Category Archives: जलवायु संकट

उत्तराखण्ड में भयावह तबाही : प्राकृतिक आपदा नहीं, अंधाधुंध पूँजीवादी विकास का नतीजा

प्रकृति के साथ आपराधिक छेड़-छाड और विकास के नाम पर हो रहे पर्यावरण विनाश के कारण उत्तराखंड में जो भयावह तबाही मची है वह प्राकृतिक आपदा नहीं है. बल्कि यह अंधाधुंध और बदहवास पूँजीवादी विकास का नतीजा है.
अब से 137 साल पहले महान विचारक फ्रेडरिक एंगेल्स ने ‘वानर से नर बनने की प्रक्रिया में श्रम की भूमिका’ नामक अपने लेख में प्रकृति और मानव जाति के बीच सामंजस्यपूर्ण सम्बन्धों को बाधित किये जाने के दुष्परिणामों के बारे में जो राय व्यक्त की थी वह आज हू-ब-हू हमारे सामने आ रहे हैं. प्रस्तुत है उस लेख का एक अंuttrakhandश–

…प्रकृति पर अपनी मानवीय विजयों के कारण हमें आत्मप्रशंसा में विभोर नहीं हो जाना चाहिए, क्योंकि वह हर ऐसी विजय का हमसे प्रतिशोध लेती है. यह सही है कि प्रत्येक विजय से पहले-पहल वे ही परिणाम प्राप्त होते हैं, जिनका हमने भरोसा किया था, पर दूसरी और तीसरी बार उसके बिलकुल ही भिन्न और अप्रत्याशित परिणाम होते हैं, जिनसे अक्सर पहले परिणाम का असर जाता रहता है. मेसोपोटामिया, यूनान, एशिया माइनर तथा अन्य स्थानों में जिन लोगों ने कृषियोग्य भूमि प्राप्त करने के लिये वनों को बिलकुल ही नष्ट कर डाला, उन्होंने कभी यह कल्पना तक नहीं की थी कि वनों के साथ आर्द्रता के संग्रह-केन्द्रों और आगारों का उन्मूलन करके वे इन देशों की मौजूदा तबाही की बुनियाद डाल रहे हैं. आल्प्स के इटलीवासियों ने जब पर्वतों की दक्षिणी ढलानों पर चीड़ के वनों को (ये उत्तरी ढलानों पर खूब सुरक्षित रखे गये थे) पूरी तरह से तबाह काट डाला तब उन्हें इस बात का अहसास नहीं था कि ऐसा करके वे अपने प्रदेश के पहाड़ी पशु-पालन पर कुठाराघात कर रहे हैं. इससे भी कम आभास उन्हें इस बात का था कि अपने कार्य द्वारा वे अपने पर्वतीय स्रोतों को वर्ष के अधिक भाग के लिये जलहीन बना रहे हैं और साथ ही इन स्रोतों के लिये यह सम्भव बना रहे हैं कि वे वर्षाऋतु में मैदान में और भी भयावह बाढ़ें लाया करें… हमें हर पग पर यह याद कराया जाता है कि प्रकृति पर हमारा शासन किसी विदेशी जाति पर एक विजेता के शासन जैसा कदापि नहीं है, वह प्रकृति से बाहर के किसी व्यक्ति जैसा शासन नहीं है, बल्कि रक्त, मांस और मस्तिष्क से युक्त हम प्रकृति के ही प्राणी हैं, हमारा अस्तित्व उसके ही मध्य है और उसके ऊपर हमारा सारा शासन केवल इस बात में निहित है कि अन्य सभी प्राणियों से हम इस मानी में श्रेष्ठ हैं कि हम प्रकृति के नियमों को जान सकते हैं और ठीक-ठीक लागू कर सकते हैं.
…जैसा समाज के संबंध में वैसे ही प्रकृति के संबंध में भी वर्तमान उत्पादन-प्रणाली मुख्यतया केवल प्रथम, ठोस परिणाम भर से मतलब रखती है. और तब विस्मय प्रकट किया जाता है कि इस उद्देश्य की पूर्ति के किये गये क्रियाकलाप के दूरवर्ती प्रभाव बिलकुल दूसरे ही प्रकार के, बल्कि मुख्यतया बिलकुल उल्टे ही प्रकार के होते हैं; कि पूर्ति और माँग का तालमेल बिलकुल विपरीत वस्तु में परिणत हो जाता है…

आर्कटिक महासागर की बर्फ अगले 10 सालों में गायब हो जाएगी : एक अध्ययन

यूरोपियन स्पेस एजेंसी द्वारा की गयी एक नयी पैमाइश के अनुसार आर्कटिक महासागर की बर्फ अगले 10 सालों में पूरी तरह पिघल जाएगी. बर्फ पिघलने की यह रफ़्तार पहले जितना  अनुमान लगाया गया था, उससे कहीं तेज है.

एक अध्ययन के मुताबित, 2004 से हर साल 900 घन किलोमीटर बर्फ गायब हुई है. आर्कटिक बर्फ की मोटाई नापने के लिए वैज्ञानिकों ने आर्कटिक के ऊपर उड़ने वाले नासा जहाजों से और बर्फ के अंदर चलने वाली पनडुब्बियों द्वारा अल्ट्रा-साउंड (सोनर) मापक से प्राप्त आकडों का उपयोग किया. साथ ही, उन्होंने इस काम के लिए खासतौर पर विकसित सैटेलाइट तकनोलोजी- क्रिस्टोसैट- 2 प्रोब का भी इस्तेमाल किया जो बर्फ की मोटाई नापने की ऐसी पहली तकनीक है.

लंदन सेंटर फॉर पोलर आब्जर्वेसन एण्ड माडलिंग के डॉ सीमूर लैक्सोन ने गार्जियन को बताया की “जल्द ही गरमी के मौसम में किसी दिन हम ऐसे यादगार पल का अनुभव कर सकते हैं कि जब हम सैटेलाइट से प्राप्त तस्वीरों पर नज़र डालें तो हमें आर्कटिक पर बर्फ की कोई चादर ही दिखाई न दे, केवल पानी ही पानी नजर आये.

एक नयी पैमाइश के मुताबिक न केवल ग्रीष्मकालीन समुद्री बर्फ से ढका क्षेत्र तेजी से पीछे सरका है, बल्कि बची-खुची बर्फ की मोटाई भी काफी तेज़ी से कम होती जा रही है.

अध्ययन से पता चलता है कि आर्कटिक बर्फ पहले लगाये गये अनुमान की तुलना में 50 प्रतिशत तेज़ी से पिघल रही है.

पिछली गर्मी के अंत में आर्कटिक पर लगभग 7000 घन किलोमीटर बर्फ ही बची रह पाई, जो 2004 में 13000 घन किलोमीटर बची हुई बर्फ की तुलना में लगभग आधी ही रह गई.

आर्कटिक की बर्फ पिघलने से समुद्र का तापमान बढ़ता है, जिससे समुद्र की सतह पर जमा मिथेन पिघलता है और भारी मात्रा में ग्रीनहाउस गैस वायुमंडल में जमा हो जाती है. इसके चलते बर्फ और भी तेजी से पिघलती है और इस चक्रीय गति के कारण जलवायु परिवर्तन की गति तेज हो जाती है.

यूसीएल के प्रोफेसर क्रिस राप्ले ने गार्जियन को बताया की “आर्कटिक और भूमध्य रेखा के बीच तापमान का जो अंतर आज बढ़ रहा है, उसके कारण ऊपरी वायुमंडल में स्थित जेट स्ट्रीम काफी अस्थिर हो सकती हैं. इसका नतीजा होगा निम्न अक्षांशो पर मौसम की अस्थिरता का बहुत ज्यादा बढ़ जाना, जैसा इस साल हम झेल चुके हैं.

(कॉमन ड्रीम्स डॉट ऑर्ग के प्रति आभार सहित. अनुवाद- सतीश)

अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें.

कारपोरेट-चालित “हरित अर्थतंत्र”- रियो सम्मलेन का एक नया तमाशा

                                        -जनेट रेडमैन


फेयरफैक्स, वर्जीनिया निवासी मेरी एक करीबी दोस्त को उसकी पहली संतान होने वाली है. जब वह बच्ची 60 साल की होगी, उस वक्त उसे इतनी तपती हुई धरती पर जीना होगा, जितनी गरमी 25 लाख साल पहले इस धरती पर इंसान की चहलकदमी शुरू होने से लेकर आज तक नहीं रही.

आज भी यह दुनिया ठीक एक पीढ़ी पहले की तुलना में बहुत ही अलग दिख रही है. जिस खतरनाक दर से पौधे और जीव-जंतु गायब हो रहे हैं कि वैज्ञानकों को यह पूछना पड़ रहा है- क्या हम छठे व्यापक विलोप के युग में प्रवेश कर रहे हैं. समुद्र में मछलियों की मात्रा, जो एक अरब से भी अधिक लोगों के लिए प्रोटीन का मुख्य स्रोत है, तेजी से घट रही है और हाल के वर्षों में रहस्यमय कोरल रीफ (मूंगे की दीवार) का विलुप्त होना पहले से ही खराब स्थिति को और भी बदतर बना रहा है. इस ग्रह की सतह के आधे से भी अधिक हिस्से पर आज “एक स्पष्ट मानव पदचिह्न” मौजूद है.

यही वे हालात हैं जिनसे बचने की उम्मीद लेकर दुनिया भर के राजनेता अब से बीस साल पहले रियो द जेनेरियो, ब्राजील के पृथ्वी सम्मलेन 1992 में जमा हुए थे.
बीस साल पहले ही, नीति निर्माताओं को यह पता था कि मानव क्रियाकलाप पर्यावरण को नुकसान पहुँचा सकते हैं. लेकिन वे इस सच्चाई से भी रूबरू थे कि दुनिया की लगभग आधी आबादी गरीबी में जी रही है तथा उनको जमीन, पानी, भोजन, सम्मानपूर्ण रोजगार और बेहतर जीवन के लिए आवश्यक सामग्री हासिल करना जरूरी है.

इन दोनों सच्चाइयों को एक साथ मिलाने के लिए रियो सम्मलेन ने “टिकाऊ विकास” को अंगीकार किया- एक ऐसा आर्थिक माडल जो भावी पीढ़ियों की अपनी जरूरतें पूरी करने की क्षमता के साथ बिना कोई समझौता किये, आज की जरूरतों को पूरा करता हो. सरकारों ने एजेंडा 21 नाम से टिकाऊ विकास का खाका स्वीकृत किया, जो 21 वीं सदी कि ओर उन्मुख था. साथ ही उन्होंने जैवविविधता, जलवायु परिवर्तन और रेगिस्तानीकरण के बारे में वैश्विक पर्यावरण समझौतों की भी शुरुआत की.  

वैश्विक समुदाय फिर से रियो में इस दुखद सच्चाई का सामना करने के लिए एकत्र हो रहा है कि इस दिशा में कोई खास प्रगति नहीं हुई है. हर किसी के दिमाग में वैश्विक वित्तीय संकट, उथल-पुथल मचा देने वाली आर्थिक असमानता और कारपोरेट की गलाकाटू प्रतियोगिता के भय से किसी फैसले को लागु करने की इच्छा का अभाव है.

आखिर गडबड क्या हुआ? इसका आंशिक उत्तर यह है कि मूल पृथ्वी सम्मलेन ने दो बेहद जरूरी मुद्दों को इस तरह नजरन्दाज किया, जैसे कोई कमरे में घुस आये हाथी की अनदेखी करे. पहला यह कि सीमित ग्रह पर असीम विकास एक बेकार की कवायद है. और दूसरा, कि उत्तरी अमरीका, यूरोप और जापान में रहनेवाली दुनिया की 20 फीसदी आबादी पृथ्वी के 80 फीसदी संसाधनों को गड़प कर जाती है. ऐसा नहीं लगता कि रियो+20, (इस नयी बैठक का यही नाम रखा गया है), इस मर्तबा भी इन दोनों हाथियों को पहचान पायेगा.

रियो की और कूच कर रहे नेता मिथकीय “हरित अर्थतंत्र” कि बढचढकर दलाली करते हुए बता रहे हैं कि इससे हमारी जलवायु सम्बंधी सभी समस्याओं का समाधान हो जायेगा. हालाँकि अभी तक इसे ठीक से परिभाषित भी नहीं किया गया है, फिर भी आम तौर पर वे लोग इसे आर्थिक विकास के एक ऐसे माडल के रूप में प्रचारित कर रहे हैं, जो स्वच्छ ऊर्जा, जलवायु-प्रतिरोधी खेती तथा दलदली इलाकों की जमीन सुखाने जैसी पारिस्थितिकी तंत्र से सम्बंधित सेवाओं के क्षेत्र में भारी पैमाने पर निजी पूँजी निवेश पर आधारित होगा. इस नई अवधारणा के तहत, व्यापार के इन तमाम नए-नए अवसरों के जरिये वाल स्ट्रीट बेहिसाब मुनाफा कमाएगा और धनी देशों की सरकारों को पर्यावरण की हिफाजत पर कोई खास खर्च नहीं करना पड़ेगा.

आश्चर्य की बात नहीं कि किसान, मूलनिवासी समुदाय, कर्ज-विरोधी कार्यकर्त्ता और जनसंगठन इस “हरित अर्थतंत्र” की लफ्फाजी को “हरित लीपापोती” कह कर ख़ारिज करते हैं.

ढेर सारे पर्यावरणवादियों और गरीबी-विरोधी संगठनों ने जिस खतरे को प्रतिध्वनित किया है वह यह कि पानी या जैवविविधता जैसी चीजों के उपयोग का प्रबंधन करने के नाम पर उनकी कीमत तय करके हम उन्हें माल में तब्दील कर देते हैं. साथ ही इस नीति के चलते इन बुनियादी जरूरतों और सेवाओं को सट्टेबाजों का मुहरा बना दिया जायेगा जो बेलगाम कीमतों के जरिये बेहिसाब मुनाफा कमाएंगे.
जरा इस बारे में सोचिये? क्या इसका कोई मतलब है कि हम अपने बचे-खुचे साझा संसाधनों- जंगल, जीन, वातावरण, भोजन को ऐसे लोगों को सुपुर्द कर दें जो हमारी अर्थ व्यवस्था को अपना निजी जुआघर समझते हैं?

यह कोई इत्तफाक नहीं कि जब जमीन और पानी का इंतजाम करने की जिम्मेदारी लोगों पर है, तब वे किसी दूर-दराज कार्यालय भवन में बैठे हेज फंड मैनेजरों की करामात पर नहीं, बल्कि अपनी बेहतर कमाई पर जीते और गुजारा करते हैं. प्रकृति के बारे में फैसला लेने का अधिकार वित्तीय क्षेत्र के हाथों में केंद्रित करने के बजाय, रियो+20 सम्मलेन को चाहिए कि प्राकृतिक संसाधनों के स्थानीय, लोकतान्त्रिक संचालन को प्रोत्साहित करे.

इस उपाय से कम से कम इतना तो होगा कि जब हमारी दोस्त की बेटी मतदान करने की उम्र में पहुँचेगी, तब तक यह धरती इस हालात में रह पायेगी कि इसे बचाने के लिए लड़ा जाय.
(जनेट रेडमैन, इन्स्टिच्युट फॉर पॉलिसी स्टडीज में सस्टेनेबुल इनर्जी एण्ड इकोनोमी नेटवर्क परियोजना के सह-निदेशक हैं. यह संस्था अमरीका और दुनिया भर में शांति, न्याय और पर्यावरण से जुड़े विद्वानों और कार्यकर्ताओं का एक समुदाय है. यह लेख काउंटरकरेंट डॉट ऑर्ग से आभार सहित ले कर प्रस्तुत किया गया है. अनुवाद- दिगम्बर.) 

संसाधनों का ह्रास और पर्यावरण का विनाश -एक विनम्र प्रस्ताव

            -फ्रेड मैगडॉफ

(इस टिप्पणी में फ्रेड ने बड़े ही सरल और रोचक ढंग से यह बताया है कि दुनिया के मुट्ठीभर सबसे धनी लोग ही संसाधनों का सबसे ज्यादा उपभोग करते हैं और वे ही पर्यावरण और धरती के विनाश के लिए जिम्मेदार हैं, जबकि उलटे वे लोग गरीबों की जनसंख्या को इसके लिए दोषी ठहराते हुए एनजीओ के जरिये परिवार नियोजन कार्यक्रम चलवाते हैं. फ्रेड का सुझाव है कि गरीब जनता बहुत कम संसाधन खर्च करती है, इसलिए गरीबों की नहीं, बल्कि धनाढ्यों की जनसंख्या और दौलत पर रोक लगा कर ही धरती को बचाया जा सकता है. फ्रेड मैगडॉफ पारिस्थितिकी और अर्थशास्त्र के जानेमाने प्रोफ़ेसर और प्रतिष्ठित लेखक हैं.)  

दैत्याकार क्रेन 

धनी देशों में ढेर सारे लोग यह मानते हैं कि इस धरती पर जितने संसाधन उपलब्ध हैं उनमें लगातार  कमी होना और दुनिया भर में बढते पर्यावरण प्रदूषण कि मुख्य वजह आज भी दुनिया के निवासियों की विराट संख्या है जो सात अरब से भी ज्यादा है. यह स्थिति और भी खराब होगी क्योंकि विश्व-जनसंख्या इस सदी के मध्य तक 9 अरब और सदी के अंत तक 10 अरब हो जाने की संभावना है.
इसका समाधान यह सुझाया जा रहा है (वैसे कुछ लोगों का कहना है कि वास्तव मे कोई समाधान है नहीं- हम सब के भाग्य में उथल-पुथल और बर्बरता लिखी है) कि विश्व जनसंख्या को तेज़ी से घटाया जाय, खासकर ऐसे कार्यक्रमों के जरिये जो जन्म में कमी को प्रेरित करें. इसी का नतीजा हैं गरीब देशों में गर्भ निरोधकों के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करने के लिए धनी देशों के एनजीओ द्वारा वित्त पोषित कार्यक्रम जो महिलाओं के लिए गर्भ-निरोधक और परिवार नियोजन के उपाय मुहैय्या करते हैं.
इस मुद्दे पर वे लोग जो रुख अपना रहे हैं हम उसकी पडताल कभी बाद में करेंगे. यहाँ हम उनके इस दावे को पूरी तरह सही मानकर चलेंगे कि दुनिया की विशाल  जनसंख्या ही संसाधनों के इस्तेमाल और वैश्विक पर्यावरण की क्षति को बुरी तरह प्रभावित कर रही है.
विश्व बैंक के कर्मचारियों ने विश्व विकास सूचक- 2008  में यह आकलन प्रस्तुत किया है की दुनिया की 10 फीसदी सबसे धनी आबादी लगभग 60 फीसदी संसाधनों का इस्तेमाल करती है और 40 फीसदी सबसे गरीब आबादी इन संसाधनों का 5 फीसदी से भी कम इस्तेमाल करती है. संसाधनों के इस्तेमाल और जनससंख्या के बीच इस घनिष्ट सम्बंध को देखते हुए सबसे धनी 10 फीसदी लोग ही 60 फीसदी वैश्विक प्रदुषण, यानी ग्लोबल वार्मिंग, जल प्रदुषण, इत्यादि के लिए जिम्मेदार हैं.

अब विचारधारा को थोड़ी देर के लिए दरकिनार कर दें. अगर आप वैश्विक संसाधनों के इस्तेमाल और पर्यावरण विनाश के मामले को लेकर उतने ही चिंतित हैं जितना मैं और कई अन्य लोग, तो ये आँकड़े ऐसे नतीजे की ओर ले जाते हैं जिनसे कोई आँख नही चुरा सकता. गरीब परिवारों की जनसंख्या घटाने का प्रयास इस मामले को हल करने में बिलकुल मदद नहीं करेगा, क्योंकि संसाधनों और पर्यावरण से जुड़ी जिन समस्याओं का हम सामना कर रहे हैं उसके असली गुनाहगार दुनिया के लखपति-करोड़पति हैं.
इस सच्चाई के मद्देनज़र हमारा यह विनम्र सुझाव है कि दुनिया के सबसे धनी 10 फीसदी लोग अपनी जरूरतों में कटौती करें. हमारे ग्रह की पारिस्थितिकी और विश्व जनगण के लिए यह कदम बेहद जरूरी है. इसलिए मेरा प्रस्ताव है की निम्नलिखित कार्यक्रमों को फौरन लागू किया जाय-
(क)     लखपतियों-करोड़पतियों के लिए “कोई बच्चा नहीं “ या “केवल एक बच्चा” की नीति;

(ख)    पैतृक संपत्ति पर 100 फीसदी टैक्स तत्काल लागु करना, (यानी संपत्ति का उत्तराधिकार खत्म);
(ग)     और न्यूनतम आय-सीमा (न्यूनतम मजदूरी की तरह ) लागू करके लखपतियों-करोड़पतियों की आय को घटाना.
इन निर्देशों का पालन करते हुए हम जल्द ही दुनियाभर में संसाधनों के इस्तेमाल और प्रदुषण को घाटा कर आधा कर सकते हैं. तब लखपति-करोड़पति या तो दुनिया से गायब हो जायेंगे (मर-खप जायेंगे ) या ऐसी जिन्दगी जियेंगे जिसमें उनका उपभोग भी आम जनता की तरह ही सामान्य हो जाएगा.
तब, जब हम अपनी धरती पर भारी दबाब को घटा चुके होंगे, हम उन मुद्दों को हाथ मे लेंगे, जिनको हल करते हुए हम अपने इस ग्रह को रहने लायक और अपने समाज को न्यायपूर्ण बनायेंगे.

डरबन जलवायु सम्मेलन : अडंगेबाज देशों की धींगामुश्ती

                                                             – माइकल जैकोब्स

(क्वेटो सम्मेलन से लेकर कोपेनहेगन और अब डरबन में भी जलवायु वार्ताओं के दौरान साम्राज्यवादी देशों का रवैया टालमटोल रहा है. जिन देशों ने का बेपनाह दोहन करके उसे कबही की गर्त में धकेल दिया, वे अरब उसे बचने के नाम पर आनाकानी कर रहे हैं. और पूरी मानवता का विनाश करने पर आमादा हैं. जहाँ एक-एक दिन भरी पद रहा हो वहाँ ये साल डर साल की मोहलत लेना कहते हैं. इसी सम्बन्ध में प्रस्तुत है यह लेख.)
डरबन में जलवायु सम्मेलन का विरोध
मनोवैज्ञानिकों ने जब ज्ञान-वैषम्य (cognitiv dissonance) की परिघटना, यानी एक ही समय दो परस्पर बातों पर यकीन करने की क्षमता को पहचाना तो शायद वे अंतरराष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन समझौतों की व्याख्या कर रहे थे.
केवल इसी महीने, दो आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने ध्यान दिलाया है कि दुनिया के पास अब कुछ ही वर्ष बचे हैं जिसके भीतर खतरनाक ग्लोबल वार्मिंग से लड़ने के लिए पर्याप्त कार्रवाई शुरू कर देनी होगी.
संयुक्त राष्ट्र संघ पर्यावरण कार्यक्रम ने कार्बन उत्सर्जन की खाई पाटने सम्बंधी जो रिपोर्ट प्रस्तुत की है उसके अनुसार अगर सभी देश 2020 तक अपने उत्सर्जन लक्ष्यों को अधिकतम सीमा तक लागू कर दें, तब भी कुल उत्सर्जन उस लक्ष्य से अधिक होगा, जो संयुक्त राष्ट्र संघ ने ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक न बढ़ने देने के लिए निर्धारित किया है.
रिपोर्ट में बताया गया है कि यदि उत्सर्जन की इस खाई को पाटना है तो और भी आगे बढ़कर कार्रवाई करने की जरूरत है.
इसी समय अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने चेतावनी दी है कि अब दुनिया के पास पेट्रोलियम पदार्थों की जगह कम कार्बन उत्सर्जन वाली ऊर्जा का इस्तेमाल और ऊर्जा कुशलता की दिशा में गंभीर शुरुआत करने के लिए केवल पांच वर्ष का समय है. 2017 तक जरुरी निवेश करने में असफलता, भविष्य में अत्यधिक उत्सर्जन की जकड़बंधी को इस हद तक पहुंचा देगी कि 2 डिग्री सेल्सियस का लक्ष्य हासिल करना असंभव हो जायेगा.
इसके बावजूद डरबन में संयुक्तराष्ट्र जलवायु वार्ता में शामिल प्रतिनिधि इस बात पर तर्क-वितर्क कर रहे हैं कि नए दौर की समझौता-वार्ताएँ 2015 से पहले शुरू हो भी पाएंगी या नहीं. कुछ देश तो लगता है कि 2 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को ही कूड़ेदान में फेंक देना चाहते हैं, भले ही वे इस पर सहमति जताने का शब्दजाल फैलाते हों.
अलग-अलग देश अपने निकम्मेपन को छुपाने के लिये गड़े गए इस झूठे आरोप के आधार पर अपना दृष्टिकोण तय कर रहे हैं की जलवायू वार्ताएँ हमेशा ही विकसित बनाम विकासशील देशों के मुद्दे पर जाकर अटकती रही है. इस तर्क-वितर्क के एक छोर पर वे देश हैं जो जलवायु परिवर्तन के आगे सबसे अधिक लाचार हैं- छोटे द्वीप और अल्प विकसित राष्ट्र और यूरोपीय संघ. ये देश चाहते हैं कि नए वैधानिक सहमति  को लेकर समझौते की शुरुआत अगले साल हो जाये, 2015 तक निष्कर्ष निकल आये और उसके बाद जितनी जल्दी संभव हो, उन्हें लागू कर दिया जाये (यूरोपीय संघ ने कहा है कि हद से हद 2020 तक). दूसरा छोर जो इस बात की वकालत कर रहा है कि नयी वार्ताएँ 2015 के बाद ही शुरू होनी चाहिए, वह परंपरागत विकसित देशों में फिसड्डी रहे- अमरीका, कनाडा, रूस और जापान तथा दो बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाएं चीन और भारत का एक असंभव सा गठजोड़ है.
डरबन में जलवायु सम्मेलन का विरोध
देर करने वाले दलील देते हैं कि एक नए चरण की वार्ताएँ करने का अभी समय नहीं आया है. एक साल पहले कानकुन में अंतिम दौर की वार्ता समाप्त होने के बाद, आज की प्राथमिकता उन निर्णयों को लागू करना है जिन पर सहमति बनी है. उनका कहना है कि देशों ने अभी-अभी तो अपने घरेलू उत्सर्जनों में कटौती की योजनाएँ लागू करना शुरू किया है. इनमें से अधिकांध देश निम्न कार्बन और हरित विकास की नीतियों को अपनाने के लिए जूझ रहे हैं, इसलिए वे नए समझौतों के बारे में सोचने के लिए तैयार नहीं हैं.
मौजूदा आर्थिक वातावरण में 2020 के लिए नयी वचनबद्धता पर सहमति की सम्भावनाएं लगभग नहीं के बराबर हैं. तर्क यह दिया गया है कि संयुक्तराष्ट्र 2013-15 में होने वाले 2 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य की समीक्षा के लिए पहले ही वचनबद्ध है जो उसके बाद के नए समझौतों के लिए उपयुक्त आधार प्रदान करेगा (एक भारतीय प्रतिनिधि ने डरबन में कहा कि इस बात का फैसला करने के लिये कि क्या तथ्यत: कोई उत्सर्जन की खाई है भी या नहीं, 2014 में इंटर गवर्मेंट पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज की 2014 में अपनी अगली रिपोर्ट आने तक दुनिया को इंतजार करना चाहिये.) देर करने वाले समूह में शामिल कई देशों के लिए ये तर्क-वितर्क केवल इस बात को ढकने का बहाना भर है कि वे किसी नयी वैधानिक सहमति के लिए बिलकुल ही तैयार नहीं हैं.
क्वेटो को नकारने वाले (अमरीका, जिसके साथ अब कनाडा भी जुड़ गया) किसी भी तरह अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी के बंधन को नापसंद करते हैं, जबकी चीन और भारत उस तारीख को टालकर आगे बढ़ाने की माँग कर रहे हैं, जिस दिन से ये समझौते लागू होने हैं. हालाँकि इस बात का जवाब किसी के पास नहीं कई कि जिस 2 डिग्री सेल्सियस लक्ष्य को सबने गले लगाया, उसे देर करते जाने पर कैसे हासिल किया किया जा सकता है.
सच तो यह है कि इस बात को लेकर ‘तत्काल वार्ता शुरू करो’ खेमे के भीतर भी असहमति है. छोटे द्वीप और अल्पविकसित देश चाहते हैं की कोई भी अवधि केवल अगले पांच वर्ष (2013-17) तक बढ़ायी जानी चाहिये और नए चरण के लक्ष्य 2018 में शुरू हो जाने चाहिये. लेकिन यूरोपीय संघ को अपने घरेलू जलवायु नीतियों के विशाल और नाजुक ढांचे को दुबारा शुरू करने से नफ़रत है जो सभी 2020 से जुड़े हुए हैं. उन्हें भय है कि इन्हें कड़ा करने के बनिस्बत सुलझा लेने की सम्भावना अधिक है.
यह तय है कि समाधान इस बात में निहित है कि 2013-15 के लिए निर्धारित संयुक्त राष्ट्र समीक्षा, कितनी वृहतर तात्कालिक महत्वाकांक्षा उत्पन्न कर पाती है.
डरबन सम्मेलन में शामिल विभिन्न पक्षों के भीतर इस बात पर अभी तक मतभेद हैं की समीक्षा आखिर क्या बाला है. कुछ इसे महज एक रिपोर्टिंग प्रक्रिया के रूप में देखते हैं कि अलग-अलग देश अपनी वचनबद्धता को लागू करने के लिए क्या कर रहे हैं. लेकिन दूसरे इसे इस आकलन की सम्भावना के रूप में देखते हैं कि 2 डिग्री सेल्सियस वास्तव में सही वैश्विक लक्ष्य है भी या नहीं (छोटे द्वीप की सरकारें चाहती हैं कि यह 1.5 डिग्री सेल्सियस होना चाहिये) और उत्सर्जन में कमी लाने के लिए मिल-जुल कर प्रयास कैसे किया जा सकता है. यह न केवल 2025 और 2030 के लिए नयी वचनबद्धताएं निर्धारित करने की अनुमति देगा- जो निश्चय ही किसी नये लक्ष्य- क्वेटो प्रोटोकॉल के नए संसकरण के लिए आधारशिला का काम करेगी, बल्कि 2020 के लिए की गयी वचनबद्धता के लिए मजबूती प्रदान करेगी. इस बात की सम्भावना बहुत ही कम है कि फ़िलहाल कुछ हो पायेगा.
लेकिन 2015 तक, जब हो सकता है कि बदतरीन आर्थिक संकट (शायद) खत्म हो जाये और नयी आईपीसीसी रिपोर्ट एक बार फिर दुनिया को उस खतरे के प्रति आगाह करे जो जलवायु परिवर्तन के चलते उत्पन्न हो रहा है, उम्मीद है की शायद कुछ हो पाए.
(लेखक : माइकल जैकोब्स, लन्दन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में जलवायु परिवर्तन के अतिथि प्राध्यापक हैं.द हिन्दू 3 दिसम्बर 2011 में प्रकाशित. क्लाइमेट टाक्स : ‘डिलेयर कंट्रीज’ फ्लेक्स मसल्स का हिन्दी अनुवाद)       
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