Category Archives: पाब्लो नेरुदा

अगर तुम मुझे भूल जाओ – पाब्लो नेरुदा

कवि का दायित्व -पाब्लो नेरुदा
(नेरुदा की यह प्रेम कविता अपने प्यारे वतन चिल के लिए है जिससे वे बेपनाह मुहब्बत करते थे, फिर भी उन्हें राजनीतिक कारणों से देश निकाला हुआ था. प्रेम कविता के रूप में भी यह उदात्त भावों से परिपूर्ण है.)
——————————
मैं चाहता हूँ तुम्हें बताना
एक बात.

 

जानती हो कैसा लगता है
जब मैं देखता हूँ
मणिमय चाँद की ओर,
मेरी खिड़की पर धीमे कदमों से आती
शरद की लाल टहनियों की ओर,
अगर मैं स्पर्श करता हूँ
आग के आसपास
या लट्ठे की झुर्रीदार देह पर,
हर चीज ले जाती है मुझे तेरी ओर,
मानो हर वो चीज जो मौजूद है यहाँ,
गंध, रोशनी, धातु,
छोटी नावें हैं
जो तैरती हुई
जा रही हैं मेरे लिए प्रतीक्षारत
तुम्हारे द्वीपों की ओर.

 

खैर, अब,
अगर तुम धीरे-धीरे छोड़ दो मुझे चाहना
मैं छोड़ दूँगा तुम्हें चाहना धीरे-धीरे.
अगर अचानक
तुम मुझे भूल जाओ
तो मेरी राह मत देखना,
कि मैं तो पहले ही भुला दिया रहूँगा तुम्हें.

 

अगर तुम मानती हो इसे उत्कट अभिलाषा और पागलपन
लहराते झंडों की हवा
जो गुजरती है मेरी जिन्दगी से होकर,
और फैसला करती हो तुम
मुझे छोड़ने का सागर किनारे
दिल के पास जहाँ मेरी जड़ें हैं,
याद रहे
की उस दिन,
उस पहर,
उठाउँगा मैं अपनी बाहें

और हमारी जड़ें प्रयाण करेंगी

किसी दूसरे देश की तलाश में.

 

लेकिन
अगर हर दिन
हर घंटे,
तुम्हे लगता है कि तुम मेरी तक़दीर हो
बेरहम मिठास के साथ,
अगर हर दिन एक फूल
आरोहित हो तुम्हारे होठों पर मेरी चाहत में,
आह मेरी प्यारी, आह मेरी अपनी,
मुझमें भी तो धधकते हैं ये सभी आग,

कुछ भी भूला या बुझा नहीं है मेरे भीतर,

मेरा प्यार पलता है तुम्हारे प्यार पर, प्रिया,
और जब तक इसे जियोगी तुम रहेगा तुम्हारी बाँहों में

मेरी बाँहों को त्यागे बिना.  

(अनुवाद- दिगम्बर)

कवि का दायित्व -पाब्लो नेरुदा

जो शख्स नहीं सुन रहा है समन्दर की आवाज़
आज, शुक्रवार की सुबह, जो शख्स कैद है
घर या दफ्तर, कारखाना या औरत के आगोश में
या सडक या खदान या बेरहम जेल के तहखाने में
आता हूँ मैं उसके करीब, और बिना बोले, बिना देखे,
जाकर खोल देता हूँ काल कोठरी का दरवाजा
और शुरू होता है एक स्पंदन, धुंधली और हठीली,
बादलों की गड़गड़ाहट धीरे-धीरे पकडती है रफ़्तार
मिलती है धरती की धड़कन और समुद्री-झाग से,
समुद्री झंझावात से उफनती नदियाँ,
जगमग तारे अपने प्रभामंडल में,
और टकराती, टूटती, सागर की लहरें लगातार.
इसलिए, जब मुकद्दर यहाँ खींच लायी है मुझे,
तो सुनना होगा मुसलसल सागर का बिलखना
और सहेजना होगा पूरी तरह जागरूक हो कर,
महसूसना होगा खारे पानी का टकराना और टूटना
और हिफाजत से जमा करना होगा एक मुस्तकिल प्याले में
ताकि जहाँ कहीं भी कैद में पड़े हों लोग,
जहाँ कहीं भी भुगत रहे हों पतझड़ की प्रताड़ना,
वहाँ एक आवारा लहर की तरह,
पहुँच सकूँ खिड़कियों से होकर,
और उम्मीद भरी निगाहें मेरी आवाज़ की ओर निहारें,  
यह कहते हुए कि ‘हम सागर तक कैसे पहुंचेंगे?’
और बिना कुछ कहे, मैं फैला दूँ उन तक
लहरों की सितारों जैसी अनुगूँज,
हर हिलोर के साथ फेन और रेत का बिखरना,
पीछे लौटते नामक की सरसराहट,
तट पर समुद्र-पांखियों की सुरमई कूक.
इस तरह पहुँचेंगे मेरे जरिये
टूटे हुए दिल तक आजादी और सागर. 

( अनुवाद – दिगम्बर )
%d bloggers like this: