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कामरेड लेनिन से बातचीत (1829) –ब्लादिमीर मायकोवस्की

mayakovsky-1

घटनाओं की एक चकरघिन्नी

ढेर सारे कामों से लदा,

दिन डूबता है धीरे-धीरे

जब उतरती है रात की परछाईं.

दो जने हैं कमरे में—

मैं

और लेनिन-

एक तस्वीर

सफेद दीवार पर लटकी.

दाढ़ी के बाल फिसलते हैं

उनके होठों के ऊपर

जब उनका मुँह

झटके से खुलता है बोलने को.

तनी हुई

भौं की सलवटें

विचारों को रखती हैं

उनकी पकड़ में,

घनी भौंहें

मेल खाती घने विचारों से.

झंडों का एक जंगल

उठी हुई मुट्ठियाँ घास की तरह सघन…

हजारों लोग बढ़ रहे हैं जुलूस में

उनके नीचे…

गाड़ियों से लाये गए,

ख़ुशी से उछलते हुए उतरते,

मैं अपनी जगह से उठता हूँ,

उनको देखने के लिए आतुर,

उनके अभिवादन के लिए,

उनके आगे हाजिर होने के लिए!

“कामरेड लेनिन,

मैं आपके सामने हाजिर हूँ-

(किसी के आदेश से नहीं,

सिर्फ अपने दिल की आवाज पर)

.यह मुश्किल काम

पूरा किया जायेगा,

बल्कि पूरा किया जा रहा है.

हम लोगों को मुहय्या करा रहे है

खाना और कपड़ा

और जरूरतमन्दों को रोशनी,

कोटा

कोयले का

और लोहे का

पूरा हुआ,

लेकिन अभी भी

परेशानियाँ कम नहीं,

कूड़ा-करकट

और बकवास

आज भी हमारे चारों ओर.

तुम्हारे बिना,

ढेर सारे लोग

बेकाबू हो गए,

सभी तरह के झगड़े

और वाद-विवाद

जो मुमकिन हैं.

हर तरह के बदमाश

भारी तादाद में

परेशान कर रहे हैं हमारे देश को,

सरहद के बाहर

और भीतर भी.

कोशिश करो

इन्हें गिनने की

और दर्ज करने की,

इनकी कोई सीमा नहीं.

सभी तरह के बदमाश,

और बिच्छू की तरह विषैले—

कुलक,

लालफीताशाह

और

निचली कतारों में,

पियक्कड़,

कट्टरपंथी,

चाटुकार.

वे अकड़ते हुए चलते हैं,

घमण्ड में चूर

मोर की तरह,

उनकी छाती पर जड़े

बैज और फौन्टेन पेन.

हम उनमें से बहुतों से छुटकारा पा लेंगे

मगर यह काम आसान नहीं

बेहद कठिन प्रयास की जरूरत है.

बर्फ से ढकी जमीन पर

और बंजर खेतों में,

धुआँभरे कारखानों में

और बन रहे कारखानों के पास,

आपको दिल में बसाए,

कामरेड लेनिन,

हम रच रहे हैं,

हम सोच रहे हैं,

हम साँस ले रहे हैं,

हम जी रहे हैं,

और हम संघर्ष कर रहे हैं!

घटनाओं की एक चकरघिन्नी

ढेर सारे कामों से लदा,

दिन डूबता है धीरे-धीरे

जब उतरती है रात की परछाईं.

दो जने हैं कमरे में—

मैं

और लेनिन-

एक तस्वीर

सफेद दीवार पर लटकी.

(अनुवाद– दिगम्बर)

रिसेप्सनिस्ट अपनी डेस्क के पास बैठी है और गुनगुनाती है सॉलिडेरिटी गीत –कारोल तार्लेन

(कारोल तार्लेन एक मजदूरनी, ट्रेड यूनियन कार्यकर्त्री और कवियत्री थीं… 2012 उनकी मृत्यु हुई… पहले भी उनकी कविता विकल्प पर प्रकाशित हुई और सराही गयी…)

हम एक नयी दुनिcarol_01gया को जन्म देंगे

पुरानी दुनिया की राख से

 

मैं एक सोन मछरी हूँ जिसे पकड़ा तुमने

ठण्डी बारिश के दौरान

सेवारवाले एक बड़े तालाब से.

मेरे माँस ने देखे धरती के चारों कोने.

मैं रसीली हूँ.

मेरे शल्क चमकते हैं

तुम्हारी पनीली भूरी आँखों में.

मैं मुस्तैदी से सजाई हुई नुमाइशी चीज हूँ

जो तुम्हारे फोन सुनती है,

टाइप करती है तुम्हारे टैक्स बचत की रिपोर्ट

शर्दियों की यात्रा.

स्वागत करती है तुम्हारे ग्राहकों का

गुलाबी मुस्कान से.

जब मैं बैठती हूँ गद्देदार

चक्करदार बिन हत्थेवाली कुर्सी पर,

सपने देखती हूँ खूबसूरत विदेशी जगहों के,

टहलती हुई विशाल सजे-धजे पार्कों में.

इसी बीच मैं देखती हूँ अपनेआप को

झुकी कमर बूढ़ी, लिपटा स्कार्फ

मेरी पतली गर्दन पर,

सुलगती राख को कुरेदते हुए,

लेकिन फिर मैं देखती हूँ

कि मैं चौड़े कुल्हेवाली, लम्बी, मजबूत औरत

दोनों पैर फैलाये,

सन्तान जन रही हूँ.

(अनुवाद — दिगम्बर)

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