व्लादिमीर मायकोवस्की की कविता- तुम

maykovasky
तुम, जो व्याभिचार के कीचड़ में लगातार लोट रहे हो,
गरम गुसलखाने और आरामदायक शौचालय के मालिक!
तुम्हारी मजाल कि अपनी चुन्धियायी आँखों से पढ़ो
अखबार में छपी सेंट जोर्ज पदक दिये जाने जैसी खबर!

तुमको परवाह भी है, उन बेशुमार मामूली लोगों की
जिन्हें चिंता है कि वे कैसे पूरी करते रहे तुम्हारी हवश,
कि शायद अभी-अभी लेफ्टिनेंट पेत्रोव की दोनों टांगें
उड़ गयीं हैं बम के धमाके से?

कल्पना करो कि अगर वह, जिसे बलि देने के लिये लाया गया,
अपने खून से लतपथ टांगे लिये आये और अचानक देख ले,
कि वोदका और सोडा-वाटर गटकते अपने पियक्कड थोबड़े से
गुनगुना रहे हो तुम सेवेरियाती का कामुक गीत!

औरतों की देह, मुर्ग-मुसल्लम और मोटर गाड़ियों के पीछे पागल
तुम्हारे जैसे अय्याश लोगों के लिये, मैं अपनी जान दे दूँ?
इससे लाख दर्जे अच्छा है कि मास्को के भटियारखाने में जाकर
वहाँ रंडियों को शरबत पिलाने के काम में लग जाऊं.

(अनुवाद- दिगम्बर)

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Comments

  • बेहतरीन यथार्थवादी कविता।

  • Himanshu Kumar  On June 27, 2013 at 12:32 pm

    shnadaar

  • धीरेश  On October 19, 2013 at 1:36 am

    शुक्रिया दिगंबर भाई, यह बेहतरीन कविता पढ़वाने के लिए।

  • कामता प्रसाद  On November 13, 2016 at 3:05 pm

    भटियारखाने शब्द समझ में नहीं आया। भड़भूजा तो हो नहीं सकता।

  • Mukesh Tyagi  On November 14, 2016 at 1:55 pm

    शुक्रिया, इस बेहतरीन कविता के लिये।

  • kk16085  On November 14, 2016 at 2:14 pm

    Reblogged this on My Blog.

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