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आलोचकों से मैं क्या चाहता हूँ – लू-शुन

lu shun

दो या तीन साल पहले नियतकालीन पत्रिकाओं में साहित्य के रूप में थोड़ा-सा मौलिक लेखन (अगर हम ऐसा कह सकते हों तो) और अनुवाद को छोड़कर कुछ खास नहीं होता था. इसीलिए पाठकों ने आलोचकों की आवश्यकता को महसूस किया. अब आलोचक प्रकट हुए और दिनों-दिन इनकी संख्या बढ़ती ही जा रही है.

यह देखते हुए कि हमारा साहित्य इतना अपरिपक्व है, कला की लौ को तेज करने के लिए आलोचकों द्वारा इसकी अच्छाइयों का पता लगाना वास्तव में बहुत अच्छा है. वे आधुनिक रचनाओं के सतहीपन को लेकर इस उम्मीद के साथ अफ़सोस जाहिर करते हैं कि हमारे लेखक कही अधिक गहन-गम्भीर रचना करेंगे तथा वे खून और आँसू के जमाव पर खेद प्रकट करते हैं, ताकि ऐसा न हो कि आधुनिक लेखक बहुत ही ढिठाई के साथ विकास कर रहे हों. ऐसा लग सकता है कि वे अतिशयोक्तिपूर्ण अलोचना कर रहे हैं, लेकिन वास्तव में यह दिखाता है कि साहित्य को लेकर उनमें गहरा लगाव है और हमें उनके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए.

लेकिन कुछ दूसरे लोग भी हैं जो साहित्यिक आलोचना की एक या दो “पश्चिमी” किताबों पर ही भरोसा करते हैं और कुछ पुरानी पंडिताऊ रचनाओं का कूड़ा परोसते हैं या चीन की परम्परागत “सच्चाइयों” को अपनाने का आग्रह करते हैं और साहित्य जगत की कटु आलोचना करते हैं. ऐसे लोग एक आलोचक के रूप में अपने प्राधिकार का दुरूपयोग करते हैं. मैं एक अनगढ़ और सरल सा दृश्य प्रस्तुत करने की इजाजत चाहूँगा. अगर किसी रसोइये ने कोई व्यंजन तैयार किया है और कोई व्यक्ति उसमें कमी देखता है, तो निश्चय ही उसे अपनी कड़ाही और दूसरे बर्तन उस आलोचक के सामने रख कर यह नहीं कहना चाहिए कि “लीजिए, इससे बेहतर बना कर दिखाइये.” लेकिन उसे इतनी उम्मीद करने का अधिकार है कि जिस व्यक्ति ने उसके व्यंजन का स्वाद चखा है उसकी भूख मर तो नहीं गयी है या वह शराब के नशे में या बुखार से पीड़ित तो नहीं, जिसके चलते उसकी जीभ मोटी और छालेदार हो गयी हो.

मैं तो आलोचकों से इससे भी कम की माँग करता हूँ. मैं यह उम्मीद नहीं करता कि दूसरों की रचना की चीर-फाड़ करने और उस पर अपना फैसला सुनाने से पहले वे अपनी ही चीर-फाड़ करें और फैसला सुनाएँ, ताकि यह देख सकें कि वे किसी रूप में छिछला, संकीर्ण और गलत तो नहीं है. यह तो बहुत अधिक माँग करना होगा. मैं सिर्फ इतनी आशा करता हूँ कि वे थोड़ी सहज बुद्धि का प्रयोग करेंगे. उन्हें इन दो भिन्न चीजों में अन्तर करना चाहिए, जैसे – नग्नता और अश्लीलता के अध्ययन के बीच, चुम्बन और सहवास के बीच, लाश के पोस्टमार्टम और उसको चिथड़े-चिथड़े करने के बीच, पढ़ने के लिए विदेश जाने और “बर्बरों द्वारा निर्वासित किये जाने” के बीच, बाँस की कोंपल और बाँस के बीच, बिल्ली और चूहे के बीच, बाघ और कॉफी हाउस के बीच … . निश्चय ही एक आलोचक पूरी तरह आजाद है कि उसके तर्क इंग्लैण्ड और अमरीका के कुछ पुराने विशेषज्ञ पर निर्भर हों, लेकिन मुझे उम्मीद है कि वह भूलेगा नहीं कि दुनिया में और भी देश हैं. वह चाहे तो तोल्सतोय का तिरस्कार कर सकता है, लेकिन मुझे उम्मीद है कि ऐसा करने से पहले वह उनका अध्ययन करेगा, उनकी कुछ किताबें पढ़ेगा.

ऐसे भी आलोचक हैं जो अनुवादों की आलोचना करते हुए यह घोषित करते है कि यह श्रम की बर्बादी है और अनुवादकों को लेखन कार्य में हाथ आजमाना चाहिए. शायद यह अनुवादक को यह जताना है कि लेखक का पेशा कितना सम्मानपूर्ण है, लेकिन फिर भी वह अनुवाद कार्य में ही संलग्न है क्योंकि वह इसी में सक्षम है या यही काम उसे सबसे अधिक पसन्द है. इस तरह यदि कोई आलोचक ऐसे-वैसे प्रस्ताव देता है, तो वह अपने अधिकार-क्षेत्र का उल्लंघन करता है– क्योंकि इस तरह के सुझाव आलोचना नहीं, बल्कि सलाह हैं. रसोइये के साथ तुलना वाले प्रसंग की ओर लौटते हैं– कोई भी व्यक्ति जो व्यंजन चखता है उसे यह बताने की जरूरत है कि स्वाद के बारे में उसकी राय क्या है. इसकी जगह यदि वह रसोइये को इस बात के लिए फटकारता है कि वह दर्जी या राज मिस्त्री क्यों नहीं है, तो वह रसोइया चाहे जितना भी बेवकूफ हो, इतना जरूर कहेगा– “महाराज, आप पागल हैं क्या!”

(अनुवाद- दिगम्बर)

लेखन काल- 9 नवंबर, 1922

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नाजिम हिकमत की कविता- आशावाद

nazim 

कविताएँ लिखता हूँ मैं

वे छप नहीं पातीं

लेकिन छपेंगी वे.

मैं इंतजार कर रहा हूँ खुश-खैरियत भरे खत का

शायद वो उसी दिन पहुँचे जिस दिन मेरी मौत हो

लेकिन लाजिम है कि वो आएगा.

दुनिया पर सरकारों और पैसे की नहीं

बल्कि अवाम की हुकूमत होगी

अब से सौ साल बाद ही सही

लेकिन ये होगा ज़रूर.

(अंग्रेजी से अनुवाद- दिगम्बर)

काम के वक्त घड़ी देखते हुए, मैं भाँप रही हूँ इसके अजीबोगरीब नतीजे – करोल तार्लेन

carol

सोचो, कितना हसीन नज़ारा होगा?
शैतानी धूल-गर्द क्या डुबो देगी फाइलों को
और चक्कर काटेगी हमारी मेज़ पर
फोन के इर्दगिर्द मैल की परत छोड़ते हुए?

क्या चालान जीरोक्स में पिघल जायेंगे?

क्या मेरे पास समय होगा
कि फैक्स करूँ चमगादड़ की किडनी
एक अंग-बैंक को और माँग सकूँ फीस
उसे खरीदनेवाले ज़रूरतमंद से?

हाँ! मेरे कंप्यूटर का बैकस्पेस बटन
काम करने से इनकार कर देगा;
मेरे की बोर्ड की हड्डियाँ छितरा जायेंगी,
ज़बकि मेरा सुपरवाइजर और अफसर
मरियल कुत्ते की तरह मेरी ऐंडी में दाँत गड़ाएंगे.

दोपहर के भोजन की जगह मैं चबाऊँगी
तयशुदा कामों की फेहरिश्त,
और भकोसने की बीमारी से ग्रसित
उल्टी कर दूँगी ऑफिस के शौचालय में,
जिसकी नालियों में चूहों के साथ तैरते हैं
सपने, कम्पनियों के विलय के.

ओह, कामक्रीड़ा का चरमसुख!
ओह, आनन्द की बारिश हो रही है
मेरी लालायित त्वचा पर!

मैं एक निजी फोन कर रही हूँ गैब्रिएल को,
मिटा रही हूँ हजारों मशीनों
की स्मरण-सूची,
तोड़ते हुए टखनों से पाजेब,
उतारती हूँ एक इंच ऊँची एड़ी वाली सैण्डिल
अपने ऑफिस की तयशुदा पोशाक
मेरे नंगे पाँव लड़खड़ाते हैं नजाकत से
मेरे सुचना पट पर
जैसे मैं शान से बढ़ रही हूँ ज़न्नत की ओर
और शामिल हो रही हूँ फरिश्तों के
मुक्ति मोर्चे में!

( अनुवाद- दिगम्बर )

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