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किसका है यह विदेशी हाथ

जनसत्ता 5 मार्च, 2012: प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने परमाणु-विरोधी आंदोलनों के खिलाफ खुली जंग छेड़ दी है। पिछले दिनों जीन-संशोधित खाद्य पदार्थों और परमाणु बिजलीघरों के खिलाफ चल रहे जन-आंदोलनों को उन्होंने देश के विकास में बाधक बताया और यह भी कहा कि इन आंदोलनों  के पीछे ‘बाहरी ताकतों का हाथ’ है। 

कम-से-कम इस बार हम अपने प्रधानमंत्री से पूरी तरह सहमत हो सकते हैं। 

इस मामले में यह समझना जरूरी है परमाणु-विरोधी आंदोलन दरअसल मौजूदा व्यवस्था के बाहर से आती हुई एक आवाज है, जिसका राजनीतिक, सामाजिक और नैतिक धरातल मनमोहन सिंह के खयालों के इंडिया से बिल्कुल अलग है।

कुडनकुलम के अनपढ़ मछुआरे अगर आवारा पूंजी के कायदों पर आधारित मनमोहन सिंह के भारत में शामिल हो जाएं तो उनकी रोजगार गारंटी योजना में जितना कमाएंगे, आज वे उसका लगभग तीन गुना प्रतिदिन कमाते हैं। इस आंदोलन के सहारे दरअसल एक टिकाऊ सामुदायिक जीवन नवउदारवादी भारत का हिस्सा बनने से मना कर रहा है। यह सब न सिर्फ मनमोहन सिंह के लिए बाहरी है, बल्कि अंतत: उस अर्थशास्त्र के खिलाफ जाता है जिसकी बुनियाद पर हमारे प्रधानमंत्री खडे हैं। 

पिछले साल जैतापुर में तीखे जन-विरोध के बाद लोगों को ‘विश्वास में लेने’ और ‘जागरूक करने’ जैसे नारों के साथ स्थानीय कमिश्नर जब विशालकाय फौज-फाटे के साथ माडबन गांव पहुंचे तो पूरे गांव ने उनकी इस बैठक का बहिष्कार किया। सिर्फ एक बूढ़ी महिला चौक तक आई और उसने अधिकारियों से पूछा- ‘‘बेटा तुम बात करने आए हो तो इतनी बड़ी बटालियन और बंदूकों के साथ क्यों आए हो? तुमको डर किससे लग रहा है?’’ ऐसी निडरता और यह नैतिक गरिमा जाहिर तौर पर मनमोहन सिंह की चौहद्दी से बाहर है। 

हरियाणा के फतेहाबाद जिले में गोरखपुर परमाणु संयंत्र के लिए किसानों को दी जा रही मुआवजा राशि को कई बार बढ़ा कर अब चौंतीस लाख रुपए प्रति एकड़ कर दिया गया है। गोरखपुर और उसके आसपास के गांवों के किसान पिछले दो साल से फतेहाबाद के मिनी सचिवालय पर धरने पर बैठे हैं और जाड़ा-गरमी-बरसात में लगातार इस धरने पर बैठे रहने से तीन किसान अब तक जान गंवा चुके हैं।
  
हरियाणा में इस संयंत्र की योजना बनाने के पीछे सरकार का यही सोच रहा होगा कि इस प्रदेश के किसान अच्छे मुआवजे पर जमीन देने से नहीं कतराते। लेकिन इस महीने हजारों की तादाद में लोग फतेहाबाद में इकट्ठा हुए और उन्होंने अपनी सेहत, सुरक्षा, जीविका और गरिमा की कीमत पर करोड़ों का मुआवजा लेने और जमीन देने से मना कर दिया। हरियाणा के किसानों का यह सरोकार उन लोगों के लिए बाहरी अजूबा ही है जिनकी हसरतों के मुल्क में हर शय बिकाऊ है। 

कुडनकुलम आंदोलन के नेता डॉ एसपी उदयकुमार ने न सिर्फ प्रधानमंत्री पर मानहानि का मुकदमा दायर किया है और मनगढ़ंत आरोपों के लिए माफी मांगने की मांग है, बल्कि उन्होंने इस बात पर हैरानी भी जताई है कि हमारे नीति-निर्माताओं के सोच से यह बात ओझल कैसे हो गई है कि गांधी के इस देश में पूरा आजादी का आंदोलन छोटे-छोटे चंदों और भागीदारियों से लड़ा और जीता गया। सरकारें, कंपनियां और मीडिया तक, अब सिर्फ पैसे की भाषा समझते हैं। डॉ उदयकुमार ने आंदोलन के पूरे खर्च का ब्योरा सार्वजनिक किया है, जिससे पता चलता है कि मछुआरे, किसान और इलाके के आमलोग अपनी कमाई का एक हिस्सा पिछले कई महीनों से आंदोलन को दे रहे हैं। लोगों के आम सहयोग से चल रहे इस संघर्ष में सबकुछ साझा किया जाता है और नकद की जरूरत ही बहुत कम होती है।  

देश की जमीनी सच्चाइयों से सरकार का इस कदर कट जाना, हमारे समाज और लोकतंत्र के लिए बहुत खतरनाक है। मीडिया और सरकार को तब परमाणु मामले में विदेशी हाथ नजर नहीं आता जब हिलेरी क्लिंटन यह धमकी देती हैं कि अमेरिका भारतीय संसद में पारित परमाणु दायित्व कानून को नहीं मानेगा और उसकी कंपनियों को हादसे की हालत में पूरी तरह मुक्त रखना होगा। परमाणु करार पर संसद में बहस के वक्त अमेरिकी दूतावास के अधिकारी न सिर्फ खुलेआम अलग-अलग पार्टियों के नेताओं से मिल कर ‘सहमति’ बना रहे थे, बल्कि सांसदों को पैसा पहुंचाने में भी उनका नाम आया था। तब मनमोहन सिंह को विदेशी हाथ नहीं दिखा। लेकिन जापान के फुकुशिमा, रूस के चेरनोबिल और अमेरिका के थ्री-माइल आइलैंड में भीषण परमाणु दुर्घटना झेल चुके लोगों से जब कोई सीखने की बात कहता है तो वह विदेशी हो जाता है। वह भी तब जब इसमें बाहर से पैसा आने जैसी बात पूरी तरह मनगढ़ंत हो। 

कुडनकुलम में रूस-निर्मितरिएक्टर का विरोध करने वाले अगर अमेरिकी पैसे से संचालित हैं तो सरकार इस बात का जवाब क्यों नहीं देती कि फिर यही लोग गुजरात और आंध्र में अमेरिकी रिएक्टरों का, जैतापुर में फ्रांस के रिएक्टरों का और हरियाणा, मध्यप्रदेश में लग रहे देशी रिएक्टरों का भी तो विरोध कर रहे हैं। अभी बिजली की हमारी कुल खपत का सिर्फ ढाई प्रतिशत परमाणु ऊर्जा से आता है जिसे अगले तीस सालों में छह से सात प्रतिशत बढ़ाने की योजना है, जबकि अभी ही नवीकरणीय ऊर्जा हमें दस प्रतिशत से ज्यादा बिजली देती है। पिछले कुछ सालों में अक्षय ऊर्जा की तकनीक उन्नत हुई है, इसके दाम भी काफी कम हुए हैं। इसके उलट, परमाणु ऊर्जा न सिर्फ हर हाल में असुरक्षित है,   बल्कि इसकी लागत भी कई गुना ज्यादा है। 

अमेरिका और यूरोप में परमाणु उद्योग पिछले तीस सालों से मंदी का शिकार रहा है और वहां निजी पूंजी इसके कारोबार से कन्नी काट लेती है। पूरी दुनिया में बिना सरकारी मदद और सबसिडी के अणुऊर्जा उत्पादन असंभव है। खुद विश्व बैंक से लेकर बड़ी-बड़ी बीमा कंपनियां भी परमाणु उद्योग को प्रोत्साहित नहीं करतीं। ऐसे में, फुकुशिमा के बाद अगर परमाणु ऊर्जा क्षमता का विस्तार सिर्फ भारत और चीन में होता दिख रहा है, तो इसका कारण यही है कि इन देशों की सरकारें वैसे भी आमलोगों की मेहनत से जमा सरकारी पूंजी बेतहाशा विकास के नाम पर निजी हाथों में लुटाती हैं। देश के संसाधनों को ऐसे ही औने-पौने दाम पर बेचने के मामले 2-जी से लेकर खनन माफिया तक जुड़ते हैं। 

लेकिन हमारे देश में असली गुनहगारों के बजाय मासूमों को निशाना बनाया जाता है। इस हफ्ते कुडनकुलम के नजदीक स्थित नागरकोयल शहर से रेनर नाम के एक जर्मन पर्यटक को रातोंरात देश से बाहर निकाल दिया गया और अगले कई दिनों तक सरकार और मीडिया हमें यह बताते रहे कि इस व्यक्ति ने आंदोलन को पांच सौ करोड़ रुपए की मदद की। रेनर यूरोपीय जिंदगी


 से थके एक अधेड़ फक्कड़ घुमक्कड़ हैं, जो पिछले चार साल से इस इलाके में आते रहे हैं। सस्ते होटलों में ठहर कर प्रकृति और भारतीय सामुदायिक जीवन का अध्ययन उनका शगल है और पांच सौ करोड़ रुपए उनकी पहुंच से बाहर की बात है। कुडनकुलम आंदोलन ने यह मांग की है कि अगर सरकार को अपनी बात का इतना भरोसा है तो रेनर को आनन-फानन में भगाने के बजाय उन पर मुकदमा क्यों नहीं चलाया गया? 

दरअसल, कुडनकुलम आंदोलन पूरी तरह पारदर्शी और अहिंसक है और सरकार उसे किसी तरह घेर नहीं पा रही है। ऐसी ही कोशिशों में कुडनकुलम में एनजीओ और चर्च की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए, लेकिन इनसे आंदोलन न कभी संचालित होता था न इस सबसे कमजोर हुआ। कुडनकुलम के मछुआरे संयोगवश ज्यादातर ईसाई हैं और जब एक पूरा इलाका आंदोलनरत होगा तो उस आबादी का हिस्सा रही सामाजिक-धार्मिक संस्थाएं भी उसमें स्वत: शामिल हो जाती हैं। लेकिन इसकी आड़ में आंदोलन को चर्च और विदेश से संचालित बताना असली मुद्दों से कन्नी काटना है। कुडनकुलम के लोग सरकार से कोई मदद पाने के लिए नहीं लड़ रहे, बल्कि सिर्फ इतना कह रहे हैं कि वे खुश हैं और उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाय। ऐसे में, आंदोलन का कोई कमजोर सिरा सरकार की पकड़ में नहीं आ रहा है। इस मायने में परमाणु-विरोधी आंदोलन बिल्कुल अलग है कि इसने विकास की मौजूदा तर्कपद्धति पर सबसे तीखा हमला किया है और जहां मजदूर आंदोलन ताकतवर होने के बावजूद मौजूदा व्यवस्था की भाषा में ही बात करता है और अपने लिए अधिकारों की मांग करता है, इस आंदोलन का तार्किक धरातल बिल्कुल स्वायत्त है। यह आवाज उस जगह से आ रही है जिसे हम विकास की होड़ में कहीं पीछे छोड़ आए हैं, जहां हमारा भविष्य भी जुड़ा हुआ है अगर हमें एक कौम के बतौर जिंदा रहना है। 

सरकार कुडनकुलम मामले में पूरी तरहइकतरफा और अलोकतांत्रिक रही है। दो दशक से निर्माणाधीन इस परियोजना को लेकर स्वतंत्र विशेषज्ञों ने शुरू से सवाल उठाए हैं। 1989 में ही पर्यावरणीय जांच के बिना परियोजना शुरू करने पर लोग हजारों की संख्या में कन्याकुमारी में गोलबंद हुए थे, जिन पर गोलियां भी चली थीं। आंदोलन के हालिया दौर में भी, सरकार ने एक तरफ तो लोगों से बातचीत के लिए एक विशेषज्ञ टीम बनाई लेकिन दूसरी तरफ आंदोलन के नेताओं पर देशद्रोह जैसे संगीन और झूठे मुकदमे थोपना जारी रखा। 

वार्ता के आखिरी दौर में जब आंदोलन के प्रतिनिधि (जिनमें महिलाएं भी थीं) सरकारी विशषज्ञों से बातचीत करने जा रहे थे, तो उन पर कांग्रेसी और भगवा गुंडों ने हमला कर दिया। सरकार के साथ इस बातचीत के लिए आंदोलन के लोगों ने परमाणु, पर्यावरण और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों से जुडेÞ बीस से ज्यादा स्वतंत्र विशेषज्ञों की एक टीम बनाई थी और यह मांग की थी कि आंदोलन की तरफ से उन्हें तर्क रखने का मौका दिया जाए। लेकिन सरकार ने एक तरफ तो यह मांग नहीं मानी और फिर जब लोगों ने यह कहा कि संयंत्र की सुरक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरणीय प्रभावों आदि से जुड़ी जानकारी और दस्तावेज उन्हें उपलब्ध कराए जाएं जिससे आंदोलनरत लोग तैयारी के साथ बहस कर सकें, तो सरकार ने साफ मना कर दिया। इसके बाद अपनी मनचाही समिति की रिपोर्ट, जिसमें सभी महत्त्वपूर्ण सवालों से किनारा कर लिया गया है, को केंद्र सरकार आम-सहमति के दस्तावेज के रूप में दिखाती फिर रही है! 

दिसंबर के अपने रूस दौरे में प्रधानमंत्री ने यहां तक कहा कि सरकार ने लोगों को बातचीत में जरूरत से ज्यादा जगह दे दी है और जल्दी ही रिएक्टर चालू कर दिया जाएगा। इसके बावजूद जमीनी आंदोलन लगातार तेज हुआ है और एक पूरा समुदाय अपने अस्तित्व के लिए आखिरी लड़ाई लड़ रहा है। कुछ हफ्तों में तमिलनाडु में जान-बूझ कर बिजली की ज्यादा कटौती की जा रही है और मीडिया में इसकी जिम्मेवारी अणु-विरोधी आंदोलन पर थोप कर उसे बदनाम किया जा रहा है। जबकि सचाई यह है कि कुडनकुलम में अगर दोनों रिएक्टर चालू हो जाएं तब भी तमिलनाडु के हिस्से सिर्फ चार सौ मेगावाट तक बिजली आएगी, जबकि इसी राज्य में अगर सारे मौजूदा बल्ब सीएफएल से बदल दिए जाएं तो साढ़े पांच सौ   मेगावाट बिजली बचाई जा सकती है और अगर पूरी सबसिडी दी जाए तब भी इसका खर्च परमाणु रिएक्टर से बहुत कम बैठता है।

जनसत्ता से आभार सहित.
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नाभिकीय ऊर्जा से मुक्त विश्व के लिये योकोहामा घोषणापत्र

11 मार्च 2011 के भूकंप, सुनामी और उसके चलते फुकुशिमा दायची नाभिकीय ऊर्जा सयंत्र में हुई परमाणु दुर्घटना ने जापान के लोगों को भयंकर कष्ट सहने को बाध्य किया है और दुनिया भर में विकिरण से होने वाले प्रदूषण को बढ़ा दिया है. साथ ही इसने परमाणु ऊर्जा से होने वाले दीर्घकालिक स्वास्थ्य, पर्यावरण और आर्थिक खतरों के बारे में दुनिया भर में खतरे की घंटी बजा दी है.

थ्री माइल आइलैंड और चेरनोबिल की तरह ही, फुकुशिमा में होने वाली दुर्घटना ने हमें एक बार फिर याद दिला दिया है कि नाभिकीय तकनीक निर्मम है और इससे होने वाली दुर्घटनाओं को रोका नहीं जा सकता. जैसा कि जापान सरकार ने घोषणा की है, परिस्थिति नियंत्रण में नहीं है. नाभिकीय ऊर्जा सयंत्र की हालत अभी भी डांवांडोल है और कर्मचारी निरंतर खतरनाक जीवन-परिस्थितियों में काम कर रहे हैं.

विकिरण से होने वाला प्रदूषण लगातार फ़ैल रहा है. यह क्षेत्रिय और वैश्विक आपातकाल है. लोगों को या तो अपने बाल-बच्चों के साथ कहीं भागने के लिये मजबूर किया जा रहा है या स्वास्थ्य से जुड़े भयावह खतरों और लंबे समय तक विकिरण से होने वाले जोखिम में जीने को मजबूर किया जा रहा है. फुकुशिमा प्रान्त में, माताओं के दूध और बच्चों के पेशाब में रेडियोधर्मी पदार्थ होने के सबूत मिले हैं. वर्त्तमान पीढ़ी ही नहीं, बल्कि आने वाली नस्लों की जिंदगियां खतरे में हैं. इलाके की अर्थव्यवस्था नष्ट हो चुकी है.
          
नाभिकीय ईंधन की श्रृंखला हर कदम पर ‘हिबाकुशा’ पैदा करती है. इस शब्द का प्रयोग हिरोशिमा और नागासाकी के बमों से बचे लोगों की दुर्दशा बयान करने के लिये किया गया था, लेकिन अब इसका इस्तेमाल विकिरण के शिकार हुए सभी लोगों के लिये किया जाता है. यूरेनियम का खनन, नाभिकीय हथियारों के परीक्षण, नाभिकीय ऊर्जा संयंत्रों में होने वाली दुर्घटनाओं और नाभिकीय कचरे के भण्डारण और परिवहन, इन सारी कार्रवाइयों ने हिबाकुशा पैदा किया है.
   
दुनियाभर में इन हिबाकुशाओं ने गोपनीयता, शर्म और चुप्पी का माहौल तैयार किया है. सूचना का अधिकार, स्वास्थ्य सम्बन्धी रिकार्ड, इलाज और मुआवजा या तो अपर्याप्त हैं, या “राष्ट्रीय सुरक्षा” और पैसे की कमी का बहाना बनाकर नकार दिया गया है. उत्तरदायित्व का यह अभाव सिर्फ जापान तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह एक बुनियादी समस्या है जो सरकारों और नाभिकीय उद्योग के भ्रष्ट संबंधों के चलते नाभकीय उद्योग में हर जगह व्याप्त है.

आज हम एक दोराहे पर खड़े हैं. हमारे पास नाभकीय ईंधन शृंखला से नाता तोडने तथा ऐसे कार्य – कुशल, अक्षय और दीर्घकालिक ऊर्जा की ओर बढ़ने का विकल्प है जो हमारे स्वास्थ्य और पर्यावरण को जोखिम में न डाले. अपनी भावी पीढ़ियों की खातिर ऐसा करना हमारी जिम्मेदारी है. नाभकीय ऊर्जा से नाता तोडने का मामला नाभिकीय हथियारों के उन्मूलन से जुड़ा हुआ है और यह चिरस्थायी विश्वशांति में सहायक होगा.
   
फुकुशिमा के लोगों और नाभिकीय ऊर्जा मुक्त विश्व के लिये योकोहामा वैश्विक सम्मेलन में शामिल लोगों की भावना के प्रति विश्व जनगण की एकजुटता यह दर्शाती है कि जनता की एकता के दम पर  ही वास्तव में हम अपने भविष्य की आधारशिला रखेंगे.  
  
हम आह्वान करते है:

1.      जवाबदेही और जिम्मेदारी सुनिश्चित करना तथा अबतक जनता से सूचनायें छिपाने और परस्पर विरोधी सूचनायें जारी करने के इतिहास को बदलते हुए जनता को सही सूचनायें मुहैया करने के लिये एक स्वतन्त्र निकाय का निर्माण.
    
2.      फुकुशिमा नाभिकीय ऊर्जा सयंत्र दुर्घटना से प्रभावित हुए लोगों के अधिकारों की सुरक्षा उन्हें इस खर्चे में अपना हिस्सा देना चाहिए.

3.      नाभकीय ईंधन शृंखला- यूरेनियम के खनन से कचरा निबटाने तक का क्रमश: उन्मूलन करने और नाभकीय ऊर्जा संयंत्रों को बंद करने के लिए एक विश्वस्तर की मार्गदर्शक योजना. “सुरक्षा का मिथक” ध्वस्त हो चुका है. नाभकीय तकनीक कभी भी सुरक्षित नहीं रहा है और यह कभी भी भारी सरकारी  अनुदान के बगैर नहीं चल पाया है. नवीनीकृत ऊर्जा सही प्रमाणित हुआ है तथा विकेन्द्रीकृत रूप में और स्थानीय स्तर पर यह इस्तेमाल के लिये उपलब्ध है, बशर्ते इसे प्रोत्साहित करने वाली नीतियों के जरिए क्षेत्रिय अर्थव्यवस्थाओं को मदद की जाय, जैसे फीड-इन शुल्क*.

4.      जो जापानी नाभिकीय ऊर्जा केन्द्र अभी बंद हैं, उनको फिर से शुरू न किया जाये. जापान की ऊर्जा जरूरतों को उन नीतियों को अमल में लाकर पूरा किया जा सकता है जिसमें फीड-इन-शुल्क जैसे कानून शामिल हैं जिन्हें स्वीकार कर लिया गया है और साथ ही जिसमें ऊर्जा के वितरण और उत्पादन के मालिकाने का ढ़ाचा अलग-अलग हो.

5.      नाभिकीय ऊर्जा सयंत्रो और उनके संघटकों के निर्यात पर प्रतिबन्ध, खास कर एशिया, मध्य पूर्व, अफ्रीका और यूरोप के औद्योगीकृत देशो में.

6.      ऐसे समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले स्थानीय और नगर निकायों को सहयोग देना जो नाभिकीय ऊर्जा पर निर्भर ना हो. हम समुदायों को मजबूत बनाने, विकेन्द्रीकरण, नीचले स्तर से योजना बनाने तथा आर्थिक, जातीयऔर लैंगिक भेदभाव का अंत करने के लिये स्थानीय और नगरपालिका अधिकारीयों, क्षेत्रीय सांसदों और भद्र समाज के बीच एकजुटता को प्रोत्साहित करते हैं.

7.      फुकुशिमा के नागरिकों के साथ किये गये व्यवहार के विरोध में और नाभिकीय ऊर्जा से मुक्त विश्व की मांग के लिये 11 मार्च 2012 को दुनियाभर में कार्यक्रमों, प्रदर्शनों, विचार गोष्ठियों और मिडिया कार्यकर्मों का आयोजन किया जायेगा.

     

ऊपर दिये गये सिद्धांतों के आधार पर वैश्विक सम्मेलन के भागीदारों ने “नाभिकीय ऊर्जा मुक्त विश्व के लिये कार्यवाहियों के अरण्य” की शुरुआत की, जिसमे ठोस कार्ययोजना शामिल हैं. ये सब संस्तुतियां उपयुक्त रूप में जापानी सरकार, दूसरे देशों की सरकारों, दीर्घकालिक विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (रियो+20) इत्यादि को पेश की जायेंगी.
योकोहामा में नाभकीय ऊर्जा मुक्त विश्व के वैश्विक सम्मेलन में 10,000 लोग शामिल हुए, और 30,000 लोगों ने इसे ऑनलाइन देखा. हम सभी सहभागी फुकुशिमा के समर्थन, वैश्विक हिबाकुशा तंत्र के तहत विकिरण से प्रभावित लोगों की एकजुटता, ईस्ट एशिया नान न्यूक्लियर पॉवर मूवमेंट की स्थापना तथा स्थानीय नगर नेताओं और नगराध्यक्षओं की एकता के लिये एक अन्तरराष्ट्रीय मंच बनाने को प्रतिबद्ध हैं.
15 जनवरी 2012
नाभिकीय ऊर्जा मुक्त विश्व के वैश्विक सम्मेलन में घोषित
योकोहामा, जापान
(इस घोषणापत्र का मसौदा नाभिकीय ऊर्जा मुक्त विश्व के वैश्विक सम्मेलन की आयोजन समिति द्वारा तैयार किया गया और दुनियाभर से आये भागीदारों ने इसका समर्थन किया.)  
* फीड-इन शुल्क – दीर्घकालिक ऊर्जा उपभोग के लिये लगाया जाने वाला शुल्क जो तकनीक पर किये गये खर्चे के आधार पर लगाया जाता है.
अनुवाद—दिनेश पोसवाल 

डॉ. कलाम, आपका लेख जितने जवाब नहीं देता, उससे ज्यादा सवाल खड़ा करता है

(नाभिकीय ऊर्जा पूरी दुनिया में विनाश का पर्याय बन चुका है। अमरीका के थ्री माइल्स वैली, रूस के चेर्वोनिल और अभी हाल ही में जापान के फुकुशिमा ने बार-बार यह चेतावनी दी है कि नाभिकीय ऊर्जा मानवता के लिए अत्यन्त घातक है। इससे निकलने वाले विकिरण का प्रभाव मौजूदा पीढ़ी को ही नहीं बल्कि आने वाली असंख्य बेगुनाह पीढ़ीयों को अपंग बनाता रहता है। यह बात जगजाहिर है।
पिछले कुछ वर्षों से हमारे देश के शासक इन सच्चाइयों की अनदेखी करते हुए नाभिकीय ऊर्जा को हर कीमत पर बढ़़ावा दे रहे हैं। संसद में ‘‘नोट के बदले वोट’’ का खेल खेलकर भी अमरीका के साथ नाभिकीय समझौते को अन्तिम रूप दिया गया। जैतापुर और कुडानकुलम में वहाँ के स्थानीय लोगों द्वारा प्रबल विरोध के बावजूद हर कीमत पर नाभिकीय संयंत्र लगाया जा रहा है।  
पिछले कुछ दिनों से पूर्व-राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम जी कुडानकुलम नाभिकीय प्लांट के पक्ष में अभियान चला रहे हैं। आसपास की जनता लंबे अरसे से इस विनाशकारी परियोजना का विरोध कर रही है। श्री कलाम ने आसपास के गावों के लिए 200 करोड़ रुपये कि एक विकास योजना भी प्रस्तावित की है, जिसका अभिप्राय समझना कठिन नहीं. इस सन्दर्भ में भारत सरकार के पूर्व ऊर्जा सचिव और योजना आयोग के पूर्व ऊर्जा सलाहकार श्री ई.ए.एस. शर्मा का श्री कलाम के नाम यह खुला पत्र।  अनुवाद – सतीश पासवान  )
भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम के नाम पत्र
प्रेषक:
डॉ. ई. ए. एस. शर्मा
पूर्व सचिव (विद्युत ), भारत सरकार
पूर्व सलाहकार (ऊर्जा), योजना आयोग
प्रिय श्री अब्दुल कलम,
मैं नाभिकीय शक्ति पर द हिन्दू में प्रकाशित आपके अति-आश्वासनकारी लेख की तरफ ध्यान दिलाना चाहता हूँ। मैं समझता हूँ कि आप कुडानकुलम के लोगों को इस बात के लिए आश्वस्त करने की हद तक चले गये कि नाभिकीय ऊर्जा ‘‘100 प्रतिशत सुरक्षित है’’। मैं आँकडों की जानकारी के मामले में बहुत ही अनाड़ी हूँ, फिर भी मुझे आश्चर्य है कि कैसे कोई व्यक्ति इतना प्रशंसात्मक दावा कर सकता है, विशेषतया तब जब कि तकनोलोजी से थोड़ा भी परिचित व्यक्ति इस तरह के दावे करने से हिचकेगा!
मैं श्रीकाकुलम, आंध्र प्रदेश का रहने वाला हूँ। मेरे निवास के बहुत ही नजदीक, कोव्वाडा में न्यूक्लियर पावर कारपोरेशन आफ इंडिया लिमिटेड (एनपीसीआईएल)ने एक बहुत बड़ा नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र का काम्प्लेक्स लगाने का प्रस्ताव रखा है। नाभिकीय ऊर्जा कि सुरक्षा को लेकर मेरी गंभीर आशंकायें हैं। अब जब कि यह मेरे घर के पिछवाड़े ही लगाने जा रहा हैं, मेरी आशंकायें कई गुना बढ़ गयीहैं। जो व्यक्ति ऐसी तकोनोलोजी से प्रभावी होने वालों में शामिल हो उसके मन में ऐसी आशंकायें होना स्वाभाविक है, भले ही कहीं दूर बैठकर लेख लिखने वाले व्यक्ति को, ऐसी आशंकायें किसी हास्य-विनोद की किताबी कल्पना’’ जैसी लगाती हों।
मैं समझता हूँ कि एनपीसीआईएल ने नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र के स्थान के चारों ओर बसे लोगों को चेतावनी देने के लिए उस संयंत्र के इर्द-गिर्द एक जोनिंग प्रणाली स्थापित की है। मैं समझता हूँ कि, ”वर्जित क्षेत्र“, ‘‘विकिरण मुक्त किया गया क्षेत्रऔर आपातकालीन जाँच-पड़ताल क्षेत्र’’ उस संयंत्र के घेरे से 16 किलोमीटर दूर तक फैला हुआ है। श्रीकाकुलम मे रह रहे मेरे परिवार को अभी तक यह सब नहीं बताया गया है। शायद, प्रभावित होने वाले सिरे पर स्थित लोगों को इसकी सूचना देने से पहले ही एनपीसीआईएल संयंत्र के पूरा हो जाने कि प्रतीक्षा कर रहा है। आपका लेख निश्चय ही इस बात पर कूटनीतिक चुप्पी साधे हुए है। शायद एनपीसीआईयल ऐसे तुच्छ तथ्यों को तूल देना नहीं चाहता हो!
आपकी प्रतिष्ठा को ध्यान मे रखते हुए, मैंने आपके लेख को बहुत ही सावधानी से पढकर यह समझने की कोशिश की कि कोव्वाडा नाभिकीय पार्कके बिलकुल नजदीक रहने वाला खुद मैं, कितना सुरक्षित रह पाऊँगा।  एनपीसीआईएल ने इस संयंत्र को स्वच्छऔर हरितदिखाने के लिए उसे कितना खूबसूरत नाम दिया है-नाभिकीय पार्क।”
एक स्थान पर, आपने निम्नलिखित दावा करने कि कृपा की है। 
नाभिकीय बहस के इर्द-गिर्द एक अन्य दलील यह है कि नाभिकीय दुर्घटना और उसके बाद होने वाला विकिरण केवल उसकी चपेट मे आनेवाली पीढ़ी को ही नुकसान नहीं पहुँचायेगा, बल्कि आनेवाली पीढ़ियों पर भी अपना घातक प्रभाव डालता रहेगा। अगर केवल अटकलबाजी और हास्य-विनोद की किताबी कल्पना की तुलना मे उपलब्ध तथ्यों और वैज्ञानिक जाँच-पड़ताल को ज्यादा महत्त्व दिया जाय , तो यह दलील हर तरह से एक मिथक साबित होगी।”
इस तरह का बयान देने से पहले निश्चित तौर पर आपने इस विषय पर उपलब्ध वैज्ञानिक साहित्य के सारे स्रोतों  की छानबीन की होगी। मुझे यकीन है कि आपने ऐसा जरूर किया होगा। मैं आपकी इस बात से सहमत हूँ कि अनुभव और अटकलबाजी की तुलना में वैज्ञानिक जाँच-परख को ज्यादा महत्त्व दिया जाना चाहिए। लेख का एक-एक वाक्य पढ़ने के बाद मैं निम्नलिखित चिंताओ का निवारण करने मे असमर्थ रहा हूँ, जो अब भी मेरे दिमाग को मथ रही है।
1- आपने नाभिकीय तकनोलोजी की  सुरक्षा से जुड़े मसलों को महज अटकलबाजी कहते हुए दरकिनार कर दिया। लेकिन क्या आपने नाभिकीय संस्थापन से यह पूछने का प्रयत्न किया कि एनपीसीआईएल ने हरेक मौजूदा नाभिकीय संयंत्र के भीतर किसी खास अवयव में खराबी आने के चलते पैदा होने वाली यांत्रिकी की गड़बड़ी से होने वाली दुर्घटना की जटिल सम्भावना का अनुमान लगाने के लिए कभी विश्वस्त अभियांत्रिकी सम्बन्धी अध्ययन कराया? यदि ऐसा नहीं हुआ, तो क्या आप केवल कुछ एक दुर्घटनाओं के अपने मूल्यांकन के आधार पर, जो पिछले कुछ दशकों में घटित हुई हैं, इस निष्कर्ष तक छलांग लगा सकते हैं कि दुर्घटना होने कि संभावना नगण्य है? क्या इस तरह का निष्कर्ष जो अत्यन्त कृत्रिम नमूने पर आधारित हैं और सांख्यिकी के लिहाज से बेहद कमजोर  हैंभ्रामक अनुमान की ओर नहीं ले जाता?
2- आपने कृतज्ञतापूर्वक यह स्वीकार किया है कि विकिरण से प्रभावित होने और कैंसर के खतरे में कुछ सह-सम्बन्ध है। फिर भी आपने रेडीयोएक्टिविटी के दूरगामी हानिकारक प्रभावों की सम्भावना, विशेषकर मानव कोशिकाओं पर इसकेदुष्प्रभाव को कम करके आंका है। क्या संयोगवश आपने इस विषय पर उपलब्ध वैज्ञानिक साहित्य कि विस्तृत जाँच-पड़ताल की? क्या आप पूरे आत्म-विश्वास से इस तथ्य को नकार सकते हैं कि लघु-तीव्रता और उच्च-तीव्रता के विकिरण का मानव स्वास्थ्य पर सम्भावित प्रभाव, अनुवांशिकी प्रभाव सहित, के बारे में वैज्ञानिक ज्ञान में भारी अंतर है? लघु-तीव्रता तक के विकिरण का भी मानवकोशिकाओं पर सम्भावित खतरे एक उदाहरण के तौर मैंने एक लेख संलग्न किया है जो कुछ दिनों पहले द हिन्दूमें उसी तरह छपा था, जिस तरह आपका यह लेख इस प्रतिष्ठित समाचार-पत्र  में छपा था। मुझे उम्मीद है कि आपने स्वास्थ्य पर विकिरण के प्रभाव के बारे में दावे के साथ कहने से पहले वैज्ञानिक साहित्यका सावधानी से अध्ययन किया होगा।
3- नाभिकीय तकनोलोजी के सकारात्मक पहलुओं पर वाक्पटुता के बावजूद आपने इसके नकारात्मक पहलुओं की पूरी तरह अनदेखी की है। मैं इसके कारणों को समझ सकता हूँ। तकनोलोजी के अनेक मामलों में, तकनोलोजी संस्थाएँ, अपनी तकनोलोजी को आगे बड़ाने की बेचैनी में, कीमतों का कम, लेकिन फायदों का अधिक आंकलन करती है। लोक-नीति के मामले में किसी भी व्यक्ति को अनिवार्य रूप से इसके प्रति हमेशा सतर्क रहना चाहिए।
4- क्या आपने अब तक बन्द हुए किसी नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र के आधार पर किसी नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र को बंद करने की कीमत का अनुमान लगाने का प्रयत्न किया? आपने अवसर लागतके बारे मे तो बताया है, लेकिन क्या आपने लम्बे समय तक संचित होने वाले रेडीयोएक्टीव कचरे के प्रबंधन की लगत का भी आंकलन का प्रयास किया? क्या आप जानते हैं कि इसकी लागत कितनी अधिक होगी यह आंकलन लगाना मुश्किल है? चेर्नोबिल को बन्द करने की कीमत का आंकलन कभी नहीं हो पायेगा, क्योंकि उसे कभी भी बन्द नहीं किया जा सकेगा। रूस सरकार दूषित चेर्नोबिल रिएक्टर के चारों तरफ विदेशी वित्तीय सहायता से पत्थर का एक विराट ताबूत बना रही है! फुकुशिमा की क्या कीमत चुकानी पड़ी, आज तक किसी को नहीं पता।
5- आपने ऊर्जा और अर्थव्यवस्था के बीच के सम्बन्धों की बात कही हैं। इस मामले मे आपके विवेक पर सवाल खड़ा करने में मुझे हिचकिचाहट हो रही है। हालाँकि मैं सुनिश्चित नहीं हूँ कि आप ऊर्जा और आर्थिक विकास के ऊपर कुशलता सुधार, माँग प्रबंधन और दूसरे उपायों के प्रभाव से अवगत हैं या नहीं। मुझे उम्मीद है कि इस विषय पर आपने इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइन्स के प्रो. अमूल्य रेड्डी से, जब वे जीवित थे, आपको इस विषय पर बातचीत का अवसर मिला होगा। मैं अपने पूरे सामर्थ्य से आपको पेंगुइन प्रकाशन के लेखक एमोरी बी लोविंस की किताब सॉफ्ट इनर्जी पाथ्स: टुवार्ड्स ए ड्यूरेबल पीसपड़ने की सलाह देता हूँ। इस विचारोत्तेजक किताब को पड़कर बहुत लाभान्वित हुआ हूँ।
श्री कलाम, इस पत्र को लिखने का मेरा मकसद किसी भी तरीके से आपके लेख में खोट निकालना नहीं, बल्कि अपनी सच्ची मानवीय चिंताओं को प्रकट करना है। आप एक विद्वान लेखक हैं। लेकिन मेरी जगह बैठे किसी व्यक्ति के लिए या मौजूदा नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र के आस-पास बसे लोगों के लिए जो बात महत्त्वपूर्ण है, वह पूर्व-कल्पित धारणा पर आधारित लेख नहीं, बल्कि वैज्ञानिक प्रमाणों परआधारित तर्क है। मैं भयभीत हूँ कि आपका लेख जितने जवाब नहीं देता उससे ज्यादा सवाल खड़े करता है।
सादर,
आपका,

डॉ. ई. ए.एस. शर्मा
पूर्व सचिव(विद्युत),भारत सरकार
पूर्व सलाहकार(ऊर्जा ),योजना आयोग
विशाखापट्टनम (दिनांक 6-11-11)

अंग्रेजी मे मूल लेख पढने के लिए इस लिंक पर क्लीक करें- 
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