Category Archives: पूंजीवाद

विकास दल – रोस कोग्गिंस

रोस कोग्गिंस की यह मशहूर कविता गरीबी और बदहाली को पेशा बनाकर मौज उड़ाने वाली स्वयंसेवी संस्थाओं पर करारा व्यंग्य है. विकास के नाम पर चलनेवाला यह धन्धा तेज़ी से फ़ैल रहा है. इसके लिए महँगे पाठ्यक्रम हैं और कमाई का अच्छा जरिया है.

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क्षमा करो यारो मुझको है ज़ल्दी जेट पकड़ना
शामिल होने विकास दल में फ़ौरन होगा उड़ना;
बोरिया-बिस्तर बाँध लिया और सब तस्वीरें धर ली
यात्री चेक और दवा-दारू सबकुछ झोले में भर ली.

पराक्रमी और वैभवशाली है विकास दल अपना
गहरे हैं विचार अपने और विश्वव्यापी है सपना;
वैसे तो हम धनिक वर्ग के साथ चला करते हैं
किन्तु विचार हमेशा अपने जनगण से मिलते हैं.

भिन्न-भिन्न देशों में शेरेटन होटल में टिकते हैं.
मल्टीनेशनल निगमों की भर्त्सना किया करते हैं;
नरम-गरम बिस्तर पर हो यदि सामाजिक विश्राम
फिर विरोध अन्याय-ज़ुल्म का कहाँ कठिन है काम.

छप्पनभोग सामने हो तो बने विमर्श कुपोषण
और भुखमरी की चर्चा हो कॉफी के टेबुल पर;
अफ्रीकी सूखा, एशियाई बाढ़ सभी पर बोलें
लेकिन जब हो पेट भरा, तब ही हम सब मुँह खोलें.

ऐसे कपटी सलाहकार हम संग लिए आते हैं
जिसकी राय समस्याओं को हरदम उलझाते हैं-
लगातार हम इसी तरह दावत करते रहते हैं
अगली बैठक आवश्यक है यह चर्चा करते हैं.

विकास दल भरता रहता है नये शब्द-भण्डार
आंग्ल वर्णमाला में इसका व्यापक है विस्तार;
“एपीजेनेटिक” जैसे भारी-भरकम शब्द उचारें
“माइक्रो”, “मैक्रो”, “लोगारिथमेटिक” से भाषा को तारें.

गूढ़-गहन बनकर हमको आनन्द बहुत आता है
बौद्धिक वातावरण इसी ढब से तो बन पाता है!
और भले ही प्रतिष्ठानों पर आँच नहीं आती है,
हम लोगों की शब्द-राशि बेहतर होती जाती है.

जब विमर्श गहरा हो जाये तुमको झपकी आये
झेप मिटाने का आओ तुमको तरकीब बताएँ;
यह दिखलाने की खातिर कि तुम भी हो विद्वान्
तड़ से पूछो “क्या सच में है यही विकास श्रीमान?”

या कह दो, “व्यवहारिक पहलू ठीक-ठाक दिखता है-
किन्तु कहीं से भी इसका सिद्धान्त नहीं जमता है!
पल्ले नहीं पड़ेगी कुछ लोगों को बात तुम्हारी,
बहुतों की नज़रों में होगी गहरी और गुणकारी.

इस विकास दल के मुख्यालय के  हैं ठाट निराले,
नक्काशी, प्राचीन वास्तु और बाटिक परदे डाले.
आँखों के आगे लटकी तस्वीर दिलाये ध्यान
महान और गरीब संग रहता सहज सरल मेज़बान. 

हद है ऐसी कविताई की— पथ पर करो प्रयाण!
मानव-पीड़ा जितनी उतना व्यापक है अभियान!
ईश्वर से तुम करो प्रार्थना वचन करे वह पूरा-
निर्धन जन हों संग सर्वदा लगे विकास का नारा.

(अनुवाद- दिगम्बर)

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पूँजीवाद से नफरत करने के दस प्रमुख कारण

carrying garbage

-गैरी एन्गलर

दसवाँ– पूँजीवादी निगम एक व्यक्तित्व विकार के शिकार हैं जिसकी झलक उनके स्थाई असामाजिक आचरण, सहानुभूति और पश्चाताप के अभाव में मिलती है और ऐसे आचरण के लिये वे अपने शेयरधारकों द्वारा पुरस्कृत किये जाते हैं. अगर निगमों को आपराधिक मनोचिकित्सक के दफ्तर में भेजा जाय, तो वह उनको मनोरोगी करार देगा और हमेशा के लिये उनपर ताला जड़ देगा.

 

नौवाँ— पूँजीवाद लालच को बढ़ावा देता है. लेकिन लालच केवल पूँजीवाद के लिये ही अच्छी चीज़ है. सामान्य जन की निगाह में यह समाजविरोधी और आत्मा का विनाश करनेवाली चीज़ है, कहने की ज़रूरत नहीं कि यह हमारे उन समुदायों के लिये बहुत ही बुरी चीज़ है जो परोपकार, करुणा और एक-दूसरे के प्रति समान सरोकार में यकीन करते हैं.

 

आठवाँ— पूँजीवाद मुट्ठीभर लोगों के विशेषाधिकार और उनके वर्गीय शासन की व्यवस्था है, जो जीविका के साधनों के निजी मालिकाने पर आधारित है. यह थोड़े से धनी लोगों को रोज़गार बेचने और खरीदने की शक्ति प्रदान करती है, जिसका अर्थ है कि उन रोजगारों पर निर्भर करनेवाले किसी समुदाय का निर्माण या विनाश वे ही कर सकते हैं.

 

सातवाँ— पूँजीपति स्वतंत्रता और व्यक्तिवाद की तारीफ़ करते हैं, लेकिन वे अपने अलावा सबकी स्वतंत्रता और व्यक्तिवाद का खात्मा करते हैं. ज़िंदा रहने के लिये काम करनेवाले हम में से ज़्यादातर लोगों से हर रोज यह कहा जाता है कि हम बिना कोई सवाल किये चुपचाप आदेश का पालन करें, इस तरह काम करें जैसे हम कोई मशीन हों और अपनी सृज़नशीलता को वहीँ तक सीमित रखें जब तक मालिकों का मुनाफा बढ़ता रहे.

 

छठा— पूँजीवाद सहकारिता और सामूहिकता को कलंकित करता है, लेकिन साथ ही वह बड़े पैमाने के उत्पादन का ढाँचा तैयार करता है जो मजदूरों से इन दोनों ही चीजों की माँग करता है. उनकी व्यवस्था की जरुरत है कि हम उसके कल-पुर्जे बन जाएँ, लेकिन इसके चलते हमें जो शक्ति हासिल होती है उससे डरकर हमसे कहा जाता है कि अपने हित में मिलजुलकर काम करना नाजायज और गलत है. इसीलिए पूँजीपति वर्ग मजदूर-यूनियनों को और मजदूरों के बीच एक-दूसरे का सहयोग करने और मिलजुलकर काम करने की प्रेरणा देनेवाले सभी संगठनों को नष्ट करने की कोशिश करता है.

 

पाँचवाँ— पूँजीवाद को इतने विराट प्रचार-तंत्र की जरूरत है, जैसा दुनिया ने आज तक नहीं देखा, ताकि वह हमें समझा सके कि पूँजीवाद ही एकमात्र सम्भव व्यवस्था है. विज्ञापन, विपणन, मनोरंजन और यहाँ तक ​​कि तथाकथित समाचारों के जरिये यह जनता को उपभोक्ता में बदल देता है. दुनिया भर में करोड़ों लोगों को इस काम पर लगाया गया है कि वे अपनी रचनाशीलता का इस्तेमाल करके हमारी प्यार, अभिलाषा, मानवीय भाईचारा और खरापन जैसी  भावनाओं को तोड़-मरोड़कर उन्हें तीन-तिकडम के साधन में बदल दें, ताकि मुट्ठी भर मुनाफाखोरों का मुनाफा पहले से भी अधिक बढ़ता रहे.

 

चौथा— पूँजीवाद एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ की नीति के ऊपर ‘नोट देकर वोट लो’ की नीति हावी होती है. जो लोग अधिकांश शेयरों के मालिक होते हैं (डालर से खरीदकर), वे ही उन दैत्याकार निगमों को नियंत्रित करते हैं, जिनमें से कई निगमों की ताकत कुछ को छोड़कर दुनिया की सभी सरकारों से अधिक है. धनाढ्य लोग उन चुनावों में अपना वर्चश्व कायम करने के लिए भी धन का इस्तेमाल करते हैं जिनमें ऐसा बताया जाता है कि हममें से हर एक को मतदान का सामान अधिकार है. पूँजीवाद के अंतर्गत जिनके पास बेहिसाब पैसा है, वे ही अधिकांश उपभोग की वस्तुओं और सेवाओं के हक़दार हैं तथा हमारी सरकार और अर्थव्यवस्था को चलाने में उनकी ही राय मानी जाती है.

 

तीसरा– पूँजीवाद निजी-स्वार्थ के सदाचार का दावेदार है, लेकिन नैतिकता, पर्यावरण या सामान्य विवेक का आदर किये बिना निजी-स्वार्थ पर्यावरण का क्षरण, देशज समुदायों का विनाश, उपनिवेशवाद, युद्ध और व्यापक जनसंहार के दूसरे रूपों की ओर ले जाता है. निजी-स्वार्थ पूँजीपतियों को हर जगह हर कीमत पर मुनाफा कमाने की ओर ले जाता है, बिना इस बात की परवाह किये कि इससे जनता और धरती के पारिस्थितिकी तंत्र को कितना अधिक नुकसान हो रहा है. निजी-स्वार्थ पूँजीवाद को किसी भी विरोधी आर्थिक व्यवस्था या चिंतन पद्धति (जैसे देशज सामुदायिक भूमि उपयोग या प्रकृति का सम्मान) को तबाह करने की ओर ले जाता है, जो मुनाफे की अंतहीन भूख के लिये रुकावट खड़ी करता हो.

 

दूसरा— पूँजीवाद लोकतंत्र का दोस्त नहीं, बल्कि आखिरकार इसका दुश्मन है. मुसीबत में पड़ने पर पूँजीपति वर्ग लोकतंत्र की जगह पूँजीवाद को चुनता है. जब जनता पूँजीपतियों की ताकत को कमजोर करने के लिए लोकतंत्र का सहारा लेती है तो पूँजीपति और धनाढ्य अपने विशेषाधिकार की रक्षा के लिए फासीवाद के नाना रूपों का सहारा लेते हैं.

 

पहला— पूँजीवाद एक कैंसर है जिसने हमारी पूरी धरती को अपनी चपेट में ले लिया है. पूँजीपति ग्लोबल वार्मिंग करके, हमारे समुद्रों का विनाश करके, वातावरण में पहले से भी अधिक जहर घोल के और हर चीज का, यहाँ तक कि जिंदगी का भी पेटेंट करा के मुनाफा बटोरते हैं.

 

(गैरी एन्गलर एक कनाडा निवासी पत्रकार और उपन्यासकार हैं. वे हाल ही में प्रकाशित न्यू कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो—वर्कर्स ऑफ द वर्ल्ड इट रियली इज टाइम टू यूनाइट www.newcommuneist.com के सह-लेखक हैं. यह रचना काउंटरपंच से आभार सहित ली गयी है. अनुवाद– दिगम्बर)

 

उत्तराखण्ड में भयावह तबाही : प्राकृतिक आपदा नहीं, अंधाधुंध पूँजीवादी विकास का नतीजा

प्रकृति के साथ आपराधिक छेड़-छाड और विकास के नाम पर हो रहे पर्यावरण विनाश के कारण उत्तराखंड में जो भयावह तबाही मची है वह प्राकृतिक आपदा नहीं है. बल्कि यह अंधाधुंध और बदहवास पूँजीवादी विकास का नतीजा है.
अब से 137 साल पहले महान विचारक फ्रेडरिक एंगेल्स ने ‘वानर से नर बनने की प्रक्रिया में श्रम की भूमिका’ नामक अपने लेख में प्रकृति और मानव जाति के बीच सामंजस्यपूर्ण सम्बन्धों को बाधित किये जाने के दुष्परिणामों के बारे में जो राय व्यक्त की थी वह आज हू-ब-हू हमारे सामने आ रहे हैं. प्रस्तुत है उस लेख का एक अंuttrakhandश–

…प्रकृति पर अपनी मानवीय विजयों के कारण हमें आत्मप्रशंसा में विभोर नहीं हो जाना चाहिए, क्योंकि वह हर ऐसी विजय का हमसे प्रतिशोध लेती है. यह सही है कि प्रत्येक विजय से पहले-पहल वे ही परिणाम प्राप्त होते हैं, जिनका हमने भरोसा किया था, पर दूसरी और तीसरी बार उसके बिलकुल ही भिन्न और अप्रत्याशित परिणाम होते हैं, जिनसे अक्सर पहले परिणाम का असर जाता रहता है. मेसोपोटामिया, यूनान, एशिया माइनर तथा अन्य स्थानों में जिन लोगों ने कृषियोग्य भूमि प्राप्त करने के लिये वनों को बिलकुल ही नष्ट कर डाला, उन्होंने कभी यह कल्पना तक नहीं की थी कि वनों के साथ आर्द्रता के संग्रह-केन्द्रों और आगारों का उन्मूलन करके वे इन देशों की मौजूदा तबाही की बुनियाद डाल रहे हैं. आल्प्स के इटलीवासियों ने जब पर्वतों की दक्षिणी ढलानों पर चीड़ के वनों को (ये उत्तरी ढलानों पर खूब सुरक्षित रखे गये थे) पूरी तरह से तबाह काट डाला तब उन्हें इस बात का अहसास नहीं था कि ऐसा करके वे अपने प्रदेश के पहाड़ी पशु-पालन पर कुठाराघात कर रहे हैं. इससे भी कम आभास उन्हें इस बात का था कि अपने कार्य द्वारा वे अपने पर्वतीय स्रोतों को वर्ष के अधिक भाग के लिये जलहीन बना रहे हैं और साथ ही इन स्रोतों के लिये यह सम्भव बना रहे हैं कि वे वर्षाऋतु में मैदान में और भी भयावह बाढ़ें लाया करें… हमें हर पग पर यह याद कराया जाता है कि प्रकृति पर हमारा शासन किसी विदेशी जाति पर एक विजेता के शासन जैसा कदापि नहीं है, वह प्रकृति से बाहर के किसी व्यक्ति जैसा शासन नहीं है, बल्कि रक्त, मांस और मस्तिष्क से युक्त हम प्रकृति के ही प्राणी हैं, हमारा अस्तित्व उसके ही मध्य है और उसके ऊपर हमारा सारा शासन केवल इस बात में निहित है कि अन्य सभी प्राणियों से हम इस मानी में श्रेष्ठ हैं कि हम प्रकृति के नियमों को जान सकते हैं और ठीक-ठीक लागू कर सकते हैं.
…जैसा समाज के संबंध में वैसे ही प्रकृति के संबंध में भी वर्तमान उत्पादन-प्रणाली मुख्यतया केवल प्रथम, ठोस परिणाम भर से मतलब रखती है. और तब विस्मय प्रकट किया जाता है कि इस उद्देश्य की पूर्ति के किये गये क्रियाकलाप के दूरवर्ती प्रभाव बिलकुल दूसरे ही प्रकार के, बल्कि मुख्यतया बिलकुल उल्टे ही प्रकार के होते हैं; कि पूर्ति और माँग का तालमेल बिलकुल विपरीत वस्तु में परिणत हो जाता है…

क्या है जो मजदूर वर्ग को क्रांतिकारी बनाता है?

-माइकल ए. लेबोवित्ज़

ऐसा क्या है जो मजदूर वर्ग को क्रांतिकारी बनाता है? वह हीगल का रहस्यवाद नहीं है कि यह एक सर्वव्यापी वर्ग या निरपेक्ष आत्मा की भौंडी नकल है. ऐसा भी नहीं कि मजदूर वर्ग अपनी भौतिक स्थिति की वजह से ही क्रांतिकारी है, यानी उद्योग के पहियों को जाम कर देने के लिये कूटनीति तौर पर उसे वहां बहाल किया गया है.

इसमें ज्यादा हैरत की बात नहीं है कि ये अच्छी-बुरी सारी व्याख्यायें बहुत थोड़े लोगों को ही कायल बना पाती हैं. निश्चय ही, कुछ ऐसे लोग भी हैं जो पहले इस बात की बहुत अच्छी तरह व्याख्या करते थे कि मजदूर वर्ग क्रांतिकारी क्यों है, लेकिन अब वे कहते हैं कि मजदूर वर्ग का समय आया और चला गया. उदाहरण के लिये, कुछ लोग यह मानते हैं कि, एक ज़माने में, पूंजी मजदूरों को सकेंद्रित करती थी, उन्हें एक साथ आने, संगठित होने और संघर्ष करने का अवसर प्रदान करती थी; मगर, अब पूंजी ने मजदूरों को विकेन्द्रीकृत कर दिया है और उन्हें एक-दूसरे के खिलाफ इस तरह खड़ा कर दिया है कि अब वे साथ मिलकर संघर्ष नहीं कर पाते. एक ज़माना था, जब मजदूरों के पास खोने के लिये अपनी बेड़ियों के सिवा कुछ भी नहीं था. लेकिन  अब पूंजीवाद ने उसे अपने अंदर समाहित कर लिया है, वह अब उपभोक्तावाद की जकड़बंदी में है और उसके उपभोग के सामान ही अब उसके मालिक हैं और वे ही उसका इस्तेमाल करते हैं.    
जो लोग यह नतीजा निकालते हैं कि मजदूर वर्ग अब इसलिए क्रांतिकारी नहीं रह गया क्योंकि पूंजीवाद ने उसे रूपांतरित कर दिया है, वे यह दर्शाते हैं कि उन्हें मार्क्सवाद की रत्ती भर भी समझ नहीं है. अपने संघर्षों के जरिये ही मजदूर वर्ग खुद को क्रांतिकारी बनाता है – खुद को रूपांतरित करता है. हमेशा से यही मार्क्स का दृष्टीकोण था – उनका “क्रांतिकारी व्यवहार” कि अवधारणा, जिसके दौरान हालात भी बदलते हैं और साथ ही साथ खुद मजदूर वर्ग में भी बदलाव आते हैं. अपने संघर्षों के जरिये ही मजदूर वर्ग खुद को बदलता है. वह खुद को नयी दुनिया का निर्माण करने के लायक बनाता है.

लेकिन मजदूर संघर्ष क्यों करते हैं? मजदूरों के सभी संघर्षों में एक ही बुनियादी बात है जिसे मार्क्स “विकास के लिए मजदूरों की अपनी जरुरत” कहते हैं. हम जानते हैं कि मार्क्स का यह मानना था कि वेतन-भत्ते के संघर्ष अपने आप में अपर्याप्त हैं. लेकिन वह यह भी मानते थे कि इन संघर्षों में शामिल न होना, मजदूरों को “उदासीन, विचारहीन और कमोबेश उत्पादन के खाते-पीते उपकरण” बना देगा. मार्क्स का तर्क था कि संघर्षों के अभाव में मजदूर “उदास, मानसिक रूप से कमज़ोर, क्लांत और विरोध न करने वाली भीड़” बनकर रह जायेंगे. संघर्ष उत्पादन की एक प्रक्रिया हैं- जो एक अलग तरह के मजदूर का निर्माण करती है, एक ऐसा मजदूर जो अपने आप को उत्पादित करता/करती है, एक ऐसे व्यक्ति के रूप में, जिसका सामर्थ्य बढ़ता है, आत्मविश्वास विकसित होता है और जिसकी संगठित होने और आपस में जुड़ने की क्षमता विस्तृत होती है. लेकिन हम ऐसा क्यों सोचते हैं कि यह संघर्ष सिर्फ वेतन-भत्ते की लड़ाई तक ही सीमित है? हर एक संघर्ष जिसमें लोग खुद हि मजबूती से डटे रहते हैं, हर एक संघर्ष जिसमें लोग सामाजिक न्याय पर जोर देते हैं, हर एक संघर्ष जिसमें वे खुद अपनी संभावनाओं और अपने विकास की जरुरत समझते हैं, उसमें शामिल लोगों के सामर्थ्य को बढ़ाते हैं.      
      इतना ही नहीं, ये संघर्ष हमें पूंजी के खिलाफ खड़ा करते हैं. क्यों? क्योंकि पूंजी एक ऐसा  अवरोध है जो हम सब के बीच और हमारे खुद के विकास के बीच बाधा बन कर खड़ी होती है. और ऐसा इसलिये है कि पूंजी ने सारी सभ्यताओं से हासिल उपलब्धियों को अपने कब्जे में कर लिया है, क्योंकि यह सामाजिक मष्तिस्क और सामाजिक श्रम का मालिक बन बैठी है, और यह हमारे उत्पादों को और मजदूरों के उत्पादों को हमारे ही खिलाफ खड़ा कर देती है; जिसके पीछे  सिर्फ एक ही मकसद होता है, खुद का फायदा – यानी मुनाफा. अगर हमें अपनी जरूरतों को पूरा करना है और अपनी क्षमता का विकास करना है, तो हमें पूंजी के खिलाफ संघर्ष करना जरूरी है  और इसी के दौरान हम मजदूर खुद को क्रांतिकारी बनाते हैं.  

लेकिन हम लोग कौन हैं? वह मजदूर वर्ग कौन है जो क्रांतिकारी है? आपको पूँजी के अंतर्गत इसका जवाब नहीं मिलेगा. मार्क्स की पूंजीमजदूर वर्ग के बारे में नहीं है – सिवाय इसके कि मजदूर वर्ग उसका एक लक्ष्य है. पूंजी में जिस चीज की ब्याख्या की गयी है वह है पूंजी की प्रकृति, इसका लक्ष्य और इसकी गतिकी. मगर मजदूर वर्ग के बारे में यह सिर्फ इतना ही बताती है कि पूंजी मजदूर वर्ग के खिलाफ काम करती है. और चूँकि वह मजदूर वर्ग को एक विषय के तौर पर पेश नहीं करती, इसलिये वह इस बात पर केंद्रित नहीं है कि पूंजी अपने इस मातहत के खिलाफ कैसे लड़ती है. इसके लिये हमें मार्क्स की दूसरी रचनाओं और उनकी टिप्पणियों को देखना होगा कि कैसे पूंजीपति वर्ग मजदूरों को बाँटकर और उन्हें अलग-थलग करके अपनी सत्ता बनाये रखता है (विशेष तौर पर अंग्रेज और आयरिश मजदूरों को). और, हालाँकि मार्क्स ने स्पष्ट तौर पर टिप्पणी की है कि “पूंजी की समकालीन सत्ता” मजदूरों में नयी जरूरतें पैदा करने पर ही “पूंजी की समकालीन सत्ता निर्भर” है, लेकिन उन्होंने किसी भी  जगह इस प्रश्न की जांच-पड़ताल नहीं की है.  

इसलिये, समकालीन मजदूर वर्ग की प्रकृति एक ऐसा महत्वपूर्ण प्रश्न है जिसका जवाब किसी किताब में नहीं ढूंढा जा सकता. हमें खुद ही इस सवाल का जवाब तलाशना होगा. आज कौन है जिसके पास पूंजी नहीं है? कौन है जो उत्पादन के साधनों से अलग है और जो अपने अस्तित्व को बचाने के लिये पूंजी के आगे एक याचक की तरह खड़ा होता है? निश्चय ही, इसमें सिर्फ वही शामिल नहीं है जो पूंजी को अपनी श्रम शक्ति बेचता है, बल्कि वे भी शामिल हैं जिनकी हैसियत पूंजी को अपनी श्रम शक्ति बेचने लायक भी नहीं हैं – सिर्फ शोषित मजदूर ही नहीं, बल्कि वे भी जिन्हें हासिये पर फेंक दिया गया है. और निश्चय ही, इसमें वे भी शामिल हैं, जो बेरोजगारों की विशाल आरक्षित सेना मौजूद होने के चलते, पूंजी के विस्तार के अधीन काम करते हैं और सारा जोखिम खुद ही उठाने को मजबूर हैं – अर्थात जो लोग अनौपचारिक (असंगठित) क्षेत्र में अपने अस्तित्व के लिये संघर्षरत हैं. भले ही वे फैक्ट्री में काम करने वाले पुरुष मजदूर के घिसेपिटे मानदण्ड पर खरे नहीं उतारते हों, क्योंकि यह मानदण्ड तो हमेशा से ही गलत था.                

निश्चय ही, हमें मजदूर वर्ग की विविधतापूर्ण प्रकृति की पहचान करने से शुरु करना होगा. क्योंकि मार्क्स जानते थे कि मजदूर वर्ग के बीच के मतभेद पूंजी के शासन का जारी रहना संभव बनाते हैं. लेकिन मार्क्स यह भी जानते थे कि संघर्षों के दौरान ही हमारी एकता का निर्माण होता है. और हम अपने खुद के विकास की जरुरत के सामूहिक लक्ष्य को पहचान कर और यह पहचान कर कि “प्रत्येक व्यक्ति का स्वतंत्र विकास सभी के स्वतंत्र विकास की जरूरी शर्त है”, उस एकता का निर्माण कर सकते है. हमें यह विश्वास दिलाकर कि पूँजीवाद का कोई विकल्प नहीं है, पूंजी विचारों की इस लड़ाई को जीतती आ रही है और जो लोग मजदूर वर्ग को क्रांतिकारी मानने से इंकार करते हैं, वे इस काम में पूँजी के मददगार हैं. हालाँकि, अपने  विकास के अधिकार पर जोर देकर हम विचारों की इस लड़ाई को लड़ सकते हैं. मार्क्स और एंगल्स यह जानते थे कि मजदूरों से “अपने अधिकारों के लिये लड़ने का आह्वान करना ‘उन्हें’, क्रांतिकारी, संगठित समूह में ढालने का एक साधन मात्र है.” हमारे पास जीतने के लिये एक पूरी दुनिया है – वह दुनिया जिसका हम हर रोज निर्माण करते हैं.
(माइकल ए. लेबोवित्ज़ वेंकूवर (कनाडा) के साईमन फ्रेसर विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के अवकाशप्राप्त प्रोफेसर और बियोंड कैपिटल, बिल्ड ईट नाउ, और द सोसिअलिस्ट अल्टरनेटिव सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं. यह लेख उनकी किताब बियोंड कैपिटल के आने वाले ईरानी संस्करण का प्राक्कथन है. मंथली रिव्यू के प्रति आभार सहित. अनुवाद- दिनेश पोसवाल)

धरती : एक वर्जित ग्रह

-जोर्ज मोनबियट

मानवता के सबसे बड़े संकट के साथ-साथ एक ऐसी विचारधारा का भी उदय हुआ, जो उस संकट के समाधान को असंभव बना देती है. 1980 के दशक के उत्तरार्ध में, जब यह साफ़ हो गया कि मानव निर्मित जलवायु परिवर्तन ने इस जानदार ग्रह और इसके निवासियों को खतरे में डाल दिया है, उसी समय दुनिया एक अतिवादी राजनीतिक सिद्धांत की गिरफ्त में आ गयी, जिसके जड़सूत्र ऐसे किसी भी हस्तक्षेप का निषेध करते हैं जो इस संकट से निजात पाने के लिए जरूरी हैं.

नवउदारवाद, जो बाजार-कट्टरपन्थ या मुक्त-बाजार अर्थव्यवस्था के नाम से भी जाना जाता है, इसका अभिप्राय बाजार को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करना है. इसका जोर इस बात पर है कि राज्य को बाजार की हिफाजत करने, निजी सम्पत्ति की रक्षा करने और व्यापार के रास्ते की बाधाएँ हटाने के अलावा और कुछ नहीं करना चाहिए. व्यवहार में यह चीज देखने को नहीं मिलती. नवउदारवादी सिद्धांतकार जिसे सिकुड़ना कहते हैं, वह लोकतंत्र के सिकुड़ने जैसा दिखता है- नागरिक जिन साधनों से अभिजात वर्ग की सत्ता पर अंकुश रख सकते हैं, उन्हें कम करते  जाना. जिसे वे “बाजार” कहते हैं, वह वास्तव में बहुराष्ट्रीय निगमों और चरम-धनवानों का स्वार्थ ही दिखाई देता है. लगता है, जैसे नवउदारवाद केवल अल्पतन्त्र को उचित ठहराने का साधन मात्र हो.
इस सिद्धांत को पहलेपहल 1973 में चिली पर आजमाया गया था. शिकागो विश्वविद्यालय के एक पुराने विद्यार्थी ने जो मिल्टन फ्रीडमैन के अतिवादी नुस्खों में दीक्षित हुए थे, सीआइए के पैसे से जेनरल पिनोचे के साथ मिल कर वहाँ इस सिद्धांत को जबरन लागू करवाया, जिसको किसी लोकतान्त्रिक देश में थोपना असंभव होता. इसका नतीजा एक ऐसी आर्थिक तबाही के रूप में सामने आया जिसमें धनी वर्ग, जिसने चिली के उद्योगों के निजीकरण के बाद उनका मालिकाना हथिया लिया था और वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों पर पूरी तरह कब्ज़ा कर लिया था, लगातार समृद्ध होता गया.
इस पंथ को मारग्रेट थैचर और रोनाल्ड रीगन ने अपना लिया. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोश और विश्व बैंक ने इसे गरीब देशों पर जबरदस्ती थोपा. जब 1988 में जेम्स हानसेन ने अमरीकी सीनेट में पहली बार धरती के तापमान में भावी बढ़ोतरी के बारे में अपना विस्तृत माडल प्रस्तुत किया, तब इस सिद्धांत को पूरी दुनिया में लागू करवाया जा रहा था.
जैसा कि हमने 2007 और 2008 में देखा (जब नवउदारवादी सरकारों को बाध्य किया जा रहा था कि वे बैंकों को उबारने से सम्बंधित अपनी नीति को त्यागें), तब किसी तरह के संकट का सामना करने की इतनी खराब परिस्थिति इससे पहले शायद ही कभी रही हो. जब कोई विकल्प न रह जाय तबतक, संकट चाहे जितना ही तीक्ष्ण हो और उसके परिणाम चाहे जितने भी गम्भीर क्यों न हों, आत्म-घृणाशील राजसत्ता दखल नहीं देगा. लेकिन नवउदारवाद सभी तरह की मुसीबतों से अभिजात वर्ग की हिफाजत करता है.
विश्व बैंक, अंतरार्ष्ट्रीय ऊर्जा एजेन्सी और प्राइसवाटरहाउसकूपर जैसे हरित अतिवादियों ने इस शताब्दी के लिए चार डिग्री, पांच डिग्री और छः डिग्री ग्लोबल वार्मिंग का जो पूर्वानुमान लगाया है, उसके चलते होनेवाले पर्यावरण विनाश से बचने का मतलब होगा- तेल, गैस और कोयला उद्योग से सीधे टक्कर लेना. इसका मतलब है उद्योगों पर इस बात के लिए दबाव डालना कि वे अपने अस्सी फीसदी से भी अधिक खनिज तेल भंडार का त्याग करें, जिसे जलाए जाने से होने वाला नुकसान हमारे बर्दास्त से बाहर है. इसका मतलब है नए तेल भंडारों का पता लगाने और उन्हें विकसित करने कि कार्रवाइयों को रद्द करना, क्योंकि जब हम पहले वाले भण्डार का ही इस्तेमाल नहीं कर सकते, तो नया खोजने से क्या फायदा? और इसका मतलब होगा ऐसे किसी भी नए संरचनागत ढाँचे के निर्माण (जैसे- हवाई अड्डे) पर रोक लगाना, जिसे बिना तेल के चलाना ही सम्भव न हो.
लेकिन आत्म-घृणाशील राजसत्ता कोई कार्रवाई कर ही नहीं सकती. जिन स्वार्थों से लोकतंत्र को बचना चाहिए, उनकी गिरफ्त में होने के चलते वे केवल बीच सड़क पर बैठे, कान खोदते और मूँछ ऐंठते रहेंगे, जबकि धड़धड़ करता ट्रक उनकी ओर आता जायेगा. टकराहट वर्जित है, कार्रवाई करना प्राणघातक पाप है. आप चाहें तो कुछ पैसे वैकल्पिक ऊर्जा पर बिखेर सकते हैं, लेकिन पुराने कानूनों की जगह कोई नया कानून नहीं बना सकते.
बराक ओबामा वे उस नीति को आगे बढ़ाते हैं जिसे वे “सबसे श्रेष्ठ” बताते हैं- हवा, सौर, तेल और गैस को प्रोत्साहन देना. ब्रिटिश जलवायु परिवर्तन सचिव, एड डेवी पिछले हफ्ते सामान्य सदन में ऊर्जा बिल पेश करते हैं, जिसका उद्देश्य ऊर्जा आपूर्ति को कार्बन रहित बनाना है. उसी बहस के दौरान वे वादा करते हैं कि वे उत्तरी सागर और दूसरे विदेशी तेल कुओं में तेल और गैस के उत्पादन की “क्षमता को बढ़ाएंगे.”
लोर्ड स्टर्न ने जलवायु परिवर्तन को परिभाषित करते हुए कह था कि यह “यह बाजार व्यवस्था की ऐसी विराटतम और व्यापक दायरे वाली असफलता है, जो पहले कभी देखने में नहीं आई थी.” जून में बेमतलब का पृथ्वी सम्मेलन, दोहा में आजकल जिस पर बहस हो रही है वे बोदे उपाय, ऊर्जा बिल और ब्रिटेन में पिछले हफ्ते जारी बीजली की माँग घटाने से सम्बंधित परचा (बेहतर होता कि ये सारे उपाय समस्या की गंभीरता के मद्देनजर इतने गये-गुजरे न होते), ये सब कुछ बाजार कट्टरपंथ की विराटतम और व्यापकतम असफलता को बेनकाब करते हैं- यह हमारे अस्तित्व से जुड़ी इस समस्या को हल करने में इस व्यवस्था की अक्षमता को दर्शाता है.
हजार वर्षों की विरासत में मिला मौजूदा कार्बन उत्सर्जन ही मानव सभ्यता से मिलतीजुलती किसी भी चीज को चकनाचूर कर देने के लिए काफी है. जटिल समाजों ने समय-समय पर साम्राज्यों के उत्थान-पतन, प्लेग, युद्ध और अकालों को  झेल लिया. वे छः डिग्री जलवायु परिवर्तन को नहीं झेलपाएंगे जिसे शहस्राब्दी तक जारी रहना है. 150 वर्षों के विस्फोटक उपभोग की एवज में, जिसके ज्यातर हिस्से का मानवता की भलाई से कोई लेना-देना नहीं रहा, हम प्राकृतिक विश्व और उस पर निर्भर मानवीय व्यवस्था को खंड-खंड बिखेर रहे हैं.
दोहा जलवायु शिखर (या तलहटी) वार्ता तथा नए उपायों के बारे ब्रिटिश सरकार की चीख-पुकार से यह थाह लग जाता है कि मौजूदा राजनीतिक कार्रवाइयों की कितनी सीमाएं हैं. आप आगे बढ़े नहीं कि सत्ता के साथ आपकी प्रतिज्ञा भंग हुई, दोनों तरह की प्रतिज्ञाएं- चाहे वह परदे के पीछे की गयी हो या नवउदारवादी पंथ द्वारा उसे मान्यता मिली हो.       
नवउदारवाद इस समस्या की जड़ नहीं है – अक्सर इस विचारधारा का इस्तेमाल बेलगाम अभिजात वर्ग द्वारा दुनिया के पैमाने पर सत्ता, सार्वजनिक सम्पत्तियों और प्राकृतिक संसाधनों पर कब्ज़ा ज़माने को उचित ठहराने के लिए किया जाता है. लेकिन इस समस्या का तब तक समाधान नहीं किया जा सकता जब तक एक प्रभावशाली राजनितिक विकल्प के जरिये इस सिद्धांत को चुनौती नहीं दी जाती.     
दूसरे शब्दों में जलवायु परिवर्तन- और वे तमाम संकट जो मानव तथा प्रकृति को अपने शिकंजे में जकड़े हुए हैं- उनके खिलाफ संघर्ष में तब तक  जीत हासिक नहीं  की जा सकती है जब तक एक  व्यापक राजनीतिक संघर्ष न छेडा जाय, धनिक तंत्र के खिलाफ व्यापक जनता कि जनवादी गोलबंदी न की जाय. मेरा मानना है कि इसकी शुरुआत उस वित्तीय व्यवस्था के खिलाफ सुधार अभियान के जरिये होनी चाहिए जिसके माध्यम से बहुराष्ट्रीय निगम और धनाढ्य वर्ग राजनीतिक फैसलों और नेताओं की खरीद-फरोख्त करते हैं. अगले कुछ हफ़्तों के भीतर ही हमारे साथियों में से कुछ लोग ब्रिटेन में एक याचिका दायर करके इस मुहीम की शुरुआत करेंगे. मुझे यकीन है कि आप उस पर जरुर हस्ताक्षर करेंगे.          
लेकिन यह तो एक विनम्र शुरुआत भर होगी. निश्चय ही हमें एक नयी राजनीति की रूपरेखा तैयार करनी होगी- जो जन हस्तक्षेप को न्यायसंगत मानती हो, जिसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों  द्वारा बाजार को मुक्त कराने के घिनौने मकसद से कहीं ज्यादा महान उद्देश्य अन्तर्निहित हो, जो मुठी-भर उद्योगों को को खास तरजीह देकर उन्हें बचने के बजाय, आम जनता और इस सजीव संसार के अस्तित्व को ज्यादा अहमियत देती हो. दूसरे शब्दों में, एक ऐसी राजनीति जो हमारी अपनी हो, न कि मुट्ठी भर चरम अमीर तबके के लिए.
(4 दिसम्बर को गार्जियन में प्रकाशित लेख का आभार सहित प्रस्तुति. अनुवाद – दिगम्बर)
इस लेख में दिये गये पाद-टिप्पणियों का अनुवाद नहीं किया गया है. जिन पाठकों की रूचि हो, वे कृपया मूल अंग्रेजी पाठ देख लें, जिसका लिंक नीचे दिया गया है.

वे कुछ भी नहीं देखते, कुछ भी याद नहीं करते

-मार्कंडेय काटजू


रौ में है रख्शे-ऐ-उम्र कहाँ देखिये थमे
नै हाथ बाग पर है, न पा है रकाब में
मिर्ज़ा ग़ालिब का यह शेर सारतः आज के भारत की ऐतिहासिक परिस्थितियों को प्रतिबिंबित करता है.
“रौ” का मतलब है रफ़्तार, “रख्श” का मतलब है घोड़ा (?), “उम्र” का मतलब है समय (इसका मतलब जिन्दगी भी है, लेकिन यहाँ इसका मतलब समय या युग है), “बाग” का मतलब घोड़े का “लगाम” और “रकाब” का मतलब पैर रखने का कुंडा.
इस तरह इस शेर का मतलब है- “समय का घोड़ा सरपट दौड़ रहा है, देखें यह कहाँ जा कर रुकता है/ घुड़सवार के हाथों में लगाम है, न उसके पैर ही कुंडे में हैं.”
ग़ालिब संभवतः 1857 के महान विप्लव के दौर में होने वाली घटनाओं के विषय में लिख रहे थे, जब घटनाएँ सरपट भाग रही थीं. लेकिन ग़ालिब की शायरी की खूबसूरती यही है (जो उर्दू की ज्यादातर शायरी में दिखती है) कि यह स्थान और काल के मामले में सर्वकालिक है.
आज के भारत में, इतिहास की रफ़्तार तेज हो गयी है. घटनाएँ पहले की तुलना में तेजी से घटित हो रही हैं और हर कोई अचम्भे में है कि आखिर इनका अंत कहाँ होगा.
मीडिया में एक के बाद एक घोटाले की रिपोर्ट आ रही है, जिनमें अमूमन उन राजनेताओं के लिप्त होने की बात होती है जो समाज के गरीब और वंचित तबकों के नाम पर कसमें खाते हैं.
टैलीरां (फ़्रांसिसी कूटनीतिग्य) ने बोर्बों वंश के राजाओं के बारे में कहा था कि उन्होंने- “कुछ भी नहीं देखा, कुछ भी याद नहीं किया और कुछ भी नहीं भूला.” अधिकतर भारतीय राजनेता भी आज किसी बोर्बों की याद दिलाते हैं. वे अपने खिलाफ बढ़ते जनाक्रोश को नहीं देख रहे हैं, जो सारी हदें पर करता जा रहा है. वे इस बात को याद नहीं करते कि बोर्बों शासकों, हैप्सबर्गों और रोमोनोवों का क्या हश्र हुआ (पता नहीं, उन्हें इनके बारे में कुछ मालूम भी है या नहीं). और वे अपनी सत्ता और धन-दौलत को नहीं भूलते, वे यही सोचते हैं कि यह सब हमेशा कायम रहेगा, जैसा कि दुर्भाग्य के शिकार उपरोक्त राजवंशों के लोग सोचा करते थे.
अर्थव्यवस्था निर्णायक कारक है. योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने हाल ही में कहा कि भारतीय सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर में गिरावट आते-आते अब वह 5.5 फीसदी पर ठहर गयी है. यह सुहावनी तस्वीर स्टैण्डर्ड एंड पुअर की इस चेतावनी के एकदम विपरीत है जिसमें कहा गया है कि 24 महीने में भारतीय अर्थव्यवस्था का संप्रभु कर्ज मूल्यांकन (क्रेडिट रेटिंग) घट कर “रद्दी हालत” में पहुँच जायेगा.
जिस चीज को डॉ. अहलुवालिया जैसे अर्थशास्त्री नहीं देखते, वह यह है कि भारत में समस्या  उत्पादन को कैसे बढ़ाया जाय, यह नहीं है (भारी संख्या में इन्जीनियरों और तकनीशियनों तथा विपुल प्राकृतिक संसाधनों को देखते हुए इसे बड़ी आसानी से बढ़ाया जा सकता है) बल्कि समस्या यह है कि भारतीय जनता की क्रय शक्ति कैसे बढ़ाई जाय. आख़िरकार, जो भी उत्पादन होता है, उसे बेचना भी तो होता है, लेकिन बिकेगा कैसे, जबकि हमारी 75-80 फीसदी जनता गरीब है, जो लगभग 25 रुपये रोज पर गुजार-बसर करती है?
यही नहीं, अगर सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि केवल धनी लोगों को और अधिक धनी बनाने के काम आती हो, जबकि गरीब जनता महंगाई के चलते और भी कंगाल होती जा रही हो, तो जाहिर है कि तैयार होने वाला माल बिक ही नहीं सकता, क्योंकि लोगों में खरीदने की क्षमता नहीं है.
हाल के महीनों में, भारत के विनिर्माण क्षेत्र में गिरावट आयी है. निर्यातोन्मुख उद्योगों को खास तौर पर करारा झटका लगा है, क्योंकि पश्चिमी देशों में मंदी आई हुई है.
भारत की तुलनात्मक स्थिरता का आधार आबादी का महज 15-20 फीसदी मद्ध्यम वर्ग है, जिसकी कुल संख्या, 120 करोड़ की भारी आबादी में लगभग 20-25 करोड़ होगी. हमारे माल और सेवाओं को यही तबका बाजार माँग मुहय्या करता है. आसमान छूती महंगाई के चलते इस मद्ध्यम वर्ग की क्रय शक्ति में भी गिरावट आ रही है. इसी का नतीजा है कि भारतीय स्थिरता की जमीन तेजी से खिसक रही है, जिसे हालिया आन्दोलनों में देखा जा सकता है.
विकराल गरीबी, भारी पैमाने पर बेरोजगारी, आसमान छूती महंगाई, ग़रीबों के इलाज का आभाव, किसानों की आत्महत्याएँ, बाल कुपोषण, इत्यादि, इन सब से एक विस्फोटक मिश्रण तैयार हुआ है. अगर बोर्बों अब भी नहीं जागे (फ़िलहाल जिसकी कोई उम्मीद मुझे दिख नहीं रही है) तो आने वाले समय में, भारत एक लम्बे समय तक चलने वाले उथल-पुथल और अराजकता की गिरफ्त में होगा, और अब वह दिन बहुत दूर नहीं.
(मार्कंडेय काटजू सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और प्रेस काउन्सिल ऑफ इण्डिया के अध्यक्ष हैं. द हिंदू में प्रकाशित अंग्रेजी लेख की साभार प्रस्तुति. अनुवाद- दिगम्बर.)   

"फिदेल मरने वाला है"

-फिदेल कास्त्रो


( प्रस्तुत लेख में फिदेल कास्त्रो ने दुनियाभर के साम्राज्यवादी मीडिया द्वारा फैलाए गये इस झूठ का मखौल उड़ाया है कि “फिदेल मरने वाला है”. इसमें उन्होंने “रिफ्लेक्संस” (विचार प्रवाह) को बंद करने के अपने फैसले का कारण भी बताया है. इस विषय में उन्होंने यह विनम्र आकलन पेश किया कि क्यूबा में उनके लेखों से कहीं ज्यादा तवज्जो देने लायक कई जरूरी मुद्दे हैं. वैश्विक घटनाओं पर हमारे समय के एक अगुआ राजनेता की बेबाक और ईमानदार टिप्पणियों का कोई जोड़ नहीं है.) 

विक्टोरिया दे गिरों मेडिकल साइंसेज इंस्टिट्यूट के स्नातक प्रथम वर्ष कक्षा द्वारा जारी किया गया बस एक सन्देश ही साम्राज्यवादी प्रोपगंडा की सारी हदें पर कर जाने और समाचार एजेंसियों द्वारा इस झूठ के पीछे टूट पड़ने के लिए काफी था. इतना ही नहीं, बल्कि अपने केबल के जरिये वे ऐसी अनापशनाप बातें फ़ैलाने लगे जो किसी मरीज के बारे में किसी ने आजतक नहीं सुनी होगी. 

स्पेन के अख़बार एबीसी ने खबर छापी कि वेनेजुएला के एक डॉक्टर ने किसी अज्ञात जगह से यह खुलासा किया है कि कास्त्रो के दिमाग की दाहिनी धमनी में बहुत ज्यादा थक्का जम गया है. “मेरा मानना है कि अब हम फिर कभी सार्वजनिक जीवन में वापस आते नहीं देख पायेंगे.” इस कथित डॉक्टर ने, अगर वह सचमुच एक डॉक्टर है, तो निस्संदेह उसने अपने देश के लोगों से दगाबाजी की है और कास्त्रो के स्वास्थ्य के बारे में बतया है कि “जल्दी ही उनका स्नायु तंत्र फेल होने वाला है.” 

दुनिया के ढेर सारे लोग इस तरह की अनाप-शनाप खबरें फैलाने वाली सूचना एजेंसियों के झांसे में आ जाते हैं, जिनमें लगभग सभी सुविधासम्पन्न और अमीर लोगों के कब्ज़े में हैं- लेकिन लोग अब इन पर बहुत कम ही यकीन करते हैं. कोई भी व्यक्ति धोखा नहीं खाना चाहता; यहाँ तक की सबसे लाइलाज झूठे से भी लोग सच सुनने की आश लगाए रहते हैं. अप्रैल 1961 में, समाचार एजेंसियों द्वारा फैलाये गए उस समाचार पर सबने विश्वास कर लिया था कि गिरोन या बे आफ पिग्स (इसे कुछ भी कहें) के भाड़े के हमलावर हवाना की तरफ बढ़ रहे हैं, जबकि सच्चाई यह थी कि उनमें कई अपनी नावों में बैठ कर उन यांकी युद्धपोतों तक पहुँचने की नाकामयाब कोशिश कर रहे थे जो उनकी हिफाजत में तैनात थे. 

बार-बार आनेवाले पूंजीवादी संकटों को देखते हुए अब सच्चाई लोगों को समझ में आने लगी है और प्रतिरोध भी दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है. कोई भी झूठ, दमन या नया हथियार इस उत्पादन प्रणाली को ध्वस्त होने से नहीं रोक पायेगा जिसमें असमानता और अन्याय की खाई दिन पर दिन चौड़ी होती जा रही है. 

कुछ दिन पहले, अक्तूबर संकट की पचासवीं सालगिरह के आसपास, समाचार एजेंसियों ने मिसाइल संकट के लिए तीन पक्षों को दोषी ठहराया था- उस समय साम्राज्यवाद के चौधरी रहे केनेडी, ख्रुश्चेव और क्यूबा. क्यूबा को नाभिकीय हथियारों से कुछ भी लेना-देना नहीं था, और न ही हिरोशिमा और नागासाकी में किये गए गैरजरूरी कत्ले-आम से ही, जो उस समय के अमरीकी राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने करायी थी, जिसकी बदौलत दुनिया भर में उनकी नाभिकीय तानाशाही कायम हुई थी. क्यूबा तो अपनी आज़ादी और सामाजिक न्याय के अपने अधिकारों की रक्षा कर रहा था 

यांकियों के हमलावर मनसूबे से अपनी मातृभूमि की अपनी हिफाजत के लिए हमने हथियारों, तेल, खाने-पीने की चीजों और अन्य संसाधनों के रूप में सोवियत सहायता कबूल की थी. इस पूंजीवादी देश ने शुरुआती महीनों से ही हम पर घिनौना और खुनी युद्ध थोप दिया था, जिसमें हजारों क्यूबावासियों को मार डाला गया और अपंग बना दिया गया. 

जब ख्रुश्चेव ने मध्यम दुरी तक मार करने वाली मिसाइल लगाने का प्रस्ताव दिया, ठीक वैसा ही, जैसी अमरीका ने तुर्की में लगा रखी थी, जो क्यूबा और अमरीक के बीच की दुरी की तुलना में सोवियत रूस के ज्यादा करीब था- तब सोवियत संघ के साथ एकता बनाये रखने के लिए क्यूबा वह खतरा उठाने से नहीं हिचका. हमारा व्यवहार नैतिक तौर पर पाक-साफ था. हमने जो कुछ किया उसके लिए किसी से माफ़ी नहीं माँगेंगे. सच्चाई यही है कि आधी सदी गुजर गयी और आज भी सर उठा कर खड़े हैं. 

मैंने “रिफ्लेक्संस” छपवाना बंद कर दिया क्योंकि यकीनन क्यूबा प्रेस के पास जो कागज है उसकी अहमीयत मेरे लेखों से कहीं ज्यादा हमारे देश के दूसरे जरूरी कामों के लिए है. 


बुरी खबर देने वाले कौवों!! मुझे तो अब याद भी नहीं कि सिरदर्द किस चिड़िया का नाम है. वे कितने झूठे हैं यह बताने के लिए मैं बतौर तोहफा उन्हें इस लेख के साथ अपना फोटो भी भेज रहा हूँ.



(मंथली रिव्यू के प्रति आभार सहित. अनुवाद- सतीश)

सिक्कों की खनक

-कुलदीप नैयर
अमेरिकी पाक्षिक, न्यू यॉर्कर ने टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के संचालक जैन बंधुओं- समीर और विनीत के बारे में जो कुछ भी बताया है, वह बहुत से लोगों को पहले से ही पता है. इसमें न्यू यॉर्कर का योगदान बस इतना है कि उसने शक-शुबहा दूर कर दिया और इस बात को पक्का कर दिया कि देश के सबसे बड़े मीडिया मुगल इस बात में यकीन करते हैं कि समाचार कॉलमों के मामले में कुछ भी पवित्र नहीं है और एक तय कीमत पर उन्हें बेचा जा सकता है, क्योंकि उनके लिये अखबार उसी तरह एक बिकाऊ माल है, जैसे देह पर मले जानेवाले सुगंधित पाउडर या टूथपेस्ट.
एक पाठक यह जानकार हतप्रभ हो सकता है कि जिस खबर को वह उत्सुकतापूर्वक पढ़ता है उसे पैसा देकर छपवाया गया है. उसकी कुंठा और लाचारी और बढ़ जाती है, क्योंकि उसे इस बात का पता नहीं चलता कि इस कहानी का कौन-सा हिस्सा खबर है और कौन-सा हिस्सा फर्जी. संपादकीय मानकों का यह उलंघन जैन बधुओं को परेशान नहीं करता, क्योंकि वे इस उद्योग को पैसा कमाने के एक कारोबार की तरह इस्तेमाल करते हैं. वे इस बात से गर्व महसूस करते हैं कि उन्होंने नैतिकता को तार-तार करके चीथड़ों में बदल दिया है और इसके बावजूद उनका अखबार भारत में अव्वल दर्जे का है. इतना ही नहीं, वे शायद दुनिया भर में किसी भी दूसरे अखबार से कहीं ज्यादा पैसा कमाते हैं. महान रूपर्ट मर्डोक का साम्राज्य भले ही टाइम्स ऑफ इंडिया से २० गुणा ज्यादा बड़ा है, फिर भी उसका मुनाफा इससे कम है.  
अपने नौ-पृष्ठ के लेख में, उक्त पाक्षिक यह वर्णन करता है कि जैन बंधु पत्रकारिता को सिर्फ “एक जरुरी सिरदर्द की तरह लेते हैं और विज्ञापनदाताओं का असली ग्राहकों की तरह अभिनन्दन करते हैं.” यह आश्चर्य की बात नहीं है कि टाइम्स ऑफ इंडिया अपनी मुद्रण लाइन में अपने संपादकों का नाम नहीं छापता, क्योंकि दरअसल अखबार का कोई संपादक है ही नहीं.
उन्होंने नहीं, किसी और ने बहुत पहले कहा था कि अखबार में लिखना विज्ञापनों के पिछले पन्ने पर लिखने के समान है. जैन बंधु इस तथ्य और इसकी भावना दोनों को अमल में लाते. “हम जानते थे कि हम सुधी श्रोताओं को एकत्रित करने के कारोबार में लगे हैं. इससे पहले, हम सिर्फ विज्ञापन के लिए स्थान बेचते थे.” न्यू यॉर्कर के उक्त लेख में  प्रत्यक्ष रूप में जैन बंधुओं का कोई उद्धरण मौजूद नहीं है. शायद उन्होंने साक्षात्कार देने से इंकार कर दिया हो.
फिर भी, उनके कुछ पिट्ठू, शुक्र है कि उनमें से कोई भी संपादकीय खेमे का नहीं है, उनके दिमाग में झाँकने का अवसर प्रदान करते हैं. एक पिट्ठू कहता है: ”संपादकों में 80-80 शब्दों के लंबे वाक्य बोलते हुए, मंच से आडंबरपूर्ण और कानफोडू भाषण देने की प्रवृति पायी जाति हैं.” विनीत जैन इस बारे में एकदम स्पष्ट हैं कि अखबार के कारोबार में सफल होने के लिये आपको संपादकों की तरह नहीं सोचना चाहिये. “अगर आप संपादकीय विचार के हैं, तो आपके सभी फैसले गलत होंगें.”
यह सच है कि जैन बंधुओं ने अखबार को “समाचारों” के कागजी कारोबार में तब्दील कर दिया है. परन्तु ऐसा इसलिये, क्योंकि उन्होंने अपने अखबार को सहेजने की कला में महारत हासिल कर लिया है, उसे सस्ता कर दिया है और उसे पीत पत्रकारिता के स्तर तक नीचे गिरा दिया है. फिर भी, वे इसकी परवाह नहीं करते, क्योंकि वे एक पेशे को व्यवसाय बनाने में माहिर हैं. उनके लिये संपादक एक दिहाड़ी मजदूर से भी सस्ते होते हैं.  
मुझे एक पुरानी घटना याद आ रही है, टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादक गिरिलाल जैन ने एक दिन मुझे फोन करके पूछा कि क्या आप अखबार के मालिक अशोक जैन से जिनसे आपकी अच्छी जान-पहचान है, इस बारे में बात कर सकते हैं कि वे अपने बेटे समीर जैन को म्रेरे ऊपर दबाव डालने से मना करें. गिरी ने कहा कि अशोक जैन की प्राथमिकतायें चाहे जो भी रही हों, वे उनके साथ अच्छा व्यवहार करते थे, लेकिन समीर का रवैया अपमानजनक था. अशोक ने जवाब में कहा कि वह चाहे तो कितने भी गिरिलाल खरीद सकता है, लेकिन वह एक भी ऐसा समीर नही ढूँढ सकता जिसने उसके मुनाफे को आठ गुणा बढ़ा दिया है. इन्दर मल्होत्रा ने एक बार मुझे बताया कि समीर कैसे वरिष्ठ पत्रकारों को संस्था के द्वारा भेजे जाने वाले कार्ड्स पर अतिथियों के नाम लिखने के लिए अपने कमरे के फर्श पर बैठने के लिये मजबूर करता था.  
जैन बंधुओं ने पैसे कमाने के अपने कारोबार में अखबार को एक बकवास गप्पबाजी तक सीमित कर दिया है. पत्रकारिता उनके कारोबार के लिए सुविधाजनक है. इसे सुनिश्चित करने के लिये, न्यू यॉर्कर के अनुसार यह अखबार “हत्याओं और बलात्कार और दुर्घटनाओं और सुनामी की ख़बरों में भी आशावाद की एक छौंक लगाने का प्रयास करता है और युवाओं से प्रेरक संवाद कायम करने को प्राथमिकता देता है. गरीबी से संबंधित ख़बरों को कम प्राथमिकता दी जाती है.”
पिछले कुछ सालों में कारोबार और प्रबंधन विभागों को ज्यादा महत्व मिलने लगा है. मैं सोचता हूँ कि आपातकाल के दौरान प्रेस का दब्बू रुख इसकी एक वजह है जिसके चलते  व्यावसायिक हितों को ज्यादा महत्व मिलने लगा है. जब यह देखा गया कि संपादन का काम करने वालों ने बिना कोई संघर्ष किये हथियार डाल दिया, तो प्रबंधकों ने उन्हें उस पूर्व-प्रतिष्ठत स्थान से नीचे गिराना शुरू कर दिया जिस पर पहले उनका कब्ज़ा था. अब वे कारोबारी पक्ष के ताबेदार की भूमिका में हैं. हम लोग जरूरी कारोबारि प्रेस नोट कूड़ेदान में फेंक दिया करते थे.     
चूँकि कारोबार और सम्पादकीय के बीच का रिश्ता धुंधला पड़ चुका है, इसलिये स्वतंत्र अभिव्यक्ति सीमित होती जा रही हैं और रोजबरोज होने वाली दखलअंदाजी बढ़ती जा रही है. यह एक खुला रहस्य है कि प्रबंधन या कारोबारी पक्ष अपने आर्थिक और राजनैतिक हितों के अनुसार एक विशेष लाइन निर्धारित करता है. यह ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है कि बहुत से मालिक राज्य सभा के वर्तमान सदस्य हैं बल्कि यह तथ्य ज्यादा महत्वपूर्ण है कि वे कृपादृष्टि पाने के लिये राजनैतिक पार्टियों से संबंध बढ़ाते हैं. 
पार्टियों या संरक्षकों के प्रति उनका आभार और उनकी निकटता अख़बारों के स्तंभों में प्रतिबिम्बित होती है. यही संबंध अब खुद को “पैसा लेकर छापी गयी ख़बरों” में तब्दील कर चुके हैं. ख़बरों को इस ढंग से लिखने की माँग की जाती है जिससे एक व्यक्ति विशेष या खास दृष्टिकोण को समाचार स्तंभों में व्यक्त किया जा सके. पाठक कभी-कभी ही पकड़ पाते हैं कि कब सूचनाओं में प्रोपगैंडा घुसा दिया जाता है या कब समाचार स्तंभों की विषय वस्तु में विज्ञापनों को ठूँस दिया जाता है.  
इसलिये, अब वक्त आ गया है कि अख़बारों, टेलीविजन और रेडियो के सभी पहलुओं की जाँच-पड़ताल करने के लिये एक मीडिया आयोग की स्थापना की जानी चाहिये. 1977 में जब आखिरी प्रेस आयोग नियुक्त किया गया था, तब उसमें टेलीविजन शामिल नहीं था, क्योंकि उस वक्त भारत में इसका अस्तित्व नहीं था. दूसरी चीजों के अतिरिक्त, मीडिया के सभी पहलुओं की जाँच-पड़ताल होनी चाहिये, मालिकों और संपादकों, पत्रकारों और मालिकों के बीच के संबंधों की जाँच होनी चाहिये, जिन्होंने वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट (कार्यरत पत्रकार कानून) की आड़ में ठेका व्यवस्था लागू की. साथ ही, टीवी और मुद्रित ससमाचार माध्यम के बीच संयोजन की भी जाँच होनी चाहिये. आज कोई भी अखबार किसी टेलीविजन चैनल या रेडियो का मालिक हो सकता है. एक ही घराने द्वारा परस्पर विरोधी मीडिया का  स्वामित्व हासिल करने पर कोई रोंक नहीं है. एकाधिकारी संघों को बढ़ावा मिलता है जो अंततः प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है.     
सत्ताधारी पार्टी, कुछ ऐसे कारणों से जिनके बारे में उसे ही पता होगा, मीडिया आयोग की नियुक्ति नहीं करना चाहता. क्या ऐसा जैन बंधुओं के प्रभाव के कारण है जिन्हें बहुत से सवालों का जवाब देना होगा? जैन बंधुओं को यह समझना होगा कि एक लेखक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार इसलिये दिया गया था ताकि वह बिना किसी भय या पक्षपात के कुछ भी कह सके. अगर मालिक ही यह तय करने लगे कि कर्मचारी क्या कहेंगे तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है. लोकतंत्र में, जहाँ स्वतंत्र सूचनायें स्वतंत्र प्रतिक्रियाओं को बढ़ावा देती हैं, वहाँ प्रेस को कुछ लोगों की सनक पर नहीं छोड़ा जा सकता. प्रतिबंधित प्रेस, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी को नष्ट कर सकता है. 
(लेखक, कुलदीप नैयर ब्रिटेन में भारतीय उच्चायुक्त और राज्य सभा के सदस्य रह चुके हैं. मूल अंग्रेजी लेख गल्फ न्यूज से आभार सहित लिया गया. अनुवाद- दिनेश पोसवाल)

दो दलित महिलायें 42 वर्षों से 15 रूपए मासिक वेतन पर काम कर रही हैं

अक्कू और लीला

एक ऐसा मामला सामने आया है जो दिखाता है कि चंद अधिकारियों की निरंकुशता ने उडुपी निवासी दो दलित महिलाओं की जिन्दगी को कितनी बुरी तरह प्रभावित किया.
अक्कू और लीला, दो महिलाओं ने 15 रूपये मासिक वेतन पर वहाँ के महिला शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान में लगभग चार दशकों तक सफाईकर्मी के रूप में सेवा की. उनसे वादा किया गया था कि उनकी नौकरी पक्की कर दी जायेगी, लेकिन 42 साल सेवा करने के बाद भी उन्हें सेवा शर्तों का कोई लाभ नहीं मिला.
उन दोनों महिलाओं ने जब 2001 में कर्नाटक प्रशासनिक ट्रिब्यून का दरवाजा खटखटाया, तब से शिक्षा विभाग ने 15 रूपए मासिक का तुच्छ वेतन भी देना बंद कर दिया.
उनकी दुर्दशा तब सामने आयी, जब उडुपी स्थित ह्यूमन राइट प्रोटेक्शन फाउन्डेशन के अध्यक्ष रविन्द्रनाथ शानबाग ने इस मुद्दे को हाथ में लिया और इस मामले की पैरवी सर्वोच्च न्यायालय तक की.
श्री शानबाग ने पत्रकारों को बताया कि सर्वोच्च न्यायालय, कर्नाटक उच्च न्यायालय और कर्नाटक प्रशासनिक ट्रिब्यूनल ने इन महिलाओं के पक्ष में फैसला दिया और सरकार को इनकी नौकरी पक्की करने का निर्देश दिया, लेकिन सरकार ने अभी तक उस आदेश का पालन नहीं किया.
उन्होंने बताया कि इस पूरी अवधि में, दोनों महिलायें कोई वेतन पाए बिना ही वर्षों तक उस संस्थान के 21 शौचालयों की सफाई करती रहीं.
कर्नाटक प्रशासनिक ट्रिब्यूनल ने 2003 में ही सरकार से 90 दिन के भीतर उनकी सेवा नियमित करने को कहा था और कर्नाटक उच्च न्यायालय ने 2004 में ही उनका बकाया वेतन भुगतान करने का आदेश दिया था. यह सुचना भी जारी हुई थी कि अगर आदेशों का पालन नहीं किया गया तो इसे न्यायालय की अवहेलना मानी जायेगी. लेकिन उन्हें वेतन का भुगतान करने के बजाय सरकार ने 2005 में सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दायर कर दी.
श्री शानबाग ने बताया कि “सर्वोच्च न्यायालय ने 2010 में इन महिलाओं के पक्ष में फैसला दिया. इन सभी आदेशों के बावजूद ये महिलायें आज भी अपना हक पाने का इंतजार कर रही हैं.” उनका कहना था कि “अब सरकारी अधिकारी कह रहे हैं कि ये महिलायें नौकरी पर रखने लायक नहीं हैं, क्योंकि अब वे सेवानिवृति की उम्र तक पहुँच गयी हैं. मैं हैरान हूँ कि इन बदहाल महिलाओं की बकाया राशि का भुगतान करने के बजाय सरकार ने उनके खिलाफ मुक़दमा लड़ने पर लाखों रुपये फूँक दिये.
क्या सर्वोच्च न्यायालय से भी ऊपर कोई अदालत है जो इन महिलाओं को न्याय दे सके?” श्री शानबाग ने सवाल किया और सरकार से आग्रह किया कि इन महिलाओं का जो भी बकाया है, उसका भुगतान करे.
(मूल अंग्रेजी लेख और चित्र के लिए हम द हिंदू के आभारी हैं)

दुनिया की अर्थव्यवस्था ढाँचागत संकट की गिरफ्त में (पांच भागों में)

पाँचवाँ भाग 

ढाँचागत संकट पूँजीवाद का व्यवस्थागत संकट है। इसमें वित्तीय महासंकट, दुनिया के अलगअलग देशों और एक ही देश के भीतर अलगअलग वर्गों के बीच बेतहाशा बढ़ती असमानता, राजनीतिक पतनशीलता और चरम भ्रष्टाचार, लोकतन्त्र का खोंखला होते जाना और राजसत्ता की निरंकुशता, सांस्कृतिक पतनशीलता, भोगविलास, पाशविक प्रवृति, अलगाव, खुदगर्जी, और व्यक्तिवाद को बढ़ावा, अतार्किकता और अन्धविश्वास का बढ़ना, सामाजिक विघटन और पहले से मौजूद टकरावों और तनावों का सतह पर आ जाना, प्रतिक्रियावादी और चरमपंथी ताकतों का हावी होते जाना तथा पर्यावरण संकट, धरती का विनाश और युद्ध की विभीषिका इत्यादि सब शामिल है। हालाँकि अपने स्वरूप, कारण और प्रभाव के मामले में इन समस्याओं की अपनीअपनी विशिष्टता और एकदूसरे से भिन्नता है, लेकिन ये सब एक ही जटिल जाला समूह में एकदूसरे से गुँथी हुई हैं तथा एक दूसरे को प्रभावित और तीव्र करती हैं। इन सबके मूल में पूँजी संचय की साम्राज्यवादी विश्व व्यवस्था है जो दुनिया भर के सट्टेबाजों, दैत्याकार बहुराष्ट्रीय निगमों और अलगअलग सरकारों के बीच साँठगाँठ और टकरावों के बीच संचालित होती है। इसका एक ही नारा हैमुनाफा, मुनाफा, हर कीमत पर मुनाफा ।वैसे तो दुनिया की तबाही के लिये आर्थिक संकट, पर्यावरण संकट और युद्ध में से कोई एक ही काफी है लेकिन  इन विनाशकारी तत्वों के एक साथ सक्रिय होने के कारण मानवता के आगे एक बहुत बड़ी चुनौती मुँह बाये खड़ी हैं। कुल मिलाकार यह संकट ढाँचागत है और इसका समाधान भी ढाँचागत बदलाव में ही है।
इस बुनियादी बदलाव के लिये वस्तुगत परिस्थिति आज जितनी अनुकूल है, इतिहास के किसी भी दौर में नहीं रही है। इस सदी की शुरुआत में रूसी क्रांति के समय पूरी दुनिया में मजदूर वर्ग की कुल संख्या दस करोड़ से भी कम थी, जबकि आज दुनिया की लगभग आधी आबादी, तीन अरब मजदूर हैं। इनमें बड़ी संख्या उन मजदूरों की है जो शहरी हैं और संचार माध्यमों से जुड़े हुए हैं। इनके संगठित होने की परिस्थिति पहले से कहीं बेहतर है। दूसरे, वैश्वीकरणउदारीकरणनिजीकरण की लुटेरी नीतियों और उनके दुष्परिणामों के चलते पूरी दुनिया में मेहनतकश वर्ग का असंतोष और आक्रोश लगातार बढ़ता गया है। इसकी अभिव्यक्ति दुनिया के कोनेकोने में निरंतर चलने वाले स्वत%स्फूर्त संघर्षों में हो रही है। तीसरे, आज उत्पादन शक्तियों का विकास उस स्तर पर पहुँच गया है कि पूरी मानवता की बुनियादी जरूरतें पूरी करना मुश्किल नहीं। फिर भी दुनिया की बड़ी आबादी आभाव ग्रस्त है और धरती विनाश के कगार पर पहुँच गयी है, क्योंकि बाजार की अंधी ताकतें और मुनाफे के भूखे भेड़िये उत्पादक शक्तियों के हाथपाँव में बेड़ियाँ डाले हुए हैं। इन्हें काट दिया जाय तो धरती स्वर्ग से भी सुन्दर हो जायेगी।

लेकिन बदलाव के लिये जरूरी शर्तमनोगत शक्तियों की स्थिति भी क्या अनुकूल है ? निश्चय ही आज दुनियाभर में वैचारिक विभ्रम का माहौल है और परिवर्तन की ताकतें बिखरी हुई हैं। ऐसे में निराशा और आशा, व्यक्तिवाद और सामूहिकता, अकेलापन और सामाजिकता, निष्क्रियता और सक्रियता, खुदगर्जी और कुरबानी, प्रगतिशीलता और प्रतिक्रियावाद, सभी तरह की प्रवृतियाँ समाज में संक्रमणशील हैं। बुनियादी सामाजिक बदलाव में भरोसा रखने वाले मेहनतकशों और उनके पक्षधर बुद्धिजीवियों का यह ऐतिहासिक दायित्व है कि जमीनी स्तर पर क्रान्तिकारी सामाजिक शक्तियों को चेतनासम्पन्न और संगठित करें। वर्तमान मानव द्रोही, सर्वनाशी सामाजिकआर्थिक ढाँचे के मलबे पर न्यायपूर्ण, समतामूलक और शोषणविहीन समाज की बुनियाद खड़ी करने की यह प्राथमिक शर्त है, जिसके बिना आज के इस चैतरफा संकट और विनाशलीला से निजात मिलना असम्भव है।

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