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मजदूरों का अपना त्यौहार


(मई दिवस का यह गीत वाल्टर क्रेन ने 1894 में लिखा था.)










दुनिया के मजदूरो, सारे बंधन तोड़ के,
इस दिन अपने सभी काम ठप्प करो,
जाड़े की ठिठुरन को छोड़ते हुए पीछे,
आगे बढ़ो प्रसन्न सूरज कि गर्मी में.
एक बार फिर, जब हमारी हरी-भरी धरती,
उल्लसित है मई की कलियों और फूलों के बीच,
उमंग और उत्साह से गूंजने दो समवेत स्वर,
मनाओ विश्व मजदूर दिवस का अपना त्यौहार.
लहराने दो हवाओं को दुनिया भर में,
संघर्ष और आशा के सन्देश लिए झंडे,
फूल-मालाओं से सजी मई दिवस पताका,
फ़ैलाए दूर-दूर तक अपना सन्देश.
अंकित है हर लहराती पट्टी पर,
धड़कती मुक्ति के निर्मल ह्रदय से,
भले ही दूर है अभी हमारा राज,
आएगा सबके एकजुट प्रयास से ही.
 तुम्हारा लक्ष्य सकल विश्व की आशा है,
तुम्हारे संघर्ष में हैं मानव जाति की उम्मीदें,
मजदूरों की आज़ादी का लहराता झंडा,
उज्ज्वल भविष्य की दुल्हन का घूँघट है.
चाहे अधिक या थोड़े, एकजुट हैं जो साथी,
आज वे खुल कर दें अपना सन्देश,
बसंत के सभी पंछी एक समान पंखों वाले,
गाएँ मिलकर मई दिवस का गीत.
नवजीवन यदि अभी तक नहीं है सामने,
सुनाई दे रही है इसकी आहट,
जगती है नई उम्मीद खुद ब खुद,
जैसे समुद्र तट पर आती हैं लहरें.
मजबूती से डटे रहो अपनी जगह,
कायम करो प्रबल एकता अपनी,
जोड़ो अपने हाथों की विश्वव्यापी कड़ी,
चाहते हो अगर अपनी आशा का प्रतिदान.
जब दुनिया के सभी मजदूर, भाई-बहन,
मिल कर रचेंगे, आनेवाले समय में,
जीवन का सुखद आवास- दूसरोंके लिए नहीं,
क्योंकि धरती और खुशहाली होगी सबकी.
– वाल्टर क्रेन (मजदूरों की मई-पताका)
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हमारा नायक : वाल्टर बेंजामिन

-एलिफ शफक

(शब्दों  के कीमियागर :निबंधकार और आलोचक वाल्टर बेंजामिन )

जब मैं कॉलेज में पढ़ती थी, तभी मैंने वाल्टर बेंजामिन को पढना शुरू किया. साहित्य समीक्षक, दार्शनिक, निबंधकार, एक शब्द-शिल्पी थे. एक जर्मन यहूदी के रूप में उनका जन्म उथलपुथल भरे दौर में, 19 वीं सदी के अंतिम दिनों में, एक बेहद खतरनाक जगह, बर्लिन में हुआ था.


हालाँकि अपने जीवनकाल में उनको जानने वाले पाठकों-श्रोताओं की संख्या बहुत ही सीमित थी, लेकिन मृत्यु के बाद उनकी ख्याति आसमान छूने लगी. मुझे याद है कि उनकी किताब- आर्केड प्रोजेक्ट (तोरणपथ की परियोजना) के तुर्की संस्करण का मैंने कितनी बेकरारी से इंतजार किया था. उस किताब ने मेरे पिट्ठू बैग में मेरे साथ हर जगह सफर किया, उसके पन्नों के फटे किनारे, उन पर सिगरेट से जलने के छींटे और कॉफी के धब्बे, और एक बार रौक संगीत समारोह के दौरान वह बारिश में भींग भी गयी. उस साल मैंने काल्पनिक और गैर-काल्पनिक, जितनी भी किताबें पढीं, उनमें कोई भी इतनी धज्जी-धज्जी, इतनी गहराई तक दिल को छूने वाली नहीं थी.
  
बेंजामिन एक तरह के कीमियागर थे, मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों में सबसे असाधारण, सबसे अलग. उन्होंने साहित्य को दर्शन के साथ, धर्म द्वारा उठाये गए सवालों को धर्मनिरपेक्षता के साथ, बामपंथी विरोध को रहस्यवाद के साथ, जर्मन आदर्शवाद को ऐ पर चलना, खंडहरों के भीतर से आने वाली जिंदगी के किसी संकेत को सुनना है. उदासी उनके अस्तित्व के आतंरिक भाग का गठन करती है. एक शाम एक शून्यवादी पुरुष दोस्त पी के बहकने लगा और दीवार पर टंगी बेंजामिन की तस्वीर के आगे चिल्लाने लगा- “मुस्कुराओ मिस्टर बेंजामिन! दुनिया को अपने कंधों पर ढोने की कोई जरुरत नहीं. अब तुम मर चुके हो, विश्राम करो!” फिर उसने अपनी शराब का गिलास उनके ऊपर दे मारा, जिसे शायद वह मेरी ओर फेंकने वाला था. मैंने सारी गन्दगी साबुन से साफ की, लेकिन बेंजामिन के चश्मे पर एक लाल धब्बा रह गया और उनकी तस्वीर ऐसी लगने लगी मानो वे हर चीज को लाल शीशे के जरिये देखना चाहते हों.

भगवान, प्रगति, सभ्यता, कोई चीज नहीं थी जिस पर वे संदेह न करते हों, यहाँ तक कि खुद अपने आप पर भी. विराट बौद्धिकता के धनी होते हुए भी वे बहुत ही सीधे-सरल और उद्विग्न थे. यहूदी रहस्यवाद के सिरमौर जेर्सोम स्कोलेम सोचते थे कि बेंजामिन एक अत्यंत विशिष्ट आत्मा थे, लेकिन वे उन वामपंथियों के खेमे में क्यों शामिल हो गए? ब्रेख्त के मन में उनके लिए अपार श्रद्धा थी, लेकिन वे समझ नहीं पाये कि वे रहस्यवादियों के इर्दगिर्द क्या करते हैं. और दो दुनिया के बीच, उन लोगों की भाषा का अनुवाद करते हुए जो कभी एक भाषा नहीं बोल सकते, बेंजामिन आपनी राय पर कातिहासिक भौतिकवाद के साथ, निराशा को रचनाशीलता के साथ घुला-मिला दिया…. गेटे, फ्रौस्ट, काफ्का और बौदेलेयर के बारे में वे विशेषज्ञ थे, लेकिन उन्होंने जीवन की छोटी-छोटी और साधारण चीजों पर भी काफी बिस्तार से लिखा. वे गजदंती मीनारों के दार्शनिक नहीं थे. ज्यों-ज्यों आप उनको पढते जाते, अमूमन  आप उन्हें सडकों पर भटकते, लोगों की बातें सुनते, नोट करते, चित्र बनाते, निरंतर जानकारी इकठ्ठा करते हुए पाते हैं.
कोई पाठक उन्हें अच्छा लगने के लिए नहीं पढता. वह महसूस करने के लिए पढता है. उनके संसार में कोई भी चीज जैसी दिखती है वैसी नहीं. उनके यहाँ सतह से आगे जाने और मानवता से जुडने की तीव्र आवश्यकता है. उनकी नजर में जिंदगी जीना मलवे के ढेर पर चलना, खंडहरों के भीतर से आने वाली जिंदगी के किसी संकेत को सुनना है. उदासी उनके अस्तित्व के आतंरिक भाग का गठन करती है. एक शाम एक शून्यवादी पुरुष दोस्त पी के बहकने लगा और दीवार पर टंगी बेंजामिन की तस्वीर के आगे चिल्लाने लगा- “मुस्कुराओ मिस्टर बेंजामिन! दुनिया को अपने कंधों पर ढोने की कोई जरुरत नहीं. अब तुम मर चुके हो, विश्राम करो!” फिर उसने अपनी शराब का गिलास उनके ऊपर दे मारा, जिसे शायद वह मेरी ओर फेंकने वाला था. मैंने सारी गन्दगी साबुन से साफ की, लेकिन बेंजामिन के चश्मे पर एक लाल धब्बा रह गया और उनकी तस्वीर ऐसी लगने लगी मानो वे हर चीज को लाल शीशे के जरिये देखना चाहते हों.

भगवान, प्रगति, सभ्यता, कोई चीज नहीं थी जिस पर वे संदेह न करते हों, यहाँ तक कि खुद अपने आप पर भी. विराट बौद्धिकता के धनी होते हुए भी वे बहुत ही सीधे-सरल और उद्विग्न थे. यहूदी रहस्यवाद के सिरमौर जेर्सोम स्कोलेम सोचते थे कि बेंजामिन एक अत्यंत विशिष्ट आत्मा थे, लेकिन वे उन वामपंथियों के खेमे में क्यों शामिल हो गए? ब्रेख्त के मन में उनके लिए अपार श्रद्धा थी, लेकिन वे समझ नहीं पाये कि वे रहस्यवादियों के इर्दगिर्द क्या करते हैं. और दो दुनिया के बीच, उन लोगों की भाषा का अनुवाद करते हुए जो कभी एक भाषा नहीं बोल सकते, बेंजामिन आपनी राय पर कायम रहे, अपने अकेलेपन में भी खूबसूरत.

जब नाजियों ने अपनी सत्ता मजबूती से कायम कर ली और इंसानियत का सामना, विवेक के बदले पागलपन, सद्भावना के बदले कट्टरता से हुआ, तब जो आदमी अपने पुस्तकालय से अलग रह कर जी नहीं पता था, अपना वतन छोड़ना पड़ा. यूरोप के एक छोर से दूसरे छोर तक की यात्रा खतरों से भरी थी. 26 सितम्बर 1940 को, फ़्रांस-स्पेन सरहद पर बीजा मिलने का इंतजार करते हुए उन्होंने आत्महत्या कर ली. अचानक उन्होंने और इंतजार न करने, और अधिक शक न करने का फैसला ले लिया.

(द गार्जियन में 27 अप्रैल 2012 को प्रकाशित ख्यातिलब्ध तुर्क लेखिका एलिफ शफक के लेख का अनुवाद- दिगम्बर)

पूँजीवाद हमें क्या देता है

–रिचर्ड डी वोल्फ
अमरीका के ज्यादातर राष्ट्रपति एक या एक से अधिक पूँजीवादी गिरावटों (ठहराव, मंदी और संकट) की सदारत करते  आ रहे हैं. रुजवेल्ट के ज़माने से ही अमरीका का हर राष्ट्रपति जनता और पूँजीपतियों की माँग पर मंदी से निपटने के लिए कोई न कोई कार्यक्रम जरुर पेश करता है. रूजवेल्ट और उसके बाद के हर राष्ट्रपति ने यह वादा किया कि उसका कार्यक्रम न केवल मौजूदा आर्थिक कठिनाइयों से मुक्ति दिलाएगा, बल्कि इस बात को भी  सुनिश्चित करेगा कि हम या हमारे बच्चे भविष्य में ऐसी मंदी का दोबारा सामना नहीं करेंगे. ओबामा इस बात की सबसे ताजा मिसाल है.

कोई भी राष्ट्रपति अब तक इस वादे को पूरा नहीं कर पाया. मौजूदा पूँजीवादी संकट पिछले पाँच सालों में अभी बीच रास्ते तक ही पहुँचा है और खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है. यह साबित करता है कि भावी आर्थिक संकटों को रोकने का वादा, केवल पिछले हर राष्ट्रपति और उसके  बेशकीमती आर्थिक सलाहकारों को बचाने में ही सहायक रहा है. चूँकि ओबामा का कार्यक्रम भी पिछले राष्ट्रपतियों के कार्यक्रमों से मूलतः भिन्न नहीं है, इसलिए इसकी सफलता की उम्मीद पालने का भी कोई कारण नहीं है.

पूँजीवादी संकट को हल करने में इस असफलता की कीमत हमारे देश के लाखों लोगों  को चुकानी पड़ी, जिन्होंने न केवल रोजगार, रोजगार की सहूलियत और सुरक्षा गंवाने जैसी बार-बार की तबाही झेली, बल्कि हमारे बच्चों के लिए मकान और नौकरी की उम्मीद भी काफी कम होती गयी. पूँजीवादी संकट से उबर पाने में असफलता के चलते आम जनता को जो व्यक्तिगत, पारिवारिक और आर्थिक  नुकसान उठाने पड़े, वे सचमुच विचलित कर देने वाले हैं. लाखों अमरीकी आज या तो रोजगार से वंचित हैं या फिर वे पार्ट-टाइम नौकरी करते हैं, जबकि उन्हें पूरा काम चाहिए. अमरीकी सरकार के मुताबिक अर्थव्यवस्था  के तीस फीसदी मशीन, औजार, ऑफिस, गोदाम और कच्चा माल बेकार पड़े हैं. यह पूँजीवादी व्यवस्था हम लोगों को उस उपज और संपत्ति से वंचित करती है जिसका उत्पादन हो सकता है, बशर्ते लोगों को काम मिले और उत्पादन के साधन बेकार पड़े सड़ते न रहें.

यह उत्पादन हमारे उद्योगों और हमारे शहरों का पुनर्निर्माण कर सकता है, उनको पर्यावरण का सम्मान करने वाली संस्थाओं में परिवर्तित कर सकता है तथा अमरीका और दूसरे देशों की गरीबी दूर कर सकता है. आज जो लोग बेरोजगार हैं उनको काम मिल जाये तो वे बेहतर जिंदगी जी सकते हैं, अपना घर चला सकते हैं और उत्पादन भी बढ़ा सकते हैं. अगर रोजगार चाहने वाले लोगों को बेकार पड़े उत्पादन के साधनों से जोड़कर हमारे लिए जरूरी उत्पादन चालू करने में पूँजीवाद आज इतनी बुरी तरह असफल नहीं होता तो निस्संदेह इससे हम सबका बहुत ही अधिक लाभ होता.

क्या इस बुनियादी समस्या के बारे में सरकारी नीतियां और कार्यक्रम झूठ नहीं फैलाते. आख़िरकार, सभी प्रमुख पार्टियां, नेता, लॉबी बनाने वाले तथा मीडिया और विद्वानों के बीच उनके साथी-संघातियों ने एक साथ मिल कर पूँजीवाद का उत्सव मानाया. पिछले पचास सालों से वे इस बात पर जोर देते रहे कि पूँजीवाद का प्रदर्शन चाहे जितना भी खराब क्यों न हो, इसकी आलोचना करना बेवकूफी, निराधार, बेहूदा, देशद्रोह और घटिया काम है. उनका एक ही मन्त्र रहा है- “पूँजीवाद अच्छा काम करता है.”’

पूँजीवाद की आलोचना पर लगभग पूरे प्रतिबन्ध के सुरक्षा कवच के पीछे अमरीकी पूँजीवादी ब्यवस्था की हालत खस्ता हो गई (आम तौर पर यही होता है जब सामाजिक संस्थाओं की सार्वजनिक आलोचना कि इजाजत नहीं होती). जब 2007 में यह संकट शुरु हुआ, तब पूंजीवाद हम में से अधिकांश लोगों के लिए बुरा काम कर रहा था.आने वाले वर्षों में यह और भी बुरे प्रदर्शन की लगातार चेतावनी दे रहा है. आलोचना से परे, पूँजीवाद को टॉनिक पिलाने वाले अब सरकार पर दबाव डाल रहे हैं कि वह सार्वजनिक खर्चों में कटौती करे, जबकि अमरीकी जनता को इसकी पहले से भी ज्यादा जरुरत है. उनका मूल नारा और कार्यक्रम आज भी यही है- थोड़े से लोगों के लिए आर्थिक स्वास्थ्य लाभऔर बहुतों के लिए मितव्ययिता.

1950 और ’60 के दशकों में सबसे धनी अमरीकियों के लिए आय कर ही उच्चतम सीमा 91 प्रतिशत थी जो आज 35 प्रतिशत रह गयी है. 1977 में वे लोग “पूँजीगत लाभ(जब वे शेयर या बोंड की बिक्री खरीद-मूल्य से अधिक दाम पर करते थे) पर 40 प्रतिशत टैक्स जमा करते थे.  आज यह दर 15 प्रतिशत है. आम जनता को टैक्स में इतनी बड़ी छूट मयस्सर नहीं. इन कटौतियों से धनी और भी धनी होते गए, जबकि सरकार को धनि लोगों से टैक्स न मिलने की भरपाई उधार लेकर करना पड़ा. कैसी विचित्र स्थिति है कि धनी लोग अब सरकारी कर्ज का उपभोग कर रहे हैं और इसके बदले आम अमरीकियों की सार्वजानिक सेवाओं में कटौती की जा रही है.

आज हम जिस तरह के आर्थिक संकट के शिकार हैं उसका समाधान राष्ट्रपति का एक और सुधार, नियमन, आर्थिक उत्प्रेरण और घाटे का बजट कार्यक्रम नहीं है. यह तो हम वर्षों से करते ही आ रहे हैं. यह उपाय लोगों को बार-बार इस आर्थिक व्यवस्था द्वारा कठिन समय में धकेलते चले जाने से रोक नहीं पाया. पूँजीवाद की गंभीर, खुली और मुक्त सार्वजनिक आलोचना काफी लंबे अरसे से अपेक्षित है और होना तो यह चाहिए था कि पहले ही इसे रोका ना जाता. हमें इस बात की जाँच करना जरूरी है अमरीका, पूँजीवाद से बेहतर उपाय क्या और कैसे कर सकता है.

किसी भी मानवीय संस्था की तरह आर्थिक व्यवस्था भी जन्म लेती है, समय के साथ फलती-फूलती है और गुजर जाती है. दास प्रथा और सामंतवाद की मृत्यु होने पर पूँजीवाद का जन्म हुआ था. फ़्रांसिसी क्रांतिकारियों के शब्दों में इसने स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा का वादा किया था. इसने उन लक्ष्यों की ओर कुछ सही प्रगति भी की. हालाँकि इसी ने कुछ ऐसे भारी अवरोध भी खड़े किये, जिससे इन लक्ष्यों को वास्तव में हासिल करना असंभव हो जाय. उनमे से प्रमुख है, पूँजीवादी उद्यमों के भीतर उत्पादन का संगठन.

पूँजीवादी उद्यम जो आज की अर्थव्यवस्था पर हावी हैं, उनके बड़े अंशधारक और उनके द्वारा चुने गए बोर्ड के डायरेक्टर विशेष हैसियत वाले लोग होते हैं और वे सभी जरुरी फैसले अलोकतांत्रिक तरीके से लेते हैं. बड़े अंशधारक और बोर्ड के डायरेक्टर उन पूंजीवादी उद्यमों से सीधे जुड़े हुए लोगों में से गिने-चुने लोग ही होते हैं. भारी संख्या उन उद्यमों के मजदूर और उन उद्यमों पर निर्भर जन समुदाय होते हैं. 
फिर भी इन थोड़े से लोगों का हर निर्णय (कि क्या, कैसे कहाँ उत्पादित करना है और उससे होनेवाले मुनाफे को कहाँ खर्च करना है) एक बहुत बड़ी आबादी की जिंदगी पर असर डालता है- जिसमें संकट का आना भी शामिल है- जबकि उन बहुसंख्य लोगों को निर्णय लेने में सीधे भागीदारी करने की इजाजत नहीं होती. तब इसमें भला आश्चर्य की क्या बात कि मुट्ठी भर लोग आमदनी और मुनाफे का बहुत बड़ा भाग अपने ही पास रख लेते हैं. इसी की बदौलत वे राजनीति पर अपनी गिरफ्त कायम कर लेते हैं और आर्थिक नुकसान और वंचना को खत्म करने की माँग कर रहे बहुमत की राह में रोडे अटकाते हैं. यही कारण है कि आज सरकार धनी लोगों को संकट से उबारने पर पैसा बहा रही है, जबकि हम लोगों को मितव्ययिता का पाठ पढ़ा रही है. 

जब तक समाज इस पूँजीवादी उत्पादन के संगठन को लाँघ कर आगे नही बढ़ता, आर्थिक संकट यूँ ही आता रहेगा और वे जनता से इसी तरह उससे उबारने के बारे में झूठे वादे करते रहेंगे. व्यवस्था के मुट्ठी भर कर्ताधर्ताओं से यह उम्मीद करना हद दर्जे का भोलापन है कि जो व्यवस्था उनके हित में भलीभांति काम कर रही है, उसकी अर्थव्यवस्था और राजनीति का वे जनवादीकरण करेंगे. यह काम तो 99 प्रतिशत जनता के ही जिम्मे है.

(रिचर्ड डी वोल्फ मेसाचुसेट्स विश्वविद्यालय के मानद प्रोफ़ेसर, डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता, रेडियो कार्यक्रम संचालक और कई पुस्तकों के लेखक हैं. यह लेख “मंथली रिव्यू” से लेकर अनुवाद किया गया है. अनुवाद- दिगंबर)

किराये की कोख


पूँजीवाद का यह आम नियम है कि वह हर चीज को ‘माल में बदल कर मुनाफा कमाता है। इसलिए पतन की सारी हदों को पार करना और मानवीय मूल्यों का गला घोंटना भी इस लुटेरी व्यवस्था के लिए कोई बड़ी बात नहीं है। औरत की कोख’ को एक माल’ में बदल दिया जाना इसका जीवन्त उदाहरण है। किराये की ‘कोख’ का व्यापार अब एक उद्योग का रूप ले चुका है और मौजूदा कानून के हिसाब से कोई जुर्म नहीं है। हर साल भारी संख्या में विदेशी दम्पत्ति हमारी गरीबी का लाभ उठाकर किराये की कोख लेने भारत आ रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में इसका बाजार 2000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा है।   
किराये की माताओं’ के रूप में महिलाओें की बाजार में उपस्थित उन्हें तमाम तरह की व्याधियों का शिकार बना देता है और इस दौरान उन्हें भयानक पीड़ा से गुजरना पड़ता है। इन महिलाओं को कृतिम गर्भाधान विधि से गर्भधारण कराने से पहले कई तरह के हार्मोन इंजेक्सन और दवाईयाँ दी जाती हैं जो इनके स्वास्थ्य पर बहुत ही हानिकारक प्रभाव डालती हैं। ऐसे कई असपफल प्रयासों के बाद ही गर्भाधारण सपफल हो पाता है। इसमें सपफलता का प्रतित केवल 25 से 40 के बीच है। एक महिला को इस तरह के कितने चक्रों से गुजारा जाय ताकि उसके स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव न पड़े, यह धन लोलुप डॉक्टरों द्वारा तय किया जाता है जो ज्यादातर मामलों में उनके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव की अनदेखी करते हैं। इस प्रक्रिया में गर्भ में एक से अधिक बच्चे ठहरने की सम्भावना भी बहुत ज्यादा होती है और किराये की माताएँ अक्सर गर्भपात का शिकार हो जाती हैं। इस तरह ये सभी जोखिम उठाने के बदले उन्हें कितना पैसा दिया जाय इसका कोई मापदण्ड निर्धारित नहीं है। असली कमाई निजी अस्पतालों के मालिक और इस धन्धे में लगे डॉक्टरों की ही होती है।
एक साल पहले फिल्म अभिनेता आमिर खान ने भी किराये की कोख’ से अपना बच्चा पैदा करवाया था। इस घटना का समाचार देने वाले समाचार पत्रों और टीवी चैनलों ने किराये की कोख’ को सन्तानहीन दम्पत्तियों के लिए वरदान के रूप में महिमामण्डित किया। मीडिया का यह रुख कोई नया नहीं। इस अमानवीय कारोबार को एक सुनहरे अवसर के रूप में प्रस्तुत करने वाले लेख और रिपोर्ट आये दिन मीडिया में देखने को मिलते हैं। सन्तान पैदा करने में असमर्थ दम्पत्तियों के लिए किराये की कोख’ का एक उद्योग के रूप में फलना-फूलना लोगों के दिमाग में रक्त सम्बन्धों की पवित्रता और अपनी सन्तान की लालसा जैसी दकियानूसी सोच का नतीजा है। इसकी जगह बच्चा गोद लेना’ कहीं ज्यादा मानवीय और संवेदनशील विकल्प है।
हालांकि हमारे दे में किराये की कोख’ से संतान उत्पन्न करना कोई नयी बात नहीं है। पहले भी पत्नी की जगह कोई दूसरी महिला किराये की माँ बनती थी जिसे बिना किसी धन लाभ के सन्तान पैदा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन इसे व्यापक समाज में स्वीकृति नहीं मिलती थी। परम्परागत रूप से अन्य व्यभिचारों, जैसे- वेश्यवृत्ति आदि की तरह इसे गुप्त रखा जाता था। आज की तरह यह खुले रूप में और इतने बड़े पैमाने पर नहीं होता था। पिछले कुछ सालों के दौरान मीडिया ने इस कारोबार को खूब प्रचारित प्रसारित किया है लेकिन निवे के लिए बाजार ढूँढ रही इस मरणासन्न पूँजीवादी व्यवस्था को जहाँ कहीं भी निवे की थोड़ी सी गुंजाइश दिखती है, खुद को जिन्दा रखने के लिए वह उसी ओर भागती है, चाहे वह कितना भी घटिया, अमानुषिक और घृणास्पद क्यों न हो।
कोई भी संवेदनशील व्यक्ति और समाज इस घृणित, विकृत और अनैतिक पेशे को भला कैसे बढ़ावा दे सकता है। मुनाफाखोरी की व्यवस्था हमारे समाज को पतन के जिस गर्त में ले जा रही है उसी का एक रूप है- मातृत्व को बाजार के अधीन लाना। यह अत्यन्त क्षोभकारी है।

देश की छाती दरकते देखता हूँ!

-केदारनाथ अग्रवाल


देश की छाती दरकते देखता हूँ!
थान खद्दर के लपेटे स्वार्थियों को,
पेट-पूजा की कमाई में जुता मैं देखता हूँ!
सत्य के जारज सुतों को,
लंदनी गौरांग प्रभु की,
लीक चलते देखता हूँ!
डॉलरी साम्राज्यवादी मौत-घर में,
आँख मूँदे डांस करते देखता हूँ!!


देश की छाती दरकते देखता हूँ!
मैं अहिंसा के निहत्थे हाथियों को,
पीठ पर बम बोझ लादे देखता हूँ।
देव कुल के किन्नरों को,
मंत्रियों का साज साजे,
देश की जन-शक्तियों का,
खून पीते देखता हूँ,
क्रांति गाते देखता हूँ!!


देश की छाती दरकते देखता हूँ!
राजनीतिक धर्मराजों को जुएँ में,
द्रोपदी को हारते मैं देखता हूँ!
ज्ञान के सब सूरजों को,
अर्थ के पैशाचिकों से,
रोशनी को माँगते मैं देखता हूँ!
योजनाओं के शिखंडी सूरमों को,
तेग अपनी तोड़ते मैं देखता हूँ!!


देश की छाती दरकते देखता हूँ!
खाद्य मंत्री को हमेशा शूल बोते देखता हूँ
भुखमरी को जन्म देते,
वन-महोत्सव को मनाते देखता हूँ!
लौह-नर के वृद्ध वपु से,
दण्ड के दानव निकलते देखता हूँ!
व्यक्ति की स्वाधीनता पर गाज गिरते देखता हूँ!
देश के अभिमन्युयों को कैद होते देखता हूँ!!
देश की छाती दरकते देखता हूँ!
मुक्त लहरों की प्रगति पर,
जन-सुरक्षा के बहाने,
रोक लगाते देखता हूँ!
चीन की दीवार उठते देखता हूँ!
क्राँतिकारी लेखनी को,
जेल जाते देखता हूँ!
लपलपाती आग के भी,
ओंठ सिलते देखता हूँ!!


देश की छाती दरकते देखता हूँ!
राष्ट्र-जल में कागजी, छवि-यान बहता देखता हूँ,
तीर पर मल्लाह बैठे और हँसते देखता हूँ!
योजनाओं के पफरिश्तों को गगन से भूमि आते,
और गोबर चोंथ पर सानंद बैठे,
मौन-मन बंशी बजाते, गीत गाते,
मृग मरीची कामिनी से प्यार करते देखता हूँ!
शून्य शब्दों के हवाई पफैर करते देखता हूँ!!


देश की छाती दरकते देखता हूँ!
बूचड़ों के न्याय-घर में,
लोकशाही के करोड़ों राम-सीता,
मूक पशुओं की तरह बलिदान होते देखता हूँ!
वीर तेलंगानवों पर मृत्यु के चाबुक चटकते देखता हूँ!
क्रांति की कल्लोलिनी पर घात होते देखता हूँ!
वीर माता के हृदय के शक्ति-पय को
शून्य में रोते विलपते देखता हूँ!!


देश की छाती दरकते देखता हूँ!
नामधारी त्यागियों को,
मैं धुएँ के वस्त्रा पहने,
मृत्यु का घंटा बजाते देखता हूँ!
स्वर्ण मुद्रा की चढ़ौती भेंट लेते,
राजगुरुओं को, मुनापफाखोर को आशीष देते,
सौ तरह के कमकरों को दुष्ट कह कर,
शाप देते प्राण लेते देखता हूँ!!


देश की छाती दरकते देखता हूँ!
कौंसिलों में कठपुतलियों को भटकते,
राजनीतिक चाल चलते,
रेत के कानून के रस्से बनाते देखता हूँ!
वायुयानों की उड़ानों की तरह तकरीर करते,
झूठ का लम्बा बड़ा इतिहास गढ़ते,
गोखुरों से सिंधु भरते,
देश-द्रोही रावणों को राम भजते देखता हूँ!!


देश की छाती दरकते देखता हूँ!
नाश के वैतालिकों को
संविधानी शासनालय को सभा में
दंड की डौड़ी बजाते देखता हूँ!
कंस की प्रतिमूर्तियों को,
मुन्ड मालाएँ बनाते देखता हूँ!
काल भैरव के सहोदर भाइयों को,
रक्त की धारा बहाते देखता हूँ!!


देश की छाती दरकते देखता हूँ!
व्यास मुनि को धूप में रिक्शा चलाते,
भीम, अर्जुन को गधे का बोझ ढोते देखता हूँ!
सत्य के हरिचंद को अन्याय-घर में,
झूठ की देते गवाही देखता हूँ!
द्रोपदी को और शैव्या को, शची को,
रूप की दूकान खोले,
लाज को दो-दो टके में बेचते मैं देखता हूँ!!


देश की छाती दरकते देखता हूँ!
मैं बहुत उत्तप्त होकर
भीम के बल और अर्जुन की प्रतिज्ञा से ललक कर,
क्रांतिकारी शक्ति का तूपफान बन कर,
शूरवीरों की शहादत का हथौड़ा हाथ लेकर,
श्रृंखलाएँ तोड़ता हूँ
जिन्दगी को मुक्त करता हूँ नरक से!!

पौल रोबसन के लिए – नाजिम हिकमत

जुझारू गायक पौल रोबसन
क्रन्तिकारी तुर्की कवि नाजिम हिकमत









वे हमें अपना गीत नहीं गाने दे रहे, रोबसन,
उकाब जैसी उड़ान वाले मेरे गायक पाखी 
मोतिया मुस्कान बिखेरते मेरे अफ्रीकी भाई,
वे हमें अपना गीत नहीं गाने दे रहे हैं.

वे भयभीत हैं, रोबसन,
भोर की लालिमा से भयभीत,
भयभीत देखने, सुनने और छूने से-
नंगधडंग बच्चे को नहलाती बारिश के शोर से भयभीत,
जैसे कोई कच्ची नाशपाती में दाँत गडाये उस हँसी से भयभीत.
वे भयभीत हैं मोहब्बत करनेवालों से, मोहब्बत फरहाद की तरह.


(यकीनन तुम्हारे यहाँ भी कोई फरहाद हुआ होगा, रोबसन,
उसका नाम क्या है भला?)
वे बीज से भयभीत हैं, धरती से
और बहते पानी से
भयभीत किसी दोस्त के हाथ को याद करने से 
जो कोई छूट, कोई कमीशन, कोई ब्याज नहीं माँगता –
हाथ जो कभी छूटा नहीं 
जैसे कोमल हथेलियों में कोई चंचल चिड़िया.
वे उम्मीद से भयभीत हैं, रोबसन, उम्मीद से भयभीत, उम्मीद से!
उकाब जैसी उड़ान वाले मेरे गायक पाखी, वे भयभीत हैं,
वे हमारे गीतों से भयभीत हैं, रोबसन. 
अक्टूबर 1949
(अनुवाद – दिगंबर)

दुनिया पर 1318 कम्पनियों का कब्जा

वाल स्ट्रीट पर कब्जा करोआंदोलन ने अपना निशाना एक प्रतित बहुराष्ट्रीय निगमों को बनाया था। उनके नारे, निशाना और नजरिया कितने सही हैइसका अंदाजा हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन से लगा सकते हैं।

जूरिख स्थित इंस्टिच्यूट ऑफ टेकनोलोजी की तीन सदस्यीय टीम ने एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में उन्होंने दुनिया भर की कुल 3.7 करोड़ कम्पनियों और निवेकों में से 3060 को छाँटकर अध्ययन का ब्योरा दिया है। जटिल गणतीय मॉडल से यह अध्ययन किया गया जिसमें इस बात को स्पष्ट किया गया है कि कैसे ये कम्पनियाँ अन्य कम्पनियों के शेयर खरीदकर उसमें साझेदारी करती हैं और किस तरह केवल 1318 कम्पनियों के एक गिरोह ने दुनिया की 60 प्रतित आमदनी पर मालिकाना कायम कर लिया है। इससे भी आगे इस रिपोर्ट ने आपस में गुँथी हुई 147 कम्पनियों के एक महा-गिरोह का भी पता लगाया है जिसका ऊपर बताये गये गिरोह की कुल सम्पत्ति में से 40 प्रतित पर कब्जा है। इन मुट्ठीभर कम्पनियों में बर्कले बैंक, जेपी मॉर्गन चेज एण्ड कम्पनी और गोल्डमैन सैक्स जैसे ज्यादातर बैंक शामिल है। लन्दन विश्वविद्यालय में बृहद अर्थशास्त्र के एक विशेषज्ञ का कहना है कि इस विश्लेषण का महत्त्व केवल इतना ही नहीं है कि इसने मुट्ठीभर लोगों द्वारा अर्थव्यवस्था पर कब्जा जमाये जाने को उजागर कर दिया है, बल्कि यह विश्व-अर्थव्यवस्था के टिकाऊपन के बारे में हमारी जानकारी भी बढ़ाता है।
जूरिख टीम के अनुसार कम्पनियों की ऐसी गिरोहबंदी एक विकट समस्या बन गयी है। इस गिरोहबंदी में अगर कोई एक कम्पनी डूबती है तो उससे जुड़ी तमाम कम्पनियों की अर्थव्यवस्था भरभराकर गिरने लगती है। नतीजतन पुरे विश्व की अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त हो जाती है। अमरीका में 2008 के संकट तथा अन्य संकटों ने इस बात को सही ठहराया है। जूरिख टीम का मानना हैं कि भले ही इस महा-गिरोह का जन्म सहज तरीके से हुआ हो, लेकिन विभिन्न देशों की राजनीतिक सत्ता पर इस महा-गिरोह का दबदबा कायम है।
जाहिर हैं कि विश्व-अर्थव्यवस्था पर अपने दबदबे से इस महा-गिरोह को असीम क्ति हासिल हुई है। उसके चलते इनको बेलगाम ताकत मिला है। इस बेलगाम ताकत तथा पूँजी संचय और मुनाफाखोरी की इनकी घृणित बीमारी ने इनको इतना क्रूर और निष्ठुर बना दिया है। कि किसी दे की अर्थव्यवस्था को चुटकियों में तबाह कर देना या लाखों लोगों का कत्लेआम करवाना इनके लिए आम बात हो गयी है। अपफगानिस्तान, इराक और लीबिया की तबाही इसके जीवंत उदाहरण हैं। ईरान पर हमले के लिए लगातार उकसावा भी इसी की मिसाल है।
आज जबकि यह पूरी तरह सापफ हो गया है कि हमारी धरती 99 प्रतित आम मेहनतक जनता और एक प्रतित धनाढ्यों के दो खेमों में बँट चुकी है और दुनिया की ज्यादातर मुसीबतें चाहे सामाजिक-आर्थिक संकट हो या जलवायु संकट, इन सबके पीछे इसी एक प्रतित लुटेरों का हाथ है। इसलिए पूरी मानवता और अपनी धरती को बचाने के लिए हर हालत में इन एक प्रतित के खिलाफ हम 99 प्रतित को एकजुट होकर इन्हें परास्त करना होगा। निश्चय ही यह ऐतिहासिक जिम्मेदारी बहुत ही चुनौती भरा है। उन्नत चेतना और मजबूत संगठन के बल पर ही यह कार्यभार पूरा किया जा सकता है।

(देश-विदेश अंक-१३ में प्रकाशित)

पान सिंह तोमर– "हमारो जवाब पूरो ना भयो"

-दिगंबर
तिग्मांशु धूलिया की फिल्म पान सिंह तोमर स्टीपल चेज (बाधा दौड़) में सात बार राष्ट्रीय चैम्पियन रहे एक फौजी के जीवन पर आधारित है जिसे हालात ने चम्बल का बागी बना दिया था। (स्टीपल चेज एक बहुत ही कठिन और थकाऊ खेल है जिसमें 3000 मीटर की दौड़ करते हुए 28 बाधाएँ और 8 पानी के गड्ढे पार करने होते हैं।)

चम्बल के बागियों पर अब तक न जाने कितनी मसालेदार हिन्दी फिल्में बनी, जिनमें कुछ तयशुदा कथासूत्र या फिल्मी फारमूले हुआ करते थे। उन फिल्मों की एक खासियत यह भी होती थी कि छद्म-व्यक्तित्व वाले या निर्वैयक्तित्व डाकुओं का किरदार निभाने वाले अभिनेताओं का व्यक्तित्व इतना उभरता था कि वे दर्शकों के दिलोदिमाग पर और साथ ही फिल्मी दुनिया में भी छा जाते थे। इसके क्लासिकीय उदाहरण मेरी जानकारी में रजा मुराद, जोगिन्दर और अमजद खान हैं। लेकिन पान सिंह तोमर इस मायने में उन साब से एकदम अलग है कि इसमें लूट-पाट, हत्या, इंतकाम की आग और क्रूरता का सनसनीखेज, ग्राफिक चित्राण नहीं है। इसमें डाकू के किरदार का गौरवगान या दूसरे छोर पर जाकर दानव के रूप चित्राण भी नहीं है। बागियों की बहादुरी और उनके अतिमानवीय चरित्र का बखान करने के बजाय यह फिल्म उन सामाजिक परिस्थितियों पर रोशनी डालती है, जिनमें एक प्रतिभाशाली खिलाड़ी और अनुशासित फौजी को बागी बनने पर मजबूर कर दिया जाता है।

तिग्मांशु धूलिया ने शेखर कपूर की फिल्म बैंडिट क्वीन में सह निर्देशन करते हुए जो तजुर्बा हासिल किया, उसका भरपूर इस्तेमाल किया और इसे एक उत्कृष्ट फिल्म बनाने में पूरी तरह कामयाब रहे। चम्बल की घाटी, नदी, बीहड़ और ग्रामीण अंचल के अब तक अनछुए, अनोखे भूदृश्यों को बखूबी कैमरे में कैद किया गया है। कथानक और माहौल के अनुरूप फिल्म के संवाद भिंड-मुरैना की ठेठ बोली में हैं जो आम तौर पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों में ही देखने को मिलते हैं। यथार्थ चित्रण के लिए निर्देशक ने यह जोखिम उठाया। फिर भी दर्शकों को इससे कोई परेशानी नहीं होती, क्योंकि संवाद के अलावा सिनेमा के दूसरे रूप विधान- अभिनय, दृश्यबंध और फिल्मांकन अपनी पूरी कलात्मकता के साथ दर्शकों को बाँधें रहते हैं। संजय चौहान ने पटकथा पर काफी मेहनत की है और तिग्मांशु धूलिया के संवाद ने उसे एकदम जीवन्त बना दिया है।

इरफान ने पान सिंह के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं-  फौजी, धावक, पति, बागी और पिता के चरित्र को भरपूर जिया है। उनके कुशल और सशक्त अभिनय का ही कमाल है कि पान सिंह की जीवन झाँकी हमें एक ही साथ तनावग्रस्त करती है, प्रपुफल्लित करती है, बेचैन करती है और उत्साहित भी करती है। पत्रकार की भूमिका में विजेन्द्र काला और पान सिंह की पत्नी की भूमिका में माही गिल का अभिनय भी काफी सहज-स्वाभाविक है। दूसरे सभी चरित्र अभिनेताओं ने भी गजब का अभिनय किया है। संगीत का अतिरेक नहीं है, इसलिए फिल्म के कथानक पर यह हावी नहीं होता। कुल मिलाकर इस फिल्म में अन्तर्वस्तु और रूप की एकता भी गजब है।

इस फिल्म की तारीफ तो सिर्फ इसी बात के लिए की जा सकती है कि मौजूदा दौर में, जहाँ क्रिकेट खिलाड़ियों की करोड़ों में बोली लग रही हो और शतक बनाने वालों को भारत रत्न देने तक की माँग हो रही हो, जबकि बाकी तमाम खेलों के राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय खिलाड़ियों की कोई पूछ न हो, वहाँ पान सिंह तोमर जैसे भूले-बिसरे धावक की कहानी को फिल्म का विषय बनाया गया। फिल्म के अन्त में ऐसे ही चार अन्य खिलाड़ियों को भी याद किया गया है जो राष्ट्रीय चैम्पियन होने के बावजूद कंगाली-बदहाली की हालत में इलाज के बिना गुमनाम मौत मरे और यहाँ तक कि अपना स्वर्ण पदक बेचने पर भी मजबूर हुए।

लेकिन यह फिल्म अपने देश के उपेक्षित और गुमनाम खिलाड़ियों को श्रद्धासुमन अर्पित करने से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती और कामयाबी यही है कि यह किसी एक बागी की कहानी मात्र नहीं रह जाती। इस फिल्म में नायक के चरित्र के साथ उसका सम्पूर्ण सामाजिक परिवेश पूरी तरह अन्तर्गुंफित है। पान सिंह को गढ़ने वाला सामाजिक यथार्थ उसकी कहानी के साथ अन्तर्धारा की तरह प्रवाहित होता रहता है और उसके जीवन के समानान्तर चल रहा भारतीय समाज-व्यवस्था का विकृत चेहरा हमारे सामने सजीव रूप में आ उपस्थित होता है। किसी उत्कृष्ट कलाकृति की खासियत भी यही है। इस फिल्म का अनेक स्तरों पर रसास्वादन किया जा सकता है। तिग्मांशु धूलिया की यह फिल्म भारतीय सिनेमा की प्रवीणता और प्रौढ़ता की ओर बढ़ते जाने का एक सुखद संकेत है।

इस फिल्म में पान सिंह की जीवन झाँकी के माध्यम से बीहड़ के ग्रामीण अंचल की ही नहीं, बल्कि आजादी के बाद निर्मित समूचे भारतीय समाज की व्यथा-कथा कही गयी है। पत्रकार के इस सवाल के जवाब में कि आपने पहली बार बन्दूक कब उठायी, वह अपने जीवन के समानान्तर चलने वाली कहानी का निचोड़ सीधे सपाट ढंग से रख देता है- अंग्रेज भगे इस मुल्क से बस उसके बाद, पंडित जी प्रधान मंत्री बन गये और नव भारत के निर्माण के संगे-संगे हमओ भी निर्माण सुरू भओ।

भारतीय राज्य और यहाँ के शासक वर्गां के चरित्र की झलक इस फिल्म में साफ-साफ देखी जा सकती है। आजादी के बाद हमारे देश में ढेर सारी विकृतियों वाली एक पूँजीवादी व्यवस्था की बुनियाद पड़ी। औपनिवेशिक प्रशासनिक ढाँचे को थोड़े-बहुत फेर-बदल के साथ बनाये रखा गया जिसको लेकर अक्सर सवाल उठते रहते हैं- चाहे गुलामी के दौर में  अंग्रेजों द्वारा बनाये गये औपनिवेशिक न्याय-तंत्र और कानून को जारी रखने की बात हो, जनविमुख सेना की अफसरशाही और फरमानशाही हो, पुलिस का उत्पीड़क और दमनात्मक चरित्र हो या प्रशासन तंत्र की जनता के प्रति बेरुखी और लापरवाही। आजादी के इतने वर्षों बाद भी यहाँ का राज्य-तंत्रा अंग्रेजों की तरह ही, बल्कि कई मामलों में अंग्रेजों से भी क्रूरतापूर्वक देश की जनता के साथ प्रजा-पौनी के रूप में बर्ताव करता है। स्वस्थ लोकतांत्रिक समाज को मजबूत बनाना और संचालित करना इस शासन तंत्र का दायित्व नहीं है। उसे तो बस कानून-व्यवस्था को कायम रखना है। बागी या अपराधी बनाने वाली परिस्थितियों और कारणों को बनाये रखना, लोगों को अपराधी बनने की ओर धकेलना और फिर कानून की रक्षा के नाम पर उन्हें मुठभेड़ में मारना ही जैसे पुलिस प्रशासन का काम हो।

पान सिंह के दो संवाद इस सच्चाई को तीक्ष्ण रूप से व्यक्त करते हैं। फौज का अधिकारी जब उससे सरेंडर करने की अपील करता है तो वह क्षोभ में आकर कहता है- उन लोगों से क्यों नहीं पूछते सवाल जो बनाते हैं बागी। पहले वे सरेंडर करें फिर हम करेंगे सरेंडर।इसी तरह सेना का एक दूसरा अधिकारी जब सरेंडर करके कोच बनने की सलाह देता है तो वह कहता है कि खेल की कीमत ये पुलिस-पंचायती क्या जानें। इन्हें तो बीहड़ आबाद करने के लिए एक और मिल गयो बागी।

आजादी के बाद गाँवों की आन्तरिक संरचना में हुए बदलावों को भी इस फिल्म में साफ-साफ देखा जा सकता है। फिल्म का खलनायक दद्दा पान सिंह का चचेरा भाई है जो उसकी जमीन हड़प लेता है और उसके परिवार का गाँव में रहना दूभर कर देता है। एक ही खानदान के दो परिवारों में से एक परिवार हर तरह के नाजायज तौर-तरीके अपना कर सरकारी तंत्रा के सहयोग और समर्थन से उफपर उठता चला जाता है तथा पूँजी के बलबूते पर नये तरह की जोर-जबरदस्ती और स्वेच्छाचारिता का प्रदर्शन करता है। मौजूदा भारतीय गाँवों की यह आम सच्चाई है जहाँ पुराने सामन्तों की जगह बहुत ही थोड़ी संख्या में, खासतौर पर ऊपरी और मध्यम जातियों के बीच से एक नव धनाढ्य वर्ग उभरा है। इसी वर्ग के हाथ में स्थानीय स्तर पर सत्ता की बागडोर है। वह अपने पट्टीदार को तो क्या, अपने ही सगे भाई को भी अपनी खुशहाली के रास्ते से हटा सकता है।

इसी त्रासद और अमानुषिक रास्ते से हमारे गाँवों में किसानों के विभेदीकरण यानी, वर्गीय ध्रुवीकरण की प्रक्रिया पूरी हुई है। मूलतः सवर्ण काश्तकारों का एक हिस्सा कंगाली का शिकार होकर समाज के निचले पायदान पर स्थित बहुसंख्य दलित और पिछड़ी जातियों की पहले से ही वंचित जमात में शामिल होता गया। इस नयी सामाजिक संरचना के ऊपरी पायदान पर कुलकों, भूस्वामियों, फार्मरों, धनी किसानों, ठेकेदारों और सरकारी तंत्र से नाभिनालबद्ध परजीवियों के छोटे से तबके का ग्रामीण क्षेत्रों में वर्चस्व कायम हुआ है। इस परिघटना की एक झलक पान सिंह के दद्दा और उसके परिवार के रूप में देख सकते हैं। फिल्म में इस तबके की हेकड़ी उत्कट रूप में उस दृश्य में सामने आती है जब कलक्टर यह कहते हुए भाग खड़ा होता है कि यह चम्बल का खून है, तुम लोग आपस में निपट लो। यही स्थिति आज स्थानीय भिन्नताओं के साथ हर इलाके में मौजूद है।

इस फिल्म में पान सिंह तोमर के व्यक्तित्व में क्रमशः तीन अलग-अलग चारित्रिक बदलाव दिखाई देते हैं। फौज में भर्ती होने तक स्वाभाविक रूप से उसके ऊपर सामन्ती परिवेश का प्रभाव है। फौज की नौकरी के शुरुआती दिनों में उसके आचार-व्यवहार में इसकी साफ झलक मिलती है। दूसरा, एक सैनिक के रूप में वह आजादी के बाद स्थापित नयी शासन व्यवस्था और राज्य के प्रति वफादारी का पाठ पढ़ता है तथा सेवानिवृत होकर गाँव लौटने के बाद भी उसे निभाने का प्रयास करता है। तीसरा, इस व्यवस्था से मोहभंग होने और बागी बनने के बाद का व्यक्तित्व है। इन तीनों चरित्रों की बारीकियों को इरफान ने अपने सशक्त अभिनय से बखूबी उभारा है।

फौजी अपफसरों के सामने पेशी के समय वह सहज, बेबाक और भोले लहजे में जिन सच्चाइयों का बयान करता है वह उसकी ठेठ समान्ती और गँवई मानसिकता का इजहार है। वह अपने मामा के बागी होने और अब तक पुलिस की गिरफ्त में न आने का बखान करता है। यह पूछे जाने पर कि तुम देश के लिए मर सकते हो, वह कहता है कि मार भी सकता हूँ…इस सवाल के जवाब में कि क्या वह सरकार पर विश्वास करता है उसका कहना है कि सरकार तो चोर है, इसीलिए तो फौज की नौकरी में आया हूँ, सरकारी नौकरी नहीं की।

अपने कोच द्वारा गाली दिये जाने पर पान सिंह कहता है कि हमारे यहाँ गाली पर गोली चल जाती है।लेकिन यहीं से फौजी जीवन जीने के साथ-साथ उसका रूपान्तरण शुरू होता है। वह राज्य की नयी संरचना को स्वीकारते हुए उसके द्वारा निर्मित अनुशासन के साँचे में ढलने लगता है। इस तरह उसके व्यक्तित्व में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव आता है। पान सिंह काफी हद तक पुराने सामंती संस्कारों की जगह नये जीवन मूल्यों को अपनाता है। गाँव की चौहद्दी लाँघने और बाहरी दुनिया से सामना होने के बाद जैसा कि फिल्म की शुरुआत में पत्रकार को अपनी कहानी सुनाते हुए उसने कहा था, यानी नव भारत के निर्माण के संगे-संगे हमओ भी निमार्ण शुरू भओ’, वह सब उसके निजी जीवन में घटित होता है। फौज की नौकरी के दौरान वह कायदे-कानून के प्रति जिस आस्था का पाठ पढ़ता है, उसे बाद में भी अपने जीवन में उतारने की भरपूर कोशिश करता है। गाँव लौटने के बाद अपने विरोधियों का अत्याचार सहते हुए और बार-बार अपने करीबी लोगों के उकसाने पर भी बन्दूक उठाने को तैयार नहीं होता। वह कमिश्नर के जरिये पंचायत में जमीन का विवाद सुलझाने की कोशिश करता है, लेकिन न्याय दिलाने के बजाय कमिश्नर उसे अपने हाल पर छोड़ देता है। विरोधियों की मार-पिटाई से बेटे के बुरी तरह लहूलुहान हो जाने पर वह पुलिस से फरियाद करता है। यह बताने के बावजूद कि वह राष्ट्रीय खिलाड़ी और पफौजी रहा है, थानेदार उसके मामले को गम्भीरता से नहीं लेता, उसका मजाक उड़ाता है, उसके साथ दुर्व्यवहार करता है। वह कहता है कि तुम्हारे बेटे की सांस तो चल रही है, मरा तो नहीं। मुरैना पुलिस की इज्जत है। बिना दो-चार लाश गिरे हम कहीं नहीं जाते।पान सिंह गुस्से से आग बबूला हो उठता है, दरोगा को खरी-खोटी सुनाता है और मायूस होकर लौट जाता है। फिर भी वह कानून को हाथ में नहीं लेना चाहता, क्योंकि नवभारत के निर्माण और कायदे-कानून पर उसे भरोसा है। लेकिन भारतीय राज मशीनरी एक नागरिक के रूप में पान सिंह की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरती। उधर दद्दा का परिवार उसके घर पर हमला करके उसकी बूढ़ी माँ को पीट-पीट कर मार डालता है। उसका परिवार गाँव छोड़ने पर मजबूर होता है। अनेक कटु अनुभवों से गुजरने के बाद उसे यह सबक मिलता है कि मौजूदा शासन-प्रशासन उसके लिए बेमानी है। उसका मोहभंग होता है और अंतिम विकल्प के रूप में वह बंदूक उठा कर बीहड़ों की राह लेता है।

सच तो यह है कि राज्य मशीनरी की निर्मम उपेक्षा और समाज व्यवस्था की क्रूरता और चरम स्वार्थपरता ने पान सिंह के लिए मरने या मारने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं छोड़ा। इतने पर भी वह अपने घायल बेटे को अगले ही दिन फ़ौज की यूनिट में हाजिर होने का आदेश देता है। जब उसका भतीजा पूछता है कि दद्दा हमारी यूनिट कब निकलेगी तो वह अपने अन्तरद्वंद्व पर बड़ी मुश्किल से काबू पाते हुए डबडबाई आँखों और भारी मन से कहता है कि हमई यूनिट निकलेगी कल सुबे।
पान सिंह का यह मोहभंग दरअसल उस व्यवस्था से है जो लोकतांत्रिक मूल्यों और संस्थाओं को भारतीय समाज में गहराई से रोपने में पूरी तरह से असफल साबित हुआ। भारतीय शासक वर्गों ने आजादी के बाद अपने संकीर्ण स्वार्थों के चलते सभी तरह के प्रतिगामी मूल्यों से समझौता किया और सामन्तवादी सामाजिक संरचना को मूलतः बने रहने दिया। उसने जातिवाद, सम्प्रदायवाद, कबीलाई जत्थेबंदी और हर तरह के भेदभाव को मिटाने के बजाय उन्हें अपनी नयी संरचना का सहायक अंग बना लिया। उसने जनता से किये गये आमूल भूमि सुधार के वादे को तिलांजलि दे दी जो एक ऐसा ऐतिहासिक कार्यभार था जो अतीत से चली आ रही ढेर सारी सामाजिक विकृतियों और विदू्रपताओं को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए अनिवार्य था।

बागी होने के बावजूद पान सिंह डकैत और बागी के फर्क को मिटाता नहीं। उसे इस बात का सख्त अपफसोस है और गुस्सा भी कि जब उसने देश के लिए मैडल लाया तो उसे कोई पूछने वाला नहीं था, लेकिन जब बागी बन गया तो सब उसका नाम ले रहे हैं। फिल्म के शुरुआती दृश्य में इन्टरव्यू लेने आये पत्रकार द्वारा खुद को डाकू कहे जाने पर वह एतराज करते हुए कहता है कि बीहड़ में बागी होते हैं, डकैत पार्लियामेंट में होते हैं।वह उस पत्रकार से पूछता है कि इस इन्टरव्यू के छपने से तुम्हारी तरक्की होगी?’ वह उसका अनादर करता है, उसे जमीन पर बिठाता है। पत्रकारों को बिना मेहनत की कमाई करने वाला बताते हुए उसका मजाक उड़ाता है और कहता है कि बहुत चर्बी चढ़ी हुई है, रोज दौड़ लगाओ। तीन राज्यों की पुलिस को चकमा देने के बाद चर्चित होने की घटना का बयान करने के बाद पत्रकार की चापलूसी और तारीफ सुनकर वह नफरत और गुस्से कहता है- सत्ताइस बैरियर, सात पानी का गड्ढा पार करके तीन हजार मीटर दौड़ पुरा किये, नेशनल चैम्पियन भये कउनो ना पूछा। ये तीन स्टेट की पुलिस को चकमा देके एक किडनैपिंग कर लेई तो पूरा देश में पान सिंह पान सिंह हो गवो।

जाहिर है कि बागी बनने के बाद भी उसका अतीत और भविष्य का सपना- नव भारत का निर्माणदुःस्वप्न की तरह उसका पीछा करता है। लेकिन जैसा कि वह बागियों के सरदार द्वारा सरेंडर करने का आग्रह ठुकराते हुए कहता है- बाबा आप कभी रेस दौड़े हैं, बाबा रेस को एक नियम होतो है, एक बार रेस शुरू है गई, फिर आप आगे हो कि पीछे हो, रेस को पूरो कारणों पडतो है। वो दूर, वो फिनिस लें,वोको छुनो पडतो है। सो हमहू रेस पूरी करेंगे, हम हरे कि जीते… उसके लिए पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं है क्योंकि बीहड़ में दुश्मन खत्म हो जाते हैं दुश्मनी नहीं।

फिल्म के एक मार्मिम दृश्य में पान सिंह दद्दा को दौड़ा कर जमीन पर गिरा देता है और वह उसके आगे अपनी जान की भीख माँगते हुए गिड़गिड़ाता है। वह बड़ी ही आत्मीयता, तकलीफ और क्षोभ के साथ उससे यह सवाल पूछता है कि हम तो एथलीट हते। धावक। इन्टरनेशनल। अरे हमसे ऐसी का गलती है गयी। का गलती है गयी की तैने हमसे हमारो खेल को मैदान छीन लेयो। और ते लोगों ने हमारे हाथ में जे (बन्दूक) पकड़ा दी। अब हम भाग रए चम्बल के बीहड़ में। जा बात को जवाब कौन दैगो, जा बात को जवाब कौन दैगो?’

पान सिंह का यह सवाल दरअसल अपने दद्दा से ही नहीं, आजादी के बाद अस्तित्व में आयी नयी व्यवस्था के स्वप्नदर्शियों और कर्णधारों से है जिनके रचे समाज में दद्दा जैसे लोग पैदा हुए और फले-फूले। राज्य मशीनरी ने उन्हें संरक्षण दिया। बागियों को खत्म करने में दिन-रात जुटी रहने वाली राज्य मशीनरी ही बागी पैदा करने वाली सामाजिक संरचना का पोषण-संरक्षण करती रही। उसका लाभ उठाकर गाँव के इलाकों में एक नया शोषक वर्ग पैदा हुआ जो पुराने सामन्ती शोषकों से भी अधिक क्रूर, शातिर और हर तरह के सड़े-गले विचारों का पोषक है। मौजूदा व्यवस्था को टिकाये रखने वाला सबसे निचले स्तर का अवलम्ब यही वर्ग है जो 1981 से लेकर आज तक, दिन-ब-दिन और भी ताकतवर होता गया है। पान सिंह का अपने दद्दा से सवाल पूछने का सिलसिला चल ही रहा होता है कि उसके गिरोह का एक आदमी गोली दाग कर उसका काम तमाम कर देता है। पान सिंह व्याकुल होकर चीखता है-हमरो जवाब पूरो ना भयो।यह सवाल दद्दा से नहीं क्योंकि वह मार दिया गया। यह सवाल मौजूदा व्यवस्था से है और हम सब से भी है। सचमुच पान सिंह का प्रश्न अभी अनुत्तरित है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक और कच्छ से आइजल तक आज भी पान सिंह तोमर नाना रूपों में पैदा हो रहे हैं और गुमनाम मौत मर रहे हैं, जबकि उन्हें पैदा करने और मारने वाली व्यवस्था का कुछ नहीं बिगड़ रहा है। कुछ ही साल पहले की बात है, जब हरित क्रान्ति का सिरमौर जिला मुजफ्फरनगर (उ.प्र.) में कुछ ही महीने के अन्दर पचास से भी अधिक नौजवान पुलिस मुठभेड़ में मारे गये थे।

पान सिंह तोमर फिल्म में उठाये गये सवाल हमारे मौजूदा दौर के बेहद जरूरी सवाल हैं। इसका जवाब ढूँढे बिना बगावत के आत्मघाती सिलसिले को बुनियादी बदलाव की दिशा में मोड़ना और भारतीय समाज को आगे की मंजिल तक ले जाना मुमकिन नहीं।
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