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उत्तरी कोरिया में युद्ध टालने का कर्तव्य

फिदेल कास्त्रो – फोटो राइटर से साभार

-फिदेल कास्त्रो

आज के दौर में मानवता जिन बड़ी चुनौतियों का सामना कर रही है, मैंने उनकी चर्चा कुछ दिन पहले ही की थी. हमारी धरती पर बौद्धिक जीवन लगभग 2,00,000 वर्ष पहले उत्पन्न हुआ था, हालाँकि नयी खोजों से कुछ और ही बात का पता चला है.

हमें बौद्धिक जीवन और उस सामान्य जीवन के अस्तित्व के बीच भ्रमित नहीं होना चाहिए, जो अपने शुरुआती रूप में हमारे सौर मंडल के अंदर करोड़ों साल पहले से मौजूद था.

दरअसल पृथ्वी पर जीवन के अनगिनत रूप मौजूद हैं. दुनिया के अत्यंत जानेमाने वैज्ञानिकों ने बहुत पहले ही अपनी श्रेष्ठ रचनाओं में इस विचार की कल्पना की थी कि 13.7 अरब वर्ष पहले ब्रह्माण्ड की सृष्टि के समय जो महा विस्फोट हुआ था, उस समय उत्पन्न हुई ध्वनि को पुनरुत्पादित किया जा सकता है.

यह भूमिका काफी विस्तृत होती, लिकिन यहाँ हमारा मकसद कोरयाई प्रायदीप में जिस तरह की परिस्थिति निर्मित हुई है, उसमें एक अविश्वसनीय और असंगत घटना की गंभीरता को व्याख्यायित  करना है, जिस भौगोलिक क्षेत्र में दुनिया की लगभग सात अरब आबादी में से पाँच अरब आबादी रहती है.

यह घटना अब से 50 वर्ष पहले, 1962 में क्यूबा के इर्द-गिर्द उत्पन्न अक्टूबर संकट के बाद नाभिकीय युद्ध की गंभीर चुनौती से मिलती-जुलती है.

1950 में वहाँ (कोरियाई प्रायदीप में) एक युद्ध छेड़ा गया था जिसकी कीमत लाखों लोगों ने अपनी जान देकर चुकायी थी. अमरीका द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी शहरों के निहत्थे लोगों पर दो नाभिकीय बम गिराए जाने के कुछ ही सेकण्ड के अंदर लाखों लोगों की या तो मौत हुई थी या वे विकिरण के शिकार हुए थे जबकि इस घटना के महज पाँच साल बाद ही कोरिया में युद्ध थोपा गया था.

उस युद्ध के दौरान जेनरल डगलस मैकार्थर ने कोरिया जनवादी जन गणराज्य पर भी नाभिकीय हथियारों का इस्तेमाल करना चाहा था. लेकिन हैरी ट्रूमैन ने इसकी इजाजत नहीं दी थी.
इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि चीन ने अपने देश की सरहद से लगे एक देश में अपने दुश्मन की सेना को पैर ज़माने से रोकने के प्रयास में अपने दस लाख बहादुर सैनिकों को गवाँ दिया था. सोवियत सेना ने भी अपनी ओर से हथियार, वायु सैनिक सहयोग, तकनीक और आर्थिक मदद दी थी.

मुझे गर्व है कि मैं एक ऐतिहासिक व्यक्ति, अत्यंत साहसी और क्रन्तिकारी नेता किम इल सुंग से मिला था. अगर वहाँ युद्ध छिड़ गया तो उस महाद्वीप के दोनों ओर की जनता को भीषण बलिदान देना पड़ेगा, जबकि उनमें से किसी को भी इससे कोई लाभ नहीं होगा. कोरिया जनवादी जन गणराज्य हमेशा से क्यूबा का मित्र रहा है तथा क्यूबा भी हमेशा उसके साथ रहा है और आगे भी रहेगा.

अब जबकि उस देश ने वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियाँ हासिल कर ली है, तब हम उसे उन तमाम देशों के प्रति उसके कर्तव्यों की याद दिलाना चाहेंगे, जो उसके महान दोस्त रहे हैं और उसका यह भूलना अनुचित होगा कि इस तरह का युद्ध खास तौर पर इस ग्रह की सत्तर फीसदी आबादी को प्रभावित करेगा.

अगर वहाँ इस पैमाने की लड़ाई फूट पड़ती है, तो दूसरी बार चुनी गयी बराक ओबामा की सरकार ऐसी छबियों के सैलाब में डूब जायेगी जो उनको अमरीका के इतिहास के सबसे मनहूस चरित्र के रूप में प्रस्तुत करेंगे. युद्ध को टालना उनका और अमरीकी जनता का भी कर्तव्य बनता है.

फिदेल कास्त्रो रुज
4 अप्रैल, 2013 

(मूल अंग्रेजी लेख dianuke.org से आभार सहित. अनुवाद- दिगम्बर)

"फिदेल मरने वाला है"

-फिदेल कास्त्रो


( प्रस्तुत लेख में फिदेल कास्त्रो ने दुनियाभर के साम्राज्यवादी मीडिया द्वारा फैलाए गये इस झूठ का मखौल उड़ाया है कि “फिदेल मरने वाला है”. इसमें उन्होंने “रिफ्लेक्संस” (विचार प्रवाह) को बंद करने के अपने फैसले का कारण भी बताया है. इस विषय में उन्होंने यह विनम्र आकलन पेश किया कि क्यूबा में उनके लेखों से कहीं ज्यादा तवज्जो देने लायक कई जरूरी मुद्दे हैं. वैश्विक घटनाओं पर हमारे समय के एक अगुआ राजनेता की बेबाक और ईमानदार टिप्पणियों का कोई जोड़ नहीं है.) 

विक्टोरिया दे गिरों मेडिकल साइंसेज इंस्टिट्यूट के स्नातक प्रथम वर्ष कक्षा द्वारा जारी किया गया बस एक सन्देश ही साम्राज्यवादी प्रोपगंडा की सारी हदें पर कर जाने और समाचार एजेंसियों द्वारा इस झूठ के पीछे टूट पड़ने के लिए काफी था. इतना ही नहीं, बल्कि अपने केबल के जरिये वे ऐसी अनापशनाप बातें फ़ैलाने लगे जो किसी मरीज के बारे में किसी ने आजतक नहीं सुनी होगी. 

स्पेन के अख़बार एबीसी ने खबर छापी कि वेनेजुएला के एक डॉक्टर ने किसी अज्ञात जगह से यह खुलासा किया है कि कास्त्रो के दिमाग की दाहिनी धमनी में बहुत ज्यादा थक्का जम गया है. “मेरा मानना है कि अब हम फिर कभी सार्वजनिक जीवन में वापस आते नहीं देख पायेंगे.” इस कथित डॉक्टर ने, अगर वह सचमुच एक डॉक्टर है, तो निस्संदेह उसने अपने देश के लोगों से दगाबाजी की है और कास्त्रो के स्वास्थ्य के बारे में बतया है कि “जल्दी ही उनका स्नायु तंत्र फेल होने वाला है.” 

दुनिया के ढेर सारे लोग इस तरह की अनाप-शनाप खबरें फैलाने वाली सूचना एजेंसियों के झांसे में आ जाते हैं, जिनमें लगभग सभी सुविधासम्पन्न और अमीर लोगों के कब्ज़े में हैं- लेकिन लोग अब इन पर बहुत कम ही यकीन करते हैं. कोई भी व्यक्ति धोखा नहीं खाना चाहता; यहाँ तक की सबसे लाइलाज झूठे से भी लोग सच सुनने की आश लगाए रहते हैं. अप्रैल 1961 में, समाचार एजेंसियों द्वारा फैलाये गए उस समाचार पर सबने विश्वास कर लिया था कि गिरोन या बे आफ पिग्स (इसे कुछ भी कहें) के भाड़े के हमलावर हवाना की तरफ बढ़ रहे हैं, जबकि सच्चाई यह थी कि उनमें कई अपनी नावों में बैठ कर उन यांकी युद्धपोतों तक पहुँचने की नाकामयाब कोशिश कर रहे थे जो उनकी हिफाजत में तैनात थे. 

बार-बार आनेवाले पूंजीवादी संकटों को देखते हुए अब सच्चाई लोगों को समझ में आने लगी है और प्रतिरोध भी दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है. कोई भी झूठ, दमन या नया हथियार इस उत्पादन प्रणाली को ध्वस्त होने से नहीं रोक पायेगा जिसमें असमानता और अन्याय की खाई दिन पर दिन चौड़ी होती जा रही है. 

कुछ दिन पहले, अक्तूबर संकट की पचासवीं सालगिरह के आसपास, समाचार एजेंसियों ने मिसाइल संकट के लिए तीन पक्षों को दोषी ठहराया था- उस समय साम्राज्यवाद के चौधरी रहे केनेडी, ख्रुश्चेव और क्यूबा. क्यूबा को नाभिकीय हथियारों से कुछ भी लेना-देना नहीं था, और न ही हिरोशिमा और नागासाकी में किये गए गैरजरूरी कत्ले-आम से ही, जो उस समय के अमरीकी राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने करायी थी, जिसकी बदौलत दुनिया भर में उनकी नाभिकीय तानाशाही कायम हुई थी. क्यूबा तो अपनी आज़ादी और सामाजिक न्याय के अपने अधिकारों की रक्षा कर रहा था 

यांकियों के हमलावर मनसूबे से अपनी मातृभूमि की अपनी हिफाजत के लिए हमने हथियारों, तेल, खाने-पीने की चीजों और अन्य संसाधनों के रूप में सोवियत सहायता कबूल की थी. इस पूंजीवादी देश ने शुरुआती महीनों से ही हम पर घिनौना और खुनी युद्ध थोप दिया था, जिसमें हजारों क्यूबावासियों को मार डाला गया और अपंग बना दिया गया. 

जब ख्रुश्चेव ने मध्यम दुरी तक मार करने वाली मिसाइल लगाने का प्रस्ताव दिया, ठीक वैसा ही, जैसी अमरीका ने तुर्की में लगा रखी थी, जो क्यूबा और अमरीक के बीच की दुरी की तुलना में सोवियत रूस के ज्यादा करीब था- तब सोवियत संघ के साथ एकता बनाये रखने के लिए क्यूबा वह खतरा उठाने से नहीं हिचका. हमारा व्यवहार नैतिक तौर पर पाक-साफ था. हमने जो कुछ किया उसके लिए किसी से माफ़ी नहीं माँगेंगे. सच्चाई यही है कि आधी सदी गुजर गयी और आज भी सर उठा कर खड़े हैं. 

मैंने “रिफ्लेक्संस” छपवाना बंद कर दिया क्योंकि यकीनन क्यूबा प्रेस के पास जो कागज है उसकी अहमीयत मेरे लेखों से कहीं ज्यादा हमारे देश के दूसरे जरूरी कामों के लिए है. 


बुरी खबर देने वाले कौवों!! मुझे तो अब याद भी नहीं कि सिरदर्द किस चिड़िया का नाम है. वे कितने झूठे हैं यह बताने के लिए मैं बतौर तोहफा उन्हें इस लेख के साथ अपना फोटो भी भेज रहा हूँ.



(मंथली रिव्यू के प्रति आभार सहित. अनुवाद- सतीश)

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