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श्रम कानून में सुधार के घटिया और क्षुद्र प्रस्ताव – कोलिन गोंजालविस

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राजग सरकार ने 5 जून और 17 जून को फैक्टरी अधिनियम और न्यूनतम मजदूरी अधिनियम में संशोधन प्रस्ताव की घोषणा की. इस बात के मद्देनजर कि संशोधन की यह प्रक्रिया 2008 में ही शुरू हो गयी थी और यह कई विेशेषज्ञ कमेटियों से होकर गुजरी, हर किसी को उम्मीद थी कि ये संशोधन सावधानीपूर्वक और सोच-समझकर सुझाए गये होंगे. लेकिन इसके विपरीत, ये संशोधन बहुत ही घटिया किस्म के,मजदूर-विरोधी और जैसे-तैसे तैयार किये हुए हैं. इस बात को ध्यान में रखते हुए क़ि ये संशोधन नरेंद्र मोदी-नीत सरकार की मजदूरों के बारे में पहली घोषणा है, इसमें किसी वैश्विक शक्ति के लिए जरूरी एक ऐसी दृष्टि के न होने पर अफ़सोस ही किया जा सकता है  कि उत्पादकता में बढ़ोतरी बेहतरीन चीजें पैदा करने वाले मजदूरों की सन्तुष्टि से ही आती है.

चूँकि इन दोनों ही कानूनों को पहले भी शायद ही कभी ठीक से लागू किया गया हो, इसलिए कोई भी यही चाहेगा कि ऐसे संशोधन लाने पर जोर होना चाहिये कि इन्हें प्रभावी बनाया जा सके. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में थर्मल पावर स्टेशन मामले में दिये गये फैसले में ऐसे लिखित आँकड़ें मौजूद हैं, जो दिखाते हैं की सैंकड़ों मजदूर लगातार मर रहे हैं तथा 50 प्रतिशत श्रमशक्ति फेफड़ों की बीमारी, बहरापन और अन्य पेशागत बीमारियों पीड़ित है. दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा कॉमनवेल्थ गेम्स मामले दिये गये फैसले में पाया गया कि उसमें मजदूर बिना सुरक्षा उपकरण के काम करते थे,  बिना बिस्तर और पंखे के शेड में सोते थे तथा बिना दरवाजे और बिना पानी वाले पाखाने का इस्तेमाल करते हुए बंधुवा मजदूरों जैसी स्थिति में जिन्दगी गुजार रहे थे. यही है भारत में मजदूरों के जीवन का यथार्थ.

महिलाओं के प्रति अन्याय

फैक्टरी अधिनियम में संशोधन के लिये क्या सुझाव आये हैं? यह सुझाव देने के बजाय कि वैश्वीकृत भारत में अंतरराष्ट्रिय मानदण्ड के अनुसार मजदूरों को रोज 8 घण्टे काम करना चाहिये, उन्होंने सुझाव दिया है कि अनुच्छेद 56 में संसोधन करके दैनिक काम के घण्टे बढ़ा कर 10.5 से 12 घण्टे तक कर दिया जाये,  कि अनुच्छेद 65(2) के अन्तर्गत अनिवार्य अतिरिक्त काम के घण्टे 50 घण्टे प्रति तिमाही से बढाकर 100 घण्टे प्रति तिमाही किया जाये और यह कि अनुच्छेद 66 के अंतर्गत महिलाओं को 7 बजे शाम के बाद काम करने की अनुमति तभी होगी जब फैक्टरी द्वारा विशेष सूचना जारी हो कि वह महिला श्रमिकों की सुरक्षा की गारंटी करने में सक्षम है. इस प्रकार महिलाओं और पुरुषों के लिये काम के घण्टे बराबर करने को कानूनी मान्यता देने के बजाय महिलाओं को दण्डित किया गया है. हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय ने तय किया है कि फैक्टरियों में नुकसानदेह चीजों का भण्डारण करना पूरी तरह कठोर जवाबदेही की माँग करता है और इस जिम्मेदारी को लेकर कोई बहानेबाजी नहीं की जा सकती, जबकि अनुच्छेद 7(B) में इस जावबदेही को ढीला करते हुए  यह कह गया है की नियोक्ता को यह सुनिश्चित करना होगा- “जहाँ तक व्यवहारिक हो सके” – कि वह सामान सुरक्षित है. अनुच्छेद 99 नियोक्ता को बाल मजदूरों की भर्ती करने में समर्थ बनाता है.

18 वर्ष की उम्र तक कोई भी व्यक्ति बाल न्याय कानून के अधीन बच्चा माना गया है. जबकि फैक्टरी एक्ट के अंतर्गत यह आयु सीमा आज भी 14 वर्ष ही है. यही नहीं, ऐसे मामले में सजा माता-पिता को दी जायेगी, नियोक्ता को नहीं.”

न्यूनतम मजदूरी क़ानून 1948 को लगातार स्थापित हो रहे उद्योगों में धीरे-धीरे कर के न्यूनतम मजदूरी लागू करने के लिए किया गया था. हालाँकि इस कानून ने सभी मजदूरों को सुरक्षा न देकर केवल अधिसूचित उद्योगों में लगी श्रमशक्ति के एक हिस्से को ही सुरक्षा मुहैया करायी थी. उदहारण के लिये घरेलू कामगारों को इसके अन्तर्गत नहीं लाया गया. एक वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था में हर किसी को सार्वभौम सुरक्षा की जरूरत होती है. जरूरत थी एक सामान्य संशोधन की, यह बताते हुए की जिन्हें मौजूदा अधिसूचना के दायरे में सुरक्षा प्राप्त नहीं है उन्हें एक शेष अधिसूचना से सुरक्षा दी जायेगी। संशोधन द्वारा ऐसा ही कुछ घुसाया जाता प्रतीत होता है. लेकिन यह पुनर्निर्धारित न्यूनतम मजदूरी सभी अधिसूचित न्यूनतम मजदूरियों में सबसे कम होगी.

ऐसा कुछ भी संकेत नहीं है जो यह दर्शाता हो कि इस कानून के लागू न होने की स्थिति में कोई भारी फेरबदल होने वाला है  या फिर अदालतों में अंतहीन मुक़दमेबाजी, जिसके अन्त में न्यूनतम मजदूरी न देने के लिये नियोक्ता पर नाममात्र का जुर्माना लगा दिया जाता है, इस प्रक्रिया को थोड़ा भी बदला जायेगा। ठेका मजदूर, जो श्रम शक्ति के ७५ प्रतिशत हैं, उनको न्यूनतम मजदूरी से वंचित रखना मानो उनकी नियति बन गयी है. घर पर काम और असंगठित श्रम के दूसरे रूपों को भी प्रभावी ढंग से सुरक्षा देने में श्रम कानून की असफलता भी जारी रहेगी.

सुधार के लिये

सुधार के लिये मजदूर आंदोलन का भी अपना एजेण्डा है. मजदूर माँग करते हैं कि ट्रेड यूनियन संगठन की मान्यता सुनिश्चित करने के लिये एक ‘गुप्त मतदान’ लागू हो. दुर्भाग्य है कि आजादी के इतने दशकों बाद भी, यह सामान्य लोकतान्त्रिक अधिकार अब तक दुर्लभ है. वे यह भी माँग करते हैं कि उनका अदालत जाने के अधिकार को इस आधार पर नहीं रोका जाना चाहिये कि इसके लिए उन्हें ओद्योगिक विवाद कानून की धारा १० के तहत सरकार से इजाजत लेना ज़रुरी है. इसके चलते मुकदमें की कार्रवाई वर्षों तक लटकी रहती है. उनकी यह भी माँग है कि संशोधन करके सर्वोच्च न्यायालय के दो मजदूर विरोधी फैसले – उमादेवी मामला और सेल मामला को पलटा जाये, ताकि अस्थायी कर्मचारी जो लम्बे समय तक सरकारी सेवाओं में रहे हैं, उन्हें नियमितीकरण का हक मिले और जब ठेका मजदूरी की व्यवस्था बोर्ड द्वारा हटा दी गयी है, ठेका मजदूर नियमित हो जायें. सर्वोच्च न्यायालय मजदूरों की इन श्रेणियों को स्थायी रूप से दासता की स्थिति में धकेल चुका है. उनकी माँग है कि बाल श्रम को ख़त्म किया जाये. ये कुछ ऐसे लोकतान्त्रिक सुधार हैं जो लम्बे समय से सरकार द्वारा ध्यान न दिये जाने के कारण लम्बित पड़े हैं.

(कोलिन गोंजालविस सर्वोच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता तथा ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क के संस्थापक हैं. द हिंदू  से साभार)

शब्दों के बचाव में — एदुआर्दो गालेआनो

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कोई व्यक्ति संवाद बनाने की जरूरत महशूस करके और दूसरों से बात करने के लिए लिखता है, उस चीज की भर्त्सना करने के लिए जो कष्ट देती है और उसे साझा करने के लिए जिससे खुशी मिलती है. कोई व्यक्ति अपने एकांत के विरुद्ध और दूसरों के एकांत के विरुद्ध लिखता है. कोई व्यक्ति यह मानकर चलता है कि साहित्य ज्ञान का प्रसार करता है और उनकी भाषा और व्यवहार को प्रभावित करता है जो उसे पढ़ते हैं…. कोई व्यक्ति, वास्तव में, उन लोगों के लिये लिखता है जिनके भाग्य और दुर्भाग्य से वह खुद को जोड़ता है – दुनिया के भूखे, निद्रा-हीन, विद्रोही और अभागे लोग – और उनमें से ज्यादातर निरक्षर हैं.

… तब हममें से वे लोग जो साहित्य के क्षेत्र में काम करना चाहते हैं, ताकि उन बेआवाज लोगों की आवाज़ को सुनने में मदद मिल सके, इस वास्तविकता के सन्दर्भ में अपना काम कैसे कर सकते हैं? क्या हम इस गूंगी-बहरी संस्कृति के मध्य में अपनी बात सुना सकते हैं? लेखकों को जो थोड़ी सी छूट हासिल है, क्या कभी-कभी यह हमारी असफलता का प्रमाण नहीं बन जाती है? हम कितनी दूर तक जा सकते हैं? हम किन लोगों तक अपनी पहुँच बना सकते हैं?

… चेतना जागृत करना, पहचान स्थापित करना – क्या साहित्य इस दौर में इससे बेहतर काम करने का दावा कर सकता है? … इन देशों में?

… लातिन अमरी
का के लेखकों के रूप में हमारा भाग्य इन गंभीर सामाजिक परिवर्तनों की जरुरत से जुड़ गया है. अपनी बात कहना स्वयं को खो देना है: यह स्पष्ट दिखायी देता है कि पूर्णरूप से अपनी बात कहने के प्रयास में, साहित्य को बाधित किया जाता रहेगा … जबतक निरक्षरता और गरीबी बरकरार हैं, और तबतक, जबतक सत्ता पर काबिज लोग अपनी सामूहिक जड़बुद्धि को… जन माध्यमों के जरिये निरंतर थोपते रहेंगे.

… हमारे इन देशो में महान परिवर्तन, गहन ढाँचागत परिवर्तन जरूरी होंगे, अगर हम लेखकों को… सभ्रांत वर्ग से आगे जाना है, अगर हमें स्वयं को अभिव्यक्त करना है … एक बंद समाज में मुक्त साहित्य का अस्तित्व केवल भर्त्सना और उम्मीद के रूप में ही कायम  रह सकता है.

… हम वही हैं जो हम करते हैं, खास तौर पर वह काम जो हम खुद को बदलने के लिये करते है… इस मायने में पहले से ही कायल लोगों के लिये लिखा गया “क्रन्तिकारी” साहित्य उतना ही निरर्थक है जितना कि रुढिवादी साहित्य… आत्मकेंद्रित चिंतन-मनन के लिए समर्पित.

हमारी सार्थकता इस बात पर निर्भर करती है कि हमारे अंदर निर्भीकता और चतुराई तथा स्पष्टता और आग्रह की क्षमता कितनी है. मुझे उम्मीद है कि हम एक ऐसी भाषा का सृजन कर सकते हैं जो परम्परावादी लेखकों की गोधूली का स्वागत करने वाली भाषा से  कहीं अधिक निर्भय और सुन्दर होगी.

… लातिन अमेरिका में एक साहित्य आकार ले रहा है और मजबूती हासिल कर रहा है, एक साहित्य …  जो हमारे मृतकों को दफ़नाने की नहीं, बल्कि उन्हें अमर करने की हिमायत करता है; जो राख के ढेर को कुरेदने से इनकार करता है और आग सुलगाने का प्रयास करता है … शायद यह “सभी चीजों के वास्तविक अर्थ” को बचाए रखने में आने वाली नस्लों की मदद करेगा.

 

एदुआर्दो गालेआनो, 1978

प्यार और युद्ध के दिन और रातें (1983) से
(अनुवाद- दिनेश पोसवाल)

 

 

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