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हिग्स बोसोन – विज्ञान और मानवता के लिए एक अनमोल उपलब्धि

 4 जुलाई 2012 विज्ञान जगत के साथ-साथ पूरी दुनिया के लिए एक यादगार दिन रहा. इस दिन  स्विट्जरलैंड और फ़्रांस की सरहद पर जेनेवा के सर्न लेबोरेटरी के निदेशक रोल्फ ह्यूर ने  दुनिया के जानेमाने वैज्ञानिकों की उपस्थिति में हिग्स बोसोन या ‘गौड पार्टिकिल’ की खोज का ऐलान किया. उन्होंने कहा कि “हमने एक नए कण का अवलोकन किया, जो हिग्स बोसोन से पूरी तरह मेल खाता है. हालाँकि अभी हमारे सामने ढेरों काम पड़े हैं. अब हम यह भी जानते हैं कि हमें किस दिशा में जाना है.” इस अवसर पर इस सूक्ष्म कण की अवधारणा प्रस्तुत करनेवाले दो वैज्ञानिकों में से एक, पिटर हिग्स भी मौजूद थे. किसी ज़माने में उन्होंने कहा था कि अपनी अवधारणा को प्रयोग द्वारा सिद्ध होते वे शायद ही देख पायें. दूसरे वैज्ञानिक सत्येन्द्र नाथ बोस की 1974 में ही मृत्यु हो गयी थी.

पाँच हजार से भी अधिक वैज्ञानिकों की टीम के साथ इस खोज में लगे दो शीर्षस्थ वैज्ञानिकों इन्कान्देला और गिआनोत्ती ने इस नए कण के प्रमाण को जटिल वैज्ञानिक शब्दावली में विस्तार से प्रस्तुत किया. हालाँकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अभी और भी निर्णायक रूप से इसकी पुष्टि की जायेगी. यही वह कण है जो इस बात की व्याख्या करता है कि ब्रह्माण्ड में मौजूद किसी भी पदार्थ का रूप और आकार किस चीज से निर्धारित होता है. यह ब्रह्माण्ड की सृष्टि को व्याख्यायित करने वाले बिग बैंग सिद्धांत कि विलुप्त कड़ियों में से एक है.

लगभग आधी सदी से वैज्ञानिक इस रहस्य से पर्दा उठाने में लगे हैं कि ब्रह्माण्ड की उत्पति कैसे हुई. इस दिशा में काफी प्रगति हुई है, सैद्धांतिक भौतिकी के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि इसके विविध पहलुओं को प्रायोगिक सत्य की कसौटी पर परखने की दृष्टि से भी. इस कण की अवधारणा 1960 के दशक में पीटर हिग्स और आइंस्टीन तथा सत्येंद्रनाथ बोस सहित वैज्ञानिकों के पांच अलग-अलग समूहों ने प्रस्तुत की थी. यह उस स्टैण्डर्ड मॉडल को पूर्णता प्रदान करनेवाला एक गायब अंश है जो मूलभूत कणों और प्रकृति के बलों की बिलकुल सही-सही व्याख्या करने में सफल साबित हुआ था. इसके अनुसार मूलभूत कणों का द्रव्यमान हिग्स बोसोनके साथ उनकी परस्पर क्रिया की शक्ति से निर्धारित होती है. हिग्स कणों के बिना ब्रह्माण्ड में मौजूद पदार्थ का कोई द्रव्यमान नहीं होगा, इसीलिए इस कण का वजूद ब्राह्मंड की सही-सही व्याख्या करने के लिए बेहद जरूरी है.

सैद्धांतिक रूप से पूरी तरह स्वीकृत और स्थापित होने के बाद अब इसे प्रयोग से सिद्ध करना बाकी था. इस काम के लिए सर्न लैब के 27 कि.मी. लंबे सुरंग में प्रोटोन तोड़ने वाला एक विराट कोलाइडर लगाया गया. इसके अंदर दो विपरी़त दिशाओं में घूर्णन करते, उच्च ऊर्जा से त्वरान्वित प्रोटोन की दो किरणों को आमने-सामने टकराया जाता है. इसके चलते असंख्य जाने-अनजाने कण पैदा होते है. ऐसे ही लाखों टकरावों के मलबे में वैज्ञानिक सिग्नल की तलाश करते हैं. हिग्स कण का जीवन-काल बहुत ही छोटा होता है- एक सेकेंड का दस हजार अरबवाँ हिस्सा. पैदा होते ही हिग्स बोसोन कई स्तरों पर विनष्ट होता है. फिर प्रयोग के दौरान यह विश्लेषण किया जाता है कि जो चीज अंत में बचती है, क्या वह हिग्स बोसोन का ही अवशेष है. कुल मिला कर यह प्रयोग बहुत ही सूक्ष्म और जटिल है.

हिग्स बोसोन कण के साथ गौड ‘पार्टिकिल’ नाम कैसे जुड़ा? इसकी कहानी यह है कि नोबेल पुरष्कार विजेता वैज्ञानिक लिओन लेदरमान ने 1993 में एक किताब लिखी थी, जिसके शीर्षक (The God Particle: If the Universe Is the Answer, What Is the Question?) में इस शब्द का प्रयोग व्यंजना में किया गया था. उस लेख में यह स्थापित किया गया था कि हिग्स बोसोन की खोज से पदार्थ की संरचना को निर्णायक रूप से समझने में मदद मिलेगी. लेकिन साथ की यह ढेर सारे नए सवालों को भी जन्म देगा. इस अर्थ में यह कण ईश्वर की तरह ही मायावी है.

खुद हिग्स और लेदरमान दोनों ही दृढ भौतिकवादी हैं. ईश्वर का संदर्भ तो व्यंग्यस्वरूप आया था, क्योंकि लेदरमान पहले उस किताब का शीर्षक (goddamn particle) “हे भगवान कण” रखना चाहते थे, लेकिन प्रकाशक इस पर राजी नहीं हुआ. तब कम चलाने के लिए उन्होंने गौड पार्टिकिल रख दिया. बहुत से वैज्ञानिक इस नाम को भ्रामक मानते हैं और इसे बहुत ही नापसंद करते हैं.

मीडिया ने रोचक किस्से गढ़ कर इस नाम को बहुप्रचलित कर दिया. कम बुद्धि वालों को अक्सर अभिधा-लक्षणा में भ्रम हो जाता है. यही कारण है कि कई मूढ़मति लोगों ने इस वैज्ञानिक खोज को ईश्वर की खोज मान कर जश्न भी मना लिया. इसमें यह निहित है कि ऐसे ईश्वर भक्त ईश्वर के अस्तित्व को लेकर संशयग्रस्त हैं, नहीं तो नास्तिक भला ईश्वर की खोज क्यों करेंगे उनके द्वारा ईश्वर का प्रमाण पाकर भक्तगण इतने गदगद भला क्यों होते?

हिग्स बोसन कण की खोज के विषय में मेरी दिलचस्पी बढाने का काम भी हिंदी के ऐसे ही किसी अनोखे पत्रकार ने अब से लगभग ६ महीने पहले की थी. उसने लिखा था कि इस कण की खोज हो जाने पर यह पक्के तौर पर स्थापित हो जायेगा कि ब्रह्माण्ड की रचना ईश्वर ने की. पहले मैंने इसे क्षद्म-विज्ञान का कोई शगूफा समझा, जो आये दिन ईश्वर और आत्मा का अस्तित्व साबित करने के लिए अकाट्य किन्तु हस्यपदक वैज्ञानिक प्रमाण पेश करते रहते हैं. लेकिन जब इस पूरी वैज्ञानिक परियोजना की तह में गया और पता चला कि जल्दी ही इस के परिणाम आने की सम्भावना है तो काफी मजा आया. वह दिन और आज का दिन, जब सुबह-सुबह अखबार से यह सुखद समाचार मिला.

हालाँकि आज भी इस युगांतरकारी घटना के विषय में खास तौर पर हिंदी अखबारों में भ्रामक उक्तियों की भरमार रही. सब का एक ही मकसद था, विज्ञान पर अन्धविश्वास की जीत सिद्ध करना. देशबंधु के एक लेख में पत्रकार यह बात घुंसाने का लोभ संवरण नहीं कर पाया कि- “यह सुनिश्चित करने के लिए हालांकि अभी और अधिक काम करने की आवश्यकता है कि जो उन्होंने  देखा, वह वाकई में कोई ईश्वर है।”

आज की परिस्थितियों में ऐसी घटनाएँ बहुत ही स्वाभाविक हैं. वर्तमान समाज में ज्ञान-विज्ञान पर जिन लोगों का कब्ज़ा है वे अपने निकृष्ट स्वार्थों के लिए इनका इस्तेमाल करते हैं और बहुसंख्य जनता को अज्ञान के अँधेरे में कैद रखना चाहते हैं. जब तक समाज व्यवस्था पर परजीवियों- धर्मधजाधारियों, सत्ताधारियों और थैलीशाहों का वर्चस्व कायम है, वे विज्ञान को अपनी चेरी बनाये रहेंगे. इसीलिए वैज्ञानिक शोध के साथ-साथ सामाजिक बदलाव भी बहुत जरूरी है. तभी जन-जन में विज्ञान और वैज्ञानिक नजरिया व्यापेगा.

हमारे यहाँ ऐसे अतीत पूजकों की भी कमी नहीं जो मानते हैं कि वेद ही दुनिया के सभी ज्ञान-विज्ञान का एकमात्र और अकाट्य स्रोत है. ऐसे ही किसी किसी भारत व्याकुल महानुभाव ने फेसबुक पर यह टिप्पणी जड़ी कि “वेदों में भी है ईश्वरीय कण का जिक्र… यूरोपीय वैज्ञानिको ने जिस हिग्स बोसॉन से मिलते-जुलते कण को खोजने का दावा किया है उसका व बिग बैंग का सबसे पहला जिक्र वेदों में आता है। वैज्ञानिकों ने हिग्स बोसॉन को गॉड पार्टिकल यानी ब्रह्मकण का नाम दिया है ।”

अतिशयोक्ति को तर्क का छूआ लगते ही भीषण हास्य उत्पन्न होता है. ये अतिशय ज्ञानी यह भी नहीं समझते एकि अपनी इन असंगत बातों से वे वेद का और प्राचीन भारतीय संस्कृति का कितना अधिक अपमान करते हैं.

बाबा आदम ने वर्जित फल खाया और भगवन ने उनको स्वर्ग से भगाया. और अब भगवान को इस सम्पूर्ण विश्व से- गोपुर, नरपुर, नागपुर से अंतिम बिदाई देने के लिए जैसे एक छोटे से कण- हिग्स बोसन की थाह लगना ही काफी है. वैसे थोड़ा-थोड़ा तो विज्ञान की हर खोज ही उन्हे पीछे  सरकाती आ रही थी, अब अलविदा, फातेहा, श्राद्ध, अंतिम अरदास, और जो जिस विधि-विधान से खुश हो, वह सब.

ग़ालिब ने बिलकुल इसी मौके के लिए लिखा था-


निकलना खुल्द से आदम का सुनते आये हैं लेकिन,
बहुत बे आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले.

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विज्ञान, वैज्ञानिक नजरिया और हमारा समाज

विज्ञान और वैज्ञानिक नजरिया के बीच गहरा सम्बन्ध होता है । लेकिन हमारे देश और समाज में एक अजीब विरोधाभास दिखाई दे रहा है  । एक तरफ विज्ञान और तकनोलोजी की उपलब्धियों का तेजी से प्रसार हो रहा है तो दूसरी तरफ के जनमानस में वैज्ञानिक नजरिये के बजाय अंधविश्वास, कट्टरपंथ, पोंगापंथ, रूढ़ियों और परम्पराएँ तेजी से पाँव पसार रही हैं । वैश्वीकरण के प्रबल समर्थक और उससे सबसे अधिक फायदा उठाने वाले तबके ही भारतीय संस्कृति की रक्षा के नाम पर अतीत के प्रतिगामी, एकांगी और पिछड़ी मूल्य–मान्यताओं को महिमामंडित कर रहे हैं । वैज्ञानिक नजरिया, तर्कशीलता, प्रगतिशीलता और धर्म निरपेक्षता की जगह अंधश्रद्धा, संकीर्णता और असहिष्णुता को बढ़ावा दिया जा रहा है । 


समाचार पत्रों में तांत्रिकों द्वारा बच्चों की बली देने या महिलाओं का यौन शोषण करने, डायन होने का आरोप लगाकर महिलाओं की हत्या करने तथा झाड़–फूंक, जादू–टोना और गंडा–ताबीज के द्वारा लोगों को ठगने की खबरें अक्सर आती रहती हैं । अखबारों में बंगाली बाबा, तांत्रिक, चमत्कारी पुरुष, ज्योतिषाचार्य के विज्ञापन छपते हैं । जप–तप, हवन, अंधविश्वास  और फलित ज्योतिष को विज्ञान सिद्ध किया जाता है और अब महाविद्यालयों में बजाप्ता ऐसे छद्म–विज्ञान का पठन–पाठन भी होने लगा है । टीवी चैनलों के मार्फत मनोकामना पूर्ण करने वाले बड़े–बड़े दावों के साथ यंत्र–तंत्र और अंगूठी बेचे जाते हैं । अंधविश्वास, पुनर्जन्म और भूत–प्रेत के किस्से प्रसारित किये जाते हैं । 


अंधविश्वास और चमत्कारों के पीछे पागल लोगों की भीड़ में उच्च शिक्षित और सम्मानजनक पेशों से जुड़े लोगों, उच्च अधिकारियों और नेताओं–मंत्रियों की अच्छी खासी तादाद देखने को मिलती है । रत्न जड़ित अंगूठियों और गंडा–ताबीज पहनना, बाबाओं के डेरे या मजारों पर जाना , मूहूर्त निकाल कर हर काम करना उनकी रोजमर्रे की जिन्दगी का हिस्सा है । ‘अलोकिक शक्ति’ वाले चमत्कारी पुरुषों के अवतार के जो भी नये–नये मामले समाने आते हैं, उनकी भक्त–मंडली में बड़े–बड़े नाम–पद धारी लोग शामिल होते हैं । समाज के शीर्षस्थ लोगों का यह आचरण आम जनता में अंधश्रद्धा और चमत्कार को अनुकरणीय बनाता है । राजनीतिक पार्टियों के नेता भी ऐसे मठाधीशों, बाबाओं और प्रवचनकर्ताओं के साथ साँठ–गाँठ करते हैं जिनके पीछे बड़ी संख्या में भक्तों की भीड़ (वोट) हो ।


प्रकृति और इंसान जाति के बीच निरन्तर जारी संघर्ष के जिस मुकाम पर आज हम खड़े हैं वहाँ विज्ञान और तकनोलोजी के एक से बढ़कर एक हैरतअंगेज कारनामें हमारे चारों ओर दिखाई दे रहे हैं । समचना तकनोलोजीµ कम्प्यूटर, संटेलाइट और इन्टरनेट के संयोग ने देश–काल का फासला काफी कम कर दिया है । नये–नये अविष्कारों के चलते भोजन , वस्त्र, आवास ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य, शि़क्षा, यातायात औरमनोरंन जैसी रोजमर्रे की जरूरतों का स्तर दिनों–दिन बेहतर होता जा रहा है । हालाँकि यहाँ भी हमारा सामना एक विरोधाभासपूर्ण स्थिति से होता हैµ विज्ञान और तकनोलोजी की अभूतपूर्व सफलताओं के बावजूद दुनिया के करोड़ों लोग भूखे–नंगे, बेघर, बीमार और कुपोषित हैं । जिन बीमारियों का इलाज बहुत आसान और सस्ता है, उनकी चपेट में आकार हर साल करोड़ों लोग भर जाते हैं । बाढ़ समखा, भूकम्प, लू और ठण्ड से मौत की खबरे आती रहती हैं । जाहिर है की विज्ञान और तकनोलोजी की उपलब्धियाँ मुठ्ठीभर मुनाफाखोरों की गिरफ्त में हैं और केवल ऊपरी तबके के चंद लोगों तक हो सकती हैं । इन उपलब्धियों को सर्वसुलभ बनाने के बजाय बहुसंख्य लोगों को भाग–भरोसे छोड़ दिया जाता है ।


हमारे देश के करोड़ों लोगों तक ज्ञान–विज्ञान की रोशनी अब तक पहुँच पायी है । ऐसे में समाज के अधिकांश लोगों में वैज्ञानिक नजरिये का अभाव कोई आश्चर्य की बात नहीं । लेकिन जिन लागों को ज्ञान–विज्ञान की जानकारी और उसकी उपलब्धियाँ हासिल हैं, वे भी वैज्ञानिक नजरिया अपनाते हों, तर्कशील और विवेकी हों, यह जरूरी नहीं । इसका सबसे ज्वलन्त उदाहरण 1995 में देखने को मिला जब गणेश की मूर्ति के दूध पीने का अफवाह फैला था । उस दिन मंदिरों के बाहर दूध लेकर कतार में खड़े या रेलमपेल मचा रहे लोगों में ज्यादातर शिक्षित लोग ही थे । दरअसल गाँव–कस्बों तक यह अफवाह पहुँच नहीं पाया था क्योंकि इसे मोबाइल फोन और टेलीवीजन के माध्यम से फैलाया गया था, जिनकी पहुँच उस दौरान शहरों तक ही सीमित थी । उस भीड़ में कई वैज्ञानिक, विज्ञान शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर और अन्य पढ़े–लिखे लोग भी शामिल थे । अगर कुछ तर्कशील लोगों ने इस भेडियाघिसान का विरोध किया भी तो उन्हें नास्तिक और विधर्मी बताते हुए अलगाव में डाल दिया गया ।


विज्ञान की जीत के मौजूदा दौर में यदि वैज्ञानिक नजरिया लोगों की जिन्दगी का चालक नहीं बन पाया तो इसके पीछे कर्इ्र कारण हैं । समाज में व्याप्त अंधविश्वास के पीछे अज्ञान के अलावा, अज्ञात का भय, अनिश्चित भविष्य समस्या का सही समाधान होते हुए भी लोगों की पहुँच से बाहर होना, समाज से कट जाने का भय, परम्पराओं से चिपके रहने की प्रवृत्ति, धर्मभीरुता और ईश्वर के प्रति अंधश्रद्धा, धर्म गुरुओं , महापुरुषों या मठाधीशों के प्रति अंधविश्वास जैसे कई कारण होते हैं । जो विज्ञान का अध्ययन–अध्यापन करने वाला कोई भौतिकशास्त्र का शिक्षक यह जानता है कि पदार्थ को उत्पन्न या नष्ट नहीं किया जा सकता। लेकिन निजी जिन्दगी में वह किसी बाबा द्वारा चमत्कार से भभूत पैदा करने या हवा से फल या अंगूठी निकालने में यकीन करता है । यह उस शिक्षक का अज्ञान नहीं बल्कि वैज्ञानिक नजरिये का अभाव है । उसके लिये विज्ञान की जानकारी केवल रोजी–रोटी कमाने का जरिया है । जीवन में उसे उतारना या कथनी–करनी के भेद को मिटाना उसकी  मजबूरी नहीं । और तो और ऐसे अर्धज्ञानी अक्सर कुतर्क के जरिये अंधविश्वास को सही ठहराने में विज्ञान का इस्तेमाल करने से भी बाज नहीं आते ।


अंधविश्वास को बढ़ावा देने के पीछे कुछ धंधेबाजों का निहित स्वासर्थ भी एक महत्त्वपूर्ण कारण है । ऐसे लोग छद्म विज्ञान और कुतर्क का सहारा लेकर अंधविश्वासों, कुरीतियों, कर्मकाण्डों और बेसिर–पैर की बातों को सही ठहराते हैं । लोगों की चेतना को कुन्द करके उनकी आँखों में धूल झोंककर, अपनी झोली भरने वालों का ऐसा करना स्वाभाविक ही है । ऐसे ही स्वार्थी तत्व विज्ञान की आड़ लेते हुए विज्ञान की जगह चमत्कार और अंधविश्वास को स्थापित करने तथा समाज की प्रगति को रोकने का लगातार प्रयास करते रहते हैं । 
विज्ञान की उपलब्धियों का इस्तेमाल किस तरह सामाजिक कुरीतियों औ सड़ी–गली परम्पराअें को जारी रखने और उन्हें मजबूत बनाने के लिये किया जा रहा है, इसके अनेक उदाहरण हैं । इनका बर्बरतम और क्रूरतम उदाहरण है लिंग परीक्षण कराकर गर्भ में ही लड़कियों को मार देना । लिंग परीक्षण और भु्रण हत्या के खिलाफ कानून रहा है और इसे अंजाम देने वाले शिक्षित–समृद्ध तबके के लोग ही हैं ।


जाहिर है कि आज के दौर में अंधविश्वास को मानने और उसे बढ़ावा देने वाले लोगों की स्थिति आदिकाल के हमारे उन पुरखों के समान नहीं है जो प्रकृति की विकराल शक्ति के आगे लाचार थे । आज जिन ढेर सारे रहस्यों से पर्दा उठ चुका है, उन्हें भी निहित स्वार्थों के कारण स्वीकार न करने वाली जड़मति ही अंधविश्वास के मूल में है । गुफाओं और जंगलों से अन्तरिक्ष तक की अपनी यात्रा में मनुष्य ने प्रकृति के रहस्यों को समझा, उसके नियमों और कार्य–कारण सम्बन्धों का पता लगाया और उनकी मदद से प्रकृति को काफी हद तक अपने वश में कर लिया । आदिकाल में अपने अस्तित्व को बचाने के लिये प्रकृति से संघर्ष करते हुए मनुष्य ने आगख्, पहिया, पत्थर के औजार से अपनी ज्ञान–विज्ञान की यात्रा शुरू की । अपने सामूहिक प्रयासों और उससे प्राप्त अनुभवों को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया । उस काल में मनुष्य की जिज्ञासा और ज्ञान पिपासा ने ढेर सारे दर्शन को आगे बढ़ाया  और काफी हद तक सत्य की खोज में सफल हुए । अनुभव संगत ज्ञान के आधारशिला पर आधुनिक विज्ञान का महल खड़ा हुआ ।


प्राचीन काल की यह विकास यात्रा मध्यकाल में आकर अवरुद्ध हो गयी, जब सामन्ती समाज में धर्मकेन्द्रित सत्ता की स्थापना हुई । सामन्ती शासकों का पूरी दुनिया में धर्म के साथ गँठजोड़ कायम हुआ और  अपने शोषण–शासन को मजबूत बनाने के लिए उन्होंने धर्मभीरुता, कट्टरता और अन्धश्रद्धा को बढ़ावा दिया । धार्मिक–दार्शनिक रहस्यवाद सामन्तों की सत्ता कायम रखने का उपकरण बन गया । यह पूरा दौर इतिहास का अंधायुग था जिसमें इक्के–दुक्के प्रयासों को छोड़ दें, तो ज्ञान–विज्ञान का विकास ठहराव और गतिरोध का शिकार बना रहा ।


पन्द्रहवीं शताब्दी में यूरोप के पुनर्जागरण काल में ज्ञान–विज्ञान की नयी–नयी कोंपले फूटनी शुरू हुईं । गैलीलियो, कॉपरनिकस और ब्रूनों जैसे अनेक वैज्ञानिकों ने धार्मिक मतों पर प्रश्न खड़ा किया और वैज्ञानिक प्रयोगों के द्वारा लोगों को यह बताया कि संसार और प्रकृति के बारे में धार्मिक मान्यताएँ गलत हैं । इस प्रयास में कितने ही वैज्ञानिकों को अमानुषिक यातनाएँ दी गयी  । लेकिन सच्चाई को दबाना सम्भव नहीं हुआ। कृषि प्रधान, सामन्ती प्राकृतिक अर्थव्यवस्था के गर्भ से उत्पन्न नवोदित वाणिज्यिक पूँजीपति वर्ग ने अपने लाभ के लिये ही सही, ऐसे हर नये खेज का समर्थन दिया । समुद्री मार्ग की खेज और नये–नये देशों तक अपना व्यापार फैलाने के दौरान उन्हें ऐसे अविष्कारों की जरूरत थी । लेकिन उनका रास्ता आसान नहीं था । लोगों के दिमाग में राजा और ईश्वर के प्रति अंधश्रद्धा और ढेर सारे सामन्ती विचार और मूल्य भरे हुए थे । इनसे मुक्त किये बिना समाज को आगे ले जाना सम्भव नहीं था ।


नवजात पूँजीपति वर्ग के लिए दो कारणों से विज्ञान और वैज्ञानिक नजरिये को बढ़ावा देना जरूरी हो था । पहला, उत्पादन को तेजी से बढ़ाने के लिए नयी–नयी मशीनों और उत्पादन के साधनों का पता लगाना जरूरी था, जो विज्ञान के विकास से सीधे जुड़ा हुआ था । दूसरा, सामन्ती शासन की जकड़बन्दी को तोड़ने के लिए जरूरी था कि लोगों को धार्मिक, कट्टरपंथ और अंधविश्वास से मुक्त कर के उन्हें तर्कशील बनाया जाय । इस तरह पूँजीपति वर्ग के सहयोग से उस दौर के दार्शनिकों और वैज्ञानिकों ने सामन्तवाद को चैतरफा चुनौती दी और ईश्वर केन्द्रित, सामन्ती समाज की जगह मानवकेन्द्रित पूँजीवादी समाज की वैचारिक बुनियाद रखी । किसी भी बात पर आँख मूँदकर विश्वास करने के बजाय उसे तथ्य और तर्क की कसौटी पर परखने का चलन बढ़ा । प्रकृति के रहस्यों से ज्यों–ज्यों पर्दा हटता गया, धर्म की जगह विज्ञान की प्रतिष्ठा बढ़ती गयी । इस पूरे दौर में विज्ञान और वैज्ञानिक नजरिया साथ–साथ आगे बढ़ते गये । केवल वैज्ञानिक और दार्शनिक ही नहीं, बल्कि जनसाधारण भी जिन नये विचारों को सही मानते थे, उन्हें अपने जीवन में उतारते थे और इसके लिये कोई भी कुर्बानी देने के लिये तैयार रहते थे ।


आज हम एक विचित्र स्थिति का सामना कर रहे हैंµ विज्ञान जितनी तेजी से आगे बढ़ रहा है वैज्ञानिक नजरिया उतनी ही तेजी से पीछे जा रहा है । ऐसा क्यों है ?


अपने शैशव और यौवन काल में पूँजीपति वर्ग ने सामन्तवाद के खिलाफ जितनी दृढ़ता के साथ संघर्ष किया था वह बाद के दौर में कायम नहीं रहा । पूँजीवादी क्रान्तियों के जिस झण्डे पर स्वतंत्रता–समानता–बंधुत्व का नारा लिखा हुआ था । सत्ता में आते ही पूँजीपति वर्ग ने उसे धूल में फेंक दिया । उसने इन पवित्र सिद्धान्तों को व्यापक जनता तक ले जाने की जगह केवल अपने और अपने सहयोगी, सभ्रान्त वर्गों तक ही सीमित कर दिया । साथ ही जिन सामन्ती मूल्य–मान्यताओं और विचारों के खिलाफ उसके पुरखों ने जीवन–मरण का संघर्ष चलाया था उन्हीं के साथ उसने समझौता किया । अपने वर्गीय शासन को बनाये रखने के लिये जरूरी था कि बहुसंख्य मेहनतकश जनता को अंधविश्वासों और अतार्किक मताग्रहों के जाल में फँसाये रखा जाये, उन्हें भाग्य और भगवान की शरण में ही रहने दिया जाये । पूँजीवाद के पराभव और पतनशील साम्राज्यवादी दौर में आज विकसित देशों में ही कट्टरपंथी, अतार्किक और प्रतिगामी मूल्यों को तेजी से फलते–फूलते देख रहे हैं । नवनाजीवादी, फासीवादी ताकतें हर जगह सर उठा रही हैं और सत्ता के गलियारे तक पहुँचने के लिए हाथ–पाँव मार रही हैं ।


हमारे देश की स्थिति तो और भी विचित्र है जहाँ का शासक वर्ग जनतांत्रिक क्रान्तियों की पैदाइश नहीं है । उपनिवेशवादी दौर में अंग्रेजों की छत्रछाया में उत्पन्न वर्ग ने समझौते और दबाव की रणनीति अपना कर खुद को आगे बढ़ाया और सत्ता हस्तान्तरण के जरिये शासन की बागडोर सम्भाली । राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भी इसने सामन्तवाद से समझौता किया । अपनी वर्गीय सीमाओं के चलते अर्थव्यवस्था सहित जीवन के हर क्षेत्र में उपनिवेशवाद विरोधी, सामन्तवाद विरोधी जनवादी कार्यभारों को क्रान्तिकारी तरीके से पूरा नहीं किया । आधे–अधूरे सुधारों के जरिये एक विकलांग–विकृत पूँजीवादी समाज अस्तित्व में आया । ऐसे समाज में स्वस्थ्य पूँजीवादी मूल्यों और वैज्ञानिक नजरिये का अभाव कोई आश्चर्य की बात नहीं । संविधान में दर्ज धर्मनिरपेक्षता की व्याख्या यहाँ सर्वधर्म सम्भाव के रूप में की जाती है । धार्मिक भावनाओं पर चोट पहुँचने की आड़ में प्रगतिशील विचारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अक्सर गला घोंटा जाता है । शासन–प्रशासन के स्तर पर हिन्दू कर्मकाण्डों का प्रयोग यहाँ आम बात है । नेताओं–अधिकारियों द्वारा सरकारी कार्यक्रमों में नारियल फोड़ना, हवन–पूजन, अनुष्ठान या भजन–कीर्तन सर्वस्वीकृत है । सरकारी पार्कों और सार्वजनिक जमीन पर पूजा स्थल, यहाँ तक कि सरकारों कार्यालयों और थानों में मंदिर होना कानून सम्मत है । सरकार के शीर्ष अधिकारियों–नेताओं द्वारा सार्वजनिक रूप से अंधश्रद्धा को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों में भागीदारी और समाचार माध्यमों से उनका प्रसारण भी वैध है । दक्षिणपंथी पार्टियों के शासन वाले राज्यों में धर्मनिरपेक्षता का मजाक उड़ाते हुए बड़े पैमाने पर यही काम कानून के जरिये किया जा रहा हैं ऐसे में बहुसंख्य अशिक्षित जनता का अंधविश्वास और कट्टरपंथ की गिरफ्त में होना या अपने आचरण व्यवहार में वैज्ञानिक नजरिये न अपनाना कोई आश्चर्य की बात नहीं ।


इक्कीसवीं सदी के इस मुकाम पर हमारे देश में मध्ययुगीन अवैज्ञानिक–अतार्किक, जड़मानसिकता का प्रभावी होना बहुत ही चिन्ता का विषय है  । यह हमारे देश और समाज की प्रगति में बहुत बड़ी बाधा है । हालाँकि वैज्ञानिक चेतना और दृष्टिकोण के प्रचार–प्रसार में नई सरकारी–गैर सरकारी संस्थायें सक्रिय हैं, लेकिन उनका प्रभाव अभी बहुत ही सीमित है ।


इस पुस्तिका में संकलित लेख वैज्ञानिक नजरिया विकसित करने की दिश में सक्रिय एक ऐसे ही मंचµ द बैंगलोर साइन्स फोरम द्वारा 1987 में प्रकाशित ‘‘साइन्स, नॉन साइन्स एण्ड द पारानौरमल’’ नामक संकलन से लिये गये हैं । इस संकलन में विज्ञान और वैज्ञानिक नजरिये से सम्बन्धित गम्भीर लेखों के अलावा अंधविश्वास और चमत्कार का पर्दाफासा करने वाले कई लेख संकलित हैं । डॉ– एच नरसिंम्हैया के नेतृत्व में गठित जाने माने वैज्ञानिकों के इस मंच ने विज्ञान और वैज्ञानिक नजरिये के प्रचार–प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है । अपनी क्षमता और सीमा को देखते हुए हमने इनमें से 10 लेखों का चुनाव किया और हिन्दी पाठकों के लिए उनका अनुवाद प्रस्तुत किया है । आगे इस विषय पर अन्य लेखों का अनुवाद भी प्रकाशित करने का प्रयास किया जायेगा । पाठकों से अनुरोध है कि वे इस पुस्तिका के बारे में अपने सुझाव और आलोचना से हमें अवश्य अवगत करायेंगे ।  
गार्गी प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक– विज्ञान और वैज्ञानिक नजरिया की भूमिका) 

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