दुनिया का ‘सबसे गरीब’ राष्ट्रपति : जोसे मुजिका

जोसे मुजिका का खेत में बना मकान, उनकी पत्नी और कुत्ता (फोटो- बीबीसी)
व्लादिमीर हर्नान्डेज

यह एक आम शिकायत है कि राजनीतिज्ञों की जीवनशैली उन लोगों से बिलकुल अलहदा होती है जो उन्हें चुनते हैं. लेकिन उरूग्वे में ऐसा नहीं है. यहाँ के राष्ट्रपति से मिलें– जो खेत में बने एक जर्जर मकान में रहते हैं और अपनी तनख्वाह का बड़ा हिस्सा दान कर देते हैं.

अपने कपड़े वे खुद ही धोकर घर के बाहर सूखाते हैं. पानी उनके अहाते में बने कुएँ से आता है, जहाँ घास-फूस फैली रहती है. सिर्फ दो पुलिस अधिकारी और एक तीन टांग वाला कुत्ता, मनुएला बाहर रखवाली करते हैं.

यह उरूग्वे के राष्ट्रपति, जोसे मुजिका का घर है जिनकी जीवनशैली दुनिया के दूसरे नेताओं से साफ तौर पर बिलकुल अलग है.

राष्ट्रपति मुजिका ने उस आरामदेह निवास को त्याग दिया जो उरूग्वे की सरकार अपने नेताओं को उपलब्ध कराती है और उन्होंने राजधानी के बाहर मोंटेवीडियो में, धूलभरी सड़क पर स्थित, अपनी पत्नी के खेत में बने घर में रहने का विकल्प चुना.

राष्ट्रपति और उनकी पत्नी जमीन पर खुद खेती करते हुए, फूल उगाते हैं.

इस सीधी-सरल जीवनशैली और इस तथ्य ने कि मुजिका अपनी मासिक तनख्वाह का 90 फीसदी, यानी लगभग 12,000 डॉलर, परोपकार के लिये दान कर देते हैं – मुजिका पर दुनिया के सबसे गरीब राष्ट्रपति होने का तमगा लगा दिया है.

बगीचे में एक पुरानी कुर्सी पर अपने प्यारे कुत्ते मनुएला को तकिये की तरह बगल में लिटाकर बैठे, वे कहते हैं, “मैंने अपना ज्यादातर जीवन इसी तरह जिया है.”

“मेरे पास जो कुछ है, उससे मैं अच्छी तरह जी सकता हूँ.”

उनकी तनख्वाह एक औसत उरूग्वेवासी की मासिक आय लगभग 775 डॉलर के बराबर है. 2010 में, उनकी घोषित वार्षिक आय– उरुग्वे में अधिकारियों के लिये इसकी घोषणा करना अनिवार्य है– 1800 डॉलर थी, जो उनकी 1887 मॉडल फ़ोल्क्सवेगन बीटल मोटर गाड़ी की कीमत है.

इस साल उन्होंने इस सम्पत्ति में अपनी पत्नी की आधी सम्पत्ति को भी शामिल कर लिया है, जिसमें जमीन, ट्रेक्टर्स और एक घर शामिल है. इसके कारण उनकी कुल सम्पत्ति बढ़कर 2,15,000 डॉलर हो गयी, जो अभी भी उप-राष्ट्रपति डनिलो एस्टोरी की घोषित सम्पति का सिर्फ दो-तिहाई, और मुजिका के पूर्ववर्ती राष्ट्रपति, तबारे वास्कुएज़ की सम्पत्ति से एक-तिहाई कम है.

2009 में निर्वाचित, मुजिका ने 1960 और 1970 के दशक उरूग्वे के टुपामारोस गुरिल्ला के सदस्य के रूप में बिताये. यह क्यूबा की क्रांति से प्रेरित एक वामपंथी सशस्त्र संगठन था. उन्हें छह बार गोली लगी और उन्होंने १४ साल जेल में बिताये. उनके कारावास का ज्यादातर समय कठोर परिस्थितियों और एकांतवास में गुजरा, जब १९८५ में उरूग्वे में जनतंत्र की बहाली हुयी और उन्हें आजाद कर दिया गया, तबतक.

मुजिका कहते है, जेल में बिताये गये उन वर्षों के दौरान ही उन्हें जीवन के प्रति अपना नजरिया गढ़ने में मदद मिली.

“मुझे ‘सबसे गरीब राष्ट्रपति’ कहा जाता है, परन्तु मैं गरीब महसूस नहीं करता. गरीब लोग वे हैं जो सिर्फ एक महंगी जीवनशैली को बनाये रखने के लिये काम करते हैं, और हमेशा पहले से ज्यादा हासिल करना चाहते हैं,” वह कहते हैं.

उनका मानना है कि “यह आज़ादी का मामला है. अगर आपके पास बहुत ज्यादा सम्पति नहीं है, तब आपको उसे बनाये रखने के लिये एक गुलाम की तरह सारी उम्र काम करने की जरुरत नहीं है और इस तरह आपके पास अपने लिये ज्यादा वक्त होता है.”

“मैं एक पागल और सनकी बूढ़ा आदमी लग सकता हूँ. लेकिन यह एक अपनी मर्जी से चुना गया विकल्प है.”

उरूग्वे के इस नेता ने इस साल जून में सम्पन्न, रियो+२० सम्मेलन में दिये गये अपने व्याख्यान में भी इसी तरह की बात रखी- “हम पूरी दोपहरी टिकाऊ विकास के बारे में बातें करते रहे. आम आदमी को गरीबी से उबारने के बारे में बातें करते रहे.

“लेकिन हम क्या सोच रहे हैं? क्या हम अमीर देशों के विकास और उपभोग के माडल को अपनाना चाहते हैं? अब मैं आपसे पूछता हूँ- इस ग्रह का क्या होगा अगर अमेरिकी महाद्वीप के हर मूलनिवासियों के घर में उसी अनुपात में कारें होंगी जितनी जर्मनी वालों के पास हैं? तब हमारे पास कितनी आक्सीजन शेष बचेगी?

“क्या इस ग्रह के पास इतने पर्याप्त संसाधन है कि सात या आठ अरब लोग उसी स्तर पर उपभोग और फिजूलखर्ची कर सकें, जैसा कि आज हम अमीर समाजों में देखते हैं? यह अत्याधिक-उपभोग का स्तर है जो हमारे ग्रह को हानि पहुँचा रहा है.”

मुजिका दुनिया के ज्यादातर नेताओं में “उपभोग के सहारे विकास हासिल करने के प्रति अंधा जूनून होने,” का इल्जाम लगाते हैं, “मानो इसका उल्टा हो, तो दुनिया का अन्त हो जायेगा.”

मुजिका अपने पूर्ववर्तियों की तरह एक विशाल आधिकारिक निवास में रह सकते थे. लेकिन शाकाहारी मुजिका और दूसरे नेताओं के बीच का अंतर भले ही कितना ज्यादा हो, वह अपने राजनैतिक जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव के मामले में उनसे ज्यादा सुरक्षित नहीं हैं.

इस संबंध में उरूग्वे के एक मतदान सर्वेक्षक इग्नासियो जुआस्नाबर कहते हैं- “क्योंकि जिस तरह वह रहते हैं उसकी वजह से बहुत से लोग राष्ट्रपति मुजिका से सहानुभूति रखते हैं. लेकिन इससे उनकी इस बात के लिए आलोचना रुक नहीं जाती कि उनकी सरकार कैसा काम कर रही है.” उरूग्वे के विपक्षी दल कहते हैं कि देश की हालिया आर्थिक सम्रद्धि के बावजूद स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में सार्वजनिक सेवाओं में बेहतर बदलाव नहीं आया है. शायद यही कारण है कि 2009 में चुनाव के बाद से पहली बार मुजिका की लोकप्रियता 50 फीसदी से भी नीचे गिर गयी है.

इस साल दो विवादित कार्यवाहियों के चलते उन्हें काफी आलोचना का सामना करना पड़ा. उरूग्वे की कांग्रेस ने हाल ही में एक बिल पास किया, जिसमे १२ हफ़्तों तक के भ्रूण का गर्भपात कराना क़ानूनी रूप से वैध बना दिया गया है. अपने पूर्ववर्तियों के विपरीत, मुजिको ने इसे वीटो नहीं किया.

ऐसा करने बजाय, उन्होंने अपनी पत्नी के मकान पर ही रुके रहने का विकल्प चुना.

वह भांग के उपभोग को क़ानूनी वैधता दिलाने की बहस का भी समर्थन कर रहे हैं, एक ऐसा बिल जो राष्ट्र को इसके व्यापार पर एकाधिकार भी दिला देगा.

“भांग का उपभोग सबसे ज्यादा चिंता की बात नहीं है, नशीली दवाओं का व्यापार वास्तविक समस्या है,” वह कहते हैं.

फिर भी, उन्हें अपनी लोकप्रियता की रेटिंग को लेकर ज्यादा चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है – उरूग्वे के कानून के मुताबिक वह 2014 में फिर से चुनाव नहीं लड़ सकते. और चूँकि वे 77 साल के हैं, इसलिए शायद वे उससे पहले ही रिटायर हो जायेंगे.

जब वह रिटायर होंगे, तब वह राष्ट्र से मिलने वाली पेंशन के अधिकारी होंगे– और दूसरे पूर्व राष्ट्रपतियों के विपरीत, उन्हें आय में होने वाली कमी का अभ्यस्त होने में ज्यादा परेशानी नहीं होगी.

टुपामारोस गुरिल्ला

· प्रारम्भ में गरीब गन्ना कामगारों और विद्यार्थियों को मिलाकर इस वामपंथी गुरिल्ला दल का गठन किया गया.

· इंका राजा टुपाक अमारू के नाम पर इसका नामकरण किया गया.

· राजनैति़क अपहरण इनकी मुख्य रणनीति थी– 1971 में ब्रिटेन के राजदूत जिओफ्री जैक्सन को आठ महीने तक कैद में रखा.

· 1973 में राष्ट्रपति जुआन मारिया बोरडाबेरी के तख्तापलट के बाद इसे कुचल दिया गया.

· मुजिका जेल जाने वाले कई विद्रोहियों में से एक थे, उन्होंने ने 14 साल सलाखों के पीछे बिताये – जब तक 1985 में संवैधानिक सरकार की वापसी हुयी.

· उन्होंने टुपामारोस को एक क़ानूनी राजनैतिक पार्टी में रूपांतरित करने में मुख्य भूमिका निभायी, जो फ्रंटे अम्प्लियो (व्यापक मोर्चे) गठबंधन में शामिल हो गया.

(बीबीसी न्यूज से साभार. अनुवाद- दिनेश पोसवाल)

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टिप्पणियाँ

  • सञ्जय झा  On नवम्बर 28, 2012 at 10:34 पूर्वाह्न

    'garib' ke jagah sayad 'sadharan ya fir adarsh' adhik sahi hoga………prerna dayak post ke liye abharsadar

  • शिवम् मिश्रा  On नवम्बर 28, 2012 at 1:30 अपराह्न

    वाह … क्या बात है इनकी … इस परिचय के लिए आभार ! नानक नाम चढ़दी कला, तेरे भाने सरबत दा भला – ब्लॉग बुलेटिन "आज गुरु नानक देव जी का प्रकाश पर्व और कार्तिक पूर्णिमा है , आप सब को मेरी और पूरी ब्लॉग बुलेटिन टीम की ओर से गुरुपर्व की और कार्तिक पूर्णिमा की बहुत बहुत हार्दिक बधाइयाँ और मंगलकामनाएँ !”आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है … सादर आभार !

  • HARSHVARDHAN SRIVASTAV  On नवम्बर 28, 2012 at 3:27 अपराह्न

    बढ़िया प्रस्तुति के लिए आभार।मेरी नयी पोस्ट "10 रुपये के नोट नहीं , अब 10 रुपये के सिक्के" को भी एक बार अवश्य पढ़े ।मेरा ब्लॉग पता है :- harshprachar.blogspot.com

  • Kavita Verma  On नवम्बर 28, 2012 at 7:52 अपराह्न

    kya bat hai bharat ke kisi neta ke liye to ab aisa soch bhi nahi sakte..aise vyaktiyon ka jeevan sach me ek prerna hai.share karne ke liye abhar..

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