फिरकापरस्त गिरोह की बढ़ती सीनाजोरी

मदनजीत सिंह
(धार्मिक कट्टरपंथी भारतीय धर्मनिरपेक्ष संविधान और अनीश्वरवादी दार्शनिक परम्पराओं का माखौल उड़ा रहे हैं, उनको चुनौती देना जरूरी है।)

       एक फ्रांसीसी पत्रकार जिसने मेरी किताब कल्चर्स एण्ड वल्चर्स पढ़ी, वह अचम्भे में पड़ गया कि आध्यात्मिक भारत में मेरे नास्तिक विश्वास और सिख धर्म का सहअस्तित्व कैसे कायम है।

    
मेरे नास्तिक विश्वास उस सिख धर्म से जुदा नहीं है जो मूलतः हिन्दू दर्शन पर आधारित है। मैंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के उपकुलपति के रूप में डॉ. एस. राधाकृष्णन द्वारा लिखे जाने वाले गीता के प्रवचनों का हवाला दिया। विद्यार्थी उस दार्शनिक से यह जानकारी पाकर दंग रह गये थे कि उत्तर मिमांसा जिसे वेदान्त के नाम से भी जाना जाता है, उसे छोड़कर हिन्दू दर्शन की अधिकांश शास्त्रीय प्रणालियाँ ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करती हैं। उन्होंने कहा कि न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्व मिमांसा तथा वृहस्पति का चार्वाक, महावीर का जैन धर्म, थेरावद बौद्ध धर्म जैसे सभी शुरूआती मत अज्ञेयवादी थे। गौतम सिद्धार्थ बुद्ध (569-483 ईसापूर्व) ने धरती को अपनी ज्ञान प्राप्ति का साक्षी मानते हुए उसका ही स्पर्श किया था।
       
 रोमिला थापर ने यूनेस्को की किताब मानवता का इतिहास का संशोधन करने के लिए आयोजित बैठक में इस बात पर बल दिया था। इस प्रख्यात इतिहासकार ने कहा कि आध्यात्मिक भारत” में अनीश्वरवादी भौतिकवाद का सबसे पहले प्रतिपादन करने वाने चार्वाक थे। उन्होंने भाग्य”, “आत्मा” यापरलोकजैसी अलौकिक बातों को बकवास बताते हुए खारिज कर दिया था। अजीत केशकम्बली बुद्ध के समकालीन थे। उनका मानना था कि मनुष्य धूल से धूल में, राख से राख में और धरती से धरती में मिल जाता है और इस दुनिया के अलावा कोई और दुनिया नहीं है। उन्होंने वेद के रचयिताओं को “विदूषक धूर्त और दानवकहा था।
       
आश्चर्यजनक है कि केशकम्बलीन के विचार 25 शताब्दियों तक कैसे गूढ़ रहस्य बने रहे और हमारे युग में एक नास्तिक और वेदों के कटु आलोचक इ. वी. रामास्वामी ने फिर से उनका आवाहन किया। उनहोंने हिन्दू देवी-देवताओं की नकल करते हुए हजारों औरतों और मर्दों को प्रदर्शन के लिए सड़क पर उतारा। यूनेस्कों ने अभूर्तपूर्व प्रशंसा-पत्र के द्वारा उन्हें सम्मानित किया- नये युग केमसीहा, दक्षिण एशिया के सुकरात, सामाजिक सुधार आन्दोलन के जनक तथा अज्ञानता, अंधविश्वास, व्यर्थ परम्पराओं और घटिया रीति-रिवाज के दुश्मन।‘’1973 में उनकी मृत्यु होने तक भारत के लोग खुलकर अपने मन की बात कहने में समर्थ थे। दलित ‘’राष्ट्र विरोधी’’ का ठप्पा लगाये जाने के बगैर मनुस्मृति की भर्त्सना कर पाते थे। ऑब्रे मेनन के रामायण को पढ़कर लोग हंस सकते थे जिसमें उन्होंने अन्दाजा लगाया था कि सीता का अपहराण नहीं हुआ था बल्कि वह लंका के खूबसूरत राजा के साथ भाग गयी थी। तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एम. करूणानिधि तो नास्तिक हैं, इस बात का मजाक उड़ाया था कि मन्नार की खाड़ी के आर-पार रामसेतु पुल का निर्माण बंदरों ने किया था। उन्होंने पूछा कि- “राम क्या?” “यह राम कौन हैं?” किस इंजीनियरिंग कॉलेज से राम ने पढ़ाई की थी?
        
वोट बैंक
        
हिन्दू राजनीतिक एजेन्ट ने नास्तिकता से भ्रष्ट होने वाली हिन्दू धर्म की अज्ञेयवादी दार्शनिक प्रणाली को खारिज कर दिया। वोट बैंक को लक्ष्य बनाते हुए उन्होंने मेरे दोस्त एम. एम. हुसैन पर इल्जाम लगाया  कि वे हिन्दू देवियों का अश्लील चित्र बनाते हैं जबकि परम्परागत रूप से उन्हें मंदिरों और तीर्थस्थानों में नग्न रूप में चित्रित किया जाता  रहा है। हिन्दू पर्सनल ला बोर्ड ने उस महान कलाकार का सर काटने वाले को 5 लाख करोड़ का इनाम घोषित किया। बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद के कार्यक्रमों ने उनके मुम्बई स्थित आवास को तहस-नहस किया तथा हुसैन की आंखें फोड़ने और हाथ काटने वालों के लिए पैसे और सोने की ईंट देने का एलान किया- जैसा कि कुरान की आयतों में मुसलमानों  का आहवान करते हुए लिखा हैं- “काफिरों को मार डालो और उनके सर और उँगलियाँ काट डाला।”

इस्लामी ’’संगसार करने वाले’’ (उन लोगों में से जो हज यात्रा के दौरानकाफिरको पत्थर मारते हैं।) संघ परिवार के फंडूसों’’ (यह उपाधि लेखिका गीता हरिहरन ने दी है) के साम्प्रदायिक गिरोह में छलांग मार कर चढ़ गये। ऑल इंडिया उलेमा कौंसिल ने हुसैन की फिल्म मीनाक्षी दिखाये जाने के खिलाफ प्रदर्शन किया जिसके एक गाने में औरतों के सौंदर्य की प्रशंसा करने वाले एक गीत की पंक्तियां पैगाम्बर हजरत मोहम्मद के व्यक्तित्व की प्रसंशा में लिखे धार्मिक पदों से मिलती थी। इस धमकी के बाद वह फिल्म सिनेमा घरों से हटा दी गयी।

इन्हीं घटनाओं के दौरान उनके खिलाफ मैंने ऑल इंडिया कौंसिल के प्रमुख तकी रजा खान के खिलाफ डंडा उठाया जो चाहते थे कि तस्लीमा नसरीन को भारत से निकाल बाहर किया जाय, जिसने औरतों के अधिकारों का उलंघन करने वाले शरिया कानूनों की आलोचना की थी। उसने तसलीमा को कत्ल करने वाले के लिए 5 लाख का इनाम घोषित किया था। 2005 में उसे कोलकाता में रहने और काम करने की इजाजत दी गयी थी। अपने सांस्कृतिक वातावरण के चलते कोलकाता तस्लीमा का प्रिय शहर था।
       
तकी रजा खान को 2007 के स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान अनपेक्षित सहयोगी मिल गया, जब कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने मुस्लिम वोट की लालसा में तस्लीमा और साथ ही सीपीएम के खिलाफ एक प्रदर्शन को उकसाया। 22 नवम्बर को पुलिस के पहरे में उसे कोलकाता से बाहर कर दिया गया। पहले उसे हवाई जहाज से जयपुर भेजा गया और फिर उसी दिन दिल्ली ले जाकर एकान्तवास में रखा गया। मानवाधिकार के उलंघन से क्रुद्ध होकर मैंने कई सरकारी अधिकारियों से सम्पर्क साधा और हफ़्तों तक ज्योति बसु सहित कई राजनेताओं से पत्राचार करता रहा। जब ये सभी प्रयास यहां तक कि भूख हड़ताल करने की धमकी भी बेअसर रही तब मैंने मनमोहन सिंह को यह दलील देते हुए पत्र लिखा कि तसलीमा का कोलकाता से निकाला जाना भारत की सांस्कृतिक परम्परा के खिलाफ है। मैंने 5 वीं शताब्दी में राजा सिबी के शासनकाल में बनायी गयी अजन्ता चित्र-कलाओं की ओर  उनका घ्यानआकृष्ट किया, जिन्होंने एक पंडुक (पंछी) के वजन भर मांस देना स्वीकार कर लिया था।
      
प्रधानमंत्री हमारे पत्रों की प्राप्ति सूचना देते रहे, लेकिन 4 अप्रैल 2008 को लिखे उनके दो पन्ने के पत्र का पारदर्शी सदभाव और मर्म अभूतपूर्व था। अन्तिम पंक्तियों में भारत के धर्मनिरपेक्ष विचार तथा मानवाधिकार और मान-सम्मान के आदर की पुष्टि की गयी थी। उन्होंने लिखा- “जाति और पंथ, समुदाय और धर्म के भेदभाव से ऊपर उठ कर लोगों का स्वागत करने की गौरवशाली भारतीय पटकथा जारी रहेगी देश के भीतर एक छोटे से हिस्से द्वारा नफरत का माहौल तैयार करने की लगातार कोशिशे हमें इस परम्परा पर कायम रहने से नहीं रोक पायेंगी। हम तसलीमा नसरीन के अपने पसंद के किसी भी देश में, इस मामले में भारत में रहने के अधिकार को स्वीकार करते है। वे जिस शहर या राज्य में रहना पसंद करें उसका विकल्प उनके लिए खुला है।” तसलीमा बहुत खुश हुई कि अब वह दिल्ली में मेरी मेहमान के रूप में जब तक जी चाहे रह पायेंगी।
       
एक स्वांग
    
उस पत्र से धार्मिक भावनाएँ  आहात होने के राजनीतिक स्वांग को रोकने की जो उम्मीद जगी थी वह झूठी साबित हुई, जब कोलकाता पुस्तक मेले में तस्लीमा की किताब निर्वासन  को रोका गया। इसके पहले देवबंद के सदस्यों ने सलमान रूश्दी को जयपुर साहित्य उत्सव में भाग लेने से रोका था। धार्मिक कट्टरपंथियों ने फिर उसी हास्यास्पद  नाटक को दोहराया और सटेनिक वर्सेज के अंश पढ़ने वाले चार प्रतिनिधियों के खिलाफ उनकी नीयतको लेकर मुकदमा दायर करने की पहल की। इसने भारतीय न्यायशास्त्र को अनुच्छेद 19 (2) के तहत अभिव्यक्ति की आजादी की अंतहीन व्याख्या के दलदल में धकेल दिया।

अदालतें तब तक धार्मिक कट्टरता के नागपाश से मुक्त नहीं हो सकती, जब तक फंडूस और संगसार करने वाले किसी मामले को साम्प्रदायिक रूप से परिभाषित करते रहेंगे और भारत की अज्ञेयवादी सभ्यता को नजअंदाज करते रहेंगे जो भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान का स्रोत है। मुझे धर्मनिरपेक्ष विचार अपनी माता सुमित्रा कौर से विरासत में मिले हैं जिनकी मृत्यु 18 मार्च 1987 को हुई। सिख आदिग्रन्थ जिस मंजूषा में रखा जाता था उसके ऊपर अमरीकी विश्वविद्यालय के छात्रों को सम्बोधित कर रहे स्वामी विवेकानन्द का चित्र था, पांडीचेरी के अरविंद आश्रम की माँका हाथ से बना रेखाचित्र था और लघुचित्र शैली में उस सूफी सन्त मियाँ  मीर की पेन्टिंग थी, जिन्होंने अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर की आधारशिला रखी थी। सिख पवित्र ग्रन्थ में हिन्दू और मुसलमान दोनों ही समुदाय के सन्तों की कवितायें शामिल हैं-कबीर, नामदेव, शेख फरीद और दूसरे भक्त कवि जो संकीर्णतावादी व्याख्याओं के जरिये ईश्वर को सीमित नहीं करना चाहते थें।
 
गुरू नानक का सिख समप्रदाय भारत की उस बहुसांस्कृतिक सभ्यता से प्रेरित है जो यहाँ के परम्परागत अज्ञेयवादी दर्शन के प्रतिमानों को प्रतिबिम्बित करती है। उन्होंने जाति प्रथा, खोखले धार्मिक रिवाज, तीर्थयात्रा और चमत्कारों की निन्दा की। जीवन भर साथ रहने वाले उनके दो अनुयायियों में से एक बाला हिन्दू था और दूसरा मर्दानामुसलमान  रबाब वादक था। उन्हीं दोनों की मदद से उन्होंने धार्मिक स्थल का निर्माण कराया जिसमें हिन्दू ईंटे और सूफी इस्लाम का मुस्लिम गाराइस्तेमाल किया गया था, जैसा कि खुशवंत सिंह ने अपनी किताबद हिस्ट्री और द सिख्स  में लिखा है।
       
मेरी धर्मनिरपेक्ष और नास्तिक भावनाएँ  बुरी तरह आहत हैं। मैं वकीलों से सलाह मशवरा कर रहा हूँ ताकि धर्मनिरपेक्ष संविधान और अज्ञेयवादी दर्शन का माखौल उड़ाने वाले धार्मिक कट्टरपंथियों के खिलाफ कार्रवाई की जा सके।
 
(
यूनेस्को के सद्भावना दूत मदनजीत सिंह साउथ एशिया फांउडेशन के संस्थापक हैं। उनका यह लेख 16 मार्च 2012 के द हिन्दू में प्रकाशित हुआ था जिसका अनुवाद आभार सहित प्रस्तुत है।)
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