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धरती : एक वर्जित ग्रह

-जोर्ज मोनबियट

मानवता के सबसे बड़े संकट के साथ-साथ एक ऐसी विचारधारा का भी उदय हुआ, जो उस संकट के समाधान को असंभव बना देती है. 1980 के दशक के उत्तरार्ध में, जब यह साफ़ हो गया कि मानव निर्मित जलवायु परिवर्तन ने इस जानदार ग्रह और इसके निवासियों को खतरे में डाल दिया है, उसी समय दुनिया एक अतिवादी राजनीतिक सिद्धांत की गिरफ्त में आ गयी, जिसके जड़सूत्र ऐसे किसी भी हस्तक्षेप का निषेध करते हैं जो इस संकट से निजात पाने के लिए जरूरी हैं.

नवउदारवाद, जो बाजार-कट्टरपन्थ या मुक्त-बाजार अर्थव्यवस्था के नाम से भी जाना जाता है, इसका अभिप्राय बाजार को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करना है. इसका जोर इस बात पर है कि राज्य को बाजार की हिफाजत करने, निजी सम्पत्ति की रक्षा करने और व्यापार के रास्ते की बाधाएँ हटाने के अलावा और कुछ नहीं करना चाहिए. व्यवहार में यह चीज देखने को नहीं मिलती. नवउदारवादी सिद्धांतकार जिसे सिकुड़ना कहते हैं, वह लोकतंत्र के सिकुड़ने जैसा दिखता है- नागरिक जिन साधनों से अभिजात वर्ग की सत्ता पर अंकुश रख सकते हैं, उन्हें कम करते  जाना. जिसे वे “बाजार” कहते हैं, वह वास्तव में बहुराष्ट्रीय निगमों और चरम-धनवानों का स्वार्थ ही दिखाई देता है. लगता है, जैसे नवउदारवाद केवल अल्पतन्त्र को उचित ठहराने का साधन मात्र हो.
इस सिद्धांत को पहलेपहल 1973 में चिली पर आजमाया गया था. शिकागो विश्वविद्यालय के एक पुराने विद्यार्थी ने जो मिल्टन फ्रीडमैन के अतिवादी नुस्खों में दीक्षित हुए थे, सीआइए के पैसे से जेनरल पिनोचे के साथ मिल कर वहाँ इस सिद्धांत को जबरन लागू करवाया, जिसको किसी लोकतान्त्रिक देश में थोपना असंभव होता. इसका नतीजा एक ऐसी आर्थिक तबाही के रूप में सामने आया जिसमें धनी वर्ग, जिसने चिली के उद्योगों के निजीकरण के बाद उनका मालिकाना हथिया लिया था और वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों पर पूरी तरह कब्ज़ा कर लिया था, लगातार समृद्ध होता गया.
इस पंथ को मारग्रेट थैचर और रोनाल्ड रीगन ने अपना लिया. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोश और विश्व बैंक ने इसे गरीब देशों पर जबरदस्ती थोपा. जब 1988 में जेम्स हानसेन ने अमरीकी सीनेट में पहली बार धरती के तापमान में भावी बढ़ोतरी के बारे में अपना विस्तृत माडल प्रस्तुत किया, तब इस सिद्धांत को पूरी दुनिया में लागू करवाया जा रहा था.
जैसा कि हमने 2007 और 2008 में देखा (जब नवउदारवादी सरकारों को बाध्य किया जा रहा था कि वे बैंकों को उबारने से सम्बंधित अपनी नीति को त्यागें), तब किसी तरह के संकट का सामना करने की इतनी खराब परिस्थिति इससे पहले शायद ही कभी रही हो. जब कोई विकल्प न रह जाय तबतक, संकट चाहे जितना ही तीक्ष्ण हो और उसके परिणाम चाहे जितने भी गम्भीर क्यों न हों, आत्म-घृणाशील राजसत्ता दखल नहीं देगा. लेकिन नवउदारवाद सभी तरह की मुसीबतों से अभिजात वर्ग की हिफाजत करता है.
विश्व बैंक, अंतरार्ष्ट्रीय ऊर्जा एजेन्सी और प्राइसवाटरहाउसकूपर जैसे हरित अतिवादियों ने इस शताब्दी के लिए चार डिग्री, पांच डिग्री और छः डिग्री ग्लोबल वार्मिंग का जो पूर्वानुमान लगाया है, उसके चलते होनेवाले पर्यावरण विनाश से बचने का मतलब होगा- तेल, गैस और कोयला उद्योग से सीधे टक्कर लेना. इसका मतलब है उद्योगों पर इस बात के लिए दबाव डालना कि वे अपने अस्सी फीसदी से भी अधिक खनिज तेल भंडार का त्याग करें, जिसे जलाए जाने से होने वाला नुकसान हमारे बर्दास्त से बाहर है. इसका मतलब है नए तेल भंडारों का पता लगाने और उन्हें विकसित करने कि कार्रवाइयों को रद्द करना, क्योंकि जब हम पहले वाले भण्डार का ही इस्तेमाल नहीं कर सकते, तो नया खोजने से क्या फायदा? और इसका मतलब होगा ऐसे किसी भी नए संरचनागत ढाँचे के निर्माण (जैसे- हवाई अड्डे) पर रोक लगाना, जिसे बिना तेल के चलाना ही सम्भव न हो.
लेकिन आत्म-घृणाशील राजसत्ता कोई कार्रवाई कर ही नहीं सकती. जिन स्वार्थों से लोकतंत्र को बचना चाहिए, उनकी गिरफ्त में होने के चलते वे केवल बीच सड़क पर बैठे, कान खोदते और मूँछ ऐंठते रहेंगे, जबकि धड़धड़ करता ट्रक उनकी ओर आता जायेगा. टकराहट वर्जित है, कार्रवाई करना प्राणघातक पाप है. आप चाहें तो कुछ पैसे वैकल्पिक ऊर्जा पर बिखेर सकते हैं, लेकिन पुराने कानूनों की जगह कोई नया कानून नहीं बना सकते.
बराक ओबामा वे उस नीति को आगे बढ़ाते हैं जिसे वे “सबसे श्रेष्ठ” बताते हैं- हवा, सौर, तेल और गैस को प्रोत्साहन देना. ब्रिटिश जलवायु परिवर्तन सचिव, एड डेवी पिछले हफ्ते सामान्य सदन में ऊर्जा बिल पेश करते हैं, जिसका उद्देश्य ऊर्जा आपूर्ति को कार्बन रहित बनाना है. उसी बहस के दौरान वे वादा करते हैं कि वे उत्तरी सागर और दूसरे विदेशी तेल कुओं में तेल और गैस के उत्पादन की “क्षमता को बढ़ाएंगे.”
लोर्ड स्टर्न ने जलवायु परिवर्तन को परिभाषित करते हुए कह था कि यह “यह बाजार व्यवस्था की ऐसी विराटतम और व्यापक दायरे वाली असफलता है, जो पहले कभी देखने में नहीं आई थी.” जून में बेमतलब का पृथ्वी सम्मेलन, दोहा में आजकल जिस पर बहस हो रही है वे बोदे उपाय, ऊर्जा बिल और ब्रिटेन में पिछले हफ्ते जारी बीजली की माँग घटाने से सम्बंधित परचा (बेहतर होता कि ये सारे उपाय समस्या की गंभीरता के मद्देनजर इतने गये-गुजरे न होते), ये सब कुछ बाजार कट्टरपंथ की विराटतम और व्यापकतम असफलता को बेनकाब करते हैं- यह हमारे अस्तित्व से जुड़ी इस समस्या को हल करने में इस व्यवस्था की अक्षमता को दर्शाता है.
हजार वर्षों की विरासत में मिला मौजूदा कार्बन उत्सर्जन ही मानव सभ्यता से मिलतीजुलती किसी भी चीज को चकनाचूर कर देने के लिए काफी है. जटिल समाजों ने समय-समय पर साम्राज्यों के उत्थान-पतन, प्लेग, युद्ध और अकालों को  झेल लिया. वे छः डिग्री जलवायु परिवर्तन को नहीं झेलपाएंगे जिसे शहस्राब्दी तक जारी रहना है. 150 वर्षों के विस्फोटक उपभोग की एवज में, जिसके ज्यातर हिस्से का मानवता की भलाई से कोई लेना-देना नहीं रहा, हम प्राकृतिक विश्व और उस पर निर्भर मानवीय व्यवस्था को खंड-खंड बिखेर रहे हैं.
दोहा जलवायु शिखर (या तलहटी) वार्ता तथा नए उपायों के बारे ब्रिटिश सरकार की चीख-पुकार से यह थाह लग जाता है कि मौजूदा राजनीतिक कार्रवाइयों की कितनी सीमाएं हैं. आप आगे बढ़े नहीं कि सत्ता के साथ आपकी प्रतिज्ञा भंग हुई, दोनों तरह की प्रतिज्ञाएं- चाहे वह परदे के पीछे की गयी हो या नवउदारवादी पंथ द्वारा उसे मान्यता मिली हो.       
नवउदारवाद इस समस्या की जड़ नहीं है – अक्सर इस विचारधारा का इस्तेमाल बेलगाम अभिजात वर्ग द्वारा दुनिया के पैमाने पर सत्ता, सार्वजनिक सम्पत्तियों और प्राकृतिक संसाधनों पर कब्ज़ा ज़माने को उचित ठहराने के लिए किया जाता है. लेकिन इस समस्या का तब तक समाधान नहीं किया जा सकता जब तक एक प्रभावशाली राजनितिक विकल्प के जरिये इस सिद्धांत को चुनौती नहीं दी जाती.     
दूसरे शब्दों में जलवायु परिवर्तन- और वे तमाम संकट जो मानव तथा प्रकृति को अपने शिकंजे में जकड़े हुए हैं- उनके खिलाफ संघर्ष में तब तक  जीत हासिक नहीं  की जा सकती है जब तक एक  व्यापक राजनीतिक संघर्ष न छेडा जाय, धनिक तंत्र के खिलाफ व्यापक जनता कि जनवादी गोलबंदी न की जाय. मेरा मानना है कि इसकी शुरुआत उस वित्तीय व्यवस्था के खिलाफ सुधार अभियान के जरिये होनी चाहिए जिसके माध्यम से बहुराष्ट्रीय निगम और धनाढ्य वर्ग राजनीतिक फैसलों और नेताओं की खरीद-फरोख्त करते हैं. अगले कुछ हफ़्तों के भीतर ही हमारे साथियों में से कुछ लोग ब्रिटेन में एक याचिका दायर करके इस मुहीम की शुरुआत करेंगे. मुझे यकीन है कि आप उस पर जरुर हस्ताक्षर करेंगे.          
लेकिन यह तो एक विनम्र शुरुआत भर होगी. निश्चय ही हमें एक नयी राजनीति की रूपरेखा तैयार करनी होगी- जो जन हस्तक्षेप को न्यायसंगत मानती हो, जिसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों  द्वारा बाजार को मुक्त कराने के घिनौने मकसद से कहीं ज्यादा महान उद्देश्य अन्तर्निहित हो, जो मुठी-भर उद्योगों को को खास तरजीह देकर उन्हें बचने के बजाय, आम जनता और इस सजीव संसार के अस्तित्व को ज्यादा अहमियत देती हो. दूसरे शब्दों में, एक ऐसी राजनीति जो हमारी अपनी हो, न कि मुट्ठी भर चरम अमीर तबके के लिए.
(4 दिसम्बर को गार्जियन में प्रकाशित लेख का आभार सहित प्रस्तुति. अनुवाद – दिगम्बर)
इस लेख में दिये गये पाद-टिप्पणियों का अनुवाद नहीं किया गया है. जिन पाठकों की रूचि हो, वे कृपया मूल अंग्रेजी पाठ देख लें, जिसका लिंक नीचे दिया गया है.

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पेशा चुनने के बारे में सलाह

-जोर्ज मोनबियट
(जार्ज मोनबियट पेशे से पत्रकार. पर्यावरणविद, लेखक और सक्रिय कार्यकर्ता हैं. इस लेख में हालाँकि उन्होंने पत्रकारिता की पढाई करने वाले विद्यार्थियों को ध्यान में रखते हुए पेशे के चुनाव पर अपने सुझाव दिए हैं, लेकिन यह लेख किसी भी नौजवान को अपनी जिंदगी का लक्ष्य और आदर्श तय करने में सही परिप्रेक्ष्य अपनाने में मददगार हो सकता है. यह लेख आभार सहित उनके वेबसाईट  http://www.monbiot.com से लिया गया है और इसका अनुवाद दिनेश पोशवाल ने किया है.)
            हर सप्ताह, कभी-कभी हर दिन, कोई न कोई व्यक्ति मुझसे यह सलाह लेने के लिए लिखता है कि वे अपने लिए किस पेशे का चुनाव करें. बदकिस्मती से, मैं सभी को जवाब नहीं दे सकता, इसलिए मैंने सोचा कि मुझे कुछ सामान्य दिशानिर्देश तैयार करने का प्रयास करना चाहिए, जिन्हें मैं आशा करता हूँ कि लोग अपने हालात के अनुसार थोड़ा फेर-बदल करके  इस्तेमाल करने में सक्षम होंगे. यह सलाह सिर्फ उन लोगों पर लागू होती है जिनके पास अपने पेशे के लिए वास्तविक विकल्प हैं, अफसोस इस बात का है कि यह बात दुनिया की बहुसंख्य आबादी,जिनके पास रोजगार के अवसर नहीं हैं, उन पर लागू नहीं होती. परन्तु जो लोग मुझे लिखते हैं, उनके पास अगर विकल्प नहीं होते, तो वे मुझसे यह प्रश्न भी नहीं पूछ रहे होते.
            हालांकि ये दिशानिर्देश दूसरे पेशों में काम करने वाले लोगों पर भी लागू हो सकते हैं, पर जो उदाहरण मैं इस्तेमाल करूँगा वे पत्रकारिता के पेशे से सम्बंधित होंगे, यह मानते हुए कि जिन लोगों से मैं मुखातिब हूँ, वे पत्रकार बनने के इच्छुक हैं, क्योंकि मैंने अपना ज्यादातर काम इसी क्षेत्र में किया है. इससे पहले कि आप मेरी सलाह पर अमल करें, मैं आपको इस बात से आगाह कर देना चाहूँगा कि आप सिर्फ मेरे शब्दों पर ही निर्भर ना रहें. मैं इस बात की गारंटी नहीं कर सकता कि यह रास्ता आपको कामयाबी दिलायेगा. आपको जितने ज्यादा से ज्यादा लोगों से संभव हो, सलाह लेनी चाहिए. आख़िरकार आपको अपने बारे में खुद ही निर्णय करना चाहिए मुझे या किसी और को आपके बारे में निर्णय लेने की इज़ाज़त दें.
            पहली सलाह जो मैं देना चाहूँगा वह यह कि आपका कालेज पेशे के चुनाव के बारे में जो सलाह देता है उसके प्रति सजग रहें. उदाहरण के लिये, पत्रकारिता स्कूल में विद्यार्थियों को सामान्यतः यह निर्देश दिया जाता है कि भले ही वे दक्षिणी अमेरिका में विकास के मुद्दों पर लिखने की इच्छा रखते हैं, पर इसके लिए आवश्यक योग्यता और अनुभव हासिल करने के लिए पहले कम से कम तीन साल उन्हें स्थानीय अखबार में काम करना चाहिए, इससे पहले कि वे राष्ट्रीय स्तर के अखबार में काम की तलाश करें, इससे पहले कि वे उस मौके को हासिल करने का प्रयास करें जो उन्हें उस कार्यक्षेत्र के निकट ला सके जिसमे वे प्रवेश करना चाहते हैं. दूसरे शब्दों में, आपको उस दिशा से विपरीत दिशा में यात्रा करने कि सलाह दी जा रही है जिधर आप जाना चाहते हैं. आप दक्षिणी अमेरिका जाना चाहते हैं? तो पहले आपको नानइटन जाना चाहिए. आप ज़पतिस्तास के बारे में लिखना चाहते हैं? तो पहले आपको कारपोरेट प्रेस रिलीज को ख़बरों में तब्दील करना सीख लेना चाहिए. आप आज़ाद होना चाहते हैं? तो पहले आप कैदी होना सीख लें.
            सलाहकार कहते हैं कि यदि आप विशेषज्ञता के जाल में नहीं फँसना चाहते, यानी आप रोजगार बाज़ार की बदलती माँगों के हिसाब से खुद को ढलने के लिए एक हद तक लचीला रहना चाहते हैं तो पेशे के लिए यही रास्ता अपनाना जरूरी है. परन्तु सच्चाई यह है कि जो रास्ता वे सुझाते हैं उस पर चलकर, आप एक विशेषज्ञ बन जायेंगे उन मूर्खतापूर्ण बातों के दोहराव  में माहिर, जिसे अमीर और ताकतवर लोग खबर समझते हैं. और ऐसा करते हुए कुछ साल बाद, आप किसी और काम के लायक नहीं रह जाते.
            दूसरे शब्दों में, पेशे का यह रास्ता शिक्षाविरोधी है. यह आपको वही सब सिखाता है जो आप करना नहीं चाहते, वही बनाता है जो आप बनना नहीं चाहते. वह एक अनूठा व्यक्ति होगा जो अपने उद्देश्यों और आदर्शों को अक्षुण्ण रखते हुए इस प्रक्रिया से निकल पाए. वास्तव में वह भी एक अनूठा व्यक्ति होगा जो इस प्रक्रिया से बाहर निकल पाए. कॉर्पोरेट और संस्थान, जो आप करना चाहते हैं उसके विपरीत काम आपसे कराना चाहते हैं. वह एक भरोसेमंद औजार चाहते हैं, एक ऐसा व्यक्ति जो सोच सकता है, परन्तु अपने लिए नहीं, बल्कि वह जो संस्था के लिए सोचता हो. आप जिस चीज में आप विश्वास करते हैं उसे कर सकते हैं, लेकिन तभी जब आपका वह विश्वास कारपोरेशन के हितों के साथ मेल खाता हो, और एक बार नहीं, बल्कि लगातार कई सालों तक. (मेरे लिए यह आश्चर्य की बात है कि कैसे इतने सारे लोगों का विश्वास संस्थागत शक्तियों की माँ के अनुरूप ढल जाता है, जब वे उस कम्पनी में एक या दो साल काम कर लेते हैं, भले ही उन कंपनियों की माँ समय के साथ  बदलती ही क्यों न रहें.)
            यहाँ तक की बुद्धिमान, दृढसंकल्प वाले व्यक्ति भी इस दुनिया में लगभग तुरंत ही अपने रास्ते से भटक जाते हैं. वे अपने नियोक्ताओं की माँग को पूरा करने और जिस प्रतिकूल दुनिया में उन्हें धकेल दिया गया है वहाँ अपना अस्तित्व बचाए रखने में इतना व्यस्त हो जाते हैं कि  अपने पेशे में जिस रास्ते पर वे वास्तव में चलना चाहते हैं उसका विकास कर सकें, इसके लिए उनके पास पर्याप्त समय या ऊर्जा शेष नहीं रह जाता. लेकिन यह रास्ता अपने आप ही नहीं बन सकता, आपको उस रास्ते का विकास करना पड़ता है. यह विचार एकदम मजाकिया है और  अक्सर अपनी नौकरी के प्रति असहज महसूस करने वाले, उन नव-नियुक्त लोगों द्वारा व्यक्त किया जाता है  कि उनहोंने जिस संस्थान को  चुना है उसे वे अंदर रहकर काम करते हुए सुधार देंगे, ताकि वह उनके विश्वास और नैतिक मूल्यों को प्रतिबिम्बित कर सके. कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी के बारे में हालिया बकवास के बावजूद, कार्पोरेशन अपने कर्मचारियों की अंतरात्मा पर नहीं, सिर्फ बाज़ार और अपने शेयरधारकों की माँ के अनुरूप काम करते हैं. यहाँ तक कि मुख्य कार्यकारी अधिकारी भी सिर्फ हाशिये पर ही कुछ प्रभाव डाल सकता है जिस क्षण भी उसकी अंतरात्मा उसकी कम्पनी के समझौता-विहीन उद्देश्यों, यानी मुनाफा पैदा करने और उसके शेयर की कीमत बढ़ाने में  बाधा डालती है, उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है.     
            इसका मतलब यह नहीं कि संस्थागत दुनिया में ऐसे अवसर ही नहीं है की आप अपने विश्वास का अनुसरण कर सकें. कुछ हैं, हालांकि वे आमतौर पर मुख्यधारा से बाहर हैं विशेष कार्यक्रम और पत्रिकायें, विशेष समाचार पत्रों के कुछ संभाग, छोटे पैमाने का उत्पादन करने वाली कम्पनियाँ जिनके प्रबंधकों ने अपने स्तर को बनाये रखा है. इस तरह की जगहों में नौकरियाँ दुर्लभ हैं, लेकिन अगर आपको ऐसी कोई नौकरी दिखायी देती है, तो पूरी ताकत और जिद के साथ उसे पाने का प्रयास करें. अगर नौकरी हासिल करने के बाद आपको ऐसा लगता है कि यह वैसी नहीं है जैसी प्रतीत होती थी या आपको ऐसा महसूस होता है कि आप लगातार उस काम से दूर जा रहे हैं जो आप करना चाहते हैं, तो उसे छोड़ने में जरा भी हिचकिचाहट ना दिखायें.   
            इसका मतलब यह नहीं कि आपको उन संस्थानों में काम का अनुभव नहीं लेना चाहिए, जिनके विश्व दृष्टिकोण को आप स्वीकार नहीं कर सकते, लेकिन तभी, जब ऐसा अवसर मिले और वहाँ उस तरह का जरूरी हुनर हासिल करने का मौका हो जो आप उनके खर्चे पर सीख सकें. लेकिन आपको इस प्रशिक्षण की सीमाओं के बारे में एकदम स्पष्ट सोच बनाये रखनी चाहिए, और उसी क्षण आपको वहाँ से बाहर जाना चाहिए जब आप वह सीख चुके हों जिसे आप सीखना चाहते हैं (सामान्यतः कुछ ही महीनों के बाद) और जब कम्पनी आप से ज्यादा फायदा उठाने लगे बजाय इसके की आप वहाँ काम करने का फायदा उठा सकें. जाने कितनी बार कार्पोरेशंस के लिए काम शुरू करने को तैयार विद्यार्थियों को मैंने यह दावा करते सुना है कि वे वहाँ पैसा कमाने  नहीं जा रहे हैं, वे वहाँ सिर्फ दो या तीन साल काम करेंगे, उसके बाद वह नौकरी छोड़ देंगे और फिर अपनी पसंद के पेशे का अनुसरण करेंगे? ना जाने कितनी बार मैं ऐसे लोगों से मिला वर्षों बाद मिला और पाया कि उन्होंने अपनी तनख्वाह के अनुरूप एक जीवनशैली, एक कार, एक ऋण हासिल कर लिया है, और उनके शुरूआती आदर्श धुंधली यादों की तरह मद्धिम पड़ गये हैं, जिन्हें अब वे नौजवानी की कल्पनायें कहकर खारिज कर देते हैं? ना जाने कितनी बार मैंने आज़ाद लोगों को अपनी आज़ादी कुर्बान करते देखा है?
            इस तरह पेशे के चुनाव को लेकर मेरी दूसरी सलाह बेंजामिन फ्रेंकलिन द्वारा दी गयी राजनैतिक सलाह की प्रतिध्वनि है जब कभी आपको आज़ादी और सुरक्षा के बीच चुनाव करना पड़े, तो आप आज़ादी को चुनें. वरना अन्त में आपके पास दोनों में से एक भी नहीं होगी. वे लोग जो एक सुरक्षित नौकरी और निश्चित तनख्वाह के वायदे पर अपनी आत्मा बेच देते हैं, जैसे ही वे लोग गैरजरूरी हो जाते हैं, उन्हें तुरंत ही बाहर फेंक दिया जाता है. आप किसी संस्थान के प्रति जितने ज्यादा वफादार होंगे, आप उतने ही ज्यादा शोषित, और आखिरकार बलि चढ़ाने के लायक बन जायेंगे.               
            निश्चय ही, इसका अभिप्राय यह नहीं है कि जो आप करना चाहते हैं उसे सीधे करना शुरू कर देंगे और आप उतना मेहनताना पाने लगेगें जितना आप चाहते हैं. लेकिन इसके लिए तीन संभावित तरीके हैं जिनकी मैं सलाह दूँगा.
            सबसे पहले आप यह तय करें कि आप आगे बढ़ना कैसे जारी रख सकेंगे. शुरूआत में कुछ समय के लिये खुद  ही आर्थिक प्रबंध करना संभव नहीं होगा, इसलिए आपको कुछ अतिरिक्त काम की आवश्यकता होगी ताकि आप जिन्दा रहने के लिए जरूरी धन जुटा सकें, परन्तु ऐसा काम जो बहुत ज्यादा मानसिक ऊर्जा की माँग करता हो. अगर आप मैक्सिको में ज़पतिस्तास के बारे में लिखना चाहते हैं, तो पहले आप वहाँ जाने के लिए जरूरी पैसा कमायें, और उनके बारे में लिखना शुरू कर दें. अगर आप चाहते हैं कि आपको उसकी उचित कीमत मिले, तो आपको अपने काम के प्रति उत्साही होना होगा. आपको अपनी ख़बरों के लिये, जो आप वहाँ से जुटाएंगे, उसके लिए सभी संभव बाज़ारों की छानबीन करनी होगी पत्रिकायें, अखबार, रेडियो, टेलीविजन, वेबसाइटस और प्रकाशक.
            वहाँ जाने से पहले आप जिन ख़बरों पर लिखना चाहते हैं, उसका स्पष्ट दृष्टिकोण होना चाहिए, बेहद सावधानी से इसकी योजना बनायें और इस मुद्दे पर जानकारी रखने वाले जितने ज्यादा लोगों से संभव हों, उनसे सम्पर्क बनायें. परन्तु उसी समय आपको उन खबरों के लिए भी तैयार रहना चाहिए जिनकी आपने अपेक्षा नहीं की थी, जिन्हें शायद किसी अनपेक्षित जगह स्थान मिल जाये. उदाहरण के लिये, वहाँ रहते हुए आपको वन्यजीवन पर एक खबर मिलती है, तो वन्यजीवन पत्रिका के लिए लेख लिखकर आप अपनी यात्रा के लिए धन जुटा सकते हैं. आप एक यात्रा वृतांत लिखकर या किसी वास्तुकलासम्बन्धी पत्रिका के लिए कुछ लिखकर या खाद्यान्न योजना के बारे में लिखकर कुछ अतिरिक्त धन जुटा सकते हैं. कभीकभी संपादक लीक से अलग सामग्री पाकर बेहद प्रसन्न होते हैं (हालाँकि वे ज्यादातर इसे समझ नहीं पाते). आप जितने ज्यादा संभव हो उतने संचार माध्यमों के लिए काम करें, और निरंतर डटे रहें.
            आप न्यूनतम संभव खर्चे में सफर करने और रहने के लिए तैयार रहें एक स्वतंत्र काम करने वाले के तौर पर अपने पहले चार सालों में मैंने अपने जीवनयापन पर औसतन पांच हज़ार पाउंड प्रतिवर्ष खर्च किये. गरीब दुनिया में सात साल काम करते हुए, मैं अपने खर्चे तीन हज़ार पाउंड प्रतिवर्ष तक कम रखने में सफल हो सका. एक स्वतंत्र काम करने वाले के लिए यह एक अच्छा अनुशासन है, भले ही आप कितना ही बेहतर कमा रहे हों. अगर आप पाँच हज़ार पाउंड प्रतिवर्ष पर रह सकते हैं, तो आप उससे छह गुणा ज्यादा सुरक्षित हैं जिसे जीने के लिए तीस हज़ार पाउंड की जरुरत है. इस सबके बावजूद, ब्रिटेन में विद्यार्थियों पर कर्जे के चलते किफायती जीवन की संभावनायें काफी हद तक धूमिल हो चुकी हैं बहुत से लोग जो काम ढूँढ रहे हैं वे पहले ही कर्जे के बोझ तले दबे हैं.
            कठिन मेहनत करें, पर जल्दबाजी ना करें. धीमेधीमे और नियमित रूप से अपना नाम स्थापित करें. और पत्रकारिता स्कूल चाहे कुछ भी कहे, अगर आप विशेषज्ञता का बुद्धिमानी से इस्तेमाल करें, तो वह आपको फांसने वाला जाल नहीं है, बल्कि जाल से बचकर निकलने का जरिया है. आप वह व्यक्ति बन सकते हैं जिसके बारे में संपादक तब सोचते हैं जब उन्हें किसी विशेष मुद्दे को किसी विशेष दृष्टिकोण से कवर करने की जरुरत होती है (जो कि वास्तव में, आपका दृष्टिकोण है). तब वे आपके विश्व नजरिये को प्राथमिकता देते हैं, कि आप उनके नजरिये को. यह आश्चर्यजनक है कि आप कितनी तेजी से एक विशेष कार्यक्षेत्र में विशेषज्ञ बन जाते हैं क्योंकि दूसरे बहुत थोड़े से पत्रकार ही उस विषय के बारे में कुछ भी जानते हैं. आपको अवसर हासिल होंगे, और मौके खुद ही आपको ढूँढ लेंगे.  

     दूसरा संभव रास्ता इस प्रकार है जो काम आप करना चाहते हैं, अगर शुरुआत में उसके लिए बाजार में घुसना कठिन लगता है, तो आप उस मुद्दे के साथ दूसरी तरह से जुड़ें. उदाहरण के लिये, अगर आप बेघरों के बारे में लिखना चाहते हैं (विकसित समाजों का एक बेहद कम प्रकाशित किया जाने वाला मुद्दा), तो यह आसान होगा कि आप एक ऐसे संगठन के साथ काम करें जो बेघरों की मदद करने का प्रयास करता है. उस मुद्दे को सीखते हुए अपना काम सीखें, और धीरेधीरे पत्रकारिता की ओर बढ़े. हालाँकि यह आपको अपने आदर्शों से एक या दो कदम दूर ले जायेगा, फिर भी आप उन लोगों के साथ काम कर सकेंगे जो उस मुद्दे का अनुभव करते हैं जिसमें आपकी दिलचस्पी है, बजाय इसके कि आप कॉर्पोरेट अखबार के दफ्तर में ऐसे तटस्थ आदमियों और महिलाओं के साथ काम करें जो स्वयं ही अपने सपनों को खो चुके हैं, और जो वास्तविक दुनिया के बारे में उतना ही कम जानते हैं जितना उन्हें पेशे की सलाह देने वाले, जिन्होंने वास्तव में इस नौकरी को हासिल करने में उनकी मदद की थी.            
            तीसरा रास्ता कठिन है, परन्तु यह उतना ही सही है. इसका अनुसरण उन लोगों ने किया है जिन्होंने मुख्यधारा के कर्मचारियों के साथ किसी भी तरह के काम की सीमाओं को समझ लिया है, और जिन्होंने अपने काम के लिए खुद ही रास्ते निकाले हैं. ज्यादातर देशों में कुछ वैकल्पिक अखबार और प्रसारक हैं, जो उन लोगों के द्वारा स्वेच्छापूर्वक चलाये जाते हैं जो अपनी जीविका के लिए खर्चा किसी तरीके से कमाते हैं. कुल मिलाकर, ये जबरदस्त साहसी ओर पक्के इरादे वाले लोग हैं, जिन्होंने अपने विश्वास को अपने आराम से ऊपर रखा है. ऐसे लोगों के साथ काम करना सिर्फ एक साधारण वजह से, सौभाग्यशाली और प्रेरणादायक हो सकता है, क्योंकि वेऔर इस तरह से आप भीआज़ाद हैं जबकि दूसरे आज़ाद नहीं हैं. दुनिया का सारा पैसा, और सारी प्रतिष्ठा, कभी भी आज़ादी के नुकसान की भरपाई नहीं कर सकते.    
            इस प्रकार मेरी आखिरी सलाह यह है- जब भी हकीकत के साथ जुड़ने या जिसे एरिक फ्राम धनदौलत और सत्ता की शवकामुक दुनिया कहते हैं, उससे जुड़ने के विकल्प से आपका सामना हो, तो जीवन को चुनें, उसकी स्पष्ट दिखायी देने वाली कीमत चाहे जितनी भी ज्यादा हो. आपके साथी शुरू में भले ही आपको तुच्छ समझे बेचारी नीना, वह छब्बीस साल की है और उसके पास अब तक कार भी नहीं है. लेकिन वे जिन्होंने धनदौलत और सत्ता को जीवन से ऊपर तरजीह दी है वे मौत की दुनिया में निवास करते हैं, जहाँ जिन्दा लोग अपनी कब्र पर लगाये जाने वाले स्मारक पत्थरों (उनके फ्रेम में जड़े हुए प्रमाणपत्र जो उस दुनिया में उनकी स्वीकार्यता को दर्शाते हैं) को अपनी दीवारों पर लगते हैं. याद रखिये कि टाइम्स का संपादक भी अपनी सारी कमाई और प्रतिष्ठा के बावजूद, मात्र एक ओहदेदार है, जिसे हर बात पर अपने अधिकारी से आदेश लेने होते हैं. उसके पास हम लोगों से कम आज़ादी है, भले ही आज टाइम्स का संपादक होने से बेहतर कुछ नहीं.
            आप जानते हैं कि आपके पास सिर्फ एक ही जीवन है. आप जानते हैं कि यह बहुमूल्य, असाधारण, और दुबारा हासिल नहीं होने वाली शै है यह अरबों साल की अकस्मात खोजों और क्रमिक विकास का नतीजा है. फिर हम इसे जिन्दा लाशों के हाथ सौंपकर बरबाद क्यों करें
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