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विकास दल – रोस कोग्गिंस

रोस कोग्गिंस की यह मशहूर कविता गरीबी और बदहाली को पेशा बनाकर मौज उड़ाने वाली स्वयंसेवी संस्थाओं पर करारा व्यंग्य है. विकास के नाम पर चलनेवाला यह धन्धा तेज़ी से फ़ैल रहा है. इसके लिए महँगे पाठ्यक्रम हैं और कमाई का अच्छा जरिया है.

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क्षमा करो यारो मुझको है ज़ल्दी जेट पकड़ना
शामिल होने विकास दल में फ़ौरन होगा उड़ना;
बोरिया-बिस्तर बाँध लिया और सब तस्वीरें धर ली
यात्री चेक और दवा-दारू सबकुछ झोले में भर ली.

पराक्रमी और वैभवशाली है विकास दल अपना
गहरे हैं विचार अपने और विश्वव्यापी है सपना;
वैसे तो हम धनिक वर्ग के साथ चला करते हैं
किन्तु विचार हमेशा अपने जनगण से मिलते हैं.

भिन्न-भिन्न देशों में शेरेटन होटल में टिकते हैं.
मल्टीनेशनल निगमों की भर्त्सना किया करते हैं;
नरम-गरम बिस्तर पर हो यदि सामाजिक विश्राम
फिर विरोध अन्याय-ज़ुल्म का कहाँ कठिन है काम.

छप्पनभोग सामने हो तो बने विमर्श कुपोषण
और भुखमरी की चर्चा हो कॉफी के टेबुल पर;
अफ्रीकी सूखा, एशियाई बाढ़ सभी पर बोलें
लेकिन जब हो पेट भरा, तब ही हम सब मुँह खोलें.

ऐसे कपटी सलाहकार हम संग लिए आते हैं
जिसकी राय समस्याओं को हरदम उलझाते हैं-
लगातार हम इसी तरह दावत करते रहते हैं
अगली बैठक आवश्यक है यह चर्चा करते हैं.

विकास दल भरता रहता है नये शब्द-भण्डार
आंग्ल वर्णमाला में इसका व्यापक है विस्तार;
“एपीजेनेटिक” जैसे भारी-भरकम शब्द उचारें
“माइक्रो”, “मैक्रो”, “लोगारिथमेटिक” से भाषा को तारें.

गूढ़-गहन बनकर हमको आनन्द बहुत आता है
बौद्धिक वातावरण इसी ढब से तो बन पाता है!
और भले ही प्रतिष्ठानों पर आँच नहीं आती है,
हम लोगों की शब्द-राशि बेहतर होती जाती है.

जब विमर्श गहरा हो जाये तुमको झपकी आये
झेप मिटाने का आओ तुमको तरकीब बताएँ;
यह दिखलाने की खातिर कि तुम भी हो विद्वान्
तड़ से पूछो “क्या सच में है यही विकास श्रीमान?”

या कह दो, “व्यवहारिक पहलू ठीक-ठाक दिखता है-
किन्तु कहीं से भी इसका सिद्धान्त नहीं जमता है!
पल्ले नहीं पड़ेगी कुछ लोगों को बात तुम्हारी,
बहुतों की नज़रों में होगी गहरी और गुणकारी.

इस विकास दल के मुख्यालय के  हैं ठाट निराले,
नक्काशी, प्राचीन वास्तु और बाटिक परदे डाले.
आँखों के आगे लटकी तस्वीर दिलाये ध्यान
महान और गरीब संग रहता सहज सरल मेज़बान. 

हद है ऐसी कविताई की— पथ पर करो प्रयाण!
मानव-पीड़ा जितनी उतना व्यापक है अभियान!
ईश्वर से तुम करो प्रार्थना वचन करे वह पूरा-
निर्धन जन हों संग सर्वदा लगे विकास का नारा.

(अनुवाद- दिगम्बर)

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गुंठर ग्रास की कविता : यूरोप के लिए शर्मनाक 

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(फासीवाद-विरोधी, नोबेल पुरस्कार प्राप्त, 87 वर्षीय जर्मन साहित्यकार गुंठर ग्रास का 13 अप्रैल को देहांत हो गया. तीन साल पहले उन्होंने ज्वलंत सामयिक मुद्दों पर दो कवितायेँ लिखी थीं जो अपनी ताप-तेवर और प्रतिरोधी स्वर के चलते काफी विवादास्पद हुईं. एक कविता इजराइल के युद्धोन्माद पर और दूसरी नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के चलते यूनान की तबाही पर. यह उसी दूसरी कविता का अंग्रेजी से किया गया अनुवाद है. अनुवाद बहुत ही अनगढ़ है, फिर भी इसका कथ्य समसामयिक है, इसी लिए जैसा भी बन पड़ा, आपके सामने प्रस्तुत है. आज भी दुनिया भर में नवउदारवादी लूट-खसोट जारी है…. यह कहानी सिर्फ यूनान की नहीं है.)

 

उथल-पुथल के करीब, क्योंकि बाज़ार न्यायसंगत नहीं, तुम उस देश से बहुत दूर हो गये जो तुम्हारा पालना था.

जो किसी की आत्मा से खोजा और पाया गया था, वही आज बेकार माना ज़ा रहा है कूड़ा-कबाड़ की तरह.

 

वह देश जिसके बारे में तुम कहते थे कि तुम उसके आभारी हो, पीड़ित है, जैसे किसी कर्जदार को कटहरी में नंगा लिटा कर कील ठोकी ज़ाय.

गरीबी से तबाह देश जिसका संचित धन तुम्हारे लूट के अजायब-घरों की शोभा बढ़ा रहा है.

 

जिन लोगों ने (दूसरे विश्वयुद्ध ज़र्मन नाजी आक्रमणकारी सैनिक) देश पर प्रहार किया, उन्हें द्वीप मिले उपहार में, बन्दूक की नोक पर पहन ली पोशाक और भर ली अपने थैलों में किताबें (प्राचीन यूनानी काव्य से अनुप्राणित ज़र्मन कवि) होल्डरलिन की.

 

तुमसे सहा नहीं गया वह देश जिसके कर्नलों को कभी सहा था तुमने गठबंधन का सहयोगी मानकर.

वह देश जिसने अपने अधिकार खो दिये, जिसका बेल्ट कसा गया और दुबारा कसा गया उन गुस्ताख ताकतवरों द्वारा.

 

एंटीगोन तुम्हें चुनौती दे रही है काले कपड़े पहनकर, और देशभर में लोग जिनके तुम अतिथि रहे, पहने हैं मातमी लिबास.

हालाँकि देश से बाहर, क्रोएसस के अनुयायियों ने बटोर ली चमकते सोने की ढेरी और जमा कर दी तुम्हारी तिजोरियों में.

 

और अंत में शराब, पियो! यूरोपीय अधिकारियों की जयजयकार करनेवालो चिल्लाओ.

हालाँकि, सुकरात तुमको लौटा रहा है हेमलोक विष से लबालब प्याला.

 

लानत है तुम पर एक सुर में गानेवालो, कि गिरोह्बंदी ही तुम्हारी फितरत है, उन खुदाओं की लानत तुम पर जिनके ओलिम्पस पर्वत को तुम चुरा रहे हो.

विवेकहीन बर्बादी के शिकार होगे तुम, उस देश के बगैर जिसके विवेक ने तुम्हारी खोज की थी, यूरोप.
(प्रस्तुति— दिगम्बर)

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