना में सोवियत रूस के ज्यादा करीब था- तब सोवियत संघ के साथ एकता बनाये रखने के लिए क्यूबा वह खतरा उठाने से नहीं हिचका. हमारा व्यवहार नैतिक तौर पर पाक-साफ था. हमने जो कुछ किया उसके लिए किसी से माफ़ी नहीं माँगेंगे. सच्चाई यही है कि आधी सदी गुजर गयी और आज भी सर उठा कर खड़े हैं. 

मैंने “रिफ्लेक्संस” छपवाना बंद कर दिया क्योंकि यकीनन क्यूबा प्रेस के पास जो कागज है उसकी अहमीयत मेरे लेखों से कहीं ज्यादा हमारे देश के दूसरे जरूरी कामों के लिए है. 


बुरी खबर देने वाले कौवों!! मुझे तो अब याद भी नहीं कि सिरदर्द किस चिड़िया का नाम है. वे कितने झूठे हैं यह बताने के लिए मैं बतौर तोहफा उन्हें इस लेख के साथ अपना फोटो भी भेज रहा हूँ.



(मंथली रिव्यू के प्रति आभार सहित. अनुवाद- सतीश)

ओलम्पिक खेल, आचार-संहिता और डाव केमिकल


(ओलम्पिक खेलों में भारत की झोली में कितने पदक आयेंगे यह तो आने वाले कुछ दिनों में पता चल ही जायेगा, लेकिन लन्दन ओलम्पिक के आयोजकों ने भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के न्यायप्रिय, स्वाभिमानी और जनपक्षधर लोगों को अपमानित किया है, इसमें कोई संदेह नहीं है. भोपाल गैस काण्ड को अंजाम देनेवाली  अपराधी कम्पनी यूनियन कार्बाईड का मालिकाना जिस डाव केमिकल ने हथियाया है, उसे ओलम्पिक का प्रायोजक बनाने के खिलाफ दुनिया भर में भारी विरोध हुआ. लेकिन इसकी अनदेखी करते हुए अंतरराष्ट्रीय ओलम्पिक संघ ने अपना फैसला नहीं बदला. प्रस्तुत है दुनिया भर में इस कंपनी के काले कारनामों का खुलासा करता ‘एथलेटिक्स अगेंस्ट डाव केमिकल’ समूह द्वारा जारी यह खुला पत्र.)
 एथलेटिक्स अगेंस्ट डाव केमिकल की ओर से जारी एक खुला पत्र

8 जुलाई, 2011 से प्रभावी ओलम्पिक चार्टर के अनुसार — 

“ओलम्पिक में भाग लेने के लिये किसी भी प्रतियोगी, कोच, प्रशिक्षक या टीम के अधिकारी के लिये यह जरुरी शर्त है कि वह ओलम्पिक चार्टर का हर हालत में पालन करे……”

ओलम्पिक खेलों में भाग लेना किसी भी खिलाड़ी का सबसे बड़ा सपना और लक्ष्य होता है. खेल भावना, चुनौतियों और बाधाओं के कारण ओलम्पिक खेल प्रेरणा के श्रोत होते हैं. इसकी सबसे अच्छी बात यह है कि पूरी मानवता के लिये यादगार पल होने के कारण लोगों का ओलम्पिक  खेलों के साथ एक भावनात्मक जुड़ाव होता है.

यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय ओलम्पिक संघ (आईओसी) ने जब डॉव केमिकल को ओलम्पिक में शामिल करने का निर्णय लिया तो हम काफी हतोत्साहित हुए, साथ ही हमने महसूस किया कि यह फैसला ओलम्पिक चार्टर और उसकी आचर संहिताओं का खुलेआम उल्लंघन है जो ओलम्पिक की मूल भावनाओं को बरक़रार रखने में सहायक हैं.

एथलेटिक्स अगेंस्ट डाव केमिकल का गठन आईओसी की इसी राय की प्रतिक्रिया में हुआ था कि केवल गिने-चुने संगठनों को छोड़कर(जो भोपाल गैस काण्ड और एजेंट आरेंज का विरोध करने वालों के प्रतिनिधि हैं) किसी के लिए डाव केमिकल का ओलम्पिक प्रायोजक होन कोई मुद्दा नहीं हैं.

हम इस बात का खंडन करते है, क्योंकि खुद खिलाड़ी होने के नाते हम इसे पूरी तरह गलत मानते है. सच्चाई यह है कि ज्यादातर खिलाड़ी यह जानते ही नहीं हैं कि दरअसल डाव केमिकल कौन और क्या है तथा इसने कैसे-कैसे कुकृत्य किये हैं. अज्ञानता का मतलब ही होता है किसी बात को चुपचाप स्वीकार कर लेना.

चार्टर के अनुच्छेद-२ के अनुसार- “उन चीजों को प्रोत्साहन और सहायता देनी चाहिए जिनसे खिलाड़ियों के स्वास्थ्य की रक्षा होती है”. लेकिन जो डाव केमिकल निम्नलिखित घटनाओं के लिये जिम्मेदार रही है, वह भला स्वास्थ्य का रक्षक कैसे हो सकती है-

* जहरीले पदार्थों का उत्सर्जन करने के कारण अमरीकी पर्यावरण रक्षा संस्थान ने इसको                                         2010 की दूसरी सबसे ज्यादा प्रदुषण फैलाने वाली कम्पनी बताया है. 

* 1951 से 1975 तक इसने नाभिकीय हथियार और उसका पलीता बनाने वाली कम्पनी का संचालन किया. जिस समय इस कम्पनी की देखरेख का जिम्मा डाव केमिकल ने लिया था, उसी दौरान वहाँ आगजनी की 200 घटनाएँ हुईं, जिनमें 300 मजदूर हताहत हुए. डाव केमिकल के अधिकारीयों ने बाद में यह स्वीकार किया कि वहाँ गैरकानूनी तरीके से प्लूटोनियम विमुक्त किया जाता था.
   
* इसने टीसीई नामक एक घोलक का अविष्कार किया, जो बाद में कैंसर और ओजोन परत में छेद का कारण बना.

* इसने डीवीसीपी नामक एक कीटनाशक का उत्पादन किया. कम्पनी के अन्दर ही जारी किये गये एक रिपोर्ट के अनुसार डीवीसीपी त्वचा के रास्ते शरीर में समा जाता है और इसे सूँघ लेने भर से ही बहुत ज्यादा नुकसान होता है.

* इसने एक खतरनाक रासायनिक विस्फोटक नापाम और एजेंट आरेन्ज का उत्पादन किया जो बहुत अधिक विषैला होता है. अमरीकी सेना ने वियतनाम युद्ध के दौरान इस घातक रसायन का प्रयोग वहाँ के नागरिकों पर किया था.

* इसने युनिवर्सिटी आफ नेब्रास्का के नेब्रास्का स्थित एक प्रयोगशाला में, विद्यार्थियों पर डर्सबन का परिक्षण किया. इसके बाद डाव एलान्को पर डर्सबन के बारे सुरक्षा सम्बन्धी सूचना और दस्तावेज़ दबाने के अपराध में 890 हज़ार डॉलर का जुर्माना लगाया गया, जो उस समय तक सबसे बड़ा जुर्माना था. 2004 में डर्सबन के उत्पादन पर रोक लगा दिया गया.

* इसने लार्सबन नाम का एक कीटनाशक तैयार किया, जो स्वास्थ्य के लिये बेहद नुकसानदायक है.

* स्टेड (ज़र्मनी) में इसने क्लोरीन छोड़ा और इसके खतरों के बारे में वहाँ कि जनता को सूचित नहीं किया.

अमरीकन केमिकल सोसाइटी ने खुलासा किया कि रासायनिक कम्पनियों ने जानबूझकर विनाइल क्लोराइड से होने वाले एंजियोसार्कोमा (यकृत कैंसर) से सम्बन्धित सूचना को दबा कर रखा. (डॉव केमिकल विनाइल क्लोराईड के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है.)

* मिडलैंड, मिशिगन में डाईआक्सीन को साफ़ करने का प्लांट स्थापित किया, जिसके कारण अमरीका में अन्य जगहों की अपेक्षा पिछले 35 सालों से डाईआक्सीन का प्रदुषण सबसे ज्यादा हो रहा है.

* डाव केमिकल ने अपने 20 हज़ार मजदूरों का गुप्त रूप से बीमा करवाया था, ताकि उनकी किसी कारण से मौत होने पर बीमा राशि खुद हड़प ले. यह काम लगभग सभी देशों में गैरकानूनी है.

* युनिवर्सिटी आफ पेन्सिलवेनिया के एक चर्म रोग विशेषज्ञ को इस कम्पनी ने होल्मरवर्ग जेल के कैदियों पर डाईआक्सिन के परीक्षण के लिये पैसे दिए थे.

* इसने सेंट क्लेयर नदी में 8000 गैलन खतरनाक रसायन- ‘पर्क’ (जिसका पेशेवर ड्राईक्लीनर इस्तेमाल करते हैं) बहाया.

* इसने सर्निया में प्रतिदिन 28 टन विषैले रसायन जलाये.

* एक जूरी ने बेनेडेक्टिन (मार्निंग सिकनेस ड्रग) के परिक्षण, उत्पादन, बिक्री और वितरण में इस कम्पनी की लापरवाही को चिन्हित किया.

टाक्सिक सब्स्टांस कंट्रोल एक्ट का उल्लंघन करने के कारण इस कम्पनी पर 11 लाख डॉलर का जुर्माना किया गया.

* नब्बे के दशक में संघीय और राज्य संस्थाओं द्वारा नियमित रूप से कानून का पालन न करने के कारण जुर्माना लगाया गया.

* क्लोरीन युक्त घोलकों का अवैध तरीके से भूगर्भ-जल और सनफ्रांसिस्को खाड़ी में उड़ेलने के खिलाफ इस पर मुक़दमा चलाया गया.

* लुसियाना कोर्ट ने पाया कि डाव केमिकल ने सिलिकान स्तन प्रत्यारोपण के परिक्षण में लापरवाही बरती, संभावित खतरों के बारे में झूठ बोला और अपनी सहायक कम्पनी डाव कार्निक के साथ मिलकर षड़यंत्र रचा.

* लुसियाना के डू पोंट-डॉव इलास्टोमर्स संयंत्र को अमरीका के सबसे घटिया और गंदे संयंत्र कि श्रेणी में रखा गया है. इस संयंत्र ने 1991 मे 540 हज़ार पाउंड कार्सिनोजेंस (कैंसर जनक पदार्थ) का उत्सर्जन किया.

* डाव केमिकल के अमरीका और कनाडा स्थित संयंत्रों मे विषैले पदार्थों के रिसाव और प्रसार के चलते दुर्घटना के कुल 1337 मामले दर्ज हुए, जो एक रिकार्ड है.

* इस कम्पनी ने सिक्योरिटी एक्ट के उन प्रावधानों को बदलवाने के लिये लाबी बनायी, जिनके तहत किसी रासायनिक संयंत्र में जोखिम कम करने के लिए सुरक्षा मानदंडों को कठोर बनाया गया था.

* कम्पनी ने ओट्टो एम्ब्रोस जैसे एक रसायनज्ञ को नौकरी पर रखा जो गुलामी और नरसंहार जैसे युद्ध अपराधों का मुजरिम है. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान एम्ब्रोस आईजी फारबेन कम्पनी का निदेशक था, यह कम्पनी जाईक्लोन बी जैसे जानलेवा पदार्थ का उत्पादन करती थी. जाईक्लोन बी  का इस्तेमाल लाखों यहूदियों की हत्या के लिये किया गया था. एम्ब्रोस उन कुख्यात लोगों में से एक है जिन लोगों ने फासीवादी कन्संट्रेसन  कैम्पों मे कैद लोगों के ऊपर जाईक्लोन बी  का इस्तेमाल करने का फैसला लिया था.

* डाव एग्रोसाइंस के ऊपर 2003 में झूठे विज्ञापन करने के लिए 20 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया. इन विज्ञापनों में यह दावा किया गया था कि डर्सबन के प्रयोग से मानव स्वास्थ्य को कोई खतरा नहीं होता है और इसके प्रयोग से स्वास्थ्य पर कोई दीर्घकालिक प्रभाव नहीं पड़ता है.

* इस कम्पनी ने क्यूबेक सरकार के एक फैसले को चुनौती दी, जिसमें इसके खर-पतवार नाशक 2,4-डी पर प्रतिबन्ध लगाया गया था. इस जहरीले पदार्थ से कैंसर होने का खतरा था. डाव केमिकल ने नाफ्टा की मदद से इस प्रतिबन्ध को हटवा दिया.

डाव केमिकल द्वारा किये गए स्वास्थ्य उल्लंघनों की यह केवल एक छोटी सी फेहरिस्त भर है.

अंतरराष्ट्रीय ओलम्पिक संघ द्वारा डाव केमिकल को ओलम्पिक में शामिल किये जाने और उसकी वकालत करने के चलते खिलाड़ी अब सीधे एक ऐसी कम्पनी से जुड़ गए हैं जो न केवल ओलम्पिक की भावना के खिलाफ काम करती है, बल्कि यह इसके उदेश्यों  का सम्मान भी नहीं करती है.

हमने अपना बयान डाव केमिकल तक ही सीमित रखा है, लेकिन ब्रिटिश फार्मास्युटिकल जिसने मेक्सिको की खाड़ी को प्रदूषित किया, ईडीएफ जो जासूसी करवाने की दोषी पायी गयी है और प्राक्टर एंड गैम्बल जो मेथिलपैराबेंस जैसे कैंसर उत्पन्न करने वाले पदार्थों का उत्पादन करती है, ये सभी कम्पनियाँ ओलम्पिक प्रायोजक के अच्छे उदहारण नहीं हैं. (इन कम्पनियों के बारे में यह सिर्फ सरसरी तौर पर की गयी टिप्पणी है.)

आईओसी को चाहिए कि या तो वह आचार-संहिता और ओलम्पिक चार्टर को प्रभावहीन घोषित कर दे या फिर इसे प्रयाजकों सहित सभी सहभागियों पर सामान रूप से लागू करे. ओलम्पिक का मकसद दोहरे मानदण्ड अपनाना नहीं है और इसीलिए हम ऐसी उम्मीद रखते हैं.

(अनुवाद- सतीश)  

ग्लैक्सो-स्मिथक्लीन पर धोखाधड़ी के जुर्म में 3 अरब डॉलर का जुरमाना


रायटर्स की एक रपट के मुताबिक ब्रिटिश दवा कम्पनी ग्लैक्सो-स्मिथक्लीन ने अपने घटिया कुकृत्य के लिए लगाये गए एक आपराधिक आरोप को स्वीकारने और 3 अरब डालर का जुर्माना भरने पर सहमति दे दी है, जिसे अमरीकी अधिकारी वहाँ के इतिहास में स्वास्थ्य सम्बंधी धोखाधड़ी का सबसे बड़ा मामला बताते हैं.
अमरीकी न्याय विभाग की जाँच के मुताबिक ग्लैक्सो ने पैक्सिल नामक अवसादरोधी दवा बिना मंजूरी लिए 18 साल से कम उम्र के रोगियों को बेंची जो केवल वयस्कों के लिए मान्य थी. वजन घटाने और नपुंसकता का इलाज करने के नाम पर उसने वेल्बुट्रिन नाम की ऐसी दवा बेंची जिसे इन कामों के लिए प्रयोग की अनुमति नहीं मिली थी.
अभियोक्ताओं के मुताबिक इन दवाओं की बिक्री बढ़ाने के लिए ग्लैक्सो कम्पनी ने मेडिकल जर्नल का एक गुमराह करने वाला लेख बाँटा तथा डॉक्टरों को आलिशान दावत और स्पा उपचार जैसी सुविधाएँ मुहैया की जो गैरक़ानूनी रिश्वत जैसा ही है. इसके अलावा कंपनी के बिक्रय प्रतिनिधियों ने डॉक्टरों को हवाई द्वीप पर छुट्टी मनाने, मेडोना के कार्यक्रम का टिकट देने और सेमिनार का खर्चा उठाने पर करोड़ों डॉलर खर्च किये.
तीसरे मामले में कंपनी ने डायबिटीज की दवा अवान्डिया के बारे में अमरीकी खाद्य एवं औषधि विभाग को सुरक्षा डाटा नहीं दिया जो कानून के खिलाफ है. यह दुराचार ’90 के दशक से सुरु हो कर 2007 तक जारी रहा.
ग्लैक्सो कंपनी ने इन तीनों मामलों में आपराधिक अभियोगों को स्वीकारने पर अपनी सहमति दी है. यह मामला खास तौर से मायने रखता है, क्योंकि कारपोरेट दुराचार के मामलों में अपराध स्वीकारना बहुत ही दुर्लभ घटना हुआ करती है. इस इल्जाम का दायरा और अहमियत इतना बेमिसाल है कि अमरीकी अधिकारी इसे “ऐतिहासिक कार्रवाई” और “गैर कानूनी कामों में लिप्त कंपनियों के लिए साफ चेतावनी” बता रहे हैं.
समझौते में कम्पनी को एक अरब डॉलर का आपराधिक और दो अरब डॉलर का दीवानी जुर्माना चुकाना होगा. इस मामले ने 2009 के उस फैसले को पीछे छोड़ दिया है जिसमें अमरीकी अदालत ने एक अन्य दवा कम्पनी फाइजर पर 13 दवाओं की अवैध बिक्री के अभियोग में 2.3 अरब डॉलर का जुर्माना लगाया था.
भारत में इन विदेशी बहुराष्ट्रीय दवा कम्पनियों की आपराधिक गतिविधियों का तो कोई अंत ही नहीं है. दुनिया भर में प्रतिबंधित दवाएँ तथा गैरकानूनी और बिलाइजाजत दवाएँ यहाँ धडल्ले से बिकती हैं. जिन दवाओं का जानवरों पर परीक्षण करना भी विदेशों में वर्जित है, उनको यहाँ आदमी पर आजमाया जाता है. दवाओं की कीमत का तो कोई हिसाब ही नहीं. फिर भी यहाँ इन पर कोई अंकुश नहीं है. तय करना मुश्किल है कि इन मानवद्रोही कुकृत्यों के लिए इन विदेशी कंपनियों और हमारे देशी शासकों में से किसका अपराध ज्यादा संगीन है.

दुनिया पर 1318 कम्पनियों का कब्जा

वाल स्ट्रीट पर कब्जा करोआंदोलन ने अपना निशाना एक प्रतित बहुराष्ट्रीय निगमों को बनाया था। उनके नारे, निशाना और नजरिया कितने सही हैइसका अंदाजा हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन से लगा सकते हैं।

जूरिख स्थित इंस्टिच्यूट ऑफ टेकनोलोजी की तीन सदस्यीय टीम ने एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में उन्होंने दुनिया भर की कुल 3.7 करोड़ कम्पनियों और निवेकों में से 3060 को छाँटकर अध्ययन का ब्योरा दिया है। जटिल गणतीय मॉडल से यह अध्ययन किया गया जिसमें इस बात को स्पष्ट किया गया है कि कैसे ये कम्पनियाँ अन्य कम्पनियों के शेयर खरीदकर उसमें साझेदारी करती हैं और किस तरह केवल 1318 कम्पनियों के एक गिरोह ने दुनिया की 60 प्रतित आमदनी पर मालिकाना कायम कर लिया है। इससे भी आगे इस रिपोर्ट ने आपस में गुँथी हुई 147 कम्पनियों के एक महा-गिरोह का भी पता लगाया है जिसका ऊपर बताये गये गिरोह की कुल सम्पत्ति में से 40 प्रतित पर कब्जा है। इन मुट्ठीभर कम्पनियों में बर्कले बैंक, जेपी मॉर्गन चेज एण्ड कम्पनी और गोल्डमैन सैक्स जैसे ज्यादातर बैंक शामिल है। लन्दन विश्वविद्यालय में बृहद अर्थशास्त्र के एक विशेषज्ञ का कहना है कि इस विश्लेषण का महत्त्व केवल इतना ही नहीं है कि इसने मुट्ठीभर लोगों द्वारा अर्थव्यवस्था पर कब्जा जमाये जाने को उजागर कर दिया है, बल्कि यह विश्व-अर्थव्यवस्था के टिकाऊपन के बारे में हमारी जानकारी भी बढ़ाता है।
जूरिख टीम के अनुसार कम्पनियों की ऐसी गिरोहबंदी एक विकट समस्या बन गयी है। इस गिरोहबंदी में अगर कोई एक कम्पनी डूबती है तो उससे जुड़ी तमाम कम्पनियों की अर्थव्यवस्था भरभराकर गिरने लगती है। नतीजतन पुरे विश्व की अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त हो जाती है। अमरीका में 2008 के संकट तथा अन्य संकटों ने इस बात को सही ठहराया है। जूरिख टीम का मानना हैं कि भले ही इस महा-गिरोह का जन्म सहज तरीके से हुआ हो, लेकिन विभिन्न देशों की राजनीतिक सत्ता पर इस महा-गिरोह का दबदबा कायम है।
जाहिर हैं कि विश्व-अर्थव्यवस्था पर अपने दबदबे से इस महा-गिरोह को असीम क्ति हासिल हुई है। उसके चलते इनको बेलगाम ताकत मिला है। इस बेलगाम ताकत तथा पूँजी संचय और मुनाफाखोरी की इनकी घृणित बीमारी ने इनको इतना क्रूर और निष्ठुर बना दिया है। कि किसी दे की अर्थव्यवस्था को चुटकियों में तबाह कर देना या लाखों लोगों का कत्लेआम करवाना इनके लिए आम बात हो गयी है। अपफगानिस्तान, इराक और लीबिया की तबाही इसके जीवंत उदाहरण हैं। ईरान पर हमले के लिए लगातार उकसावा भी इसी की मिसाल है।
आज जबकि यह पूरी तरह सापफ हो गया है कि हमारी धरती 99 प्रतित आम मेहनतक जनता और एक प्रतित धनाढ्यों के दो खेमों में बँट चुकी है और दुनिया की ज्यादातर मुसीबतें चाहे सामाजिक-आर्थिक संकट हो या जलवायु संकट, इन सबके पीछे इसी एक प्रतित लुटेरों का हाथ है। इसलिए पूरी मानवता और अपनी धरती को बचाने के लिए हर हालत में इन एक प्रतित के खिलाफ हम 99 प्रतित को एकजुट होकर इन्हें परास्त करना होगा। निश्चय ही यह ऐतिहासिक जिम्मेदारी बहुत ही चुनौती भरा है। उन्नत चेतना और मजबूत संगठन के बल पर ही यह कार्यभार पूरा किया जा सकता है।

(देश-विदेश अंक-१३ में प्रकाशित)

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