Category Archives: गरीबी रेखा

अमीरों की मितव्ययिता                   

–पी. साईनाथ
           
योजना आयोग के अनुसार अगर एक ग्रामीण भारतीय प्रतिदिन २२ रुपये ५० पैसे खर्च करता है तो वह गरीब नहीं माना जायेगा, जबकि पिछले साल मई और अक्टूबर के बीच इसी योजना आयोग के उपाध्यक्ष की विदेश यात्राओं पर २.०२ लाख रुपये रोजाना औसत खर्च आया है.

खर्चों में कटौती के प्रणव मुखर्जी के भावनात्मक आह्वान ने देश को भावुक कर दिया था. इससे पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी इसकी वकालत कर चुके थे और उन्होंने अपनी जमात के लोगों को रचनात्मक तरीकों से इसे अपनाते देखा. यहाँ तक कि विदेश मंत्रालय को २००९ में किये गये इस आह्वान पर काम करते देखते (किफायती दर्जे में हवाईयात्रा, खर्चों में कटौती), हम इस महान खोज के चौथे साल में प्रवेश कर चुके हैं.     

निश्चय ही, हमारे यहाँ कई प्रकार की मितव्ययितायें हैं. इन अनेकों आजमायी गयी विविधताओं में से  योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया वाली किस्म को लेते है. खर्चों में कटौती के लिये डा. अहलूवालिया की वचनबद्धता को कोई भी चुनौती नहीं दे सकता. देखिये वह किस तरह गरीबी की रेखा के बारे में उस लोकलुभावन मांग के खिलाफ अडिग खड़े रहे हैं जो मानीखेज है. जनता की कतई खुशामद नहीं की गयी. शहरी भारत में २९ रूपये या ग्रामीण भारत में २३ रूपये रोज खर्च करें तो आप गरीब नहीं हैं. यहां तक कि  उन्होंने उच्चतम न्यायालय से भी  अपने लाखों-करोंडों  देशवासियों के प्रति  इस कठोरता को बनाये रखने का अनुरोध किया है. योजना आयोग द्वारा दायर एक हलफनामे में ३२ रूपये (शहरी) और २६ रूपये (ग्रामीण) प्रतिदिन की रेखा की वकालत की गयी  है. उसके बाद से, इस पदम विभूषण विजेता और सके कुछ सहयोगियों ने इस रेखा को र कम करने के लिये बेहिचक अपनी राय पेश की है.

आरटीआई पूछताछ

डा. अहलूवालिया मितव्ययिता को खुद पर लागू करते हैं इस बात की पुष्टि दो आरटीआई प्रश्नों से हो जाती है. दोनों ही आरटीआई-आधारित पत्रकारिता के बेहतरीन उदाहरण हैं, परन्तु उन्हें उतनी तवज्जो नहीं मिल पायी जिसके वे हकदार हैं. उनमे से एक श्यामलाल यादव द्वारा दी गयी इंडिया टुडे (जिसमें जून २००४ से जनवरी २०११ के बीच डा. अहलूवालिया की विदेश यात्राओं का ब्यौरा है) की खबर है. यह पत्रकार (जो अब इंडियन एक्सप्रेस में काम करते हैं) पहले भी आरटीआई-आधारित बेहतरीन ख़बरें दे चुके हैं.

दूसरी खबर, इस साल फ़रवरी में, द स्टेट्समेन न्यूज़ सर्विस में प्रकाशित हुई (पत्रकार का नाम नहीं दिया गया है). इसमें मई और अक्टूबर २०११ के बीच में डा. अहलूवालिया की विदेश यात्राओं का ब्यौरा है. एसएनएस की रिपोर्ट कहती है कि “इस अवधि में, १८ रातों के दौरान चार यात्राओं के लिये राजकोष को कुल ३६,४०,१४० रुपये कीमत चुकानी पड़ी, जो औसतन २.०२ लाख रुपये प्रतिदिन बैठती है.”

जिस दौरान यह सब हुआ, उस समय के हिसाब से २.०२ लाख रुपये ४,००० डॉलर प्रतिदिन के बराबर बैठते हैं. (अहा! हमारी खुशकिस्मती है कि मोंटेक मितव्ययी हैं. अन्यथा कल्पना करें कि उनके खर्चे कितने अधिक होते). प्रतिदिन का यह खर्चा उस ४५ सेंट की अधिकतम सीमा से ९,००० गुना ज्यादा है जितने पर उनके अनुसार एक ग्रामीण भारतीय ठीक-ठाक जी ले रहा है, या उस शहरी भारतीय के लिये ५५ सेंट की अधिकतम सीमा से ७,००० गुना ज्यादा है जिसे डा. अहलूवालिया “सामान्य तौर पर पर्याप्त” मानते हैं.

यहां हो सकता है कि १८ दिनों में खर्च किये गये ३६ लाख रूपये (या ७२,००० डॉलर) उस साल विश्व पर्यटन के लिये दिया गया उनका निजी प्रोत्साहन हो. आख़िरकार, २०१० में पर्यटन उद्योग अभी भी २००८-०९ के विनाश से उभर ही रहा था, जैसा कि संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यटन संगठन ध्यान दिलाता है. दूसरी तरफ, यू.एन. संस्था ने पाया कि २०१० में वैश्विक यात्राओं पर वार्षिक आय 1,000 अरब  डॉलर तक पहुँच गयी. वार्षिक आय में सबसे ज्यादा बढ़त अमेरिका और यूरोप में देखी गयी (जहाँ उन १८ दिनों में से ज्यादातर दिन व्यतीत किये गये). भारतीय जनता इस बात पर खुशी मना सकती है कि उन देशों के स्वास्थ्य लाभ में उन्होंने भी एक सादगीपूर्ण भूमिका निभायी, तब भी जबकि वे घर पर खर्चों में कटौती की मार झेल रहे थे.

श्यामलाल यादव की आरटीआई में दिये गये आकड़े बेहद दिलचस्प हैं. शुरुआत के लिये, उनकी जाँच दिखाती है कि अपने सात साल के कार्यकाल में डा. अहलूवालिया ने ४२ आधिकारिक विदेश यात्रायें की और विदेशों में २७४ दिन बिताये. इस तरह यह “हर नौ में से एक दिन” विदेश में पड़ता है. और इसमें यात्रा करने में लगे दिन शामिल नहीं हैं. इंडिया टुडे की खबर ने पाया कि उनके इस भ्रमण के लिये राजकोष से २.३४ करोड़ रूपये खर्च किये गये, यह बताया गया है कि उनकी यात्राओं के संबंध में उन्हें तीन अलग- अलग अनुमान प्राप्त हुए थे और उदारतापूर्वक उन्होंने अपनी खबर के लिये सबसे कम खर्च वाले अनुमान को चुना. साथ ही, इंडिया टुडे की खबर कहती है, “यह स्पष्ट नहीं है कि इन आकड़ों में भारतीय दूतावास के द्वारा विदेश में किये गये अतिरिक्त खर्चे, जैसे-  लिमोसिन को किराये पर लेना शामिल हैं या नहीं. वास्तविक खर्चे काफी ज्यादा हो सकते हैं.”

चूँकि जिस पद पर वह हैं उसके लिये ज्यादा विदेश यात्राओं की आवश्यकता नहीं है – हालाँकि, यह सब “प्रधानमंत्री की इजाजत” से किया गया है– यह काफी दुविधा में डाल देने वाला है. ४२ यात्राओं में से २३ अमेरिका के लिये थी, जो योजना में विश्वास नहीं करता ( योजना में तो, शायद डॉ. अहलूवालिया भी विश्वास नहीं करते), तब यह और भी ज्यादा दुविधा में डाल देने वाली बात है. ये यात्रायें किस बारे में थी? मितव्ययिता के बारे में वैश्विक जागरूकता का प्रसार करने के लिये? यदि ऐसा है तो, हमें उनकी यात्राओं पर ओर ज्यादा खर्च करना होगा: एथेन्स की सड़कों पर इस ध्येय का क़त्ल करते हुए विद्रोही ग्रीसवासियों पर ध्यान दें. और उससे भी ज्यादा उनकी अमरीका यात्राओं पर जहाँ अमीरों की मितव्ययिता असाधारण है. यहाँ तक उस देश के मैनेजरों ने २००८ में भी करोड़ों रूपये बोनस लिये, जिस साल वाल स्ट्रीट ने विश्व अर्थव्यवस्था का भट्टा बिठा दिया था. इस साल, अमरीका में बेहद-अमीर मीडिया अखबार भी लिख रहे हैं कि ये मैनेजर ही कम्पनियों, नौकरियों और तमाम चीजों का विनाश कर रहे हैं– और इस सबसे व्यक्तिगत लाभ उठा रहे हैं. लाखों अमरीकावासी, जिनमे वे भी शामिल है जो बंधक घरों की नीलामी का शिकार हुए हैं, वे अलग तरह की मितव्ययिता भुगत रहे हैं. उस तरह की, जिससे फ्रांसीसी घबराये हुए थे और जिसके खिलाफ उन्होंने वोट दिया.

२००९ में जब डा. सिंह ने खर्चों में कटौती का अनुरोध किया, तब उनके मंत्रिमंडल ने इस आह्वान का शानदार जवाब दिया. अगले २७  महीनों के दौरान, हर सदस्य ने औसतन, कुछ लाख रूपये प्रति महीने अपनी सम्पति में जोड़े. यह सब उस दौरान, जब वे मंत्रियों के तौर पर कठिन मेहनत कर रहे थे. प्रफुल पटेल इनमे सबसे आगे रहे, जिन्होंने इस दौरान अपनी सम्पति में हर २४ घंटे में, औसतन पांच लाख रुपये जोड़े. तब जब एयर इंडिया के कर्मचारी, जिस मंत्रालय का ज्यादातर समय वह मन्त्री थे, हफ़्तों तक अपनी तनख्वाह पाने के लिये संघर्ष कर रहे थे. अब जबकि प्रणव अपना कोड़ा फटकार रहे हैं, तब ओर भी ज्यादा मितव्ययिता देखने को मिलेगी.

अब इस मितव्ययिता के द्विदलीय भाईचारे को देखें: प्रफुल पटेल (यूपीए–एनसीपी) और नितिन गडकरी (एनडीए–बीजेपी) ने अभी तक की दो सबसे महंगी शादियों का आयोजन किया, जिसमे किसी आईपीएल फ़ाइनल से भी ज्यादा मेहमान शामिल थे. लिंग-संतुलन का कठोर अनुशासन, भी. ये आयोजन, मि. पटेल की बेटी के लिये और मि. गडकरी के बेटे के लिये थे. 

इनके कारपोरेट प्रतिरूपों ने इसे ओर आगे बढ़ाया. समकालीन स्मृति में मुकेश अंबानी का सबसे महंगा २७ मंजिल (पर उसकी ऊंचाई ५० मंजिल तक है) का घर. और विजय माल्या ने– किंगफिशर में जिनके कर्मचारी अपनी तनख्वाहों के लिये संघर्ष कर रहे हैं–  ५ मई को ट्वीट किया: “दुबई में बुर्ज खलीफा के १२३वें माले पर एटमोसफियर में रात्रिभोज कर रहा हूँ. मैं अपने जीवन में कभी इतनी ऊंचाई पर नहीं आया. शानदार दृश्य.” यह शायद उससे ज्यादा ऊंचाई पर है जहाँ अभी किंगफिशर उड़ान भर रही है. दोनों की आईपीएल में खुद की टीमें हैं. एक ऐसी संस्था जिसे सार्वजनिक आर्थिक सहायता मिली है (उदाहरण के लिये, मनोरंजन कर में छूट). यह तब तक, जब तक मामला बम्बई उच्च न्यायालय में नहीं गया. आईपीएल से जुड़ी  जनता के पैसे से चलने वाली अन्य मितव्ययितायें भी हैं – इन खबरों का इंतज़ार करें.

वाल स्ट्रीट मॉडल   

कारपोरेट जगत आम तौर पर वाल स्ट्रीट के मॉडल का अनुसरण करता है. वहाँ, नौ बैंकों, जिसमे सिटीग्रुप और मेर्रिल लिंच शामिल हैं, ने “२००८ में ३२.६ बिलियन डॉलर बोनस के तोर पर दिये, उस समय जब उन्होंने करदाताओं द्वारा जमा धन से १७५ बिलियन डॉलर प्राप्त किये,” ब्लूमबर्ग ने २००९ में रिपोर्ट दी. उसने इस विषय पर न्यूयॉर्क के अटॉर्नी जनरल एंडरयू कयूओमो की रिपोर्ट से उद्धृत किया: “जब बैंक बेहतर कर रहे थे, तब उनके कर्मचारियों को अच्छी तनख्वाह दी जा रही थी. जब बैंक खराब प्रदर्शन कर रहे थे तब भी उनके कर्मचारियों को अच्छी तनख्वाह दी जा रहती थी. जब बैंकों ने बेहद खराब प्रदर्शन किया तो करदाताओं ने उनकी जमानत ली और उनके कर्मचारियों को तब भी अच्छी तनख्वाह दी गयी. जैसे-जैसे मुनाफा कम होता गया, उनके बोनस और दूसरे पारितोषिकों में कोई कमी नहीं आयी.”

ध्यान दें  कि  पिछले सप्ताह प्रणव की मितव्ययिताओं की प्रार्थना ने बेहद-अमीरों के प्रवक्ताओं को टीवी पर बहुत जोरशोर से यह कहते हुए देखा कि घाटा पूरी तरह से “एक के बाद एक होने वाली लोकलुभावन कार्यवाहियों” की वजह से है, जिसमे  ऐसे मूर्खतापूर्ण काम शामिल हैं,- जैसे लोगों को काम देना, भुखमरी को कम करना, बच्चों को स्कूल भेजना. इसमें धनाड्य वर्ग के लिये किये गये लुभावने कामों का कोई जिक्र नहीं है जिसमें  इन्ही प्रणव के बजट के माध्यम से कारपोरेट टैक्स, उत्पाद और सीमा शुल्क में रियायत देकर लगभग ५ लाख करोड़ रुपये (उस समय लगभग १०० बिलियन डॉलर) मुख्य रूप से अमीर और कारपोरेट वर्ग को तोहफे में दे दिये गये. सीताराम येचुरी ने इस बात की ओर संसद का ध्यान दिलाया है कि बेहद-अमीरों के लिये बट्टे खाते में डाले गये इन पैसों की वजह से राजकोषीय घाटा ८,००० करोड़ रुपये ज्यादा बढ़ गया है. परन्तु वह गरीबों के लिये किये जाने वाले “लोकलुभावन काम” हैं जिन्हें आलोचना झेलनी पड़ती है.

अमर्त्य सेन खेदपूर्वक पूछते हैं कि “राजस्व से सम्बंधित समस्याओं पर मिडिया में किसी भी तरह की बहस क्यों नहीं होती है, जैसे कि सोने और चांदी को सीमा शुल्क में छूट, वित्त मंत्रालय के अनुसार, इसमें राजस्व को उससे ज्यादा राशि का नुकसान शामिल है (प्रति वर्ष ५०,००० करोड़ रूपये) जितनी खाद्य सुरक्षा बिल के लिये जरूरी अतिरिक्त राशि (२७,००० करोड़ रूपये) है.”

इस सर्वगुण संपन्न सम्मोहक दायरे के बाहर रहने वाले भारतीय एक अलग तरह की मितव्ययिता जानते हैं. खाद्य मुद्रास्फीति दो अंको में है. एक साल में सब्जियों के दाम ६० प्रतिशत बढ़ चुके हैं. बच्चों में कुपोषण सब-सहारा अफ्रीका से दोगुना है. परिवार दूध और दूसरी जरुरी चीजों का उपयोग तेजी से कम कर रहे हैं. स्वास्थ्य सेवाओं में भारी वृद्धि लाखों लोगों को कंगाल कर रही है. किसान निवेश करने में और कर्ज हासिल करने में असमर्थ हैं. बहुत से लोगों को पीने के पानी की कमी है, जैसे- जैसे इस जीवनदायिनी वस्तु को दूसरे कामों के लिये इस्तेमाल किया जा रहा है. उच्च वर्ग के लिये मितव्ययिता का अभ्यास करना कितना बेहतर होगा.  
(द हिन्दू में प्रकाशित पी. साईनाथ के लेख की आभार सहित प्रस्तुति. अनुवाद– दिनेश पोसवाल)  

एक परिवार की कहानी : जो बत्तीस रुपये रोज से अधिक खर्च करता है

अमरपाल/ पारिजात


(योजना आयोग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार शहरी क्षेत्र में 32 रुपये और ग्रामीण क्षेत्र में 26 रुपये प्रतिदिन प्रति व्यक्ति खर्च करने वाला परिवार गरीबी रेखा से ऊपर माना जायेगा।

इस 32 रुपये और 26 रुपये में भोजन, आवास, वस्त्र, शिक्षा, स्वास्थ्य और मनोरंजन जैसे सभी खर्चे शामिल हैं। हमने अपने आस-पास के कुछ परिवारों से बातचीत कर उनकी जिन्दगी की हकीकत जानने की कोशिश की। स्थानाभाव के कारण हम उनमें से एक ही परिवार की स्थिति यहाँ दे रहे हैं। बाकी लोगों की कहानी भी लगभग ऐसी ही है।)
अब से 14 साल पहले चंद्रपाल (उम्र- 45वर्ष) एक लोहा फैक्ट्री में काम करते थे, जहाँ भारी वजन उठाने के चलते उनकी रीढ़ की हड्डी खिसक गयी। तभी से वे कोई भारी काम करने लायक नहीं रहे। उन्हें घर बैठना पड़ा। इलाज के अभाव में वे अब लगभग अपंग हो गए हैं।
चंद्रपाल मूल रूप से खुर्जा (बुलंदशहर) के रहने वाले हैं। जब वह छोटे थे तभी दवा के अभाव में डायरिया से उनके पिता की मौत हो गयी थी। चंद्रपाल बताते हैं कि उनके माता-पिता की दस संताने हुईं, जिनमें से सिर्फ तीन ही बच पायीं। बाकी सभी बच्चे बीमारी और कुपोषण से मर गये। जो बचे रहे उनमें भी बड़े भाई टीबी होने और खुराक न मिलने से मर गए। उनकी माँ ने खेत में मजदूरी करके किसी तरह अपने बच्चों को पाला-पोसा और चंद्रपाल को 12वीं तक पढ़ाया। इसके बाद वे खुर्जा शहर में ही एक लोहे की फैक्ट्री में काम करने लगे। फैक्ट्री में काम दौरान रीढ़ की हड्डी की परेशानी और बेहतर काम की तलाश में वे दिल्ली चले आये।
दिल्ली के पास लोनी में उनका 50 गज का अपना मकान है तीन कमरों का, जिस पर पलस्तर नहीं हुआ है। 1997 में उन्होंने यह जमीन 55 हजार रुपये में खरीदी थी जो अपने खून पसीने की कमाई और खुर्जा का पुश्तैनी मकान बेचकर जुटाया था। उन्होंने अपना सारा पैसा इसी घर में लगा दिया, लेकिन फिर भी मकान अधूरा ही बन पाया। चंद्रपाल और उनका बेटा अब खुद ही उसे थोड़ा-थोड़ा करके पूरा करते हैं। मकान में काम करते हुए ही चंद्रपाल के एक हाथ की हड्डी भी टूट गयी, जो इलाज के बाद भी नहीं जुड़ी। परिवार की आमदनी इतनी नहीं कि ऑपरेशन करवा सकें। ये दर्द अब उनकी जिन्दगी का हिस्सा बन गया है। अब वे हाथ से भी भारी काम करने में अक्षम हैं।
परिवार का खर्च उनकी पत्नी अंगूरी देवी चलाती हैं। वे दिल्ली में किसी सेठ की कोठी पर घरेलू नौकरानी का काम करती हैं। पूरे दिन घर का सारा काम करने के बदले उन्हें हर महीने 5 हजार रुपये मिलते हैं। पिछले 14 साल में केवल एक हजार रुपये की बढ़ोत्तरी हुई। वे सारा पैसा घर में देती हैं। अपने पास एक धेला भी नहीं रखती। इसका कारण बताते हुए कहती हैं कि बाजार में चलते हुए कभी उनका मन ललचा गया तो गलती से वह कुछ खरीद न लें। इसीलिए उनके पास सिर्फ 70रुपये का रेल पास रहता है, ताकि वे रोज लोनी से दिल्ली आ-जा सकें।
चंद्रपाल के घर में बिजली कनेक्शन नहीं है। किराये पर जनरेटर का कनेक्शन है जो रात को तीन घण्टे बिजली देता है , जिससे 15 वाट का एक बल्ब जलता है। इसके लिए उन्हें 100 रुपये महीना देना होता है। बाकी समय वे ढिबरी से काम चलाते हैं। पीने के पानी का कनेक्शन भी नहीं है। घर में एक हैंडपम्प है। 120 फीट गहरा।  दिल्ली और उसके आस-पास के इलाकों में इतनी गहराई पर पीने लायक पानी नहीं मिलता। जगह-जगह बोर्ड लगे हैं कि हैंडपम्प के पानी का प्रयोग पीने के लिए न करें। लेकिन यहाँ तो इसी पानी से काम चलाना पड़ता है।
गंदे पानी की निकासी का कोई इंतजाम नहीं है और न ही गलियों की साफ सफाई का। घर के आगे नाली का पानी बहता है और घर के पीछे सड़ता-बजबजाता पानी का गड्ढा।  परिवार में हरदम कोई न कोई बीमार रहता है। हर महीने इलाज पर औसतन 200 रुपये का खर्चा आता है। जो कुल आमदनी का 4 प्रतिशत बैठता है। चंद्रपाल के टूटे हाथ का इलाज कराना परिवार के बस का नहीं है। वे इस पर सोचते भी नहीं। वे जानते हैं कि सरकारी अस्पताल में ऑपरेशन करवाने पर भी उसमें कम से कम दो महीने की कमाई लग जाएगी।
बीमारी के बारे में चन्द्रपाल ने कहा कि लोनी में किसी को डेंगू नहीं होता। लोगों को सबसे ज्यादा मलेरिया होता है। डेंगू के मच्छर तो साफ पानी में पलते हैं। यहाँ तो पीने के लिए भी साफ पानी नहीं है। घर के आगे-पीछे हमेशा गन्दा पानी भरा रहता है। उसमें तो मलेरिया के मच्छर ही पलते हैं। मच्छर इतने कि घर में बैठ नहीं सकते। बीमारी की जड़ यही सब है।
इस परिवार का मुख्य भोजन आलू की सब्जी या चटनी और रोटी है। अंगूरी देवी अपने मालिक के यहाँ से कभी कोई सब्जी ले आयें, तभी उन्हें सब्जी नसीब होती है। हफ्ते में एक या दो दिन ही घर में सब्जी बनती है।  हमारा देश मसालों के लिए मशहूर है, लेकिन इस घर में हल्दी ,जीरा, धनिया और लाल मिर्च के अलावा और कोई मसाला इस्तेमाल नहीं होता।
चंद्रपाल के लिए फल खरीद पाना मुमकिन नहीं। सालों से परिवार में कोई फल नहीं आया। परिवार में माँस-मछली नहीं बनती। पनीर खाने के बारे में वे सोच भी नहीं सकते।  अंगूरी देवी बताती है की जब से कोठी में काम करने लगीं तब से उन्हें चाय पीने की लत लग गयी। सुबह 6 बजे चाय पीकर ही वह काम पर जाती हैं। इसी बहाने घर में रोज 10 रुपये का 300 ग्राम दूध आता है। अपनी पत्नी की इस बुरी लत से चंद्रपाल खुश हैं क्योंकि इसी बहाने उन्हें भी दूध की चाय मिल जाती है। ईंधन में 3 लीटर मिट्टी का तेल राशन की दुकान से और 4 किलो रसोई गैस ब्लैक खरीद कर इस्तेमाल होता है। खाने के मद में औसतन 3000रुपये महीने का खर्च आता है जो की कुल आय का 60प्रतिशत है।
जब हमने उनसे महँगाई के बारे में पूछा कि क्या इससे घर के खर्च पर कोई फर्क पड़ा है, तो वह बेबस होकर बोले ‘‘सरकार गरीबों की दुश्मन हो गयी है। हमसे न जाने किस जनम का बदला ले रही है। महँगाई दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। पहले एक आदमी काम करता था और पूरा परिवार खाता था। ठीक से गुजारा होता था। लेकिन अब तो महँगाई के मारे सबको काम करना पड़ता है, फिर भी किसी का गुजारा नहीं होता। हमारे सामने वाले परिवार में माँ-बाप और एक लड़की है, तीनों काम करते हैं। माँ-बाप बाहर और लड़की घर पर ही किसी के दो बच्चों की देखभाल का काम करती है। अपने घर का सारा काम भी वही करती है, फिर भी गुजारा नहीं। वे भी हमारे ही तरह हैं।’’
भारत में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 9 गज कपड़े की खपत होती है। चंद्रपाल के परिवार ने पिछले 14 सालों से शायद ही कभी कोई नया कपड़ा खरीदा हो। अंगूरी देवी जिस कोठी पर काम करती हैं वहीं से मिले उतरन को इस्तेमाल करने लायक बना लिया जाता है। यानी कपड़े के मद में वे कुछ भी खर्च नहीं करते।
परिवार की खराब स्थिति के बारे में बात चली तो अंगूरी देवी गुस्से में बोलीं-‘‘अरे भइया क्या करें, कौन अपने बच्चों को अच्छा खिलाना-पिलाना नहीं चाहता। महँगाई ने मार डाला। हमारी जिन्दगी तो नरक बन गयी है। गरीबों का कोई नहीं है। पर क्या करें, भइया जीना तो पड़ता ही है।’’
चंद्रपाल के दो बच्चे हैं बड़ा लड़का सरकारी स्कूल में 11वीं कक्षा में पढ़ता है। उसकी फीस 550 रुपये छमाही है। लड़की प्राइवेट स्कूल में 9वीं में पढ़ती है। पहले वे दोनों ही प्राइवेट स्कूल में पढ़ते थे, लेकिन फीस न भर पाने के कारण लड़के को सरकारी स्कूल में दाखिला लेना पड़ा। सरकार कुल जीडीपी का शिक्षा के मद में जितना खर्च करती है उससे ज्यादा यह परिवार करता है- कुल आय का लगभग 6.2 प्रतिशत और वह भी सबसे घटिया दर्जे की शिक्षा के बदले।
अंगूरी देवी ने बताया कि बच्चे कभी नहीं खेलते। चन्द्रपाल ने बीच में टोका कि पूरी लोनी में खेलने की कहीं  कोई जगह भी है क्या, जो खेलें। और खेल का सामान भी तो  हो। उनका कहना था कि हमारा लड़का पढ़ाई में बहुत होशियार था। लेकिन अब पता नहीं उसे क्या हो गया है, पढ़ने में जी नहीं लगाता। 11वीं में फेल भी हो गया था पिछले साल। (हफ्ते भर बाद पता चला कि उनके लड़के ने पढ़ाई छोड़ दी है और अब कहीं काम ढूँढ रहा है।)
चंद्रपाल बताते हैं कि उन्होंने अपनी पत्नी के साथ 1992 में सिनेमा हॉल में कोई फिल्म देखी थी, वही पहला और आखरी मौका था। चंद्रपाल बहुत साल पहले पोस्टमैन की भर्ती परीक्षा में खुर्जा से लखनऊ गये थे। उसमें भी रेल में किराया नहीं दिया था और रात स्टेशन पर ही बितायी थी, पैसे के अभाव के कारण। यही उनकी जिन्दगी की सबसे लम्बी यात्रा रही।
पति-पत्नी दोनों का मानना है कि आज वह जिस हालत में हैं वह सब बाबा गोरखनाथ की कृपा है, इसलिए महीने में दो बार वे हरियाणा के किसी आश्रम में जाते हैं। इस यात्रा में लगभग 500 रुपये मासिक खर्च आता है। यदि इसे पर्यटन माने (जो है भी) तो इसमें उनकी आय का कुल 10 प्रतिशत खर्च होता है।
मनोरंजन का कोई साधन घर में नहीं है। चन्द्रपाल ने बताया कि ‘‘बहुत समय से एक रेडियो खरीदना चाहता हूँ, लेकिन तंगी की वजह से नहीं खरीद पाया। टीवी तो बहुत बड़ी बात है हमारे लिए, सपने जैसा।’’
उनके घर में 2 टूटी खाट, वर्षों से खराब पड़ा एक 14 इंच का ब्लैक एण्ड व्हाइट टीवी, एक मेज और एक डबल बेड है। टीवी और डबल बेड अंगूरी देवी के मालिक ने बहुत ही सस्ते में दिया था, इसके अलावा मालिक का दिया हुआ एक मोबाइल फोन भी है। इसमें वे हर महीने औसतन 15रुपये का रिचार्ज करवाते हैं। इस तरह संचार पर उनकी आमदनी का 0.3 प्रतिशत खर्च है। अखबार कभी कहीं दिख गया तो चन्द्रपाल उसे पढ़ लेते हैं। खरीद पाना उनके बस का नहीं।
इस परिवार की प्रति व्यक्ति मासिक आमदनी 1250 रुपये यानी प्रतिदिन 41 रुपये 70 पैसे है जो सरकार द्वारा तय किये गये गरीबी रेखा के पैमाने (960 रुपये) की तुलना में 290 रुपये ज्यादा है। जबकि परिवार के लोग ठीक से खाना भी नहीं खा पाते, भोजन में प्रोटीन, वसा और विटामीन का कोई नामों निशान नहीं, कपड़ा नहीं खरीदते, रहन-सहन का स्तर बहुत ही खराब है, पीने का साफ पानी मयस्सर नहीं, बीमार पड़ने पर उचित इलाज नहीं करा सकते, बच्चों को पढ़ा नहीं सकते, मनोरंजन के बारे में सोच भी नहीं सकते, त्योहार नहीं मनाते, सर के ऊपर किसी तरह छत तो है लेकिन, दड़बेनुमा, गन्दगी भरे माहौल में वे दिन काट रहे हैं। जाड़े में सीलन और ठण्ड, बरसात में कीचड़, गर्मी में तपिस। चारों ओर बदबू और मच्छर। इस नरक से भी बदतर जिन्दगी की गाड़ी उसी दिन पटरी से उतर जायेगी जिस दिन किसी कारण से परिवार की आय का एक मात्र जरिया, अंगूरी देवी की घरेलू नौकरानी की नौकरी छूट जायेगी।
लेकिन योजना आयोग की नजर में यह परिवार गरीबी रेखा से ऊपर है। चूँकि यह परिवार गरीब नहीं है, इसलिए यह कोई भी सरकारी सहायता पाने का हकदार नहीं है।
अर्जुन सेन गुप्ता कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक 77 फीसदी लोगों की आय प्रतिव्यक्ति 20 रुपये रोज, यानी 600 रुपये प्रतिमाह है। उसकी तुलना में तो इस परिवार की आय दुगुने से भी ज्यादा है। यह सब अकल चकरा देनी वाली बातें हैं। देश में गरीबी का अन्दाजा लगाइये। 
(देश-विदेश पत्रिका के अंक 12 में प्रकाशित)



योजना आयोग ने कहा- गाँव में 26 और शहर में 32 रुपए से ज्यादा खर्च करने वाले गरीब नहीं हैं।

अर्जुन सेनगुप्ता कमिटी ने कहा- 80 करोड़ देशवासी 20 रुपये रोज पर गुजर-बसर करते हैं।

दोनों सही हैं तो देश में गरीबों की कुल संख्या का अंदाजा लगाइए। 80 करोड़? 90 करोड़? 100 करोड़?

आँकड़े निर्मम होते हैं।

आँकड़ों से खिलवाड़ करने वाले जालिम होते हैं।

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