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हिन्दू राष्ट्रवाद के कुतर्क– मेघनाद देसाई

 

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निम्नलिखित प्रस्थापनाएं हिन्दू राष्ट्रवादी सिद्धांत के केंद्र में हैं-

  • भारत प्रागैतिहासिक काल से ही भारतवर्ष या आर्यावर्त के रूप में एक एकल राष्ट्र रहा है.
  • जब मुस्लिम आक्रमणकारी आठवीं शताब्दी के बाद उत्तर-पश्चिम से आये, तभी से भारत गुलाम हो गया– पहले मोहम्मद बिन कासिम और मोहम्मद गजनी तथा बाद में दिल्ली सल्तनत और फिर मुग़ल साम्राज्य. मुस्लिम विदेशी हैं. विदेशी के प्रति इस घृणा के जरिए यह बात स्वयंसिद्ध और स्थापित कर दी जाती है कि आर्य भारत में कहीं और से नहीं आये थे. सिन्धु घाटी सभ्यता और आर्यों के आक्रमण की कहानी के बीच सामंजस्य बिठाने को लेकर इनमें एक बड़ी उलझन है. हिन्दू राष्ट्रवादी इस बात से साफ-साफ इनकार करते हैं कि आर्य विदेशी थे.
  • अंग्रेजों ने एक एकल भारतीय पहचान निर्मित नहीं की. यह तो हमेशा से ही मौजूद थी. मैकाले ने जो शिक्षा प्रणाली लागू की, उसने अभिजात्यों को पैदा किया– मैकाले-पुत्र, जो विदेशियों की तरह बर्ताव करते हैं और सोचते हैं.
  • 1947 में 1200 साल की गुलामी का अन्त हुआ. (नरेन्द्र मोदी ने अपने निर्वाचन के बाद संसद के केन्द्रीय सौंध में अपने पहले भाषण के दौरान यह बात कही.) भारत अंततः एक हिन्दू राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान का दावा करने के लिए स्वतन्त्र हुआ.
  • हालाँकि कांग्रेसी धर्मनिरपेक्ष, मुसलामानों को विशेषाधिकार देते रहे, जिनकी देशभक्ति पर हमेशा संदेह किया जाना चाहिए, क्योंकि उनका देश पाकिस्तान है.फर्जी इतिहास की बकवासये प्रस्थापनाएं नाना प्रकार के अवधारणात्मक और ऐतिहासिक मुद्दे उठाती हैं. आइये उनकी जांच-पड़ताल करे—पहला, मूल निवासी बनाम विदेशी का मुद्दा है. अंग्रेज स्पष्ट रूप से विदेशी थे. वे जब यहाँ आये तब उनको यहाँ कुछ करने का अवसर था और उन्होंने यहाँ उस तरह का “उपनिवेशीकरण” नहीं किया जिस तरह रोडेशिया या आस्ट्रेलिया में. दूसरी ओर मुसलमान शासक वापस नहीं गये और उन्होंने भारत को अपना घर बना लिया.यह हिन्दू राष्ट्रवादियों के लिए एक समस्या पैदा करता है. यह सच्चाई है कि मुसलमान 1200 साल से यहीं के निवासी हैं, फिर भी इनकी निगाह में वे भारत के निवासी नहीं हैं. वे हमेशा-हमेशा के लिए विजातीय ही रहेंगे. यह अजीबोगरीब सिद्धात है, क्योंकि भारत अपने पूरे इतिहास के दौरान “विदेशी” कबीलों का शरणस्थल रहा है– शक, हूण, काला सागर के पार से आनेवाले बंजारे और दूसरी “नस्लें” जो सब के सब हिन्दू धर्म में परिवर्तित होती गयीं. लेकिन फिर भी 1200 साल काफी नहीं हैं. तो फिर आर्यों के बारे में क्या कहेंगे? क्या आर्य भी मध्य यूरोप या उत्तरी ध्रुव के करीब से नहीं आये थे, जैसा की बाल गंगाधर तिलक ने तर्क द्वारा स्थापित किया है?

    यह कहना कि आर्य विदेशी हैं, हिन्दुत्व को विदेशी धर्म बना देता है. फिर तो आदिवासी–- जनजातियाँ ही एकमात्र असली मूलनिवासी होंगे, जैसा कि कुछ दलित विद्वानों ने तर्क दिया है. यही कारण है कि हिन्दू राष्ट्रवादी आर्यों का विदेशी मूल का होना स्वीकार नहीं करते हैं, हिन्दू राष्ट्रवादी आख्यान के साथ मेल बैठने के लिए आर्यों को मौलिक रूप से यहाँ का मूलनिवासी बताना जरूरी है, जो एक ऐसे काल की कल्पना करते हैं जब किसी न किसी रूप में पूरे भारत में तत्क्षण हिन्दू धर्मं स्थापित हुआ था, जिसके पीछे वेद और ब्राह्मणों के बलिदान इत्यादि की भूमिका थी. इसी कारण से हिन्दू भारत की सामान्य भाषा के रूप में संस्कृत का होना भी जरूरी होगा.

    यह फर्जी इतिहास की बकवास है. हिन्दू जिस धर्म को व्यवहार में लाते हैं उसका वेदों से बहुत कम ही सम्बन्ध है. वैदिक देवों की अब पूजा नहीं होती. विष्णु, शिव और काली का हिन्दू मंदिरों में प्रादुर्भाव वेदों के कम से कम 1000 साल बाद ही हुआ. ब्राह्मणवाद (जो हिन्दू धर्म का सही नाम है) का धीमी गति से प्रसार जो इसके केन्द्रीय स्थल पंजाब से दिल्ली क्षेत्र की ओर तथा बाद में उत्तर प्रदेश और बिहार की ओर हुआ, इसका अच्छी तरह मानचित्र निरूपण किया गया है. यह भी अच्छी तरह ज्ञात है कि ईशा पूर्व छठी शताब्दी से आजीविका, जैन धर्म और बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में पाली और अर्धमागधी की महत्वपूर्ण भूमिका थी.

    बौध धर्म और ब्राह्मणवाद के बीच एक हजार सालों तक संघर्ष चला जिसके बाद ही ब्राह्मणवाद को विजयी घोषित किया जा सका. भारत लगभग उसी समय एक हिन्दू राष्ट्र बना जब शंकराचार्य ने बौद्धों से बहस की और उनको पराजित किया. हालाँकि अगर हिन्दू राष्ट्रवादियों के कालक्रम को गंभीरता से लें, तो यह मुसलामानों का “गुलाम” बनने के ठीक बाद का समय रहा होगा.
    हिन्दू राष्ट्रवादियों की रणनीति बौद्ध धर्म और ब्राह्मणवाद के बीच के किसी भी टकराव को नकारना और यह दावा करना है कि बुद्ध विष्णु के अवतार थे. यह दावा सातवीं शताब्दी तक पुराणों में नहीं मिलता, जिस समय तक बौद्ध धर्म बाहर का रास्ता पकड़ रहा था. भारत को इतिहास के पूरे दौर में एक हिन्दू राष्ट्र के रूप में परिभाषित करने के लिए हिन्दुत्व ही पर्याप्त नहीं है.

    सावरकर ने हिन्दुत्व पर लिखे अपने लेख में इस वृत्त को चौकोर बनाने की कोशिश की थी. वे एक आधुनिकतावादी थे, न कि किसी धर्म के अनुयायी. राष्ट्र के बारे में उनका विचार उस दौरान राष्ट्रीयता के बारे में प्रचलित उन फैशनेबल विचारों से निकले थे जो यूरोप के नये पैदा हुए राष्ट्रों द्वारा ग्रहण किये गये थे, उनमें से कई पहले हैब्सबर्ग साम्राज्य के अंग रहे थे जो 1918 में विघटित हो गया था, जैसे– हंगरी, पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया. राष्ट्रीयता भूभाग पर आधारित होती थी और किसी विशेष भूभाग में पैदा हुए लोग उस राष्ट्र के सदस्य होते थे.

    उनका हिन्दुत्व हिन्दू धर्म से बंधा नहीं था. मतलब यह कि कोई भी व्यक्ति जो सिन्धु की धरती पर जन्मा हो वह हिन्दू है और हिन्दुत्व का अंग है. इसका एक गौण पाठ है कि हिन्दू, मुसलमानों से कहीं अधिक हिन्दुत्व का अंग हैं. लेकिन मुसलमान हिन्दुत्व के अंग हो सकते हैं यदि अपनी जन्मभूमि के प्रति वफादार हों. बाद वाले हिन्दू राष्ट्रवादियों ने सावरकर के हिन्दुत्व की धारणा को तो अपना लिया, लेकिन उनके धर्मनिरपेक्ष सिद्धांत को नहीं अपनाया.

    गुलामी के बारे में भ्रामक विचार

    भारत के एक इतिहास के रूप में, हिंदू राष्ट्रवादी कहानी उतनी ही आंशिक और एकांगी है जितनी नेहरूवादी दृष्टिकोण ने पैदा की है. निश्चय ही, ये दोनों उत्तर भारतीय पक्षपात से भरी हुई कहानियाँ हैं. वे दिल्ली और उसके शासकों को ही सम्पूर्ण भारत मानते हैं. मुस्लिम हमलावर संभवतः आठवीं शताब्दी में सिंध और सौराष्ट्र आये और बारहवीं सदी में दिल्ली सल्तनत की स्थापना की. लेकिन वे विंध्य के दक्षिण में प्रवेश कभी नहीं कर पाये.

  • Secularism-630x315दक्षिण भारत में मुस्लिम आप्रवासियों के बारे में उत्तर भारत से बहुत ही अलग इतिहास है. जब औरंगजेब काफी बाद में, सत्रहवीं सदी में दक्षिण की ओर गया, उससे पहले दक्षिण भारत मुस्लिम शासन से “पीड़ित” नहीं था. दक्षिण में हिन्दू रजवाड़े एक समय मुस्लिम शासकों के साथ सहअस्तित्व में थे, लेकिन यह केवल दूसरी सहस्राब्दी के मध्य में ही सम्भव हुआ। “गुलामी के 1,200 साल” का विचार पूरी तरह फर्जी है। असम किसी भी मुस्लिम सत्ता द्वारा कभी भी जीता नहीं गया.लेकिन अंततः “सही मायने में वस्तुगत” इतिहास कभी नहीं लिखा जायेगा. किसी भी राष्ट्र में, कभी नहीं लिखा गया. बहस और पुनर्व्याख्यायें हमेशा चलती रहती हैं. अकादमियों को संरक्षण देकर उनका इस्तेमाल इतिहास की सरकारी लाइन को पुख्ता करने के लिए किया जा सकता है. अगर शोध के लिए धन की आपूर्ति सरकार की तरफ से हो रही है तो निष्पक्ष अनुसंधान की पवित्रता की गारंटी नहीं की जा सकती. हालाँकि भारत में, अनुसंधान के लिए निजी परोपकारी स्रोतों से धन मुहैया कराने की परंपरा नहीं रही है. सरकार ने उच्च शिक्षा के सभी दरवाजों पर सरकार की पहरेदारी है, जिसके लिए कांग्रेस का जड़ीभूत पूर्वाग्रह जिम्मेदार है जो आजादी के बाद के शुरूआती तीस सालों तक बेरोकटोक शासन करती रही. यह पूर्वाग्रह रिस-रिसकर अच्छी तरह से भाजपा में घुस चुका है.चिंता की बात महज हिंदू राष्ट्रवाद का विचार ही नहीं है. चिन्तित करनेवाली बात यह है कि खुद भाजपा सरकार इस खास नजरिये का प्रचारक होगी.(मेघनाद देसाई लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अर्थशास्त्र के मानद प्रोफेसर हैं और मशहूर पुस्तक द रीडिस्कवरी ऑफ़ इण्डिया एण्ड डेवलपमेंट एण्ड नेशनहुड के लेखक हैं. आभार– स्क्रोल डॉट इन. अनुवाद—दिगम्बर)
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फिरकापरस्त गिरोह की बढ़ती सीनाजोरी

मदनजीत सिंह
(धार्मिक कट्टरपंथी भारतीय धर्मनिरपेक्ष संविधान और अनीश्वरवादी दार्शनिक परम्पराओं का माखौल उड़ा रहे हैं, उनको चुनौती देना जरूरी है।)

       एक फ्रांसीसी पत्रकार जिसने मेरी किताब कल्चर्स एण्ड वल्चर्स पढ़ी, वह अचम्भे में पड़ गया कि आध्यात्मिक भारत में मेरे नास्तिक विश्वास और सिख धर्म का सहअस्तित्व कैसे कायम है।

    
मेरे नास्तिक विश्वास उस सिख धर्म से जुदा नहीं है जो मूलतः हिन्दू दर्शन पर आधारित है। मैंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के उपकुलपति के रूप में डॉ. एस. राधाकृष्णन द्वारा लिखे जाने वाले गीता के प्रवचनों का हवाला दिया। विद्यार्थी उस दार्शनिक से यह जानकारी पाकर दंग रह गये थे कि उत्तर मिमांसा जिसे वेदान्त के नाम से भी जाना जाता है, उसे छोड़कर हिन्दू दर्शन की अधिकांश शास्त्रीय प्रणालियाँ ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करती हैं। उन्होंने कहा कि न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्व मिमांसा तथा वृहस्पति का चार्वाक, महावीर का जैन धर्म, थेरावद बौद्ध धर्म जैसे सभी शुरूआती मत अज्ञेयवादी थे। गौतम सिद्धार्थ बुद्ध (569-483 ईसापूर्व) ने धरती को अपनी ज्ञान प्राप्ति का साक्षी मानते हुए उसका ही स्पर्श किया था।
       
 रोमिला थापर ने यूनेस्को की किताब मानवता का इतिहास का संशोधन करने के लिए आयोजित बैठक में इस बात पर बल दिया था। इस प्रख्यात इतिहासकार ने कहा कि आध्यात्मिक भारत” में अनीश्वरवादी भौतिकवाद का सबसे पहले प्रतिपादन करने वाने चार्वाक थे। उन्होंने भाग्य”, “आत्मा” यापरलोकजैसी अलौकिक बातों को बकवास बताते हुए खारिज कर दिया था। अजीत केशकम्बली बुद्ध के समकालीन थे। उनका मानना था कि मनुष्य धूल से धूल में, राख से राख में और धरती से धरती में मिल जाता है और इस दुनिया के अलावा कोई और दुनिया नहीं है। उन्होंने वेद के रचयिताओं को “विदूषक धूर्त और दानवकहा था।
       
आश्चर्यजनक है कि केशकम्बलीन के विचार 25 शताब्दियों तक कैसे गूढ़ रहस्य बने रहे और हमारे युग में एक नास्तिक और वेदों के कटु आलोचक इ. वी. रामास्वामी ने फिर से उनका आवाहन किया। उनहोंने हिन्दू देवी-देवताओं की नकल करते हुए हजारों औरतों और मर्दों को प्रदर्शन के लिए सड़क पर उतारा। यूनेस्कों ने अभूर्तपूर्व प्रशंसा-पत्र के द्वारा उन्हें सम्मानित किया- नये युग केमसीहा, दक्षिण एशिया के सुकरात, सामाजिक सुधार आन्दोलन के जनक तथा अज्ञानता, अंधविश्वास, व्यर्थ परम्पराओं और घटिया रीति-रिवाज के दुश्मन।‘’1973 में उनकी मृत्यु होने तक भारत के लोग खुलकर अपने मन की बात कहने में समर्थ थे। दलित ‘’राष्ट्र विरोधी’’ का ठप्पा लगाये जाने के बगैर मनुस्मृति की भर्त्सना कर पाते थे। ऑब्रे मेनन के रामायण को पढ़कर लोग हंस सकते थे जिसमें उन्होंने अन्दाजा लगाया था कि सीता का अपहराण नहीं हुआ था बल्कि वह लंका के खूबसूरत राजा के साथ भाग गयी थी। तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एम. करूणानिधि तो नास्तिक हैं, इस बात का मजाक उड़ाया था कि मन्नार की खाड़ी के आर-पार रामसेतु पुल का निर्माण बंदरों ने किया था। उन्होंने पूछा कि- “राम क्या?” “यह राम कौन हैं?” किस इंजीनियरिंग कॉलेज से राम ने पढ़ाई की थी?
        
वोट बैंक
        
हिन्दू राजनीतिक एजेन्ट ने नास्तिकता से भ्रष्ट होने वाली हिन्दू धर्म की अज्ञेयवादी दार्शनिक प्रणाली को खारिज कर दिया। वोट बैंक को लक्ष्य बनाते हुए उन्होंने मेरे दोस्त एम. एम. हुसैन पर इल्जाम लगाया  कि वे हिन्दू देवियों का अश्लील चित्र बनाते हैं जबकि परम्परागत रूप से उन्हें मंदिरों और तीर्थस्थानों में नग्न रूप में चित्रित किया जाता  रहा है। हिन्दू पर्सनल ला बोर्ड ने उस महान कलाकार का सर काटने वाले को 5 लाख करोड़ का इनाम घोषित किया। बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद के कार्यक्रमों ने उनके मुम्बई स्थित आवास को तहस-नहस किया तथा हुसैन की आंखें फोड़ने और हाथ काटने वालों के लिए पैसे और सोने की ईंट देने का एलान किया- जैसा कि कुरान की आयतों में मुसलमानों  का आहवान करते हुए लिखा हैं- “काफिरों को मार डालो और उनके सर और उँगलियाँ काट डाला।”

इस्लामी ’’संगसार करने वाले’’ (उन लोगों में से जो हज यात्रा के दौरानकाफिरको पत्थर मारते हैं।) संघ परिवार के फंडूसों’’ (यह उपाधि लेखिका गीता हरिहरन ने दी है) के साम्प्रदायिक गिरोह में छलांग मार कर चढ़ गये। ऑल इंडिया उलेमा कौंसिल ने हुसैन की फिल्म मीनाक्षी दिखाये जाने के खिलाफ प्रदर्शन किया जिसके एक गाने में औरतों के सौंदर्य की प्रशंसा करने वाले एक गीत की पंक्तियां पैगाम्बर हजरत मोहम्मद के व्यक्तित्व की प्रसंशा में लिखे धार्मिक पदों से मिलती थी। इस धमकी के बाद वह फिल्म सिनेमा घरों से हटा दी गयी।

इन्हीं घटनाओं के दौरान उनके खिलाफ मैंने ऑल इंडिया कौंसिल के प्रमुख तकी रजा खान के खिलाफ डंडा उठाया जो चाहते थे कि तस्लीमा नसरीन को भारत से निकाल बाहर किया जाय, जिसने औरतों के अधिकारों का उलंघन करने वाले शरिया कानूनों की आलोचना की थी। उसने तसलीमा को कत्ल करने वाले के लिए 5 लाख का इनाम घोषित किया था। 2005 में उसे कोलकाता में रहने और काम करने की इजाजत दी गयी थी। अपने सांस्कृतिक वातावरण के चलते कोलकाता तस्लीमा का प्रिय शहर था।
       
तकी रजा खान को 2007 के स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान अनपेक्षित सहयोगी मिल गया, जब कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने मुस्लिम वोट की लालसा में तस्लीमा और साथ ही सीपीएम के खिलाफ एक प्रदर्शन को उकसाया। 22 नवम्बर को पुलिस के पहरे में उसे कोलकाता से बाहर कर दिया गया। पहले उसे हवाई जहाज से जयपुर भेजा गया और फिर उसी दिन दिल्ली ले जाकर एकान्तवास में रखा गया। मानवाधिकार के उलंघन से क्रुद्ध होकर मैंने कई सरकारी अधिकारियों से सम्पर्क साधा और हफ़्तों तक ज्योति बसु सहित कई राजनेताओं से पत्राचार करता रहा। जब ये सभी प्रयास यहां तक कि भूख हड़ताल करने की धमकी भी बेअसर रही तब मैंने मनमोहन सिंह को यह दलील देते हुए पत्र लिखा कि तसलीमा का कोलकाता से निकाला जाना भारत की सांस्कृतिक परम्परा के खिलाफ है। मैंने 5 वीं शताब्दी में राजा सिबी के शासनकाल में बनायी गयी अजन्ता चित्र-कलाओं की ओर  उनका घ्यानआकृष्ट किया, जिन्होंने एक पंडुक (पंछी) के वजन भर मांस देना स्वीकार कर लिया था।
      
प्रधानमंत्री हमारे पत्रों की प्राप्ति सूचना देते रहे, लेकिन 4 अप्रैल 2008 को लिखे उनके दो पन्ने के पत्र का पारदर्शी सदभाव और मर्म अभूतपूर्व था। अन्तिम पंक्तियों में भारत के धर्मनिरपेक्ष विचार तथा मानवाधिकार और मान-सम्मान के आदर की पुष्टि की गयी थी। उन्होंने लिखा- “जाति और पंथ, समुदाय और धर्म के भेदभाव से ऊपर उठ कर लोगों का स्वागत करने की गौरवशाली भारतीय पटकथा जारी रहेगी देश के भीतर एक छोटे से हिस्से द्वारा नफरत का माहौल तैयार करने की लगातार कोशिशे हमें इस परम्परा पर कायम रहने से नहीं रोक पायेंगी। हम तसलीमा नसरीन के अपने पसंद के किसी भी देश में, इस मामले में भारत में रहने के अधिकार को स्वीकार करते है। वे जिस शहर या राज्य में रहना पसंद करें उसका विकल्प उनके लिए खुला है।” तसलीमा बहुत खुश हुई कि अब वह दिल्ली में मेरी मेहमान के रूप में जब तक जी चाहे रह पायेंगी।
       
एक स्वांग
    
उस पत्र से धार्मिक भावनाएँ  आहात होने के राजनीतिक स्वांग को रोकने की जो उम्मीद जगी थी वह झूठी साबित हुई, जब कोलकाता पुस्तक मेले में तस्लीमा की किताब निर्वासन  को रोका गया। इसके पहले देवबंद के सदस्यों ने सलमान रूश्दी को जयपुर साहित्य उत्सव में भाग लेने से रोका था। धार्मिक कट्टरपंथियों ने फिर उसी हास्यास्पद  नाटक को दोहराया और सटेनिक वर्सेज के अंश पढ़ने वाले चार प्रतिनिधियों के खिलाफ उनकी नीयतको लेकर मुकदमा दायर करने की पहल की। इसने भारतीय न्यायशास्त्र को अनुच्छेद 19 (2) के तहत अभिव्यक्ति की आजादी की अंतहीन व्याख्या के दलदल में धकेल दिया।

अदालतें तब तक धार्मिक कट्टरता के नागपाश से मुक्त नहीं हो सकती, जब तक फंडूस और संगसार करने वाले किसी मामले को साम्प्रदायिक रूप से परिभाषित करते रहेंगे और भारत की अज्ञेयवादी सभ्यता को नजअंदाज करते रहेंगे जो भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान का स्रोत है। मुझे धर्मनिरपेक्ष विचार अपनी माता सुमित्रा कौर से विरासत में मिले हैं जिनकी मृत्यु 18 मार्च 1987 को हुई। सिख आदिग्रन्थ जिस मंजूषा में रखा जाता था उसके ऊपर अमरीकी विश्वविद्यालय के छात्रों को सम्बोधित कर रहे स्वामी विवेकानन्द का चित्र था, पांडीचेरी के अरविंद आश्रम की माँका हाथ से बना रेखाचित्र था और लघुचित्र शैली में उस सूफी सन्त मियाँ  मीर की पेन्टिंग थी, जिन्होंने अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर की आधारशिला रखी थी। सिख पवित्र ग्रन्थ में हिन्दू और मुसलमान दोनों ही समुदाय के सन्तों की कवितायें शामिल हैं-कबीर, नामदेव, शेख फरीद और दूसरे भक्त कवि जो संकीर्णतावादी व्याख्याओं के जरिये ईश्वर को सीमित नहीं करना चाहते थें।
 
गुरू नानक का सिख समप्रदाय भारत की उस बहुसांस्कृतिक सभ्यता से प्रेरित है जो यहाँ के परम्परागत अज्ञेयवादी दर्शन के प्रतिमानों को प्रतिबिम्बित करती है। उन्होंने जाति प्रथा, खोखले धार्मिक रिवाज, तीर्थयात्रा और चमत्कारों की निन्दा की। जीवन भर साथ रहने वाले उनके दो अनुयायियों में से एक बाला हिन्दू था और दूसरा मर्दानामुसलमान  रबाब वादक था। उन्हीं दोनों की मदद से उन्होंने धार्मिक स्थल का निर्माण कराया जिसमें हिन्दू ईंटे और सूफी इस्लाम का मुस्लिम गाराइस्तेमाल किया गया था, जैसा कि खुशवंत सिंह ने अपनी किताबद हिस्ट्री और द सिख्स  में लिखा है।
       
मेरी धर्मनिरपेक्ष और नास्तिक भावनाएँ  बुरी तरह आहत हैं। मैं वकीलों से सलाह मशवरा कर रहा हूँ ताकि धर्मनिरपेक्ष संविधान और अज्ञेयवादी दर्शन का माखौल उड़ाने वाले धार्मिक कट्टरपंथियों के खिलाफ कार्रवाई की जा सके।
 
(
यूनेस्को के सद्भावना दूत मदनजीत सिंह साउथ एशिया फांउडेशन के संस्थापक हैं। उनका यह लेख 16 मार्च 2012 के द हिन्दू में प्रकाशित हुआ था जिसका अनुवाद आभार सहित प्रस्तुत है।)

विज्ञान, वैज्ञानिक नजरिया और हमारा समाज

विज्ञान और वैज्ञानिक नजरिया के बीच गहरा सम्बन्ध होता है । लेकिन हमारे देश और समाज में एक अजीब विरोधाभास दिखाई दे रहा है  । एक तरफ विज्ञान और तकनोलोजी की उपलब्धियों का तेजी से प्रसार हो रहा है तो दूसरी तरफ के जनमानस में वैज्ञानिक नजरिये के बजाय अंधविश्वास, कट्टरपंथ, पोंगापंथ, रूढ़ियों और परम्पराएँ तेजी से पाँव पसार रही हैं । वैश्वीकरण के प्रबल समर्थक और उससे सबसे अधिक फायदा उठाने वाले तबके ही भारतीय संस्कृति की रक्षा के नाम पर अतीत के प्रतिगामी, एकांगी और पिछड़ी मूल्य–मान्यताओं को महिमामंडित कर रहे हैं । वैज्ञानिक नजरिया, तर्कशीलता, प्रगतिशीलता और धर्म निरपेक्षता की जगह अंधश्रद्धा, संकीर्णता और असहिष्णुता को बढ़ावा दिया जा रहा है । 


समाचार पत्रों में तांत्रिकों द्वारा बच्चों की बली देने या महिलाओं का यौन शोषण करने, डायन होने का आरोप लगाकर महिलाओं की हत्या करने तथा झाड़–फूंक, जादू–टोना और गंडा–ताबीज के द्वारा लोगों को ठगने की खबरें अक्सर आती रहती हैं । अखबारों में बंगाली बाबा, तांत्रिक, चमत्कारी पुरुष, ज्योतिषाचार्य के विज्ञापन छपते हैं । जप–तप, हवन, अंधविश्वास  और फलित ज्योतिष को विज्ञान सिद्ध किया जाता है और अब महाविद्यालयों में बजाप्ता ऐसे छद्म–विज्ञान का पठन–पाठन भी होने लगा है । टीवी चैनलों के मार्फत मनोकामना पूर्ण करने वाले बड़े–बड़े दावों के साथ यंत्र–तंत्र और अंगूठी बेचे जाते हैं । अंधविश्वास, पुनर्जन्म और भूत–प्रेत के किस्से प्रसारित किये जाते हैं । 


अंधविश्वास और चमत्कारों के पीछे पागल लोगों की भीड़ में उच्च शिक्षित और सम्मानजनक पेशों से जुड़े लोगों, उच्च अधिकारियों और नेताओं–मंत्रियों की अच्छी खासी तादाद देखने को मिलती है । रत्न जड़ित अंगूठियों और गंडा–ताबीज पहनना, बाबाओं के डेरे या मजारों पर जाना , मूहूर्त निकाल कर हर काम करना उनकी रोजमर्रे की जिन्दगी का हिस्सा है । ‘अलोकिक शक्ति’ वाले चमत्कारी पुरुषों के अवतार के जो भी नये–नये मामले समाने आते हैं, उनकी भक्त–मंडली में बड़े–बड़े नाम–पद धारी लोग शामिल होते हैं । समाज के शीर्षस्थ लोगों का यह आचरण आम जनता में अंधश्रद्धा और चमत्कार को अनुकरणीय बनाता है । राजनीतिक पार्टियों के नेता भी ऐसे मठाधीशों, बाबाओं और प्रवचनकर्ताओं के साथ साँठ–गाँठ करते हैं जिनके पीछे बड़ी संख्या में भक्तों की भीड़ (वोट) हो ।


प्रकृति और इंसान जाति के बीच निरन्तर जारी संघर्ष के जिस मुकाम पर आज हम खड़े हैं वहाँ विज्ञान और तकनोलोजी के एक से बढ़कर एक हैरतअंगेज कारनामें हमारे चारों ओर दिखाई दे रहे हैं । समचना तकनोलोजीµ कम्प्यूटर, संटेलाइट और इन्टरनेट के संयोग ने देश–काल का फासला काफी कम कर दिया है । नये–नये अविष्कारों के चलते भोजन , वस्त्र, आवास ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य, शि़क्षा, यातायात औरमनोरंन जैसी रोजमर्रे की जरूरतों का स्तर दिनों–दिन बेहतर होता जा रहा है । हालाँकि यहाँ भी हमारा सामना एक विरोधाभासपूर्ण स्थिति से होता हैµ विज्ञान और तकनोलोजी की अभूतपूर्व सफलताओं के बावजूद दुनिया के करोड़ों लोग भूखे–नंगे, बेघर, बीमार और कुपोषित हैं । जिन बीमारियों का इलाज बहुत आसान और सस्ता है, उनकी चपेट में आकार हर साल करोड़ों लोग भर जाते हैं । बाढ़ समखा, भूकम्प, लू और ठण्ड से मौत की खबरे आती रहती हैं । जाहिर है की विज्ञान और तकनोलोजी की उपलब्धियाँ मुठ्ठीभर मुनाफाखोरों की गिरफ्त में हैं और केवल ऊपरी तबके के चंद लोगों तक हो सकती हैं । इन उपलब्धियों को सर्वसुलभ बनाने के बजाय बहुसंख्य लोगों को भाग–भरोसे छोड़ दिया जाता है ।


हमारे देश के करोड़ों लोगों तक ज्ञान–विज्ञान की रोशनी अब तक पहुँच पायी है । ऐसे में समाज के अधिकांश लोगों में वैज्ञानिक नजरिये का अभाव कोई आश्चर्य की बात नहीं । लेकिन जिन लागों को ज्ञान–विज्ञान की जानकारी और उसकी उपलब्धियाँ हासिल हैं, वे भी वैज्ञानिक नजरिया अपनाते हों, तर्कशील और विवेकी हों, यह जरूरी नहीं । इसका सबसे ज्वलन्त उदाहरण 1995 में देखने को मिला जब गणेश की मूर्ति के दूध पीने का अफवाह फैला था । उस दिन मंदिरों के बाहर दूध लेकर कतार में खड़े या रेलमपेल मचा रहे लोगों में ज्यादातर शिक्षित लोग ही थे । दरअसल गाँव–कस्बों तक यह अफवाह पहुँच नहीं पाया था क्योंकि इसे मोबाइल फोन और टेलीवीजन के माध्यम से फैलाया गया था, जिनकी पहुँच उस दौरान शहरों तक ही सीमित थी । उस भीड़ में कई वैज्ञानिक, विज्ञान शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर और अन्य पढ़े–लिखे लोग भी शामिल थे । अगर कुछ तर्कशील लोगों ने इस भेडियाघिसान का विरोध किया भी तो उन्हें नास्तिक और विधर्मी बताते हुए अलगाव में डाल दिया गया ।


विज्ञान की जीत के मौजूदा दौर में यदि वैज्ञानिक नजरिया लोगों की जिन्दगी का चालक नहीं बन पाया तो इसके पीछे कर्इ्र कारण हैं । समाज में व्याप्त अंधविश्वास के पीछे अज्ञान के अलावा, अज्ञात का भय, अनिश्चित भविष्य समस्या का सही समाधान होते हुए भी लोगों की पहुँच से बाहर होना, समाज से कट जाने का भय, परम्पराओं से चिपके रहने की प्रवृत्ति, धर्मभीरुता और ईश्वर के प्रति अंधश्रद्धा, धर्म गुरुओं , महापुरुषों या मठाधीशों के प्रति अंधविश्वास जैसे कई कारण होते हैं । जो विज्ञान का अध्ययन–अध्यापन करने वाला कोई भौतिकशास्त्र का शिक्षक यह जानता है कि पदार्थ को उत्पन्न या नष्ट नहीं किया जा सकता। लेकिन निजी जिन्दगी में वह किसी बाबा द्वारा चमत्कार से भभूत पैदा करने या हवा से फल या अंगूठी निकालने में यकीन करता है । यह उस शिक्षक का अज्ञान नहीं बल्कि वैज्ञानिक नजरिये का अभाव है । उसके लिये विज्ञान की जानकारी केवल रोजी–रोटी कमाने का जरिया है । जीवन में उसे उतारना या कथनी–करनी के भेद को मिटाना उसकी  मजबूरी नहीं । और तो और ऐसे अर्धज्ञानी अक्सर कुतर्क के जरिये अंधविश्वास को सही ठहराने में विज्ञान का इस्तेमाल करने से भी बाज नहीं आते ।


अंधविश्वास को बढ़ावा देने के पीछे कुछ धंधेबाजों का निहित स्वासर्थ भी एक महत्त्वपूर्ण कारण है । ऐसे लोग छद्म विज्ञान और कुतर्क का सहारा लेकर अंधविश्वासों, कुरीतियों, कर्मकाण्डों और बेसिर–पैर की बातों को सही ठहराते हैं । लोगों की चेतना को कुन्द करके उनकी आँखों में धूल झोंककर, अपनी झोली भरने वालों का ऐसा करना स्वाभाविक ही है । ऐसे ही स्वार्थी तत्व विज्ञान की आड़ लेते हुए विज्ञान की जगह चमत्कार और अंधविश्वास को स्थापित करने तथा समाज की प्रगति को रोकने का लगातार प्रयास करते रहते हैं । 
विज्ञान की उपलब्धियों का इस्तेमाल किस तरह सामाजिक कुरीतियों औ सड़ी–गली परम्पराअें को जारी रखने और उन्हें मजबूत बनाने के लिये किया जा रहा है, इसके अनेक उदाहरण हैं । इनका बर्बरतम और क्रूरतम उदाहरण है लिंग परीक्षण कराकर गर्भ में ही लड़कियों को मार देना । लिंग परीक्षण और भु्रण हत्या के खिलाफ कानून रहा है और इसे अंजाम देने वाले शिक्षित–समृद्ध तबके के लोग ही हैं ।


जाहिर है कि आज के दौर में अंधविश्वास को मानने और उसे बढ़ावा देने वाले लोगों की स्थिति आदिकाल के हमारे उन पुरखों के समान नहीं है जो प्रकृति की विकराल शक्ति के आगे लाचार थे । आज जिन ढेर सारे रहस्यों से पर्दा उठ चुका है, उन्हें भी निहित स्वार्थों के कारण स्वीकार न करने वाली जड़मति ही अंधविश्वास के मूल में है । गुफाओं और जंगलों से अन्तरिक्ष तक की अपनी यात्रा में मनुष्य ने प्रकृति के रहस्यों को समझा, उसके नियमों और कार्य–कारण सम्बन्धों का पता लगाया और उनकी मदद से प्रकृति को काफी हद तक अपने वश में कर लिया । आदिकाल में अपने अस्तित्व को बचाने के लिये प्रकृति से संघर्ष करते हुए मनुष्य ने आगख्, पहिया, पत्थर के औजार से अपनी ज्ञान–विज्ञान की यात्रा शुरू की । अपने सामूहिक प्रयासों और उससे प्राप्त अनुभवों को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया । उस काल में मनुष्य की जिज्ञासा और ज्ञान पिपासा ने ढेर सारे दर्शन को आगे बढ़ाया  और काफी हद तक सत्य की खोज में सफल हुए । अनुभव संगत ज्ञान के आधारशिला पर आधुनिक विज्ञान का महल खड़ा हुआ ।


प्राचीन काल की यह विकास यात्रा मध्यकाल में आकर अवरुद्ध हो गयी, जब सामन्ती समाज में धर्मकेन्द्रित सत्ता की स्थापना हुई । सामन्ती शासकों का पूरी दुनिया में धर्म के साथ गँठजोड़ कायम हुआ और  अपने शोषण–शासन को मजबूत बनाने के लिए उन्होंने धर्मभीरुता, कट्टरता और अन्धश्रद्धा को बढ़ावा दिया । धार्मिक–दार्शनिक रहस्यवाद सामन्तों की सत्ता कायम रखने का उपकरण बन गया । यह पूरा दौर इतिहास का अंधायुग था जिसमें इक्के–दुक्के प्रयासों को छोड़ दें, तो ज्ञान–विज्ञान का विकास ठहराव और गतिरोध का शिकार बना रहा ।


पन्द्रहवीं शताब्दी में यूरोप के पुनर्जागरण काल में ज्ञान–विज्ञान की नयी–नयी कोंपले फूटनी शुरू हुईं । गैलीलियो, कॉपरनिकस और ब्रूनों जैसे अनेक वैज्ञानिकों ने धार्मिक मतों पर प्रश्न खड़ा किया और वैज्ञानिक प्रयोगों के द्वारा लोगों को यह बताया कि संसार और प्रकृति के बारे में धार्मिक मान्यताएँ गलत हैं । इस प्रयास में कितने ही वैज्ञानिकों को अमानुषिक यातनाएँ दी गयी  । लेकिन सच्चाई को दबाना सम्भव नहीं हुआ। कृषि प्रधान, सामन्ती प्राकृतिक अर्थव्यवस्था के गर्भ से उत्पन्न नवोदित वाणिज्यिक पूँजीपति वर्ग ने अपने लाभ के लिये ही सही, ऐसे हर नये खेज का समर्थन दिया । समुद्री मार्ग की खेज और नये–नये देशों तक अपना व्यापार फैलाने के दौरान उन्हें ऐसे अविष्कारों की जरूरत थी । लेकिन उनका रास्ता आसान नहीं था । लोगों के दिमाग में राजा और ईश्वर के प्रति अंधश्रद्धा और ढेर सारे सामन्ती विचार और मूल्य भरे हुए थे । इनसे मुक्त किये बिना समाज को आगे ले जाना सम्भव नहीं था ।


नवजात पूँजीपति वर्ग के लिए दो कारणों से विज्ञान और वैज्ञानिक नजरिये को बढ़ावा देना जरूरी हो था । पहला, उत्पादन को तेजी से बढ़ाने के लिए नयी–नयी मशीनों और उत्पादन के साधनों का पता लगाना जरूरी था, जो विज्ञान के विकास से सीधे जुड़ा हुआ था । दूसरा, सामन्ती शासन की जकड़बन्दी को तोड़ने के लिए जरूरी था कि लोगों को धार्मिक, कट्टरपंथ और अंधविश्वास से मुक्त कर के उन्हें तर्कशील बनाया जाय । इस तरह पूँजीपति वर्ग के सहयोग से उस दौर के दार्शनिकों और वैज्ञानिकों ने सामन्तवाद को चैतरफा चुनौती दी और ईश्वर केन्द्रित, सामन्ती समाज की जगह मानवकेन्द्रित पूँजीवादी समाज की वैचारिक बुनियाद रखी । किसी भी बात पर आँख मूँदकर विश्वास करने के बजाय उसे तथ्य और तर्क की कसौटी पर परखने का चलन बढ़ा । प्रकृति के रहस्यों से ज्यों–ज्यों पर्दा हटता गया, धर्म की जगह विज्ञान की प्रतिष्ठा बढ़ती गयी । इस पूरे दौर में विज्ञान और वैज्ञानिक नजरिया साथ–साथ आगे बढ़ते गये । केवल वैज्ञानिक और दार्शनिक ही नहीं, बल्कि जनसाधारण भी जिन नये विचारों को सही मानते थे, उन्हें अपने जीवन में उतारते थे और इसके लिये कोई भी कुर्बानी देने के लिये तैयार रहते थे ।


आज हम एक विचित्र स्थिति का सामना कर रहे हैंµ विज्ञान जितनी तेजी से आगे बढ़ रहा है वैज्ञानिक नजरिया उतनी ही तेजी से पीछे जा रहा है । ऐसा क्यों है ?


अपने शैशव और यौवन काल में पूँजीपति वर्ग ने सामन्तवाद के खिलाफ जितनी दृढ़ता के साथ संघर्ष किया था वह बाद के दौर में कायम नहीं रहा । पूँजीवादी क्रान्तियों के जिस झण्डे पर स्वतंत्रता–समानता–बंधुत्व का नारा लिखा हुआ था । सत्ता में आते ही पूँजीपति वर्ग ने उसे धूल में फेंक दिया । उसने इन पवित्र सिद्धान्तों को व्यापक जनता तक ले जाने की जगह केवल अपने और अपने सहयोगी, सभ्रान्त वर्गों तक ही सीमित कर दिया । साथ ही जिन सामन्ती मूल्य–मान्यताओं और विचारों के खिलाफ उसके पुरखों ने जीवन–मरण का संघर्ष चलाया था उन्हीं के साथ उसने समझौता किया । अपने वर्गीय शासन को बनाये रखने के लिये जरूरी था कि बहुसंख्य मेहनतकश जनता को अंधविश्वासों और अतार्किक मताग्रहों के जाल में फँसाये रखा जाये, उन्हें भाग्य और भगवान की शरण में ही रहने दिया जाये । पूँजीवाद के पराभव और पतनशील साम्राज्यवादी दौर में आज विकसित देशों में ही कट्टरपंथी, अतार्किक और प्रतिगामी मूल्यों को तेजी से फलते–फूलते देख रहे हैं । नवनाजीवादी, फासीवादी ताकतें हर जगह सर उठा रही हैं और सत्ता के गलियारे तक पहुँचने के लिए हाथ–पाँव मार रही हैं ।


हमारे देश की स्थिति तो और भी विचित्र है जहाँ का शासक वर्ग जनतांत्रिक क्रान्तियों की पैदाइश नहीं है । उपनिवेशवादी दौर में अंग्रेजों की छत्रछाया में उत्पन्न वर्ग ने समझौते और दबाव की रणनीति अपना कर खुद को आगे बढ़ाया और सत्ता हस्तान्तरण के जरिये शासन की बागडोर सम्भाली । राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भी इसने सामन्तवाद से समझौता किया । अपनी वर्गीय सीमाओं के चलते अर्थव्यवस्था सहित जीवन के हर क्षेत्र में उपनिवेशवाद विरोधी, सामन्तवाद विरोधी जनवादी कार्यभारों को क्रान्तिकारी तरीके से पूरा नहीं किया । आधे–अधूरे सुधारों के जरिये एक विकलांग–विकृत पूँजीवादी समाज अस्तित्व में आया । ऐसे समाज में स्वस्थ्य पूँजीवादी मूल्यों और वैज्ञानिक नजरिये का अभाव कोई आश्चर्य की बात नहीं । संविधान में दर्ज धर्मनिरपेक्षता की व्याख्या यहाँ सर्वधर्म सम्भाव के रूप में की जाती है । धार्मिक भावनाओं पर चोट पहुँचने की आड़ में प्रगतिशील विचारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अक्सर गला घोंटा जाता है । शासन–प्रशासन के स्तर पर हिन्दू कर्मकाण्डों का प्रयोग यहाँ आम बात है । नेताओं–अधिकारियों द्वारा सरकारी कार्यक्रमों में नारियल फोड़ना, हवन–पूजन, अनुष्ठान या भजन–कीर्तन सर्वस्वीकृत है । सरकारी पार्कों और सार्वजनिक जमीन पर पूजा स्थल, यहाँ तक कि सरकारों कार्यालयों और थानों में मंदिर होना कानून सम्मत है । सरकार के शीर्ष अधिकारियों–नेताओं द्वारा सार्वजनिक रूप से अंधश्रद्धा को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों में भागीदारी और समाचार माध्यमों से उनका प्रसारण भी वैध है । दक्षिणपंथी पार्टियों के शासन वाले राज्यों में धर्मनिरपेक्षता का मजाक उड़ाते हुए बड़े पैमाने पर यही काम कानून के जरिये किया जा रहा हैं ऐसे में बहुसंख्य अशिक्षित जनता का अंधविश्वास और कट्टरपंथ की गिरफ्त में होना या अपने आचरण व्यवहार में वैज्ञानिक नजरिये न अपनाना कोई आश्चर्य की बात नहीं ।


इक्कीसवीं सदी के इस मुकाम पर हमारे देश में मध्ययुगीन अवैज्ञानिक–अतार्किक, जड़मानसिकता का प्रभावी होना बहुत ही चिन्ता का विषय है  । यह हमारे देश और समाज की प्रगति में बहुत बड़ी बाधा है । हालाँकि वैज्ञानिक चेतना और दृष्टिकोण के प्रचार–प्रसार में नई सरकारी–गैर सरकारी संस्थायें सक्रिय हैं, लेकिन उनका प्रभाव अभी बहुत ही सीमित है ।


इस पुस्तिका में संकलित लेख वैज्ञानिक नजरिया विकसित करने की दिश में सक्रिय एक ऐसे ही मंचµ द बैंगलोर साइन्स फोरम द्वारा 1987 में प्रकाशित ‘‘साइन्स, नॉन साइन्स एण्ड द पारानौरमल’’ नामक संकलन से लिये गये हैं । इस संकलन में विज्ञान और वैज्ञानिक नजरिये से सम्बन्धित गम्भीर लेखों के अलावा अंधविश्वास और चमत्कार का पर्दाफासा करने वाले कई लेख संकलित हैं । डॉ– एच नरसिंम्हैया के नेतृत्व में गठित जाने माने वैज्ञानिकों के इस मंच ने विज्ञान और वैज्ञानिक नजरिये के प्रचार–प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है । अपनी क्षमता और सीमा को देखते हुए हमने इनमें से 10 लेखों का चुनाव किया और हिन्दी पाठकों के लिए उनका अनुवाद प्रस्तुत किया है । आगे इस विषय पर अन्य लेखों का अनुवाद भी प्रकाशित करने का प्रयास किया जायेगा । पाठकों से अनुरोध है कि वे इस पुस्तिका के बारे में अपने सुझाव और आलोचना से हमें अवश्य अवगत करायेंगे ।  
गार्गी प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक– विज्ञान और वैज्ञानिक नजरिया की भूमिका) 

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