गाजा के बारे में ख़ामोशी – महमूद दरवेश

(अगर गद्य कवियों के लिए कसौटी है तो फिलीस्तीनी शायर महमूद दरवेश इस पर पूरी तरह खरे उतरते हैं. गाजा पर इजरायली हमले के समय 2007 में लिखी गयी उनकी  इस रचना का अंग्रेजी अनुवाद सिनान अन्तून ने की थी. हिंदी अनुवाद  उसी पर आधारित है.)

गाजा अपने रिश्तेदारों से बहुत दूर और दुश्मनों के करीब है, क्योंकि जब कभी धमाका करता है गाजा, तो यह एक टापू में तब्दील हो जाता है और कभी यह धमाका करना बंद नहीं करता. इसने दुश्मन के चेहरे को खरोंचा, उसके मंसूबों को ध्वस्त किया और वक्त के साथ उसके इत्मीनान को रोक दिया.
क्योंकि गाजा में वक्त कुछ अलग ही चीज है.
क्योंकि गाजा में गैरतरफ़दार नहीं है वक्त का मिजाज.
यह लोगों को अपने इरादे ठंडा करने पर मजबूर नहीं करता, बल्कि धमाका करने और हकीकत से टकराने की सीख देता है.
वक्त यहाँ बच्चों को बचपन से बुढापे की ओर नहीं ले जाता, बल्कि दुश्मन से पहली झड़प के साथ ही उन्हें इन्सान बना देता है.
गाजा में वक्त आराम नहीं, बल्कि तपती दोपहर की आंधी है. क्योंकि गाजा के उसूल बिलकुल अलग हैं, बिलकुल अलग.
जो दूसरे के कब्जे में हो, उसका वसूल सिर्फ यही होता है कि किस हद तक वह कब्जे का विरोध करता है. सिर्फ यही एक मुकाबला है वहाँ. गाजा इस जालिम और शानदार उसूल को जानने-समझने का आदी हो गया है. वह इसे किताबों से, उतावले स्कूली सेमिनारों से, धुआँधार प्रचार करते भोंपुओं से या गानों से नहीं सीखता. वह महज तजुर्बे और कार्रवाई से सीखता है इसे, जो इस्तहार और दिखावे के लिए नहीं किया जाता.
गाजा का गला नहीं है. इसकी सुराखें हैं जो बोलती हैं पसीने, खून और आग की जुबान. इसीलिए दुश्मन इससे मौत की हद तक नफ़रत करता है और जुर्म की हद तक डरता है. और इसीलिए इसके रिश्तेदार और दोस्त शरमाते हुए इससे प्यार करते हैं जो समय-समय पर जलन और खौफ की वजह बन जाता है, क्योंकि गाजा अपने दुश्मनों और दोस्तों, दोनों के लिए एक ही साथ जालिमाना सबक और चमकदार मिशाल है.
गाजा कोई बेहद खूबसूरत शहर नहीं है.
इसके समुद्री किनारे अरबी शहरों के किनारों से ज्यादा नीले नहीं हैं.
इसके संतरे भूमध्य सागर के पूर्वी छोर के निहायत खूबसूरत संतरों जैसे नहीं हैं.
गाजा सबसे अमीर शहर नहीं है.
यह सबसे खूबसूरत और सबसे बड़ी जगह नहीं है, मगर एक भरे-पूरे वतन की तारीख़ के बराबर है, क्योंकि दुश्मन की निगाह में यह कहीं ज्यादा बदसूरत, कंगाल, दुखी और शातिर है. क्योंकि दुश्मन के मिजाज और सकून को परेशान करने में हम सब में इसे ही सबसे ज्यादा महारत हासिल है. क्योंकि उसके लिए यह एक खौफनाक ख्वाब है. क्योंकि यह बारूदी संतरा है, बिन बचपन के बच्चे, बिन बुढ़ापा के बूढ़े और बगैर ख्वाहिश की औरतें. इन्हीं चीजों के चलते यह हम सब में सबसे खूबसूरत, पाक और अमीर है और सबसे ज्यादा प्यार के काबिल है.
हम गाजा के साथ नाइंसाफी करते हैं जब हम इसकी नज्मों की तलाश करते हैं, इसलिए हमें गाजा की खूबसूरती को बिगाडना नहीं चाहिए. इसमें जो सबसे सुन्दर है वह ये कि ऐसे वक्त यह शायरी से महरूम है जब हमने कोशिश की कि दुश्मन पर शायरी के जरिये जीत हासिल करें, और इस तरह हमने खुद पर भरोसा किया और बहुत खुश थे कि दुश्मन हमें गाने दे रहा है. हमने उसे जीतने दिया, और फिर गाते-गाते जब हमारे होंठ खुश्क हो गये, तब हमने देखा कि दुश्मन ने शहरों, किलों और सड़कों की तामीर पूरी कर ली. हमने गाजा के साथ नाइंसाफी की जब हमने इसे मिथ में तब्दील कर दिया, क्योंकि हम इस बात से नफरत करेंगे जब हम पायेंगे कि यह एक छोटे से गरीब शहर के सिवा कुछ भी नहीं जो कब्ज़े की मुखालफत करता है.
हम नाइंसाफी करते हैं जब इस बात पर ताज्जुब करते हैं- वो क्या था जिसने इसे मिथ में बादल दिया? अगर हममें वकार होता तो हमने सारे शीशे चकनाचूर कर दिये होते और अगर खुद के खिलाफ बगावत करने से इनकार करते तो इस बात पर रोते और लानत भेजते. हम गाज़ा के साथ नाइंसाफी करते हैं जब इसे आसमान पर चढाते हैं, क्योंकि इसका जादुई असर हमें इंतज़ार के आखिरी छोर तक ले जायेगा और गाजा कभी हमारे हाथ नहीं आएगा. गाजा हमें आजाद नहीं करता. गाजा के पास घोड़े, हवाईजहाज और जादू की छड़ी नहीं हैं, राजधानियों में दफ्तर नहीं हैं. गाजा हमारी खूबियों से खुद को आजाद करता है और साथ ही हमारी जुबान को गजाओं से आज़ाद करता है. जब ख्वाबों में हमारी मुलाकात इसके साथ हो तो शायद यह हमें पहचान भी न पाए, क्योंकि गाजा का जन्म आग से हुआ था, जबकि हम लावारिस छोड़ दिये गये मकानों में इंतजार करते और रोते-बिलखते पैदा हुए थे.
ये सच है कि गाजा के अपने खास हालात और इसकी अपनी इंकलाबी रवायतें हैं. लेकिन इसका राज कोई गडबडझाला नहीं- कब्जे के मुखालफत की इसकी लड़ाई आमफहम है और आपस में मजबूती से जुड़ी हुई है और इसे पता है कि उसे क्या चाहिए (यह दुश्मन को अपनी सरहद के बाहर खदेड़ना चाहता है). कब्जे की मुखालफत की लड़ाई और आम अवाम के बीच का रिश्ता वैसा ही है जैसे चमड़े और हड्डी के बीच, न कि उस्ताद और शागिर्द के बीच.  गाजा में मुखालफत की लड़ाई किसी पेशे में या संस्था में नहीं बदली है.
इसे किसी का दुमछल्ला बनना काबूल नहीं और अपनी किस्मत किसी के दस्तखत या मुहर के साथ टांकना भी मंजूर नहीं.
यह इस बात की भी परवाह नहीं करता कि हम इसके नाम, तस्वीर या वाक्पटुता से वाकिफ हैं या नहीं. यह नहीं मानता कि यह मीडिया के लिए कोई मसाला है. यह कैमरे के लिए तैयारी नहीं करता और न ही अपने चेहरे पर मुस्कराहट थोपता है.
इन सब की न तो इसे ख्वाहिश है, न हमलोगों को.
इसीलिए तो सौदागरों की निगाह में गाजा एक खराब कारोबार है और इसीलिए अरबों की निगाह में एक लाजवाब नैतिक खजाना.
गाजा की खूबसूरती यह है कि हमारी आवाज इस तक नहीं पहुँचती. कोई चीज इसे टस से मस नहीं करती; कोई चीज इसकी मुट्ठी को दुश्मन के चेहरे से इधर-उधर नहीं कर पाती. हम चाँद के पूरब की ओर या मंगल की खोज हो जाने पर उसके पश्चिम की ओर फिलीस्तीनी रियासत का ढाँचा खड़ा नहीं करेंगे. गाजा नामंजूरी के लिए हरदम तैयार है….भूख और नामंजूरी, प्यास और नामंजूरी, बेदखली और नामंजूरी, अत्याचार और नामंजूरी, घेराबंदी और नामंजूरी, मौत और नामंजूरी.
हो सकता है कि दुश्मन गाजा पर जीत हासिल कर ले (तूफानी समुन्दर एक छोटी सी टापू पर जीत हासिल कर सकता है… वे इसके सारे दरख्तों को काट कर गिरा सकते हैं).
वे इसकी हड्डियां तोड़ सकते हैं.
वे इसके बच्चों और औरतों के भीतर टैंक घुसा सकते हैं. वे इसे समन्दर, रेत या लहू में डुबो सकते हैं.
लेकिन यह झूठ को नहीं दुहरायेगा और हमलावरों के आगे “हाँ” नहीं कहेगा.
यह लगातार धमाका करता रहेगा.
यह मौत नहीं, न ही यह ख़ुदकुशी है. यह गाजा का अपना खास अंदाज है इस बात के ऐलान का कि उसे जीने का हक है. यह लगातार धमाका करता रहेगा.
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टिप्पणियाँ

  • Ganesh Pandey  On दिसम्बर 20, 2012 at 4:33 पूर्वाह्न

    धन्यवाद, दिगम्बर जी। अच्छा गद्य है। वाकई शानदार! उचित ही निराला ने गद्य को जीवन संग्राम की भाषा कहा है।

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