Monthly Archives: March 2012

डेंगू मुक्त क्यूबाः एक और कीर्तिस्तंभ

क्यूबा ने शोध प्रयासों के जरिये अपने दे को डेंगू बुखार से मुक्त कर लिया है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन
क्यूबा के वैज्ञानिक मारिया जी गुजमान और गुस्तावो कोरी ने बताया कि क्यूबा यह दिखाता है कि कैसे संसाधनों की कमी होते हुए भी कोई दे शोध कार्यों के जरिये डेंगू जैसी वैश्विक स्वास्थ्य समस्या से निपट सकता है।
लेखकों के अनुसार हमारे देश ने पूर्ण रूप से स्थानीय स्तर पर प्रासंगिक मूलभूत समस्याओं को निशाना बनाकर और व्यवहार में लाये जाने वाले शोध के जरिये असंभव-सा लगने वाले इस काम को कर दिखाया है।
क्यूबा के स्वदेशी अध्यनों ने इस बुखार से सम्बंधित उसकी जानकारी को बेहतर बनाया और अपने द्वीप के प्रसंग में इसकी खासियतों को उजागर किया जैसे मनुष्यों में डेंगू प्रतिरोधी जीन का मौजूद होना।
लेखकों के अनुसार स्थानीय शोधकार्यों से नये-नये निदान उपकरण बनाये गये हैं जिनकी सहायता से देशभर में फैले प्रयोगशालाओं के जाल की सहायता से खून के नमूनों का विश्लेषण किया जाता है इसी की देन है कि रोग निगरानी करने की उसकी क्षमता काफी बढ़ गयी है और क्यूबा आत्मनिर्भर हो गया है। अपने भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन के जरिये क्यूबा ने इन कामों को बखूबी अंजाम दिया। टीका लगाने वाली 2 दवाईयाँ भी विकसित की गयी हैं जो अब इलाज से पहले किये जाने वाले मूल्यांकन के काफी आगे के चरण में हैं।
वेक्टर कंट्रोल योजनाओंकी सूचना देने के लिए भी शोध जानकारी का उपयोगकिया जाता है। इसका स्तेमाल कीट विज्ञान संबंधी शोधकार्यो जैसेकीटनाकों के प्रतिरोध की प्रक्रिया का अध्ययन करने या ऐसे पर्यावरण संबंधी लक्षणों का पता लगाने में किया जाता है जो डेंगू-वाहक मच्छरों को फैलाने में मदद करते हैं।
लेखकों के अनुसार वेक्टर कंट्रोल योजनामें स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ाने के लिए कुछ अन्य जाँच पड़ताल किये जा रहे हैं। यह काम काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि डेंगू फैलाने वाले मच्छरों का मौजूद होना मानव व्यवहार पर निर्भर करता है।
यह अध्ययन लान्सेट नामक ख्यातिलब्ध मैडिकल जनरल में प्रकाशित हुआ है। क्यूबा ने एक बार यह फिर साबित किया है कि अपने देश के स्रोत-साधनों और जनता की सहभागिता के बलबूते बड़ी से बड़ी समस्या का समाधन किया जा सकता है। हमारे देश की राजधानी में हर साल डेंगू एक महामारी का रूप ले लेता है और सरकारी तंत्र तमाशादेखता रह जाता है। दूर देहात में गाँव के गाँव ऐसी बीमारियों की चपेट में होते हैं और हजारों लोग सवास्थ्य सेवाओं के निजीकरण और मुनाफाखोरी की भेंट चढ़ जाते हैं। सबके लिए स्वास्थ्य की गारण्टी उसी समाज में सम्भव है जो सामाजिक न्याय और समानता पर आधरित हो।
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ईरान पर हमला करना क्यों जरूरी है– दस समुचित कारण

  — डेविड स्वांसन
1. अगर ईरान पर हमला किया गया तो वह जबाबी कार्रवाई करेगा, जो कि एक युद्ध अपराध होगा। और युद्धअपराध के लिए सजा देना जरुरी है।
2. मेरे टेलीविजन ने कहा है कि ईरान के पास नाभिकीय हथियार हैं। मुझे पूरा यकीन है कि इस बार  तो यह बात सही है ही। यही बात उत्तरी कोरिया के मामले में भी सही है। हम केवल उन्ही देशों पर बमबारी करते हैं जिनके पास या तो सचमुच में नाभिकीय हथियार होते हैं या वे बुराई की धुरी होते हैं।
केवल इराक को छोड़कर, उसकी बात कुछ और थी।
3. इराक की हालत बहुत बुरी नहीं है। अगर इस बात को ध्यान में रखा जाए कि वहाँ की सरकार कितनी घटिया है, तो बहुत सारे लोगों के मरने या देश छोड़कर चले जाने के बाद वहाँ की स्थिति काफी बेहतर हो गयी है। यह सब नहीं हो पाता अगर हमने योजना के अनुसार काम न किया होता

4. जब हमने ईरान से तेल नहीं खरीदने की ध्मकी दी तो ईरान ने हमें तेल नहीं देने की धमकी दी, जो बिल्कुल भी बर्दाश्त से बाहर है। हम उस तेल के बिना क्या कर पायेंगे? और यदि वह बेचने पर राजी ही हो जाये, तो खरीदने से क्या फायदा?

5. 9/11 की घटना में ईरान का गुप्त रूप से हाथ था। मैंने इसे ऑनलाइन पढ़ा है। और अगर उसका हाथ नहीं था तो यह और भी बुरी बात है। ईरान ने सदियों से किसी दूसरे देश पर हमला नहीं किया, इसका मतलब ही है कि वह जल्द ही हमला करेगा।

6. अमरीकियों और इजरायलियों से भिन्न ईरानी कट्टर धर्मिक होते हैं ज्यादातर इजरायली ईरान पर हमला नहीं चाहते। पर वहाँ की पवित्र सरकार हमला चाहती है। इस फैसले का विरोध करना ईश्वर के विरूद्ध पाप है।
7. (अ) ईरानी इतने मूर्ख हैं कि जब हमने उसके वैज्ञानिकों की हत्या की तो उन्होंने टैक्सास में भाडे़ पर एक कार डीलर किया, ताकि मैक्सिको में भाडे़ पर एक नशीले पदार्थ की तस्करी करने वाले गिरोह को रखे, ताकि वाशिंगटन स्थित सउदी अरब के राजदूत की हत्या करेंऔर उन्होंने किया भी नहीं– इतना कुछ इसलिए कि हम उनको पकडें और हमारी बदनामी हो। 
7. (ब) ओह! इन मूर्खों पर तो बमबारी कर देना चाहिये। वे सभ्य नहीं है।
8. युद्ध अमरीका की अर्थव्यवस्था के लिये फायदेमन्द है और ईरान के लिए भी। ईरान में मौजूद अमरीकी फौजी वहाँ का सामान खरीदेंगे। और जो महिलाएँ युद्ध के बाद जिंदा बचेंगी उनको ज्यादा अधिकार होंगे। जैसा वर्जीनिया में हुआ था। 1953 की उस छोटी सी दुर्घटना (अमरीका द्वारा ईरान की चुनी हुई मोशद्दक सरकार की तख्ता-पलट) के बाद हम ईरान के शुक्रगुजार हैं।

9. इस पूरे क्षेत्र को एकजुट करने का बस यही एक तरीका है। या तो हम ईरान पर बमबारी करें और वह हमारे प्रति शाश्वत प्रेम की पथ ले। या अगर जरूरी हो तो ईरान की मुक्ति के लिये हम उस पर कब्जा कर लें, जैसे हमने उसके पडोसी दे के साथ किया। इसमें ज्यादा समय नहीं लगेगा। देखिए तो सही, अपफगानिस्तान की हालत कितनी अच्छी है।

10. वे हमारा ड्रोन वापस नहीं दे रहे हैं। अब बहुत हुआ।

(डेविड स्वांसन कई युद्ध-विरोधी पुस्तकों के लेखक और सक्रीय कार्यकर्ता हैं वे ऑनलाइन कार्यकर्ताओं की संस्था ( www://rootsanction.org ) में काम करते हैं यह लेख काउंटरपंच से लेकर अनूदित  गया है।)

फिरकापरस्त गिरोह की बढ़ती सीनाजोरी

मदनजीत सिंह
(धार्मिक कट्टरपंथी भारतीय धर्मनिरपेक्ष संविधान और अनीश्वरवादी दार्शनिक परम्पराओं का माखौल उड़ा रहे हैं, उनको चुनौती देना जरूरी है।)

       एक फ्रांसीसी पत्रकार जिसने मेरी किताब कल्चर्स एण्ड वल्चर्स पढ़ी, वह अचम्भे में पड़ गया कि आध्यात्मिक भारत में मेरे नास्तिक विश्वास और सिख धर्म का सहअस्तित्व कैसे कायम है।

    
मेरे नास्तिक विश्वास उस सिख धर्म से जुदा नहीं है जो मूलतः हिन्दू दर्शन पर आधारित है। मैंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के उपकुलपति के रूप में डॉ. एस. राधाकृष्णन द्वारा लिखे जाने वाले गीता के प्रवचनों का हवाला दिया। विद्यार्थी उस दार्शनिक से यह जानकारी पाकर दंग रह गये थे कि उत्तर मिमांसा जिसे वेदान्त के नाम से भी जाना जाता है, उसे छोड़कर हिन्दू दर्शन की अधिकांश शास्त्रीय प्रणालियाँ ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करती हैं। उन्होंने कहा कि न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्व मिमांसा तथा वृहस्पति का चार्वाक, महावीर का जैन धर्म, थेरावद बौद्ध धर्म जैसे सभी शुरूआती मत अज्ञेयवादी थे। गौतम सिद्धार्थ बुद्ध (569-483 ईसापूर्व) ने धरती को अपनी ज्ञान प्राप्ति का साक्षी मानते हुए उसका ही स्पर्श किया था।
       
 रोमिला थापर ने यूनेस्को की किताब मानवता का इतिहास का संशोधन करने के लिए आयोजित बैठक में इस बात पर बल दिया था। इस प्रख्यात इतिहासकार ने कहा कि आध्यात्मिक भारत” में अनीश्वरवादी भौतिकवाद का सबसे पहले प्रतिपादन करने वाने चार्वाक थे। उन्होंने भाग्य”, “आत्मा” यापरलोकजैसी अलौकिक बातों को बकवास बताते हुए खारिज कर दिया था। अजीत केशकम्बली बुद्ध के समकालीन थे। उनका मानना था कि मनुष्य धूल से धूल में, राख से राख में और धरती से धरती में मिल जाता है और इस दुनिया के अलावा कोई और दुनिया नहीं है। उन्होंने वेद के रचयिताओं को “विदूषक धूर्त और दानवकहा था।
       
आश्चर्यजनक है कि केशकम्बलीन के विचार 25 शताब्दियों तक कैसे गूढ़ रहस्य बने रहे और हमारे युग में एक नास्तिक और वेदों के कटु आलोचक इ. वी. रामास्वामी ने फिर से उनका आवाहन किया। उनहोंने हिन्दू देवी-देवताओं की नकल करते हुए हजारों औरतों और मर्दों को प्रदर्शन के लिए सड़क पर उतारा। यूनेस्कों ने अभूर्तपूर्व प्रशंसा-पत्र के द्वारा उन्हें सम्मानित किया- नये युग केमसीहा, दक्षिण एशिया के सुकरात, सामाजिक सुधार आन्दोलन के जनक तथा अज्ञानता, अंधविश्वास, व्यर्थ परम्पराओं और घटिया रीति-रिवाज के दुश्मन।‘’1973 में उनकी मृत्यु होने तक भारत के लोग खुलकर अपने मन की बात कहने में समर्थ थे। दलित ‘’राष्ट्र विरोधी’’ का ठप्पा लगाये जाने के बगैर मनुस्मृति की भर्त्सना कर पाते थे। ऑब्रे मेनन के रामायण को पढ़कर लोग हंस सकते थे जिसमें उन्होंने अन्दाजा लगाया था कि सीता का अपहराण नहीं हुआ था बल्कि वह लंका के खूबसूरत राजा के साथ भाग गयी थी। तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एम. करूणानिधि तो नास्तिक हैं, इस बात का मजाक उड़ाया था कि मन्नार की खाड़ी के आर-पार रामसेतु पुल का निर्माण बंदरों ने किया था। उन्होंने पूछा कि- “राम क्या?” “यह राम कौन हैं?” किस इंजीनियरिंग कॉलेज से राम ने पढ़ाई की थी?
        
वोट बैंक
        
हिन्दू राजनीतिक एजेन्ट ने नास्तिकता से भ्रष्ट होने वाली हिन्दू धर्म की अज्ञेयवादी दार्शनिक प्रणाली को खारिज कर दिया। वोट बैंक को लक्ष्य बनाते हुए उन्होंने मेरे दोस्त एम. एम. हुसैन पर इल्जाम लगाया  कि वे हिन्दू देवियों का अश्लील चित्र बनाते हैं जबकि परम्परागत रूप से उन्हें मंदिरों और तीर्थस्थानों में नग्न रूप में चित्रित किया जाता  रहा है। हिन्दू पर्सनल ला बोर्ड ने उस महान कलाकार का सर काटने वाले को 5 लाख करोड़ का इनाम घोषित किया। बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद के कार्यक्रमों ने उनके मुम्बई स्थित आवास को तहस-नहस किया तथा हुसैन की आंखें फोड़ने और हाथ काटने वालों के लिए पैसे और सोने की ईंट देने का एलान किया- जैसा कि कुरान की आयतों में मुसलमानों  का आहवान करते हुए लिखा हैं- “काफिरों को मार डालो और उनके सर और उँगलियाँ काट डाला।”

इस्लामी ’’संगसार करने वाले’’ (उन लोगों में से जो हज यात्रा के दौरानकाफिरको पत्थर मारते हैं।) संघ परिवार के फंडूसों’’ (यह उपाधि लेखिका गीता हरिहरन ने दी है) के साम्प्रदायिक गिरोह में छलांग मार कर चढ़ गये। ऑल इंडिया उलेमा कौंसिल ने हुसैन की फिल्म मीनाक्षी दिखाये जाने के खिलाफ प्रदर्शन किया जिसके एक गाने में औरतों के सौंदर्य की प्रशंसा करने वाले एक गीत की पंक्तियां पैगाम्बर हजरत मोहम्मद के व्यक्तित्व की प्रसंशा में लिखे धार्मिक पदों से मिलती थी। इस धमकी के बाद वह फिल्म सिनेमा घरों से हटा दी गयी।

इन्हीं घटनाओं के दौरान उनके खिलाफ मैंने ऑल इंडिया कौंसिल के प्रमुख तकी रजा खान के खिलाफ डंडा उठाया जो चाहते थे कि तस्लीमा नसरीन को भारत से निकाल बाहर किया जाय, जिसने औरतों के अधिकारों का उलंघन करने वाले शरिया कानूनों की आलोचना की थी। उसने तसलीमा को कत्ल करने वाले के लिए 5 लाख का इनाम घोषित किया था। 2005 में उसे कोलकाता में रहने और काम करने की इजाजत दी गयी थी। अपने सांस्कृतिक वातावरण के चलते कोलकाता तस्लीमा का प्रिय शहर था।
       
तकी रजा खान को 2007 के स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान अनपेक्षित सहयोगी मिल गया, जब कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने मुस्लिम वोट की लालसा में तस्लीमा और साथ ही सीपीएम के खिलाफ एक प्रदर्शन को उकसाया। 22 नवम्बर को पुलिस के पहरे में उसे कोलकाता से बाहर कर दिया गया। पहले उसे हवाई जहाज से जयपुर भेजा गया और फिर उसी दिन दिल्ली ले जाकर एकान्तवास में रखा गया। मानवाधिकार के उलंघन से क्रुद्ध होकर मैंने कई सरकारी अधिकारियों से सम्पर्क साधा और हफ़्तों तक ज्योति बसु सहित कई राजनेताओं से पत्राचार करता रहा। जब ये सभी प्रयास यहां तक कि भूख हड़ताल करने की धमकी भी बेअसर रही तब मैंने मनमोहन सिंह को यह दलील देते हुए पत्र लिखा कि तसलीमा का कोलकाता से निकाला जाना भारत की सांस्कृतिक परम्परा के खिलाफ है। मैंने 5 वीं शताब्दी में राजा सिबी के शासनकाल में बनायी गयी अजन्ता चित्र-कलाओं की ओर  उनका घ्यानआकृष्ट किया, जिन्होंने एक पंडुक (पंछी) के वजन भर मांस देना स्वीकार कर लिया था।
      
प्रधानमंत्री हमारे पत्रों की प्राप्ति सूचना देते रहे, लेकिन 4 अप्रैल 2008 को लिखे उनके दो पन्ने के पत्र का पारदर्शी सदभाव और मर्म अभूतपूर्व था। अन्तिम पंक्तियों में भारत के धर्मनिरपेक्ष विचार तथा मानवाधिकार और मान-सम्मान के आदर की पुष्टि की गयी थी। उन्होंने लिखा- “जाति और पंथ, समुदाय और धर्म के भेदभाव से ऊपर उठ कर लोगों का स्वागत करने की गौरवशाली भारतीय पटकथा जारी रहेगी देश के भीतर एक छोटे से हिस्से द्वारा नफरत का माहौल तैयार करने की लगातार कोशिशे हमें इस परम्परा पर कायम रहने से नहीं रोक पायेंगी। हम तसलीमा नसरीन के अपने पसंद के किसी भी देश में, इस मामले में भारत में रहने के अधिकार को स्वीकार करते है। वे जिस शहर या राज्य में रहना पसंद करें उसका विकल्प उनके लिए खुला है।” तसलीमा बहुत खुश हुई कि अब वह दिल्ली में मेरी मेहमान के रूप में जब तक जी चाहे रह पायेंगी।
       
एक स्वांग
    
उस पत्र से धार्मिक भावनाएँ  आहात होने के राजनीतिक स्वांग को रोकने की जो उम्मीद जगी थी वह झूठी साबित हुई, जब कोलकाता पुस्तक मेले में तस्लीमा की किताब निर्वासन  को रोका गया। इसके पहले देवबंद के सदस्यों ने सलमान रूश्दी को जयपुर साहित्य उत्सव में भाग लेने से रोका था। धार्मिक कट्टरपंथियों ने फिर उसी हास्यास्पद  नाटक को दोहराया और सटेनिक वर्सेज के अंश पढ़ने वाले चार प्रतिनिधियों के खिलाफ उनकी नीयतको लेकर मुकदमा दायर करने की पहल की। इसने भारतीय न्यायशास्त्र को अनुच्छेद 19 (2) के तहत अभिव्यक्ति की आजादी की अंतहीन व्याख्या के दलदल में धकेल दिया।

अदालतें तब तक धार्मिक कट्टरता के नागपाश से मुक्त नहीं हो सकती, जब तक फंडूस और संगसार करने वाले किसी मामले को साम्प्रदायिक रूप से परिभाषित करते रहेंगे और भारत की अज्ञेयवादी सभ्यता को नजअंदाज करते रहेंगे जो भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान का स्रोत है। मुझे धर्मनिरपेक्ष विचार अपनी माता सुमित्रा कौर से विरासत में मिले हैं जिनकी मृत्यु 18 मार्च 1987 को हुई। सिख आदिग्रन्थ जिस मंजूषा में रखा जाता था उसके ऊपर अमरीकी विश्वविद्यालय के छात्रों को सम्बोधित कर रहे स्वामी विवेकानन्द का चित्र था, पांडीचेरी के अरविंद आश्रम की माँका हाथ से बना रेखाचित्र था और लघुचित्र शैली में उस सूफी सन्त मियाँ  मीर की पेन्टिंग थी, जिन्होंने अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर की आधारशिला रखी थी। सिख पवित्र ग्रन्थ में हिन्दू और मुसलमान दोनों ही समुदाय के सन्तों की कवितायें शामिल हैं-कबीर, नामदेव, शेख फरीद और दूसरे भक्त कवि जो संकीर्णतावादी व्याख्याओं के जरिये ईश्वर को सीमित नहीं करना चाहते थें।
 
गुरू नानक का सिख समप्रदाय भारत की उस बहुसांस्कृतिक सभ्यता से प्रेरित है जो यहाँ के परम्परागत अज्ञेयवादी दर्शन के प्रतिमानों को प्रतिबिम्बित करती है। उन्होंने जाति प्रथा, खोखले धार्मिक रिवाज, तीर्थयात्रा और चमत्कारों की निन्दा की। जीवन भर साथ रहने वाले उनके दो अनुयायियों में से एक बाला हिन्दू था और दूसरा मर्दानामुसलमान  रबाब वादक था। उन्हीं दोनों की मदद से उन्होंने धार्मिक स्थल का निर्माण कराया जिसमें हिन्दू ईंटे और सूफी इस्लाम का मुस्लिम गाराइस्तेमाल किया गया था, जैसा कि खुशवंत सिंह ने अपनी किताबद हिस्ट्री और द सिख्स  में लिखा है।
       
मेरी धर्मनिरपेक्ष और नास्तिक भावनाएँ  बुरी तरह आहत हैं। मैं वकीलों से सलाह मशवरा कर रहा हूँ ताकि धर्मनिरपेक्ष संविधान और अज्ञेयवादी दर्शन का माखौल उड़ाने वाले धार्मिक कट्टरपंथियों के खिलाफ कार्रवाई की जा सके।
 
(
यूनेस्को के सद्भावना दूत मदनजीत सिंह साउथ एशिया फांउडेशन के संस्थापक हैं। उनका यह लेख 16 मार्च 2012 के द हिन्दू में प्रकाशित हुआ था जिसका अनुवाद आभार सहित प्रस्तुत है।)

राजनीति में जाति का जुड़ाव जीवंत सामाजिक सच्चाइयों से है.

जोसेफ तारामंगलम
जाति भारतीय सामाजिक जीवन का इतना प्रभावी लक्षण क्यों है? द हिंदूमें प्रकाशित लेख (भारत की नियति जाति में जकड़े रहना नहीं, २१ फरवरी) में आंद्रे बताई का मानना है कि राजनीति और मीडिया के चलते ही जाति आज भी जीवित है. भारतीय संविधान ने भी शायद कुछ भूमिका निभाई है. नागरिकों का राष्ट्र और नागरिक अधिकारों की स्थापना के साथ ही इसने जाति को भी जीवित रखा. राजनीति के बाहर धीरे-धीरे, लेकिन लगातार होने वाले ढेर सारे बदलावों ने आपसी खान-पान, अंतरजातीय विवाह और जाति आधारित पेशों जैसे कई मामलों में जाति प्रथाओं और जाति चेतना को रूपांतरित किया है.
यह आम तौर पर स्वीकृत दृष्टिकोण है और इसमें ताज्जुब की कोई बात नहीं कि समाजशास्त्री जिसको विशिष्ठता (ठोस) से सर्वव्यापकता (सामान्य) की ओर आगे बढ़ना कहते हैं, आधुनिकता की ताकतें उससे संबद्ध होती हैं. हमने इसे भारत में रेलवे के आने के साथ देखा, जिसमे अलग-अलग जातियों के लिए अलग से डब्बे का इंतजाम नहीं किया गया था. इसलिए हमें यह मान लेना चाहिए कि बताई जिन बदलावों को दर्शाते हैं, भले ही वे उन्हें थोडा बढ़ा-चढा के बता रहे हों, लेकिन बदलाव आये हैं. यह तथ्य कि भारत में अपने हाथों से मल-मूत्र साफ करने वाले तीन लाख से भी ज्यादा लोग लगभग पूरी तरह दलित समुदाय से आते हैं, निश्चय ही इस मुद्दे पर गंभीर चिंतन के लिए उकसाता है. यह जानना भी दिलचस्प होगा कि अब से छह दशक पहले बताई ने जिस तमिलनाडु में अपना पीएचडी शोध किया था, वहाँ के गांवों में आपसी खान-पान कितना है और कितने लोग अंतरजातीय विवाह करते हैं. 
पहुँच पर पाबन्दी 
बताई के तर्कों के साथ समस्या यह है कि इसमें जाति के कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं की अनदेखी की गयी है जो लगातार मजबूती के साथ जारी हैं और शायद ठेठ भारतीय विकास के कुछ खास  लक्षणों को मजबूत करने में सहायक हैं. जाति के ये पहलू उस भौतिक आधार पर टिके हुए हैं जो जीविका के संसाधनों और जोर-जबर के साधनों के ऊपर बेहद भेदभावपूर्ण नियंत्रण से तय होता है. इनका इस्तेमाल अब पवित्रता/अपवित्रता के विधि-विधान को जबरन लागू करवाने के लिए नहीं, बल्कि पुराने और नए संसाधनों और अवसरों तक बहुसंख्य दलितों और अन्य पिछड़ी जातियों की पहुँच पर पाबंदी लगाने के लिए किया जाता है. जाति की राजनीति को अगर इस सन्दर्भ के बाहर या इन सच्चाइयों से काट कर देखें तो उसे समझ पाना मुमकिन नहीं.
सामाजिक सूचक 
भारत के विकास का एक सुस्पष्ट विरोधाभास उन देशज प्रवंचनाओं पर कुछ रोशनी डाल सकता है जिनका शिकार निम्न जातियां हैं. ऊँची वृद्धि दर के बावजूद, भारत की हालत प्रतिव्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद और आर्थिक वृद्धि के मामले में निचले स्तर के विकासशील देशों से भी खराब है. प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और भारतीय संगठनों द्वारा जितने भी तरह के सामाजिक सूचक मुहैया कराये जाते हैं (जैसे- मानव विकास सूचकांक, बहुआयामी गरीबी सूचकांक, वैश्विक भूख सूचकांक) उन सभी मामलों में स्थिति दयनीय है. मानव विकास सूचकांक के निम्न स्तर (१६९ देशों की सूची में भारत का ११९ वाँ स्थान है, जबकि चीन का ८९ वाँ) के लिए प्राथमिक शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सामान्य सूचकों का स्तर भी बहुत ही खराब होना जिम्मेदार है. खास तौर पर शिशु मृत्यु दर, कुपोषण, कमवजन और छोटे कद वाले बच्चों तथा कमवजन और खून की कमी वाली गर्भवती महिलाओं के मामले में स्तर बहुत ही गिरा हुआ है. वैश्विक भूख सूचकांक के मामले में भारत का ६६ वाँ दर्जा बहुत ही शर्मनाक है जो बांगलादेश को छोड़ कर अपने दक्षिण एशियाई पड़ोसियों से भी गया-गुजरा है. हमारा देश दुनिया भर में सबसे ज्यादा एकमुश्त भूखे लोगों का ठिकाना है- २५.५ करोड लोग, यानी  कुल आबादी का २१ प्रतिशत. बहुआयामी गरीबी सूचकांक का भी यही हाल है- ४५.५ करोड लोग, यानी ५५ प्रतिशत आबादी भीषण गरीबी की गिरफ्त में है और आठ भारतीय राज्यों में जितने लोग बहुआयामी गरीबी के शिकार हैं उनकी तादाद २६ बेहद गरीब  अफ़्रीकी देशों के कुल ग़रीबों से भी कहीं ज्यादा है.
इन आंकड़ों के पीछे भारतीय समाज के दो महत्वपूर्ण तथ्य हैं- पहला इस देश में निम्नवर्ग की एक बहुत ही भारी तादाद है, और दूसरा, इन वर्गों में विशेष रूप से बड़ी आबादी निम्न जाति के लोगों की (खास कर दलितों की) और आदिवासियों की है. इन सभी सूचकों के मामले में इन समूहों की स्थिति (१० प्रतिशत से भी ज्यादा का अंतर) काफी बुरी है. उदहारण के लिए, कुल ५५ प्रतिशत भारतीय बहुआयामी गरीबी के शिकार हैं, जबकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति में यह संख्या क्रमशः ६५.८ और ८१.४ है. ध्यान दें कि जिन राज्यों की स्थिति ज्यादा खराब है, वे वही हैं जहाँ अनुसूचित जाति और जनजाति का अनुपात अधिक है.
हिंसा की व्यवस्था
निम्न जातियों की रसातल जैसी सामाजिक-आर्थिक स्थिति कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि यह ऐतिहासिक विरासत में मिले उस ढांचे में निहित है जिसने बुनियादी बदलाव में बाधा खड़ी की. भारत की ऐतिहासिक असफलताएँ- जमीन के पुनर्वितरण की भ्रूण-हत्या, खेती की उपेक्षा (१९६०-७० के दशक में हरित क्रांति को छोड़ कर) और जातिगत असमानता पर प्रहार करने में नरम रुख- इन ढांचों को कायम रखने में मददगार साबित हुईं. इस सन्दर्भ में भारत के यात्रा-पथ की एक पेचदार बात पर नजर डालना दिलचस्प है कि जिस दौर में इसने वैज्ञानिक, तकनीकी और उच्च शिक्षा के दूसरे रूपों में भारी छलांग लगाई और जिसके चलते आज के मशहूर भारतीय मध्यम वर्ग की संख्या में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई, उसी दौर में प्राथमिक शिक्षा में बहुत ही घटिया रिकार्ड रहा (यह स्थिति पूर्वी एशिया के ठीक विपरीत है). 
इस विराट असफलता के लिए एक सफाई यह दी जाती है कि पहले के योजनाकारों ने एक भ्रांत धारणा को आगे बढ़ाया कि वैज्ञानिक, तकनीकी और उच्च शिक्षा ही भारत में तीव्र आर्थिक विकास के लिए जरूरी है. लेकिन एक दूसरी व्याख्या भी है जिसमें जाति को एक कारक माना गया है. इस नजरिये का एक अच्छा विवरण यह है कि अपनी दिली इच्छाओं के चलते भारत के ऊपरी जातियों के लोगों को दलितों को शिक्षित करने में कोई लाभ नहीं दिखाई दिया.  इससे थोड़ा कम अच्छा विवरण यह तर्क पेश करता है कि निम्न जातियों को शिक्षित करने की योजना को ऊपरी जातियों की ओर से इसलिए विरोध झेलना पड़ा कि इस तरह की परियोजन और इसके चलते निम्न जातियों का ऊपर उठना, निम्नजाति के मजदूरों, आश्रितों और नौकरों को अपने काबू में रखने की उनकी मंशा को मटियामेट कर देगा. बिहार के देहातों में काम करते हुए और उस दौरान इस तरह की गतिविधि का अवलोकन करते हुए मैंने पाया कि इस अंतिम तर्क में थोड़ा दम है. 
अंततः, इस बात पर ध्यान देना जरुरी है कि यह ढाँचा महज विचारधारा और अपवित्रता के विधि-विधान से नहीं चलता बल्कि भरपूर हिंसा के दम पर कायम है. वास्तव में यह एक ढांचागत हिंसा की व्यवस्था है जिसका इजहार लगातार धमकियों और समय-समय पर फूट पडने वाली शरीरिक हिंसा के रूप में होता है, जिसे जमीन के मालिक ऊपरी जातियों के लोग इस चुनौती के चलते अंजाम देते हैं कि पहले से चले आ रहे सम्बंध बदल रहे हैं और साथ ही निचली जातियों के लोग भी अब विरोध कर रहे हैं और पलटवार भी कर रहे हैं. दलितों के ऊपर अत्याचारहत्या, बलात्कार और आगजनी से लेकर दलित महिलाओं को नंगा करके गांव में घुमाने और पीडितों के मुंह में पेशाब-पाखाना डालने जैसे अपमानजनक कुकृत्य तक के भरपूर दस्तावेजी प्रमाण मौजूद हैं. भारतीय सांसदों ने इन घटनाओं को इतना गंभीर माना कि १९८९ में दलितों के विरुद्ध अत्याचार क़ानूनपारित किया. हालाँकि इस कानून का प्रभावी होना संदिग्ध है, दलित कार्यकर्ता इस बात पर जोर देते हैं कि बिना नीचे से राजनीतिक दबाव बनाये इस कानून को लागू नहीं करवाया जा सकता.
आर्थिक विकास का जो मौजूदा ढर्रा ग्रामीण आबादी और खेतिहर मजदूरों को पहले से भी ज्यादा वंचना की ओर धकेल रहा है, उसे देखते हुए समर्पित कार्यकर्ताओं और अमर्त्य सेन जैसे विद्वानों ने (जिनका भारतीय अकाल के ऊपर किया गया शोध दिखाता है कि भारतीय अकालों के दौरान उसके शिकार होने वालों में दलितों की संख्या बहुत ही अधिक रही है) आह्वान किया है कि वंचित समुदायों के बेहतर राजनीतिक संगठनों के जरिये समतामूलक सत्ता का निर्माण किया जाय. 
तब आखिर बताई के इस सुझाव का क्या किया जाये कि जाति का बड़ी आसानी से खात्मा हो जाता, अगर इसे राजनीति और मीडिया के दायरे से बाहर कर दिया गया होता? निश्चय ही, उन्होंने खुदगर्ज नेताओं और मीडिया के लोगों द्वारा जाति का दुरुपयोग करने का मामला महत्वपूर्ण रूप से उठाया है. लेकिन जाति के अराजनीतिकरण का जो नुस्खा उन्होंने सुझाया है, उससे कुछ होने वाला नहीं. बेहतर रास्ता शायद वह हो जिसे केरल ने तय किया, जहाँ निम्न जातियों की राजनीतिक लामबंदी को संगठन के व्यापक तार्किक-वैधानिक और सर्वव्यापी रूपों के साथ, जाति समुदाय और धर्म से ऊपर उठ कर गठित ट्रेड यूनियनों और पार्टियों के रूपों के साथ एकीकृत किया गया.
हाँ, हमने छुआछूत को मिटा दिया, अब उस भौतिक आधार को मिटने की जरूरत है जो छुआछूत को बनाये हुए है और हररोज  भेदभाव और हिंसा के नए रूपों को जनम दे रहा है.
(लेखक माउन्ट सेंट विन्सेंट यूनिवर्सिटी, हलिफैक्स, कनाडा में  समाजशास्त्र के मानद प्रोफ़ेसर हैं और आजकल सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज, तिरुअनंतपुरम में आमंत्रित अध्येता हैं. यह लेख द हिन्दूमें ७ मार्च को प्रकाशित हुआ था जिसका अनुवाद आभार सहित प्रस्तुत है.)


जाति में जकडे रहना भारत की नियति नहीं

आंद्रे बताई
जो लोग अखबारों और टीवी चैनलों पर सामायिक मुद्दों के ऊपर चर्चा करते रहते हैं, वे अगर यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जाति भारत की नियति है, तो उन्हें माफ़ कर देना चाहिए. राजनीतिक मुद्दों पर टिप्पणी करनेवाले मीडिया विशेषज्ञों के बीच अगर किसी बात में समानता है तो बस यही कि जाति के विषय में और चुनावी राजनीति में उसकी भूमिका की ओर ध्यान आकृष्ट करने में वे हमेशा लवलीन रहते हैं.
बहुतेरे लोग अब यह यकीन करने लगे हैं कि देश में हो रहे जनसंख्या सम्बंधी, तकनीकी और आर्थिक बदलावों से तो इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन फिर भी जातियों और समुदायों में बंटे होना भारतीय समाज का अनिवार्य चरित्र है और इसे मिटा पाना असंभव है. उनका यह भी मानना है कि इन बंटवारों को नजरअंदाज करना या आमदनी, शिक्षा और पेशा जैसे दूसरे बंटवारों की ओर ध्यान दिलाना जमीनी सच्चाइयों से मुँह चुराना है. उनमें से जो कुछ ज्यादा ही रेडिकल हैं, वे यह भी जोड़ देते हैं कि इन सच्चाइयों की अनदेखी करना, दरअसल समाज के फायदे और जिम्मेवारियों का इंसाफ और बराबरी के साथ बंटवारे की राजनीतिक जिम्मेदारी से टालमटोल करना है.
क्या भारत में कुछ भी नहीं बदला है? वास्तव में पिछले साथ सालों के दौरान हमारी राजनीतिक अवधारणा और सामाजिक यथार्थ दोनों ही मामलों में ढेर सारे बदलाव हुए हैं. राष्ट्रीय आंदोलन के जिन नेताओं ने उपनिवेशिक शासन से भारत की स्वतंत्रता के लिए सफलतापूर्वक संघर्ष किया, उनका विश्वास था कि अतीत में भारत भले ही जातियों और समुदायों में बंटा समाज था, लेकिन नए गणतांत्रिक संविधान को अंगीकार कर लेने के बाद यह नागरिकों का राष्ट्र बन जाएगा. वे अत्यंत आशावादी थे. संविधान ने नागरिकों के अधिकारों को स्थापित किया, लेकिन इसने जिन नागरिकों का सर्जन किया उनके दिलों और दिमागों से जाति का निर्मूलन नहीं किया. कई भारतीयों का, शायद अधिकांश लोगों का दिली मिजाज़ आज भी उंच-नीच में बंटे समाज का ही मिजाज़ है.
आपसी खान-पान के नियम
सार्विक वयस्क मताधिकार ने जाति के आधार पर चुनावी समर्थन जुटाने की नयी सम्भावनायें पैदा कीं और इस तरह जातिगत चेतना को समाप्त होने से रोका. लोकतंत्र से अपेक्ष थी कि यह जातिगत भेदभाव को नष्ट कर देगा, लेकिन इसके परिणामस्वरूप जो उम्मीद थी, उससे उलते ही नतीजे सामने आये. लोकतंत्र में राजनीति किसी देश के जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है, लेकिन यह उसका एकमात्र अंग नहीं है. जीवन के दूसरे क्षेत्र हैं जिनमें जातिगत चेतना निस्तेज होती गयी है, भले ही बहुत तेजी से और नाटकीय रूप में न हुई हो. बदलाव की जिस रुझान के बारे में हम आगे चर्चा करेंगे उस ओर मीडिया का ध्यान नहीं गया क्योंकि यह बदलाव लंबे समयांतराल में घटित हुआ. इसे महीने-महीने या साल दर साल देख पाना मुमकिन नहीं, बल्कि दो या दो से अधिक पीढ़ियों के दौरान ही इसे महसूस किया जा सकता है.
हम पवित्रता और अपवित्रता के कर्मकांडी विरोध से ही शुरू करें, जो जातियों के ऊँच-नीच में बंटवारे की एक बुनियाद थी. पवित्रता और अपवित्रता के नियम जातियों और उपजातियों के भीतर भेदभाव और श्रेणी-विभाजन को चिन्हित करने में काम आते थे. इनमें से कुछ लक्षण आपस में घुलने-मिलने और एक साथ खाने-पीने से सम्बंधित थे.  उन्हीं से तय होता था कि कौन किसके साथ खाने की पंगत में बैठ सकता है और किनके हाथ का खाना और पानी ले सकता है. केवल बराबर दर्जे वाली जातियों के लोग ही एक पंगत में खा सकते थे. आम तौर पर लोग अपने से ऊँची जाति के लोगों के हाथ से ही खाना और पानी लेते थे, अपने से नीची जाति के हाथ से नहीं.
भोजन की लेन-देन के बारे में शास्त्रीय विधि-निषेध कठोर थे और अब से सौ साल पहले तक जारी थे. इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि उन विधि-निषेधों का लगातार क्षरण हुआ है. जीवन और कार्य की आधुनिक परिस्थितियों ने इनमें से बहुतेरों को लुप्तप्राय बना दिया. पवित्रता और अपवित्रता के अतिरेक को कोलकाता और दिल्ली जैसे शहरों में रहनेवाले पढ़े-लिखे लोग मजाक का विषय समझते हैं. कॉलेज कैंटीन या ऑफिस के भोजन कक्ष में इस तरह के नियमों का पालन करना असंभव है. सार्वजनिक आयोजनों में लोगों को अपनी-अपनी जाति के अनुसार बैठने पर जोर देना आज शर्मनाक घटना मानी जायेगी.
अतीत में, जाति के नियमों के मुताबिक एक-दूसरे के साथ खाने-पीने और शादी-विवाह करने पर लगाये गए रोक का सीधा सम्बंध था. शादी पर रोक अभी समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन कुछ हद तक इसमें ढील आई है. हिंदुओं में, अंतरजातीय विवाह पर पहले क़ानूनी रोक था. अब वह कानून तो बदल गया, लेकिन जाति के भीतर शादी करने का रिवाज आज भी भारी पैमाने पर देखा जा सकता है. हालाँकि हो यह रहा है कि शादी तय करते समय अन्य बातों के आलावा शिक्षा और आमदनी को भी दिमाग में रखा जा रहा है. बहरहाल, यह बहस करना काफी कठिन है कि पिछले कुछ दशकों से वैवाहिक मामलों में जातिगत चेतना उठान पर है.
राजनीति में, मीडिया में
जाति और पेशे के बीच एक आम जुडाव इस हद तक अभी जारी है कि निम्नतम जातियों के लोग बड़े पैमाने पर घटिया और कम मजदूरी वाले कामों में लगे हैं, जबकि उपरी जाति के लोगों का झुकाव अच्छी आमदनी और सर्वोत्तम पेशों की ओर है. लेकिन जाति और पेशे के बीच का संबंध, जमीन और अनाज की परंपरागत अर्थव्यवस्था की तुलना में आज कहीं ज्यादा लचीला है. तेज आर्थिक विकास और माध्यम वर्ग के विस्तार के साथ-साथ व्यक्तिगत अवसर की गतिशीलता ने जाति और पेशे के बीच के संबंध को और अधिक ढीला किया है.
इन सब के बावजूद, अगर जनता की चेतना पर जातिगत जकडबंदी न सिर्फ कायम है, बल्कि मजबूत होती जा रही है, तो इसके निश्चित कारण हैं. यह कारण संगठित राजनीति के क्षेत्र में देखा जा सकता है. राजनीति के अखाड़े में जाति का प्रवेश आज़ादी हे पहले ही हो गया था, खास तौर पर भारतीय उपमहाद्वीप में. लेकिन आज़ादी के बाद सार्विक वयस्क मताधिकार अपनाये जाने के बाद राजनीतिक प्रक्रिया में जाति को घंसीटने का ढंग और दायरा बिलकुल बदल गया.
जातीय चेतना चुनावों के मौके पर आगे लायी जाती है. लोकसभा और विधान सभा के चुनाव अब पूरे साल होते रहते हैं. सामान पहुँचाने और तैयारी से जुड़े दूसरे कारणों से, विधान सभा के चुनाव भी अब कई-कई हफ्ते में पूरे होते हैं. आम चुनावों के आलावा उप-चुनाव भी होते हैं. चुनाव अभियान दिनोंदिन भडकीले और लगातार खर्चीले होते गए हैं और अक्सर वे आनंदोत्सव का वातावरण तैयार करते हैं. जाति के आधार पर चुनावी समर्थन जुटाना एक जटिल परिघटना है जिसके नतीजे बेइंतिहा अटकलों की गुंज़ाइश पैदा करते हैं.
बावजूद इसके कि पूरे देश के लिए चुनावी मौसम का कभी भी अंत नहीं होता, कोई खास मतदाता चुनाव की प्रक्रिया में कभी कभार और छिटपुट रूप से ही भाग लेता है. औसत ग्रामीण मतदाता चुनावी मामलों के बजाय अपने घरेलू मसलों, काम-धाम और पूजा-पाठ में कहीं ज्यादा दिमाग खपाता है. सब को पता है कि शहरों में रहनेवाले भारतीय मतदाता बहुत काम संख्या में वोट देने जाते हैं. लेकिन मतदान केन्द्र तक जाने के लिहाज से भले ही वे चुनाव में भाग नहीं लेते, मगर अप्रत्यक्ष रूप से वे इनमें जरूर भाग लेते हैं, क्योंकि वे टेलीविजन पर देखते रहते हैं कि बाहरी दुनियां में क्या हो रहा है. थोड़ी मात्रा में राजनीतिक शिक्षा के साथ टेलीविजन हमें मनोरंजन की भरपूर खुराक देता है.
निजी टेलीविजन चैनलों ने एक पूरी दुनिया रची है जिसमें उनके संचालक और विशेषज्ञ एक दूसरे के साथ जीवंत संपर्क में रहते हुए जातिगत घटकके महत्त्व का लेखा-जोखा लेते हैं तथा उनके टीकाकार जातियों, उपजातियों और जातियों के समूहों के बीच की प्रतिद्वंद्विता और गंठबंधन की खोजबीन करते है, जिनमें से अधिकांश लोगों की देश में दूरगामी बादलावों के रुझान की न तो कोई समझ होती है और न ही उसमें कोई रूचि. ये विचार-विमर्श यह भ्रम पैदा करते हैं कि जाति भारतीय समाज का एक अपरिवर्तनीय लक्षण है. आज जातिगत चेतना को मजबूत करने और हमें इस बात का  कायल बनाने के लिए कि जाति भारत की नियति है, मीडिया में जो कुछ चल रहा है, उसे यदि जारी रहने दिया गया तो यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण होगा.
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के मानद प्रोफ़ेसर और राष्ट्रिय अनुसन्धान प्रोफ़ेसर हैं. २१ फरवरी के द हिंदूमें प्रकशित लेख का अनुवाद, आभार सहित.)

किसका है यह विदेशी हाथ

जनसत्ता 5 मार्च, 2012: प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने परमाणु-विरोधी आंदोलनों के खिलाफ खुली जंग छेड़ दी है। पिछले दिनों जीन-संशोधित खाद्य पदार्थों और परमाणु बिजलीघरों के खिलाफ चल रहे जन-आंदोलनों को उन्होंने देश के विकास में बाधक बताया और यह भी कहा कि इन आंदोलनों  के पीछे ‘बाहरी ताकतों का हाथ’ है। 

कम-से-कम इस बार हम अपने प्रधानमंत्री से पूरी तरह सहमत हो सकते हैं। 

इस मामले में यह समझना जरूरी है परमाणु-विरोधी आंदोलन दरअसल मौजूदा व्यवस्था के बाहर से आती हुई एक आवाज है, जिसका राजनीतिक, सामाजिक और नैतिक धरातल मनमोहन सिंह के खयालों के इंडिया से बिल्कुल अलग है।

कुडनकुलम के अनपढ़ मछुआरे अगर आवारा पूंजी के कायदों पर आधारित मनमोहन सिंह के भारत में शामिल हो जाएं तो उनकी रोजगार गारंटी योजना में जितना कमाएंगे, आज वे उसका लगभग तीन गुना प्रतिदिन कमाते हैं। इस आंदोलन के सहारे दरअसल एक टिकाऊ सामुदायिक जीवन नवउदारवादी भारत का हिस्सा बनने से मना कर रहा है। यह सब न सिर्फ मनमोहन सिंह के लिए बाहरी है, बल्कि अंतत: उस अर्थशास्त्र के खिलाफ जाता है जिसकी बुनियाद पर हमारे प्रधानमंत्री खडे हैं। 

पिछले साल जैतापुर में तीखे जन-विरोध के बाद लोगों को ‘विश्वास में लेने’ और ‘जागरूक करने’ जैसे नारों के साथ स्थानीय कमिश्नर जब विशालकाय फौज-फाटे के साथ माडबन गांव पहुंचे तो पूरे गांव ने उनकी इस बैठक का बहिष्कार किया। सिर्फ एक बूढ़ी महिला चौक तक आई और उसने अधिकारियों से पूछा- ‘‘बेटा तुम बात करने आए हो तो इतनी बड़ी बटालियन और बंदूकों के साथ क्यों आए हो? तुमको डर किससे लग रहा है?’’ ऐसी निडरता और यह नैतिक गरिमा जाहिर तौर पर मनमोहन सिंह की चौहद्दी से बाहर है। 

हरियाणा के फतेहाबाद जिले में गोरखपुर परमाणु संयंत्र के लिए किसानों को दी जा रही मुआवजा राशि को कई बार बढ़ा कर अब चौंतीस लाख रुपए प्रति एकड़ कर दिया गया है। गोरखपुर और उसके आसपास के गांवों के किसान पिछले दो साल से फतेहाबाद के मिनी सचिवालय पर धरने पर बैठे हैं और जाड़ा-गरमी-बरसात में लगातार इस धरने पर बैठे रहने से तीन किसान अब तक जान गंवा चुके हैं।
  
हरियाणा में इस संयंत्र की योजना बनाने के पीछे सरकार का यही सोच रहा होगा कि इस प्रदेश के किसान अच्छे मुआवजे पर जमीन देने से नहीं कतराते। लेकिन इस महीने हजारों की तादाद में लोग फतेहाबाद में इकट्ठा हुए और उन्होंने अपनी सेहत, सुरक्षा, जीविका और गरिमा की कीमत पर करोड़ों का मुआवजा लेने और जमीन देने से मना कर दिया। हरियाणा के किसानों का यह सरोकार उन लोगों के लिए बाहरी अजूबा ही है जिनकी हसरतों के मुल्क में हर शय बिकाऊ है। 

कुडनकुलम आंदोलन के नेता डॉ एसपी उदयकुमार ने न सिर्फ प्रधानमंत्री पर मानहानि का मुकदमा दायर किया है और मनगढ़ंत आरोपों के लिए माफी मांगने की मांग है, बल्कि उन्होंने इस बात पर हैरानी भी जताई है कि हमारे नीति-निर्माताओं के सोच से यह बात ओझल कैसे हो गई है कि गांधी के इस देश में पूरा आजादी का आंदोलन छोटे-छोटे चंदों और भागीदारियों से लड़ा और जीता गया। सरकारें, कंपनियां और मीडिया तक, अब सिर्फ पैसे की भाषा समझते हैं। डॉ उदयकुमार ने आंदोलन के पूरे खर्च का ब्योरा सार्वजनिक किया है, जिससे पता चलता है कि मछुआरे, किसान और इलाके के आमलोग अपनी कमाई का एक हिस्सा पिछले कई महीनों से आंदोलन को दे रहे हैं। लोगों के आम सहयोग से चल रहे इस संघर्ष में सबकुछ साझा किया जाता है और नकद की जरूरत ही बहुत कम होती है।  

देश की जमीनी सच्चाइयों से सरकार का इस कदर कट जाना, हमारे समाज और लोकतंत्र के लिए बहुत खतरनाक है। मीडिया और सरकार को तब परमाणु मामले में विदेशी हाथ नजर नहीं आता जब हिलेरी क्लिंटन यह धमकी देती हैं कि अमेरिका भारतीय संसद में पारित परमाणु दायित्व कानून को नहीं मानेगा और उसकी कंपनियों को हादसे की हालत में पूरी तरह मुक्त रखना होगा। परमाणु करार पर संसद में बहस के वक्त अमेरिकी दूतावास के अधिकारी न सिर्फ खुलेआम अलग-अलग पार्टियों के नेताओं से मिल कर ‘सहमति’ बना रहे थे, बल्कि सांसदों को पैसा पहुंचाने में भी उनका नाम आया था। तब मनमोहन सिंह को विदेशी हाथ नहीं दिखा। लेकिन जापान के फुकुशिमा, रूस के चेरनोबिल और अमेरिका के थ्री-माइल आइलैंड में भीषण परमाणु दुर्घटना झेल चुके लोगों से जब कोई सीखने की बात कहता है तो वह विदेशी हो जाता है। वह भी तब जब इसमें बाहर से पैसा आने जैसी बात पूरी तरह मनगढ़ंत हो। 

कुडनकुलम में रूस-निर्मितरिएक्टर का विरोध करने वाले अगर अमेरिकी पैसे से संचालित हैं तो सरकार इस बात का जवाब क्यों नहीं देती कि फिर यही लोग गुजरात और आंध्र में अमेरिकी रिएक्टरों का, जैतापुर में फ्रांस के रिएक्टरों का और हरियाणा, मध्यप्रदेश में लग रहे देशी रिएक्टरों का भी तो विरोध कर रहे हैं। अभी बिजली की हमारी कुल खपत का सिर्फ ढाई प्रतिशत परमाणु ऊर्जा से आता है जिसे अगले तीस सालों में छह से सात प्रतिशत बढ़ाने की योजना है, जबकि अभी ही नवीकरणीय ऊर्जा हमें दस प्रतिशत से ज्यादा बिजली देती है। पिछले कुछ सालों में अक्षय ऊर्जा की तकनीक उन्नत हुई है, इसके दाम भी काफी कम हुए हैं। इसके उलट, परमाणु ऊर्जा न सिर्फ हर हाल में असुरक्षित है,   बल्कि इसकी लागत भी कई गुना ज्यादा है। 

अमेरिका और यूरोप में परमाणु उद्योग पिछले तीस सालों से मंदी का शिकार रहा है और वहां निजी पूंजी इसके कारोबार से कन्नी काट लेती है। पूरी दुनिया में बिना सरकारी मदद और सबसिडी के अणुऊर्जा उत्पादन असंभव है। खुद विश्व बैंक से लेकर बड़ी-बड़ी बीमा कंपनियां भी परमाणु उद्योग को प्रोत्साहित नहीं करतीं। ऐसे में, फुकुशिमा के बाद अगर परमाणु ऊर्जा क्षमता का विस्तार सिर्फ भारत और चीन में होता दिख रहा है, तो इसका कारण यही है कि इन देशों की सरकारें वैसे भी आमलोगों की मेहनत से जमा सरकारी पूंजी बेतहाशा विकास के नाम पर निजी हाथों में लुटाती हैं। देश के संसाधनों को ऐसे ही औने-पौने दाम पर बेचने के मामले 2-जी से लेकर खनन माफिया तक जुड़ते हैं। 

लेकिन हमारे देश में असली गुनहगारों के बजाय मासूमों को निशाना बनाया जाता है। इस हफ्ते कुडनकुलम के नजदीक स्थित नागरकोयल शहर से रेनर नाम के एक जर्मन पर्यटक को रातोंरात देश से बाहर निकाल दिया गया और अगले कई दिनों तक सरकार और मीडिया हमें यह बताते रहे कि इस व्यक्ति ने आंदोलन को पांच सौ करोड़ रुपए की मदद की। रेनर यूरोपीय जिंदगी


 से थके एक अधेड़ फक्कड़ घुमक्कड़ हैं, जो पिछले चार साल से इस इलाके में आते रहे हैं। सस्ते होटलों में ठहर कर प्रकृति और भारतीय सामुदायिक जीवन का अध्ययन उनका शगल है और पांच सौ करोड़ रुपए उनकी पहुंच से बाहर की बात है। कुडनकुलम आंदोलन ने यह मांग की है कि अगर सरकार को अपनी बात का इतना भरोसा है तो रेनर को आनन-फानन में भगाने के बजाय उन पर मुकदमा क्यों नहीं चलाया गया? 

दरअसल, कुडनकुलम आंदोलन पूरी तरह पारदर्शी और अहिंसक है और सरकार उसे किसी तरह घेर नहीं पा रही है। ऐसी ही कोशिशों में कुडनकुलम में एनजीओ और चर्च की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए, लेकिन इनसे आंदोलन न कभी संचालित होता था न इस सबसे कमजोर हुआ। कुडनकुलम के मछुआरे संयोगवश ज्यादातर ईसाई हैं और जब एक पूरा इलाका आंदोलनरत होगा तो उस आबादी का हिस्सा रही सामाजिक-धार्मिक संस्थाएं भी उसमें स्वत: शामिल हो जाती हैं। लेकिन इसकी आड़ में आंदोलन को चर्च और विदेश से संचालित बताना असली मुद्दों से कन्नी काटना है। कुडनकुलम के लोग सरकार से कोई मदद पाने के लिए नहीं लड़ रहे, बल्कि सिर्फ इतना कह रहे हैं कि वे खुश हैं और उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाय। ऐसे में, आंदोलन का कोई कमजोर सिरा सरकार की पकड़ में नहीं आ रहा है। इस मायने में परमाणु-विरोधी आंदोलन बिल्कुल अलग है कि इसने विकास की मौजूदा तर्कपद्धति पर सबसे तीखा हमला किया है और जहां मजदूर आंदोलन ताकतवर होने के बावजूद मौजूदा व्यवस्था की भाषा में ही बात करता है और अपने लिए अधिकारों की मांग करता है, इस आंदोलन का तार्किक धरातल बिल्कुल स्वायत्त है। यह आवाज उस जगह से आ रही है जिसे हम विकास की होड़ में कहीं पीछे छोड़ आए हैं, जहां हमारा भविष्य भी जुड़ा हुआ है अगर हमें एक कौम के बतौर जिंदा रहना है। 

सरकार कुडनकुलम मामले में पूरी तरहइकतरफा और अलोकतांत्रिक रही है। दो दशक से निर्माणाधीन इस परियोजना को लेकर स्वतंत्र विशेषज्ञों ने शुरू से सवाल उठाए हैं। 1989 में ही पर्यावरणीय जांच के बिना परियोजना शुरू करने पर लोग हजारों की संख्या में कन्याकुमारी में गोलबंद हुए थे, जिन पर गोलियां भी चली थीं। आंदोलन के हालिया दौर में भी, सरकार ने एक तरफ तो लोगों से बातचीत के लिए एक विशेषज्ञ टीम बनाई लेकिन दूसरी तरफ आंदोलन के नेताओं पर देशद्रोह जैसे संगीन और झूठे मुकदमे थोपना जारी रखा। 

वार्ता के आखिरी दौर में जब आंदोलन के प्रतिनिधि (जिनमें महिलाएं भी थीं) सरकारी विशषज्ञों से बातचीत करने जा रहे थे, तो उन पर कांग्रेसी और भगवा गुंडों ने हमला कर दिया। सरकार के साथ इस बातचीत के लिए आंदोलन के लोगों ने परमाणु, पर्यावरण और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों से जुडेÞ बीस से ज्यादा स्वतंत्र विशेषज्ञों की एक टीम बनाई थी और यह मांग की थी कि आंदोलन की तरफ से उन्हें तर्क रखने का मौका दिया जाए। लेकिन सरकार ने एक तरफ तो यह मांग नहीं मानी और फिर जब लोगों ने यह कहा कि संयंत्र की सुरक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरणीय प्रभावों आदि से जुड़ी जानकारी और दस्तावेज उन्हें उपलब्ध कराए जाएं जिससे आंदोलनरत लोग तैयारी के साथ बहस कर सकें, तो सरकार ने साफ मना कर दिया। इसके बाद अपनी मनचाही समिति की रिपोर्ट, जिसमें सभी महत्त्वपूर्ण सवालों से किनारा कर लिया गया है, को केंद्र सरकार आम-सहमति के दस्तावेज के रूप में दिखाती फिर रही है! 

दिसंबर के अपने रूस दौरे में प्रधानमंत्री ने यहां तक कहा कि सरकार ने लोगों को बातचीत में जरूरत से ज्यादा जगह दे दी है और जल्दी ही रिएक्टर चालू कर दिया जाएगा। इसके बावजूद जमीनी आंदोलन लगातार तेज हुआ है और एक पूरा समुदाय अपने अस्तित्व के लिए आखिरी लड़ाई लड़ रहा है। कुछ हफ्तों में तमिलनाडु में जान-बूझ कर बिजली की ज्यादा कटौती की जा रही है और मीडिया में इसकी जिम्मेवारी अणु-विरोधी आंदोलन पर थोप कर उसे बदनाम किया जा रहा है। जबकि सचाई यह है कि कुडनकुलम में अगर दोनों रिएक्टर चालू हो जाएं तब भी तमिलनाडु के हिस्से सिर्फ चार सौ मेगावाट तक बिजली आएगी, जबकि इसी राज्य में अगर सारे मौजूदा बल्ब सीएफएल से बदल दिए जाएं तो साढ़े पांच सौ   मेगावाट बिजली बचाई जा सकती है और अगर पूरी सबसिडी दी जाए तब भी इसका खर्च परमाणु रिएक्टर से बहुत कम बैठता है।

जनसत्ता से आभार सहित.
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