दुनिया पर 1318 कम्पनियों का कब्जा

वाल स्ट्रीट पर कब्जा करोआंदोलन ने अपना निशाना एक प्रतित बहुराष्ट्रीय निगमों को बनाया था। उनके नारे, निशाना और नजरिया कितने सही हैइसका अंदाजा हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन से लगा सकते हैं।

जूरिख स्थित इंस्टिच्यूट ऑफ टेकनोलोजी की तीन सदस्यीय टीम ने एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में उन्होंने दुनिया भर की कुल 3.7 करोड़ कम्पनियों और निवेकों में से 3060 को छाँटकर अध्ययन का ब्योरा दिया है। जटिल गणतीय मॉडल से यह अध्ययन किया गया जिसमें इस बात को स्पष्ट किया गया है कि कैसे ये कम्पनियाँ अन्य कम्पनियों के शेयर खरीदकर उसमें साझेदारी करती हैं और किस तरह केवल 1318 कम्पनियों के एक गिरोह ने दुनिया की 60 प्रतित आमदनी पर मालिकाना कायम कर लिया है। इससे भी आगे इस रिपोर्ट ने आपस में गुँथी हुई 147 कम्पनियों के एक महा-गिरोह का भी पता लगाया है जिसका ऊपर बताये गये गिरोह की कुल सम्पत्ति में से 40 प्रतित पर कब्जा है। इन मुट्ठीभर कम्पनियों में बर्कले बैंक, जेपी मॉर्गन चेज एण्ड कम्पनी और गोल्डमैन सैक्स जैसे ज्यादातर बैंक शामिल है। लन्दन विश्वविद्यालय में बृहद अर्थशास्त्र के एक विशेषज्ञ का कहना है कि इस विश्लेषण का महत्त्व केवल इतना ही नहीं है कि इसने मुट्ठीभर लोगों द्वारा अर्थव्यवस्था पर कब्जा जमाये जाने को उजागर कर दिया है, बल्कि यह विश्व-अर्थव्यवस्था के टिकाऊपन के बारे में हमारी जानकारी भी बढ़ाता है।
जूरिख टीम के अनुसार कम्पनियों की ऐसी गिरोहबंदी एक विकट समस्या बन गयी है। इस गिरोहबंदी में अगर कोई एक कम्पनी डूबती है तो उससे जुड़ी तमाम कम्पनियों की अर्थव्यवस्था भरभराकर गिरने लगती है। नतीजतन पुरे विश्व की अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त हो जाती है। अमरीका में 2008 के संकट तथा अन्य संकटों ने इस बात को सही ठहराया है। जूरिख टीम का मानना हैं कि भले ही इस महा-गिरोह का जन्म सहज तरीके से हुआ हो, लेकिन विभिन्न देशों की राजनीतिक सत्ता पर इस महा-गिरोह का दबदबा कायम है।
जाहिर हैं कि विश्व-अर्थव्यवस्था पर अपने दबदबे से इस महा-गिरोह को असीम क्ति हासिल हुई है। उसके चलते इनको बेलगाम ताकत मिला है। इस बेलगाम ताकत तथा पूँजी संचय और मुनाफाखोरी की इनकी घृणित बीमारी ने इनको इतना क्रूर और निष्ठुर बना दिया है। कि किसी दे की अर्थव्यवस्था को चुटकियों में तबाह कर देना या लाखों लोगों का कत्लेआम करवाना इनके लिए आम बात हो गयी है। अपफगानिस्तान, इराक और लीबिया की तबाही इसके जीवंत उदाहरण हैं। ईरान पर हमले के लिए लगातार उकसावा भी इसी की मिसाल है।
आज जबकि यह पूरी तरह सापफ हो गया है कि हमारी धरती 99 प्रतित आम मेहनतक जनता और एक प्रतित धनाढ्यों के दो खेमों में बँट चुकी है और दुनिया की ज्यादातर मुसीबतें चाहे सामाजिक-आर्थिक संकट हो या जलवायु संकट, इन सबके पीछे इसी एक प्रतित लुटेरों का हाथ है। इसलिए पूरी मानवता और अपनी धरती को बचाने के लिए हर हालत में इन एक प्रतित के खिलाफ हम 99 प्रतित को एकजुट होकर इन्हें परास्त करना होगा। निश्चय ही यह ऐतिहासिक जिम्मेदारी बहुत ही चुनौती भरा है। उन्नत चेतना और मजबूत संगठन के बल पर ही यह कार्यभार पूरा किया जा सकता है।

(देश-विदेश अंक-१३ में प्रकाशित)

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टिप्पणियाँ

  • vikram  On अप्रैल 12, 2012 at 8:51 पूर्वाह्न

    दिमाग को झकझोर देने वाला आंकड़ा है..किस तरह केवल 1318 कम्पनियों के एक गिरोह ने दुनिया की 60 प्रतिशत आमदनी पर मालिकाना कायम कर लिया है।

  • माधोदास उदासीन  On अप्रैल 24, 2012 at 10:51 पूर्वाह्न

    बेहतरीन जानकारी

  • Vikram Meena  On अप्रैल 24, 2012 at 10:55 पूर्वाह्न

    बहुत ही खूबसूरत……. वाह !!!

  • Vikram Meena  On अप्रैल 24, 2012 at 10:55 पूर्वाह्न

    बहुत ही खूबसूरत……. वाह !!!

  • Shamshad Elahee "Shams"  On जून 8, 2012 at 10:52 अपराह्न

    Very important article… The same facts are being used by religious forces too. From freemasonry/ illuminati/ Imam etc are interpreting this phenomenon according to their own class interest. This situation could only be defined by Marxist canons thus only communist can fight against this oppressive system thru out the world in order to establish socialism. We have to take care of religious forces at the same time, particularly political Islam.

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