Category Archives: पत्रकारिता

सिक्कों की खनक

-कुलदीप नैयर
अमेरिकी पाक्षिक, न्यू यॉर्कर ने टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के संचालक जैन बंधुओं- समीर और विनीत के बारे में जो कुछ भी बताया है, वह बहुत से लोगों को पहले से ही पता है. इसमें न्यू यॉर्कर का योगदान बस इतना है कि उसने शक-शुबहा दूर कर दिया और इस बात को पक्का कर दिया कि देश के सबसे बड़े मीडिया मुगल इस बात में यकीन करते हैं कि समाचार कॉलमों के मामले में कुछ भी पवित्र नहीं है और एक तय कीमत पर उन्हें बेचा जा सकता है, क्योंकि उनके लिये अखबार उसी तरह एक बिकाऊ माल है, जैसे देह पर मले जानेवाले सुगंधित पाउडर या टूथपेस्ट.
एक पाठक यह जानकार हतप्रभ हो सकता है कि जिस खबर को वह उत्सुकतापूर्वक पढ़ता है उसे पैसा देकर छपवाया गया है. उसकी कुंठा और लाचारी और बढ़ जाती है, क्योंकि उसे इस बात का पता नहीं चलता कि इस कहानी का कौन-सा हिस्सा खबर है और कौन-सा हिस्सा फर्जी. संपादकीय मानकों का यह उलंघन जैन बधुओं को परेशान नहीं करता, क्योंकि वे इस उद्योग को पैसा कमाने के एक कारोबार की तरह इस्तेमाल करते हैं. वे इस बात से गर्व महसूस करते हैं कि उन्होंने नैतिकता को तार-तार करके चीथड़ों में बदल दिया है और इसके बावजूद उनका अखबार भारत में अव्वल दर्जे का है. इतना ही नहीं, वे शायद दुनिया भर में किसी भी दूसरे अखबार से कहीं ज्यादा पैसा कमाते हैं. महान रूपर्ट मर्डोक का साम्राज्य भले ही टाइम्स ऑफ इंडिया से २० गुणा ज्यादा बड़ा है, फिर भी उसका मुनाफा इससे कम है.  
अपने नौ-पृष्ठ के लेख में, उक्त पाक्षिक यह वर्णन करता है कि जैन बंधु पत्रकारिता को सिर्फ “एक जरुरी सिरदर्द की तरह लेते हैं और विज्ञापनदाताओं का असली ग्राहकों की तरह अभिनन्दन करते हैं.” यह आश्चर्य की बात नहीं है कि टाइम्स ऑफ इंडिया अपनी मुद्रण लाइन में अपने संपादकों का नाम नहीं छापता, क्योंकि दरअसल अखबार का कोई संपादक है ही नहीं.
उन्होंने नहीं, किसी और ने बहुत पहले कहा था कि अखबार में लिखना विज्ञापनों के पिछले पन्ने पर लिखने के समान है. जैन बंधु इस तथ्य और इसकी भावना दोनों को अमल में लाते. “हम जानते थे कि हम सुधी श्रोताओं को एकत्रित करने के कारोबार में लगे हैं. इससे पहले, हम सिर्फ विज्ञापन के लिए स्थान बेचते थे.” न्यू यॉर्कर के उक्त लेख में  प्रत्यक्ष रूप में जैन बंधुओं का कोई उद्धरण मौजूद नहीं है. शायद उन्होंने साक्षात्कार देने से इंकार कर दिया हो.
फिर भी, उनके कुछ पिट्ठू, शुक्र है कि उनमें से कोई भी संपादकीय खेमे का नहीं है, उनके दिमाग में झाँकने का अवसर प्रदान करते हैं. एक पिट्ठू कहता है: ”संपादकों में 80-80 शब्दों के लंबे वाक्य बोलते हुए, मंच से आडंबरपूर्ण और कानफोडू भाषण देने की प्रवृति पायी जाति हैं.” विनीत जैन इस बारे में एकदम स्पष्ट हैं कि अखबार के कारोबार में सफल होने के लिये आपको संपादकों की तरह नहीं सोचना चाहिये. “अगर आप संपादकीय विचार के हैं, तो आपके सभी फैसले गलत होंगें.”
यह सच है कि जैन बंधुओं ने अखबार को “समाचारों” के कागजी कारोबार में तब्दील कर दिया है. परन्तु ऐसा इसलिये, क्योंकि उन्होंने अपने अखबार को सहेजने की कला में महारत हासिल कर लिया है, उसे सस्ता कर दिया है और उसे पीत पत्रकारिता के स्तर तक नीचे गिरा दिया है. फिर भी, वे इसकी परवाह नहीं करते, क्योंकि वे एक पेशे को व्यवसाय बनाने में माहिर हैं. उनके लिये संपादक एक दिहाड़ी मजदूर से भी सस्ते होते हैं.  
मुझे एक पुरानी घटना याद आ रही है, टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादक गिरिलाल जैन ने एक दिन मुझे फोन करके पूछा कि क्या आप अखबार के मालिक अशोक जैन से जिनसे आपकी अच्छी जान-पहचान है, इस बारे में बात कर सकते हैं कि वे अपने बेटे समीर जैन को म्रेरे ऊपर दबाव डालने से मना करें. गिरी ने कहा कि अशोक जैन की प्राथमिकतायें चाहे जो भी रही हों, वे उनके साथ अच्छा व्यवहार करते थे, लेकिन समीर का रवैया अपमानजनक था. अशोक ने जवाब में कहा कि वह चाहे तो कितने भी गिरिलाल खरीद सकता है, लेकिन वह एक भी ऐसा समीर नही ढूँढ सकता जिसने उसके मुनाफे को आठ गुणा बढ़ा दिया है. इन्दर मल्होत्रा ने एक बार मुझे बताया कि समीर कैसे वरिष्ठ पत्रकारों को संस्था के द्वारा भेजे जाने वाले कार्ड्स पर अतिथियों के नाम लिखने के लिए अपने कमरे के फर्श पर बैठने के लिये मजबूर करता था.  
जैन बंधुओं ने पैसे कमाने के अपने कारोबार में अखबार को एक बकवास गप्पबाजी तक सीमित कर दिया है. पत्रकारिता उनके कारोबार के लिए सुविधाजनक है. इसे सुनिश्चित करने के लिये, न्यू यॉर्कर के अनुसार यह अखबार “हत्याओं और बलात्कार और दुर्घटनाओं और सुनामी की ख़बरों में भी आशावाद की एक छौंक लगाने का प्रयास करता है और युवाओं से प्रेरक संवाद कायम करने को प्राथमिकता देता है. गरीबी से संबंधित ख़बरों को कम प्राथमिकता दी जाती है.”
पिछले कुछ सालों में कारोबार और प्रबंधन विभागों को ज्यादा महत्व मिलने लगा है. मैं सोचता हूँ कि आपातकाल के दौरान प्रेस का दब्बू रुख इसकी एक वजह है जिसके चलते  व्यावसायिक हितों को ज्यादा महत्व मिलने लगा है. जब यह देखा गया कि संपादन का काम करने वालों ने बिना कोई संघर्ष किये हथियार डाल दिया, तो प्रबंधकों ने उन्हें उस पूर्व-प्रतिष्ठत स्थान से नीचे गिराना शुरू कर दिया जिस पर पहले उनका कब्ज़ा था. अब वे कारोबारी पक्ष के ताबेदार की भूमिका में हैं. हम लोग जरूरी कारोबारि प्रेस नोट कूड़ेदान में फेंक दिया करते थे.     
चूँकि कारोबार और सम्पादकीय के बीच का रिश्ता धुंधला पड़ चुका है, इसलिये स्वतंत्र अभिव्यक्ति सीमित होती जा रही हैं और रोजबरोज होने वाली दखलअंदाजी बढ़ती जा रही है. यह एक खुला रहस्य है कि प्रबंधन या कारोबारी पक्ष अपने आर्थिक और राजनैतिक हितों के अनुसार एक विशेष लाइन निर्धारित करता है. यह ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है कि बहुत से मालिक राज्य सभा के वर्तमान सदस्य हैं बल्कि यह तथ्य ज्यादा महत्वपूर्ण है कि वे कृपादृष्टि पाने के लिये राजनैतिक पार्टियों से संबंध बढ़ाते हैं. 
पार्टियों या संरक्षकों के प्रति उनका आभार और उनकी निकटता अख़बारों के स्तंभों में प्रतिबिम्बित होती है. यही संबंध अब खुद को “पैसा लेकर छापी गयी ख़बरों” में तब्दील कर चुके हैं. ख़बरों को इस ढंग से लिखने की माँग की जाती है जिससे एक व्यक्ति विशेष या खास दृष्टिकोण को समाचार स्तंभों में व्यक्त किया जा सके. पाठक कभी-कभी ही पकड़ पाते हैं कि कब सूचनाओं में प्रोपगैंडा घुसा दिया जाता है या कब समाचार स्तंभों की विषय वस्तु में विज्ञापनों को ठूँस दिया जाता है.  
इसलिये, अब वक्त आ गया है कि अख़बारों, टेलीविजन और रेडियो के सभी पहलुओं की जाँच-पड़ताल करने के लिये एक मीडिया आयोग की स्थापना की जानी चाहिये. 1977 में जब आखिरी प्रेस आयोग नियुक्त किया गया था, तब उसमें टेलीविजन शामिल नहीं था, क्योंकि उस वक्त भारत में इसका अस्तित्व नहीं था. दूसरी चीजों के अतिरिक्त, मीडिया के सभी पहलुओं की जाँच-पड़ताल होनी चाहिये, मालिकों और संपादकों, पत्रकारों और मालिकों के बीच के संबंधों की जाँच होनी चाहिये, जिन्होंने वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट (कार्यरत पत्रकार कानून) की आड़ में ठेका व्यवस्था लागू की. साथ ही, टीवी और मुद्रित ससमाचार माध्यम के बीच संयोजन की भी जाँच होनी चाहिये. आज कोई भी अखबार किसी टेलीविजन चैनल या रेडियो का मालिक हो सकता है. एक ही घराने द्वारा परस्पर विरोधी मीडिया का  स्वामित्व हासिल करने पर कोई रोंक नहीं है. एकाधिकारी संघों को बढ़ावा मिलता है जो अंततः प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है.     
सत्ताधारी पार्टी, कुछ ऐसे कारणों से जिनके बारे में उसे ही पता होगा, मीडिया आयोग की नियुक्ति नहीं करना चाहता. क्या ऐसा जैन बंधुओं के प्रभाव के कारण है जिन्हें बहुत से सवालों का जवाब देना होगा? जैन बंधुओं को यह समझना होगा कि एक लेखक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार इसलिये दिया गया था ताकि वह बिना किसी भय या पक्षपात के कुछ भी कह सके. अगर मालिक ही यह तय करने लगे कि कर्मचारी क्या कहेंगे तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है. लोकतंत्र में, जहाँ स्वतंत्र सूचनायें स्वतंत्र प्रतिक्रियाओं को बढ़ावा देती हैं, वहाँ प्रेस को कुछ लोगों की सनक पर नहीं छोड़ा जा सकता. प्रतिबंधित प्रेस, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी को नष्ट कर सकता है. 
(लेखक, कुलदीप नैयर ब्रिटेन में भारतीय उच्चायुक्त और राज्य सभा के सदस्य रह चुके हैं. मूल अंग्रेजी लेख गल्फ न्यूज से आभार सहित लिया गया. अनुवाद- दिनेश पोसवाल)
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पेशा चुनने के बारे में सलाह

-जोर्ज मोनबियट
(जार्ज मोनबियट पेशे से पत्रकार. पर्यावरणविद, लेखक और सक्रिय कार्यकर्ता हैं. इस लेख में हालाँकि उन्होंने पत्रकारिता की पढाई करने वाले विद्यार्थियों को ध्यान में रखते हुए पेशे के चुनाव पर अपने सुझाव दिए हैं, लेकिन यह लेख किसी भी नौजवान को अपनी जिंदगी का लक्ष्य और आदर्श तय करने में सही परिप्रेक्ष्य अपनाने में मददगार हो सकता है. यह लेख आभार सहित उनके वेबसाईट  http://www.monbiot.com से लिया गया है और इसका अनुवाद दिनेश पोशवाल ने किया है.)
            हर सप्ताह, कभी-कभी हर दिन, कोई न कोई व्यक्ति मुझसे यह सलाह लेने के लिए लिखता है कि वे अपने लिए किस पेशे का चुनाव करें. बदकिस्मती से, मैं सभी को जवाब नहीं दे सकता, इसलिए मैंने सोचा कि मुझे कुछ सामान्य दिशानिर्देश तैयार करने का प्रयास करना चाहिए, जिन्हें मैं आशा करता हूँ कि लोग अपने हालात के अनुसार थोड़ा फेर-बदल करके  इस्तेमाल करने में सक्षम होंगे. यह सलाह सिर्फ उन लोगों पर लागू होती है जिनके पास अपने पेशे के लिए वास्तविक विकल्प हैं, अफसोस इस बात का है कि यह बात दुनिया की बहुसंख्य आबादी,जिनके पास रोजगार के अवसर नहीं हैं, उन पर लागू नहीं होती. परन्तु जो लोग मुझे लिखते हैं, उनके पास अगर विकल्प नहीं होते, तो वे मुझसे यह प्रश्न भी नहीं पूछ रहे होते.
            हालांकि ये दिशानिर्देश दूसरे पेशों में काम करने वाले लोगों पर भी लागू हो सकते हैं, पर जो उदाहरण मैं इस्तेमाल करूँगा वे पत्रकारिता के पेशे से सम्बंधित होंगे, यह मानते हुए कि जिन लोगों से मैं मुखातिब हूँ, वे पत्रकार बनने के इच्छुक हैं, क्योंकि मैंने अपना ज्यादातर काम इसी क्षेत्र में किया है. इससे पहले कि आप मेरी सलाह पर अमल करें, मैं आपको इस बात से आगाह कर देना चाहूँगा कि आप सिर्फ मेरे शब्दों पर ही निर्भर ना रहें. मैं इस बात की गारंटी नहीं कर सकता कि यह रास्ता आपको कामयाबी दिलायेगा. आपको जितने ज्यादा से ज्यादा लोगों से संभव हो, सलाह लेनी चाहिए. आख़िरकार आपको अपने बारे में खुद ही निर्णय करना चाहिए मुझे या किसी और को आपके बारे में निर्णय लेने की इज़ाज़त दें.
            पहली सलाह जो मैं देना चाहूँगा वह यह कि आपका कालेज पेशे के चुनाव के बारे में जो सलाह देता है उसके प्रति सजग रहें. उदाहरण के लिये, पत्रकारिता स्कूल में विद्यार्थियों को सामान्यतः यह निर्देश दिया जाता है कि भले ही वे दक्षिणी अमेरिका में विकास के मुद्दों पर लिखने की इच्छा रखते हैं, पर इसके लिए आवश्यक योग्यता और अनुभव हासिल करने के लिए पहले कम से कम तीन साल उन्हें स्थानीय अखबार में काम करना चाहिए, इससे पहले कि वे राष्ट्रीय स्तर के अखबार में काम की तलाश करें, इससे पहले कि वे उस मौके को हासिल करने का प्रयास करें जो उन्हें उस कार्यक्षेत्र के निकट ला सके जिसमे वे प्रवेश करना चाहते हैं. दूसरे शब्दों में, आपको उस दिशा से विपरीत दिशा में यात्रा करने कि सलाह दी जा रही है जिधर आप जाना चाहते हैं. आप दक्षिणी अमेरिका जाना चाहते हैं? तो पहले आपको नानइटन जाना चाहिए. आप ज़पतिस्तास के बारे में लिखना चाहते हैं? तो पहले आपको कारपोरेट प्रेस रिलीज को ख़बरों में तब्दील करना सीख लेना चाहिए. आप आज़ाद होना चाहते हैं? तो पहले आप कैदी होना सीख लें.
            सलाहकार कहते हैं कि यदि आप विशेषज्ञता के जाल में नहीं फँसना चाहते, यानी आप रोजगार बाज़ार की बदलती माँगों के हिसाब से खुद को ढलने के लिए एक हद तक लचीला रहना चाहते हैं तो पेशे के लिए यही रास्ता अपनाना जरूरी है. परन्तु सच्चाई यह है कि जो रास्ता वे सुझाते हैं उस पर चलकर, आप एक विशेषज्ञ बन जायेंगे उन मूर्खतापूर्ण बातों के दोहराव  में माहिर, जिसे अमीर और ताकतवर लोग खबर समझते हैं. और ऐसा करते हुए कुछ साल बाद, आप किसी और काम के लायक नहीं रह जाते.
            दूसरे शब्दों में, पेशे का यह रास्ता शिक्षाविरोधी है. यह आपको वही सब सिखाता है जो आप करना नहीं चाहते, वही बनाता है जो आप बनना नहीं चाहते. वह एक अनूठा व्यक्ति होगा जो अपने उद्देश्यों और आदर्शों को अक्षुण्ण रखते हुए इस प्रक्रिया से निकल पाए. वास्तव में वह भी एक अनूठा व्यक्ति होगा जो इस प्रक्रिया से बाहर निकल पाए. कॉर्पोरेट और संस्थान, जो आप करना चाहते हैं उसके विपरीत काम आपसे कराना चाहते हैं. वह एक भरोसेमंद औजार चाहते हैं, एक ऐसा व्यक्ति जो सोच सकता है, परन्तु अपने लिए नहीं, बल्कि वह जो संस्था के लिए सोचता हो. आप जिस चीज में आप विश्वास करते हैं उसे कर सकते हैं, लेकिन तभी जब आपका वह विश्वास कारपोरेशन के हितों के साथ मेल खाता हो, और एक बार नहीं, बल्कि लगातार कई सालों तक. (मेरे लिए यह आश्चर्य की बात है कि कैसे इतने सारे लोगों का विश्वास संस्थागत शक्तियों की माँ के अनुरूप ढल जाता है, जब वे उस कम्पनी में एक या दो साल काम कर लेते हैं, भले ही उन कंपनियों की माँ समय के साथ  बदलती ही क्यों न रहें.)
            यहाँ तक की बुद्धिमान, दृढसंकल्प वाले व्यक्ति भी इस दुनिया में लगभग तुरंत ही अपने रास्ते से भटक जाते हैं. वे अपने नियोक्ताओं की माँग को पूरा करने और जिस प्रतिकूल दुनिया में उन्हें धकेल दिया गया है वहाँ अपना अस्तित्व बचाए रखने में इतना व्यस्त हो जाते हैं कि  अपने पेशे में जिस रास्ते पर वे वास्तव में चलना चाहते हैं उसका विकास कर सकें, इसके लिए उनके पास पर्याप्त समय या ऊर्जा शेष नहीं रह जाता. लेकिन यह रास्ता अपने आप ही नहीं बन सकता, आपको उस रास्ते का विकास करना पड़ता है. यह विचार एकदम मजाकिया है और  अक्सर अपनी नौकरी के प्रति असहज महसूस करने वाले, उन नव-नियुक्त लोगों द्वारा व्यक्त किया जाता है  कि उनहोंने जिस संस्थान को  चुना है उसे वे अंदर रहकर काम करते हुए सुधार देंगे, ताकि वह उनके विश्वास और नैतिक मूल्यों को प्रतिबिम्बित कर सके. कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी के बारे में हालिया बकवास के बावजूद, कार्पोरेशन अपने कर्मचारियों की अंतरात्मा पर नहीं, सिर्फ बाज़ार और अपने शेयरधारकों की माँ के अनुरूप काम करते हैं. यहाँ तक कि मुख्य कार्यकारी अधिकारी भी सिर्फ हाशिये पर ही कुछ प्रभाव डाल सकता है जिस क्षण भी उसकी अंतरात्मा उसकी कम्पनी के समझौता-विहीन उद्देश्यों, यानी मुनाफा पैदा करने और उसके शेयर की कीमत बढ़ाने में  बाधा डालती है, उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है.     
            इसका मतलब यह नहीं कि संस्थागत दुनिया में ऐसे अवसर ही नहीं है की आप अपने विश्वास का अनुसरण कर सकें. कुछ हैं, हालांकि वे आमतौर पर मुख्यधारा से बाहर हैं विशेष कार्यक्रम और पत्रिकायें, विशेष समाचार पत्रों के कुछ संभाग, छोटे पैमाने का उत्पादन करने वाली कम्पनियाँ जिनके प्रबंधकों ने अपने स्तर को बनाये रखा है. इस तरह की जगहों में नौकरियाँ दुर्लभ हैं, लेकिन अगर आपको ऐसी कोई नौकरी दिखायी देती है, तो पूरी ताकत और जिद के साथ उसे पाने का प्रयास करें. अगर नौकरी हासिल करने के बाद आपको ऐसा लगता है कि यह वैसी नहीं है जैसी प्रतीत होती थी या आपको ऐसा महसूस होता है कि आप लगातार उस काम से दूर जा रहे हैं जो आप करना चाहते हैं, तो उसे छोड़ने में जरा भी हिचकिचाहट ना दिखायें.   
            इसका मतलब यह नहीं कि आपको उन संस्थानों में काम का अनुभव नहीं लेना चाहिए, जिनके विश्व दृष्टिकोण को आप स्वीकार नहीं कर सकते, लेकिन तभी, जब ऐसा अवसर मिले और वहाँ उस तरह का जरूरी हुनर हासिल करने का मौका हो जो आप उनके खर्चे पर सीख सकें. लेकिन आपको इस प्रशिक्षण की सीमाओं के बारे में एकदम स्पष्ट सोच बनाये रखनी चाहिए, और उसी क्षण आपको वहाँ से बाहर जाना चाहिए जब आप वह सीख चुके हों जिसे आप सीखना चाहते हैं (सामान्यतः कुछ ही महीनों के बाद) और जब कम्पनी आप से ज्यादा फायदा उठाने लगे बजाय इसके की आप वहाँ काम करने का फायदा उठा सकें. जाने कितनी बार कार्पोरेशंस के लिए काम शुरू करने को तैयार विद्यार्थियों को मैंने यह दावा करते सुना है कि वे वहाँ पैसा कमाने  नहीं जा रहे हैं, वे वहाँ सिर्फ दो या तीन साल काम करेंगे, उसके बाद वह नौकरी छोड़ देंगे और फिर अपनी पसंद के पेशे का अनुसरण करेंगे? ना जाने कितनी बार मैं ऐसे लोगों से मिला वर्षों बाद मिला और पाया कि उन्होंने अपनी तनख्वाह के अनुरूप एक जीवनशैली, एक कार, एक ऋण हासिल कर लिया है, और उनके शुरूआती आदर्श धुंधली यादों की तरह मद्धिम पड़ गये हैं, जिन्हें अब वे नौजवानी की कल्पनायें कहकर खारिज कर देते हैं? ना जाने कितनी बार मैंने आज़ाद लोगों को अपनी आज़ादी कुर्बान करते देखा है?
            इस तरह पेशे के चुनाव को लेकर मेरी दूसरी सलाह बेंजामिन फ्रेंकलिन द्वारा दी गयी राजनैतिक सलाह की प्रतिध्वनि है जब कभी आपको आज़ादी और सुरक्षा के बीच चुनाव करना पड़े, तो आप आज़ादी को चुनें. वरना अन्त में आपके पास दोनों में से एक भी नहीं होगी. वे लोग जो एक सुरक्षित नौकरी और निश्चित तनख्वाह के वायदे पर अपनी आत्मा बेच देते हैं, जैसे ही वे लोग गैरजरूरी हो जाते हैं, उन्हें तुरंत ही बाहर फेंक दिया जाता है. आप किसी संस्थान के प्रति जितने ज्यादा वफादार होंगे, आप उतने ही ज्यादा शोषित, और आखिरकार बलि चढ़ाने के लायक बन जायेंगे.               
            निश्चय ही, इसका अभिप्राय यह नहीं है कि जो आप करना चाहते हैं उसे सीधे करना शुरू कर देंगे और आप उतना मेहनताना पाने लगेगें जितना आप चाहते हैं. लेकिन इसके लिए तीन संभावित तरीके हैं जिनकी मैं सलाह दूँगा.
            सबसे पहले आप यह तय करें कि आप आगे बढ़ना कैसे जारी रख सकेंगे. शुरूआत में कुछ समय के लिये खुद  ही आर्थिक प्रबंध करना संभव नहीं होगा, इसलिए आपको कुछ अतिरिक्त काम की आवश्यकता होगी ताकि आप जिन्दा रहने के लिए जरूरी धन जुटा सकें, परन्तु ऐसा काम जो बहुत ज्यादा मानसिक ऊर्जा की माँग करता हो. अगर आप मैक्सिको में ज़पतिस्तास के बारे में लिखना चाहते हैं, तो पहले आप वहाँ जाने के लिए जरूरी पैसा कमायें, और उनके बारे में लिखना शुरू कर दें. अगर आप चाहते हैं कि आपको उसकी उचित कीमत मिले, तो आपको अपने काम के प्रति उत्साही होना होगा. आपको अपनी ख़बरों के लिये, जो आप वहाँ से जुटाएंगे, उसके लिए सभी संभव बाज़ारों की छानबीन करनी होगी पत्रिकायें, अखबार, रेडियो, टेलीविजन, वेबसाइटस और प्रकाशक.
            वहाँ जाने से पहले आप जिन ख़बरों पर लिखना चाहते हैं, उसका स्पष्ट दृष्टिकोण होना चाहिए, बेहद सावधानी से इसकी योजना बनायें और इस मुद्दे पर जानकारी रखने वाले जितने ज्यादा लोगों से संभव हों, उनसे सम्पर्क बनायें. परन्तु उसी समय आपको उन खबरों के लिए भी तैयार रहना चाहिए जिनकी आपने अपेक्षा नहीं की थी, जिन्हें शायद किसी अनपेक्षित जगह स्थान मिल जाये. उदाहरण के लिये, वहाँ रहते हुए आपको वन्यजीवन पर एक खबर मिलती है, तो वन्यजीवन पत्रिका के लिए लेख लिखकर आप अपनी यात्रा के लिए धन जुटा सकते हैं. आप एक यात्रा वृतांत लिखकर या किसी वास्तुकलासम्बन्धी पत्रिका के लिए कुछ लिखकर या खाद्यान्न योजना के बारे में लिखकर कुछ अतिरिक्त धन जुटा सकते हैं. कभीकभी संपादक लीक से अलग सामग्री पाकर बेहद प्रसन्न होते हैं (हालाँकि वे ज्यादातर इसे समझ नहीं पाते). आप जितने ज्यादा संभव हो उतने संचार माध्यमों के लिए काम करें, और निरंतर डटे रहें.
            आप न्यूनतम संभव खर्चे में सफर करने और रहने के लिए तैयार रहें एक स्वतंत्र काम करने वाले के तौर पर अपने पहले चार सालों में मैंने अपने जीवनयापन पर औसतन पांच हज़ार पाउंड प्रतिवर्ष खर्च किये. गरीब दुनिया में सात साल काम करते हुए, मैं अपने खर्चे तीन हज़ार पाउंड प्रतिवर्ष तक कम रखने में सफल हो सका. एक स्वतंत्र काम करने वाले के लिए यह एक अच्छा अनुशासन है, भले ही आप कितना ही बेहतर कमा रहे हों. अगर आप पाँच हज़ार पाउंड प्रतिवर्ष पर रह सकते हैं, तो आप उससे छह गुणा ज्यादा सुरक्षित हैं जिसे जीने के लिए तीस हज़ार पाउंड की जरुरत है. इस सबके बावजूद, ब्रिटेन में विद्यार्थियों पर कर्जे के चलते किफायती जीवन की संभावनायें काफी हद तक धूमिल हो चुकी हैं बहुत से लोग जो काम ढूँढ रहे हैं वे पहले ही कर्जे के बोझ तले दबे हैं.
            कठिन मेहनत करें, पर जल्दबाजी ना करें. धीमेधीमे और नियमित रूप से अपना नाम स्थापित करें. और पत्रकारिता स्कूल चाहे कुछ भी कहे, अगर आप विशेषज्ञता का बुद्धिमानी से इस्तेमाल करें, तो वह आपको फांसने वाला जाल नहीं है, बल्कि जाल से बचकर निकलने का जरिया है. आप वह व्यक्ति बन सकते हैं जिसके बारे में संपादक तब सोचते हैं जब उन्हें किसी विशेष मुद्दे को किसी विशेष दृष्टिकोण से कवर करने की जरुरत होती है (जो कि वास्तव में, आपका दृष्टिकोण है). तब वे आपके विश्व नजरिये को प्राथमिकता देते हैं, कि आप उनके नजरिये को. यह आश्चर्यजनक है कि आप कितनी तेजी से एक विशेष कार्यक्षेत्र में विशेषज्ञ बन जाते हैं क्योंकि दूसरे बहुत थोड़े से पत्रकार ही उस विषय के बारे में कुछ भी जानते हैं. आपको अवसर हासिल होंगे, और मौके खुद ही आपको ढूँढ लेंगे.  

     दूसरा संभव रास्ता इस प्रकार है जो काम आप करना चाहते हैं, अगर शुरुआत में उसके लिए बाजार में घुसना कठिन लगता है, तो आप उस मुद्दे के साथ दूसरी तरह से जुड़ें. उदाहरण के लिये, अगर आप बेघरों के बारे में लिखना चाहते हैं (विकसित समाजों का एक बेहद कम प्रकाशित किया जाने वाला मुद्दा), तो यह आसान होगा कि आप एक ऐसे संगठन के साथ काम करें जो बेघरों की मदद करने का प्रयास करता है. उस मुद्दे को सीखते हुए अपना काम सीखें, और धीरेधीरे पत्रकारिता की ओर बढ़े. हालाँकि यह आपको अपने आदर्शों से एक या दो कदम दूर ले जायेगा, फिर भी आप उन लोगों के साथ काम कर सकेंगे जो उस मुद्दे का अनुभव करते हैं जिसमें आपकी दिलचस्पी है, बजाय इसके कि आप कॉर्पोरेट अखबार के दफ्तर में ऐसे तटस्थ आदमियों और महिलाओं के साथ काम करें जो स्वयं ही अपने सपनों को खो चुके हैं, और जो वास्तविक दुनिया के बारे में उतना ही कम जानते हैं जितना उन्हें पेशे की सलाह देने वाले, जिन्होंने वास्तव में इस नौकरी को हासिल करने में उनकी मदद की थी.            
            तीसरा रास्ता कठिन है, परन्तु यह उतना ही सही है. इसका अनुसरण उन लोगों ने किया है जिन्होंने मुख्यधारा के कर्मचारियों के साथ किसी भी तरह के काम की सीमाओं को समझ लिया है, और जिन्होंने अपने काम के लिए खुद ही रास्ते निकाले हैं. ज्यादातर देशों में कुछ वैकल्पिक अखबार और प्रसारक हैं, जो उन लोगों के द्वारा स्वेच्छापूर्वक चलाये जाते हैं जो अपनी जीविका के लिए खर्चा किसी तरीके से कमाते हैं. कुल मिलाकर, ये जबरदस्त साहसी ओर पक्के इरादे वाले लोग हैं, जिन्होंने अपने विश्वास को अपने आराम से ऊपर रखा है. ऐसे लोगों के साथ काम करना सिर्फ एक साधारण वजह से, सौभाग्यशाली और प्रेरणादायक हो सकता है, क्योंकि वेऔर इस तरह से आप भीआज़ाद हैं जबकि दूसरे आज़ाद नहीं हैं. दुनिया का सारा पैसा, और सारी प्रतिष्ठा, कभी भी आज़ादी के नुकसान की भरपाई नहीं कर सकते.    
            इस प्रकार मेरी आखिरी सलाह यह है- जब भी हकीकत के साथ जुड़ने या जिसे एरिक फ्राम धनदौलत और सत्ता की शवकामुक दुनिया कहते हैं, उससे जुड़ने के विकल्प से आपका सामना हो, तो जीवन को चुनें, उसकी स्पष्ट दिखायी देने वाली कीमत चाहे जितनी भी ज्यादा हो. आपके साथी शुरू में भले ही आपको तुच्छ समझे बेचारी नीना, वह छब्बीस साल की है और उसके पास अब तक कार भी नहीं है. लेकिन वे जिन्होंने धनदौलत और सत्ता को जीवन से ऊपर तरजीह दी है वे मौत की दुनिया में निवास करते हैं, जहाँ जिन्दा लोग अपनी कब्र पर लगाये जाने वाले स्मारक पत्थरों (उनके फ्रेम में जड़े हुए प्रमाणपत्र जो उस दुनिया में उनकी स्वीकार्यता को दर्शाते हैं) को अपनी दीवारों पर लगते हैं. याद रखिये कि टाइम्स का संपादक भी अपनी सारी कमाई और प्रतिष्ठा के बावजूद, मात्र एक ओहदेदार है, जिसे हर बात पर अपने अधिकारी से आदेश लेने होते हैं. उसके पास हम लोगों से कम आज़ादी है, भले ही आज टाइम्स का संपादक होने से बेहतर कुछ नहीं.
            आप जानते हैं कि आपके पास सिर्फ एक ही जीवन है. आप जानते हैं कि यह बहुमूल्य, असाधारण, और दुबारा हासिल नहीं होने वाली शै है यह अरबों साल की अकस्मात खोजों और क्रमिक विकास का नतीजा है. फिर हम इसे जिन्दा लाशों के हाथ सौंपकर बरबाद क्यों करें
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