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अमरीका के अश्वेत और भूरे निम्न वर्ग के खिलाफ युद्ध का विरोध– अब हम और इंतजार नहीं कर सकते

Demonstrators stand in the middle of West Florissant as they react to tear gas fired by police during ongoing protests in reaction to the shooting of Brown, in Ferguson–रॉबिन डी.जी. केली

इंतजार करो। धैर्य रखो। शान्त रहो। अमरीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति ने कहा–– “यह एक ऐसा देश है जो सभी को अपने विचार व्यक्त करने की छूट देता है, उन्हें उन कार्रवाईयों के खिलाफ विरोध प्रकट करने के लिए शान्तिपूर्वक प्रदर्शन की इजाजत देता है जिन्हें वे अन्यायपूर्ण समझते हैं।” गडबड़ी मत फैलाओ, अपनी बात रखो । न्याय किया जायेगा। हम कानून की इज्जत करते हैं। यह अमरीका है।

हम सभी ग्रांड जूरी (उच्च न्यायालय) के फैसले का इंतजार कर रहे थे, इसलिए नहीं कि हममें से अधिकांश लोग अभियोग सिद्ध होने की उम्मीद रखते थे। जिला अटार्नी रॉबर्ट पी. मेककुलोच का लच्छेदार वक्तव्य यह समझाते हुए (या उसका बचाव करते हुए) कि कैसे ग्रांड जूरी अपने निर्णय पर पहुँची, एक विजयी भाषण जैसा था। ग्रांड जूरी के लिए यहाँ तक कि अनजाने में हत्या का मामूली सा आरोप भी न तलाश पाना एक आश्चर्यजनक उपलब्धि थी, तब जबकि पुलिस गोलीबारी में एक निहत्था किशोर कई गज दूर हाथ उठाये खड़ा था। बीस मिनट से भी कम समय में 4799 पेज की कार्यवाही का निचोड़ निकालते हुए, ग्रांड जूरी ने चश्मदीद गवाहों की सत्यता पर ही सवाल खड़े कर दिये, चैबीस–घंटे चलनेवाले समाचारों और सोशल मीडिया पर जाँच–पड़ताल को बाधित करने का इल्जाम लगाया और आस–पड़ोस में होनेवाली कथित हिंसा को इस बात के लिए जिम्मेदार ठहराया कि क्यों माइक ब्राउन की लाश को फुटपाथ से उठाने के लिए सुबह तक का इतंजार करना पड़ा। जब मेककुलोच ने अपने जीवन में कभी किसी पुलिसकर्मी को दोषी नहीं ठहराया, तो अब हम उससे कुछ अलग करने कि उम्मीद भला क्यों करते?

कुछ लोग एक चमत्कार की उम्मीद कर रहे थेय ज्यादातर लोग इसलिए इंतजार कर रहे थे कि एक संकट उमड़–घुमड़ रहा था। सेंट लुईस और आसपास के इलाकों में, और मिसौरी राज्य में भी, गोरे लोगों ने इस प्रतीक्षा काल का इंतजार युद्ध की तैयारी के लिए किया। निवासियों ने और ज्यादा बन्दूकें और गोलाबारूद खरीदा, दुकानों की खिड़कियों को बचाने के लिए प्लाइवुड का जखीरा इकठ्ठा किया, अलार्म सिस्टम लगवाये और खिड़कियों पर पट्टियाँ लगायीं, खाने–पीने का सामान इकट्ठा किया। गवर्नर जे. निक्सन ने आपातकाल की घोषणा कर दी, राज्य–भर से नेशनल गार्ड सुरक्षाबलों को बुला लिया और साथ ही दंगा नियंत्रण और जवाबी कार्रवाई के लिए राज्य की नागरिक सेना को ट्रेनिंग दी गयी। संघीय सरकार ने एफबीआई एजेंटों को भेज दिया, अनुमान है कि उनमें से कुछ गुप्त रूप से विरोध आन्दोलनों में काम कर रहे थे। जब मैं यह लेख लिख रहा हूँ तब प्रदर्शनकारियों और खासकर अश्वेत–समुदाय के खिलाफ सभी ताकतों को तैनात कर दिया गया है और गवर्नर ने और ज्यादा नेशनल गार्डों की टुकडियाँ भेजने का अनुरोध किया है।

इसी बीच, जब हम ग्रांड जूरी के निर्णय का इंतजार कर रहे थे तो क्लीवलैंड में एक 12 साल के अश्वेत लड़के तामीर राइस को गोली मारी गयी क्योंकि एक अधिकारी ने गलती से उसकी खिलौना बन्दूक को असली समझ लिया था । तामीर क्लीवलैंड के कडेल रिक्रियेसन सेंटर के बाहर खेल रहा था, जो उन कुछ सार्वजनिक जगहों में से एक थी जो बच्चों के लिए सुरक्षित जगहें हैं।

जब हम इंतजार कर रहे थे, तभी क्लीवलैंड के पुलिसकर्मियों ने एक 37 साल की अश्वेत औरत तनिषा एण्डरसन की जान ले ली जो मानसिक विकार (बाईपोलर डिसओर्डर) से पीड़ित थी। जब उसके घरवालों ने एक मुश्किल हालात में मदद के लिए 911 नम्बर पर फोन किया, तो पुलिस उसके घर पहुँची, लेकिन उसके साथ हमदर्दी का व्यवहार करने के बजाय उन्होंने वही किया जिसकी उन्हें प्रतिक्षण दिया गया था, यानी एक अश्वेत मुहल्ले में अश्वेत लोगों का सामना कैसे करना चाहिए। उन्होंने उसके साथ एक दुश्मन लड़ाके की तरह बरताव किया। जब वह उत्तेजित हो गयी तो एक अफसर ने उसे जबरन जमीन पर गिरा दिया और हथकड़ी पहना दी जबकि दूसरे अफसर ने उसके चेहरे को जमीन से सटा दिया और अपने घुटनों से उसकी पीठ दबाकर उसे 6 से 7 मिनट तक दबाए रखा, जब तक उसका शरीर शिथिल नहीं पड़ गया। उसने साँस लेना बन्द कर दिया। उन्होंने साँस चालू करने की कृत्रिम विधि से उसकी साँस चालू करने का कोई प्रयास नहीं किया। परिवारवालों और गवाहों को बताया कि वह सो रही है । आखिरकार 20 मिनट बाद जब एम्बुलेंस वहाँ पहुँची तो वह मर चुकी थी।

जब हम इंतजार कर रहे थे, तभी एन हार्बर, मिशिगन में पुलिस ने चालीस साल की एक अश्वेत औरत अयुरा रेन रोसर की हत्या कर दी। खबरों के अनुसार जब पुलिसकर्मी एक घरेलू हिंसा की शिकायत पर वहाँ पहुँचे तो वह हाथ में सब्जी काटनेवाला एक चाकू घुमा रही थी, हालाँकि उसके जिस पुरुष मित्र ने इस घटना की सूचना दी थी, उसने इस बात पर जोर दिया कि उससे पुलिसकर्मियों कोई खतरा नहीं है। इस बात से उनपर कोई फर्क नहीं पड़ा, उन्होंने गोली चला दी।

जब हम इंतजार कर रहे थे, तभी शिकागो के पुलिस अधिकारी ने 19 साल के रोशाद मेकिनटोश को गोलियों से गम्भीर रूप से घायल कर दिया। अधिकारी के दावों के बावजूद, कई चश्मदीद गवाहों ने बयान दिया कि मेकिनटोश निहत्था था, अपने हाथ ऊपर करके घुटनों के बल बैठा था और वह उस अधिकारी से गोली न चलाने की प्रार्थना कर रहा था।

जब हम इंतजार कर रहे थे, तभी साराटोगा स्प्रिंग्स, उटाह में पुलिस ने एक 22 साल के अश्वेत नौजवान डेरन हंट के शरीर में छह गोलियाँ उतार दीं, जो एक निंजा लड़ाके की तरह के कपड़े पहने हुए था और एक नकली समुराई तलवार लिये हुए था। इसी बीच विक्टरविले, कैलीफोर्निया में पुलिस ने 36 साल के एक अश्वेत आदमी और पाँच बच्चों के पिता दांते पार्कर को मार दिया। उसे एक चोरी के सन्देह में रोका गया, जब वह अपनी मोटरसाइकल पर जा रहा था । जब उसने “सहयोग करना” बन्द कर दिया तो अधिकारियों ने उसे काबू में करने के लिए बार–बार उस पर टेसर (बिजली के झटके देनेवाला एक हथियार) का इस्तेमाल किया। उन जख्मों की वजह से वह मर गया।

जब हम इंतजार कर रहे थे, तभी अठाईस साल के एक अश्वेत अकाई गरली का भी यही हाल हुआ जब वह ईस्ट न्यूयॉर्क, बु्रकलीन में लुईस एच. पिंक हाउसेस में सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था। पुलिस उस आवासीय परियोजना में टोह लेने की एक ठेठ मुहीम पर गयी थी । ऑफिसर पीटर लिआंग एक हाथ में बन्दूक और दूसरे हाथ में टार्च लेकर अँधेरी सीढ़ियों की तरफ बढ़ा। वह अपने सामने आनेवाले खतरे से निपटने के लिए मुस्तैद था। उदार मेयर बिल डीब्लासियो और पुलिस चीफ बिल ब्रांटन के अनुसार, गरली की मौत एक आनुसांगिक क्षति है। भरपूर क्षमा याचनाएँ की गयीं। गरली अपने पीछे एक दो साल की बेटी छोड़ गया।

जब हम इंतजार कर रहे थे, तभी एलऐपीडी (लॉस एंजेल्स पुलिस डिपार्टमेंट) अधिकारियों ने 25 साल के, एक मानसिक रूप से बीमार अश्वेत, इजेल फोर्ड को उसके अपने पड़ोस के दक्षिण लॉस एंजेल्स में रोका और गोली मार दी। एलऐपीडी ने लॉस एंजेल्स में रहनेवाले 37 साल के पिता ओमर अब्रेगो को रोका, और उसे पीट–पीटकर मार डाला।

जब हम इंतजार कर रहे थे और लगातार इंतजार कर रहे थे, तभी डैरेन विल्सन (माइक ब्राउन का हत्यारोपी पुलिसकर्मी) ने शादी कर ली, वह प्रशासनिक छुट्टी पर रहते हुए अपनी तनख्वाह भी लेता रहा और उसने अपने “बचाव” के नाम पर 4 लाख डॉलर से ज्यादा का चंदा भी हासिल कर लिया।

आप देख सकते हैं कि हम दर्जनों, सैकड़ों, हजारों अभियोगों और फैसलों का इंतजार कर रहे हैं। हर मौत कष्ट देती है। हर दोषमुक्त पुलिसकर्मी, सुरक्षाकर्मी और निगरानीकर्मी मन में आक्रोश पैदा करता है। ग्रांड जूरी के निर्णय ने ज्यादातर अश्वेतों को हैरान नहीं किया क्योंकि हम सजा सुनाये जाने का इंतजार नहीं कर रहे थे। हम न्याय का इंतजार कर रहे थे या ज्यादा सटीक तरीके से कहें, तो न्याय के लिए संघर्ष कर रहे थे। हम सभी नामों को जानते हैं और जानते हैं कि वे कैसे मरे। एरिक गार्नर, काजेमे पावेल, वोनडेरिट डी. मेयर्स जूनियर, जॉन क्राफोर्ड तृतीय, कैरी बाल जूनियर, माइक ब्राउन……..नामों की सूची अन्तहीन है। वे निहत्थे थे और उन्हें ऐसे हालात में गोली मार दी गयी जहाँ जानलेवा हमला जरूरी नहीं था। हम बार–बार आनेवाले दुस्वप्न की तरह उनके नामों को उठाये फिरते हैं, मुर्दों को घिनौने बेसबाल कार्डों की तरह एकत्रित करते हैं। कुछ नहीं भूलते। सिर्फ मुर्दा शरीरों का ढेर है जो हमारी पलक झपकते ही बढ़ जाता है। पिछली तीन पीढ़ियों के लिए, एलेनोर बम्पर्स, माइकल स्टीवर्ट, इयुला लव, अमादु डियालो, ऑस्कर ग्रांट, पेट्रिक डोरिसमंड, मेलिस ग्रीन, टाईशा मिलर, सीन बेल, आईअना स्टेनली–जोंस, मार्गरेट लावर्ने मिशेल इत्यादि, उनमें से कुछ नाम हैं जो नस्ली पुलिस हिंसा के प्रतीक हैं। और मैं सिर्फ मरे हुए लोगों की बात कर रहा हूँ उनकी नहीं जिन्हें परेशान किया गया, पीटा गया, अपमानित किया गया, रोककर जिनकी तलाशी ली गयी और जिनके साथ बलात्कार किया गया।

इसी बीच गवर्नर जे निक्सन, राष्ट्रपति ओबामा, अटार्नी जनरल एरिक होल्डर, मुख्यधारा की प्रेस और राज्य से पुरस्कृत हर अफ्रिकी–अमरीकी नेता अश्वेतों को शान्त रहने और अहिंसक बने रहने का उपदेश देते हैं, जबकि हिंसा का मुख्य कारण पुलिस है। माइक ब्राउन के कत्ल ने लोगों को सड़क पर ला दिया, जहाँ उनका सामना आँसू गैस और रबड़ की गोलियों से हुआ। एक ऐसी दुनिया में राष्ट्र द्वारा की जानेवाली हिंसा हमेशा ही अदृश्य बनी रहती है जहाँ पुलिस और सैनिक हीरो होते हैं और वे जो कुछ भी जो करते हैं उसे हमेशा ही “सुरक्षा,” संरक्षण और आत्मरक्षा के तौर पर दिखाया जाता है। पुलिस बेकाबू (अश्वेत) अपराधियों से नागरिकों की रक्षा करने और उनकी सेवा करने के लिए सड़कों पर उतरती है। इसलिए, हर बार पर पीड़ित को आक्रमणकारी दर्शाने का प्रयास किया जाता है। ट्रेवन मार्टिन ने फुटपाथ को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया और माइक ब्राउन ने अपने भारीभरकम शरीर को। एक अश्वेत आदमी के द्वारा आगे की तरफ लपकने या घूरने को एक आसन्न धमकी समझा जा सकता है। जब 9 अगस्त को माइक ब्राउन के कत्ल के बाद फर्गुसन के उपनगर भड़क उठे तब मीडिया और मुख्यधारा के नेता लूटपाट रोकने और “शान्ति” बनाये रखने के लिए ज्यादा चिंतित थे, बजाय इस तथ्य पर ध्यान दिये कि डैरेन विल्सन अपना वेतन प्राप्त करते हुए छुट्टी पर आजाद था। या इस बात के लिए कि खून से सने, मौत की वजह से अकड़ते, गोलियों से बिंधे, माइक ब्राउन के प्राणहीन शरीर का साढ़े चार घंटे तक पड़े रहना चैथे जेनेवा संधिपत्र का उल्लंघन किये जाने के कारण एक युद्ध अपराध है। आखिर यह एक सामुहिक सजा की कार्यवाही थी–– एक उत्पीड़ित लाश के सार्वजनिक प्रदर्शन का मकसद एक पूरे समुदाय को आतंकित करना था, हर किसी को अधीन करके दंडित करना था, बाकी लोगों को उनका अंजाम याद दिलाना था, अगर वे ठीक से व्यवहार नहीं करते हैं। हम इसे “गैरकानूनी ढंग से सजा देना” कहा करते थे।

युद्ध ? हाँ, युद्ध। माइक ब्राउन के कत्ल के बाद पुलिस के खिलाफ तत्कालीन और अनवरत संघर्ष राज्य और अश्वेतों के बीच के एक कम तीव्रता के युद्ध को प्रकट करता है, और ग्रांड जूरी के निर्णय के पश्चात प्रदर्शनकारियों पर किये गये असंगत बल प्रयोग ने संघर्ष को और भड़का दिया। पूरी दुनिया को फर्गुसन एक युद्ध क्षेत्र जैसा दिखाई दिया क्योंकि पुलिस अपने हेलमेटों, सुरक्षा जैकेटों, निजी हथियारों और एम–16 राइफलों के साथ सेना जैसी लगी। लेकिन फर्गुसन और सेंट लुइस में, और देश–भर की गरीब बस्तियों में, रहनेवाले अफ्रीकी–अमरीकी नागरिकों को यह जानने के लिए आँसू गैस या चेहरे छुपाकर दंगा पुलिसकर्मियों को सहन करने की जरूरत नहीं थी क्योंकि वे पहले से ही एक युद्ध क्षेत्र में रह रहे हैं पुलिस के प्रति माइक ब्राउन और डोरियन जोहनसन की शुरूआती घबराहट की वजह यही थी।

इस इलाके में अतीत और वर्तमान की पुलिस हिंसा ही ब्राउन और जोहनसन के विल्सन से डरने की असली वजह है। अभियोग पक्ष ने हत्या की इस वारदात को एक अठारह साल के भौचक्के और क्रोधित लड़के से खुद को बचने के लिए “एक कानूनी अधिकारी द्वारा हमले से पहले” अपनी आत्मरक्षा की कार्रवाई के रूप में, एक तर्कसंगत मामला बना कर पेश किया। विल्सन को अपनी जान का डर था, सिर्फ इतनी–सी बात उसके द्वारा किये गये जानलेवा हमले को जायज ठहराने के लिए काफी था। लेकिन वह तीन महीने लम्बे चलनेवाले विचार–विमर्श के अन्त में ग्रांड जूरी को दिये जानेवाले निर्देश थे, जिन पर हमें ध्यान देने की जरूरत है। जूरी के सदस्यों से यह कहने के बाद कि वे विल्सन की कार्रवाई को पुलिस द्वारा जानलेवा हमले पर मिसौरी अधिनियम के अनुसार फैसला करें, सहायक जिला प्रोसिक्यूटर, शीला विरली और काठी अलीजदेह ने अचानक घोषणा की कि “रिसर्च करने” पर उन्होंने पाया कि अमरीकी उच्चतम न्यायालय ने अधिनियम को हटा दिया है। निर्णय और पुराने अधिनियम के स्थान पर, विरली ने इस बात का वर्णन लिखा कि जब एक अधिकारी गिरफ्तारी करने के लिए बलप्रयोग करता है तो उस पर यह कानून कैसे लागू होता है। जब ग्रांड जूरी के एक सदस्य ने स्पष्टीकरण के लिए सवाल पूछने शुरू किये तो विरली ने समझाया कि पुराना कानून “पूरी तरह गलत या त्रुटीपूर्ण नहीं है, लेकिन कुछ ऐसा है जो ठीक नहीं है, इसलिए उसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दें।” उसके बाद उसने संकेत दिया कि हम अमरीकी उच्चतम न्यायालय के टेनेसी बनाम गार्नर (1985) निर्णय पर निर्भर रहेंगे, “ऐसा नहीं है कि यह आपके लिए बहुत ज्यादा महत्त्वपूर्ण है ।…… हम कानून की क्लास शुरू नहीं करना चाहते ।” उसके बाद उसने आत्मरक्षा निर्देश पर ध्यान दिलाना शुरू कर दिया।

लेकिन निर्णय पर जल्दी से एक नजर डाल लेने से स्पष्ट हो जाता है कि इस आदेश का उद्देश्य जानलेवा हमले के इस्तेमाल को सीमित करना था, यह तर्क देते हुए कि एक भागते हुए संदिग्ध व्यक्ति को मारना एक अनुचित “हमला” है जो सम्भवत: जीने से वंचित करने के खिलाफ बने चैथे संशोधन का उल्लंघन है। अगर एक संदिग्ध व्यक्ति हथियारबन्द और खतरनाक नहीं है तो उस पर जानलेवा हमला करना न्यायसंगत नहीं है और इसलिए उसके जीवन पर हमला तर्कसंगत नहीं है।

चाहे इसे हम नशीली दवाओं के खिलाफ युद्ध कहें, या “ऑपरेशन घेटो स्टोर्म” कहें या माल्कॉम एक्स के शब्दों में ग्रासरूट मूवमेंट कहें, हम जिस चीज का सामना कर रहे हैं वह राज्य और उसके निजी सहयोगियों के द्वारा खासकर गरीबों और अधिकारहीन अश्वेत और भूरे मजदूर वर्ग के खिलाफ चलाये जा रहे स्थायी युद्ध से किसी भी तरह कम नहीं है। पाँच सदियों के दौरान, यह गुलामी और साम्राज्यवाद से लेकर विराट व्यवस्थागत अपराधीकरण तक फैला हुआ है। हम अपने बच्चों पर इसका प्रभाव देखते हैं, और कानून में इसका प्रभाव देखते हैं, जिसके तहत आसानी से किशोरों पर व्यस्कों की तरह अभियोग चलाये जाते हैंय जीरो टोलरेंस नीतियों की बाढ़ में इसका प्रभाव देखते हैं (जो एक बार फिर नशीली दवाओं के खिलाफ युद्ध का सह–उत्पाद है)य इस चैंका देनेवाले तथ्य में देखते हैं कि हिंसक अपराधों में उल्लेखनीय कमी के बावजूद निष्कासन और निलम्बन में कई गुणा बढ़ोत्तरी हुई है। अपराध, नैतिक घबड़ाहट, नवउदारवादी नीतियाँ और नस्लवाद मानवीय प्रबन्धन पर आधारित जेल में कैद करने, निगरानी, रोकथाम, दमन, जानलेवा कब्जे और भारी गलतबयानी की खर्चीली व्यवस्था की आग में पेट्रोल डालने का काम करते हैं।

फर्गुसन के अश्वेत समुदाय और उसके आसपास के समुदाय नियमित रूप से अन्य दूसरी चीजों के अतिरिक्त पुलिस द्वारा रोके जाने में, ध्वनि अध्यादेश के उल्लंघन (जैसे कि तेज आवाज में संगीत सुनना) के लिए, सेंट लुईस रेलों में चलती रेल में चढ़ने, घास न कटी होने या घर गन्दा होने पर, अनाधिकार प्रवेश पर, “झोलदार पैंट” पहनने पर, ड्राइविंग लाइसेंस या पंजीकरण समाप्त हो जाने पर, “शान्ति भंग करने” पर लगाये गये जुर्माने में हर दिन इस युद्ध का अनुभव करते हैं। यदि ये जुर्माने अदा नहीं किये जाते तो इससे जेल जाना पड़ सकता है, अपनी कार या सम्पत्ति को गँवाना पड़ सकता है, या सामाजिक सेवा के लिए अपने बच्चों को खोना पड़ सकता है। अपराधिक न्याय व्यवस्था गरीब और मजदूर अश्वेतों से सजा और शुल्क के माध्यम से एक तरह का नस्ली कर वसूलती है। 2013 में, फर्गुसन के नगरपालिका न्यायालय ने 21,000 से कुछ ही ज्यादा लोगों को लगभग 33,000 गिरफ्तारी वांरट जारी किये, जिससे नगरपालिका को लगभग 26 लाख डॉलर प्राप्त हुए। इसी साल, फर्गुसन में तलाशी के 92 प्रतिशत और यातायात उल्लंघन रोकने के 86 प्रतिशत मामलों में अश्वेत शामिल थे, इस तथ्य के बावजूद कि हर तीन में से एक गोरा आदमी गैरकानूनी हथियार या नशीली दवाओं के साथ पाया गया, जबकि हर पाँच में से सिर्फ एक अश्वेत नियम विरुद्ध था।

फिर भी, यथास्थिति के समर्थक हमेशा ही राज्य हिंसा के आलोचकों को कम आयवाले अश्वेत समुदायों में होनेवाली आपसी नस्ली हत्याओं की संख्या का हवाला देकर भटकाने की कोशिश करते हैं। न्यूयॉर्क के भूतपूर्व मेयर रूडी गुलियानी के हालिया शातिराना ताने को कौन भूल सकता है जो उन्होंने माइकल एरिक डाइसन के “प्रेस से मिलें” कार्यक्रम में किया–– “गोरे पुलिस अधिकारी वहाँ (अश्वेतों के इलाकों में) नहीं होते अगर आप एक–दूसरे को नहीं मार रहे होते ।” निश्चित रूप से यह एक नस्लवादी शेखी है, लेकिन इस तरह के कथन इस बात की गहन पूछताछ को रोकने में सफल हो जाते हैं कि कैसे नवउदारवादी नीतियाँ (जैसे कल्याणकारी राज्य का विखंडन, पूँजी के पलायन को प्रोत्साहित करना, सार्वजनिक स्कूलों, अस्पतालों, घरों, पारगमन और दूसरे सार्वजनिक संसाधनों का निजीकरण, पुलिस और जेलों में पूँजी निवेश, इत्यादि) एक तरह की राजकीय हिंसा है जो अभावग्रस्तता, पर्यावरण और स्वास्थ्य संकट, गरीबी तथा हिंसा और दमन पर आधारित वैकल्पिक (गैरकानूनी) अर्थव्यवस्था को जन्म देती है।

गुलियानी के व्यंग्यात्मक अपशब्द आधुनिक कानून व्यवस्था की असफलता का एक दमदार मामला है। अगर पुलिस की जिम्मेदारी शान्ति बनाये रखना और नागरिकों की रक्षा करना है, लेकिन इसके बजाय वे हिंसक मौतों की “महामारी” फैलाने में योगदान करती है, तो यह अश्वेतों और भूरे लोगों के इलाकों से पुलिस को पूरी तरह हटा लेने का मामला बनता है। पुलिस को लड़ाई का प्रशिक्षण दिया जाता है और पुलिसकर्मी अक्सर कम आयवाले नस्ली समुदायों के युवाओं को सम्भावित शत्रु समझते हैं। इसलिए अँधेरी सीढ़ियों में एक “बेगुनाह” काले आदमी का, सब्जी काटनेवाला चाकू लिये एक अश्वेत महिला का, या खिलौना बन्दूक से खेलते हुए छोटे बच्चों का कत्ल कोई दुर्घटना नहीं है। पुलिसकर्मी इन इलाकों में हाथ में हथियार लेकर गश्त करते हैं, उन्हें हर छाया के पीछे एक संदिग्ध छिपा हुआ दिखाई देता है और युद्ध में या तो मरना होता है या मारना होता है।

डैरेन विल्सन को माइक ब्राउन के कत्ल से सजा न सुनाये जाने की रोशनी में, उन लोगों के द्वारा जो राजकीय हिंसा से आतंकित है और विशेष तौर पर अपनी सुरक्षा को लेकर खतरा महसूस करते हैं, मिसौरी में पुलिस को हटा लेने का आह्वान–– अस्थायी तौर पर ही सही–– एक वाजिब माँग है। वे कानून और व्यवस्था चाहते हैं, लेकिन पुलिस ने लगातार कानून का अनादर किया है और लगभग बिना किसी जवाबदेही के कार्यवाही की है। पुलिस ने एक अनियंत्रित संगठन की तरह काम किया, उनकी कार्यवाही ने अव्यवस्था और भय पैदा किया। इसके अतिरिक्त, प्रभावी रूप से अभियोग न लगने से पुलिस फोर्स निर्दाेष साबित हो जाती है, जिससे अश्वेतों के जीवन की रक्षा करने और न्याय दिलवाने में सरकार की असफलता से उपजे क्रोध और निराशा की कानूनी अभिव्यक्ति का जवाब देते वक्त पुलिस को हिंसा और दमन का और ज्यादा इस्तेमाल करने का बहाना मिल जाता है। पहले ही ग्रांड जूरी के निर्णय के परिणामस्वरूप ऐसा हो रहा है, जब दंगा पुलिस ‘हेंड्स अप यूनाईटेड’ और उसके साथ–साथ दूसरे सुरक्षित स्थानों पर धावा बोल रही है।

हेंड्स अप यूनाईटेड, लॉस्ट वॉइसेज, ऑर्गनाइजेशन फॉर ब्लैक स्ट्रगल, डोंट शूट कोलिशन, मिलेनियल एक्टिविस्ट यूनाईटेड, और उनके जैसे दूसरे संगठनों के युवा संगठनकर्ता समझते हैं कि वे युद्ध की स्थिति में हैं। टेफपो, टोरी रसेल, मोंटेग्यु सिमंस, चेयेने ग्रीन, एश्ले येट्स, और सेंट लुईस इलाके के अनेकों दूसरे युवा अश्वेत कार्यकर्ता अभियोग का इंतजार नहीं कर रहे हैं। न ही वे दिखावटी संघीय जाँच का इंतजार नहीं कर रहे हैं, उन्हें उस संघीय सरकार के बारे में कोई भ्रम नहीं है जो स्थानीय पुलिस को सैन्य साजोसामान प्रदान करती है, जेलें बनाती है, जो बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के हजारों लोगों को चालकों और चालकरहित जहाजों से मारती है, और जो इजराइल को उसके गैरकानूनी युद्ध और कब्जे के लिए हथियारबन्द करती है। वे संगठित हो रहे हैं । साथ ही शिकागो के वे सक्रिय कार्यकर्ता भी संगठित हो रहे हैं जिन्होंने वी चार्ज जेनोसाइड और ब्लैक यूथ प्रोजेक्ट की स्थापना की, और लॉस एंजेल्स के युवा जिन्होंने कम्युनिटी राइट्स कैम्पेन बनाया, और देश–भर के सैकड़ों ऐसे संगठन जो प्रतिदिन राजकीय हिंसा और कब्जे को चुनौती दे रहे हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि न सिर्फ अश्वेतों का जीवन महत्त्वपूर्ण है (यह तो स्पष्ट ही है), बल्कि यह कि प्रतिरोध का अपना महत्त्व है। इसका महत्त्व है, क्योंकि हम अभी भी अधिवासी उपनिवेशवाद, नस्ली पूँजीवाद और पितृसत्ता के परिणामों के साथ संघर्षरत हैं। कैटरिना के बाद के न्यू ओरलियंस में इसका महत्त्व था जो कामकाजी लोगों पर नवउदारवाद के निरंतर चलनेवाले युद्ध की एक मुख्य रणभूमि है और जहाँ अश्वेत संगठनकर्ता बहुनस्ली गठबन्धनों का नेतृत्व करते हुए स्कूलों, अस्पतालों, सार्वजनिक पारगमन और सार्वजनिक घरों के निजीकरण तथा सार्वजनिक क्षेत्र की यूनियनों को खंडित करने का विरोध कर रहे हैं। फर्गुसन के युवा प्रचंडता के साथ अपना संघर्ष जारी रखे हुए हैं, सिर्फ माइक ब्राउन के लिए न्याय पाने और पुलिस दुर्व्यवहार को खत्म करने के लिए ही नहीं बल्कि वे नस्लवाद को हमेशा के लिए खत्म कर देने के लिए, साम्राज्य का अन्त करने के लिए और अन्तत: युद्ध को खत्म करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

(काउन्टरपंच डॉट कॉम से साभार । अनुवाद–दिनेश पोसवाल)

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काम के वक्त घड़ी देखते हुए, मैं भाँप रही हूँ इसके अजीबोगरीब नतीजे – करोल तार्लेन

carol

सोचो, कितना हसीन नज़ारा होगा?
शैतानी धूल-गर्द क्या डुबो देगी फाइलों को
और चक्कर काटेगी हमारी मेज़ पर
फोन के इर्दगिर्द मैल की परत छोड़ते हुए?

क्या चालान जीरोक्स में पिघल जायेंगे?

क्या मेरे पास समय होगा
कि फैक्स करूँ चमगादड़ की किडनी
एक अंग-बैंक को और माँग सकूँ फीस
उसे खरीदनेवाले ज़रूरतमंद से?

हाँ! मेरे कंप्यूटर का बैकस्पेस बटन
काम करने से इनकार कर देगा;
मेरे की बोर्ड की हड्डियाँ छितरा जायेंगी,
ज़बकि मेरा सुपरवाइजर और अफसर
मरियल कुत्ते की तरह मेरी ऐंडी में दाँत गड़ाएंगे.

दोपहर के भोजन की जगह मैं चबाऊँगी
तयशुदा कामों की फेहरिश्त,
और भकोसने की बीमारी से ग्रसित
उल्टी कर दूँगी ऑफिस के शौचालय में,
जिसकी नालियों में चूहों के साथ तैरते हैं
सपने, कम्पनियों के विलय के.

ओह, कामक्रीड़ा का चरमसुख!
ओह, आनन्द की बारिश हो रही है
मेरी लालायित त्वचा पर!

मैं एक निजी फोन कर रही हूँ गैब्रिएल को,
मिटा रही हूँ हजारों मशीनों
की स्मरण-सूची,
तोड़ते हुए टखनों से पाजेब,
उतारती हूँ एक इंच ऊँची एड़ी वाली सैण्डिल
अपने ऑफिस की तयशुदा पोशाक
मेरे नंगे पाँव लड़खड़ाते हैं नजाकत से
मेरे सुचना पट पर
जैसे मैं शान से बढ़ रही हूँ ज़न्नत की ओर
और शामिल हो रही हूँ फरिश्तों के
मुक्ति मोर्चे में!

( अनुवाद- दिगम्बर )

दिमागी बुखार: बच्चों को या इस व्यवस्था को

-डॉ. नवनीत किशोर 

हर साल की तरह इस साल भी देश के कई राज्यों में मासूम बच्चे एक-एक करके दिमागी बुखार की चपेट में आकर दम तोड़ रहे हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश और असम के कई जिलों के मासूम बच्चे दिमागी बुखार के कारण मौत को गले लगा चुके हैं, दुःखद यह है कि ये सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है

बिहार के अपर स्वास्थ्य सचिव के अनुसार अब तक लगभग 600 बच्चे दिमागी बुखार की चपेट में आ चुके हैं तथा इनमें से 233 मौत की नींद सो चुके है। सभी मामले बिहार के 10 जिलों के हैं। कुल मौतों में से 163 मौत अकेले जिला मुजफ्फरपुर में हुई हैं, बाकि ज्यादातर पटना और गया जिलों में हुई हैं।
असम में कुल 50 बच्चों की मौत हो चुकी है। अकेले सिबसागर जिले में 22 मौतें हो चुकी हैं।, असम के अन्य प्रभावित जिले शिव सागर, डुबरी, मोरीगाँव, दारंग व नालवाड़ी है।
एक साथ इतने सारे मासूम बच्चों की मौतें दिल को दहलाती तो हैं ही, साथ ही कई सारे सवाल भी खड़े करती हैं-
1. क्या इतनी सारी मौतों को रोका जा सकता था।
2. क्या नैनो टेक्नोलॉजी और गॉड पार्टीकल की खोज करने वाला विज्ञान इसके समाधान में असमर्थ है।
3. क्या दिमागी बुखार से मुक्ति पाना मानवीय सीमाओं से परे है।
जवाब है? नहीं, कतई नहीं।
आज का विज्ञान इस बिमारी के फैलने के कारणों और उसे रोकने के तरीकों से अच्छी तरह वाकिफ है। विज्ञान के पास इस बिमारी से लड़ने के पर्याप्त हथियार भी हैं। हमारे पास इस बिमारी की समझ तो पर्याप्त है, लेकिन कमी कुछ है तो  इसे व्यापक पैमाने पर लागू करने की इच्छाशक्ति की है, जिसका इस व्यवस्था के हृदयहीन संचालकों में नितान्त अभाव है।
आज वैज्ञानिकों ने इस बिमारी से बचने के लिए टीका तो विकसित कर लिया है, लेकिन आम जनता की आर्थिक-सामाजिक हैसियत और सरकारी पहलकदमी के अभाव में यह टीका आम जन तक समय पर नहीं पहुँच पाता। पिछले साल असम में यह टीका टीकाकरण के माध्यम से जनता के पास पहुँचाने का प्रयास तो किया गया, लेकिन यह प्रयास भी आधे-अधूरे ही रह गये। बिहार और उत्तर प्रदेश में तो इस तरह का नाममात्रा का दिखावा भी नहीं किया गया।
ध्यान देने लायक बात यह है कि चीन, जापान, कोरिया, ताईवान, वियतनाम और कम्बोडिया आदि देशों में इसी टीके के दम पर दिमागी बुखार को बहुत हद तक नियंत्रिते किया गया है। आपात स्थिति में बच्चों व सुअरों को टीकाकरण करना नितान्त आवश्यक होता है। गौरतलब है कि यह बिमारी मुख्यतः गरीब तबके के बच्चों को ही प्रभावित करती है, जो लोग इस टीके का खर्च वहन नहीं कर सकते हैं।
यह काम बिना सरकारी प्रयास के असम्भवप्राय है। हमारी सरकार के पास 100 पूँजीपतियों को बचाने के लिए 5 लाख करोड़ से ज्यादा रुपये तो हैं, लेकिन गरीब जनता को देने के नाम पर सरकार छाती पीट-पीट कर खुद को दिवालिया बताती है।
यह बिमारी क्यूलैक्स नामक मच्छर से फैलती है। जब वे मच्छर संक्रमित सुअर को काटते हैं तो स्वयं संक्रमित होकर किसी भी व्यक्ति को काटकर उसे संक्रमित कर देते है। एक बार बिमारी होने पर इसका इलाज बेहद मुश्किल होता है, लेकिन इससे बचाव करना तथा फैलने से रोकना कठिन नहीं है।
इस बिमारी को फैलने से दो तरीकों से रोका जा सकता है। पहला, मच्छर के काटने से बचाव करके और दूसरा, मच्छर व उसके अण्डों को नष्ट करके।
जल जमाव को रोक कर, मच्छरों के पनपने के स्थानों को नष्ट किया जा सकता है, लेकिन चप्पे-चप्पे पर जाकर जल भराव को सरकार स्वयं नष्ट नहीं करती है और जो व्यवस्था आम जन तक शिक्षा नहीं पहुँचा पायी, वह जटिल बिमारियों से लड़ने की जागृति और चेतना कहाँ से दे सकती है।
प्रभावित क्षेत्रों में समय रहते बड़े पैमाने पर फॉगिंग व अन्य दवाओं का छिड़काव किया जाना चाहिए। मगर आपदा आने के बाद ही सरकार की नींद टूटती है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है। चूँकि यह मच्छर घरों के बाहर खेतों और गड्ढों में पनपता हैं, तो महामारी की स्थिति से हैलीकॉप्टर आदि से भी छिड़काव किया जाना चाहिए, लेकिन हमारे देश में हैलीकॉप्टर से नेताओं की सेन्डिल लाने का खर्च तो वहन किया जा सकता है, गरीब बच्चों को बचाने के नाम पर यह बेहद खर्चीला कार्यक्रम हो जाता है।
सुअरों के बड़े की 2 किमी की परिधि में फॉगिंग नितान्त आवश्यक होती है। संक्रमित सुअरों के मालिकों को उचित मुआवजा देने के बाद सुअरों को नष्ट किया जाना चाहिये, लेकिन मुआवजा (बेल आउट पैकेज) तो हमारे देश में सिर्फ उद्योगपतियों को ही दिया जाता है।
मच्छरों से निजी सुरक्षा के लिए ऊँचे जूते, पूरे तन को ढकने वाले कपड़े, मच्छर रोधी उपकरण (और मच्छर भगाने वाले साधन) का प्रयोग करना चाहिए। माहमारी फैलने के समय तो सरकार कागजोन में दवायुक्त मच्छरदानी भी सर्वजन को वितरित करती है।

विज्ञान कहता है कि सूअर पालन में लगे लोगों को व उनके परिवार के लोगों को ऊँचे जूते, मास्क, चश्मा, पूरे बदन को ढकने वाले कपडे़ पहन कर रखना चाहिए। यह तो इस देश का बच्चा भी जानता है कि कम आर्थिक हैसियत वाले इन लोगों को इस तरह का सुझाव देना भी उनका मजाक उड़ाना है।
कुल मिलाकर इस बिमारी का महत्त्व वैज्ञानिक कमआर्थिक व सामाजिक अधिक है। यह बिमारी गरीब लोगों को सबसे अधिक प्रभावित करती है, इसलिए व्यवस्था के नुमाइन्दे इससे प्रायः मुँह मोडे़ रहते हैं। दिल्ली में डेंगू और स्वाइन फ्लू पर जितना बवाल मचता है और जितनी मुस्तैदी दिखायी जाती है वह इन मासूमों की मौत पर कहीं नजर नहीं आती। हर साल हजारों की संख्या में दिमागी बुखार से गरीबों के बच्चे मर रहे हैं, फिर भी यह देश की कोई खास समस्या नहीं है। चूंकि यह समस्या सामाजिक, आर्थिक, विषमता की जमीन पर ही पनपती है, इसलिए इस गैरबराबरी को समाप्त किये बिना इस समस्या और ऐसी ही तमाम समस्याओं का भी समाधान असम्भव है।
यह समझना आवश्यक है कि सामाजिक गैरबराबरी की जड़ भी आर्थिक गैरबराबरी में होती है। गैरबराबरी वाले समाज में गरीब तबके के लोगों की उपेक्षा होना लाजमी है। दिमागी बुखार के अलावा निचले तत्व में फैलने वाली अन्य सभी बिमारियों के खिलाफ संघर्ष इस गैरबराबरी वाली व्यवस्था को नष्ट करने के लिए निर्णायक संघर्ष का ही एक जरूरी हिस्सा है।

देश में बच्चों के कुपोषण और मौत की भयावह तस्वीर

हाल ही में हंगर एंड मालन्युट्रिशननाम से एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है जिसमें बताया गया है कि हर साल लगभग १६ लाख बच्चे जन्म के कुछ ही समय बाद मर जाते हैं. दो साल से कम उम्र के पचास फीसदी बच्चे कुपोषित हैं.


छह राज्यों के बच्चों का सर्वे करके नन्दी फाउंडेशन द्वारा तैयार की गयी इस रिपोर्ट के मुताबिक देश में छह वर्ष से कम आयु के 42 प्रतिशत बच्चों का वजन सामान्य से कम होता है और 50 प्रतिशत बच्चे गंभीर बीमारियों का शिकार होते हैं. समस्या की गंभीरता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत के आठ राज्यों में जितने बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, उतने अफ्रीका और सहारा उपमहाद्वीप के ग़रीब से ग़रीब देशों में भी नहीं हैं.

देश के संपन्न राज्यों में से एक, महाराष्ट्र में जनवरी 2012 में दस लाख 67 हजार 659 बच्चे कुपोषित थे और मई 2012 तक इनमें से 24 हजार 365 बच्चों की मौत हो गयी थी.

रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के नंदूरबार जिले में पिछले साल 49 हजार, नासिक में एक लाख, मेलघाट में चालीस हजार, औरंगाबाद में 53 हजार, पुणे जैसे सम्पन्न शहर में 61 हजार और मराठवाड़ा में 24 हजार बच्चे कुपोषण के शिकार हुए.

मुंबई के अस्पतालों में हर रोज 100 से ज्यादा कुपोषण के शिकार बच्चे भर्ती हो रहे हैं, जिनमें से 40 फीसदी की मौत हो जाती है. सिर्फ मुंबई में ही साल भर में 48 हजार बच्चे कुपोषण का शिकार हुए हैं.

समूचे महाराष्ट्र की स्थिति यह है कि जनवरी 2012 में दस लाख 67 हजार 659 बच्चे कुपोषण का शिकार थे और मई 2012 तक इनमें से 24 हजार 365 बच्चों की मौत हो गयी थी.


भूख और कुपोषण संबंधी एक रिपोर्ट जारी करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पिछले साल कुपोषण की समस्या को देश के लिए शर्मनाक बताया था. घडियाली आँसू बहाए जाने के एक साल बाद जारी इस रिपोर्ट के आँकड़े, दिनों दिन बदतर होते हालात की ओर इशारा करते हैं.



इन दिल दहला देने वाली सच्चाइयों का हमारे देश के निर्मम शासकों पर कोई असर नहीं होता. विकास के जिस अमानुषिक रास्ते पर वे देश को घसीट रहे हैं, उसमें यहाँ की हालात सोमालिया से भी बदतर होना तय है. इसी भयावह सम्भावना की एक झलक इस रिपोर्ट में दिखती है.

अमरीकी गैरबराबरी के बारे में कुछ निर्मम सच्चाइयाँ



अमरीका में गैरबराबरी के अध्ययन से कुछ ऐसे तथ्य उजागर होते हैं जिन पर विश्वास करना सचमुच कठिन है।

1. संयुक्त राज्य की कम्पनियाँ सबसे कम आय वाले 20 प्रतिशत अमरीकियों की तुलना में कुल मिलाकर बहुत ही कम प्रतिशत कर चुकाती हैं। 

2011में कुल कॉरपोरेट मुनाफा 1970 अरब डॉलर था। जिसमें से कॉरपोरेटों ने 181 अरब डॉलर (9 प्रतिशत) संघीय कर और 40 अरब डॉलर (2 प्रतिशत) राज्य कर के रूप में अदा किया। यानी उनका कुल कर भार केवल 11प्रतिशत था। सबसे गरीब 20 प्रतिशत अमरीकी जनता ने संघ, राज्य और स्थानीय निकायों को अपनी आमदनी का 17.4 प्रतिशत कर के रूप में चुकाया।

2. अत्यधिक मुनाफा और कर भुगतान से बचने वाले तकीनीकी उद्योग को सरकारी खर्च से चलने वाले अनुसंधान के जरिये खड़ा किया गया था।

तकनीकी क्षेत्र किसी अन्य उद्योग की तुलना में सरकारी अनुसंधान और विकास पर कहीं अधिक निर्भर रहे हैं। अमरीकी सरकार ने 1980 से ही तकनीक और संचार में बुनियादी शोधों के लिए लगभग आधे के बराबर वित्तीय सहायता मुहैया की। आज भी संघीय अनुदान विश्वविद्यालयों में होने वाले अनुसंधानों का लगभग 60 प्रतिशत खर्च वहन करता है।

आईबीएम की स्थापना 1911 में, हेवलेट्ट-पैक्कार्ड की 1947में, इन्टेल की 1968 में, माइक्रोसाफ्ट की 1975में, एप्पल और ओरेकल की 1977 में, सिस्को की 1984 में हुई थी। ये सभी सरकार और सेना के नवाचारों पर निर्भर थीं। अभी हाल ही में निगमित गूगल की शुरूआत 1996 में हुई, जिसका विकास रक्षा विभाग के अर्पानेट प्रणाली और नेशनल साईंस फेडरेशन के डिजिटल पुस्तकालय पहल के माध्यम से हुआ।

2011में इन सभी कम्पनियों का सम्मिलित संघीय कर भुगतान महज 10.6 प्रतिशत था।

3. शेयर बाजार में वित्तीय उपकरणों के 10 हजार महाशंख (quadrillion, यानी 10 पर 23 शून्य वाला अंक) डॉलर की बिक्री पर कोई कर नहीं।

अंतरराष्ट्रीय भुगतान बैंक द्वारा प्रस्तुत 2008 की रिपोर्ट के मुताबिक कुल वार्षिक व्युत्पत्ति व्यापार 11.4 हजार महाशंख डॉलर था। इसी साल शिकागो वाणिज्यिक विनिमयन की रिपोर्ट के मुताबिक यह व्यापार 12 हजार महाशंख डॉलर था।
10हजार महाशंख डॉलर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था (सकल विश्व वार्षिक उत्पाद) से 12 गुना से भी अधिक है। यह अमरीका के प्रत्येक आदमी को 30 लाख डॉलर देने के लिए यह पर्याप्त है। लेकिन एक मायने में यह असली मुद्रा नहीं है। इसमें ज्यादातर कम्प्यूटर के जरिये होने वाला एक प्रकार का ऊँची मात्रा का नेनोसेकेण्ड व्यापार है जिसने हमारी अर्थव्यवस्था को लगभग तबाह कर दिया है। इसलिए इसके ऊपर एक छोटा सा बिक्री कर पूरी तरह न्यायोचित है। लेकिन इस पर कोई बिक्री कर नहीं है।

आप बाहर जाकर जूता या आई फोन खरीदिए तो इसके लिए आपको 10 प्रतिशत से ज्यादा बिक्री कर अदा करना होगा। लेकिन वॉलस्ट्रीट जाइये और दस लाख डॉलर के बेहद जोखिम भरे क्रेडिट डिफाल्ट स्वैप खरीदिये और शून्य प्रतिशत कर चुकाइये।

4. बहुत से अमरीकियों को देश की कुल आय में प्रति डॉलर पर एक सेंट हिस्सा मिलता है।

श्वेत परिवारों के मालिकाने वाले प्रति डॉलर गैर आवासीय सम्पत्ति की तुलना में अश्वेत लोगों के पास महज एक सेन्ट की सम्पत्ति है।

– 0.1प्रतिशत सबसे अमीरों की 1980 में जितनी सम्पत्ति थी उसमें चार गुने की बढ़ोत्तरी हुई। वहीं 90 प्रतिशत सबसे गरीबों की सम्पत्ति में एक प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई।     

अमरीका की कुल वित्तीय प्रतिभूतियों (जैसे बॉण्ड) में नीचे के 90 प्रतिशत अमरीकियों का हिस्सा केवल डेढ़ प्रतिशत है बाकी 98.5 प्रतिशत ऊपर के 10 प्रतिशत अमीरों के कब्जे में है।

बोईंग, डूपोन्ट, वेल्स फार्गो, वेरीजॉन, जनरल इलैक्ट्रिक्स और डॉव केमिकल्स से 2008-2010 में हुऐ कुल मुनाफे में से अमरीकी जनता को कर के रूप में केवल एक प्रतिशत प्राप्त हुआ।

5. हमारा समाज एक आदमी या एक परिवार को इतनी सम्पत्ति रखने की छूट देता है जितने से दुनिया के सभी भूखों को खाना खिलाया जा सकता है।

संयुक्त राष्ट्र संघ के आकलन के मुताबिक दुनिया की भूखमरी को पूरी तरह से खत्म करने के लिए 3अरब डॉलर की जरूरत है। जबकि बहुत से अमरीकियों की निजी सम्पत्ति इस धन राशि से ज्यादा है।

दुनिया में 92.5 करोड़ लोगों को पर्याप्त भोजन नहीं मिलता। विश्व खाद्य कार्यक्रम के अनुसार एक आदमी के भोजन के लिए एक साल में लगभग 100 डॉलर की जरूरत है। यानि इसके लिए कुल 92 अरब डॉलर की दरकरा है जो वालमार्ट के 6 उत्तराधिकारियों की सम्पत्ति के बराबर है।

अपमान की चरम सीमा

एक हेज फण्ड मैनेजर ने (जॉन पॉलसन) 2007 में एक वित्तीय कम्पनी (गोल्डमेन सैक्स) के साथ षडयंत्र करके जोखिम भरे सबप्राइम बंधक पत्र तैयार किये ताकि मकान की कीमतें गिरने का पूर्वानुमान करके अपने द्वारा तैयार किये हुए निश्चित तौर पर असफल वित्तीय उपकरण के ऊपर दाँव खेलने में वह दूसरे लोगों के पैसों का उपयोग कर सके। उसे इस सफलता पूर्वक खेले गये जुए में 3.7अरब डॉलर की कमाई हुई। तीन साल बाद उसने 5अरब डॉलर और बनाये जो वास्तविक दुनिया में 100000 स्वास्थ्य कर्मियों की तनख्वाह देने के लिए पर्याप्त होता।

मध्यम वर्गीय करदाताओं की और ज्यादा बेइज्जती के लिए पॉलसन की आय के ऊपर कर की दर महज 15प्रतिशत थी। दुगनी बेइज्जती के रूप में वह चाहे तो इस सब पर कोई कर अदा नहीं करेगा क्योंकि हेज फण्ड के मुनाफे को अनिश्चित काल के लिए टाला या छुपाया जा सकता है। तिगुनी बेइज्जती, कि उसके लाभ का एक भाग खुद उन्हीं मध्यम वर्गीय करदाताओं के पैसे से हुआ जिसके जरिये उस (एआईजी) कम्पनी को डूबने से बचाया (बेल आउट) गया जिसे उस जुआरी को दाँव में जीता हुआ पैसा चुकाना था।

और जिन लोगों को हमने अपने हितों की रक्षा के लिए चुना वे इस बारे में कुछ भी कर पाने में अनिच्छुक या असमर्थ हैं।
(पॉल बॉकेट डीपॉल विश्वविद्यालय में आर्थिक असमानता विषय के अध्यापक हैं। वह सामाजिक न्याय और शैक्षणिक वेबसाइट (UsAgainstGreed.orgPayUpNow.org,RappingHistory.org) के संस्थापक हैं, और अमेरिकन वार: इल्यूजन एण्ड रियेलिटी(क्लैरिटी प्रेस) के सम्पादक और मुख्य लेखक हैं। काउन्टर पंच में प्रकाशित इस लेख का अनुवाद पारिजात ने किया है। )  

किराये की कोख


पूँजीवाद का यह आम नियम है कि वह हर चीज को ‘माल में बदल कर मुनाफा कमाता है। इसलिए पतन की सारी हदों को पार करना और मानवीय मूल्यों का गला घोंटना भी इस लुटेरी व्यवस्था के लिए कोई बड़ी बात नहीं है। औरत की कोख’ को एक माल’ में बदल दिया जाना इसका जीवन्त उदाहरण है। किराये की ‘कोख’ का व्यापार अब एक उद्योग का रूप ले चुका है और मौजूदा कानून के हिसाब से कोई जुर्म नहीं है। हर साल भारी संख्या में विदेशी दम्पत्ति हमारी गरीबी का लाभ उठाकर किराये की कोख लेने भारत आ रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में इसका बाजार 2000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा है।   
किराये की माताओं’ के रूप में महिलाओें की बाजार में उपस्थित उन्हें तमाम तरह की व्याधियों का शिकार बना देता है और इस दौरान उन्हें भयानक पीड़ा से गुजरना पड़ता है। इन महिलाओं को कृतिम गर्भाधान विधि से गर्भधारण कराने से पहले कई तरह के हार्मोन इंजेक्सन और दवाईयाँ दी जाती हैं जो इनके स्वास्थ्य पर बहुत ही हानिकारक प्रभाव डालती हैं। ऐसे कई असपफल प्रयासों के बाद ही गर्भाधारण सपफल हो पाता है। इसमें सपफलता का प्रतित केवल 25 से 40 के बीच है। एक महिला को इस तरह के कितने चक्रों से गुजारा जाय ताकि उसके स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव न पड़े, यह धन लोलुप डॉक्टरों द्वारा तय किया जाता है जो ज्यादातर मामलों में उनके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव की अनदेखी करते हैं। इस प्रक्रिया में गर्भ में एक से अधिक बच्चे ठहरने की सम्भावना भी बहुत ज्यादा होती है और किराये की माताएँ अक्सर गर्भपात का शिकार हो जाती हैं। इस तरह ये सभी जोखिम उठाने के बदले उन्हें कितना पैसा दिया जाय इसका कोई मापदण्ड निर्धारित नहीं है। असली कमाई निजी अस्पतालों के मालिक और इस धन्धे में लगे डॉक्टरों की ही होती है।
एक साल पहले फिल्म अभिनेता आमिर खान ने भी किराये की कोख’ से अपना बच्चा पैदा करवाया था। इस घटना का समाचार देने वाले समाचार पत्रों और टीवी चैनलों ने किराये की कोख’ को सन्तानहीन दम्पत्तियों के लिए वरदान के रूप में महिमामण्डित किया। मीडिया का यह रुख कोई नया नहीं। इस अमानवीय कारोबार को एक सुनहरे अवसर के रूप में प्रस्तुत करने वाले लेख और रिपोर्ट आये दिन मीडिया में देखने को मिलते हैं। सन्तान पैदा करने में असमर्थ दम्पत्तियों के लिए किराये की कोख’ का एक उद्योग के रूप में फलना-फूलना लोगों के दिमाग में रक्त सम्बन्धों की पवित्रता और अपनी सन्तान की लालसा जैसी दकियानूसी सोच का नतीजा है। इसकी जगह बच्चा गोद लेना’ कहीं ज्यादा मानवीय और संवेदनशील विकल्प है।
हालांकि हमारे दे में किराये की कोख’ से संतान उत्पन्न करना कोई नयी बात नहीं है। पहले भी पत्नी की जगह कोई दूसरी महिला किराये की माँ बनती थी जिसे बिना किसी धन लाभ के सन्तान पैदा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन इसे व्यापक समाज में स्वीकृति नहीं मिलती थी। परम्परागत रूप से अन्य व्यभिचारों, जैसे- वेश्यवृत्ति आदि की तरह इसे गुप्त रखा जाता था। आज की तरह यह खुले रूप में और इतने बड़े पैमाने पर नहीं होता था। पिछले कुछ सालों के दौरान मीडिया ने इस कारोबार को खूब प्रचारित प्रसारित किया है लेकिन निवे के लिए बाजार ढूँढ रही इस मरणासन्न पूँजीवादी व्यवस्था को जहाँ कहीं भी निवे की थोड़ी सी गुंजाइश दिखती है, खुद को जिन्दा रखने के लिए वह उसी ओर भागती है, चाहे वह कितना भी घटिया, अमानुषिक और घृणास्पद क्यों न हो।
कोई भी संवेदनशील व्यक्ति और समाज इस घृणित, विकृत और अनैतिक पेशे को भला कैसे बढ़ावा दे सकता है। मुनाफाखोरी की व्यवस्था हमारे समाज को पतन के जिस गर्त में ले जा रही है उसी का एक रूप है- मातृत्व को बाजार के अधीन लाना। यह अत्यन्त क्षोभकारी है।

मार्क्स की एक भूली-बिसरी रचना : आत्महत्या के बारे में प्यूचे (दूसरी किस्त)


प्यूचे द्वारा बुर्जुआ समाज की यह नैतिक और सामाजिक आलोचना तथा मार्क्स द्वारा इसकी पुनर्प्रस्तुति जाहिरा तौर पर रूमानी स्वच्छन्दतावादी है। प्यूचे ने रूमानियत के प्रति अपनी सहानुभूति को रूसों के हवाले से प्रमाणित किया है और उन फिलिस्टाइन बुर्जुआओं पर तीखा अभियोग भी लगाया है जिनका व्यापार ही उनकी आत्मा है, वाणिज्य ही उनका परमात्मा है तथा आत्महत्या के शिकार लोगों और उनके द्वारा छोड़ी गयी हताशा की रूमानी कविता के प्रति जिनके दिल में अपमान और तिरस्कार के सिवा और कोई भाव नहीं है।
स्वच्छन्दतावाद केवल एक साहित्यिक धारा ही नहीं है। मार्क्स का मानना था कि यह आधुनिक पूँजीवादी सभ्यता के खिलाफ, जो अतीत को आदर्श के रूप में प्रस्तुत करती है और उसका गुणगान करती है, एक सांस्कृतिक प्रतिवाद है। मार्क्स खुद कहीं दूरदूर तक स्वच्छन्दतावादी नहीं थे, लेकिन बुर्जुआ समाज के स्वच्छन्दतावादी आलोचकों के वे प्रशंसक थे। उनकी रचनाओं में बालजाक और डीकेन्स जैसे साहित्यकारों, कर्लाइल जैसे राजनीतिक चिन्तक या सिसमोन्दी जैसे अर्थशास्त्री की अन्तर्दृष्टि का समावेश आसानी से देखी जा सकती है। इनमें से ढेर सारे लोग और खुद प्यूचे भी समाजवादी नहीं थे, लेकिन जैसा कि मार्क्स ने अपनी इस रचना में बताया है, मौजूदा समाज व्यवस्था की आलोचना करने के लिए किसी का समाजवादी होना जरूरी नहीं है। पूँजीवादी समाज की अमानवीय और पाशविक प्रकृति, हृदयहीन बुर्जुआ अहंकार और लोभलालच के प्रति जिन स्वच्छन्दतावादी अलंकारों का प्रयोग प्यूचे के संस्मरणों में है, उन्हें मार्क्स की प्रारम्भिक रचनाओं में भी देखा जा सकता है, लेकिन इस रचना में तो यह असाधारण रूप में विद्यमान है।
आत्महत्या के लिए जिम्मेदार, पूँजीवाद की आर्थिक बुराइयों, जैसे- कम वेतन, बेरोजगारी और गरीबी की चर्चा करने के साथसाथ प्यूचे ने सामाजिक अन्याय के उन रूपों पर भी विशेष जोर दिया है जो प्रत्यक्षत आर्थिक कारक नहीं हैं, लेकिन जो गैर सर्वहारा तबके के लोगों की निजी जिन्दगी को बुरी तरह प्रभावित करते हैं।
आर्थिकेतर कारकों के बारे में प्यूचे के दृष्टिकोण से सहमति जताते हुए मार्क्स ने अपनी भूमिका में उन बुर्जुआ मानवतावादियों पर कटाक्ष किया है जो वाल्तेयर के उपन्यास कांदीदके आचार्य पेंगलस की तरह यह मानते हैं कि वे श्रेष्टतम सम्भव दुनिया में जी रहे हैं और जरूरत सिर्फ इतनी है कि मजदूरों को थोड़ा भोजन और थोड़ी शिक्षा दे दी जाए। वे उन पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि ‘‘मानो मौजूदा सामाजिक परिस्थितियों के चलते केवल मजदूर ही कष्ट भोग रहे हैं ।’’ दूसरे शब्दों में, मार्क्स और प्यूचे की निगाह में बुर्जुआ समाज का आलोचक खुद को केवल आर्थिक शोषण तक ही सीमित नहीं रख सकता, हालाँकि शोषण का यह पहलू काफी महत्त्वपूर्ण है। इस आलोचना को व्यापक सामाजिक और नैतिक चरित्र ग्रहण करना होगा और इसमें पूँजीवाद की गहरी और बहुआयामी बुराइयों को शामिल करना जरूरी होगा। पूँजीवादी अमानवीयता केवल सर्वहारा वर्ग के लिए ही नहीं, बल्कि विभिन्न तबकों को लोगों के लिए पीड़ादायी है।
इस लेख का सबसे महत्त्वपूर्ण और दिलचस्प पहलू यह है कि आखिर बुर्जुआ समाज द्वारा हताशा और आत्महत्या की ओर धकेले गये सर्वाधिक पीड़ित गैर सर्वहारा लोग कौन हैं? प्यूचे के उद्धरणों और मार्क्स की टिप्पणियों के केन्द्र में यह सामाजिक श्रेणी है- महिलाएँ।
महिलाओं के उत्पीड़न की इतनी सशक्त अभिव्यक्ति मार्क्स की किसी अन्य रचना में दुर्लभ है। इसमें आत्महत्या की जिन चार घटनाओं का उल्लेख किया गया है, उनमें से तीन घटनाएँ महिलाओं से सम्बन्धित हैं जो पितृसत्ता या मार्क्स और प्यूचे के शब्दों में पारिवारिक क्रूरता की शिकार हैं, जो निरंकुश सत्ता का ऐसा रूप है- जिसे फ़्रांसीसी क्रान्ति ने उखाड़ फेंकने का काम नहीं किया। तीन में से दो महिलाएँ बुर्जुआ वर्ग की हैं और तीसरी एक दर्जी की बेटी है, जो आम जनता के बीच से है। इन सबके दुर्भाग्य का कारण लिंगभेद है न कि वर्ग।
पहला मामला जिसमें माँबाप की निष्ठुरता ने एक लड़की को आत्महत्या के लिए मजबूर किया था, बर्बर पितृसत्तात्मक अधिकारों पर आधारित पारिवारिक निरंकुशता का उदाहरण है। इसकी तीव्र भर्त्सना करते हुए मार्क्स ने इसे कायरतापूर्ण प्रतिशोध की कार्रवाई बताया है जो बुर्जुआ समाज के अधीन जी रहे दब्बू लोगों द्वारा अपने बीच के, अपने से कमजोर लोगों के खिलापफ की जाती है।
दूसरा उदाहरण मार्टिनिक की एक नौजवान औरत का है जिसके पति ने उसे कमरे के अन्दर बन्द कर दिया, जहाँ उसने आत्महत्या कर ली। इस घटना का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया है और मार्क्स ने इस पर अत्यन्त भावपूर्ण टिप्पणी की है। उनकी दृष्टि में यह पुरुषों की अपनी पत्नियों के ऊपर असीम पितृसत्तात्मक अधिकार और इसी के साथसाथ निजी सम्पत्ति के इर्ष्यालु मालिक जैसे रवैये का एक ठेठ उदाहरण मालूम पड़ता है। मार्क्स ने इस पर टिप्पणी करते हुए उस नृशंस पति की तुलना गुलामों की खरीदफरोख्त करने वाले से की है। सच्चे और उन्मुक्त पे्रम की उपेक्षा करने वाली सामाजिक परिस्थितियों तथा पितृसत्तात्मक नागरिक संहिता और सम्पत्ति कानूनों के चलते पुरुष उत्पीड़क अपनी पत्नी के साथ वैसा ही बर्ताव करता है जैसा कोई कंजूस अपनी सोने की तिजोरी के साथ करता है- किसी चीज की तरह किसी वस्तु की तरह, ‘‘उसकी सम्पत्ति की सूची’’ की तरह उसे बन्द दरवाजे के पीछे रखा जाता है। इस अभियोग के जरीये मार्क्स ने पितृसत्तात्मक वर्चस्व को आधुनिक पूँजीवादी, पुरुषवर्चस्ववादी पारिवारिक सम्बन्धों का सहयोगी बताया है।
तीसरे मामले का सम्बन्ध गर्भपात के अधिकार से है जिसके खिलाफ घटना के 200 साल बाद तक नारी संगठनों ने जुझारू संघर्ष चलाया और तब जाकर कुछ देशों में उन्हें यह अधिकार हासिल हुआ। यह मामला एक युवती का है जो पितृसत्तात्मक परिवार के पवित्र नियमों के खिलापफ गर्भवती हो जाती है और जिसे सामाजिक ढोंग, प्रतिगामी नैतिकता और गर्भपात को निषिद्ध करने वाला पूँजीवादी कानून, सबने मिलकर आत्महत्या की ओर धकेल दिया।

प्यूचे के चुनिन्दा उद्धरण और इसके अनुवादक मार्क्स की टिप्पणियाँ, दोनों ने मिलकर इन तीनों मामलों के अध्ययन को बुर्जुआ महिलाओं सहित समस्त नारी जाति की गुलामी, पितृसत्ता और पूँजीवादी परिवार के उत्पीड़क चरित्र के खिलाफ एक तीव्र प्रतिरोध का दस्तावेज बना दिया है। निष्कर्ष के रूप में प्यूचे और मार्क्स इस बात के कायल हैं कि आत्महत्या किसी समस्या का समाधान नहीं तथा न हीं उदारता और दयाधर्म के जरिये इसका उन्मूलन किया जा सकता है। ‘‘आत्महत्या किसी कठिनाई का बदतरीन समाधान प्रस्तुत करती है, फाँसी लगाओ और शान्ति पाओ। 

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