पर्यावरण विनाश पूँजीवादी व्यवस्था का परिणाम है

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कॉप20 शिखर सम्मलेन में इवो मोरालेस के भाषण का मुख्य अंश

जलवायु परिवर्तन हमारे समय की गम्भीर वैश्विक चुनौतियों में से एक है. और हम देख रहे हैं कि विकासशील देश निरंतर जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों तथा चरम प्राकृतिक आपदाओं की बारम्बारता और तीव्रता को झेल रहे हैं, हालाँकि वे ऐतिहासिक रूप से ऐसे देश हैं जो जलवायु परिवर्तन के लिए बहुत ही कम जिम्मेदार रहे हैं.

जलवायु परिवर्तन न केवल विकासशील देशों के विकास की सम्भावना और उनके टिकाऊ विकास के लिए खतरा उत्पन्न करता है, बल्कि यह माँ धरती के देशों, समाजों और पारिस्थितिकी के अस्तिव और उनकी उत्तरजीविता के लिए ही खतरा है.

हम घोषित करते हैं कि जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र रूपरेखा सम्मलेन, जलवायु परिवर्तन के प्रति वैश्विक अनुक्रिया के विषय में वार्ता का एक अनिवार्य अन्तरराष्ट्रीय और अन्तरसरकारी मन्च है. इस अनुक्रिया को  सम्मलेन के सिद्धांतों, प्रावधानों और अंतिम लक्ष्य का पूरी तरह सम्मान करना जरुरी होगा, खास कर बराबर, निष्पक्ष और एक समान, लेकिन विभेदीकृत जिम्मेदारियों के सिद्धांत का….

और हम रेखांकित करते हैं की अनुकूलन, वित्तपोषण और तकनीक के बारे में नया संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन प्रावधानों की रचना की जाय, जैसा कि जलवायु परिवर्तन के प्रति एक समग्र दृष्टिकोण के साथ जी77+चीन की ओर से प्रस्तावित है, जिसमें ऐसा शमन और अनुकूलन शामिल है, जो कानून और जनता के विकास के साथ मेल खाता हो….

बहनो और भाइयो, अब मैं ज़लवायु परिवर्तन से सम्बंधित नैतिक और राजनीतिक चिंताओं को लेकर बोलीविया के बहुलतावादी राष्ट्र की सरकार के गहन दृष्टिकोण और अवस्थिति का इज़हार करते हुए आपसे धैर्य और सहनशीलता की माँग करता हूँ…. हम जीवन और माँ धरती की हिफाज़त पर आधारित जलवायु सहमति हासिल कर सकते हैं, न कि बाजार, मुनाफा और पूँजीवाद पर आधारित.

पेरू के भूक्षेत्र में आज जो महान सभ्यता है, महान देशज सभ्यता, ज्ञान से भरपूर और जिसने हमारे लिए महान विरासत सौंपी है, कई वर्षों पहले उसका विस्तार हमारे समूचे महाद्वीप में था. आज, जबकि लीमा में कॉप20 का अयोजन हो रहा है, मैं यह माँग करता हूँ कि हम अपने निर्णय की दिशा अब्या याला की हमारी देशज जनता के उसी ज्ञान के अनुरूप तय करें….

हम उन्हीं लोगों के दर्शन और मूल्यों का उपयोग करते हुए जलवायु सहमति कायम करें, उपनिवेशवाद विरोधी दृष्टिकोण पर आधारित एक नयी जलवायु सहमति. हम दुनिया भर की देशज जनता मिलें और इस मुद्दे पर तबतक चर्चा करें, ज़बतक हम एक राय न बना लें; हम वर्तालाप और विमर्श करने में कई दिन और कई रात लगा सकते हैं, लेकिन हमारा लक्ष्य है कि हम सभी लोगों के बीच सहमति बन जाए.

हम जोड़तोड़ नहीं करते, हम धोखाधड़ी नहीं करते और हम मुद्दों को उलझाते नहीं. सहमति पर पहुँचने के दौरान बात करने के लिए और बात सुनने के लिए हम एक दूसरे को भरपूर समय देते हैं. यहाँ हर चीज़ खुल्लमखुल्ला है.

और हमारे देशज पुरखों ने हमें सिखाया है कि एक न्यायपूर्ण समाज तीन सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए— “अमा सुआ,” “अमा लुल्ला” और “अमा कुएल्ला” — यानी चोरी मत करो, झूठ मत बोलो और काहिल मत बनो.

मैं कहता हूँ कि अपने पुरखों की उन्ही नीतियों और मूल्यों का इस्तेमाल करके हम एक नयी जलवायु सहमति विकसित करें, जिसकी शुरुआत “अमा सुआ” से हो— हम डकैत नहीं हैं; हमें दूसरों की चीजें नहीं चुरानी चाहिए.

हाल ही में जलवायु परिवर्तन पर अन्तरसरकारी संयुक्तराष्ट्र पैनल ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में यह निचोड़ दिया है कि अगर हम तापक्रम में दो डिग्री सेंटीग्रेड की बढ़ोतरी नहीं चाहते तो हम 2050 तक वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन एक हज़ार गीगाटन से अधिक नहीं कर सकते.

और अगर हम चाहते हैं कि वातावरण का तापक्रम डेढ़ डिग्री सेंटीग्रेड से अधिक न बढ़े तो कार्बनडाई ऑक्साइड के उत्सर्ज़न की मात्रा लगभग 630 गिगाटन से कम होना चाहिए.

जो वायुमण्डलीय आकाश हमारे ग्रह में स्थित है, उसमें निष्पक्ष और सामान रूप से, किन्तु अलग-अलग जिम्मेदारियों के सिद्धांतों पर आधारित, सब का बराबर हिस्सा होना ज़रुरी है,

लेकिन कुछ लालची देश हैं जो चाहते हैं कि वायुमण्डलीय आकाश में जो कुछ भी है, उसका वे अकेले ही उपभोग करें. वे देश औपनिवेशिक काल से ही हमारे साथ चोरी-डकैती कर रहे हैं और आज भी इसे जारी रखना चाहते हैं. वे हमारा भविष्य, हमारे बच्चों का भविष्य और हमारी आनेवाली पीढ़ियों का भविष्य चुरा रहे हैं और वे हमारी इस सम्भावना पर भी डाका डाल रहे हैं कि हम टिकाऊ तरीके से विकास कर सकें.

और अगर विकासशील देश अपनी जनता को अधिक सम्मानजनक जिंदगी मुहय्या करने की जिम्मेदारी के चलते ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करते हैं तो वे हमारी तरफ ऊँगली उठाते हैं. हाँ, वे उन देशों पर प्रतिबन्ध लगाना और साजा देना चाहते हैं जो अपनी जानता को खाना खिलाने के लिए इस में से बहुत थोड़ा सा हिस्सा लेते, लेकिन वे खुद को सजा नहीं देते जो धनी होने और अपनी अय्यासी के लिए भारी मात्रा में चोरी करते हैं.

ऐसे देशों का एक बड़ा गिरोह है जिसने में वातावरण के साथ ऐतिहासिक रूप से दुराचार किया और जो मान धरती के जलवायु का संहार करने पर आमादा हैं.

लेकिन पूरी ईमानदारी के साथ हमें यह भी कहना है कि ऐसे भी देश हैं जो उसी तरह का व्यावसायिक और उपभोक्तावादी रास्ता अपना रहे हैं. वे भी हिंसक और लालची पूँजीवाद पर आधारित उपभोग और उत्पादन का वही ढाँचा खड़ा कर रहे हैं, धनवान बनने की लालसा में चंद लोगों के हाथों में सम्पत्ति संचित और केंद्रित कर रहे हैं, जिस लालसा के चलते गरीबी और वंचना लगातार उत्पन्न होती रहती है….

बहनो और भाइयो, हम ऐसा कोई जलवायु समझौता स्वीकार नहीं कर सकते जो पूँजी को लाभ पहुँचाने, मुट्ठी भर लोगों को खुशहाल बनाने और लुटेरी उपभोक्तावादी वृद्धि के लिए धरती माता और मानवता को मौत के मुँह में धकेलता हो. हम यहाँ जीवन के हक में  जलवायु समझौता करने आये हैं, व्यापारियों और पूँजीवादी व्यवसायवाद के लिए नहीं.

दूसरे, “हम झूठे लोग नहीं हैं” अमा लुल्ला, यानी झूठ मत बोलो. हम एक नये जलवायु समझौते के लिए ऐसी वार्ता जारी नहीं रख सकते जिसमें एक देश दूसरे देश से झूठ बोलते हैं, जिसमें वे कहते हैं कि वे जलवायु परिवर्तन के लिए कुछ करने जा रहे हैं, लेकिन वास्तव में कुछ भी करना नहीं चाहते, जिसमें वे कहते कुछ और हैं, लेकिन वास्तव में वे कुछ और ही करने की सोच रहे होते हैं अथवा जिसमें वे नहीं बताते कि वे क्या सोच रहे हैं और क्या कर रहे हैं.

जो समझौता धरती माता की पर्यावरणीय अखण्डता की, हमारे अनोखे मानव समुदाय की अखण्डता कि गारन्टी नहीं करता, वह नैतिक नहीं है. जो समझौता केवल पूँजीपतियों के बारे में सोचता है और जीवन को प्रोत्साहित नहीं करता, वह झूठ बोलता है. हम जीवन की ज़गह पूँजी के हित स्वार्थों की पूर्ति करनेवाले शक्तिशाली लोगों को एक ऐसा नया जलवायु समझौता नहीं थोपने देंगे, जो मानवता और धरती माता को मौत की ओर धकेलता हो.

तीसरा सिद्धांत, “हम लोग काहिल नहीं हैं,” अमा क्वेल्ला, यानी काहिल मत बनो. विकसित देश कार्बन उत्सर्जन में कमी का अपना लक्ष्य बढ़ाना नहीं चाहते. साथ ही  रूपरेखा सम्मेलन के अधीन निर्धारित समन्वय, आर्थिक और तकनीकी प्रावधान तथा क्षमता बढाने के अपने लक्ष्यों को तो वे इससे भी कम लागू करना चाहते हैं.

इससे भी बदतर, कुछ देश ऐसे हैं जो एक नये जलवायु समझौते को बढ़ावा दे रहे हैं, जिसमें सारी कोशिश इसके लिए है कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को स्वैच्छिक बना दिया जाय, जो उनके लिए बहुत ही सुविधाजनक है, यानी हर देश अपनी ओर से वचन दे, विकसित देश अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी को नकार दें और अगले तीस वर्षों में तीन या चार डिग्री सेल्सियस से भी अधिक तापमान बढाकर मानवता के लिए खतरा पैदा करें.

अगर विकसित देशों ने उत्सर्जन घटाने का अपना वचन निभाया होता और सम्मेलन में उनसे जिस कार्रवाई की अपेक्षा की गयी थी, उसे पूरा किया होता, तो आप यकीन करें कि इस मुकाम पर हम जलवायु परिवर्तन के बारे में सर्वनाशी पूर्वानुमानों की चर्चा नहीं सुन रहे होते. लेकिन ऐसे भी देश हैं, जिनके देश में उत्सर्जन में कमी लाना उनके आर्थिक विकास को प्रभावित करेगा तथा वे विकसित देशों का समर्थन करने और जलवायु परिवर्तन से निबटने को इच्छुक नहीं हैं.

ऐसे भी देश हैं जो सम्मेलन में तय की गयी अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करने के बजाय इस बात को सुनिश्चित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाते हैं कि दूसरे लोग जो कर सकते हैं करें या भविष्य में उनको जो करना होगा सो करेंगे. और इसीलिए हम उनसे कहते हैं कि वे मूलनिवासी देशों की राह पर चलें– चोरी मत करो, झूठ मत बोलो और काहिल मत बनो.

हम वायुमंडलीय अंतरिक्ष और विकास का अधिकार जो दूसरे देशों से, खास कर गरीब देशों से मेल खाती है, उसे चुराते नहीं हैं. हम झूठ नहीं बोलते और किसी को ठगते नहीं; हम जिस समझौते से सहमत होते हैं, उसकी शर्तों का पालन करते हैं. हम काहिल नहीं हैं और ऐसे महत्त्वाकांक्षी वादों के साथ समझौता करते हैं जो धरती माता की अखण्डता सुनिश्चिता करने के लिए जरूरी हो तथा जो उत्सर्जन में कटौती, अनुकूलन, वित्तपोषण, तकनोलोजी और पूँजी के विकास को समन्वित करता हो.

कॉप20 शिखर सम्मलेन में शामिल बहनो और भाइयो, कभी-कभी हम सम्मेलन के कक्ष में केवल ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों पर चर्चा करते हैं, इसके उद्भव पर नहीं. हमने तीस वर्षों तक ढकोसला और बेकार की वार्ताएँ की, जिनका कोई नतीजा नहीं निकला…..

आज हम खुद को धरती माता के विनाश के कगार पर पा रहे हैं, मानव जाती के गायब होने का सामना कर रहे हैं. उत्तरी गोलार्ध के विकसित देशों ने, जो प्रकृति के विनाश के लिए जिम्मेदार हैं, अपनी मनोवांछित वचनबद्धता को उचित ठहराने के लिए हमें बंजर धरती तक ला दिया. हम विकासशील देशों ने इस एकतरफा और बाँझ वार्तालाप को वैधानिक बनाने का साधन मुहय्या किया.

हमने शक्तिशालियों के लिए पुराने करतूतों को दुहराने का बहाना मुहय्या किया, जिसका निपटारा वार्ता और विचार-विमर्श के ढोंग-पाखण्ड से हुआ. पर्यावरणवाद की इस सारी कवायद के भीतर भारी मात्रा में पाखंड, नस्लवाद और नवउपनिवेशवाद निहित है.

जलवायु परिवर्तन एक बार फिर पूँजीवादी विकास के उस हरामखोर मॉडल से ध्यान हटाने वाला एक सेफ्टी वाल्व हो गया है जो इस मानवता को विनाश की ओर ले जा रहा है…. कम समय गँवा रहे हैं, क्योंकि वार्ता बराबर की ताकतों के बीच नहीं हो रही है; यह एक असफल एकालाप है….

अब आप से यह कहना जरूरी है कि इन तीस वर्षों में कुछ भी नहीं बदला….

अपनी जनता की ओर से, मैं केवल यही कह सकता हूँ कि हम एक बार फिर ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं, क्योंकि अन्तरराष्ट्रिय समझौते के नाम पर जिस पाखण्ड से हमारा सामना हुआ, वे पहले ही कम नहीं थे. हमारी जनता इन छलावों से तंग आ चुकी है, वे लोग तापमान में बढ़ोतरी से, हमारे हिमाच्छादित पर्वतों के पिघलने से, भारी बर्षा से, बेरहम बाढ़ और दिल दहलानेवाले सूखे से तंग आ चुके हैं, जो हर बार हमें और अधिक गरीब बनाते हैं.

हमें जलवायु परिवर्तन के बुनियादी कारणों को समझना होगा. हमें अब और मसविदा रिपोर्ट नहीं चाहिए; हम कहीं अधिक ढाँचागत समाधान चाहते हैं, पूँजीवाद से निजात चाहते हैं, दुनिया की जनता को बचाना चाहते हैं…. गैस या विषैले उत्सर्जन में एक या दो डिग्री कमी लाने से भला क्या होगा, जब अगली पीढ़ी दमघोंटू गर्मी से पककर खत्म हो जायेगी?

मूल समस्या लोभी वित्तीय वास्तुकला पर आधारित सभ्य बनानेवाला कल्पित मॉडल है, जिसमें सम्पति सिर्फ मुट्ठीभर लोगों के हाथों में केंद्रित है और जो मानवता की बहुसंख्या के लिए गरीबी पैदा करता है.

बहनो और भाइयो, मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि अगर हमारी शताब्दी और हमने अपने  ग्रह के लिए मुसीबत खड़ी करनेवाली समस्त वित्तीय, राजनीतिक, जलवायुगत और सामाजिक विकृतियों के गुरुत्व केन्द्र को नहीं बदला, तो सर्वसम्मत समझौते की तलाश एक कपोल कल्पना से ज्यादा कुछ नहीं होगा.

जलवायु परिवर्तन की समस्या का एक दूसरा कारण महाशक्तियों की युद्ध राजनीति और उस पर खर्च होने वाला भारी बजट है. पाँच बड़ी सैनिक शक्तियों द्वारा सेना पर जितना पैसा खर्च किया जाता है उसके आधे में हम अपनी पर्यावरण सम्बंधी आधी समस्याएँ हल कर सकते हैं….

और जलवायु परिवर्तन का तीसरा कारण अतिशय औद्योगीकरण, अन्धाधुन्ध उपभोग और संसाधनों की लूट है जो मानवता की बड़ी बीमारियों को बढ़ा सकते हैं. वित्तीय वास्तुकला और युद्ध की राजनीति को सही ठहरानेवाले आर्थिक मॉडल की नाभि में मुक्त बाज़ार की राजनीति है, यानी परभक्षी पूँजीवादी नीतियाँ जो मुनाफा, अय्यासी और भोगविलास के सिवा किसी चीज़ पर ध्यान नहीं देतीं…. लोगों के साथ वस्तु की तरह व्यवहार किया जाता है और धरती माता को एक माल की तरह.

मानवता और धरती माता के जीवन की रक्षा के लिए प्रस्ताव

आज हम क्या कर रहे हैं? बड़ी विश्व शक्तियों की सरकारें और पूँजीपति जो जलवायु महाविनाश के लिए जिम्मेदार हैं, उन्होंने यह दिखा दिया कि वे सम्पूर्ण प्रकृति और मानवता को जोखिम में डालनेवाली इस संसारव्यापी त्रासदी की रफ़्तार कम करने में असमर्थ हैं. उनकी सत्ता और मुनाफा पर्यावरण की अपूरणीय क्षति पर ही कायम है….

जलवायु परिवर्तन को रोकने का ज़िम्मा उन लोगों के भरोसे नहीं छोड़ा ज़ा सकता जो प्रकृति के विनाश से मुनाफा कमाते हैं. इसीलिए हम जनता के लोगों को जीवन और समाज की निरंतरता कायम रखने के लिए सीधे अपनी ज़िम्मेदारी स्वीकारनी होगी. इसके लिए सरकार पर नियन्त्रण कायम करके, उस शक्ति का प्रयोग सरकार और पूँजीपतियों दोनों पर एक समन दबाव डालने के लिए करना होगा, ताकि खुद को प्राकृतिक विनाश के इस रसातल में गिरने से बचाने के लिए हम सख्त और फौरी कदम उठा सकें.

अपने जीवन और अपनी भावी पीढ़ी के अस्तित्व की हिफाज़त के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि दुनिया की जनता, कठोर परिश्रम करनेवाला समाज जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का हर रोज सामना कर रहा है, वह सरकार, राजनीति और अर्थव्यवस्था का नियन्त्रण अपने हाथ में ले तथा मानवता और धरती की हिफाज़त के लिए इसका इस्तेमाल करे….

हमें पूँजीवादी संचय पर, उपभोक्ता मालों के अन्तहीन संचय पर लगाम लगाना होगा. हमें एक अन्य सभ्यता, अन्य समाज, अन्य मानसिकता, अन्य मूल्य, अन्य संस्कृति की ज़रूरत है जो मानवीय ज़रूरतों को तरजीह देते हों, मुनाफे को नहीं, जो मानव जाति और धरती माता में विश्वास रखते हों, “पैसा पीर” में नहीं….

या तो हम वैश्विक पूँजीवादी समाज को बदलें या यह विश्व जनगण और प्रकृति को ही खत्म कर देगा.

पर्यावरण विश्व की सम्पूर्ण जानता की, आदिम जनता की, वर्तमान जनता की और भविष्य में आनेवाली जनता की साझी विरासत है….

पर्यावरण एक साझा संसाधन है…. और इसी लिए इसका प्रबन्ध हमें एक समुदाय के रूप में करना ज़रूरी है. प्रकृति अपने आप में ही एक समुदाय है, क्योंकि यह सबके लिए लाभदायक है और सबको प्रभावित करता है. हमारी प्राचीन मूलनिवासी जनता यह जानती थी और इसीलिए नह समुदाय के रूप में रहती थी….

बहनो और भाइयो, प्रकृति के साथ सामंजस्य कायम करके जीने का एकमात्र उपाय समुदाय है. समुदाय ही पर्यावरण को, जीवन को और उसी के अनुरूप मानव जाति को  बचानेवाला है. समुदाय जीवन है, पूँजीवादमौत. समुदाय धरती माता के साथ सामंजस्य है और पूँजीवाद धरती माता का विनाश.

आख़िरकार, इस पर विचार करना महत्वपूर्ण है कि कैसे हमें उन लोगों को आँकनेवाली संस्थाएँ कहदी करनी है जो हमारे ग्रह को प्रदूषित करते हैं, जो हमारी धरती माता को घायल करते हैं. मानवता को जलवायु न्याय के लिए एक अन्तरराष्ट्रीय ट्रिब्यून गठित करना है, ताकि न्याय करना सम्भव हो.

बहनो और भाइयो, संक्षेप में यही वाह अनुभव है जो मूलनिवासी जनता ने समुची मानवता की भलाई के लिए हमें प्रदान किया है.

बहुत-बहुत धन्यवाद. (तालियाँ)

(अनुवाद- दिगम्बर)

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