"फिदेल मरने वाला है"

-फिदेल कास्त्रो


( प्रस्तुत लेख में फिदेल कास्त्रो ने दुनियाभर के साम्राज्यवादी मीडिया द्वारा फैलाए गये इस झूठ का मखौल उड़ाया है कि “फिदेल मरने वाला है”. इसमें उन्होंने “रिफ्लेक्संस” (विचार प्रवाह) को बंद करने के अपने फैसले का कारण भी बताया है. इस विषय में उन्होंने यह विनम्र आकलन पेश किया कि क्यूबा में उनके लेखों से कहीं ज्यादा तवज्जो देने लायक कई जरूरी मुद्दे हैं. वैश्विक घटनाओं पर हमारे समय के एक अगुआ राजनेता की बेबाक और ईमानदार टिप्पणियों का कोई जोड़ नहीं है.) 

विक्टोरिया दे गिरों मेडिकल साइंसेज इंस्टिट्यूट के स्नातक प्रथम वर्ष कक्षा द्वारा जारी किया गया बस एक सन्देश ही साम्राज्यवादी प्रोपगंडा की सारी हदें पर कर जाने और समाचार एजेंसियों द्वारा इस झूठ के पीछे टूट पड़ने के लिए काफी था. इतना ही नहीं, बल्कि अपने केबल के जरिये वे ऐसी अनापशनाप बातें फ़ैलाने लगे जो किसी मरीज के बारे में किसी ने आजतक नहीं सुनी होगी. 

स्पेन के अख़बार एबीसी ने खबर छापी कि वेनेजुएला के एक डॉक्टर ने किसी अज्ञात जगह से यह खुलासा किया है कि कास्त्रो के दिमाग की दाहिनी धमनी में बहुत ज्यादा थक्का जम गया है. “मेरा मानना है कि अब हम फिर कभी सार्वजनिक जीवन में वापस आते नहीं देख पायेंगे.” इस कथित डॉक्टर ने, अगर वह सचमुच एक डॉक्टर है, तो निस्संदेह उसने अपने देश के लोगों से दगाबाजी की है और कास्त्रो के स्वास्थ्य के बारे में बतया है कि “जल्दी ही उनका स्नायु तंत्र फेल होने वाला है.” 

दुनिया के ढेर सारे लोग इस तरह की अनाप-शनाप खबरें फैलाने वाली सूचना एजेंसियों के झांसे में आ जाते हैं, जिनमें लगभग सभी सुविधासम्पन्न और अमीर लोगों के कब्ज़े में हैं- लेकिन लोग अब इन पर बहुत कम ही यकीन करते हैं. कोई भी व्यक्ति धोखा नहीं खाना चाहता; यहाँ तक की सबसे लाइलाज झूठे से भी लोग सच सुनने की आश लगाए रहते हैं. अप्रैल 1961 में, समाचार एजेंसियों द्वारा फैलाये गए उस समाचार पर सबने विश्वास कर लिया था कि गिरोन या बे आफ पिग्स (इसे कुछ भी कहें) के भाड़े के हमलावर हवाना की तरफ बढ़ रहे हैं, जबकि सच्चाई यह थी कि उनमें कई अपनी नावों में बैठ कर उन यांकी युद्धपोतों तक पहुँचने की नाकामयाब कोशिश कर रहे थे जो उनकी हिफाजत में तैनात थे. 

बार-बार आनेवाले पूंजीवादी संकटों को देखते हुए अब सच्चाई लोगों को समझ में आने लगी है और प्रतिरोध भी दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है. कोई भी झूठ, दमन या नया हथियार इस उत्पादन प्रणाली को ध्वस्त होने से नहीं रोक पायेगा जिसमें असमानता और अन्याय की खाई दिन पर दिन चौड़ी होती जा रही है. 

कुछ दिन पहले, अक्तूबर संकट की पचासवीं सालगिरह के आसपास, समाचार एजेंसियों ने मिसाइल संकट के लिए तीन पक्षों को दोषी ठहराया था- उस समय साम्राज्यवाद के चौधरी रहे केनेडी, ख्रुश्चेव और क्यूबा. क्यूबा को नाभिकीय हथियारों से कुछ भी लेना-देना नहीं था, और न ही हिरोशिमा और नागासाकी में किये गए गैरजरूरी कत्ले-आम से ही, जो उस समय के अमरीकी राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने करायी थी, जिसकी बदौलत दुनिया भर में उनकी नाभिकीय तानाशाही कायम हुई थी. क्यूबा तो अपनी आज़ादी और सामाजिक न्याय के अपने अधिकारों की रक्षा कर रहा था 

यांकियों के हमलावर मनसूबे से अपनी मातृभूमि की अपनी हिफाजत के लिए हमने हथियारों, तेल, खाने-पीने की चीजों और अन्य संसाधनों के रूप में सोवियत सहायता कबूल की थी. इस पूंजीवादी देश ने शुरुआती महीनों से ही हम पर घिनौना और खुनी युद्ध थोप दिया था, जिसमें हजारों क्यूबावासियों को मार डाला गया और अपंग बना दिया गया. 

जब ख्रुश्चेव ने मध्यम दुरी तक मार करने वाली मिसाइल लगाने का प्रस्ताव दिया, ठीक वैसा ही, जैसी अमरीका ने तुर्की में लगा रखी थी, जो क्यूबा और अमरीक के बीच की दुरी की तुलना में सोवियत रूस के ज्यादा करीब था- तब सोवियत संघ के साथ एकता बनाये रखने के लिए क्यूबा वह खतरा उठाने से नहीं हिचका. हमारा व्यवहार नैतिक तौर पर पाक-साफ था. हमने जो कुछ किया उसके लिए किसी से माफ़ी नहीं माँगेंगे. सच्चाई यही है कि आधी सदी गुजर गयी और आज भी सर उठा कर खड़े हैं. 

मैंने “रिफ्लेक्संस” छपवाना बंद कर दिया क्योंकि यकीनन क्यूबा प्रेस के पास जो कागज है उसकी अहमीयत मेरे लेखों से कहीं ज्यादा हमारे देश के दूसरे जरूरी कामों के लिए है. 


बुरी खबर देने वाले कौवों!! मुझे तो अब याद भी नहीं कि सिरदर्द किस चिड़िया का नाम है. वे कितने झूठे हैं यह बताने के लिए मैं बतौर तोहफा उन्हें इस लेख के साथ अपना फोटो भी भेज रहा हूँ.



(मंथली रिव्यू के प्रति आभार सहित. अनुवाद- सतीश)

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