Monthly Archives: April 2013

शर्ट, पैंट, कपड़े की टोपी और फेल्ट हैट के बारे में –नाजिम हिकमत

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अगर कोई है
जो कहता है
मुझे
“साफ कमीज का दुश्मन”
तो देखना चाहिए उसे तस्वीर मेरे महान शिक्षक की,
गुरुओं के गुरु, मार्क्स, गिरवी रखते थे
अपना जैकेट,
और शायद खाते हों चार दिन में एक जून;
फिर भी
उनकी खूबसूरत दाढ़ी
झरने की तरह
गिरती थी लहराती हुई
बेदाग, झक्क सफ़ेद
कलफ की हुई कमीज पर….

और किसी इस्त्री किये पैंट को
आज तक फांसी की सजा हुई?
समझदार लोगों को
यहाँ भी पढ़ना चाहिए अपना इतिहास-
“1848 में जब गोलियाँ उनकी जुल्फें संवारती थी,
पहनते थे वे
असली विलायती ऊन का पैंट
बिलकुल अंग्रेजी फैशनवाला,
माड़ी दे कर इश्तरी किया हुआ
हमारे महापुरुष, एंगेल्स….

व्लादिमीर इलिच उल्यानोव लेनिन जब खड़े हुए
मोर्चे पर किसी आग-बबूला महामानव की तरह
पहने थे कालरदार कमीज
और साथ में टाई भी….”

जहाँ तक मेरी बात है
मैं महज एक सर्वहारा कवि हूँ
-मार्क्सवादी-लेनिनवादी चेतना, तीस किलो हड्डियाँ,
सात लीटर खून,
दो किलो मीटर शिराएँ और धमनियाँ,
मांस, मांसपेशियाँ, त्वचा और नसें,
कपड़े की टोपी मेरे सिर की
यह नहीं बताती
कि उसमें क्या खूबी है
मेरे इकलौते फेल्ट हैट से ज्यादा
और इस तरह गुजरता जा रहा है
एक एक दिन….

लेकिन
जब मैं पहनता हूँ हफ्ते में छ दिन
कपड़े की टोपी
तभी जाके हफ्ते में एक दिन
पहन पाता हूँ
अपनी प्रिया के साथ घूमते वक्त
साफ-सुथरा
अपना एकलौता फेल्ट हैट….

सवाल यह है कि
मेरे पास क्यों नहीं हैं दो फेल्ट हैट?
आपका क्या कहना है उस्ताद?
क्या मैं काहिल हूँ?
नहीं!
दिन में बारह घंटे जिल्दसाजी करना,
अपने पैरों पर खड़े-खड़े तबतक
जबतक मैं लुढक के गिर न जाऊं,
मेहनत का काम है….

क्या मैं बिलकुल भोंदू हूँ?
नहीं!
मसलन,
मैं हो ही नहीं सकता
उतना गया गुजरा
जितना अलाने जी या फलाने जी…

क्या मैं कोई बेवकूफ हूँ?
ठीक है,
पर पूरी तरह नहीं….
थोड़ा लापरवाह हो सकता हूँ….
लेकिन कुल मिला कर
असली वजह यही है कि
मैं एक सर्वहारा हूँ,
भाई,
एक सर्वहारा!
और मेरे पास भी दो फेल्ट हैट होंगे
-दो क्या दो लाख-
लेकिन तभी जब,
सभी सर्वहाराओं की तरह
मेरा भी मालिकाना होगा –कब्ज़ा होगा हम सब का-
बार्सिलोना-हाबिक-मोसान-मैनचेस्टर के कपड़ा मिलों पर
अगर नहींsssss,
तो नहीं!

(अनुवाद – दिगम्बर)

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प्यूएत्रो रिको निवासी के लिए शोक गीत – –पेद्रो पियेत्री

pedro pietri
प्यूएत्रो रिको निवासी के लिए शोकगीत कविता का पहला पाठ 1969 में साम्राज्यवाद विरोधी लातिन अमेरिकी नौजवानों के समूह यंग लॉर्ड्स पार्टी के सर्मथन में आयोजित न्यूयार्क रैली में किया गया था। ब्लैक पैंथर पार्टी की तरह ही यंग लॉर्ड्स भी सामूदायिक कार्यकर्ता थे, जो जायज और सस्ते मकान तथा समूचित स्वास्थ्य सेवा की माँग का समर्थन करते थे और बच्चों के लिए मुफ्त नाश्ता कार्यक्रम चलाते थे। उन्होंने अपने पास परिवेश के जुझारूपन को वियतनाम और दूसरे देशों में अमरीकी साम्राज्यवाद की दुस्साहिसिक कार्रवाइयों को रोकने, तीसरी दुनिया की मंक्ति, गरीब और अफ्रीकी–अमरीकी लोगों का दमन खत्म करने तथा एक समाजवादी समाज के निर्माण के आहवान से जोड़ा। 1970 के दशक के मध्य में अमरीकी सरकार के उकसावे पर यंग लॉर्ड्स को तहस–नहस कर दिया गया, लेकिन पैद्रो पियेत्री एक क्रांतिकारी कार्यकर्ता और कवि के रूप में निरन्तर सक्रिय रहे और उन्हें अपनी इन दोनों तरह की भूमिकाओं में कोई अन्तर नहीं दिखा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने न्यूयारिकन पोएट्स कैफे की स्थापना की। और उसे जारी रखने में सहयोग दिया जो प्रतिरोधी कला और साहित्य का प्रतिष्ठित केन्द्र था।
पेद्रो पियेत्री का जन्म 1944 में प्यूएत्रो रिको के पेन्स नामक स्थान में और लालन–पालन हार्लेम में हुआ था। हाईस्कूल तक पढ़ाई करने के बाद उन्हें अमरीकी सेना में भर्ती कर लिया गया, वियतनाम युद्व में लड़ने भेजा गया और जब वहां से वापस आये तो वे युद्ध और युद्ध को जन्म देने वाली व्यवस्था के प्रबल विरोधी हो गये। “मुझे एहसास हुआ कि असली दुश्मन कौन है। दुश्मन काले पाजामें वाले वियतकांग नहीं, बल्कि अमरीकी भाड़े के सैनिक थे जिन्होंने उनके देश पर हमला किया था।” व्यवस्था के खिलाफ गुस्से में आग बबूला होकर उन्होंने पियोत्रे रिको निवासी के लिए शोकगीत कविता लिखी जो पहली बार 1973 में इसी शीर्षक से मन्थली रिव्यू प्रेस द्वारा प्रकाशित उनकी रचनाओं के संग्रह और दूसरे आठ अलग–अलग काव्य संकलनों में प्रकाशित हुई। तीन मार्च 2004 को 59 वर्ष की आयु में कैंसर से ग्रस्त होने के कारण प्रैद्रो पिएत्री की मृत्यु हो गयी।
प्यूएत्रे रिको निवासी के लिए शोकगीत का प्रभाव, उसकी अंतर्दृष्टि और सन्देश आज भी पूरी दुनिया के कार्यकर्ताओं और स्वप्नदर्शियों के बीच गुंजायमान हो रहा है । जैसा कि न्यूयार्क टाइम्स ने (लगभग 10 साल पहले) लिखा था–“तीन दशक पहले इस कविता ने एक आंदोलन प्रज्वलित किया था।” –मन्थली रिव्यू

उन्होंने मेहनत की
वे हमेशा समय से आये
उन्होंने कभी देर नहीं की
उन्होंने कभी पलट कर जवाब नहीं दिया
जब अपमानित किये गये
उन्होंने मेहनत की
उन्होंने किसी एक दिन छुट्टी नहीं की
तय छुट्टियों के अलावा
वे हड़ताल पर नहीं गये
बिना अनुमति के
उन्होंने मेहनत की
सप्ताह में दस दिन
और केवल पाँच दिन की मजदूरी मिली
उन्होंने मेहनत की
उन्होंने मेहनत की
उन्होंने मेहनत की
और वे मर गये
वे मर गये तबाह होकर
वे मर गये कर्ज के बोझ से
वे मर गये बिना जाने
कि कैसा लगता है प्रवेश द्वार
पहले राष्ट्रीय सिटी बैंक का

जुआन
मिगुएल
मिलाग्रोस
ओल्गा
मैनुएल
सब मर गये कल आज
और दुबारा मरेंगे कल
अपने कर्ज का बोझ
सबसे करीबी रिश्तेदार को सौंपकर
सब मर गये
इस इन्तजार में कि
इजेन का बाग
उनकी खातिर दुबारा खुलेगा
नये प्रबंध तंत्र के आने पर
सब मर गये
यही सपना देखते हुए कि अमरीका
आधी रात को उन्हें जगायेगा
खुशी से चिल्लाते मीरा–मीरा
तुम्हारे नाम लॉटरी निकली है
एक लाख डॉलर
सब मर गये
नफरत करते पंसारी की दुकान से
जिसने बेच दिया छल से सड़ा कबाब
और बुलेट-प्रूफ चावल और सेम
सब मर गये इन्तजार करते
सपना देखते और नफरत करते
मृत प्यूएत्रे रिको निवासी
जिन्होंने कभी नहीं जाना कि वे
प्यूएत्रे रिको से हैं
जिन्होंने कभी कॉफी पीने का अवकाश नहीं लिया
धर्मोंपदेशों का उलंघन करके
कि अन्त करें अपनी टूटी खोपड़ी के मालिक का
और बतियाएँ अपनी लातिन अमरीकी रूह से

जुआन
मिगुएल
मिलाग्रोस
ओल्गा
मैनुएल
भग्न स्नायु गलियों के वासी
जहाँ चूहे जीते हैं करोड़पतियों की तरह
और लोग जीते ही नहीं बिल्कुल
और मर गये और कभी जीवित नहीं थे
जुआन
मरा इंतजार में कि कब निकलेगी उसकी लौटरी
मिगुएल
मरा सहायता राशि चेक के इंतजार में
कि आये और लौटे और फिर आये
मिलाग्रोस
मरी इस इंतजार में
कि उसके दस बच्चे
कब बड़े हों और काम पर लगें
कि वह छुट्टी पाए काम से
ओल्गा
मरी इंतजार करते कि वेतन पाँच डॉलर बढ़ जाए
मेनुअल
मरा इसी इंतजार में कब मरे उसका मेठ
और कब हो उसकी तरक्की

काफी लम्बा सफर है
स्पेनी हरले से
सुदूर टापू का कब्रिस्तान
जहाँ वे दफनाये गये
पहले रेल का सफर
फिर बस का
और दोपहर के भोजन की मनमानी कीमत
और फूल
जिन्हें चुरा लिया जायेगा
दर्शन का समय बीतते ही
बहुत खर्चीला है
बहुत खर्चीला है
लेकिन वे समझते हैं
उनके माता–पिता समझते थे
यह सुदूर अलाभकर यात्रा है
स्पेनी हरलेमसे
सुदूर टापू पर बने कब्रिस्तान तक

जुआन
मिगुएल
मिलाग्रोस
ओल्गा
मैनुएल
सब मर गये कल और आज
और फिर मरेंगे कल
सपना देखते
रानियों का सपना
साफ-सुथरे, सफेद कुमुदनी जैसे
परिवेश का
जहाँ नहीं दिखे
प्यूऐत्रो रिको निवासी
तीस हजार डॉलर का मकान
इमारत में रहने वाला
पहला लातिनी
उस इलाके में बसने का गौरव
जहाँ रहने वाले फिरंगी चाहते हैं
उन्हें पीट–पीट कर मार डालना
गौरव बहुत दूर होने का
इस पवित्र वाक्य से– क्या हालचाल है

ये सपने
ये खोखले सपने
माँ-बाप के छोड़े हुए
छलमय शयन कक्षों में
स्वाभाविक नतीजा हैं
टेलिविजन कार्यक्रमों का
आदर्श गोरे अमरीकी
परिवार के बारे में
काली नौकरानियों वाले
और लातिन अमरीकी दरबान
जिन्हें अच्छी जानकारी है
कि कैसे हर कोई
उन पर हँसे
और उनका साहूकार
और जिनके वे नुमाइंदे हैं वे भी

जुआन
मरा एक नयी मोटर गाड़ी का
सपना देखते
मिगुएल
मरा नए गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम का सपना देखते
मिलाग्रोस
मरी प्यूएत्रो रिको जाने का सपना देखते
ओल्गा
मरी असली गहनों का सपना देखते
मैन्युएल
मरा आयरिश घुड़दौड़ में दाँव लगाने का सपना देखते

वे सब मर गये
जैसे एक नायक मरता है बीच में फँसा
कपड़ा उद्योग के इलाके में
दोपहर के बारह बजे
सामाजिक सुरक्षा कार्ड राख में
यूनियन का बकाया धूल में

वे जानते थे वे पैदा हुए रोने के लिए
अपनी अंत्येष्ठी करने वाले को नौकरी पर रखवाने के लिए
जैसे वे निष्ठा की कसम खाते हैं
उस झण्डे के प्रति जो चाहता है उन्हें तबाह करना
उन्होंने देखे अपने नाम
तबाही की टेलीफोन निर्देशिका में
उन्हें सिखाया गया भूलना
समाचार पत्रों की दूसरी गुस्ताखी को
जो गलत हिज्जे, गलत उच्चारण करते
और कुछ का कुछ समझ लेते हैं उनके नाम
और जश्न मनाते हैं उनकी मौत पर
और मार लेते हैं उनके कफन–दफन का खर्चा
वे मृत पैदा हुए थे
और वे मुर्दा मरे

यही समय है
दुबारा सिस्टर लोपेज से मिलने का
बेहतरीन उपचार करने वाली
पत्तों से भाग्य पढ़ने वाली
स्पेनी हर्लेम में
वह संवाद कायम करेगी
तुम्हारे मृत सम्बंधियों के साथ
वाजिब दक्षिणा लेकर
अच्छे नतीजे की गारंटी है

जाग पत्ते जाग बता दे भाग
मौत नहीं तू गूँगा-बहरा लूला-लंगड़ा
तुम्हें चाहने वाले जानना चाहते हैं
किस नम्बर पर दाव लगायें
अभी बतायें सही बतायें
जाग पत्ते जाग बता दे भाग
मौत नहीं तू गूँगा-बहरा लूला-लंगड़ा
अब जब खत्म हो गयीं तेरी मुसीबतें
और दुनिया का बोझ उतर गया कन्धों से
मदद कर उन्हें जो छूट गये पीछे

जाग पत्ते जाग बता दे भाग
मौत नहीं तू गूँगा-बहरा लूला-लंगड़ा
अगर सही नम्बर छू जायें
सभी मुसीबत दूर भगायें
फिर हम आयेंगे तेरी कब्र पर
हर सरकारी छुट्टी के दिन
तुम्हें चाहने वाले जानना चाहते हैं
किस नम्बर पर दाव लगायें
अभी बतायें सही बतायें
हमें पता है सक्षम है तुम्हारी आत्मा
मौत नहीं तू गूँगा-बहरा लूला-लंगड़ा
जाग पत्ते जाग बता दे भाग

जुआन
मिगुएल
मिलाग्रोस
ओल्गा
मैनुएल
सब मर गये कल और आज
और फिर मरेंगे कल
नफरत करते लड़ते-झगड़ते और चोरी करते
आपस में टूटी खिड़कियों से
धर्म का पालन करते खुले आकाश के नीचे
नया विधान
पुराना विधान
देशी राजस्व के
न्यायाधीश और जूरी और जल्लाद के
संरक्षित और देशी सूदखोर के
सिद्धांतो के मुताबिक
पुराने सामान बेचने वाले कबाड़ी
कैसे हैं आप कहना सीखो
और तुम्हारी किस्मत चमक जायेगी
और वे मर गये
वे मर गये
और मर कर वापस नहीं आयेंगे
बिना रोके लापरवाही
अपनी बातचीत की कला का
टूटी-फूटी अंग्रेजी के पाठ को लेकर
ताकि भाव जमे मिस्टर गोल्डस्टीनों पर
जो बरकरार रखते हैं उनकी नौकरी
बर्तन धोने वाला किरानी कुली हरकारा लड़कों
फैक्ट्री मजदूरों नौकरानियों मालबाबुओं
लदान बाबुओं डाकघर सहायक
सहायक, सहायक, सहायक
से लेकर सहायक के सहायक
बर्तन धोने वाले का सहायक और खुद ब खुद
बनावटी हँसी हँसने वाला द्वारपाल
वो भी अब तक की सबसे कम मजदूरी पर
जिसे बढ़ाने की माँग पर आग बबूला हो जाता है
क्योंकि यह कम्पनी की नीति के खिलाफ है
पदोन्ती देना किसी लातिनो को

जुआन
मर गया मिगुएल से नफरत करते क्योंकि मिगुएल की
पुरानी मोटर गाड़ी अच्छी चालू हालत में थी
उसकी पुरानी मोटर गाड़ी की तुलना में
मिगुएल
मर गया मिलाग्रोस से नफरत करते क्योंकि
मिलाग्रोस के पास था
एक रंगीन टेलीविजन
और उसकी अपनी औकात नहीं थी खरीदनें की
मिलाग्रोस
मर गयी ओल्गा से नफरत करते क्योंकि ओल्गा
उसी काम के लिए पाँच डॉलर ज्यादा बना लेती थी
ओल्गा
मर गयी मेनुएल से नफरत करते
क्योंकि मेनुएल
जुऐ में उससे अधिक बार जीता
जितनी बार वह जीती
मेनुएल मर गया उन सभी से नफरत करते हुए
जुआन
मेगुएल
मिलाग्रोस
और ओल्गा
क्योंकि वे सभी बोलते थे टूटी फूटी अंग्रेजी
उससे कहीं धारा प्रवाह

और अब वे एक साथ हैं
शून्य के मुख्य दालान में
चुप्पी के आदी बने
हवा की सीमाओं से दूर
कीड़ों के प्रभुत्व में कैद
सुदूर टापू पर कब्रिस्तान में
यही है खाँचेदार परलोक
जिसके बारे में प्रोटेस्टेन्ट दान पात्र्
चर्चा करते थे इतने जोर-शोर से अहंकार पूर्वक

यहाँ लेटा है जुआन
यहाँ लेटा है मिगुएल
यहाँ लेटी है मिलाग्रोस
यहाँ लेटी है ओल्गा
यहाँ लेटा है मेनूएल
जो मर गये कल आज और फिर मरेंगे कल
हमेशा तबाह हमेशा कर्ज में
बिना कभी जाने
कि वे सुन्दर लोग हैं
बिना कभी जाने
अपने रूप रंग का भूगोल
प्यूएत्रो रिको एक खूबसूरत जगह है
प्यूएत्रो रिको–निवासी सुन्दर नस्ल हैं
यदि वे केवल
टेलीविजन बन्द कर देते
और अपनी कल्पनाओं में डूबते उतराते
यदि वे केवल
इस्तेमाल करते गोरे वर्चस्व के बाइविल का
टायलेट पेपर की जगह
और अपनी लातिनी आत्मा को बनाते
एक मात्र धर्म अपनी नस्ल का
यदि वे केवल
लौट गये होते सूरज की परिभाषा की ओर
अपनी अनुभूतियों के ग्रीष्मकाल में आये
पहले मानसिक बर्फीले तूफान के बाद
यदि वे केवल
अपनी आँखों को खुला रखते
अपने सहकर्मियों की शव यात्र पर
जो आये थे इस देश में अपनी किस्मत संवारने
और दफनाये गये बिना अन्तःवस्त्रों के

जुआन
मिगुएल
मिलाग्रोस
ओल्गा
मैनुएल
अब किया करेंगे खुद अपने काम
जहाँ सुन्दर लोग गाते
और नाचते और काम करते हैं एक साथ
जहाँ हवा अन्जान है
मौसम के तकलीफदेह हालात से
जहाँ शब्दकोष की जरूरत नहीं होती
अपने लोगों के साथ संवाद बनाने के लिए
यहाँ स्पेनी बोली जाती है हर समय
यहाँ सबसे पहले अपने झण्डे को सलाम करो
यहाँ डायल साबुन के प्रचार नहीं हैं
यहाँ सब लोग सुगंधित हैं
यहाँ टीवी पर दिखने वाले दावतों का कोई भविष्य नहीं है
यहाँ औरत और मर्द अनुरागी हैं अभिलाषा के
और कभी उबते नहीं एक दूसरे से
यहाँ कुछ हुआ का अर्थ है क्या हो रहा है
यहाँ नीग्रो के नाम से बुलाने का मतलब होगा
प्यार कहकर बुलाना ।

(मंथली रिव्यू से आभार सहित. अनुवाद – दिगम्बर)

पता है, आधार क्यों अनिवार्य नहीं है?

-राम कृष्णास्वामी 

आधार/एकल पहचान पत्र (यूआईडी)का विरोध कर रहे आंदोलनकारी पिछले तीन सालों से यह दलील दे रहे हैं कि यह सांप्रदायिक हमले की और ले जा सकता है, गैरकानूनी प्रवासियों की मदद कर सकता है, निजता में दखलंदाजी कर सकता है, असंसदीय है, इसे संसद से स्वीकृति नहीं मिली है, गैरकानूनी है, इत्यादि. फिर भी एकल पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) और संप्रग नेतृत्व द्वारा इन सभी आपत्तियों की अनसुनी की गयी.

साथ ही, आधार अनिवार्य नहीं है और इसीलिए कहा गया कि ये आपत्तियाँ अमान्य हैं. मध्यम और उच्च वर्ग के भारतीय यूआईडी की बहस पर चुप्पी साधे रहे, क्योंकि इससे उनके ऊपर जरा भी प्रभाव नहीं पड़ता. यूआईडी नामांकन केन्द्रों पर लोगों की लंबी कतारों को देखने से इस धारणा की पुष्टि होती है.

नंदन नीलकानी और यूआईडी महानिदेशक आर एस शर्मा ने बार-बार राष्ट्र को कहा कि यूआईडी, जिसे अब आधार कहा जाता है, बाध्यकारी नहीं है. फिर भी, वे कहते हैं कि एक समय बाद यह सर्वव्यापी भी हो सकता है, जब सेवा देने वाली संस्थाएं सेवा लेने के लिए इसे अनिवार्य बनाने पर जोर डालें. नंदन नीलकानी के ही शब्दों में- “हाँ, यह स्वैच्छिक है. लेकिन सेवा देनेवाले इसे बाध्यकारी बना सकते हैं. आने वाले समय में, मैं इसे अनिवार्य नहीं कहूँगा. इसकी जगह मैं कहूँगा कि यह सर्वव्यापी हो जायेगा.”

जबसे भारत सरकार ने गरीब और हाशिए पर धकेल दिये गये लोगों के लिए एकल पहचान संख्या के विचार से खेलना शुरू किया, तभी से राष्ट्र को यही बताया जाता रहा कि यह बाध्यकारी नहीं है.
कभी इस पर आश्चर्य हुआ कि क्यों?

एक सवाल आन्दोलनकारियों ने कभी नहीं पूछा कि “आधार अनिवार्य क्यों नहीं है?”

इसका कारण बहुत साफ़ है और लगातार हम सब की आँखों में घूरता रहा है, फिर भी शायद किसी ने यह सवाल  नहीं उठाया. आज क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है, उस पर यह सवाल कुछ और रोशनी डालता है.

सरसरी तौर पर देखने से ही इन दोनों मंसूबों में भारतीय इतिहास के सबसे विद्वान मुर्ख तुगलक की प्रतिध्वनि सुनाई देती है. इस तरह के मंसूबों का मकसद महान राष्ट्र का निर्माण करना नहीं होता, वास्तव में ये कंगालों की पीढ़ी तैयार करने का अचूक तरीका हो सकते हैं. गरीबी तब तक “अच्छी” थी जब तक ग़रीबों में उससे संघर्ष करने और ऊपर उठने की गरिमा कायम थी. जबकि कंगालीकरण उस चेतना और आत्म-गौरव को ही मार देगा जो एक अरब से भी अधिक आबादी वाले एक राष्ट्र के कायम रहने और आगे बढ़ने के लिए बहुत ही जरूरी है.

मानव जाति का इतिहास गवाह है कि जो लोग मालिक की स्थिति में थे, वे हमेशा अपने गुलामों के लिए किसी न किसी तरह का पहचान-चिन्ह चाहते थे. सिर्फ गुलाम और उसके परिवार का नाम लिखना ही पर्याप्त नहीं था. गुलामों को नाव में लादते समय मालिक उनकी बाँहों को दाग कर कोई चिन्ह बना देते थे. रूसी साम्राज्य के ज़माने में कतोर्श्निकी (सार्वजनिक गुलामों) को भयानक तरीके से चिन्हित किया जाता था- उनके ललाट और गाल पर  गुलाम शब्द गोद कर उस पर बारूद रगड़ दिया जाता था. कई देशों में गुलामों का सिर मूड कर सिर्फ एक चुटिया छोड़ दी जाती थी. सिर मूडना पुंसत्व-हरण, यानी मर्दानगी, सत्ता और आजादी छीन जाने का प्रतीक था. वर्चश्व के संबंधों के सबसे चरम रूपों में से एक है गुलामी, जिसमें मालिक के लिए सम्पूर्ण सत्ता और गुलाम के लिए पूरी तरह सत्ताहीनता की सारी हदें पार कर ली जाती हैं.

भारत में, वर्तमान सन्दर्भ में राजसत्ता “मालिक” है जो कहती है कि ग़रीबों को जिन्दा रहने के लिए सिर्फ 32 रुपया ही काफी है, जबकि पूँजीवादी मालिक 500 की थाली का खर्च उठा सकते हैं. भारतीय जनता “गुलाम” है जो गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करती है, जिनको कहा गया है कि जब तक तुम्हारे पास ऊँगली की छाप सहित  एक नंबर नहीं है, तब तक तुमको सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान से तीन रुपये किलो चावल पाने का हक नहीं है. भारत में एक गुलाम सामाजिक रूप से मृत प्राणी है, जिसकी पहचान मालिक द्वारा जारी की गयी एक संख्या से की जा सकती है, न कि उसके पिता, माता या दुनिया के साथ जोड़ने वाली कोई दूसरी सामाजिक कड़ी से.

यह सवाल अक्सर सामाजिक कार्यकर्ताओं से पूछा जाता रहा है कि “आपको निजता के बारे में परेशान होने की क्या जरूरत है, अगर आपके पास छुपाने के लिए कुछ है ही नहीं?” इसी सिद्धांत से यह बात भी तो निकलती है कि “जिन लोगों के पास छुपाने के लिए कुछ हो, वे निश्चय ही कोई ऐसी विशिष्ट पहचान संख्या नहीं चाहते जो उनके जैविक मापकों, जैसे ऊँगली की छाप या पुतलियों के फोटो से जुड़ा हो.”

हाल ही में किये गये स्टिंग ऑपरेशन से पता चला कि कई बैंक भ्रष्ट लोगों को बिना उनकी पहचान खोले, उनकी हराम की काली कमाई सफ़ेद करने की सहूलियत मुहैय्या करते हैं. कमाल है कि बैंकर काला धन सफ़ेद बनाने में भ्रष्ट लोगों की इतनी आसानी से मदद करते है. अब कल्पना कीजिए कि भारत के भ्रष्ट लोग आधार को अनिवार्य बनाये जाने पर क्या प्रतिक्रिया देंगे. कानून का पालन करवाने वाली संस्थाएं छुपाये गये धन को बेनकाब करने में आधार संख्या और उससे सम्बंधित जैविक माप का इस्तेमाल करेंगी और वह भी केवल भारत में ही नहीं, बल्कि स्विस बैंकों और सिंगापुर के बैंकों में भी, क्योंकि आजकल सिंगापुर गैरकानूनी धन छुपाने वालों का नया स्वर्ग बन गया है.

अगर समय के साथ आधार को बाध्यकारी बना दिया गया, तो इससे सम्बंधित जैविक माप का इस्तेमाल सारे भ्रष्ट नौकरशाहों, राजनेताओं और पूँजीपतियों का भंडाफोड करने में हो सकता है. तब उनकी हालत खस्ता हो जायेगी. तय है की सरकार ऐसे दानव को सुलभ बनाना नहीं चाहती. इसीलिए आधार बाध्यकारी नहीं है. इसलिए कार्यकर्ताओं को  विशिष्ट पहचान संख्या प्राधिकरण के अध्यक्ष और संप्रग सरकार को खुली चुनौती देनी चाहिए कि अगर हिम्मत है तो वे आधार को सबके लिए बाध्यकारी बनाएँ और देश को भीतर से खोंखला कर रहे इन कीड़ों को नेस्तनाबूद करने में मदद करें.

नीलकानी महोदय, एक बार आपने पूछा था कि “मैं क्या हूँ? कोई विषाणु?”

आधार को सभी भारतीयों के लिए बाध्यकारी बना कर, चाहे अमीर हो या गरीब, आप साबित करो कि विषाणु नहीं हो, और दिखाओ कि तुम्हारे “कल्पना का भारत” राष्ट्र की सच्ची सेवा का प्रयास है.

जाहिर है कि आप एक ऐसी व्यवस्था मुहय्या नहीं करना चाहते जहाँ सभी लोग बराबर हों, बल्कि कुछ लोगों को  ज्यादा बराबर बनाना चाहते हैं, जिन्हें आधार को नकारने का अधिकार हो. लेकिन पक्के तौर पर जान लीजिए कि जिस दिन आप का प्राधिकरण और भारत सरकार आधार को बाध्यकारी बनती है, उसी दिन यह राष्ट्र, यानी धनाढ्य और शक्तिशाली वर्ग आप लोगों को विशिष्ट पहचान संख्या का असली रंग दिखा देगा.

एक राष्ट्र के रूप में हम सब एकजुट हो कर इस सरकार से सवाल कर सकते हैं—

“आधार बाध्यकारी क्यों नहीं है?”

धनवानों और वंचितों में भेदभाव करके आधार एक नयी तरह की जाति व्यवस्था क्यों बना रही है, जो पहले से ही खंडित देश को और अधिक तोड़ने का काम करेगी?

आधार इसलिए बाध्यकारी नहीं है, ताकि इसका फायदा उठाते हुए नीच कोटि के अपराधी, जैसे हत्यारे, बलात्कारी, गबन करने वाले, टैक्स चोर, आयकर जालसाज़, भ्रष्ट अफसर और नेता, और यहाँ तक कि कोई आतंकवादी भी बेधड़क कानून को ठेंगा दिखाते रहें.
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आधार का विरोध करने वाले लोगो के कुछ मशहूर कथन—

“विशिष्ट पहचान योजना भारतीय नागरिकों की निजता छीन लेगी” – मैथ्यू थॉमस

“निजता ऐसी चीज नहीं जिसे लोग बिना इससे वंचित हुए महसूस कर सकें. इसे खत्म कर दो और आप मनुष्य होने के लिए सबसे जरूरी चीज को नष्ट कर देंगे.” – फिल बूथ, नो टू आई डी

“आधार परियोजना भारतीय संविधान को मुर्दा दस्तावेज में तब्दील कर देगी” – एस जी वोम्बातकेरे
“यूआईडी सांप्रदायिक हमले में सहायक होगा.” – अरुणा राय और निखिल डे, राष्ट्रिय सलाहकार समिति के सदस्य

“आधार बाध्यकारी नहीं है – यह तो बस स्वैच्छिक “सहूलियत” है. इसके प्राधिकरण की टिप्पणी में यह जोर देकर कहा गया है कि “पंजीयन करवाना बाध्यकारी नहीं होगा.” लेकिन एक चाल चली गयी है- “…जिन सहूलियतों और सेवाओं को यूआईडी से जोड़ा जाएगा वे इस संख्या की माँग को सुनिश्चित कर सकते हैं.” यह किसी गाँव के कुँए में जहर घोल कर उस गाँव वालों पानी की बोतल बेचने और यह दावा करने के सामान है कि लोग स्वेच्छा से पानी खरीद रहे हैं. अगला वाक्य भी अमंगलकारी है – “हालाँकि यह सरकार और रजिस्ट्रार को इस बात से रोकेगा नहीं कि वे पंजीयन को अनिवार्य बनायें.” – जिन द्रेज, अर्थशास्त्र के मानद प्रोफ़ेसर, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, राष्ट्रिय सलाहकार समिति के पूर्व सदस्य.

“नीलकानी का रिपोर्ट करने का तौर-तरीका इतिहास में अभूतपूर्व है, वे सीधे प्रधान मंत्री को रिपोर्ट करते हैं, और इस तरह सरकार के भीतर के सभी नियंत्रणों और संतुलनों को दरकिनार करते हैं.” – गृह मंत्री चिदंबरम

“यूआईडी एक कारपोरेट घोटाला है, जो सुचना प्रद्योगिकी क्षेत्र में अरबों डॉलर झोंक रहा है.” – अरुंधती राय

“अगर सरकार इस देश को बेच रही है तो हम सबको कम से कम यह जानना चाहिए कि वह किसको बेच रही है.” – वीरेश मलिक 
    
उँगलियों की छाप का सबसे प्रबल विरोध करने वाला कोई और नहीं, बल्कि खुद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी थे, जिन्होंने कहा था कि “जेनेरल स्मट के नए क़ानून के बारे में …हम पहले ही साफ़ हो लें. अब सभी भारतीयों की उँगलियों के छाप लिए जायेंगे…अपराधियों की तरह. चाहे मर्द हों या औरतें. ईसाई विधि से की गयी शादी के अलावा कोई भी शादी वैध नहीं होगी. इस क़ानून के तहत हमारी पत्नियाँ और माताएँ वेश्या हैं. और यहाँ हर मर्द हरामी है.” 

लेकिन आज के शासकों में से आज कौन है जो महात्मा गांधी को याद करता है, दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने क्या कह था, यह तो बहुत दूर की बात है.  

(काफिला डॉट ऑर्ग से आभार सहित. अनुवाद – दिगम्बर) 

  

उत्तरी कोरिया में युद्ध टालने का कर्तव्य

फिदेल कास्त्रो – फोटो राइटर से साभार

-फिदेल कास्त्रो

आज के दौर में मानवता जिन बड़ी चुनौतियों का सामना कर रही है, मैंने उनकी चर्चा कुछ दिन पहले ही की थी. हमारी धरती पर बौद्धिक जीवन लगभग 2,00,000 वर्ष पहले उत्पन्न हुआ था, हालाँकि नयी खोजों से कुछ और ही बात का पता चला है.

हमें बौद्धिक जीवन और उस सामान्य जीवन के अस्तित्व के बीच भ्रमित नहीं होना चाहिए, जो अपने शुरुआती रूप में हमारे सौर मंडल के अंदर करोड़ों साल पहले से मौजूद था.

दरअसल पृथ्वी पर जीवन के अनगिनत रूप मौजूद हैं. दुनिया के अत्यंत जानेमाने वैज्ञानिकों ने बहुत पहले ही अपनी श्रेष्ठ रचनाओं में इस विचार की कल्पना की थी कि 13.7 अरब वर्ष पहले ब्रह्माण्ड की सृष्टि के समय जो महा विस्फोट हुआ था, उस समय उत्पन्न हुई ध्वनि को पुनरुत्पादित किया जा सकता है.

यह भूमिका काफी विस्तृत होती, लिकिन यहाँ हमारा मकसद कोरयाई प्रायदीप में जिस तरह की परिस्थिति निर्मित हुई है, उसमें एक अविश्वसनीय और असंगत घटना की गंभीरता को व्याख्यायित  करना है, जिस भौगोलिक क्षेत्र में दुनिया की लगभग सात अरब आबादी में से पाँच अरब आबादी रहती है.

यह घटना अब से 50 वर्ष पहले, 1962 में क्यूबा के इर्द-गिर्द उत्पन्न अक्टूबर संकट के बाद नाभिकीय युद्ध की गंभीर चुनौती से मिलती-जुलती है.

1950 में वहाँ (कोरियाई प्रायदीप में) एक युद्ध छेड़ा गया था जिसकी कीमत लाखों लोगों ने अपनी जान देकर चुकायी थी. अमरीका द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी शहरों के निहत्थे लोगों पर दो नाभिकीय बम गिराए जाने के कुछ ही सेकण्ड के अंदर लाखों लोगों की या तो मौत हुई थी या वे विकिरण के शिकार हुए थे जबकि इस घटना के महज पाँच साल बाद ही कोरिया में युद्ध थोपा गया था.

उस युद्ध के दौरान जेनरल डगलस मैकार्थर ने कोरिया जनवादी जन गणराज्य पर भी नाभिकीय हथियारों का इस्तेमाल करना चाहा था. लेकिन हैरी ट्रूमैन ने इसकी इजाजत नहीं दी थी.
इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि चीन ने अपने देश की सरहद से लगे एक देश में अपने दुश्मन की सेना को पैर ज़माने से रोकने के प्रयास में अपने दस लाख बहादुर सैनिकों को गवाँ दिया था. सोवियत सेना ने भी अपनी ओर से हथियार, वायु सैनिक सहयोग, तकनीक और आर्थिक मदद दी थी.

मुझे गर्व है कि मैं एक ऐतिहासिक व्यक्ति, अत्यंत साहसी और क्रन्तिकारी नेता किम इल सुंग से मिला था. अगर वहाँ युद्ध छिड़ गया तो उस महाद्वीप के दोनों ओर की जनता को भीषण बलिदान देना पड़ेगा, जबकि उनमें से किसी को भी इससे कोई लाभ नहीं होगा. कोरिया जनवादी जन गणराज्य हमेशा से क्यूबा का मित्र रहा है तथा क्यूबा भी हमेशा उसके साथ रहा है और आगे भी रहेगा.

अब जबकि उस देश ने वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियाँ हासिल कर ली है, तब हम उसे उन तमाम देशों के प्रति उसके कर्तव्यों की याद दिलाना चाहेंगे, जो उसके महान दोस्त रहे हैं और उसका यह भूलना अनुचित होगा कि इस तरह का युद्ध खास तौर पर इस ग्रह की सत्तर फीसदी आबादी को प्रभावित करेगा.

अगर वहाँ इस पैमाने की लड़ाई फूट पड़ती है, तो दूसरी बार चुनी गयी बराक ओबामा की सरकार ऐसी छबियों के सैलाब में डूब जायेगी जो उनको अमरीका के इतिहास के सबसे मनहूस चरित्र के रूप में प्रस्तुत करेंगे. युद्ध को टालना उनका और अमरीकी जनता का भी कर्तव्य बनता है.

फिदेल कास्त्रो रुज
4 अप्रैल, 2013 

(मूल अंग्रेजी लेख dianuke.org से आभार सहित. अनुवाद- दिगम्बर)

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