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दुनिया की अर्थव्यवस्था ढाँचागत संकट की गिरफ्त में (पांच भागों में)

पाँचवाँ भाग 

ढाँचागत संकट पूँजीवाद का व्यवस्थागत संकट है। इसमें वित्तीय महासंकट, दुनिया के अलगअलग देशों और एक ही देश के भीतर अलगअलग वर्गों के बीच बेतहाशा बढ़ती असमानता, राजनीतिक पतनशीलता और चरम भ्रष्टाचार, लोकतन्त्र का खोंखला होते जाना और राजसत्ता की निरंकुशता, सांस्कृतिक पतनशीलता, भोगविलास, पाशविक प्रवृति, अलगाव, खुदगर्जी, और व्यक्तिवाद को बढ़ावा, अतार्किकता और अन्धविश्वास का बढ़ना, सामाजिक विघटन और पहले से मौजूद टकरावों और तनावों का सतह पर आ जाना, प्रतिक्रियावादी और चरमपंथी ताकतों का हावी होते जाना तथा पर्यावरण संकट, धरती का विनाश और युद्ध की विभीषिका इत्यादि सब शामिल है। हालाँकि अपने स्वरूप, कारण और प्रभाव के मामले में इन समस्याओं की अपनीअपनी विशिष्टता और एकदूसरे से भिन्नता है, लेकिन ये सब एक ही जटिल जाला समूह में एकदूसरे से गुँथी हुई हैं तथा एक दूसरे को प्रभावित और तीव्र करती हैं। इन सबके मूल में पूँजी संचय की साम्राज्यवादी विश्व व्यवस्था है जो दुनिया भर के सट्टेबाजों, दैत्याकार बहुराष्ट्रीय निगमों और अलगअलग सरकारों के बीच साँठगाँठ और टकरावों के बीच संचालित होती है। इसका एक ही नारा हैमुनाफा, मुनाफा, हर कीमत पर मुनाफा ।वैसे तो दुनिया की तबाही के लिये आर्थिक संकट, पर्यावरण संकट और युद्ध में से कोई एक ही काफी है लेकिन  इन विनाशकारी तत्वों के एक साथ सक्रिय होने के कारण मानवता के आगे एक बहुत बड़ी चुनौती मुँह बाये खड़ी हैं। कुल मिलाकार यह संकट ढाँचागत है और इसका समाधान भी ढाँचागत बदलाव में ही है।
इस बुनियादी बदलाव के लिये वस्तुगत परिस्थिति आज जितनी अनुकूल है, इतिहास के किसी भी दौर में नहीं रही है। इस सदी की शुरुआत में रूसी क्रांति के समय पूरी दुनिया में मजदूर वर्ग की कुल संख्या दस करोड़ से भी कम थी, जबकि आज दुनिया की लगभग आधी आबादी, तीन अरब मजदूर हैं। इनमें बड़ी संख्या उन मजदूरों की है जो शहरी हैं और संचार माध्यमों से जुड़े हुए हैं। इनके संगठित होने की परिस्थिति पहले से कहीं बेहतर है। दूसरे, वैश्वीकरणउदारीकरणनिजीकरण की लुटेरी नीतियों और उनके दुष्परिणामों के चलते पूरी दुनिया में मेहनतकश वर्ग का असंतोष और आक्रोश लगातार बढ़ता गया है। इसकी अभिव्यक्ति दुनिया के कोनेकोने में निरंतर चलने वाले स्वत%स्फूर्त संघर्षों में हो रही है। तीसरे, आज उत्पादन शक्तियों का विकास उस स्तर पर पहुँच गया है कि पूरी मानवता की बुनियादी जरूरतें पूरी करना मुश्किल नहीं। फिर भी दुनिया की बड़ी आबादी आभाव ग्रस्त है और धरती विनाश के कगार पर पहुँच गयी है, क्योंकि बाजार की अंधी ताकतें और मुनाफे के भूखे भेड़िये उत्पादक शक्तियों के हाथपाँव में बेड़ियाँ डाले हुए हैं। इन्हें काट दिया जाय तो धरती स्वर्ग से भी सुन्दर हो जायेगी।

लेकिन बदलाव के लिये जरूरी शर्तमनोगत शक्तियों की स्थिति भी क्या अनुकूल है ? निश्चय ही आज दुनियाभर में वैचारिक विभ्रम का माहौल है और परिवर्तन की ताकतें बिखरी हुई हैं। ऐसे में निराशा और आशा, व्यक्तिवाद और सामूहिकता, अकेलापन और सामाजिकता, निष्क्रियता और सक्रियता, खुदगर्जी और कुरबानी, प्रगतिशीलता और प्रतिक्रियावाद, सभी तरह की प्रवृतियाँ समाज में संक्रमणशील हैं। बुनियादी सामाजिक बदलाव में भरोसा रखने वाले मेहनतकशों और उनके पक्षधर बुद्धिजीवियों का यह ऐतिहासिक दायित्व है कि जमीनी स्तर पर क्रान्तिकारी सामाजिक शक्तियों को चेतनासम्पन्न और संगठित करें। वर्तमान मानव द्रोही, सर्वनाशी सामाजिकआर्थिक ढाँचे के मलबे पर न्यायपूर्ण, समतामूलक और शोषणविहीन समाज की बुनियाद खड़ी करने की यह प्राथमिक शर्त है, जिसके बिना आज के इस चैतरफा संकट और विनाशलीला से निजात मिलना असम्भव है।

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दुनिया की अर्थव्यवस्था ढाँचागत संकट की गिरफ्त में (पाँच भागों में)

चौथा भाग

इसमें कोई संदेह नहीं कि दुनिया को तबाही की ओर ले जाने वाला विश्वव्यापी आर्थिक संकट हो, पर्यावरण विनाश का खतरा हो या युद्ध और नरसंहार से होने वाली तबाही, ये सब प्राकृतिक आपदाएँ नहीं हैं। इनके लिये दुनियाभर के शोषकों द्वारा सोचसमझ कर लागू की गयी नीतियाँ जिम्मेदार हैं। 1990 के आसपास बर्लिन की दीवार ढहने, रूसी खेमे के पतन और युगोस्लाविया के बिखराव के बाद विश्वशक्तिसंतुलन में भारी बदलाव आया। राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष और समाजवाद की ओर से 1917 की रूसी क्रांति सम्पन्न होने के बाद से ही पूँजीवादी खेमे को मिलने वाली चुनौती, वैसे तो सोवियत संघ में ख्रुश्चोव द्वारा तख्तापलट के बाद से ही लगातार क्षीण हो रही थी, अब रूसी साम्राज्यवादी खेमे की रहीसही चुनौती भी समाप्त हो गयी। इसके चलते पूरी दुनिया में अमरीकी चैधराहट वाले साम्राज्यवादी खेमे का पलड़ा भारी हो गया।

इस बदले हुए माहौल में विश्व पूँजीवाद को दुनिया के बाजार, कच्चे माल के स्रोत और सस्ते श्रम पर कब्जा जमाने का अनुकूल अवसर मिल गया। साथ ही आत्मनिर्भर विकास का सपना देखने वाले तीसरी दुनिया के तमाम शासकों ने भी हवा का रुख देखते हुए साम्राज्यवाद के आगे आत्मसमर्पण कर दिया। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष की देखरेख में वाशिंगटन आमसहमतिके नाम से एक नयी आर्थिक विश्व व्यवस्था का पुनर्गठन किया गया, जिसका मकसद सम्पूर्ण विश्व में पूँजी की लूट के मार्ग से सभी बाधाओं को एकएक कर हटाना था। तटकर और व्यापार पर आम सहमति (गैट) की जगह डंकल प्रस्ताव के अनुरूप विश्व व्यापार संगठन की स्थापना की गयी, जिसने दुनियाभर में बहुराष्ट्रीय निगमों, शेयर बाजार के निवेशकों और बैंकों की लूट का रास्ता आसान बना दिया। प्रकृति के दोहन और मानव श्रमशक्ति के शोषण की रफ्तार सारी सीमाएँ लाँघ गयी।

पूरी दुनिया पर पूँजीवाद की निर्णायक जीत और इतिहास के अंतकी दुंदुभि बजाते हुए दुनिया के पैमाने पर अतिरिक्त मूल्य की उगाही के लिये अमरीका की चैधराहट में आर्थिक नवउपनिवेशवादी व्यवस्था का एक मुकम्मिल ढाँचा तैयार किया गया। इस पिरामिडनुमा ढाँचे के शीर्ष पर अमरीका और उसके नीचे ग्रुप 7 के बाकी देश काबिज थे। उनके नीचे हैसियत के मुताबिक दूसरे पूँजीवादी देश और सबसे नीचे सम्राज्यवादी लूट और कर्जजाल में फँसकर तबाह हो चुके तीसरी दुनिया के देशों को जगह दी गयी थी। इस नये लूटतंत्र के अंदर माले गनीमत (लूट के माल) में किसे कितना हिस्सा मिलेगा, यह इस बात से तय होना था कि किस देश के पास कितनी पूँजी है और टेक्नोलॉजी का स्तर क्या है। अब संकट की घड़ी में इसकी कीमत भी अलगअलग देशों को अपनी हैसियत के मुताबिक ही चुकानी होगी, यानी क्रमश% ऊपर के पायदानों पर खड़े साम्राज्यवादी देश कम प्रभावित होंगे और सबसे गरीब, तीसरी दुनिया के देश पहले से भी अधिक तबाही के शिकार होंगे।

साम्राज्यवादी वैश्वीकरण की इन नीतियों ने पूरी दुनिया को एकाधिकारी पूँजी संचय की एक ऐसी व्यवस्था के भीतर जकड़ दिया, जिस पर कहीं से कोई अंकुश, कोई नियंत्रण नहीं रहा। यही कारण है कि इस नयी विश्व व्यवस्था में एक तरफ जहाँ अमीरीगरीबी के बीच की खाई बेहिसाब चैड़ी होती गयीदुनियाभर में अर्थव्यवस्थाएँ ठहराव और वित्तीय उथलपुथल का शिकार हुईं, दूसरी ओर हमारी धरती भी विनाश के कगार पर पहुँचा दी गयी। लेकिन इस के बावजूद, विश्व पूँजीवाद का अन्तर्निहित संकट हल होने के बजाय और भी घनीभूत, और भी असमाधेय होता गया। कारण यह कि श्रम की लूट और पूँजी संचय जितने बड़े पैमाने पर होगा, पूँजी निवेश का संकट उतना ही विकट होता जायेगा। यह एक ऐसा दुष्चक्र है, जो पूँजीवाद के प्रारंभिक दौर, मुक्त व्यापर के जमाने से ही बना रहा है। लेकिन एकाधिकारी पूँजी के मौजूदा दौर में यह संकट इसलिए असाध्य है, क्योंकि यह अब सम्पूर्ण पूँजीवादी व्यवस्था का ढाँचागत संकट बन चुका है।

प्रारम्भिक पूँजीवाद के दौर में आने वाला आवर्ती संकट और वर्तमान ढाँचागत संकट के बीच साफसाफ फर्क है। इसे स्पष्ट रूप से समझकर ही भविष्य की सही दिशा तय की जा सकती है। क्योंकि नयी और जटिल समस्याओं का समाधान पूराने सूत्रों और समीकरणों से नहीं हो सकता। आवर्ती या मीयादी संकट जब भी आता था, तो उसका समाधान पहले से स्थापित ढाँचे के भीतर ही हो जाता था, लेकिन आज का बुनियादी संकट समूचे ढाँचे को ही संकट ग्रस्त कर देता है। यह किसी एक भौगोलिक क्षेत्र या उद्योग की किसी खास शाखा तक या किसी खास अवधि तक सीमित नहीं होता। यह सर्वग्रासी होता है, जिसकी चपेट में वित्त, वाणिज्य, कृषि, उद्योग और सभी तरह की सेवाएँ आ जाती हैं।

पुराने जमाने में उच्च स्तर कि तकनोलॉजी और उत्पादकता वाले उद्योग गलाकाटू प्रतियोगिता और मंदी की मार से बच जाते थे, लेकिन एकाधिकारी वित्तीय (सटोरिया) पूँजी के वर्तमान दौर में, सर्वग्रासी संकट की घड़ी में अब ये कारक उद्धारकर्ता की भूमिका नहीं निभा सकते। उल्टे आज तकनीकी श्रेष्ठता वाले विकसित पूँजीवादी देशों में ही संकट ज्यादा गहरा है।

दूसरे, ऐसा नहीं कि मंदी एक खास अवधि तक ही बनी रहे तथा पूँजी और उत्पादक शक्तियों की क़ुर्बानी लेने के बाद फिर आर्थिक गतिविधियों का ग्राफ उठने लगे, जैसा पुराने दौर में हुआ करता था।अब तो अर्थव्यवस्था मंदी में दोहरी, तिहरी डुबकी लगाने के बाद भी उससे उबर नहीं पाती। सीमित समय के लिये चक्रीय क्रम में आने वाली मंदी अब चिरस्थायी और दीर्घकालिक चरित्र ग्रहण कर चुकी है।

तीसरे, पुराने समय में मंदी किसी एक देश या एक भौगोलिक क्षेत्र तक ही सीमित होती थी। दुनिया का बहुत बड़ा हिस्सा, जो पूँजीवादी दुनिया का अंग नहीं बना था, वहाँ भले और ढेर सारी समस्याएँ थीं, लेकिन पूँजीवादी संकट जैसी किसी चीज का अस्तित्व नहीं था। पूँजी के वैश्वीकरण के मौजूदा दौर में विश्वअर्थव्यवस्था आपस में इस तरह अंतरगुम्फित है कि धरती के किसी भी कोने से शुरू होने वाला संकट धीरेधीरे पूरी दुनिया में पाँव पसारने लगाता है। अमरीकी गृह ऋण संकट का बुलबुला फटने के बाद से अब तक की घटनाएँ इस बात की जीतीजागती मिसाल हैं।



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तीसरा भाग 

जहाँ तक हथियारों की होड़ और युद्ध का सवाल है, चरम परजीवी और मरणासन्न वित्तीय पूँजी के इस युग का एक चारित्रिक लक्षण है युद्ध। पिछली एक सदी के इतिहास पर नजर डालें, तो शायद ही कोई दिन गुजरा होगा जब धरती के किसी न किसी कोने में साम्राज्यवादियों द्वारा थोपा गया युद्ध या गृहयुद्ध जारी न रहा हो। 1929 की महामंदी के बाद भी व्यापार युद्ध और आगे चलकर विश्व युद्ध की फिजा बनने लगी थी और अपने संकट से निजात पाने के लिये साम्राज्यवादी खेमे ने पूरी दुनिया को विश्वयुद्ध की आग में झोंक दिया था। आज स्थिति हूहू वैसी ही नहीं है। साम्राज्यवादी देशों के बीच फिलहाल आपसी कलह और टकराव का स्तर वहाँ नहीं पहुँचा है कि वे आमनेसामने खड़े हो जायें। खेमेबंदी और गलाकाट प्रतियोगिता उसी रूप में नहीं है। लेकिन संकट गहराने के साथ ही अंदरअंदर टकराव और मोर्चाबंदी चल रही है। नये संश्रय कायम हो रहे हैं, एक धु्रवीय विश्व की छाती पर नयीनयी गोलबन्दियाँ हो रही हैं। हालाँकि अभी अमरीका को सीधे चुनौती देने वाला कोई गुट नहीं उभरा है, लेकिन विश्व रंगमंच की ढेर सारी घटनाएँ बताती हैं कि अब बीस साल पहले वाली बात नहीं रही। वाशिंगटन आम सहमतिके भीतर दरार दिखने लगे हैं, चाहे ईरान पर प्रतिबन्ध की बात हो, सीरिया का मामला हो या संयुक्त राष्ट्र संघ के विभिन्न प्रस्तावों का।

आने वाले समय का अनुमान लगाने के लिये सितम्बर 2002 में प्रकाशित अमरीकी सुरक्षा रणनीति दस्तावेज पर गौर करना जरूरी है, जिसमें कहा गया था कि हम दूसरी महाशक्तियों का मजबूती से प्रतिरोध करेंगे।…हम महाशक्तियों के बीच प्रतियोगिता की पुरानी बुनावट के दुबारा उभरने की सम्भावना के प्रति सचेत हैं। आज अनेक महाशक्तियाँ आतंरिक संक्रमण से गुजर रही हैं, जिनमें रूस, भारत और चीन अधिक महत्त्वपूर्ण हैं।… यह अमरीकी सैन्य शक्ति की अनिवार्य भूमिका को एक बार फिर सुनिश्चित करने का समय है। हमें अपने सुरक्षा बल का इस तरह निर्माण और देखरेख करना जरूरी है, कि कोई उसे चुनौती न दे सके।इस दस्तावेज में असली चिन्ता चीन को लेकर थी । उल्लेखनीय है कि इसी के बाद से भारत में महाशक्ति बनने का शेखचिल्लीपन पैदा हुआ जो बेबुनियाद है बहरहाल एक ध्रुवीय विश्व और साम्राज्यवादी समूह के निर्विकल्प चै/ारी की यह चिंता वैश्वीकरण के इस दौर में काफी महत्त्व रखता है ।
सच तो यह है कि आज विश्व शांति के लिये अमरीका से बढ़कर कोई दूसरा खतरा नहीं है । इसकी अर्थव्यवस्था भले ही लगातार नीचे लुढ़क रही हो, सैनिक ताकत के मामले में आज भी इसका कोई सानी नहीं। पिछले बीस बरसों से दुनिया के कुल सैनिक खर्च का एक तिहाई अकेले अमरीका करता है। 2011 में यह खर्च चीन से पाँच गुना, रूस से दस गुना, भारत से पन्द्रह गुना और ईरान से चालीस गुना था। आर्थिक रूप से संकट ग्रस्त होने के बावजूद अमरीका अपनी सैनिक वरीयता बनाये हुए है और इसी से अपनी आर्थिक बर्बादी की क्षतिपूर्ती करता है। सैनिक मामलों में अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिये उसके पास दो बहाने हैंतेल के स्रोतों पर कब्जा और चीन का भय।

साम्राज्यवादी विश्व व्यवस्था में शामिल होने के बाद चीन का जिस तरह विकास और विस्तार हुआ है, उसे देखते हुए अमरीका का यह भय बेबुनियाद नहीं। चीनी अर्थवयवस्था सट्टेबाजी पर नहीं, बल्कि मूलत% वास्तविक उत्पादन के दम पर गतिमान है। दो सौ साल देर से पूँजीवादी दौड़ में शामिल होने के बावजूद, लगभग तीन दशकों तक वहाँ लागू की गयी समाजवादी नीतियाँ और उत्पादक शक्तियों का चहुँमुखी विकास आज भी वहाँ पूँजीवादी विकास का उत्प्रेरक है। दुनिया के कुल लौह अयस्क की सालाना खपत का 30 प्रतिशत, इस्पात 27 प्रतिशत, अल्युमिनियम 25 प्रतिशत, कोयला 31 प्रतिशत और पेट्रोलियम का 7प्रतिशत अकेले चीन करता है। उसने ईरान से 7,000करोड़ डॉलर का तेल और गैस खरीदने का सौदा किया है। चीन का कुल विदेशी मुद्रा भंडार 2,300 अरब डॉलर है, जिसमें से 1,700 अरब का निवेश डॉलर परिसंपत्तियों में किया हुआ है। निश्चय ही ये तथ्य अमरीका को बेचैन करने के लिये काफी हैं।

अमरीकी नेशनल इंटेलिजेंस काउन्सिल ने कहा था कि दुनिया की अर्थव्यवस्था में उभरती ताकतें अमरीकी वर्चस्व के लिये चुनौती हैं। हालाँकि अभी यह मुख्यत% व्यापार, पूँजी निवेश, नयी तकनोलॉजी और दूसरी कम्पनियों के अधिग्रहण के इर्दगिर्द ही है । व्यापार युद्ध को वास्तविक युद्ध बदलते देर नहीं लगती। इसी बौखलाहट में अमरीका ने चीन को घेरने की एक बहुआयामी और दीर्घकालिक योजना बनायी है, जिसमें जापान, आस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया में इंटरसेप्टर मिसाइल लगाना, ताईवान को हथियारों से लैस करना और भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी शामिल हैं। हालाँकि चीन आज भी साम्राज्यवादी शक्ति नहीं बना है, लेकिन भविष्य की गति इसी दिश की ओर संकेत करती है।

आज साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच में आपसी टकराव और उनके युद्ध आसन्न नहीं है, लेकिन इसकी सम्भावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता। कारण यह कि एकाधिकारी पूँजी के मरणासन्न और चिरस्थाई ढाँचागत संकट के मौजूदा दौर में साम्राज्यवाद अपने अस्तित्व की रक्षा के लिये मानवता को युद्ध की आग में झोंकने से भी बाज नहीं आयेगा। पहला और दूसरा विश्व युद्ध आर्थिक संकट का ही नतीजा था, जो अब पहले से भी विकट हो चुका है । विश्व युद्ध भले ही न हों, लेकिन उद्धत अमरीका का जो युद्धोन्माद इराक, अफगानिस्तान और लीबिया में दिखायी दिया, वही अब इरान और सीरिया के खिलाफ दिख रहा है। हालाँकि अमरीका की अब वैसी ही साख नहीं है जो इराक और अफगानिस्तान पर हमले के समय थी।

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दुनिया की अर्थव्यवस्था ढाँचागत संकट की गिरफ्त में (पाँच भागों में)

दूसरा भाग 

औद्योगिक क्रांति के बाद लगातार
200 सालों तक कोयला, पेट्रोलियम और ऊर्जा के अन्य साधनों के अंधाधुंध इस्तेमाल और कच्चा माल के लिये प्राकृतिक संसाधनों के बेतहाशा दोहन के चलते धरती तेजी से गर्म होती गयी। नतीजा यह कि साइबेरिया के बर्फीले मैदान पिघल रहे हैं और उनसे मिथेन गैस का रिसाव हो रहा है जो धरती और जलवायु के लिये कार्बन डाई ऑक्साइड से 30 गुना ज्यादा खतरनाक है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण आर्कटिक महासागर की बर्फीली सतह और हिमालय सहित दुनियाभर के ग्लेसियर पिघलने से समुद्र का जलस्तर हर साल 2सेंटी मीटर ऊपर उठ रहा है। इसी का नतीजा है 1998में बांग्लादेश का 65 प्रतिशत इलाका बाढ़ में डूब गया था। 16 लाख की आबादी वाले भोला द्वीप का आधा हिस्सा बाढ़ में बह गया। अनुमान है कि ग्लोबल वार्मिंग से पैदा होने वाली बीमारियों की चपेट में आने से बांग्लादेश के डेढ़ लाख लोग हर साल मर जाते हैं। बांग्लादेश ही नहीं, दुनिया के कई इलाके ऐसा ही प्रकोप झेल रहे हैं।

विकास के नाम पर पूँजीवाद ने पूरी दुनिया में जो विध्वंस किया है उसके कारण आज हर घंटे पौधे और जानवरों की तीन प्रजातियाँ लुप्त हो जा रही हैं । पिछले 35सालों में ही रीढ़धारी प्राणियों की एक तिहाई प्रजातियाँ धरती से गायब हो गईं। और अब इंसानों की बारी है। पूर्वी अफ्रीका के अर्धसिंचित इलाकों में बारिस न होने के चलते इथोपिया, सोमालिया, केन्या और सूडान में लगातार सूखा पड़ रहा है । दारफुर में 1984–85 के अकाल में एक लाख लोग मर गये । यह हालत तो तब है जब कार्बन की मात्रा 3870 लाख अंश प्रति टन है। अनुमान है कि जल्दी ही यह 4000–4500 लाख अंश प्रति टन हो जाने वाला है। इसके कारण धरती का औसत तापमान 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ जायेगा और जलवायु में अचानक भारी बदलाव आयेगा। तब धरती को बचाना भी असम्भवप्राय हो जायेगा।

दुनियाभर के वैज्ञानिक धरती पर मँडराने वाले खतरे की चेतावनी दे रहे हैं, लेकिन शोषकशासक पूँजीपति वर्ग के कान पर जूँ नहीं रेंगती। वे ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठकर जश्न मना रहे हैं और पूरी धरती को विनाश की ओर धकेल रहे हैं। विश्व पर्यावरण सम्मेलन मजाक बन कर रह गये हैं। पृथ्वी सम्मेलन (1992) से लेकर रियो सम्मेलन (2012) तक, और इन बीस वर्षों में हुए क्वेटो, कोपेनहेगन और कानकुन बैठकों की असफलता से जाहिर है कि दुनिया के शासकों को धरती के विनाश की कोई परवाह नहीं। उल्टे अब वे जलवायु संकट या ग्लोबल वार्मिंग की सच्चाइयों को ही झुठलाने पर आमादा हैं।

साम्राज्यवादी वैश्वीकरण के बाद से प्रकृति का दोहन और ऊर्जा का इस्तेमाल पहले से कईकई गुना अधिक हो गया है। भारत में भी आज देशीविदेशी पूँजी के नापाक गठबंधन से हर तरह के खनिज पदार्थ की लूट अपने चरम पर है। इसके लिये कानून की धज्जी उड़ाना, उन इलाकों के निवासियों को उजाड़ना और विरोध के स्वर को बंदूकों के दम पर कुचलना, औपनिवेशिक दौर में गुलाम बनाये गये देशों पर ढाये जाने वाले कहर की याद ताजा करते हैं। पहले जो दमनउत्पीड़न विदेशी आक्रांता करते थे, वही अब बहुराष्ट्रीय निगमों के साथ साँठगाँठ करके अपने ही देश के शासक कर रहे हैं।

दुनिया की अर्थव्यवस्था ढाँचागत संकट की गिरफ्त में (पाँच भागों में)

आज पूरी दुनिया एक अभूतपूर्व आर्थिक संकट के भंवर में गोते लगा रही है। 2007–08 में अमरीका में सबप्राइम गृह ऋण का बुलबुला फूटने के बाद शुरू हुआ वित्तीय महासंकट अब पूरी दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले चुका है। यूरोप के कई देशों की अर्थव्यवस्थाएँ एकएक कर तबाह होती जा रही हैं। भारत में भी विकास का गुब्बारा पिचकने लगा है। बीस साल पहले उदारीकरणनिजीकरण की जिन नीतियों को रामबाण दवा बताते हुए लागू किया गया था, उनकी पोलपट्टी खुल चुकी है। विकास दर, विदेश व्यापार घाटा, मानव सूचकांक, महँगाई, बेरोजगारी जैसे लगभग सभी आर्थिक मानदण्ड इसकी ताईद कर रहे हैं। कमोबेश यही हालत दूसरे देशों की भी है।

विश्व पूँजीवादी व्यवस्था का यह संकट ढाँचागत, सर्वग्रासी और असमाधेय है। मानव जीवन का कोई भी पहलू इससे अछूता नहीं है। आर्थिक संकट राजनीतिक संकट को जन्म दे रहा है, जो आगे बढ़ कर सामाजिकसांस्कृतिकवैचारिक संकट को गहरा रहा है। यहाँ तक कि हमारा भूमंडल भी पूँजीवाद की विनाशलीला को अब और अधिक बर्दाश्त कर पाने में असमर्थ हो चुका है। प्राकृतिक संसाधनों के बेतहाशा दोहन और बेहिसाब कार्बन उत्सर्जन से होनेवाले जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के कारण आज पूरी धरती पर विनाश का खतरा मंडरा रहा है।

इस चैतरफा संकट के आगे पूँजीवादी शासक और उनके विद्वान हतप्रभ, हताश और लाचार नजर आ रहे हैं। इसका ताजा उदहारण है जून माह में मौजूदा संकट को लेकर आयोजित दो विश्व स्तरीय सम्मेलनों का बिना किसी समाधान तक पहुँचे ही समाप्त हो जाना। इनमें से एक था, रियो द जेनेरियो (ब्राजील) में धरती को विनाश से बचाने के लिये आयोजित रियो़ पर्यावरण सम्मेलन और दूसरा यूरोपीय देशों के आर्थिक संकट के बारे में लोस काबोस (मैक्सिको) में आयोजित जी–20 की बैठक। इन दोनों ही सम्मेलनों के दौरान भारी संख्या में एकत्रित आन्दोलनकारियों ने इस संकट के लिये जिम्मेदार, साम्राज्यवादी वैश्वीकरण की नीतियों के खिलाफ लोगों ने जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया।
2007 में विराट अमरीकी निवेशक बैंक लेहमन ब्रदर्स के डूबने के साथ ही वहाँ 1929 के बाद का सबसे बड़ा आर्थिक विध्वंश शुरू हुआ । इसे रोकने के लिये अमरीका ने मुक्त व्यापार के ढकोसले को त्यागते हुए सरकारी खजाने से 1900 अरब डॉलर सट्टेबाजों को दिवालिया होने से बचाने के लिये झोंका । तभी से यह कहावत प्रचलित हुई– “मुनाफा निजी, घाटा सार्वजनिक ।

इस भारी रकम से वित्तीय तंत्र तत्काल ध्वस्त होने से तो बच गया, लेकिन संकट और गहराता गया। हुआ यह कि बैंकों ने अपने 3400 अरब डॉलर के सीधे नुकसान और अरबोंखरबों डॉलर के डूबे कर्जों से खुद को सुरक्षित रखने के लिये सरकार से मिले डॉलरों से नये कर्ज बाँटने के बजाय अपनी तिजोरी में दबा लिये। सटोरियों की करनी का फल वास्तविक उत्पादन में लगी अर्थव्यवस्था को भुगतना पड़ा, क्योंकि उत्पादन जारी रखने के लिये जरूरी उधार की कमी से जूझ रहे उद्योगों के लिये कार्यशील पूँजी का संकट ज्यों का त्यों बना रहा। बैंकों को दी गयी सरकारी सहायता राशि रसातल में समा गयी। शेयर बाजार का भूचाल पूरी अर्थव्यवस्था और सरकारी मशीनरी को झकझोरने लगा। आज वहाँ बेरोजगारी 10फीसदी है, जबकि भारी संख्या में लोग अर्द्ध बेरोजगार हैं। लेकिन यह संकट अमरीका तक ही सीमित नहीं रहा। जल्दी ही यह संकट पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर अपना असर डालने लगा। विश्व व्यापार में 12 फीसदी की कमी आयी है, जो महामंदी के बाद की सबसे बड़ी गिरावट है।

यूनान दिवालिया होने के कगार पर पहुँच गया । यही हाल यूरोप के कुछ अन्य देशोंइटली, पुर्तगाल, आयरलैंड और स्पेन का भी हुआ । उन्हें उबारने के लिये झोंकी गयी मुद्राकोष और यूरोपीय संघ की पूँजी भी अर्थव्यवस्था को गति देने के बजाय रसातल में समाती गयी । आर्थिक विध्वंस की कीमत हर जगह मेहनतकश जनता को चुकानी पड़ी। सरकारों ने सट्टेबाजों, बैंकों और निगमों के हित में अपने जनविरोधी कदमों को और कठोर किया। मकसद साफ थास्वास्थ्य, शिक्षा जैसी जरूरी सरकारी सेवाओं और सब्सीडी में कटौती, आम जनता पर टैक्स का बोझ और वेतन में कमी करके उससे बचे धन से सटोरियों की हिफाजत । यह फैसला पूँजीवाद के संचालकों के वैचारिक दिवालियेपन की ही निशानी है, क्योंकि मंदी के दौरान सरकारी खर्च और लोगों की आय में कटौती करके जानबूझ कर माँग कम करना आत्मघाती कदम होता है । इन उपायों ने मंदी को और भी गहरा कर दिया ।
पूँजीवाद जब भी संकट ग्रस्त होता है तो उसके रक्षकों को मसीहा के रूप में जॉन मेनार्ड कीन्स की याद आती है, जिन्होंने 1929 की मंदी के बाद सरकारी खर्च बढ़ा कर लोगों की माँग बनाये रखने का सुझाव दिया था। इस बार भी पॉल क्रुग्मान सरीखे कई अर्थशास्त्रियों ने वही पुराना राग अलापा। अव्वल तो सट्टेबाजी के वर्चस्व वाले इस अल्पतंत्र से ऐसी उम्मीद ही बेकार है, लेकिन यदि वे ऐसा करें भी तो इस खर्च से बढ़ने वाले सरकारी कर्ज को भी वित्तीय उपकरण बना कर उसे शेयर बाजार में उतार दिया जायेगा। उधर संकुचन के माहौल में ऐसे बॉण्ड को भला कौन खरीदेगा ? तब सरकारी कर्ज का संकट बढ़ेगा और सरकार का ही दिवाला पिट जायेगा, जैसा यूरोप के देशों में हुआ।

पूँजीवादी दायरे में संकट का हल तो यही है कि आर्थिक विकास तेजी आये तथा माँग और पूर्ति के बीच संतुलन कायम हो । लेकिन यह इंजन पहले ही फेल हो चुका है । 1970 के दशक में रोनाल्ड रीगन और मार्गरेट थेचर ने राष्ट्रीय आय को मजदूरों से छीनकर पूँजीपतियों की तिजोरी भरने की दिशा में मोड़ दिया था । आर्थिक विकास और मुनाफे की दर बढ़ाने के लिये /ान जुटाने के नाम पर मजदूरी और सरकारी सहायता में कटौती की गयी थी । पूँजीवाद के इन नीम हकीमों का नया अर्थशास्त्र (रीगोनॉमिक्सथैचरोनॉमिक्स) जिसे कई दूसरे देशों ने भी अपनाया, रोग से भी घातक साबित हुआ । इससे आय की असमानता तेजी से बढ़ी, बहुसंख्य आबादी की क्रयशक्ति गिरी और माँग में भारी कमी आयी।

शेयर बाजार में पूँजी निवेश और बाजार की माँग बढ़ाने के लिये अर्थव्यवस्था का वित्तीयकरण किया गया, जिसमें सरकार द्वारा कर्ज लेकर सरकारी माँग को फर्जी तरीके से बढ़ाना, बाजार और मुनाफे से सभी नियंत्रण हटाना, ब्याजदर में भारी कमी और कर्ज की शर्तें आसान बनाना, सट्टेबाजी के नये उपकरणों, जैसे- ऑप्संस, फ्यूचर्स, हेज फंड इत्यादि का आविष्कार करना और घरेलू कर्ज के गुब्बारे को फुलाते जाना शामिल था। 1980–85 में अमरीका का कुल कर्ज सकल घरेलू उत्पाद का डेढ़ गुना था, जो 2007 में बढ़ कर साढ़े तीन गुना हो गया। उधर पूँजीपतियों का मुनाफा भी 1950 के 15 प्रतिशत से बढ़ कर 2001में 50 प्रतिशत हो गया। लोगों की आय बढ़ाये बिना ही मुनाफा बाजार में तेजी कायम रही। लोग उस पैसे को खर्च कर रहे थे जो उनका था ही नहीं। 1970 से 2006 के बीच घरेलू कर्ज दो गुना हो गया। लेकिन 2007 आतेआते सबप्राइम गृह ऋण के विध्वंस के रूप में कर्ज की हवा से फुलाया गया विकास का गुब्बारा फट गया। इस पूरे प्रकरण ने पूँजीवाद की चरम पतनशीलता, परजीविता और मरणासन्नता को सतह पर ला दिया।

सतत विकास पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का स्वाभाविक लक्षण नहीं है और पिछले 2 सौ वर्षों से यदि यह व्यवस्था मंदी की मार से बचती चली आ रही है तो इसके पीछे अलगअलग दौर में सक्रिय बाहरी कारकों की ही भूमिका रही है। इनमें प्रमुख हैंउपनिवेशों का विराट बाजार, सस्ता श्रम और कच्चे माल का विपुल भंडार, दुनिया के बँटवारे और पुनर्बंटवारे के लिये लड़ा गया साम्राज्यवादी युद्ध, नरसंहार और तबाही के हथियारों का तेजी से फैलता उद्योग, युद्ध की तबाही से उबारने और पुनर्निर्माण के ऊपर भारी पूँजी निवेश, अकूत पूँजीनिवेश की संभावना वाली (जैसेरेल या मोटर कार) नयी तकनीक की खोज, शेयर बाजार की अमर्यादित  सट्टेबाजी इत्यादि। और जब एक के बाद एक, ये सारे मोटर फुँकते चले गये तो आखिरकार अर्थव्यवस्था का वित्तीयकरण करके सस्ते कर्ज के दम पर उसे गतिमान बनाये रखने का नुस्खा आजमाया गया। मौजूदा विश्व आर्थिक संकट इसी की देन है।

इस जर्जर विश्व पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में ठहराव अब स्थाई परिघटना बन गया है । अतिरिक्त उत्पादन क्षमता, अत्यल्प उपभोग और मुनाफे में लगातार गिरावट के लाइलाज रोग का इसके पास कोई निदान नहीं है। पूँजीवादी देश अपने संकट का बोझ एकदूसरे पर डालने के लिये धींगामुश्ती कर रहे हैं।

इस संकट के परिणामस्वरूप पूरी दुनिया पर दो अत्यंत गम्भीर खतरे मंडरा रहे हैंपहला, प्राकृतिक संसाधनों के बेतहाशा दोहन के कारण धरती के विनाश का खतरा और दूसरा, हथियारों की होड़, युद्ध, नरसंहार का खतरा, जिनका जिक्र करना बहुत जरूरी है।

आर्कटिक महासागर की बर्फ अगले 10 सालों में गायब हो जाएगी : एक अध्ययन

यूरोपियन स्पेस एजेंसी द्वारा की गयी एक नयी पैमाइश के अनुसार आर्कटिक महासागर की बर्फ अगले 10 सालों में पूरी तरह पिघल जाएगी. बर्फ पिघलने की यह रफ़्तार पहले जितना  अनुमान लगाया गया था, उससे कहीं तेज है.

एक अध्ययन के मुताबित, 2004 से हर साल 900 घन किलोमीटर बर्फ गायब हुई है. आर्कटिक बर्फ की मोटाई नापने के लिए वैज्ञानिकों ने आर्कटिक के ऊपर उड़ने वाले नासा जहाजों से और बर्फ के अंदर चलने वाली पनडुब्बियों द्वारा अल्ट्रा-साउंड (सोनर) मापक से प्राप्त आकडों का उपयोग किया. साथ ही, उन्होंने इस काम के लिए खासतौर पर विकसित सैटेलाइट तकनोलोजी- क्रिस्टोसैट- 2 प्रोब का भी इस्तेमाल किया जो बर्फ की मोटाई नापने की ऐसी पहली तकनीक है.

लंदन सेंटर फॉर पोलर आब्जर्वेसन एण्ड माडलिंग के डॉ सीमूर लैक्सोन ने गार्जियन को बताया की “जल्द ही गरमी के मौसम में किसी दिन हम ऐसे यादगार पल का अनुभव कर सकते हैं कि जब हम सैटेलाइट से प्राप्त तस्वीरों पर नज़र डालें तो हमें आर्कटिक पर बर्फ की कोई चादर ही दिखाई न दे, केवल पानी ही पानी नजर आये.

एक नयी पैमाइश के मुताबिक न केवल ग्रीष्मकालीन समुद्री बर्फ से ढका क्षेत्र तेजी से पीछे सरका है, बल्कि बची-खुची बर्फ की मोटाई भी काफी तेज़ी से कम होती जा रही है.

अध्ययन से पता चलता है कि आर्कटिक बर्फ पहले लगाये गये अनुमान की तुलना में 50 प्रतिशत तेज़ी से पिघल रही है.

पिछली गर्मी के अंत में आर्कटिक पर लगभग 7000 घन किलोमीटर बर्फ ही बची रह पाई, जो 2004 में 13000 घन किलोमीटर बची हुई बर्फ की तुलना में लगभग आधी ही रह गई.

आर्कटिक की बर्फ पिघलने से समुद्र का तापमान बढ़ता है, जिससे समुद्र की सतह पर जमा मिथेन पिघलता है और भारी मात्रा में ग्रीनहाउस गैस वायुमंडल में जमा हो जाती है. इसके चलते बर्फ और भी तेजी से पिघलती है और इस चक्रीय गति के कारण जलवायु परिवर्तन की गति तेज हो जाती है.

यूसीएल के प्रोफेसर क्रिस राप्ले ने गार्जियन को बताया की “आर्कटिक और भूमध्य रेखा के बीच तापमान का जो अंतर आज बढ़ रहा है, उसके कारण ऊपरी वायुमंडल में स्थित जेट स्ट्रीम काफी अस्थिर हो सकती हैं. इसका नतीजा होगा निम्न अक्षांशो पर मौसम की अस्थिरता का बहुत ज्यादा बढ़ जाना, जैसा इस साल हम झेल चुके हैं.

(कॉमन ड्रीम्स डॉट ऑर्ग के प्रति आभार सहित. अनुवाद- सतीश)

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मातमे आज़ादी – जोश मलीहाबादी

देश-विभाजन की एक त्रासद तस्वीर (फोटो- मार्गरेट बर्क-ह्वाइट)
(14 अगस्त 1947 की आधी रात, एक समझौते के जरिये भारतीय पूँजीपति वर्ग की पार्टी काँग्रेस को सत्ता हस्तांतरित करके अंग्रेज यहाँ से चले गये, लेकिन जाते-जाते इस देश के दो टुकड़े कर गये. विभाजन की इस त्रासदी को आज भी भारतीय उपमहाद्वीप की जनता तरह-तरह से भुगत रही है. आज़ादी का क्या हश्र होना था, इसका अंदाज़ा उस दौर के कई कवियों, शायरों और रचनाकारों ने लगाया था. इंकलाबी शायर जोश मलीहाबादी की यह नज्म बँटवारे की उसी त्रासद स्थिति का बयान करती है और समझौते से मिली अधूरी आज़ादी की असलियत को उजागर करती है.)
मातमे आज़ादी – जोश मलीहाबादी
शाखें हुईं दो-नीम जो ठंडी हवा चली
गुम हो गयी शमीम जो बादे-शबा चली

अंग्रेज ने वो चाल बा-जोरो-जफ़ा चली
बरपा हुई बरात के घर में चला-चली
अपना गला खरोशे-तरन्नुम से फट गया
तलवार से बचा तो रगे-गुल से कट गया
सिख ने गुरु के नाम को बट्टा लगा दिया
मंदिर को बिरहमन के चलन ने गिरा दिया
मस्जिद को सेख जी की करामत ने ढा दिया
मजनू ने बढ़ के पर्दा-ए-महमिल गिरा दिया
इस सू-ए-जाँ को गलगला-ए-आम कर दिया
मरियम को खुद मसीह ने बदनाम कर दिया
सिक्कों की अंजुमन के खरीदार आ गये
सेठों के खादिमान-ए-वफादार आ गये
खद्दर पहन-पहन के बद-अवतार आ गये
दर पर सफेदपोश सियाह्कार आ गये
दुश्मन गये तो दोस्त बने दुश्मने-वतन
खिल-अत की तह खुली, तो बरामद हुआ कफ़न
बर्तानिया के खास गुलामान-ए-खानज़ाद
देते थे लाठियों से जो हुब्बे-वतन की दाद
एक-एक जबर जिनकी है अब तक सरों को याद
वो आई.सी.एस. अब भी हैं खुश्बख्तो-बामुराद
शैतान एक रात में इन्सान बन गये
जितने नमक हराम थे कप्तान बन गये
वहशत रवा, अनाद रवा, दुश्मनी रवा
हलचल रवा, खरोश रवा, सनसनी रवा
रिश्वत रवा, फसाद रवा,रहजनी रवा
अल-किस्सा हर वो शै की नाक़र्दनी रवा
इन्सान के लहू को पियो इज़ने-आम है
अंगूर की शराब का पीना हराम है
छाई हुई है ज़ेरे-फलक बदहवाशियाँ
आँखे उदास-उदास, तो मन हैं धुँआ धुँआ
मनके ढले हुए हैं तो ऐंठी हुई जबान
वो ज़ौफ़ है की मुँह से निकलती नहीं फुगाँ
एक-दूसरे की शक्ल तो पहचानते नहीं
मैं खुद हूँ कौन, ये भी कोई जानता नहीं
फुटपाथ, कारखाने, मिलें, खेत, भट्टियाँ
गिरते हुए दरख़्त, सुलगते हुए मकाँ
बुझते हुए यकीन. भड़कते हुए गुमाँ
इन सबसे उठ रहा है बगावत का फिर धुआँ
शोलों के पैकरों से लिपटने की देर है
आतिशफिशाँ पहाड़ के फटने की देर है
वो ताज़ा इंकिलाब हुआ आग पर सवार
वो सनसनाई आँच, वो उड़ने लगा शरार
वो गुम हुए पहाड़ वो गल्तन हुआ गुबार
ऐ बेखबर! वो आग लगी, आग, होशियार
बढ़ता हुआ फिजाँ ये कदम काढ़ता हुआ
भूचाल आ रहा है जो फुंकारता हुआ

एदुआर्दो गालेआनो की पुस्तक लातिन अमरीका के रिसते जख्म (एक महाद्वीप के लूट की पाँच सदियाँ) की प्रस्तावना

-इसाबेल अलेंदे
वर्षों पहले, जब मैं युवा थी और विश्वास करती थी कि दुनिया को बेहतरीन आकांक्षाओं और आशाओं के अनुरूप ढाला जा सकता है, उसी दौरान किसी ने मुझे पीले कवर की एक किताब पढ़ने के लिये दी थी- लातिन अमरीका के रिसते जख्म, लेखक- एदुआर्दो गालेआनो.मैंने भावनाओं के उमंग में डूब कर उसे दो ही दिन में खत्म कर दिया, लेकिन उसे पूरी तरह समझने के लिये मुझे उसे दो बार फिर पढ़ना पड़ा. 
  
1970 के दशक की शुरुआत में चिली उस प्रचंड तूफान से घिरे समुद्र में फँसा एक छोटा सा द्वीप था, इतिहास ने नक्शे पर एक बीमार दिल जैसा दिखनेवाले लातिन अमरीकी महाद्वीप को जिसमें धकेल दिया था. हम साल्वाडोर अलेंदे की समाजवादी सरकार के दौर से गुजर रहे थे, लोकतांत्रिक चुनावों के जरिये राष्ट्रपति बनने वाला पहला मार्क्सवादी, एक ऐसा व्यक्ति जिसके पास समता और स्वाधीनता का सपना था और उस सपने को हकीकत में बादलने का जोश था. तभी पीले कवर की उस किताब ने, यह साबित किया था कि हमारे क्षेत्र में कोई भी सुरक्षित द्वीप नहीं, हम सभी शोषण और उपनिवेशीकरण के 500 वर्षों के साझीदार थे, हम सभी एक ही समान नियति से बंधे हुए थे, हम सभी उत्पीड़ितों की एक ही प्रजाति से सम्बंध रखते थे. अगर मैं इस किताब के वास्तविक अर्थ को समझने में सक्षम होती, तो मैं यह निष्कर्ष निकाल सकती थी कि साल्वाडोर अलेंदे की सरकार शुरुआत से ही अभिशप्त थी. यह शीत युद्ध का काल था और अमेरिका, हेनरी किसिंजेर के शब्दों में “अपने घर के  पिछवाड़े” एक वामपंथी प्रयोग को सफल नहीं होने दे सकता था. क्यूबा की क्रांति ही काफी थी; कोई अन्य समाजवादी प्रयोग सहन नहीं किया जा सकता था, चाहे वह लोकतांत्रिक चुनाव का ही नतीजा क्यों न हो.

 11 सितंबर, 1973 को एक सैन्य तख्तापलट ने चिली में लोकतांत्रिक परंपरा की एक सदी का अंत कर दिया और जनरल औगुस्तो पिनोचे के लंबे शासन काल की शुरुआत की. इसी तरह के तख्तापलट दूसरे देशों में भी हुए और शीघ्र ही इस महाद्वीप की आधी से अधिक जनता आतंक के साये में जी रही थी. यह वाशिंगटन में तैयार की गयी तथा दक्षिणपंथियों की आर्थिक और राजनैतिक शक्ति के बल पर लातिन अमरीकी जनता के ऊपर थोपी गयी रणनीति थी. हर अवसर पर सेना ने विशेषाधिकार संपन्न सत्ताधारी गुटों के लिए भाड़े के सैनिकों की तरह काम किया. बड़े पैमाने पर दमन को संगठित किया गया; यातना, नजरबंदी कैंप, सेंसरशिप, बिना मुक़दमे के कारावास और बिना मुकदमे के मौत की सजा रोजमर्रे की घटनाएँ थीं. हजारों लोग “गायब हो गये”, जान बचाने के लिये भारी तादाद में निर्वासित लोगों और शरणार्थियों ने अपना देश छोड़ दिया. इस महाद्वीप ने जिन पुराने जख्मों को बर्दाश्त किये थे और जो अभी भरे भी नहीं थे, उनमें नए-नए जख्म और शामिल होते गये. इसी राजनैतिक पृष्ठभूमि में, दक्षिण अमेरिका के रिसते जख्म प्रकाशित हुई. इस किताब ने रातोरात एदुआर्दो गालेआनो को मशहूर कर दिया, हालाँकि वह पहले ही उरूग्वे के एक जाने-माने राजनैतिक पत्रकार थे. 
      
अपने सभी देशवासियों की तरह एदुआर्दो भी एक फुटबाल खिलाड़ी बनना चाहते थे. वह एक संत भी बनना चाहते थे, लेकिन जैसा कि बाद में हुआ, उन्होंने ढेर सारे पाप किये, उन्होंने एक बार इसे कबूल भी किया. “मैंने कभी किसी का क़त्ल नहीं किया, यह सच है, लेकिन महज इसलिये क्योंकि मेरे पास साहस और समय की कमी थी, इसलिये नहीं कि मुझमें इच्छा की कमी थी.” वह एक राजनैतिक पत्रिका मार्चा के लिये काम करते थे, अठाईस साल की उम्र में वे उरुग्वे के एक महत्वपूर्ण अखबार एपोचा के प्रबंधक बन गये. उन्होंने दक्षिणी अमेरिका के रिसते जख्म को, 1970 की आखिरी नब्बे रातों, यानी तीन महीने में लिखा, जबकि दिन के समय वे विश्वविद्यालय में किताबों, पत्रिकाओं और सूचनापत्रों का संपादन किया करते थे.

यह उरुग्वे का बहुत बुरा दौर था. हवाईजहाज और पानी के जहाज नौजवान लोगों से भर कर रवाना होते थे, जो अपने देश की गरीबी और घटिया जीवन-स्तर से बचकर भाग रहे होते थे, जिसने उन्हें बीस साल की उम्र में ही बूढा बना दिया था, और जहाँ मांस और ऊन से ज्यादा हिंसा की फसल उगती थी. एक सदी तक चलने वाले एक ग्रहण के बाद सेना ने तुपामारो गुरिल्लाओं से लड़ने के बहाने इस परिदृश्य पर हमला बोल दिया. उन्होंने आज़ादी की बलि चढ़ा दी और शासन के रहे सहे अधिकारों को भी छीन लिया, जो पहले ही नाम मात्र का नागरिक समाज रह गया था.

1973 के मध्य में सैन्य तख्तापलट हुआ, उन्हें जेल में डाल दिया गया, और उसके कुछ समय बाद ही वह अर्जेंटीना प्रवास पर चले गये, जहाँ उन्होंने क्राइसिसपत्रिका शुरू की. लेकिन 1976 में अर्जेंटीना में भी सैनिक तख्तापलट हो गया तथा बुद्धिजीवियों, वामपंथियों, पत्रकारों और कलाकारों के खिलाफ “कुत्सित लड़ाई” शुरू हो गयी. गालेआनो एक बार फिर प्रवास पर चले गये, इस बार वे अपनी पत्नी हेलेना विल्लाग्र के साथ स्पेन चले गये. स्पेन में उन्होंने संस्मरण पर एक खूबसूरत किताब, डेज एंड नाईटस् ऑफ लव एंड वार लिखी, और उसके कुछ समय पश्चात उन्होंने अमरीका की आत्मा के साथ एक वार्तालाप-सा शुरू किया; मेमोरिज ऑफ फायर, दक्षिणी अमेरिका के पूर्व-कोलम्बियाई युग से आधुनिक समय तक के इतिहास का एक विराट भितिचित्र. “मैंने ऐसी कल्पना की कि अमेरिका एक औरत है और वह मेरे कानों में अपने गुप्त किस्से कह रही है, प्यार और हिंसा के वे कृत्य जिन्होंने उसका निर्माण किया.” उन्होंने हाथ से लिखते हुए, आठ साल तक इन खंडों पर काम किया. “मैं समय बचाने में विशेष रूचि नहीं रखता, मैं उसका आनंद लेना पसंद करता हूँ.” अंततः १९८५ में, जब एक जनमत संग्रह ने उरुग्वे में सैनिक तानाशाही को पराजित कर दिया, तब गालेआनो अपने देश वापस लौट सके. उनका प्रवास ग्यारह साल तक चला, लेकिन उन्होंने खामोश रहना या अदृश्य रहना नहीं सीखा था; जैसे ही उन्होंने मोंटेवीडियो में कदम रखा, वे  उस कमज़ोर लोकतंत्र को जो सैनिक सरकार की जगह कायम हुआ था, उसे मजबूत बनाने में जुट गये. उन्होंने अधिकारी वर्ग का विरोध करना लगातार जारी रखा और तानाशाही के अपराधों की भर्तस्ना करने के लिये अपने जीवन को भी खतरे में डाला.

एदुआर्दो गालेआनो के कई कथासाहित्य और कविताओं के संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं; वह अनगिनत लेखों, साक्षात्कारों और व्याख्यानों के लेखक हैं; उन्होंने अपनी साहित्यिक प्रतिभा और राजनैतिक सक्रियता के लिये बहुत से पुरुस्कार, मानद उपाधियाँ और सम्मान हासिल किये हैं. वे लातिन अमरीका के, जो अपने महान साहित्यिक नामों के लिये जाना जाता है, सबसे दिलचस्प लेखकों में से एक हैं. उनका लेखन सतर्क विवरण, राजनैतिक मत, काव्यात्मक शैली और बेहतरीन किस्सागोई के लिये जाना जाता है. वह गरीबों और उत्पीडितों की, और साथ ही नेताओं और बुद्धिजीवियों की आवाज सुनने के लिये लातिन अमेरिका के एक छोर से दूसरे छोर तक घूमे. वह अमेरिका के मूलनिवासियों, किसानों, गुरिल्लाओं, सैनिकों, कलाकारों और अपराधियों के साथ रहे; उन्होंने राष्ट्रपतियों, अत्याचारियों, शहीदों, नायकों, डाकुओं, निराश माताओं और बीमार वेश्याओं से बातचीत की. उन्होंने तेज ज्वर सहे, वे जंगलों में पैदल चले और एक बार जबरदस्त दिल के दौरे से बाल-बाल बचे; उन्हें दमनकारी शासन और कट्टर आतंकवादियों ने प्रताड़ित किया. मानव अधिकारों की रक्षा के लिये उन्होने अकल्पनीय जोखिम उठाते हुए सैन्य तानाशाही और हर प्रकार की क्रूरता और शोषण का विरोध किया. लातिन अमेरिका के बारे में उनका प्रत्यक्ष ज्ञान मेरी जानकारी में किसी भी अन्य व्यक्ति से कहीं ज्यादा है और वे इसका इस्तेमाल पूरी दुनिया को अपनी जनता के सपनों और भ्रमों, आशाओं और असफलताओं को बताने के लिये करते हैं. वे लेखन प्रतिभा, दयालु ह्रदय, और सुलभ मनोविनोद से भरपूर एक जांबाज़ हैं. “हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जो जिन्दा लोगों के बजाय मृत लोगों से अच्छा व्यवहार करती है. हम जो जिन्दा हैं, वे सवाल करते हैं और जवाब देते हैं, और हमारे अंदर और भी बहुत से अक्षम्य दोष हैं, उस व्यवस्था की निगाह में जो मानती है कि पैसे की तरह ही मौत भी जनता की जिन्दगी को बेहतर बनाती है.”

किस्सागोई में उनकी निपुणता और साथ ही दूसरी सभी प्रतिभाएं, उनकी पहली किताब दक्षिणी अमेरिका के रिसते जख्म में स्पष्ट दिखाई देती हैं. मैं एदुआर्दो गालेआनो को व्यक्तिगत तौर पर जानती हूँ; वह बिना किसी सचेत प्रयास के, अनिश्चित काल तक कहानियों की कभी न खत्म होने वाली कड़ियाँ पिरो सकते हैं. एक बार हम क्यूबा के समुद्रतट के पास एक होटल में थे, जहाँ यातायात का कोई साधन नहीं था और कमरा भी वातानुकूलित नहीं था. कई दिनों तक पीना कोलाडा (रम, नारियल की मलाई और अन्नानास के जूस को मिलाकर बनाया गया एक पेय पदार्थ – अनुवादक) की चुस्की लेते हुए वे अपनी अद्भुत कहानियों से मेरा मनोरंजन करते रहे. किस्सागोई की यह अलौकिक प्रतिभा दक्षिणी अमेरिका के रिसते जख्म को पठनीय बनाती है– जैसा कि एक बार उन्होने कहा था– समुद्री डाकुओं के बारे में एक उपन्यास, उन लोगों के लिये भी रुचिकर है जो आर्थिक-राजनैतिक मामलों में विशेष जानकारी नहीं रखते हैं. किताब किसी अफसाने की तरह एक लय में आगे बढती है; इसे बिना पूरा खत्म किये रखना संभव नहीं है. उनके तर्क, उनका क्रोध, और उनका जोश अभिभूत कर देने वाला नहीं हो पाता, अगर यह सब इतनी शानदार शैली में, इतने कुशल समयानुपात और कौतुहल के साथ व्यक्त न किया गया होता. गालेआनो शोषण की अनम्य प्रचंडता के साथ भर्त्सना करते हैं, फिर भी यह किताब एक सबसे निकृष्टतम लूट के दौर में लोगों की एकजुटता और जिजीविषा को काव्यात्मक शैली में प्रस्तुत करती है. गालेआनो की किस्सागोई में एक रहस्यमयी क्षमता है. पाठक को पढ़ने के लिये उकसाने और उसे अंत तक लगातार पढते रहने पर राजी करने के लिये वे अपने इस कौशल का जाम कर इस्तेमाल करते हैं, और पाठक के दिमाग के निजी कोने में घुसपैठ करके उसे अपनी रचना के आकर्षण और अपने आदर्शों की ताकत के सामने समर्पण के लिये मजबूर कर देते हैं.

अपनी पुस्तक बुक ऑफ एम्ब्रासेज में, एदुआर्दो ने एक कहानी कही है जो मुझे बेहद पसंद है. मेरे लिये यह आम तौर पर लेखन का, और खास तौर पर खुद उनके लेखन का एक शानदार रूपक है.

एक बूढा और अकेला आदमी था जिसने अपना अधिकांश समय बिस्तर पर ही बिताया. उसके बारे में अफवाह थी कि उसने अपने घर में एक खज़ाना छुपा रखा है. एक दिन कुछ चोर उसके घर में घुस गये. उन्होने हर तरफ तलाश किया और उन्हें तहखाने में एक संदूक मिला. वे उसे उठाकर ले गये और जब उन्होने उसे खोला तो पाया कि वह चिट्ठियों से भरा हुआ था. वे प्रेमपत्र थे जो उस बूढ़े आदमी को पूरे जीवन के दौरान प्राप्त हुए थे. चोर उन पत्रों को जलाने वाले थे, लेकिन उन्होने इस बारे में बात की और आख़िरकार उन्हें वापस करने का फैसला लिया. एक-एक करके. हर हफ्ते एक पत्र. उसके बाद हर सोमवार की दोपहर वह बूढा आदमी डाकिये के आने की प्रतीक्षा करता. जैसे ही वह उसे आते देखता, वह दौड़ना शुरु कर देता और डाकिया, जिसे  सब कुछ पता था, अपने हाथ से एक चिठ्ठी उसकी तरफ बढ़ा देता. और संत पीटर भी, एक औरत का सन्देश पाकर खुशी से धडकते उसके दिल की आवाज सुन सकते थे.

क्या यह साहित्य का दिलचस्प नमूना नहीं है? एक घटना जिसे काव्यमय सत्य से रूपांतरित किया गया है. लेखक उन्हीं चोरों की तरह होते हैं, वे कुछ ऐसी चीज लेते हैं जो वास्तविक होती है, जैसे की चिट्ठियां, और उसे जादू की तरकीब से एक ऐसी चीज़ में तब्दील कर देते हैं जो एकदम ताज़ा हो. गालेआनो की कहानी में चिट्ठियां पहले से अस्तित्व में हैं और वे सबसे पहले उस बूढे आदमी की हैं, परन्तु वह एक अंधेरे तहखाने में बिना पढ़े ही पड़ी हुई हैं, वे मृतप्राय हैं. उन्हें एक-एक करके डाक से वापस भेजने की साधारण सी तरकीब से उन चोरों ने चिट्ठियों को एक नया जीवन और उस बूढे आदमी को एक नया भरम दे दिया. मेरे लिये गालेआनो के लेखन में यह प्रशंसनीय है: छुपे हुए खजानों को ढूँढ निकलना, भूली-बिसरी घटनाओं को नयी जीवंतता प्रदान करना, और अपने उग्र जोश के जरिये थकी हुई आत्माओं में नई जान डाल देना.

चीजें जैसी दिखायी देती हैं उससे आगे बढ़कर, लातिन अमरीका के रिसते जख्मउनकी छानबीन का निमंत्रण देती है. इस तरह की महान साहित्यिक रचना लोगों की चेतना को झकझोरती हैं, उन्हें एकजुट करती हैं, व्याख्या करती हैं, समझाती हैं, भर्त्सना करती हैं, और उन्हें परिवर्तन के लिये उकसाती हैं. एदुआर्दो गालेआनो का एक ओर पक्ष है जो मुझे बेहद आकर्षित करता है. यह व्यक्ति जिसे इतनी ज्यादा जानकारी है और जिसने सूत्रों और संकेतों का अध्ययन करके जिस तरह की भविष्यवाणी का बोध विकसित किया है, वह  आशावादी है. मेमोरिज ऑफ फायर के तीसरे खंड, सेंचुरी ऑफ विंड  में ६०० पेज तक लातिन अमरीका के लोगों के साथ किये गये नरसंहार, क्रूरता, दुर्व्यवहार, और शोषण को साबित करने के बाद तथा वह सबकुछ जो चुरा लिया गया है और जिसका चुराया जाना निरंतर जारी है, इसका धैर्यपूर्वक वर्णन करने के बाद अंत में, वे लिखते हैं-  

जीवन का वृक्ष जानता है कि चाहे कुछ भी हो जाये, उसके इर्दगिर्द नाचने वाला जोशीला संगीत कभी नहीं थमता. कितनी ही मौत क्यों न आये, कितना ही खून क्यों न बह जाये, यह संगीत आदमियों और औरतों को नृत्य कराता रहेगा तब तक जब तक हवा उनकी सांस चलाती रहेगी, खेत जुतते रहेंगे और उन्हें प्यार करते रहेंगे.  

उम्मीद की यह किरण ही है जो मुझे गालेआनो के लेखन में सबसे ज्यादा प्रेरणास्पद लगती है. इस महाद्वीप में फैले हुए हजारों शरणार्थीयों की तरह, मुझे भी 1973 के सैन्य तख्तापलट के बाद अपना देश छोड़ कर जाना पड़ा. मैं अपने साथ कुछ ज्यादा नहीं ले सकी- कुछ कपड़े, पारिवारिक चित्र, एक छोटे से बैग में अपने आँगन की थोड़ी सी मिट्टी, और दो किताबें- पाब्लो नरूदा की ओडेस का एक पुराना संस्करण और पीली कवर वाली किताब दक्षिणी अमेरिका के रिसते जख्म. बीस साल से ज्यादा बीतने के बाद भी वह किताब आज भी मेरे पास है. इसीलिये मैं इस किताब की प्रस्तावना लिखने और एदुआर्दो गालेआनो को उनके स्वतंत्रता के प्रति आश्चर्यजनक प्रेम के लिये तथा एक लेखक और दक्षिणी अमेरिका के नागरिक के तौर पर मेरी जागरूकता में योगदान के लिये सार्वजानिक रूप से धन्यवाद देने से मैं खुद को रोंक नहीं पायी. जैसा कि उन्होंने एक बार कहा था- “उन चीज़ों के लिये मरना उचित है जिनके बगैर जीना उचित नहीं.”

(अनुवाद- दिनेश पोसवाल) 

एदुआर्दो गालेआनो की विश्वप्रसिद्ध पुस्तक ओपन वेन्स ऑफ लातिन अमरीका  का हिंदी अनुवाद जल्दी ही गार्गी प्रकाशन से छपने वाला है. यहाँ उसका प्राक्कथन पोस्ट किया जा रहा है जिस पर सुधी पाठकों की राय और आलोचनाएँ आमंत्रित हैं.

मार्खेज़ को डिमेंशिया हो गया है -अंशु मालवीय


(अब से ठीक एक महीना पहले मार्खेज़ के भाई के मार्फ़त यह खबर मिली थी कि एकांत के सौ बर्ष जैसे उपन्यास के कालजयी लेखक गेब्रियल गार्सिया मार्खेज़ स्मृतिलोप के शिकार हैं. इसने दुनिया भर में मार्खेज़ के प्रशंसकों को बेचैन कर दिया था. अंशु की यह कविता उसी बेचैनी, उसी छटपटाहट से जन्मी है और हमारे समय को अपने आगोश में लेती जा रही विश्वव्यापी डिमेन्शिया के व्यापक आयाम से रूबरू कराती है.)


मार्खेज़ को डिमेंशिया हो गया है.

जीवन की उत्ताल तरंगों के बीच गिर-गिर पड़ते हैं
स्मृति की नौका से बिछल-बिछलकर;
फिर भरसक-भरजाँगर
कोशिश कर बमुश्किल तमाम
चढ़ पाते हैं नौका पर,
उखड़ती साँसों की बारीक डोर थाम.
जिसे इंसानियत का सत्व मानते हैं वह
वही स्मृति साथ छोड़ रही है उनका
विस्मृति के महाप्रलय में
निरुपाय-निहत्था है हमारा स्मृतियोद्धा अब.
सामूहिक स्मृतिलोप के शिकार
माकोंडो गाँव के निवासियों की तरह
चलो हम उनके लिए चीजों पर उनके नाम लिख दें-
देखो ये बिक चुकी नदी है
ये नीलाम हो चुके पर्वत
अपने अस्तित्व ही नहीं
हमारी यादों के भी कगार पर जी रहे पंछी
ये हैं अवैध घोषित हो चुकी नस्लें
ये हैं हमारे गणराज्य
बनाना रिपब्लिक के संवैधानिक संस्करण
ये है तुम्हारा वाइन का गिलास
ये कलम, ये कागज और ये तुम हो
हमारे खिलंदड़े लेखक गेब्रिएल गार्सिया मार्खेज़ !
ये यादें ही तो हैं
जिन्होंने नाचना और गाना सिखाया
सिखाया बोलना और चलना
सिखाया जीना और बदला लेना,
लामकाँ में घर बनाना सिखाया 
हमारे विस्थापित मनों को
हमें और किसी का भरोसा नहीं स्मृति यात्री !
धर्म ने हमारा सत्वहरण कर लिया
विज्ञान ने तानाशाहियों की दलाली की
विचारधाराओं ने राष्ट्रों के लिए मुखबिरी की
इतिहास ने हमारी परछाइयाँ बुहार दीं
हमें यादों का ही भरोसा है,
अब वह भी छिनी जाती है
बगैर किसी मुआवजे के हमारी जमीनों जैसी.
यादें जमीन हैं
          आसमान के बंजरपन को
          अनन्तकाल से कोसती हुई.
हमारी नाल कहाँ गड़ी है ?
माँ जैसे लोरी सुनाने वाले सनकी बूढ़े !
कब से यूँ ही विचर रहे हो धरती पर
हमारे प्रसव के लिए पानी गुनगुना करते,
थरथराते हाथों से दिए की लौ पकड़े हुए स्मृति धाय !
हमारी नाल कहाँ गड़ी है?
कैसी हैं हमारी विच्छिन्न वल्दीयतें !
कैसे हैं इंसानियत के नकूश !
हमारे गर्भस्वप्न कैसे हैं ?
किन तितलियों के पंखों में छुपे हैं
हमारे दोस्त फूलों के पुष्प पराग … !
किससे पूछें
        तुमसे तो खुद जुदा हो चली हैं स्मृतियाँ     
                          स्मृति नागरिक !
मछलियों की रुपहली पीठों पर ध्यान लगाये
पानी के ऊपर ठहरे जलपाखियों की एकाग्र साधना से पूछें,
पूछें पानी से सट कर उड़ते बगुलों की पंख समीरन से,
जमुना के गंदले पानी में टूटकर बिखरे
सूरज की किरचों से पूछें,
पूछें मरीचिका के संधान में मिथक बनते मृगों से,
डेल्टावनों की सांघातिक मक्खियों से पूछें
या पूछें अभयारण्यों में खाल के व्यापारियों से
अभय की भीख माँगते बाघों से,
अपने खेत में अपने पोसे हुए पेड़ की डाल से ख़ुदकुशी करते
किसान के अँगोछे की गाँठ से पूछें,
या बंद कारखाने के अकल्पनीय अकेले चौकीदार से पूछें,
फ्लाई ओवर के नीचे गड़गड़ाहट से उचटी नींदों से पूछें
या पूछें सीवर से निकलती कार्बन मोनो औक्साइड से
किस उपनिषद – किस दर्शन के पास जवाब है इन सवालों का
सिवाय यायावर यादों की एक तवील यात्रा के
हमें हमारी गड़ी हुई नालों के स्वप्न क्यूँ आते हैं ?
                               हमारे ज्ञानी ओझा !
हम सब डिमेन्शिया में जा रहे हैं मार्खेज़ !
अपने उचटे हुए हाल और बेदखल माज़ी के बीच झूलते
किसी और का मुस्तकबिल जीने को अभिशप्त;
ये किन अनुष्ठानों का अभिशाप है ?
कि शब्द अपने अर्थ भूलते जा रहे हैं
भूलती जा रही हैं सांसें अपनी लय
खिलौने सियासत करने लगे हैं
साज लड़ने लगे हैं जंग
जिस्मफरोशी कर रही हैं रोटियाँ
           और हम हथियारों का तकिया लगाने को मजबूर हैं !   
हम सब डिमेन्शिया में जा रहे हैं मार्खेज़
और हम इसे अलग-अलग नामों से पुकार रहे हैं
विकास, तरक्की, साझा भविष्य … या
या इतिहास गति की वैज्ञानिक नियति ?
विज्ञान         और        नियति
                    माई गुडनेस !
मार्खेज़ तुम्हें डिमेन्शिया हो गया है और
इससे पहले कि यादों से पूरी तरह वतन बदर हो जाओ
एक बार जरुर हमारे लिए चीजों पर नाम की चिप्पियाँ लगाना
                             मसलन-
                             ये हैं यादें
                             ये है आज़ादी और
                             ये है लड़ना
                                 यादों के छोर तक लड़ना !

अंशु मालवीय

हिबाकुशा

(नागाशाकी और हिरोशिमा पर अमरीका द्वारा परमाणु बम गिराये जाने के बाद उस विभीषिका में बच गये, यंत्रणा और वेदना की जिन्दगी जी रहे लोगों को हिबाकुशा कहा गया. व्यापकता में इसका प्रयोग परमाणु खतरे के अर्थ में भी किया जाता है. पेन्टिंग फ़्रांसिसी चित्रकार –Stéphane Chabrières)


एक हिबाकुशा फ़ैल रहा है

हमारे चारों और
यादों में धधक रहा है लाल-लाल
चार हजार डिग्री सेल्सियस
तापमान का लावा.

एक बंद अधजली
सवा आठ बजा रही घड़ी
वक्त के ठहर जाने का
डरावना संकेत कर रही है.

कौंध रही है छवि –
माँ की छाती से लिपटा
दुधमुहाँ बच्चा
पलक झपकते ही
पहले अंगारा, फिर चारकोल में
बदल गए दोनों.

आँखों में नाचते हैं
उद्ध्वस्त शहर
जो पल भर में
बदल गए शमशान में.

असंख्य झुलसे हुए
औरत-मर्द-बच्चे
छलांग लगाते रहे
एक के ऊपर एक
और देखते ही देखते नदी
पट गयी लाशों से.

एक लाख चालीस हजार मौत
और दो लाख छियासठ हजार
हिबाकुशा- बच गए जो
यंत्रणा और वेदना में
तिल-तिल जीने मरने को.

2

पसर रहा है हमारी आँखों के आगे
हिबाकुशा हमारे चारों ओर
नागाशाकी, हिरोशिमा, फुकुसिमा.

यह दौर है हिबाकुशा
कि डालर महाप्रभु के
सुझाये मार्ग से इतर
विकास के दूसरे रास्तों की
चर्चा भी देशद्रोह है.

अक्षय ऊर्जा स्रोतों के
सुलभ-सुरक्षित उपाय
दबा दिए गए हैं
नाभिकीय कचरे की ढेर में.

विनाशलीला की बुनियाद पड़ रही है
विकास का परचम लहराते हुए.

विध्वंसक युद्ध की नहीं
समझौतों की शांतिमयी भाषा
दुरभिसंधि के दुर्बोध, जटिल वाक्यों
और संविधान की पुरपेंच धाराओं से
गूंगा किये जाते हैं
प्रतिरोध के स्वर.

विदेशी हमलावर नहीं,
जीवन-जीविका-जमीन की हिफाजत में
उठे जनज्वार को रौंदते हैं
स्वदेशी फौजी बूट.

विदेशी आक्रांताओं ने बदल लिये हैं
अपने पुराने कूटनीतिक पैंतरे.

बाइबिल और बंदूक की जगह
ब्रेटन वुड साहूकारों की हुंडी
और इकरारनामे का मसौदा है
गुलामी का नया मन्त्र.

यह दौर है हिबाकुशा
कि नाभिकीय तबाही के व्यापारी
मौत के सौदागरों और
जयचंदों – मीर जाफरों के बीच
होती हैं सद्भावपूर्ण गुप्त वार्ताएं
और देश के कई इलाके
बदल जाते हैं फौजी छावनी में.

एक फरमान जारी होता है
और देखते-देखते
एक हँसती खिलखिलाती
जिंदगी से भरपूर सभ्यता
खँडहर में बदल जाती है.

जब दुनिया भर में तेज है
हिबाकुशा के खिलाफ संघर्ष
तो पनाह ले रहे हैं हमारी धरती पर
थ्री माइल्स वैली, चर्नोबिल और फुकुसिमा
जैतापुर, कुडानकुलम, गोरखपुर में.

किसी नादिर शाह की बर्बर फ़ौज नहीं
किसी चंगेज किसी तैमूर
किसी अशोक किसी सिकंदर की
जरुरत ही क्या है भला.

तबाही के लिए काफी हैं
विकास का अलम लिए
कत्लोगारत पर आमादा
हिबाकुशा के रक्तपिपासु पूजक
हमारे जन प्रतिनिधि.
(-दिगम्बर)

 

 

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