Category Archives: ओत्तो रेने कास्तिलो

व्यंग्य







-ओत्तो रेने कास्तिलो 
हिटलर ने कहा था 1935 में कि
“नाजी जर्मनी
हजार सालों तक कायम रहेगा

ठीक दस साल बाद 
क्या कहा था हिटलर ने
बर्लिन के खंडहरों तले?
कुछ ही साल बाद
डलेस महोदय ने
एक विराट ट्रेक्टर की तरह घड़घड़ाते हुए
कहा “यह दशक देखेगा
साम्यवादी गुलामी का अंत.”
कुछ ही वर्षों बाद
यूरी गगारिन ने क्या किया  
जब अमरीका के विस्तीर्ण सागर और 
विस्तृत भूभाग के ऊपर असीम आकाश से

उसने मानवता को बधाई सन्देश दिया?

टॉमस मान सही थे
जब उन्होंने कहा कि
“साम्यवाद-विरोध
बीसवीं सदी की
सबसे मजाकिया तरकीब है.”

फिर भी
उनके स्वार्थ
उनका मुनाफा 
जारी है धूमधाम से
जारी है कत्लोगारत
आज भी.

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एक अन्याय की रपट

(पिछले दिनों इलाहाबाद शहर को सुन्दर बनाने के लिए जब वहाँ ठेला-खोमचा और पटरी पर सामान बेचनेवाले मेहनतकश लोगों के उजाड़े जाने की खबर साथी उत्पला शुक्ला ने दी थी, तभी ग्वाटेमाला के क्रन्तिकारी कवि ओत्तो रेने कास्तिलो की यह कविता याद आयी थी और इसे अंग्रेजी में साथियों को पढ़वाया भी था. बेदखली और विस्थापन हमारे यहाँ रोजमर्रे की घटना हो गयी है. हृदयहीन शासक-प्रशासक देश भर में ग़रीबों की रोजी-रोटी छीन रहे हैं  और उन्हें दर-दर की ठोकर खाने पर मजबूर कर रहे हैं. इस कविता में दामियाना मुर्सिया को इसलिए सड़क पर फेंक दिया गया, क्योंकि उसने घर का किराया नहीं चुकाया. लेकिन हमारे महान लोकतंत्र में तो बिना किसी वजह के, केवल शासकों की सनक और शौक के चलते किसी को, कहीं से भी,कभी भी उजाड़ दिया जाता है और उसे विकास का नाम दे दिया जाता है.) 


एक अन्याय की रपट – ओत्तो रेने कास्तिलो 
“गार्सिया की बिधवा, 77 वर्षीय श्रीमती दामिआना मुर्सिया के घरेलू सामान पिछ्ले कुछ दिनों से खुले में पड़े-पड़े बारिश में भींग रहे हैं, जिन्हें तीसरे और चौथे अंचल के बीच, गाली नं. 15 “सी” स्थित उनके छोटे-से घर के बाहर फेंक दिया गया था.” (रेडियो अखबार “डायरियो मिनुतो” पहला संस्करण, बुधवार, 10 जून, 1964.)

शायद आप यकीन न करें,
लेकिन यहाँ,
मेरी आँखों के आगे,
एक बूढी औरत,
गार्सिया की बिधवा, दामियाना मुर्सिया,
77 साल की जर्जर काया,
बारिश में भींगती,
अपने टूटे-फूटे, पुराने, दागदार,
फर्नीचरों के बगल में खड़ी,
अपनी झुकी पीठ पर
सह रही है
आपकी और मेरी इस व्यवस्था के
सभी दानवी अन्याय.
गरीब होने के चलते,
धनिकों के न्यायाधीशों ने
आदेश दिया बेदखली का.
अब तक शायद आपने
इस शब्द को समझा नहीं.
कितनी महान दुनिया में
जी रहे हैं आप!
जहाँ धीरे-धीरे करके
अत्यंत पीड़ादायक शब्द
अपनी क्रूरता खोते जा रहे हैं.
और उनकी जगह हर रोज,
भोर की तरह,
उग आते हैं नए-नए शब्द
आदमी के प्रति
प्रेम और नरमी से भरपूर.
बेदखली,
कैसे किया जाय इसका बयान?
आप जानते हैं,
जब आप किराया नहीं चुका सकते
तो आ धमकते हैं धनिकों के अधिकारी
और फेंक देते हैं आपके सामान
बाहर गली में.
और ख्वाबों में खोये-खोये अचानक
आपके सर से छत छिन जाती है.
यही मतलब है इस शब्द का
बेदखली- अकेलापन
खुले आकाश के नीचे,
आँखे आँकती हैं, मुसीबत.
ये आजाद दुनिया है, वे कहते हैं.
कैसी किस्मत कि तुम
अब तक नहीं जान पाए
इन स्वाधीनताओं को!
गार्सिया की बिधवा दमियाना मुर्सिया
आप को मालूम है,
बहुत छोटी है,
और ठण्ड से बुरी तरह काँपती हुई.
उसका अकेलापन कितना महान है!
आप यकीन नहीं करेंगे,
कितना सताते हैं ये अन्याय.
हमारे लिए तो रोजमर्रे की बात हैं  
अजूबा तो तब हो कि कोई करुणा
और गरीबी से घृणा की बात करे.
और फिर भी हमेशा से ज्यादा
प्यार करता हूँ मैं आपकी दुनिया को,
इसे जानता-समझता हूँ,
महिमा मण्डित करता हूँ
इसके विश्वव्यापी गौरव को.
और खुद से पूछता हूँ मैं-
क्यों हमारे बूढ़े लोग
इस हद तक कष्ट सहते है,
जबकि बुढ़ापा सबके लिए
आता है एक दिन?
लेकिन सबसे बुरी चीज है
आदत.
आदमी खो देता है अपनी मानवता,
परवाह नहीं उसे
दूसरों की असह्य वेदना की.
और वह खाता है
वह हँसता है
और वह हर बात भुला देता है.
मैं नहीं चाहता इन चीजों को
अपने देश की खातिर.
मैं नहीं चाहता इन चीजों को
किसी के लिए भी.
मैं नहीं चाहता इन चीजों को
दुनिया में किसी के लिए भी.
और मैं कहता हूँ
दर्द का मारा
कि सम्हालना चाहिए
एक अमिट आभा.  
यह आज़ाद दुनिया है, वे कहते हैं.
मेरी तरफ देखो.
और कहो अपने साथियों से
कि मेरी हँसी
मेरे चेहरे के बीचोंबीच
विकृत रूप ले चुकी है.
कहो उनसे मैं उनकी इस दुनिया को प्यार करता हूँ.
उन्हें खूबसूरत बनाना चाहिए इसको.
और मैं बेहद खुश हूँ
कि वे जान ही नहीं पाए अबतक
कि अन्याय
कितना गहरा और तकलीफदेह है.

(अनुवाद- दिगम्बर) 

अराजनीतिक बुद्धिजीवी

-ओत्तो रेने कास्तिलो 
(ग्वाटेमाला के क्रन्तिकारी कवि, जन्म 1934 – मृत्यु 1967 )

















एक दिन
हमारे देश के
अराजनीतिक बुद्धिजीवियों से
पूछताछ करेंगे
हमारे सबसे सीधे-सादे लोग.

उनसे पूछा जायेगा

कि उन्होंने क्या किया
जब उनका राष्ट्र
मरता रहा धीरे-धीरे,
सुलगता धीमी आँच में,
निर्बल और अकेला.
कोई भी उनसे नहीं पूछेगा
उनकी पोशाक के बारे में,
दोपहर में खाकर
सुस्ताने के बारे में,
कोई नहीं जानना चाहेगा
“शून्य के विचार” के साथ
उनके बंजर मुकाबलों के बारे में.

परवाह नहीं करेगा कोई भी
उनकी महँगी ऊँची पढ़ाई की.
नहीं पूछा जायेगा उनसे
यूनानी मिथकों के बारे में.
या उस आत्म-घृणा के बारे में
जो उत्पन्न होती है उस समय
जब उन्हीं में से कोई
शुरू करता है
कायरों की मौत मरना.
कुछ भी नहीं पूछा जायेगा 
उनके बेहूदे तर्कों के बारे में,
जो सफ़ेद झूठ के साये में
पनपते हैं.
उस दिन
सीधे-सादे लोग आयेंगे.
जिनके लिए कोई जगह नहीं थी
अराजनीतिक बुद्धिजीवियों की
किताबों और कविताओं में,
लेकिन रोज पहुँचाते रहे जो
उनके लिए ब्रेड और दूध,
तोर्तिला और अण्डे,
वे जिन्होंने उनके कपडे सिले,
वे जिन्होंने उनकी गाड़ी चलाई,
जिन लोगों ने देख-भाल की
उनके कुत्तों और बागवानी की
और खटते रहे उनकी खातिर,
और वे लोग पूछेंगे-
“क्या किया तुमने जब गरीब लोग
दुःख भोग रहे थे, 
जब उनकी कोमलता
और जीवन जल रहा था
भीतर-भीतर?”   
मेरे मधुर देश के
अराजनीतिक बुद्धिजीवीयो,
तुम कोई जवाब नहीं दे पाओगे.
चुप्पी का गिद्ध
तुम्हारी आँतों को चबायेगा,
तुम्हारी अपनी दुर्गति
कचोटेगी तुम्हारी आत्मा.
और लाज के मारे
मौन रह जाओगे तुम. 

(अनुवाद- दिगम्बर)
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