Monthly Archives: October 2012

कवि का दायित्व -पाब्लो नेरुदा

जो शख्स नहीं सुन रहा है समन्दर की आवाज़
आज, शुक्रवार की सुबह, जो शख्स कैद है
घर या दफ्तर, कारखाना या औरत के आगोश में
या सडक या खदान या बेरहम जेल के तहखाने में
आता हूँ मैं उसके करीब, और बिना बोले, बिना देखे,
जाकर खोल देता हूँ काल कोठरी का दरवाजा
और शुरू होता है एक स्पंदन, धुंधली और हठीली,
बादलों की गड़गड़ाहट धीरे-धीरे पकडती है रफ़्तार
मिलती है धरती की धड़कन और समुद्री-झाग से,
समुद्री झंझावात से उफनती नदियाँ,
जगमग तारे अपने प्रभामंडल में,
और टकराती, टूटती, सागर की लहरें लगातार.
इसलिए, जब मुकद्दर यहाँ खींच लायी है मुझे,
तो सुनना होगा मुसलसल सागर का बिलखना
और सहेजना होगा पूरी तरह जागरूक हो कर,
महसूसना होगा खारे पानी का टकराना और टूटना
और हिफाजत से जमा करना होगा एक मुस्तकिल प्याले में
ताकि जहाँ कहीं भी कैद में पड़े हों लोग,
जहाँ कहीं भी भुगत रहे हों पतझड़ की प्रताड़ना,
वहाँ एक आवारा लहर की तरह,
पहुँच सकूँ खिड़कियों से होकर,
और उम्मीद भरी निगाहें मेरी आवाज़ की ओर निहारें,  
यह कहते हुए कि ‘हम सागर तक कैसे पहुंचेंगे?’
और बिना कुछ कहे, मैं फैला दूँ उन तक
लहरों की सितारों जैसी अनुगूँज,
हर हिलोर के साथ फेन और रेत का बिखरना,
पीछे लौटते नामक की सरसराहट,
तट पर समुद्र-पांखियों की सुरमई कूक.
इस तरह पहुँचेंगे मेरे जरिये
टूटे हुए दिल तक आजादी और सागर. 

( अनुवाद – दिगम्बर )
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"फिदेल मरने वाला है"

-फिदेल कास्त्रो


( प्रस्तुत लेख में फिदेल कास्त्रो ने दुनियाभर के साम्राज्यवादी मीडिया द्वारा फैलाए गये इस झूठ का मखौल उड़ाया है कि “फिदेल मरने वाला है”. इसमें उन्होंने “रिफ्लेक्संस” (विचार प्रवाह) को बंद करने के अपने फैसले का कारण भी बताया है. इस विषय में उन्होंने यह विनम्र आकलन पेश किया कि क्यूबा में उनके लेखों से कहीं ज्यादा तवज्जो देने लायक कई जरूरी मुद्दे हैं. वैश्विक घटनाओं पर हमारे समय के एक अगुआ राजनेता की बेबाक और ईमानदार टिप्पणियों का कोई जोड़ नहीं है.) 

विक्टोरिया दे गिरों मेडिकल साइंसेज इंस्टिट्यूट के स्नातक प्रथम वर्ष कक्षा द्वारा जारी किया गया बस एक सन्देश ही साम्राज्यवादी प्रोपगंडा की सारी हदें पर कर जाने और समाचार एजेंसियों द्वारा इस झूठ के पीछे टूट पड़ने के लिए काफी था. इतना ही नहीं, बल्कि अपने केबल के जरिये वे ऐसी अनापशनाप बातें फ़ैलाने लगे जो किसी मरीज के बारे में किसी ने आजतक नहीं सुनी होगी. 

स्पेन के अख़बार एबीसी ने खबर छापी कि वेनेजुएला के एक डॉक्टर ने किसी अज्ञात जगह से यह खुलासा किया है कि कास्त्रो के दिमाग की दाहिनी धमनी में बहुत ज्यादा थक्का जम गया है. “मेरा मानना है कि अब हम फिर कभी सार्वजनिक जीवन में वापस आते नहीं देख पायेंगे.” इस कथित डॉक्टर ने, अगर वह सचमुच एक डॉक्टर है, तो निस्संदेह उसने अपने देश के लोगों से दगाबाजी की है और कास्त्रो के स्वास्थ्य के बारे में बतया है कि “जल्दी ही उनका स्नायु तंत्र फेल होने वाला है.” 

दुनिया के ढेर सारे लोग इस तरह की अनाप-शनाप खबरें फैलाने वाली सूचना एजेंसियों के झांसे में आ जाते हैं, जिनमें लगभग सभी सुविधासम्पन्न और अमीर लोगों के कब्ज़े में हैं- लेकिन लोग अब इन पर बहुत कम ही यकीन करते हैं. कोई भी व्यक्ति धोखा नहीं खाना चाहता; यहाँ तक की सबसे लाइलाज झूठे से भी लोग सच सुनने की आश लगाए रहते हैं. अप्रैल 1961 में, समाचार एजेंसियों द्वारा फैलाये गए उस समाचार पर सबने विश्वास कर लिया था कि गिरोन या बे आफ पिग्स (इसे कुछ भी कहें) के भाड़े के हमलावर हवाना की तरफ बढ़ रहे हैं, जबकि सच्चाई यह थी कि उनमें कई अपनी नावों में बैठ कर उन यांकी युद्धपोतों तक पहुँचने की नाकामयाब कोशिश कर रहे थे जो उनकी हिफाजत में तैनात थे. 

बार-बार आनेवाले पूंजीवादी संकटों को देखते हुए अब सच्चाई लोगों को समझ में आने लगी है और प्रतिरोध भी दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है. कोई भी झूठ, दमन या नया हथियार इस उत्पादन प्रणाली को ध्वस्त होने से नहीं रोक पायेगा जिसमें असमानता और अन्याय की खाई दिन पर दिन चौड़ी होती जा रही है. 

कुछ दिन पहले, अक्तूबर संकट की पचासवीं सालगिरह के आसपास, समाचार एजेंसियों ने मिसाइल संकट के लिए तीन पक्षों को दोषी ठहराया था- उस समय साम्राज्यवाद के चौधरी रहे केनेडी, ख्रुश्चेव और क्यूबा. क्यूबा को नाभिकीय हथियारों से कुछ भी लेना-देना नहीं था, और न ही हिरोशिमा और नागासाकी में किये गए गैरजरूरी कत्ले-आम से ही, जो उस समय के अमरीकी राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने करायी थी, जिसकी बदौलत दुनिया भर में उनकी नाभिकीय तानाशाही कायम हुई थी. क्यूबा तो अपनी आज़ादी और सामाजिक न्याय के अपने अधिकारों की रक्षा कर रहा था 

यांकियों के हमलावर मनसूबे से अपनी मातृभूमि की अपनी हिफाजत के लिए हमने हथियारों, तेल, खाने-पीने की चीजों और अन्य संसाधनों के रूप में सोवियत सहायता कबूल की थी. इस पूंजीवादी देश ने शुरुआती महीनों से ही हम पर घिनौना और खुनी युद्ध थोप दिया था, जिसमें हजारों क्यूबावासियों को मार डाला गया और अपंग बना दिया गया. 

जब ख्रुश्चेव ने मध्यम दुरी तक मार करने वाली मिसाइल लगाने का प्रस्ताव दिया, ठीक वैसा ही, जैसी अमरीका ने तुर्की में लगा रखी थी, जो क्यूबा और अमरीक के बीच की दुरी की तुलना में सोवियत रूस के ज्यादा करीब था- तब सोवियत संघ के साथ एकता बनाये रखने के लिए क्यूबा वह खतरा उठाने से नहीं हिचका. हमारा व्यवहार नैतिक तौर पर पाक-साफ था. हमने जो कुछ किया उसके लिए किसी से माफ़ी नहीं माँगेंगे. सच्चाई यही है कि आधी सदी गुजर गयी और आज भी सर उठा कर खड़े हैं. 

मैंने “रिफ्लेक्संस” छपवाना बंद कर दिया क्योंकि यकीनन क्यूबा प्रेस के पास जो कागज है उसकी अहमीयत मेरे लेखों से कहीं ज्यादा हमारे देश के दूसरे जरूरी कामों के लिए है. 


बुरी खबर देने वाले कौवों!! मुझे तो अब याद भी नहीं कि सिरदर्द किस चिड़िया का नाम है. वे कितने झूठे हैं यह बताने के लिए मैं बतौर तोहफा उन्हें इस लेख के साथ अपना फोटो भी भेज रहा हूँ.



(मंथली रिव्यू के प्रति आभार सहित. अनुवाद- सतीश)

आत्मकथा






-नाजिम हिकमत
मेरा जन्म हुआ 1902 में
और जहाँ पैदा हुआ वहाँ एक मर्तबा भी वापस नहीं गया
मुझे पीछे लौटना पसंद नहीं
तीन साल का हुआ तो अलेप्पो में पाशा के पोते की खिदमत की
उन्नीस की उम्र में दाखिल हुआ मास्को कम्युनिस्ट विश्वविद्यालय में
उन्चास की उम्र में चेका पार्टी का मेहमान बन कर दुबारा मास्को गया
और चौदह साल की उम्र से ही शायर हूँ मैं
कुछ लोगों को पेड़-पौधों और कुछ को मछलियों के बारे में मालूम है सब कुछ
मुझे पता है जुदाई के बारे में
कुछ लोगों को जबानी याद हैं सितारों के नाम
मैं सुनाता हूँ अभाव के बारे में कविता
मैंने जेलखानों में और आलिशान होटलों में रातें गुजारीं
मैंने भूख और यहाँ तक कि भूख हड़ताल के बारे में भी जाना
मगर शायद ही कोई खाने की चीज हो
जिसका जायका न लिया हो
तीस की उम्र में वे मुझे फाँसी पर लटकाना चाहते थे
बयालीस की उम्र में वे देना चाहते थे शान्ति पुरस्कार
और दिया भी
छत्तीस की उम्र में चार वर्ग मीटर कंक्रीट तले आधा साल गुजारा
उनसठ साल कि उम्र में प्राग से भागा और हवाना पहुँचा अठारह घंटे में
लेनिन को कभी देखा नहीं मगर उनकी ताबूत के करीब था 1924 में
1961 में मैंने जिस समाधी का दौरा किया वह थी उनकी किताबें
उन्होंने मेरी पार्टी से काट कर अलग करने की कोशिश की
मगर कामयाब नहीं हुए
और न ही मैं कुचला जा सका ढहते हुए बुतों के नीचे
1951 में एक नौजवान दोस्त के साथ खतरनाक समुद्री यात्रा की
1952 में अपना टूटा हुआ दिल लिए चार महीने चित लेटा रहा
मौत का इंतजार करते हुए
मुझे रश्क था उस औरत से जिसे मैं प्यार करता था
चार्ली चैप्लिन से मैं बिलकुल नहीं जलता था
मैंने अपनी औरत को धोखा दिया
अपने दोस्तों के पीठ पीछे मैंने कभी बात नहीं की
पी मगर हर रोज नहीं
खुशी की बात यह कि मैंने अपनी रोटी ईमानदारी से हासिल की
झूठ बोला इस तरह कि किसी और को शर्मिंदा न होना पड़े
इस तरह झूठ बोला कि दूसरों को चोट न पहुँचे
लेकिन बेवजह भी झूठ बोला
मैंने रेलों, हवाईजहाजों और मोटरगाड़ियों में सफर किया
जो मयस्सर नहीं ज्यादातर लोगों को
मैं ओपेरा देखने गया
ज्यादातर लोग तो जानते भी नहीं ओपेरा के बारे में
और 1921 के बाद मैं वैसी जगह नहीं गया जहाँ ज्यादातर लोग जाते हैं
मस्जिदों चर्चों मंदिरों सिनागॉग जादूघरों में
मगर कहवा घरों में अड्डेबाजी जरुर की
मेरी रचनाएँ छप चुकी हैं तीस या चालीस भाषाओँ में
हमारे देश तुर्की में तुर्की भाषा में उन पर रोक है
मुझे कैंसर नहीं हुआ अभी तक 
और कोई वजह नहीं कि आगे भी हो
मैं प्रधान मंत्री या उसके जैसा कुछ भी नहीं बनूँगा कभी
और मैं नहीं चाहूँगा वैसी जिन्दगी जीना
अब तक शामिल नहीं हुआ किसी जंग में
या बमबारी से बचने के लिए रात के पिछले पहर किसी बिल में नहीं दुबका
और कभी भी गोते लगाते हवाई जहाजों को देख कर सड़क पर नहीं लेटा
मगर मुझे प्यार हो गया था लगभग सोलह की उम्र में  
मुख़्तसर बात ये दोस्तो
कि भले ही आज के दिन बर्लिन शहर में बडबडा रहा हूँ गमगीन
मगर ये कह सकता हूँ कि मैं इंसान की तरह जिया 
और किसे पता कि कब तक जिऊंगा
और मुझ पर क्या गुजरेगी.
(यह आत्मकथा 11 सितम्बर 1961 को बर्लिन में लिखी गयी थी. अंग्रेजी से अनुवाद- दिगम्बर)

सिक्कों की खनक

-कुलदीप नैयर
अमेरिकी पाक्षिक, न्यू यॉर्कर ने टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के संचालक जैन बंधुओं- समीर और विनीत के बारे में जो कुछ भी बताया है, वह बहुत से लोगों को पहले से ही पता है. इसमें न्यू यॉर्कर का योगदान बस इतना है कि उसने शक-शुबहा दूर कर दिया और इस बात को पक्का कर दिया कि देश के सबसे बड़े मीडिया मुगल इस बात में यकीन करते हैं कि समाचार कॉलमों के मामले में कुछ भी पवित्र नहीं है और एक तय कीमत पर उन्हें बेचा जा सकता है, क्योंकि उनके लिये अखबार उसी तरह एक बिकाऊ माल है, जैसे देह पर मले जानेवाले सुगंधित पाउडर या टूथपेस्ट.
एक पाठक यह जानकार हतप्रभ हो सकता है कि जिस खबर को वह उत्सुकतापूर्वक पढ़ता है उसे पैसा देकर छपवाया गया है. उसकी कुंठा और लाचारी और बढ़ जाती है, क्योंकि उसे इस बात का पता नहीं चलता कि इस कहानी का कौन-सा हिस्सा खबर है और कौन-सा हिस्सा फर्जी. संपादकीय मानकों का यह उलंघन जैन बधुओं को परेशान नहीं करता, क्योंकि वे इस उद्योग को पैसा कमाने के एक कारोबार की तरह इस्तेमाल करते हैं. वे इस बात से गर्व महसूस करते हैं कि उन्होंने नैतिकता को तार-तार करके चीथड़ों में बदल दिया है और इसके बावजूद उनका अखबार भारत में अव्वल दर्जे का है. इतना ही नहीं, वे शायद दुनिया भर में किसी भी दूसरे अखबार से कहीं ज्यादा पैसा कमाते हैं. महान रूपर्ट मर्डोक का साम्राज्य भले ही टाइम्स ऑफ इंडिया से २० गुणा ज्यादा बड़ा है, फिर भी उसका मुनाफा इससे कम है.  
अपने नौ-पृष्ठ के लेख में, उक्त पाक्षिक यह वर्णन करता है कि जैन बंधु पत्रकारिता को सिर्फ “एक जरुरी सिरदर्द की तरह लेते हैं और विज्ञापनदाताओं का असली ग्राहकों की तरह अभिनन्दन करते हैं.” यह आश्चर्य की बात नहीं है कि टाइम्स ऑफ इंडिया अपनी मुद्रण लाइन में अपने संपादकों का नाम नहीं छापता, क्योंकि दरअसल अखबार का कोई संपादक है ही नहीं.
उन्होंने नहीं, किसी और ने बहुत पहले कहा था कि अखबार में लिखना विज्ञापनों के पिछले पन्ने पर लिखने के समान है. जैन बंधु इस तथ्य और इसकी भावना दोनों को अमल में लाते. “हम जानते थे कि हम सुधी श्रोताओं को एकत्रित करने के कारोबार में लगे हैं. इससे पहले, हम सिर्फ विज्ञापन के लिए स्थान बेचते थे.” न्यू यॉर्कर के उक्त लेख में  प्रत्यक्ष रूप में जैन बंधुओं का कोई उद्धरण मौजूद नहीं है. शायद उन्होंने साक्षात्कार देने से इंकार कर दिया हो.
फिर भी, उनके कुछ पिट्ठू, शुक्र है कि उनमें से कोई भी संपादकीय खेमे का नहीं है, उनके दिमाग में झाँकने का अवसर प्रदान करते हैं. एक पिट्ठू कहता है: ”संपादकों में 80-80 शब्दों के लंबे वाक्य बोलते हुए, मंच से आडंबरपूर्ण और कानफोडू भाषण देने की प्रवृति पायी जाति हैं.” विनीत जैन इस बारे में एकदम स्पष्ट हैं कि अखबार के कारोबार में सफल होने के लिये आपको संपादकों की तरह नहीं सोचना चाहिये. “अगर आप संपादकीय विचार के हैं, तो आपके सभी फैसले गलत होंगें.”
यह सच है कि जैन बंधुओं ने अखबार को “समाचारों” के कागजी कारोबार में तब्दील कर दिया है. परन्तु ऐसा इसलिये, क्योंकि उन्होंने अपने अखबार को सहेजने की कला में महारत हासिल कर लिया है, उसे सस्ता कर दिया है और उसे पीत पत्रकारिता के स्तर तक नीचे गिरा दिया है. फिर भी, वे इसकी परवाह नहीं करते, क्योंकि वे एक पेशे को व्यवसाय बनाने में माहिर हैं. उनके लिये संपादक एक दिहाड़ी मजदूर से भी सस्ते होते हैं.  
मुझे एक पुरानी घटना याद आ रही है, टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादक गिरिलाल जैन ने एक दिन मुझे फोन करके पूछा कि क्या आप अखबार के मालिक अशोक जैन से जिनसे आपकी अच्छी जान-पहचान है, इस बारे में बात कर सकते हैं कि वे अपने बेटे समीर जैन को म्रेरे ऊपर दबाव डालने से मना करें. गिरी ने कहा कि अशोक जैन की प्राथमिकतायें चाहे जो भी रही हों, वे उनके साथ अच्छा व्यवहार करते थे, लेकिन समीर का रवैया अपमानजनक था. अशोक ने जवाब में कहा कि वह चाहे तो कितने भी गिरिलाल खरीद सकता है, लेकिन वह एक भी ऐसा समीर नही ढूँढ सकता जिसने उसके मुनाफे को आठ गुणा बढ़ा दिया है. इन्दर मल्होत्रा ने एक बार मुझे बताया कि समीर कैसे वरिष्ठ पत्रकारों को संस्था के द्वारा भेजे जाने वाले कार्ड्स पर अतिथियों के नाम लिखने के लिए अपने कमरे के फर्श पर बैठने के लिये मजबूर करता था.  
जैन बंधुओं ने पैसे कमाने के अपने कारोबार में अखबार को एक बकवास गप्पबाजी तक सीमित कर दिया है. पत्रकारिता उनके कारोबार के लिए सुविधाजनक है. इसे सुनिश्चित करने के लिये, न्यू यॉर्कर के अनुसार यह अखबार “हत्याओं और बलात्कार और दुर्घटनाओं और सुनामी की ख़बरों में भी आशावाद की एक छौंक लगाने का प्रयास करता है और युवाओं से प्रेरक संवाद कायम करने को प्राथमिकता देता है. गरीबी से संबंधित ख़बरों को कम प्राथमिकता दी जाती है.”
पिछले कुछ सालों में कारोबार और प्रबंधन विभागों को ज्यादा महत्व मिलने लगा है. मैं सोचता हूँ कि आपातकाल के दौरान प्रेस का दब्बू रुख इसकी एक वजह है जिसके चलते  व्यावसायिक हितों को ज्यादा महत्व मिलने लगा है. जब यह देखा गया कि संपादन का काम करने वालों ने बिना कोई संघर्ष किये हथियार डाल दिया, तो प्रबंधकों ने उन्हें उस पूर्व-प्रतिष्ठत स्थान से नीचे गिराना शुरू कर दिया जिस पर पहले उनका कब्ज़ा था. अब वे कारोबारी पक्ष के ताबेदार की भूमिका में हैं. हम लोग जरूरी कारोबारि प्रेस नोट कूड़ेदान में फेंक दिया करते थे.     
चूँकि कारोबार और सम्पादकीय के बीच का रिश्ता धुंधला पड़ चुका है, इसलिये स्वतंत्र अभिव्यक्ति सीमित होती जा रही हैं और रोजबरोज होने वाली दखलअंदाजी बढ़ती जा रही है. यह एक खुला रहस्य है कि प्रबंधन या कारोबारी पक्ष अपने आर्थिक और राजनैतिक हितों के अनुसार एक विशेष लाइन निर्धारित करता है. यह ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है कि बहुत से मालिक राज्य सभा के वर्तमान सदस्य हैं बल्कि यह तथ्य ज्यादा महत्वपूर्ण है कि वे कृपादृष्टि पाने के लिये राजनैतिक पार्टियों से संबंध बढ़ाते हैं. 
पार्टियों या संरक्षकों के प्रति उनका आभार और उनकी निकटता अख़बारों के स्तंभों में प्रतिबिम्बित होती है. यही संबंध अब खुद को “पैसा लेकर छापी गयी ख़बरों” में तब्दील कर चुके हैं. ख़बरों को इस ढंग से लिखने की माँग की जाती है जिससे एक व्यक्ति विशेष या खास दृष्टिकोण को समाचार स्तंभों में व्यक्त किया जा सके. पाठक कभी-कभी ही पकड़ पाते हैं कि कब सूचनाओं में प्रोपगैंडा घुसा दिया जाता है या कब समाचार स्तंभों की विषय वस्तु में विज्ञापनों को ठूँस दिया जाता है.  
इसलिये, अब वक्त आ गया है कि अख़बारों, टेलीविजन और रेडियो के सभी पहलुओं की जाँच-पड़ताल करने के लिये एक मीडिया आयोग की स्थापना की जानी चाहिये. 1977 में जब आखिरी प्रेस आयोग नियुक्त किया गया था, तब उसमें टेलीविजन शामिल नहीं था, क्योंकि उस वक्त भारत में इसका अस्तित्व नहीं था. दूसरी चीजों के अतिरिक्त, मीडिया के सभी पहलुओं की जाँच-पड़ताल होनी चाहिये, मालिकों और संपादकों, पत्रकारों और मालिकों के बीच के संबंधों की जाँच होनी चाहिये, जिन्होंने वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट (कार्यरत पत्रकार कानून) की आड़ में ठेका व्यवस्था लागू की. साथ ही, टीवी और मुद्रित ससमाचार माध्यम के बीच संयोजन की भी जाँच होनी चाहिये. आज कोई भी अखबार किसी टेलीविजन चैनल या रेडियो का मालिक हो सकता है. एक ही घराने द्वारा परस्पर विरोधी मीडिया का  स्वामित्व हासिल करने पर कोई रोंक नहीं है. एकाधिकारी संघों को बढ़ावा मिलता है जो अंततः प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है.     
सत्ताधारी पार्टी, कुछ ऐसे कारणों से जिनके बारे में उसे ही पता होगा, मीडिया आयोग की नियुक्ति नहीं करना चाहता. क्या ऐसा जैन बंधुओं के प्रभाव के कारण है जिन्हें बहुत से सवालों का जवाब देना होगा? जैन बंधुओं को यह समझना होगा कि एक लेखक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार इसलिये दिया गया था ताकि वह बिना किसी भय या पक्षपात के कुछ भी कह सके. अगर मालिक ही यह तय करने लगे कि कर्मचारी क्या कहेंगे तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है. लोकतंत्र में, जहाँ स्वतंत्र सूचनायें स्वतंत्र प्रतिक्रियाओं को बढ़ावा देती हैं, वहाँ प्रेस को कुछ लोगों की सनक पर नहीं छोड़ा जा सकता. प्रतिबंधित प्रेस, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी को नष्ट कर सकता है. 
(लेखक, कुलदीप नैयर ब्रिटेन में भारतीय उच्चायुक्त और राज्य सभा के सदस्य रह चुके हैं. मूल अंग्रेजी लेख गल्फ न्यूज से आभार सहित लिया गया. अनुवाद- दिनेश पोसवाल)

नोबेल शान्ति पुरस्कार : एक उन्माद भरी जालसाजी

स्पेन में अशांति और दंगे  (फोटो ए पी के प्रति आभार सहित )

यूरोपीय संघ को नोबेल शान्ति पुरस्कार देना एक भद्दा मजाक और उन्माद भरी जालसाजी है. नोर्वे नाटो का सदस्य देश है. सबसे अहम यह कि यूरोपीय संघ के सदस्य देश भी नाटो के सदस्य देश हैं, जो वास्तव में यूरोपीय संघ सैनिक शक्ति के रूप में काम करता है. इसलिए नाटो नोर्वेजियाई नोबेल “शान्ति” समिति ने नाटो यूरोपीय संघ के सदस्य देशों को अपना पुरस्कार दिया है, क्योंकि उसने अभी हाल ही में लीबिया के खिलाफ हमलावर युद्ध छेड़ा, ताकि वहाँ के तेल ओर गैस भंडार पर डाका डाले और इस दौरान लगभग 50,000 अफ्रीकियों को वहाँ से भगा दे. यह यूरोपीय गौरांग नस्लवादी उपनिवेशवादी साम्राज्यवाद का मामला है जो दुबारा अफ्रीका पर शिकंजा कस रहा है- फर्क सिर्फ यही है कि इस बार यह कुकृत्य बेहतर देखरेख के लिए नोबेल शान्ति पुरस्कार का ठप्पा लगा कर किया जा रहा है.


प्रोफ़ेसर फ्रांसिस ए. बोएल अंतरराष्ट्रीय न्याय के विशेषग्य हैं. वे 1998 में फिलीस्तीनी स्वतंत्रता की घोषणा के बारे में फिलीस्तीनी मुक्ति संगठन और यासिर अराफात के क़ानूनी सलाहकार थे. साथ ही, वे 1991 से 1993 तक मध्य-पूर्व शान्ति वार्ता के प्रतिनिधि थे जिस दौरान उन्होंने उस ओस्लो समझौते के लिए, जो अब बेकार हो चुका है, फिलिस्तीन की ओर से जवाबी प्रस्ताव तैयार किया था. उनकी रचनाओं में “पेलेस्टाइन, पेलेस्तिनियन एण्ड इंटरनेशनल ला” (2003) और “द पेलेस्तिनियन राइट ऑफ रिटर्न अंडर इंटरनेशनल ला” (2010) शामिल हैं.
प्रोफ़ेसर फ्रांसिस ए. बोएल ने 1976 में नोबेल शान्ति पुरस्कार के लिए नामांकन की पात्रता हासिल की थी, जब उन्होंने पहली बार हावर्ड में इंटरनेशनल ला का अध्यापन शुरू किया था.
(Countercurrents.org से आभार सहित लिया और अनूदित किया गया.)

वैश्विक श्रेष्ठता के लिए द इकोनोमिक टाइम्स पुरस्कार के निर्णायक मंडल को खुला पत्र

 – जी. अनन्तपद्मनाभम, एमनेस्टी इन्टरनेशनल (भारत)
(यूँ तो किसी अंग्रेजी अख़बार द्वारा उद्योगपतियों को दिया जानेवाला कोई ऐसा पुरस्कार जिसके निर्णायक मंडल में औद्योगिक घराने के लोग ही भरे पड़े हों, उसके चरित्र को लेकर न तो किसी भ्रम की गुंजाइश है और न ही वह हमारे सरोकार का विषय है. लेकिन एमनेस्टी के इस पत्र में वेदान्ता कम्पनी के क्रियाकलापों से सम्बंधित जो तथ्य और सूचनाएं दी गयी हैं, वह निश्चय ही गौरतलब है. संपादक.)
प्रिय श्री दीपक पारेख, श्री कुमार मंगलम बिरला, श्री के. वी. कामथ, श्री क्रिस गोपालकृष्णन, श्री ए.के. नायक, श्रीमती चन्दा कोचर और श्री सिरिल श्रोफ,
हम एमनेस्टी इंटरनेशनल भारत के लोग वेदान्ता पी.एल.सी. के चेयरमैन श्री अनिल अग्रवाल को वर्ष 2012 का द इकोनिमिक टाइम्स बिजनेस लीडर पुरस्कार देने के आपके फैसले से काफी निराश हुए हैं.
बिजनेस लीडर पुरस्कार उस व्यक्ति को दिया जाता है जिसने “सफलता की एक रणनीतिक दिशा का प्रदर्शन किया हो और एक दृष्टि अपनाई हो.” लेकिन वेदान्ता ने, ओडिसा की नियामगिरी पहाडियों में बॉक्साईट के खदान शुरू करने और लांजीगढ़ के निकट एक अलम्युनियम शोधक संयंत्र का विस्तार करने के लिए लीडरशिप और दृष्टि, दोनों ही मामले में भारी कमी का प्रदर्शन किया. इसकी जगह इसने जिस चीज का परिचय दिया, वह है- भारतीय कानूनों की बेशर्मी के साथ अवहेलना और स्थानीय समुदायों के अधिकारों के प्रति सम्मान का पूरी तरह आभाव.
अगस्त 2010 में, पर्यावरण और वन मंत्रालय ने जब यह पाया कि नियामगिरी बॉक्साईट परियोजना ने पर्यावरण और वन कानूनों का बड़े पैमाने पर उलंघन किया है और इससे डोंगरिया कोंध आदिवासी समुदाय के साथ-साथ स्थानीय समुदायों के अधिकारों का हनन होगा, तो इस परियोजना को रद्द कर दिया गया. मंत्रालय ने लांजीगढ़ संयंत्र के विस्तार की अनुमति पर भी रोक लगा दी, जब विशेषग्य समिति ने पाया कि यह गैरकानूनी है. द इकोनोमिक टाइम्स ने नियामगिरी बॉक्साईट खदान योजना का खुद ही लिखित रूप से विरोध किया है.
वेदान्त ने उसके बाद से एक मानवाधिकार और टिकाऊपन की नीतिगत रूपरेखा तैयार की, जिसके बारे में उसका दावा है कि वह अंतरराष्ट्रीय मानकों और सर्वश्रेष्ठ व्यवहार पर आधारित है. उक्त पुरस्कार के निर्णायकों ने कहा है कि श्री अग्रवाल की कंपनियों में कुशासन के बार में  जो धारणा प्रचलित है, वह यथार्थ नहीं है. लेकिन एमनेस्टी इन्टरनेशनल के ताजा शोध बताते हैं कि वेदान्ता के उलंघन अपने चरम पर हैं और लगातार जारी हैं. वेदान्ता की घोषित नीतिगत रुपरेखा और ओडिसा में इसकी व्यावहारिक कार्रवाइयों में भारी अंतर मौजूद है.
वेदान्ता द्वारा डोंगरिया कोंध के दृष्टिकोण की उपेक्षा लगातार जारी है. इसने स्थानीय समुदायों से राय-मशवरा करने का दावा किया है, जो एमनेस्टी इन्टरनेशनल द्वारा एकत्रित प्रमाणों से पुष्ट नहीं होता. इन प्रमाणों में डोंगरिया कोंध की गवाहियाँ और औपचारिक बैठकों का कार्यवृत भी शामिल है. कम्पनी के दावे, 2010 में पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा नियुक्त विशेषग्य समिति के दो अधिकारियों के निष्कर्षों से भी गलत ठहरते हैं.
वेदान्ता का यह दावा कि लांजीगढ़ संयंत्र के चलते बुरी तरह प्रभावित समुदायों की गवाही के आगे कहीं नहीं टिकते कि उसके द्वारा अपनाई गयी प्रक्रिया और योजना भारतीय कानूनों के अनुरूप है. इस संयंत्र से होने वाले प्रदुषण के कारण स्थानीय निवासियों के स्वास्थ्य और जल स्रोतों पर बुरा असर हुआ, बिना उचित मुआवजा दिये उनकी खेती की जमीन अधिग्रहित कर ली गयी तथा प्रदूषण और सामिलात जमीन पर कम पहुँच के चलते उनकी रोजी-रोटी का नुकसान हुआ.
लांजीगढ़ संयंत्र से निकलने वाले लाल कीचड़ के जलाशयों से उत्पन्न खतरों को पर्याप्त रूप से हल करने और वास्तविक प्रदूषण के दुष्प्रभावों के बारे में सही जानकारी देने में वेदान्ता की असफलता का एमनेस्टी इन्टरनेशनल ने भंडाफोड किया. लेकिन इसके बावजूद कम्पनी ने सुधार की दिशा में उचित कदम नहीं उठाये.
राष्ट्रिय मानवाधिकार आयोग द्वारा की जा रही एक जाँचपड़ताल में पाया गया कि जो लोग वेदान्ता के विरोधी हैं, उन्हें फर्जी मुकदमों में फँसाने और उनके विरोध को कुचलने में स्थानीय पुलिस भी लिप्त है. आयोग की जाँच बताती है कि वेदान्ता के परोक्ष इशारे पर पुलिस ने इस परियोजना से प्रभावित गाँवों के निवासियों के ऊपर कई मौकों पर झूंठे और अतिरंजित मामलों में मुकदमा दर्ज किया.
ये सभी तथ्य मानवाधिकारों की समस्या को हल करने सम्बंधी वेदान्त की कथित वचनवद्धता पर सवाल खड़ा करते हैं. श्री अग्रवाल ने इकोनोमिक टाइम्स से कहा है कि- “हमें अपने विकास के लिए अपने संसाधनों का उपयोग टिकाऊ ढंग से करना है.” लेकिन वेदान्ता ने लगातार यह दिखाया है कि वह ऐसा करने को इच्छुक नहीं है.
वेदान्ता के कई समर्थकों को जब इसके द्वारा किये गये पर्यावरण और मानवाधिकार हनन के बारे में सचेत किया गया तो उन्होंने अपनी राय पर पुनर्विचार किया.
2007 से ही, वेदान्ता के कई संस्थागत निवेशकों ने, जिनमें नार्वेजियन पेन्सन फंड और द चर्च ऑफ इंग्लैण्ड पेन्सन बोर्ड भी शामिल हैं, ओडिसा में कम्पनी की कार्रवाइयों के बुरे प्रभावों के बारे में चिंता जाहिर करते हुए इस कम्पनी का अपना हिस्सा बेच दिया.
इस साल के शुरू में ब्रिटेन की रोयल सोसाइटी फॉर प्रिवेंशन ऑफ एक्सीडेंट और ब्रिटिश सेफ्टी काउन्सिल को जब लांजीगढ़ संयंत्र में सुरक्षा मानकों की अवहेलना के में बारे सुचना मिली, तो उन संस्थाओं ने वेदान्ता को पुरस्कार देना टाल दिया. चार महीना पहले ही, ओस्लो स्थित बिजनेस फॉर पीस फाउन्डेशन ने  ‘व्यापार में नैतिकता’ के लिए श्री अग्रवाल को जो पुरस्कार देना तय किया था, उसे रद्द कर दिया जब वेदांता के कदाचारों और मानवाधिकार हनन के बारे में उसे सूचित किया गया.
हम अपील करते हैं कि आप श्री अग्रवाल को वर्ष का इ.टी. बिजनेस लीडर पुरस्कार देने के फैसले पर पुनर्विचार करें. वेदान्ता को इस पुरस्कार से सुशोभित करना मानवाधिकार हनन के एक इतिहास को पुरस्कृत करना है, अपने अधिकारों पर हमले के खिलाफ स्थानीय समुदायों के न्याय अभियान की अनदेखी करना है और इ.टी. कारपोरेट श्रेष्ठता पुरस्कार के उद्देश्य के साथ गद्दारी है.     
भवदीय,
जी. अनन्तपद्मनाभन
मुख्य कार्यकारी, एमनेस्टी इंटरनेशनल (भारत)
(काफिला.ऑर्ग के अंग्रेजी पोस्ट का आभार सहित अनुवाद)

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दो दलित महिलायें 42 वर्षों से 15 रूपए मासिक वेतन पर काम कर रही हैं

अक्कू और लीला

एक ऐसा मामला सामने आया है जो दिखाता है कि चंद अधिकारियों की निरंकुशता ने उडुपी निवासी दो दलित महिलाओं की जिन्दगी को कितनी बुरी तरह प्रभावित किया.
अक्कू और लीला, दो महिलाओं ने 15 रूपये मासिक वेतन पर वहाँ के महिला शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान में लगभग चार दशकों तक सफाईकर्मी के रूप में सेवा की. उनसे वादा किया गया था कि उनकी नौकरी पक्की कर दी जायेगी, लेकिन 42 साल सेवा करने के बाद भी उन्हें सेवा शर्तों का कोई लाभ नहीं मिला.
उन दोनों महिलाओं ने जब 2001 में कर्नाटक प्रशासनिक ट्रिब्यून का दरवाजा खटखटाया, तब से शिक्षा विभाग ने 15 रूपए मासिक का तुच्छ वेतन भी देना बंद कर दिया.
उनकी दुर्दशा तब सामने आयी, जब उडुपी स्थित ह्यूमन राइट प्रोटेक्शन फाउन्डेशन के अध्यक्ष रविन्द्रनाथ शानबाग ने इस मुद्दे को हाथ में लिया और इस मामले की पैरवी सर्वोच्च न्यायालय तक की.
श्री शानबाग ने पत्रकारों को बताया कि सर्वोच्च न्यायालय, कर्नाटक उच्च न्यायालय और कर्नाटक प्रशासनिक ट्रिब्यूनल ने इन महिलाओं के पक्ष में फैसला दिया और सरकार को इनकी नौकरी पक्की करने का निर्देश दिया, लेकिन सरकार ने अभी तक उस आदेश का पालन नहीं किया.
उन्होंने बताया कि इस पूरी अवधि में, दोनों महिलायें कोई वेतन पाए बिना ही वर्षों तक उस संस्थान के 21 शौचालयों की सफाई करती रहीं.
कर्नाटक प्रशासनिक ट्रिब्यूनल ने 2003 में ही सरकार से 90 दिन के भीतर उनकी सेवा नियमित करने को कहा था और कर्नाटक उच्च न्यायालय ने 2004 में ही उनका बकाया वेतन भुगतान करने का आदेश दिया था. यह सुचना भी जारी हुई थी कि अगर आदेशों का पालन नहीं किया गया तो इसे न्यायालय की अवहेलना मानी जायेगी. लेकिन उन्हें वेतन का भुगतान करने के बजाय सरकार ने 2005 में सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दायर कर दी.
श्री शानबाग ने बताया कि “सर्वोच्च न्यायालय ने 2010 में इन महिलाओं के पक्ष में फैसला दिया. इन सभी आदेशों के बावजूद ये महिलायें आज भी अपना हक पाने का इंतजार कर रही हैं.” उनका कहना था कि “अब सरकारी अधिकारी कह रहे हैं कि ये महिलायें नौकरी पर रखने लायक नहीं हैं, क्योंकि अब वे सेवानिवृति की उम्र तक पहुँच गयी हैं. मैं हैरान हूँ कि इन बदहाल महिलाओं की बकाया राशि का भुगतान करने के बजाय सरकार ने उनके खिलाफ मुक़दमा लड़ने पर लाखों रुपये फूँक दिये.
क्या सर्वोच्च न्यायालय से भी ऊपर कोई अदालत है जो इन महिलाओं को न्याय दे सके?” श्री शानबाग ने सवाल किया और सरकार से आग्रह किया कि इन महिलाओं का जो भी बकाया है, उसका भुगतान करे.
(मूल अंग्रेजी लेख और चित्र के लिए हम द हिंदू के आभारी हैं)
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