Category Archives: प्रगतिशील साहित्य

कोएनर महाशय की कहानी –अगर शार्क आदमी होते — बर्तोल्त ब्रेख्त

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मकान मालकीन की छोटी लड़की ने क महाशय से पुछा– “अगर शार्क आदमी होते तो क्या छोटी मछलियों के साथ उनका व्यवहार सभ्य-शालीन होता?” उन्होंने कहा- “निश्चय ही, अगर शार्क आदमी होते तो वे छोटी मछलियों के लिए समुद्र में विशाल बक्से बनवाते, जिसके भीतर हर तरह के भोजन होते, तरकारी और मांस दोनों ही। वे इस बात का ध्यान रखते कि बक्सों में साफ पानी रहे और आम तौर पर वे हर तरह की स्वच्छता का इंतजाम करते। उदाहरण के लिए अगर किसी छोटी मछली का पंख चोटिल हो जाता तो तुरन्त उसकी पट्टी की जाती, ताकि वह मर न जाये और समय से पहले वह शार्क के लिए गायब न हो जाये। छोटी मछलियाँ उदास न हों इसलिए समय-समय पर विराट जल महोत्सव होता, क्योंकि प्रसन्नचित्त मछलियाँ उदास मछलियों से ज्यादा स्वादिष्ट होती हैं। निश्चय ही, बड़े बक्सों में स्कूल भी होते। उन स्कूलों में छोटी मछलियाँ यह सिखतीं कि शार्क के जबड़ों में कैसे तैरा जाता है। भूगोल जानना भी जरूरी होता, ताकि उदहारण के लिए, वे उन बड़े शार्कों को खोज सकें जो किसी जगह सुस्त पड़े हों। छोटी मछलियों के लिए प्रमुख विषय निश्चय ही नैतिक शिक्षा होता। उनको सिखाया जाता की दुनिया में यह सबसे अच्छी और बेहद सुन्दर बात होगी अगर कोई छोटी मछली ख़ुशी-ख़ुशी अपने को कुर्बान करे और यह कि उन सबको शार्कों पर भरोसा रखना होगा, खासकर तब जब वे कहें कि वे उनके लिए सुन्दर भविष्य मुहैया कर रहे हैं। छोटी मछलियों को पढ़ाया जाता कि यह भविष्य तभी सुनिश्चित होगा जब वे आज्ञाकारी बनना सीख जायें। छोटी मछलियों को सभी घटिया, भौतिकवादी, स्वार्थपरक और मार्क्सवादी रुझानों सावधान रहना होता और अगर उनमें से कोई दगाबाजी करके इन बातों में दिलचस्पी लेती तो तुरन्त इसकी सूचना शार्कों को देनी होती। अगर शार्क आदमी होते तो निश्चय ही वे एक दूसरे के खिलाफ युद्ध छेड़ते, ताकि दूसरे मछली बक्सों और दूसरी छोटी मछलियों को जीत सकें। युद्ध उनकी अपनी छोटी मछलियों द्वारा लड़ा जाता। वे अपनी छोटी मछलियों को सिखाते कि उनमें और दूसरे शार्कों की छोटी मछलियों के बीच भरी अन्तर है। वे घोषणा करते कि छोटी मछली चुप रहने के लिए सुविख्यात हैं, लेकिन वे बिलकुल अलग भाषाओं में चुप हैं और इसलिए एक दूसरे को समझ पाना उनके लिए असंभव होता है। हर छोटी मछली जो युद्ध में एक जोड़ी छोटी मछली, यानी अपने दुश्मन की हत्या करती उसे समुद्री शैवाल टाँका हुआ तमगा मिलता और उसको नायक की उपाधि से विभूषित किया जाता। अगर शार्क आदमी होते तो निश्चय ही कला भी होती। सुन्दर-सुन्दर तस्वीरें होतीं जिनमें शार्क की दाँतों को शानदार रंगों में चित्रित किया गया होता और उनके जबड़ों को निर्मल विहार उपवन के रूप में दर्शाया जाता जिसमें कोई भी शान से विचरण कर पाता। समुद्र की तलहटी में थियेटर यह दिखाता कि कैसे बहादुर छोटी मछलियाँ उत्साहपूर्वक शार्क के जबड़े में तैर रही हैं और संगीत इतना सुन्दर होता कि वह उनके सुर में सुर मिलाता रहता, आर्केस्ट्रा उनको प्रोत्साहित करता और अत्यंत मनोहर विचारों से श्लथ, छोटी मछलियाँ स्वप्निल बहाव के साथ शार्क के जबड़े में समातीं। एक धर्म भी होता अगर शार्क आदमी होते। वह उपदेश देता कि छोटी मछली वास्तव में केवल शार्कों के उदर में ही समुचित रूप से जीना शुरू करती हैं। इसके आलावा, अगर शार्क आदमी होते तो सभी छोटी मछलियों की बराबरी का दर्जा ख़त्म हो जाता, जैसा कि आजकल है। कुछ को महत्वपूर्ण पद दिये जाते और उनको बाकी सब से ऊँचा स्थान दिया जाता। जो थोड़ी बड़ी होतीं उन्हें अपने से छोटी मछलियों को खाने की भी इजाजत होती। शार्कों की इस बात पर पूरी सहमति होती क्योंकि उनको भी तो समय-समय पर थोडा बड़ा निवाला खाने को मिलता। और हाँ, जो छोटी मछलियाँ थोड़े बड़े आकर की होतीं वे अपने पदों पर काबिज होकर बाकी छोटी मछलियों के बीच व्यवस्था कायम करतीं। वे शिक्षक, अफसर, बक्सा निर्माण इंजीनियर इत्यादि हो जातीं। थोड़े शब्दों में, अगर शार्क आदमी होते तो पहली बार वे समुद्र के भीतर संस्कृति ले आते।

(अनुवाद — दिगम्बर)

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मैं क्यों लिखता हूँ

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खुद को कुछ सनकी और तकलीफदेह अहसासों से बचाने के लिए.

जो ख़यालात और इलहाम मेरे दिमाग में उमड़ते-घुमड़ते हैं उनको तरतीब देने की कोशिश में ताकि उनको बेहतर ढंग से समझा जाय.

कोई ऐसी बात कहने के लिए जो कहने लायक हो.

लफ़्ज़ों के सिवा किसी भी दूसरी चीज का सहारा लिये बगैर कोई ऐसी चीज बनाने के लिए जो खूबसूरत और टिकाऊ हो.

क्योंकि इसमें मजा आता है.

क्योंकि सिर्फ यही काम है जिसे मैं कमोबेश बेहतर तरीके से करना जानता हूँ.

क्योंकि ये मुझे किसी नाकाबिले-बयान गुनाह से आजाद कर देता है.

क्योंकि इस काम का मैं आदी हो गया हूँ और क्योंकि मेरे लिए ये किसी बुराई से, किसी रोजमर्रे के काम से कहीं बेहतर है.

ताकि मेरी जिन्दगी का तजुर्बा, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो, कहीं खो न जाए.

क्योंकि अपने टाईपराइटर और सादा कागज़ के आगे  मेरे अकेले होने की हकीक़त मुझे पूरी तरह आजाद और ताकतवर होने का भरम देती है.

एक किताब की शक्ल में, एक आवाज़ की तरह जिसे कोई सुनने की जहमत मोल ले सके, मरने के बाद भी जिन्दगी को कायम रखने के लिए.

(रचनाकार– जूलियो रैमन रिबेरो, लातिन अमरीकी लेखक, 1929-94. अनुवाद– दिगम्बर)

जेवियर हेरौद पेरेज़ की कविता

jeviyar harod parej जेवियर हेरौद पेरेज़ (1942-1963) पेरू के कवि और नेशनल लिबरेशन आर्मी सदस्य थे। अठारह साल की उम्र में उनके दूसरे कविता संग्रह को पेरू का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान प्रदान किया गया।

जनवरी 1963 में,  21 वर्षीय कवि जेवियर हेरौद  और एलेन इलियास के नेतृत्व में एक क्रान्तिकारी समूह ने हथियार लेकर बोलीविया की सरहद पार की और दक्षिणी पेरू में प्रवेश किया। गंभीर बीमारी से ग्रस्त 15 सदस्यीय टीम ने इलाज के लिए प्योर्तो माल्दोनादो शहर में प्रवेश करने का फैसला किया। स्थानीय पुलिस समूह को पहले ही सूचना मिल गयी थी. पेरू की पुलिस ने 15 मई को हेरौद को  सीने में गोली मार दी जब वे एक डोंगी में बैठ कर शहर से गुजर रहे थे। वह एक ऐसा दौर था जब लातिन अमरीका संघर्ष और सृजन के नए-नए कीर्तिस्तम्भ खड़ा हो रहे थे। उनकी मृत्यु के चार साल बाद ही सीआईए की साजिशों के तहत चे ग्वेरा की बोलीविया में इसी तरह हत्या की गयी थी। प्रस्तुत है जेवियर हेरौद पेरेज़ की एक कविता—

नदी हूँ मैं

1.

मैं एक नदी हूँ, विराट पत्थरों से होकर बहती,
कठोर चट्टानों से होकर गुजरती,
हवा तय करती है मेरे रास्ते।
मेरे आस-पास के पेड़ बारिश में सराबोर हैं।
मैं एक नदी हूँ, भरपूर गुस्से के साथ बहती नदी,
बेपनाह प्रचंडता के साथ,
जब भी कोई पुल अपनी तिरछी परछाईं मुझमें बिखेरता है।

2.

मैं एक नदी हूँ, एक नदी,
एक नदी, हर सुबह स्फटिक की तरह साफ़।
कभी-कभी मैं नाजुक और विनम्र होती हूँ।
मैं उर्वर घाटियों से शान्तिपूर्वक फिसलती हूँ।
मैं पशु और सीधे-सच्चे लोगों को
जितना चाहें पिलाती हूँ अपना पानी।
दिन में बच्चे तैर-तैर आते हैं मेरे भीतर
रात में स्पन्दित प्रेमी झाँकते हैं मेरी आँखों में।
और डुबकी लगाते हैं
मेरे भुतहे पानी के गहरे अँधेरे में।

3.

मैं एक नदी हूँ।
लेकिन कभी-कभी होती हूँ बेरहम और मजबूत।
कभी-कभी जिन्दगी या मौत का नहीं करती सम्मान।
झरने के उत्ताल तरंग में उछलती-कूदती,
मैं  बार-बार पीटती हूँ चट्टानों को
अनगिनत टुकड़ों में तोड़ती हूँ।
पशु भागते हैं। वे भागते हैं।
जब मैं उनके मैदानों में सैलाब बनकर उतरती हूँ।
जब मैं उनकी ढलानों में बोती हूँ छोटे-छोटे कंकड़-पत्थर।
जब मैं उनके घरों और चरागाहों को डुबोती हूँ।
जब बाढ़ में डुबोती हूँ उनके दरवाजे और उनके दिल,
उनकी उनके शरीर और उनके दिल।

4

और यह तब होता है, जब मैं तेजी से नीचे आती हूँ–
जब मैं उनके दिलों में पैठ सकती हूँ
और उनके लहू पर भी काबू कर सकती हूँ
और मैं उनके अंदर से उनको निहार सकती हूँ।
फिर मेरा गुस्सा शांत हो जाता है
और मैं एक पेड़ बन जाती हूँ।
मैं एक पेड़ की तरह खुद को जड़ लेती हूँ
और पत्थर की तरह मौन हो जाती हूँ
काँटा रहित गुलाब की तरह मैं शान्त हो जाती हूँ।

5

मैं एक नदी हूँ.
मैं नदी हूँ अनन्त खुशियों की.
मैं महसूस करती हूँ दोस्ताना शीतल हवाएँ.
महसूस करती हूँ अपने चेहरे पर मंद समीर
अपनी अन्तहीन यात्रा के दौरान.

6

मैं नदी हूँ जो यात्रा करती है
किनारों, सूखे पेड़ों और रूखे पत्थरों के साथ,
मैं नदी हूँ जो हिलोरे मारती गुजरती है
तुम्हारे कानों, तुम्हारे दरवाजों और तुम्हारे दिलों से होकर.
मैं नदी हूँ जो यात्रा करती है
घास के मैदानों, फूलों, गुलाब की झुकी डालियों से होकर,
मैं एक नदी हूँ जो यात्रा करती है
सडकों के साथ-साथ, धरती के आरपार, नम आकाश के नीचे.
मैं नदी हूँ जो यात्रा करती है
पहाड़ों, चट्टानों और खारे झरनों से होकर.
मैं नदी हूँ जो यात्रा करती है
मकानों, मेजों, कुर्सियों से होकर.
मैं नदी हूँ जो यात्रा करती है
इन्सान के भीतर— पेड़, फल, गुलाब, पत्थर,
मेज, दिल, दिल, दरवाजा—
हर चीज जो मेरे आगे आये.

7

मैं नदी हूँ जो गाती है लोगों के लिए भरी दुपहरी में.
मैं उनके कब्र के आगे गाती हूँ.
मैं उन पवित्र स्थानों की ओर मुड़ जाती हूँ.

8

मैं नदी हूँ जो रात में बदल गयी है.
मैं उतरती हूँ उबड़-खाबड़ गहराइयों में,
भुला दिए गये अनजान गाँवों के निकट,
लोगों से अटी पड़ी खिडकियों वाले शहरों के करीब.
मैं नदी हूँ,
बहती हूँ घास के मैदानों से होकर.
हमारे किनारे खड़े पेड़ जीवित हैं कबूतरों के संग-साथ.
पेड़ गाते हैं नदी के साथ,
पेड़ गाते हैं मेरे पंछियों के ह्रदय से,
नदियाँ गाती हैं मेरी बाहों में बाहें डाल.

9

वह घड़ी आएगी
जब मुझे विलीन हो जाना पड़ेगा
सागर में,
कि मिला सकूँ मैं अपना निर्मल जल उसके धुँधले पानी में.
हमें अपने चमकीले गीत को चुप करना होगा,
हमें बन्द करना होगा वह गपशप
जो प्रभात की अगवानी में हर रोज किया करती थी,
मैं अपनी आँखें सागर जल से धो लूँगी.
वह दिन आएगा,
और उस अनन्त सागर में
मैं नहीं देख पाउंगी अपने उर्वर खेतों को,
नहीं देख पाऊँगी मैं अपने हरे पेड़ों को,
मेरे आसपास की हवा,
मेरा निर्मल आकाश, मेरी गहरी झील,\
मेरा सूरज, मेरे बादल,
मैं कुछ नहीं  देखपाऊँगी,
सिवाय उस अनन्त नीलाभ स्वर्ग के
जहाँ हर चीज घुलीमिली है,
पानी के विराट विस्तार में,
जहाँ एक और गीत या कोई दूसरी कविता का
इसके सिवा कोई अर्थ नहीं होगा
कि कोई तुच्छ नदी बहकर नीचे आती,
या कोई हहरारती नदी मुझ से मिलने आती,
मेरे नए चमकीले पानी में,
हाल ही में विलुप्त मेरे जल में.

(अनुवाद- दिगम्बर)

तुम्हारे हाथ और उनके झूठ के बारे में — नाजिम हिकमत

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तुम्हारे हाथ
पत्थरों की तरह संगीन.
जेल में गाये गये तमाम गीतों की तरह मनहूस,
बोझ ढोनेवाले जानवरों की तरह अनाड़ी, सख़्त
और भूखे बच्चों के चेहरों की तरह नाराज़ हैं.

मधुमक्खियों की तरह कुशल और सहनशील,
दूध से भरी छातीयों की तरह भरपूर,
कुदरत की तरह दिलेर,
और अपनी खुरदरी खाल में दोस्ताना अहसास छुपाये
तुम्हारे हाथ.

यह दुनिया बैल के सिंग पर नहीं टिकी है,
तुम्हारे हाथों ने सम्हाल रखी है यह दुनिया.

और लोगो, मेरे लोगो,
वे तुम्हें झूठ परोसते रहते हैं,
जबकि तुम भूख से मर रहे हो,
तुम्हें गोस्त और रोटी खिलाने की ज़रूरत है.
और सफ़ेद कपड़े से ढकी मेज़ पर एक बार भी
भर पेट खाए बिना ही
तुम छोड़ देते हो यह दुनिया
जिसकी हर डाली पर लदे हुए हैं
बेशुमार फल.

लोगो, मेरे लोगो,
खासकर एशिया के लोगो, अफ्रीका के लोगो,
निकट पूर्व, मध्य पूर्व, प्रशान्त द्वीप के लोगो,
यानी धरती के सत्तर फीसद लोगो,

अपने हाथों की तरह तुम बूढ़े और भुलक्कड़ हो,
बेकल, अनोखे और जवान हो अपने हाथों की तरह.

लोगो, मेरे लोगो,
मेरे अमरीकी लोगो, मेरे यूरोपीय लोगो,
तुम फुरतीले, साहसी और लापरवाह हो अपने हाथों की तरह,
अपने हाथों की तरह ज़ल्दी राजी हो जानेवाले,
आसान है तुमसे पीछा छुड़ाना….

लोगो, मेरे लोगो,
अगर टीवी और रेडियो झूठ बोलते हैं,
अगर किताबें झूठ बोलती हैं,
अगर दीवार के पोस्टर और अखबारों के इश्तहार झूठ बोलते हैं,
अगर परदे पर लड़कियों की नंगी टाँगे झूठ बोलती हैं,
अगर प्रार्थनाएँ झूठ बोलती हैं,
अगर लोरियाँ झूठ बोलती हैं,
अगर सपने झूठ बोलते हैं,
अगर शराबखाने का साज़िन्दा झूठ बोलता है,
अगर मायूसी भरी रात में चाँदनी झूठ बोलती है,
अगर अल्फाज़ झूठ बोलते हैं
अगर रंग झूठ बोलते हैं,
अगर आवाजें झूठ बोलती हैं,
अगर तुम्हारे हाथों को छोड़कर,
तुम्हारे हाथों के सिवा
हर चीज और हर शख्स झूठ बोलता है,
तो यह सारी कवायद तुम्हारे हाथों को
मिट्टी के लोंदे की तरह फरमाबरदार,
अँधेरे की तरह अन्धा,
और कुत्ते की तरह भोंदू बना देने के लिए है,
ताकि तुम्हारे हाथ घूँसों में,
बगावत में तब्दील न हो जाएँ,
और इसलिए कि इस नाशवान, मगर जीने लायक दुनिया में
जहाँ हम मेहमान हैं इतने कम समय के,
सौदागरों की यह हुकूमत,
यह ज़ुल्म कहीं खत्म न हो जाए…
(अनुवाद– दिगम्बर)

शब्दों के बचाव में — एदुआर्दो गालेआनो

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कोई व्यक्ति संवाद बनाने की जरूरत महशूस करके और दूसरों से बात करने के लिए लिखता है, उस चीज की भर्त्सना करने के लिए जो कष्ट देती है और उसे साझा करने के लिए जिससे खुशी मिलती है. कोई व्यक्ति अपने एकांत के विरुद्ध और दूसरों के एकांत के विरुद्ध लिखता है. कोई व्यक्ति यह मानकर चलता है कि साहित्य ज्ञान का प्रसार करता है और उनकी भाषा और व्यवहार को प्रभावित करता है जो उसे पढ़ते हैं…. कोई व्यक्ति, वास्तव में, उन लोगों के लिये लिखता है जिनके भाग्य और दुर्भाग्य से वह खुद को जोड़ता है – दुनिया के भूखे, निद्रा-हीन, विद्रोही और अभागे लोग – और उनमें से ज्यादातर निरक्षर हैं.

… तब हममें से वे लोग जो साहित्य के क्षेत्र में काम करना चाहते हैं, ताकि उन बेआवाज लोगों की आवाज़ को सुनने में मदद मिल सके, इस वास्तविकता के सन्दर्भ में अपना काम कैसे कर सकते हैं? क्या हम इस गूंगी-बहरी संस्कृति के मध्य में अपनी बात सुना सकते हैं? लेखकों को जो थोड़ी सी छूट हासिल है, क्या कभी-कभी यह हमारी असफलता का प्रमाण नहीं बन जाती है? हम कितनी दूर तक जा सकते हैं? हम किन लोगों तक अपनी पहुँच बना सकते हैं?

… चेतना जागृत करना, पहचान स्थापित करना – क्या साहित्य इस दौर में इससे बेहतर काम करने का दावा कर सकता है? … इन देशों में?

… लातिन अमरी
का के लेखकों के रूप में हमारा भाग्य इन गंभीर सामाजिक परिवर्तनों की जरुरत से जुड़ गया है. अपनी बात कहना स्वयं को खो देना है: यह स्पष्ट दिखायी देता है कि पूर्णरूप से अपनी बात कहने के प्रयास में, साहित्य को बाधित किया जाता रहेगा … जबतक निरक्षरता और गरीबी बरकरार हैं, और तबतक, जबतक सत्ता पर काबिज लोग अपनी सामूहिक जड़बुद्धि को… जन माध्यमों के जरिये निरंतर थोपते रहेंगे.

… हमारे इन देशो में महान परिवर्तन, गहन ढाँचागत परिवर्तन जरूरी होंगे, अगर हम लेखकों को… सभ्रांत वर्ग से आगे जाना है, अगर हमें स्वयं को अभिव्यक्त करना है … एक बंद समाज में मुक्त साहित्य का अस्तित्व केवल भर्त्सना और उम्मीद के रूप में ही कायम  रह सकता है.

… हम वही हैं जो हम करते हैं, खास तौर पर वह काम जो हम खुद को बदलने के लिये करते है… इस मायने में पहले से ही कायल लोगों के लिये लिखा गया “क्रन्तिकारी” साहित्य उतना ही निरर्थक है जितना कि रुढिवादी साहित्य… आत्मकेंद्रित चिंतन-मनन के लिए समर्पित.

हमारी सार्थकता इस बात पर निर्भर करती है कि हमारे अंदर निर्भीकता और चतुराई तथा स्पष्टता और आग्रह की क्षमता कितनी है. मुझे उम्मीद है कि हम एक ऐसी भाषा का सृजन कर सकते हैं जो परम्परावादी लेखकों की गोधूली का स्वागत करने वाली भाषा से  कहीं अधिक निर्भय और सुन्दर होगी.

… लातिन अमेरिका में एक साहित्य आकार ले रहा है और मजबूती हासिल कर रहा है, एक साहित्य …  जो हमारे मृतकों को दफ़नाने की नहीं, बल्कि उन्हें अमर करने की हिमायत करता है; जो राख के ढेर को कुरेदने से इनकार करता है और आग सुलगाने का प्रयास करता है … शायद यह “सभी चीजों के वास्तविक अर्थ” को बचाए रखने में आने वाली नस्लों की मदद करेगा.

 

एदुआर्दो गालेआनो, 1978

प्यार और युद्ध के दिन और रातें (1983) से
(अनुवाद- दिनेश पोसवाल)

 

 

लाल हमारा रंग – ए.एन.सी. कुमालो

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हमें ऐसी कविताओं की जरूरत है

जिनमें खून के रंग की आभा हो

और दुश्मनों के लिए आती हो जिनसे

यमराज के भैंसे की घंटी की आवाज

 

कविताएँ

जो आतताइयों के चेहरे पर

सीधा वार करती हों

और उनके गरूर को तोड़ती हों

 

कविताएँ

जो लोगों को बताएँ

कि मृत्यु नहीं, जीवन

निराशा नहीं, आशा

सूर्यास्त नहीं, सूर्योदय

प्राचीन नहीं, नवीन

समर्पण नहीं, संघर्ष

 

कवि, तुम लोगों को बताओ

कि सपने सच्चाई में बदल सकते हैं

तुम आजादी की बात करो

और धन्नासेठों को सजाने दो

थोथी कलाकृतियों से अपनी बैठकें

 

तुम आजादी की बात करो

और महसूस करो लोगों की आँखों में

जनशक्ति की वह ऊष्मा

जो जेल की सलाखों को

सरपत घास की तरह मरोड़ देती है

ग्रेनाइट की दीवारों को ध्वस्त करके

रेत में बदल देती है

 

कवि,

इससे पहले कि यह दशक भी

अतीत में गर्क हो जाय

तुम जनता के बीच जाओ और

जन संघर्षों को आगे बढ़ाने में

मदद करो !

 

 

उन नौजवानों से जो कुछ करना चाहते हैं- मार्ज पियर्सी

Marge+Piercy

प्रतिभा उनके लेखे वही है

जो तुम्हें हासिल होती है तभी जब

उपन्यास छप जाय और उसे

हाथोंहाथ लिया जाय. उससे पहले

जो तुम्हारा सरमाया है वह

महज थकानेवाला विभ्रम,

बुनाई करने जैसा कोई शौक.

 

काम का मायने तभी है

जब नाटक का मंचन हो जाय

और ताली बजाएँ दर्शक.

उससे पहले पूछते रहते हैं दोस्त

कि कब निकल रहे हो

नौकरी तलाशने के लिए.

 

प्रतिभा का पता तभी चलता है उन्हें

जब तुम्हारी अनूठी कविताओं का

तीसरा संकलन आ जाये. इससे पहले

तुम पर इल्जाम मढते हैं पिछड़ने का

कहते हैं अब तक कोई बाल-बच्चा

क्यों नहीं, तुम्हें लफंगा समझते हैं.

 

मनोहर नामों से कला की कार्यशाला

क्यों लगाते हैं लोग, जबकि वास्तव में

सीख पाते हो महज कुछेक तकनीक,

टंकण निर्देश और कुछ भाव-भंगिमाएँ.

क्या कलाकार की कमी सिर्फ इतनी

कि दीवार पर लटकाने के लिए

किसी दंतचिकित्सक या पशुचिकित्सक

की तरह होना चाहिए लाइसेन्स

जो आपको प्रमाणित करे

चाहे काहिल और परपीडक हों और

आपके बनाये दाँत शोरबे में गिर पड़ें

आप कहलाएँगे प्रमाणित दंतचिकित्सक.

 

असली लेखक वही है

जो सचमुच लिखता है. प्रतिभा

एक खोज है ज्वलनशीलता जैसी जो

काम आती है आग लगने-बुझने के बाद.

रचना खुद अपना उपचार है. इसे ही

पसंद करना बेहतर होगा तुम्हारे लिए,

इस बात से बेखबर कि लोग

तुमसे प्यार करें या न करें.

(अनुवाद- दिगम्बर)

योद्धा और मक्खियाँ * –लू शुन

lu shun

जर्मन दार्शनिक शौपेनहावर ने कहा है कि मनुष्य की श्रेष्ठता को आँकने के मामले में, आत्मिक श्रेष्ठता और शरीर के आकार को निर्धारित करने वाले नियम एक दूसरे के विपरीत होते हैं. हमारे लिए इसका अभिप्राय यह है कि आदमी का शरीर जितना ही छोटा होगा, उतनी ही उसकी भावनाएँ श्रेष्ठ होंगी.

ऐसा इसलिए कि करीब से देखने पर जहाँ उसकी त्रुटियाँ और घाव साफ दिखाई देते हैं, कोई आदमी नायक नहीं दिखता, बल्कि वह हमारी ही तरह लगता है, भगवान या किसी नयी प्रजाति का अलौकिक प्राणी नहीं लगता. वह महज एक आदमी होता है. लेकिन निश्चय ही इसी में उसकी महानता होती है.

जब कोई योद्धा रणक्षेत्र में धराशायी हो जाता है, तो मक्खियों को जो चीज सबसे पहले नजर आती है, वह उसकी त्रुटियाँ और घाव ही होते हैं. वे उनको भिनभिनाते हुए चूसती हैं और यह सोच कर खुश होती हैं कि वे इस पराजित नायक से ज्यादा महान हैं. और चूँकि नायक मर चुका होता है और वह उन मक्खियों को उड़ा नहीं पाता, इसलिए मक्खियाँ और जोर-जोर से भिनभिनाती हैं और कल्पना करती हैं कि वे अमर संगीत का सृजन कर रही हैं, क्योंकि वे उस मृत नायक से अधिक पूर्ण और उत्तम हैं.

सही है कि मक्खियों की त्रुटियों और घावों पर कोई भी ध्यान नहीं देता.

हालाँकि अपनी तमाम त्रुटियों और घावों के बावजूद योद्धा तो योद्धा ही होता है, जबकी अत्यंत परिपूर्ण और उत्तम मक्खियाँ भी आखिरकार मक्खियाँ ही होती हैं.

भिनभिनाओ, मक्खियो! भले ही तुम्हारे पास पंख हों और भले ही तुम्हारे पास भिनभिन करने की क्षमता हो, लेकिन तुम जैसे कीड़े-मकोड़े किसी योद्धा के मुकाबिल नहीं हो सकते!

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* यहाँ योद्धा  डॉ. सुन यात-सेन और 1911 की क्रान्ति के शहीदों को कहा गया है, जबकि मक्खियाँ प्रतिक्रियावादियों के भाड़े के टट्टुओं को .

(अनुवादक– दिगम्बर)

तुम्हारी तरह – रॉक डाल्टन

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(रॉक डाल्टन (1935-1975) साल्वाडोर के कवि और पत्रकार थे. राजनीतिक गतिविधियों के कारण उन्हें अक्सर कैद किया जाता रहा. एकाधिक बार उन्हें फाँसी की सजा होते-होते बची. एक बार तो तब, जब भूकम्प के चलते उस जेल की दीवार ढह गयी जिसमें वे कैद थे. उनकी जिंदगी का बड़ा भाग जलावतनी में गुजरा और मौत हुई अपने ही देश के एक अन्य गुरिल्ला गुट के हाथों. 

रॉक डाल्टन की कविता प्रेम, संघर्ष, राजनीति और जिंदगी की कविता है. उनका यह कथन कि “कविता, सबके लिए है, जैसे रोटी,” पूरे लातिन अमरीका में एक लोकप्रिय नारा बन गया है.)

तुम्हारी तरह मैं भी
प्यार करता हूँ-
प्यार, जिंदगी, चीजों की सुगंध
आकाश के नीलेपन
और जनवरी के भू-दृश्य से.

और मेरा खून खौलता है
और मैं हँसता हूँ उन आंखों से
जिन्हें मालूम है आँसू की कलियों का मर्म.
मैं मानता हूँ दुनिया खूबसूरत है
और कविता, सबके लिए है, जैसे रोटी.

और यह भी कि मेरी रगें ख़त्म नहीं होतीं मुझ में
बल्कि उन तमाम बेनाम लोगों के लहू में
जो लड़ रहे हैं जिंदगी,
प्यार,
छोटी-छोटी चीजों,
भू-दृश्य और रोटी,
और सबके लिए कविता की खातिर.

(अनुवाद – दिगम्बर)

आलोचकों से मैं क्या चाहता हूँ – लू-शुन

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दो या तीन साल पहले नियतकालीन पत्रिकाओं में साहित्य के रूप में थोड़ा-सा मौलिक लेखन (अगर हम ऐसा कह सकते हों तो) और अनुवाद को छोड़कर कुछ खास नहीं होता था. इसीलिए पाठकों ने आलोचकों की आवश्यकता को महसूस किया. अब आलोचक प्रकट हुए और दिनों-दिन इनकी संख्या बढ़ती ही जा रही है.

यह देखते हुए कि हमारा साहित्य इतना अपरिपक्व है, कला की लौ को तेज करने के लिए आलोचकों द्वारा इसकी अच्छाइयों का पता लगाना वास्तव में बहुत अच्छा है. वे आधुनिक रचनाओं के सतहीपन को लेकर इस उम्मीद के साथ अफ़सोस जाहिर करते हैं कि हमारे लेखक कही अधिक गहन-गम्भीर रचना करेंगे तथा वे खून और आँसू के जमाव पर खेद प्रकट करते हैं, ताकि ऐसा न हो कि आधुनिक लेखक बहुत ही ढिठाई के साथ विकास कर रहे हों. ऐसा लग सकता है कि वे अतिशयोक्तिपूर्ण अलोचना कर रहे हैं, लेकिन वास्तव में यह दिखाता है कि साहित्य को लेकर उनमें गहरा लगाव है और हमें उनके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए.

लेकिन कुछ दूसरे लोग भी हैं जो साहित्यिक आलोचना की एक या दो “पश्चिमी” किताबों पर ही भरोसा करते हैं और कुछ पुरानी पंडिताऊ रचनाओं का कूड़ा परोसते हैं या चीन की परम्परागत “सच्चाइयों” को अपनाने का आग्रह करते हैं और साहित्य जगत की कटु आलोचना करते हैं. ऐसे लोग एक आलोचक के रूप में अपने प्राधिकार का दुरूपयोग करते हैं. मैं एक अनगढ़ और सरल सा दृश्य प्रस्तुत करने की इजाजत चाहूँगा. अगर किसी रसोइये ने कोई व्यंजन तैयार किया है और कोई व्यक्ति उसमें कमी देखता है, तो निश्चय ही उसे अपनी कड़ाही और दूसरे बर्तन उस आलोचक के सामने रख कर यह नहीं कहना चाहिए कि “लीजिए, इससे बेहतर बना कर दिखाइये.” लेकिन उसे इतनी उम्मीद करने का अधिकार है कि जिस व्यक्ति ने उसके व्यंजन का स्वाद चखा है उसकी भूख मर तो नहीं गयी है या वह शराब के नशे में या बुखार से पीड़ित तो नहीं, जिसके चलते उसकी जीभ मोटी और छालेदार हो गयी हो.

मैं तो आलोचकों से इससे भी कम की माँग करता हूँ. मैं यह उम्मीद नहीं करता कि दूसरों की रचना की चीर-फाड़ करने और उस पर अपना फैसला सुनाने से पहले वे अपनी ही चीर-फाड़ करें और फैसला सुनाएँ, ताकि यह देख सकें कि वे किसी रूप में छिछला, संकीर्ण और गलत तो नहीं है. यह तो बहुत अधिक माँग करना होगा. मैं सिर्फ इतनी आशा करता हूँ कि वे थोड़ी सहज बुद्धि का प्रयोग करेंगे. उन्हें इन दो भिन्न चीजों में अन्तर करना चाहिए, जैसे – नग्नता और अश्लीलता के अध्ययन के बीच, चुम्बन और सहवास के बीच, लाश के पोस्टमार्टम और उसको चिथड़े-चिथड़े करने के बीच, पढ़ने के लिए विदेश जाने और “बर्बरों द्वारा निर्वासित किये जाने” के बीच, बाँस की कोंपल और बाँस के बीच, बिल्ली और चूहे के बीच, बाघ और कॉफी हाउस के बीच … . निश्चय ही एक आलोचक पूरी तरह आजाद है कि उसके तर्क इंग्लैण्ड और अमरीका के कुछ पुराने विशेषज्ञ पर निर्भर हों, लेकिन मुझे उम्मीद है कि वह भूलेगा नहीं कि दुनिया में और भी देश हैं. वह चाहे तो तोल्सतोय का तिरस्कार कर सकता है, लेकिन मुझे उम्मीद है कि ऐसा करने से पहले वह उनका अध्ययन करेगा, उनकी कुछ किताबें पढ़ेगा.

ऐसे भी आलोचक हैं जो अनुवादों की आलोचना करते हुए यह घोषित करते है कि यह श्रम की बर्बादी है और अनुवादकों को लेखन कार्य में हाथ आजमाना चाहिए. शायद यह अनुवादक को यह जताना है कि लेखक का पेशा कितना सम्मानपूर्ण है, लेकिन फिर भी वह अनुवाद कार्य में ही संलग्न है क्योंकि वह इसी में सक्षम है या यही काम उसे सबसे अधिक पसन्द है. इस तरह यदि कोई आलोचक ऐसे-वैसे प्रस्ताव देता है, तो वह अपने अधिकार-क्षेत्र का उल्लंघन करता है– क्योंकि इस तरह के सुझाव आलोचना नहीं, बल्कि सलाह हैं. रसोइये के साथ तुलना वाले प्रसंग की ओर लौटते हैं– कोई भी व्यक्ति जो व्यंजन चखता है उसे यह बताने की जरूरत है कि स्वाद के बारे में उसकी राय क्या है. इसकी जगह यदि वह रसोइये को इस बात के लिए फटकारता है कि वह दर्जी या राज मिस्त्री क्यों नहीं है, तो वह रसोइया चाहे जितना भी बेवकूफ हो, इतना जरूर कहेगा– “महाराज, आप पागल हैं क्या!”

(अनुवाद- दिगम्बर)

लेखन काल- 9 नवंबर, 1922

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