हिन्दू राष्ट्रवाद के कुतर्क– मेघनाद देसाई

 

meghnad

निम्नलिखित प्रस्थापनाएं हिन्दू राष्ट्रवादी सिद्धांत के केंद्र में हैं-

  • भारत प्रागैतिहासिक काल से ही भारतवर्ष या आर्यावर्त के रूप में एक एकल राष्ट्र रहा है.
  • जब मुस्लिम आक्रमणकारी आठवीं शताब्दी के बाद उत्तर-पश्चिम से आये, तभी से भारत गुलाम हो गया– पहले मोहम्मद बिन कासिम और मोहम्मद गजनी तथा बाद में दिल्ली सल्तनत और फिर मुग़ल साम्राज्य. मुस्लिम विदेशी हैं. विदेशी के प्रति इस घृणा के जरिए यह बात स्वयंसिद्ध और स्थापित कर दी जाती है कि आर्य भारत में कहीं और से नहीं आये थे. सिन्धु घाटी सभ्यता और आर्यों के आक्रमण की कहानी के बीच सामंजस्य बिठाने को लेकर इनमें एक बड़ी उलझन है. हिन्दू राष्ट्रवादी इस बात से साफ-साफ इनकार करते हैं कि आर्य विदेशी थे.
  • अंग्रेजों ने एक एकल भारतीय पहचान निर्मित नहीं की. यह तो हमेशा से ही मौजूद थी. मैकाले ने जो शिक्षा प्रणाली लागू की, उसने अभिजात्यों को पैदा किया– मैकाले-पुत्र, जो विदेशियों की तरह बर्ताव करते हैं और सोचते हैं.
  • 1947 में 1200 साल की गुलामी का अन्त हुआ. (नरेन्द्र मोदी ने अपने निर्वाचन के बाद संसद के केन्द्रीय सौंध में अपने पहले भाषण के दौरान यह बात कही.) भारत अंततः एक हिन्दू राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान का दावा करने के लिए स्वतन्त्र हुआ.
  • हालाँकि कांग्रेसी धर्मनिरपेक्ष, मुसलामानों को विशेषाधिकार देते रहे, जिनकी देशभक्ति पर हमेशा संदेह किया जाना चाहिए, क्योंकि उनका देश पाकिस्तान है.फर्जी इतिहास की बकवासये प्रस्थापनाएं नाना प्रकार के अवधारणात्मक और ऐतिहासिक मुद्दे उठाती हैं. आइये उनकी जांच-पड़ताल करे—पहला, मूल निवासी बनाम विदेशी का मुद्दा है. अंग्रेज स्पष्ट रूप से विदेशी थे. वे जब यहाँ आये तब उनको यहाँ कुछ करने का अवसर था और उन्होंने यहाँ उस तरह का “उपनिवेशीकरण” नहीं किया जिस तरह रोडेशिया या आस्ट्रेलिया में. दूसरी ओर मुसलमान शासक वापस नहीं गये और उन्होंने भारत को अपना घर बना लिया.यह हिन्दू राष्ट्रवादियों के लिए एक समस्या पैदा करता है. यह सच्चाई है कि मुसलमान 1200 साल से यहीं के निवासी हैं, फिर भी इनकी निगाह में वे भारत के निवासी नहीं हैं. वे हमेशा-हमेशा के लिए विजातीय ही रहेंगे. यह अजीबोगरीब सिद्धात है, क्योंकि भारत अपने पूरे इतिहास के दौरान “विदेशी” कबीलों का शरणस्थल रहा है– शक, हूण, काला सागर के पार से आनेवाले बंजारे और दूसरी “नस्लें” जो सब के सब हिन्दू धर्म में परिवर्तित होती गयीं. लेकिन फिर भी 1200 साल काफी नहीं हैं. तो फिर आर्यों के बारे में क्या कहेंगे? क्या आर्य भी मध्य यूरोप या उत्तरी ध्रुव के करीब से नहीं आये थे, जैसा की बाल गंगाधर तिलक ने तर्क द्वारा स्थापित किया है?

    यह कहना कि आर्य विदेशी हैं, हिन्दुत्व को विदेशी धर्म बना देता है. फिर तो आदिवासी–- जनजातियाँ ही एकमात्र असली मूलनिवासी होंगे, जैसा कि कुछ दलित विद्वानों ने तर्क दिया है. यही कारण है कि हिन्दू राष्ट्रवादी आर्यों का विदेशी मूल का होना स्वीकार नहीं करते हैं, हिन्दू राष्ट्रवादी आख्यान के साथ मेल बैठने के लिए आर्यों को मौलिक रूप से यहाँ का मूलनिवासी बताना जरूरी है, जो एक ऐसे काल की कल्पना करते हैं जब किसी न किसी रूप में पूरे भारत में तत्क्षण हिन्दू धर्मं स्थापित हुआ था, जिसके पीछे वेद और ब्राह्मणों के बलिदान इत्यादि की भूमिका थी. इसी कारण से हिन्दू भारत की सामान्य भाषा के रूप में संस्कृत का होना भी जरूरी होगा.

    यह फर्जी इतिहास की बकवास है. हिन्दू जिस धर्म को व्यवहार में लाते हैं उसका वेदों से बहुत कम ही सम्बन्ध है. वैदिक देवों की अब पूजा नहीं होती. विष्णु, शिव और काली का हिन्दू मंदिरों में प्रादुर्भाव वेदों के कम से कम 1000 साल बाद ही हुआ. ब्राह्मणवाद (जो हिन्दू धर्म का सही नाम है) का धीमी गति से प्रसार जो इसके केन्द्रीय स्थल पंजाब से दिल्ली क्षेत्र की ओर तथा बाद में उत्तर प्रदेश और बिहार की ओर हुआ, इसका अच्छी तरह मानचित्र निरूपण किया गया है. यह भी अच्छी तरह ज्ञात है कि ईशा पूर्व छठी शताब्दी से आजीविका, जैन धर्म और बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में पाली और अर्धमागधी की महत्वपूर्ण भूमिका थी.

    बौध धर्म और ब्राह्मणवाद के बीच एक हजार सालों तक संघर्ष चला जिसके बाद ही ब्राह्मणवाद को विजयी घोषित किया जा सका. भारत लगभग उसी समय एक हिन्दू राष्ट्र बना जब शंकराचार्य ने बौद्धों से बहस की और उनको पराजित किया. हालाँकि अगर हिन्दू राष्ट्रवादियों के कालक्रम को गंभीरता से लें, तो यह मुसलामानों का “गुलाम” बनने के ठीक बाद का समय रहा होगा.
    हिन्दू राष्ट्रवादियों की रणनीति बौद्ध धर्म और ब्राह्मणवाद के बीच के किसी भी टकराव को नकारना और यह दावा करना है कि बुद्ध विष्णु के अवतार थे. यह दावा सातवीं शताब्दी तक पुराणों में नहीं मिलता, जिस समय तक बौद्ध धर्म बाहर का रास्ता पकड़ रहा था. भारत को इतिहास के पूरे दौर में एक हिन्दू राष्ट्र के रूप में परिभाषित करने के लिए हिन्दुत्व ही पर्याप्त नहीं है.

    सावरकर ने हिन्दुत्व पर लिखे अपने लेख में इस वृत्त को चौकोर बनाने की कोशिश की थी. वे एक आधुनिकतावादी थे, न कि किसी धर्म के अनुयायी. राष्ट्र के बारे में उनका विचार उस दौरान राष्ट्रीयता के बारे में प्रचलित उन फैशनेबल विचारों से निकले थे जो यूरोप के नये पैदा हुए राष्ट्रों द्वारा ग्रहण किये गये थे, उनमें से कई पहले हैब्सबर्ग साम्राज्य के अंग रहे थे जो 1918 में विघटित हो गया था, जैसे– हंगरी, पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया. राष्ट्रीयता भूभाग पर आधारित होती थी और किसी विशेष भूभाग में पैदा हुए लोग उस राष्ट्र के सदस्य होते थे.

    उनका हिन्दुत्व हिन्दू धर्म से बंधा नहीं था. मतलब यह कि कोई भी व्यक्ति जो सिन्धु की धरती पर जन्मा हो वह हिन्दू है और हिन्दुत्व का अंग है. इसका एक गौण पाठ है कि हिन्दू, मुसलमानों से कहीं अधिक हिन्दुत्व का अंग हैं. लेकिन मुसलमान हिन्दुत्व के अंग हो सकते हैं यदि अपनी जन्मभूमि के प्रति वफादार हों. बाद वाले हिन्दू राष्ट्रवादियों ने सावरकर के हिन्दुत्व की धारणा को तो अपना लिया, लेकिन उनके धर्मनिरपेक्ष सिद्धांत को नहीं अपनाया.

    गुलामी के बारे में भ्रामक विचार

    भारत के एक इतिहास के रूप में, हिंदू राष्ट्रवादी कहानी उतनी ही आंशिक और एकांगी है जितनी नेहरूवादी दृष्टिकोण ने पैदा की है. निश्चय ही, ये दोनों उत्तर भारतीय पक्षपात से भरी हुई कहानियाँ हैं. वे दिल्ली और उसके शासकों को ही सम्पूर्ण भारत मानते हैं. मुस्लिम हमलावर संभवतः आठवीं शताब्दी में सिंध और सौराष्ट्र आये और बारहवीं सदी में दिल्ली सल्तनत की स्थापना की. लेकिन वे विंध्य के दक्षिण में प्रवेश कभी नहीं कर पाये.

  • Secularism-630x315दक्षिण भारत में मुस्लिम आप्रवासियों के बारे में उत्तर भारत से बहुत ही अलग इतिहास है. जब औरंगजेब काफी बाद में, सत्रहवीं सदी में दक्षिण की ओर गया, उससे पहले दक्षिण भारत मुस्लिम शासन से “पीड़ित” नहीं था. दक्षिण में हिन्दू रजवाड़े एक समय मुस्लिम शासकों के साथ सहअस्तित्व में थे, लेकिन यह केवल दूसरी सहस्राब्दी के मध्य में ही सम्भव हुआ। “गुलामी के 1,200 साल” का विचार पूरी तरह फर्जी है। असम किसी भी मुस्लिम सत्ता द्वारा कभी भी जीता नहीं गया.लेकिन अंततः “सही मायने में वस्तुगत” इतिहास कभी नहीं लिखा जायेगा. किसी भी राष्ट्र में, कभी नहीं लिखा गया. बहस और पुनर्व्याख्यायें हमेशा चलती रहती हैं. अकादमियों को संरक्षण देकर उनका इस्तेमाल इतिहास की सरकारी लाइन को पुख्ता करने के लिए किया जा सकता है. अगर शोध के लिए धन की आपूर्ति सरकार की तरफ से हो रही है तो निष्पक्ष अनुसंधान की पवित्रता की गारंटी नहीं की जा सकती. हालाँकि भारत में, अनुसंधान के लिए निजी परोपकारी स्रोतों से धन मुहैया कराने की परंपरा नहीं रही है. सरकार ने उच्च शिक्षा के सभी दरवाजों पर सरकार की पहरेदारी है, जिसके लिए कांग्रेस का जड़ीभूत पूर्वाग्रह जिम्मेदार है जो आजादी के बाद के शुरूआती तीस सालों तक बेरोकटोक शासन करती रही. यह पूर्वाग्रह रिस-रिसकर अच्छी तरह से भाजपा में घुस चुका है.चिंता की बात महज हिंदू राष्ट्रवाद का विचार ही नहीं है. चिन्तित करनेवाली बात यह है कि खुद भाजपा सरकार इस खास नजरिये का प्रचारक होगी.(मेघनाद देसाई लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अर्थशास्त्र के मानद प्रोफेसर हैं और मशहूर पुस्तक द रीडिस्कवरी ऑफ़ इण्डिया एण्ड डेवलपमेंट एण्ड नेशनहुड के लेखक हैं. आभार– स्क्रोल डॉट इन. अनुवाद—दिगम्बर)
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टिप्पणियाँ

  • Kamta Prasad  On अप्रैल 3, 2016 at 2:33 अपराह्न

    के बीच एक हजार सालों तक संघर्ष चला (किनके बीच, कुछ शब्द छूटे हैं, मेरे ख्याल से बौद्ध और हिंदू)

  • विकल्प  On अप्रैल 3, 2016 at 3:28 अपराह्न

    धन्यवाद. ठीक कर दिया.

  • Jaya Karki  On अप्रैल 4, 2016 at 2:12 अपराह्न

    aapka bahut bahut dhanyabad.Maine Yeh mahatwopurna lekh padh liya hai.
    Bikalpa liye aabhar bekta karta hu.

    Jaya karki
    kathmandu
    Nepal

    2016-04-03 12:49 GMT+05:45 “विकल्प” :

    > विकल्प posted: ” निम्नलिखित प्रस्थापनाएं हिन्दू राष्ट्रवादी सिद्धांत के
    > केंद्र में हैं- भारत प्रागैतिहासिक काल से ही भारतवर्ष या आर्यावर्त के रूप
    > में एक एकल राष्ट्र रहा है. जब मुस्लिम आक्रमणकारी आठवीं शताब्दी के बाद
    > उत्तर-पश्चिम से आये, तभी से भारत गुल”
    >

  • Manish Kumar Singh  On अप्रैल 4, 2016 at 3:03 अपराह्न

    quite informative post. thanks

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