कारोल तार्लेन की कविता – आग

 

carol tarlen

आग 

-कारोल तार्लेन

(पोशाक फैक्ट्री में काम करने वाले दक्षिण कोरियाई मजदूर जीन तोएर-इल के लिये, जिसने मौजूदा श्रम कानूनों को लागू न किये जाने का विरोध करते हुए 1970 में आत्महत्या कर ली थी.)

उसके कपड़े पेट्रोल से सराबोर

चेहरे से पसीने की तरह टपकता पेट्रोल

पेट्रोल से चमकते उसके बाल

उसने लाइटर जलाई

फ़ैल गईं आग की लपटें

उसकी बाहों और पीठ तक  

रोशनी फ़ैल गई

उसके श्रम की अँधेरी गली में.

हमलोग मशीन नहीं हैं वह चिल्लाया

आग झुलसाने लगा उसका मांस

हमलोग लोहा-लक्कड़ नहीं हैं वह चीखा

हम धूल फाँकते हैं खून थूकते हैं

सिलाई मशीन पर सो जाते हैं निढाल

वे नशे की सुई लगाते हैं हमारी नसों में

हर टाँके पे ज़लती है हमारी खाल

हम खाने के लिए अवकाश की भीख माँगते हैं 

हम गाने के लिए समय की भीख माँगते हैं

हम समय की भीख माँगते हैं कपड़े उतारने के लिए

हम रात को देखने के लिए गिडगिडाते हैं 

हम उगते सूरज को देखने के लिए गिडगिडाते हैं

पेशाब करने जाने के लिए गिडगिडाते हैं हम

खाना खाने के लिए गिडगिडाते हैं

काम पाने के लिए गिडगिडाते हैं

हम आग की लपटें हैं

हम मशीन नहीं हैं 

हम इंज़न नहीं हैं जो डंसता है हमारे सपनों को 

हम खून और मांस के बने हैं 

मैं जल रहा हूँ

मैं जल रहा हूँ कि लड़कियों की पसलियाँ

टीबी से ज़र्ज़र हो गईं हैं

मैं जल रहा हूँ दिन-रात लगातार काम के चलते 

मैं जल रहा हूँ कि कानूनों पर मूत रहे हैं शासक

मैं अपनी माँ और बहन के लिये जल रहा हूँ

जो सोती हैं तार-तार कम्बल ओढ़ कर

नंगे फर्श पर लेट कर

मैं अपनी सभी बहनों के लिये जल रहा हूँ

जो खून उगलती हैं अंजुरी में

मैं जल रहा हूँ अपने भाइयों के लिये 

जिन्हें मजबूर किया गया वियतनाम में मरने के लिये

मैं वह भिक्षुक हूँ जो जला शान्ति के लिये

मैं एक औरत जिसको जला दिया ईसाई पादरियों ने

मैं जोआन जिसे मुक्ति के लिये जलाया गया

मैं एक मजदूरनी जिसे इसलिए जलाया गया कि वह

घेराव कर रही थी तालाबंदी के खिलाफ फैक्टरी गेट पर

मैं एक रसियन यहूदी जिसे जलाया गया बाबी यार के गड्ढे में 

मैं एक बच्चा जिसके ज़लते हाथों को

खिडकी के पल्ले के बीच कुचल दिया गया

मैं उनका मांस, मैं उनके सपने

मैं लपट हूँ

मैं कोई मशीन नहीं

मैं आत्मा हूँ 

मैं रोशनी हूँ

मैं प्यार हूँ 

(कारोल तर्लेन, जन्म- 1943, मृत्यु- 2004. अमरीकी मजदूर यूनियन की नेता, युद्धविरोधी कार्यकर्ता और कवियत्री. यह कविता पहले पेमिकन प्रेस द्वारा 2005 में प्रकाशित हुई थी. अनुवाद- दिगम्बर)

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