Category Archives: जेवियर हेरौद पेरेज़

जेवियर हेरौद पेरेज़ की कविता

jeviyar harod parej जेवियर हेरौद पेरेज़ (1942-1963) पेरू के कवि और नेशनल लिबरेशन आर्मी सदस्य थे। अठारह साल की उम्र में उनके दूसरे कविता संग्रह को पेरू का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान प्रदान किया गया।

जनवरी 1963 में,  21 वर्षीय कवि जेवियर हेरौद  और एलेन इलियास के नेतृत्व में एक क्रान्तिकारी समूह ने हथियार लेकर बोलीविया की सरहद पार की और दक्षिणी पेरू में प्रवेश किया। गंभीर बीमारी से ग्रस्त 15 सदस्यीय टीम ने इलाज के लिए प्योर्तो माल्दोनादो शहर में प्रवेश करने का फैसला किया। स्थानीय पुलिस समूह को पहले ही सूचना मिल गयी थी. पेरू की पुलिस ने 15 मई को हेरौद को  सीने में गोली मार दी जब वे एक डोंगी में बैठ कर शहर से गुजर रहे थे। वह एक ऐसा दौर था जब लातिन अमरीका संघर्ष और सृजन के नए-नए कीर्तिस्तम्भ खड़ा हो रहे थे। उनकी मृत्यु के चार साल बाद ही सीआईए की साजिशों के तहत चे ग्वेरा की बोलीविया में इसी तरह हत्या की गयी थी। प्रस्तुत है जेवियर हेरौद पेरेज़ की एक कविता—

नदी हूँ मैं

1.

मैं एक नदी हूँ, विराट पत्थरों से होकर बहती,
कठोर चट्टानों से होकर गुजरती,
हवा तय करती है मेरे रास्ते।
मेरे आस-पास के पेड़ बारिश में सराबोर हैं।
मैं एक नदी हूँ, भरपूर गुस्से के साथ बहती नदी,
बेपनाह प्रचंडता के साथ,
जब भी कोई पुल अपनी तिरछी परछाईं मुझमें बिखेरता है।

2.

मैं एक नदी हूँ, एक नदी,
एक नदी, हर सुबह स्फटिक की तरह साफ़।
कभी-कभी मैं नाजुक और विनम्र होती हूँ।
मैं उर्वर घाटियों से शान्तिपूर्वक फिसलती हूँ।
मैं पशु और सीधे-सच्चे लोगों को
जितना चाहें पिलाती हूँ अपना पानी।
दिन में बच्चे तैर-तैर आते हैं मेरे भीतर
रात में स्पन्दित प्रेमी झाँकते हैं मेरी आँखों में।
और डुबकी लगाते हैं
मेरे भुतहे पानी के गहरे अँधेरे में।

3.

मैं एक नदी हूँ।
लेकिन कभी-कभी होती हूँ बेरहम और मजबूत।
कभी-कभी जिन्दगी या मौत का नहीं करती सम्मान।
झरने के उत्ताल तरंग में उछलती-कूदती,
मैं  बार-बार पीटती हूँ चट्टानों को
अनगिनत टुकड़ों में तोड़ती हूँ।
पशु भागते हैं। वे भागते हैं।
जब मैं उनके मैदानों में सैलाब बनकर उतरती हूँ।
जब मैं उनकी ढलानों में बोती हूँ छोटे-छोटे कंकड़-पत्थर।
जब मैं उनके घरों और चरागाहों को डुबोती हूँ।
जब बाढ़ में डुबोती हूँ उनके दरवाजे और उनके दिल,
उनकी उनके शरीर और उनके दिल।

4

और यह तब होता है, जब मैं तेजी से नीचे आती हूँ–
जब मैं उनके दिलों में पैठ सकती हूँ
और उनके लहू पर भी काबू कर सकती हूँ
और मैं उनके अंदर से उनको निहार सकती हूँ।
फिर मेरा गुस्सा शांत हो जाता है
और मैं एक पेड़ बन जाती हूँ।
मैं एक पेड़ की तरह खुद को जड़ लेती हूँ
और पत्थर की तरह मौन हो जाती हूँ
काँटा रहित गुलाब की तरह मैं शान्त हो जाती हूँ।

5

मैं एक नदी हूँ.
मैं नदी हूँ अनन्त खुशियों की.
मैं महसूस करती हूँ दोस्ताना शीतल हवाएँ.
महसूस करती हूँ अपने चेहरे पर मंद समीर
अपनी अन्तहीन यात्रा के दौरान.

6

मैं नदी हूँ जो यात्रा करती है
किनारों, सूखे पेड़ों और रूखे पत्थरों के साथ,
मैं नदी हूँ जो हिलोरे मारती गुजरती है
तुम्हारे कानों, तुम्हारे दरवाजों और तुम्हारे दिलों से होकर.
मैं नदी हूँ जो यात्रा करती है
घास के मैदानों, फूलों, गुलाब की झुकी डालियों से होकर,
मैं एक नदी हूँ जो यात्रा करती है
सडकों के साथ-साथ, धरती के आरपार, नम आकाश के नीचे.
मैं नदी हूँ जो यात्रा करती है
पहाड़ों, चट्टानों और खारे झरनों से होकर.
मैं नदी हूँ जो यात्रा करती है
मकानों, मेजों, कुर्सियों से होकर.
मैं नदी हूँ जो यात्रा करती है
इन्सान के भीतर— पेड़, फल, गुलाब, पत्थर,
मेज, दिल, दिल, दरवाजा—
हर चीज जो मेरे आगे आये.

7

मैं नदी हूँ जो गाती है लोगों के लिए भरी दुपहरी में.
मैं उनके कब्र के आगे गाती हूँ.
मैं उन पवित्र स्थानों की ओर मुड़ जाती हूँ.

8

मैं नदी हूँ जो रात में बदल गयी है.
मैं उतरती हूँ उबड़-खाबड़ गहराइयों में,
भुला दिए गये अनजान गाँवों के निकट,
लोगों से अटी पड़ी खिडकियों वाले शहरों के करीब.
मैं नदी हूँ,
बहती हूँ घास के मैदानों से होकर.
हमारे किनारे खड़े पेड़ जीवित हैं कबूतरों के संग-साथ.
पेड़ गाते हैं नदी के साथ,
पेड़ गाते हैं मेरे पंछियों के ह्रदय से,
नदियाँ गाती हैं मेरी बाहों में बाहें डाल.

9

वह घड़ी आएगी
जब मुझे विलीन हो जाना पड़ेगा
सागर में,
कि मिला सकूँ मैं अपना निर्मल जल उसके धुँधले पानी में.
हमें अपने चमकीले गीत को चुप करना होगा,
हमें बन्द करना होगा वह गपशप
जो प्रभात की अगवानी में हर रोज किया करती थी,
मैं अपनी आँखें सागर जल से धो लूँगी.
वह दिन आएगा,
और उस अनन्त सागर में
मैं नहीं देख पाउंगी अपने उर्वर खेतों को,
नहीं देख पाऊँगी मैं अपने हरे पेड़ों को,
मेरे आसपास की हवा,
मेरा निर्मल आकाश, मेरी गहरी झील,\
मेरा सूरज, मेरे बादल,
मैं कुछ नहीं  देखपाऊँगी,
सिवाय उस अनन्त नीलाभ स्वर्ग के
जहाँ हर चीज घुलीमिली है,
पानी के विराट विस्तार में,
जहाँ एक और गीत या कोई दूसरी कविता का
इसके सिवा कोई अर्थ नहीं होगा
कि कोई तुच्छ नदी बहकर नीचे आती,
या कोई हहरारती नदी मुझ से मिलने आती,
मेरे नए चमकीले पानी में,
हाल ही में विलुप्त मेरे जल में.

(अनुवाद- दिगम्बर)

Advertisements
%d bloggers like this: